50% सेल

    ये सोमवार की सुबह आती क्यों  है?ये सिर्फ स्नेहा के लिये ही इतनी टॉर्चर होती है ,या सभी का यही हाल होता है,मालूम नही!
      तरुण को सिर्फ ये पता है की उसे ठीक 8बजे ऑफ़िस निकलना ही हैं,चाहे शहर मे कर्फ्यू लग जाये,देश मे  इमरजेन्सी आ जाये,पर 8 मतलब 8।
     स्नेहा नाश्ता बना पायी तो ठीक वर्ना ऑफ़िस कैन्टीन जिन्दाबाद।

      जैसा की दुनिया के हर मर्द को लगता है,की उसकी बीवी सबसे निकम्मी है,तरुण को भी पूरा विश्वास है,इस बात पर।
    और वो अपनी निकम्मी बीवी के टाईम मैनेजमेंट से तो कतई खुश नही रहता।

    “क्या करती रहती हो दिन भर ,एक फ़ोन नही संभाल पाती हो,,ऊपर से सारा सब कुछ अपने सर ले लोगी।”
    “क्या ज़रूरत थी नये प्रोजेक्ट पे हाथ मारने की,आराम से बैंच पे थी,,कोई काम नही ,प्रेशर नही,बस जाओ ,और आओ।”
      “अच्छा सुनो अगर आहान और ऑफ़िस एक साथ नही कर पा रही तो कुछ दिन के लिये माँ  को बुला लेते हैं,तुम्हे भी सुविधा हो जायेगी।”
        “नही नही माँ को बुलाने की ज़रूरत नही,मै कर लुंगी।”

      बस मर्दों के पास यही एक हथियार हैं,पता है सास को बुलाने के डर से बीवी हथियार डाल ही देगी। और बिना कोई और शिकायत किये चुप लगा जायेगी।

        पुरूषों के लिये उनका कैरीयर सब कुछ होता है,उनका बॉस ही उनका भगवान और ऑफ़िस ही उनका मदीना।पर औरत के लिये ! सिर्फ उसके समय काटने का ज़रीया।।
       ये बात पुरूषों के मन में भी गहरी बैठी होती है और ऑफ़िस ना जाने वाली महिलाओं के भी।

      “बैंच पे अच्छी थी……कैसे भला? किसको पसंद है काम पे भी जाओ और काम भी ना करो।”
“अरे जब अहान के लिये क्रच मिल ही गया,और ऑफ़िस शुरु कर ही दिया तो खाली क्यों बैठूँ ।”

      स्नेहा अपने विचारों मे उलझी खुद ही बडबड करती काम भी निपटाती जाती है।
     वैसे सभी औरतों मे एक ईश्वर प्रदत्त शक्ती होती है,तीन चार काम एक बार मे कर लेने की,,,लैंड लाईन से बहन से बात भी कर लेंगी,मोबाइल पे ज़रूरी मेल और मैसेज भी चेक होता रहेगा,,और साथ ही सब्जी भी कटती जायेगी,और सबसे ज़रूरी क्राईम पैट्रोल का एपिसोड साथ ही देख लेंगी।

      क्या करें,भगवान ने औरत को बनाया एक पर काम दिये अनेक।
     ऐसे ही स्नेहा खूब हडबडी मे रोज सारा काम निपटाती है,और फिर रात के खाने पे अपने पति से यही सुनती है,कि तुम दिन भर करती क्या हो?

    रोज सुबह 10बजे अहान को क्रच छोड़ कर उसे ऑफ़िस जाना होता है,इतनी हाय तौबा होती है सुबह की पूछो मत। इसी हाय तौबा मे उसने एक बार अपना मोबाइल गलती से कपडों के साथ वॉशिंग मशीन मे घुमा दिया।
       कपडों के साथ उनसे भी ज्यादा साफ सुथरा मोबाइल निकला,और स्नेहा सन्न रह गई,वो तो अच्छा था की उसके मेल पे सारे नम्बर सुरक्षित थे।

     अगली बार अहान का दूध गरम करते मे मोबाइल जाने कैसे अवन मे रखा गया,असल मे उस दिन शाम को तरुण के एक परिचित खाने पे आने वाले थे,क्या बनाऊं,क्या ना बनाऊं की उधेडबुन मे फसीं स्नेहा फ़ोन मे अपनी सहेली से इसी संबंध मे कुछ अति आवश्यक परिचर्चा मे व्यस्त थी ,तभी अहान के लिये दूध गिलास मे निकाला और अवन खोला और कान पर से मोबाईल निकाल के अवन मे रख दिया।

       अबकी बार खूब ठोंक बजा के अहान के पापा ने महंगा सा आई फोन खरीदा,उनका अटूट विश्वास  था की औरतों को सामान से ज्यादा उसकी कीमत से प्यार होता है।बस उनका आईडिया काम कर गया।

     छह महीनों मे दो स्मार्ट फोन गवां चुकी स्नेहा को   स्वयं भी आत्मग्लानी थी। अब वो अहान से भी ज्यादा फ़ोन को संभालती,पर हाय रे फूटी किस्मत!

       वही मनहूस सोमवार का दिन फिर आ गया,,दो दिन की लम्बी छुट्टी के बाद ये दिन बहुत जानलेवा होता है,खासकर नौकरीपेशा औरत के लिये।

      तरुण को नाश्ता करा के भेजा और अपने काम पे लग गई,कामवाली को जल्दी जल्दी काम समझा के अहान को तैय्यार किया और खुद नहाने घुस गई।
       स्नेहा नहा के आके जल्दी जल्दी तैय्यार होने लगी,उसने क्रीम हाथों पे निकाली ही थी की विलासिनी ज़ोर से चिल्लाई “दीदी बाबा ने पॉटी कर ली।” अब स्नेहा जब तक क्रीम को हाथों मे समेटे वहाँ पहुचीं तभी तरुण का फोन आने लगा,तरुण का फोन नही उठाने से जनाब एकदम से चिढ जाते हैं,इसलिए फोन उठाना भी आवश्यक था।
       फ़ोन को कन्धे और कानो के बीच फसाये स्नेहा ने जैसे तैसे बात करी और अहान को वैसे ही उठा बाथरूम मे ले गई।

        अहान को साफ सुथरा कर बड़े प्यार से गोद मे लिया और गर्दन सीधी कर ली,इसी बीच स्नेहा का जानी दुश्मन उसका फोन बड़ी चालाकी से उसे अंगूठा दिखा गया……और 40000 के आई फ़ोन ने ना आव देखा ना ताव कमोड मे कूद कर आत्महत्या कर ली।

   ‘छपाक ‘ इस आवाज के साथ ही स्नेहा का दिल डूब गया,आंखों मे मोटे मोटे आंसू आ गये।
    “हे भगवान! मेरे साथ ही क्यों?”
    “अब क्या मुहँ दिखाउन्गी तरुण को,उनको तो और मौका मिल गया,आज तो जान ही ले लेंगे मेरी।
सही कहते हैं,एक फ़ोन भी संभाल के नही रख सकती। क्या करुँ,कैसे बचू,कोई उपाय।”
       ” सही कहता है तरुण ,मै किसी लायक नही हूँ,ना घर सम्भालना आता ,ना ढंग से खाना बनाना ,कोई काम तो होता जो मै परफेक्टली कर पाती,ऊषा ,नीरू,चंचल ये सब कितने अच्छे से सब कर लेती हैं ।”
     जब कभी इंसान से ऐसी कोई गलती हो जाती है जो कुछ ज्यादा ही महंगी हो,तब उसे अपना असल चरित्र समझ आ जाता है,उसी समय उसे अपने सारे गुण दोष नज़र आने लगते है,अपनी भयानक भूल का पश्चाताप होने लगता है,और जाने अनजाने ही कितनी मन्नते हो जाती हैं…..पर यही कुछ समय बाद वो अति आवश्यक मन्नतें,बिल्कुल ही अनावश्यक होकर मन से निकल भी जाती हैं ।
     “गणेश जी इस बार तरुण के गुस्से से बचा लो ,आपको सवा किलो लड्डू भोग लगाउन्गी वो भी पैदल दगडू शेठ आके”
        (  दगड़ू शेठ पुणे का बहुत प्रसिद्ध गणपति मन्दिर है,जहां लेखक की स्वयं बहुत आस्था है।)
       
           ईश्वर हर असहाय की मदद करतें हैं…..उसी समय लैंड लाइन पे घंटी बजी ,,स्नेहा को पता था ,तरुण का फ़ोन है,,भारी कदमों से जा के बोला “हेल्लो ।”
    “स्नेहा क्या हुआ ,बात करते मे ही अचानक आवाज आनी बन्द हो गई। आहान तो ठीक है ना,अरे बोलती क्यों नही…..मेरा दिल घबरा रहा है जान ,तुम ठीक तो हो ना।”
     डांट पड़ने का डर था ,पर यहाँ तो गहरी सांत्वना वाले शब्द थे,भावुक होकर स्नेहा रो पड़ी।
      ऐसा रोयी ,ऐसा रोयी की हिचकी बँध गई,,बेचारी खुद चुप होना चाहती थी पर रुलायी थी की रुक ही नही रही थी।

    “रुको ,मै अभी आया।” “नही तुम मत आओ,सब ठीक है,,आहान एकदम ठीक है।”
    “वो असल मे मेरा फ़ोन ……कमोड …..”
“ओह्हो अहान ने तुम्हारा फोन कमोड मे गिरा दिया क्या?  अरे कोई बात नही ,तुम तो ऐसे रोयी की मै घबरा ही गया था।”
“फ़ोन के लिये इतना परेशान हो रहा था मेरा बेबी,कोई नही स्वीटहार्ट शाम को चलेंगे नया फ़ोन ले लेना।”
     
    इतनी देर से छाये ऊमस भरे बादल बरस गये,चारों ओर हरियाली छा गई,मयूर नाच उठे,कोयल गाने लगी,सारा संसार खूबसूरती की चादर मे मुस्कुराने लगा और……….स्नेहा की जान मे जान आई …
          …..सच कहतें हैं लोग,बच्चे भगवान का रूप होते हैं,,”आज मेरे बालगोपाल ने मुझे बचा ही लिया।
    वर्ना सच्चाई पता चल जाती तो तरुण ऑफ़िस से ही मुझे गोली मार देता।”

        थोडी देर पहले का गहन दुख दूर हो गया और गुनगुनाते हुए स्नेहा रसोई मे तरुण का मनपसंद खाना बनाने चली गई,,ऑफ़िस से छुट्टी ले ली।।

      खाना बनाते मे उसे अचानक याद आया की ऑनलाइन शॉपिंग की सेल का आज आखिरी दिन था,और उसने ढेर से कपड़े ऑर्डर करने के लिये जमा कर रखे थे, पर हाय री किस्मत !
              50परसेन्ट सेल उसके हाथ से फिसल के कमोड मे गिर चुकी थी……..और स्नेहा एक बार फिर गहन अवसाद मे घिर चुकी थी।

aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

2 विचार “50% सेल” पर

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s