जीवनसंगिनी

     आज आंसू हैं की रुकने का नाम ही नही ले रहे,पर उन्हें आंखों मे रोके रहना मजबूरी है,बहुत नज़ाकत से हल्के हाथों से ही टिशू से आँखो की कोर पोंछ रही हूँ ।
     “मानसी no dear ,plz don’t spoil,..पूरा मेकप खराब हो जायेगा।”
   मेरी ब्युटिशियन ,मेरी सखियाँ,सभी समझा रही मुझे,की अपनी शादी के दिन ऐसे कौन रोता है भला।

तभी नीचे से बुलावा आ गया,जयमाला के लिये,मुझे मेरी सखियाँ,बहनें नीचे ले चली।
जयमाला हुई,फेरे फिरे और मेरी मांग मे अनुराग ने सिन्दूर भर दिया।

दुल्हने सतरंगी अरमान लिये जातीं हैं,मैं राहुल की यादों की पोटली लिये ससुराल चली।

शादी के दूसरे दिन सत्यनारायण पूजन मे एक बार फिर गठजोड़ कर के हमे साथ बैठाया गया,तब भी अपने जीवन संगी को अच्छे से देख नही पायी।

फिर घूमने फिरने हमे ऊटी भेजा गया,पहली बार फ्लाइट में इन्हें भर आँख मैने देखा,इनमे ऐसा क्या दिखा मेरे पिता को ,वही ढूंडने की कोशिश करती रही। कहाँ उनकी चम्पा चमेली सी लड़की और कहाँ ये खडूस। समझ आ गया बाबा को सिर्फ लड़के की कलक्टरी ने ही रिझाया था।

   कितने मनोयोग से बी एस सी प्रथम वर्ष मे प्रवेश लिया था,वहाँ पहुचते ही सीनियर की रैगिन्ग का शिकार होना पड़ा,उफ्फ एक गाना ना गा पाने के कारण ही राधिका मैम ने बहुत ज़ोर की लताड़ लगायी,पर तभी किसी की गहरी आवाज कानों मे पड़ी।
“अरे राधा ,उन मोहतरमा को मत परेशान करो भाई,देख नही रही,कितना घबरा गयी है, जाईये जाईये आप अपनी क्लास मे जाईये।”
जान बचा कर जो भागी मैं,पर जाते जाते अपने उस मसीहा को देख लिया मैने ,राहुल!
 
             अन्तिम वर्ष का होनहार छात्र,जितना होशियार उतना ही मनोहारी,गोरा, लम्बा चौड़ा,ऐसे जैसे फिल्मी हीरो ।
   
                 उसके बाद हमारी दोस्ती हो गयी,जो जल्दी ही प्यार मे बदल गयी,सभी सहेलियां राहुल के नाम से छेड़ती ,ऐसा लगता जीवन सफल हो गया मेरा।
  साथ साथ समय बहता गया ,मैं अन्तिम वर्ष मे आ गयी, राहुल एम एस सी करने लगा।मैं  शादी चाहती थी पर राहुल कैरिअर ,सही भी तो था।मै रुकने को तैयार भी थी पर जाने कहाँ से दुर्भाग्य ने जीवन मे दस्तक दे दी।

    मेरी फुफी की बेटी की शादी मे अनुराग की माताजी ने मुझे देखा ,परिवार के बारे मे पता किया और झट रिश्ता भेज दिया।
   बाबा तो फुले नही समाए ,इतने बड़े घर का लड़का वो भी प्रथम प्रयास मे बना कलेक्टर,उनकी नज़र मे तो उनकी पुत्री का सौभाग्य द्वार खुल रहा था।

      ऊटी से लौटने के बाद हम अनुराग की नौकरी वाले शहर मे आ गये,प्रथम नियुक्ति थी इसीसे एक छोटा सा कस्बा ही था,वहाँ भी सारे प्रशासनिक अधिकारियों की एक अलग कॉलोनी थी।

   हमारा जीवन भी चल निकला,बाकी दम्पतियों की तरह,शान्त और सुगम।
   मैने अनुराग से कभी कोई शिकायत नही की ना उन्हें मौका दिया,पर ये आदमी कभी मेरे हृदय मे जगह नही बना पाया।
   
    एक दिन अचानक फोन बजा”हेलो ! मनु मै बोल रहा हूँ राहुल।”
“यार तुमने अपना मोबाईल नंबर भी बदल दिया,हद करती हो,ये भी नही सोचा मेरा क्या होगा?”
“हेलो राहुल,कैसे हो तुम?”
“मै ठीक हूँ,अभी ये बताओ ,तुम हो कहाँ ।मै मिलने आना चहता हूँ ।मिलोगी ना,या शादी हो गयी तो भूल गयी हमे।”
“हां,मिलूंगी। बाद मे बात करती हूँ,अभी दरवाज़े पे कोई है।”
  
  बहाने से फोन काट दिया ,दिल की धडकने इतनी तेज हो गयी की सच मे दरवाजे की आवाज कानो मे नही पड़ी।

    फिर जाने अनजाने राहुल से बाते शुरु हो गयी,छोटे मोटे संदेशों का आदान प्रदान ,फोटो की अदला बदली ,जीवन फिर सुखमय होने लगा।

    एक दिन ऐसे ही राहुल मे खोयी सब्जी काट रही थी,उंगली कट गयी।खुद ही अल्हड़ सी पट्टी  बांध ली।अनुराग ने नाश्ते के बीच पुछा भी “ये क्या लग गया मानसी।”
                   उफ्फ इस आदमी को बात भी तो करना नही आता,कौन आदमी होगा संसार मे जो अपनी रूपसी पत्नी से ऐसे बोलता होगा,मानसी ! अरे मानू बोल लो,मनु बोलो,मोना बोलो पर नही मानसी !
   मैने भी उतनी ही रुखाई से जवाब दिया-“कुछ नही प्याज काटते मे कट गया।”
    इन्होने नाश्ता खतम किया और औफिस चले गये।
    ऐसी आग लगी की क्या कहूँ,मै भी द्वार भिड़ा कर राहुल को संदेश भेजने मे व्यस्त हो गयी।राहुल को इनकी सारी करनी बताती हूँ ।
 
               मुझे अचंभित करते हुए अनुराग दोपहर अचानक घर चले आये,अपना टिफिन डब्बा भी साथ लाये थे। आते ही बोले”मानसी जल्दी तैयार हो जाओ ,मै रास्ता देख रहा हूँ ।”
               “कहाँ जाना है।”पर मेरा सवाल हवा मे ही खो गया,इनका अर्दली इनके सामने मुझसे कही ज्यादा ज़रूरी फाइल खोल चुका था,और ये उसमे डूब चुके थे।
                   मै अन्दर गयी ,मुझे 10मिनट भी नही बीते की इनकी आवाज आयी,”हो गयी तैयार।”।
                     हे ईश्वर क्या करुँ इस आदमी का,इस संसार मे कौन ऐसी स्त्री होगी जो सिर्फ 10मिनट मे तैयार हो जाये।अभी तो मै अपनी आलमारी खोले यही देख रही थी की क्या पहनूँ ।तभी जिलाधीश महोदय फिर गरजे ” मानसी तुम्हे वापस घर छोड़ मुझे टी एल मीटिंग के लिये जाना।जल्दी कर लो।”
    
               लगा आलमारी के दरवाजे पे अपना सर फोड लूँ ।  जैसे तैसे 15मिनट मे तैयार होके बाहर आयी,हमेशा की तरह इन्होने देखना भी ज़रूरी नही समझा ।हम कार मे बैठे चल दिये।
                               कॉलोनी मे ही एक छोटा सा अस्पताल था,गाड़ी वहाँ जाकर रुकी।
                     मै जब तक अपनी गुलाबी सितारों वाली साड़ी  का आंचल बचाती उतरी ये लपक के काऊंटर पर पहुच्ं के कुछ फॉर्म जैसा भरने लगे।
                     उफ्फ अगर किसी मरीज को ही देखने आना था तो एक बार बता ही देते ,मै इतनी गहरी लाल लिपस्टिक तो ना लगाती,मुझे तो लगा कही बाहर लंच पे लेके जा रहे।
                      ये पर्ची लिये एक कमरे मे दाखिल हुए,पीछे मै भी।वहाँ बैठी डॉक्टरनी ने पूछा -“अरे आईये कलेक्टर साहब ,क्या तकलीफ हो गयी आपको।”
   “जी मुझे नही ,इन्हे” “असल मे सुबह इनकी उंगली कट गयी।”
“ओहो वाह is she your wife..she is quite a mouth full “
उस सात्विकी साऊथ कॉटन साड़ी धारिणी के सामने मेरी रेशमी साडी मुझे डंक मारने लगी।
    क्या सोच रहे होंगे सब , टी टी इन्जेक्शन लगवाने   कौन इतना सज के आता है।

   हम घर पहुचें,अनुराग उस दिन बिना खाए ही चले गये,मीटिंग का समय हो गया था।आज की कोई भी बात राहुल को नही बता पायी।

       एक दोपहर माँ का फ़ोन आया”मनु जल्दी आ जा बेटा,तेरे पापा को अस्थमा का दौरा पड़ा है,भर्ती कराना पड़ा ।”
       घबरा कर तुरंत अनुराग को फ़ोन मिलाया पर इनका नंबर व्यस्त आ रहा था,मै जल्दी जल्दी सामान रखने लगी ।  10मिनट बीते की ये दरवाजे पे खड़े थे,”मानसी जल्दी करो”।
    मुझे अच्छा लगा की ये मुझे मायके भेजने तैय्यार हो गये,सामान लेके बाहर आई,तो इनके अर्दली सारा सामान इनकी गाड़ी मे रखने लगे। मै बैठी,और ये भी,मैने इनकी तरफ सवालिया नजरों से देखा “ट्रेन की टिकट नही मिली मानसी,हम दोनो कार से ही चलेंगे।तुम्हे फ़ोन करने के बाद छोटु ने मुझे भी फ़ोन कर दिया था।”
      पहली बार जीवन मे इनके गले से लगने का बहुत मन किया ,पर मैनें खुद को संभाल लिया।
      वहाँ जाकर तो ये मेरे मायके मे ऐसे घुल मिल गये जैसे ये ही उनके बेटे हैं,मै कुछ नही,सारी भाग दौड की और 2ही दिन मे बाबा की छुट्टी करा के हम घर ले आये।
      शाम को माँ मेरी बिदाई की तैय्यारी मे लगी थी “क्या माँ इतना सारा कुछ देने की क्या ज़रूरत,अभी  बाबा के मे भी कितना रुपया खर्च हुआ होगा,रहने दो ना।”
     “कहाँ कुछ खर्च हुआ लाली,सारा बिल तो जमाई जी ने भर दिया,हमे तो देखने तक नही दिया,छोटु ने जबर्दस्ती छीन के देखा 75000का बिल था।”
     “सच बहुत पुण्य किये है लाड़ो तूने,जो ऐसा पति मिला।” उस रात हम वापस आ गये।

      कुछ दिन बाद करवा चौथ का व्रत पड़ा, भारतीय औरतें भले अपने पति से प्यार ना करे पर पति के लिये रखे जाने वाले व्रत उपवासों से उन्हें बहुत प्रेम होता है,मै भी बहुत चहक के करवा चौथ की तैयारियाँ करने लगी।
                         पर करवा चौथ वाले दिन सुबह ही ज़ोर का सर दर्द चढ़ गया,जब तक नहा धो के आई ,ये नाश्ता करके निकलने की तैयारी मे थे,मेरा सूखा  मुह देख के पूछा “क्या हुआ तबियत ठीक नही क्या।”
जवाब मैने नही कामवालि रधिया ने दिया”आज बहुजी का व्रत है साहब ,करवा चौथ।”
               “अच्छा कुछ जूस वूस ही ले लो,तीरथ को भेज के फल वगैरा मंगा लेना।”
       मंगा लेना ,मेरा सर ,कितना रूखा आदमी है ये।
“अरे जूस कहाँ पियेंगी साब ,आज तो बहु जी निर्जला व्रत किये हैं,शाम को चांद की पूजा कर आपके हाथ से ही पियेंगी।”
     पता नही सुने या नही ,चले गये।    मै भी आराम से सोफे पे पसर गयी और राहुल से वाट्स अप पे बात करने लगी।

        राहुल मुझे देखने को कितना उत्सुक रहता था,उसके कारण हर 2दिन बाद डी पी बदलना पड़ता था,लेकिन उसकी एक बात मुझे पसंद नही आती थी,उसका अनुराग की बुराई करना।
    
                   आज भी राहुल इधर उधर की ढेरों बाते बता रहा था,अचानक उसने कुछ ऐसा कहा की मन खट्टा सा होने लगा।
     वो मेरे शहर आके कुछ दिन रुकना चहता था,किसी होटल मे,जहां हम आराम से मिल सके ।
  “मिलने की क्या ज़रूरत है राहुल,दिन भर तो बातें करतें हैं हम।”
   “ज़रूरत है मनु,सिर्फ बातें ही तो सब कुछ नही होती ना।””तुम समझ तो रही हो ना ,मै क्या कह रहा।”
   “मै अच्छे से जानता हूँ,तुम्हारे खडूस पति को,घमंडी है बहुत,सोचता क्या है,कलेक्टर बन गया तो सब उसके गुलाम है।इतनी सुन्दर बीवी को भी नौकर बना रखा है।”
                            “नही राहुल ऐसी तो कोई बात नही,अनुराग ने कभी मुझे कुछ भी करने को विवश नही किया।”
“अरे तो इसका क्या मतलब ,कभी उसने तुम्हारी तारीफ की क्या।”
“नही तारीफ तो नही की,पर बुराई भी तो नही निकाली।बल्कि जब उस दिन उस डॉक्टर ने मेरी तारीफ की तो अनुराग ऐसे लजा गये की मुझे भी हंसी आ गयी।”
                    “क्या बात है मैडम ,आज बड़ा प्यार उमड रहा ऐसे तो बड़ी बुराईयां निकालती हो।”
                               “अच्छा खैर वो सब छोड़ो,सच बताओ ,तुम मिलोगी या नही,,अगर तुम्हारा इससे आगे जाने का इरादा नही है तो कल से ये गप्पे मारना भी बन्द करो यार,बोर कर दिया है तुमने अपना अनुराग पुराण सुना सुना के”।

   कान मे जैसे सीसा पिघल गया,कैसा आदमी था ये राहुल ,कभी तो मै इसकी जान हुआ करती थी,घण्टों मेरी बातें सुनता था,और आज 3ही महिनों मे मै बोर हो गयी। ईश्वर तेरी माया,क्या पुरूषों को बस यही चाहिये।

   फ़ोन बन्द कर मैने आंखे बन्द कर ली,कुछ अच्छा सोचने का मन कर रहा था,पर ये क्या बन्द आंखों मे बार बार अनुराग क्यों चला आ रहा था।

   शाम को कॉलोनी मे एक साथ सभी की पूजन व्यवस्था की गयी थी,मै भी शादी का जोड़ा पहन तैयार हो गयी।
                    आईने मे खुद को देखती ही रह गयी।इतना सुन्दर भी कोई हो सकता है,अपने मे खोयी मुस्कुरा रही थी तभी कमरे के कोने मे मेरे पीछे खड़े अनुराग पे नज़र पड़ी,वो भी मुझे मुग्ध दृष्टी से देख रहे थे ,मुझसे नजरें मिलते ही तुरंत ही अपनी नज़र हटाये हाथ मुह धोने चल दिये।
               और  मैं अपने इस विजय पर्व पर इठलाती बाहर चली आई।रसोई मे रधिया रात के खाने की तैयारी कर रही थी,कढी मैने बना कर रख दी थी,वो पूरिया निकाल रही थी,बोली “बहु जी आज साहब का डिब्बा ऐसे ही आ गया,साहब तो खाना खाए ही नही।”
    अब इस आदमी के लिये उतना रूखापन नही था मन मे ,पर इस निष्ठुर पे पूरी तरह भरोसा भी नही था,की ये आदमी मेरे लिये भोजन त्याग सकता है।

     ये कुर्ता पहने तैयार हो आये,मैरून कुर्ती मे अच्छे लग रहे थे।हम नीचे गये और पूजा निपटा ली।जान बूझ कर तो ये इंसान कर ही नही सकता अनजाने ही हुआ होगा,इन्होनें भी वही रंग पहना जिस रंग की मेरी साडी थी । हम दोनों ने एक से रंग के कपड़े पहने थे,जिसके कारण नीचे सभी हमे छेड़ते रहे।

     मेरी उस दिन के बाद राहुल से  बात चीत काफी कम हो गयी और अब मै पहले से अधिक सावधान थी,सिर्फ हल्की फुल्की बातें ही करती,ज्यादा भावुकता से बचने लगी थी।
    एक दिन इनकी आलमारी जमा रही थी की ऊपर के आले से एक तस्वीर और एक चिट्ठी गिरी ।
तस्वीर निहायत ही खूबसूरत सी एक लड़की की थी,नाम लिखा था लालिमा,वो सच लालिमा ही थी,साथ मे जो चिट्ठी थी उसे मैने पढ्ना शुरु किया।
” माननीय
       आपके घर पर मैनें मेरी बहन के लिये रिश्ते का प्रस्ताव भेजा था,पर आपकी माताजी को कोई और लड़की भा गयी है,हमने उसका सारा कच्चा चिठ्ठा निकाला,उसका उसके ही कॉलेज के किसी लड़के के साथ संबंध है,सुनने मे आया की लड़की भागने को भी तैय्यार थी,वो तो लड़का संस्कारी निकला।
  आपके घर से हमे खोटे सिक्के सा फिरा दिया गया,मैं नही जानता की वो लोग ऐसा क्या दे रहे जिसका लालच आपके घर वालों पे हावी है,पर हम आपको 30 लाख रुपये और बाकी सारा सामान देना चाहतें हैं जब ये प्रस्ताव आपके पिता के सामने रखा तो उन्होने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया। आजकल के लड़के खुद समझदार हैं स्वयं अपना निर्णय लेने मे सक्षम हैं इसीसे ये पत्र भेज रहाँ हूँ,साथ ही फोटो भी है,पसंद आये तो आप हमे  फ़ोन कर लीजियेगा।
         आपका धरनीधर।”

  मेरा सर घूम गया,कुछ नही सूझा क्या करुँ,मै जाने कब तक वैसे ही बैठी रही,अनुराग कब आये,पता ही नही चला,वो आये ,मेरे हाथ से चिट्ठी ली और फाड़ के फेक दी।
  
                  मैनें आँख उठा कर इन्हे देखा और ज़ोर से रो पड़ी।ये घबरा गये पर वही बैठ कर मुझे सांत्वना देते रहे।

                  “आपने एक बार भी मुझसे कुछ नही पुछा,आप खुद को समझते क्या हैं।क्यों की आपने मुझसे शादी,आज आपको मुझे सब सच बताना ही पड़ेगा।”
               “अरे मानसी क्या बताऊँ ।मैने किसी ज़ोर जबर्दस्ती मे शादी नही की।”देखो जब से नौकरी लगी ,घर पे विवाह प्रस्तावों की बाढ़ सी आ गयी।मै शुरु से ही पढाई मे लगा रहा,कभी जीवन मे कोई लड़की नही आई,माँ से कह रखा था,उनकी पसंद ही मेरी पसंद।”   
       “तो आपको उस चिट्ठी पे विश्वास नही हुआ,की मेरा मेरे कॉलेज मे कुछ…”
           “तुम पागल हो क्या,अरे इस तरह की चिट्ठी पे कौन पुरुष विश्वास करेगा और जो इस पे विश्वास करे उससे बढ़ के मूर्ख मेरी नज़र मे कोई नही।”
      “पर सोचो अनुराग ,अगर ये बात सच होती तो।”
          “तो क्या ,मुझे तो शादी के 5महिनों मे ऐसी कोई कमी मेरी बीवी मे नज़र नही आई, रही बात तुम्हारे पास्ट की ,तो वो हर किसी का एक खुबसूरत पास्ट होता है,पर सच्चा इंसान वही है ,जो सच्चाई से ईमानदारी से अपने जीवन की धारा मे बहता जाये।”
            “हाँ बात वहाँ गलत हो जाती,जब मै या तुम अनिच्छा से इस बन्धन मे बन्धे होते और दुनिया वालों के लिये इस रिश्ते को खीचते चलते,वो मेरी नज़र मे पाप होता,ऐसा कुछ अगर तुम मुझे बताती तो मै दूसरे ही दिन तुम्हे खुद उसके पास पहुँचा देता जिससे तुम असल मे प्यार करती होती।”

     “और हाँ,एक बात और हर इंसान अपने आप मे सम्पूर्ण नही होता,अगर तुम मे कुछ कमियाँ हैं तो मैं तो कमियों की खान हूँ,अगर तुमने मुझे 5 महिने झेल लिया तो पूरा जीवन झेल ही लोगी।”
                “देखो मानसी बहुत लच्छेदार बातें मै नही जानता,मुझे कविताए ना पढना आता ,ना लिखना ,मै एक साधारण सा आदमी हूँ जो अपने परिवार से अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता है,पर मुझसे ये उम्म्मीद ना करना की मै रोज तुम्हारी तारीफ करुँ ।”
               “पर मुझे तो पसंद हैं कवितायेँ “मैं मुस्कुरा उठी,  कितना सरल जीवन परिचय मुझे समझा गये अनुराग,सच तो है जीवन कोई फिल्म नही ,यथार्थ है और यहां मेरे अनुराग जैसे हीरो की ही ज़रूरत है।

   मैं मुस्कुराते हुए रसोई मे चाय चढ़ाने चली गयी,चाय बनाते बनाते ही राहुल को सारा किस्सा कह सुनाया और ये भी बता दिया की वो अब मेरा सिर्फ अच्छा दोस्त है,उससे ज्यादा की मुझसे कोई उम्मीद ना रखे।

    अब मैं अपने रूखे सूखे पति को कैसे अपनी पत्नी को खुश रखना है,कैसे बात करना है,ये सब सब समय समय पे सिखाती रहती हूँ,रोज डे पे मै ही  गुलाब देती हूँ,चॉकलेट डे पे चॉकलेट और वैलेन्टाइन डे पे उन्हे डिनर पे भी ले जाना मेरा ही काम है,,
      हाँ मेरा नीरस कलेक्टर इन सब मौको पे अपना अमुल्य समय मुझे दे देता है,और मेरी इन सब कारगुजरियों पे शरमा के गुलाबी भी हो जाता है,लेकिन आज भी खुल के I love u नही बोल पाता और मै जानती हूं कभी बोल भी नही पायेगा।

इति।

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

“जीवनसंगिनी” पर एक विचार

  1. वाह 👌👌👌👌👌👌 जीवन के हर एक पल का ध्यान रख कर बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया है आपने 👏👏👏👏👏👏👏👏👏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹👍👍👍👍👍👍👍👍💪❤️❤️❤️❤️❤️😘😘

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