जीवनसाथी -16

जीवन साथी –16

    “अगर तुम बताना सही समझो तो बता दो पिंकी कि आखिर वो क्या तकलीफ है जो राजा अपने दिल में दबाये है, एक दो बार कुछ इशारा तो दिया लेकिन कभी कुछ खुल के बताया नही।”

   ” अच्छा!! वैसे तो राजा भैया सबसे अपने मन की बात कहते नहीं हैं, ऐसा क्या इशारा दिया तुम्हें?”

  ” कुछ खास तो नही, बस ऐसे ही एक रात हम बालकनी में बैठे कॉफ़ी पी रहे थे तब कुछ स्कूल कालेज के किस्सों की बात हो रही थी तभी राजा ने अपने कॉलेज के किस्से सुनाये थे, एक दो नही ढ़ेर सारे किस्से!! और उन्हें बताते हुए उनकी आंखें ऐसी चमक उठीं थीं जैसे कोई छोटा बच्चा अपने बचपन की सबसे प्यारी चीज़ के बारे में बता रहा हो, और साथ ही ये भी बताया की वो कॉलेज के कुछ साल उनकी जिन्दगी के सबसे हसीन लम्हें बन कर रह गयें हैं, जहां ना कोई फिक्र थी ना कोई चिंता, हर तरफ से बेपरवाह वो बिल्कुल किसी पँछी से उड़ते फिरते थे, और पता है एक राज़ की बात भी बताई थी।”

” क्या ऐसा क्या बताया भैय्या ने?”

” ये बताया कि उनकी स्कूल की पढ़ाई तो तुम्हारी रियासत के पुश्तैनी स्कूल से ही हुई, जैसी तुम्हारे यहाँ शायद सभी बच्चों की हुई होगी, है ना?”

” हाँ! हम सब भी हमारी रियासत के स्कूल से ही पढ़े  है।”

” हाँ तो इसलिये उन्हें स्कूल में भी वो आज़ादी नही लगती थी। वो असली दुनिया देखना चाहते थे और इसलिये घर वालों को किसी तरह मनाकर वो बाहर पढ़ने चले गये बनारस!! इसके बाद पता है पिंकी क्या हुआ?”

” क्या हुआ बंसी ?”

” इसके बाद मैं तो एकदम इंप्रेस हो गयी , मैंने कहा अरे वाह तुमने बनारस से पढ़ाई की है इसलिये इतना नॉलेज है तो तुम्हारे भैय्या बोलते हैं _” कौन कम्बख्त वहाँ पढ़ने गया था, हम तो कॉलेज तभी जाया करते थे जब मस्ती कर कर के बोर हो जाते थे, ऐसे ऐसे काण्ड किये वहाँ रहते हुए कि कोई सोच भी नही सकता था।”

” देखो भाई मेरा है लेकिन आज तक मुझे ही कुछ नही बताया, आने दो अभी खबर लेती हूँ ।”

” बिल्कुल सही, आने दो राजा को उसके मुहँ से ही सुनना ,इतना मज़ा आयेगा की दुनिया ही भूल जाओगी, उस रात हम दोनो तीन बजे रात तक यहाँ बैठे गप्पे मारते रहे थे, अच्छा तुम बताओ क्या बता रहीं थी अपने घर परिवार और राजा के बारे में ….

    ” हाँ बंसी अब तुम्हे बताने में कैसा संकोच…..
         वैसे हमारी फैमिली के बारे में भी तुम बहुत कुछ नहीं जानती हो। हमारे  पूर्वज मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों के राजा हुआ करते थे, उन्होंने काफी लंबे समय तक शासन किया था।
    कहा जाता है कि मुगलों के आने के बाद भी हमारे पूर्वजों ने अपना राज पाट नही छोड़ा, उसके बाद अंग्रजों का शासनकाल आया, पर तब भी अपनी शान पे हमने बट्टा नही लगने दिया, दादी तो बताती हैं कि हमारे दादा जी अपनी यंग एज में 14- 15 साल की उम्र में फ्रीडम फाइटर बन गये थे हमारे महल का खूब सारा पैसा उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए लगाया था। कभी अगर तुम्हारा मेरी दादी से मिलना हुआ तो उनसे यह किस्सा सुनना खैर वह सब तो पुरानी बातें हैं सब बीत गया अब!! अब वह राजा महाराजा वाली बात तो नहीं रही लेकिन अभी भी भोपाल के आगे हमारी एक छोटी सी रियासत है।
      मेरे पापा लोग दो भाई और एक बहन हैं, हमारी फुफू साहब का परिवार भी हमारे साथ ही रहता है , मेरे बारे में तो जानती ही हो, मैं अपने माता पिता की इकलौती संतान हूँ, असल में मैं जब पैदा हुई उसके बाद से माँ साहेब को कुछ तकलीफें रहने लगीं थी, कभी कभी माँ साहेब बताती हैं कि उन्हें लगता था जैसे उनकी सबसे मुहँलगी नौकरानी ही उनके खाने में ऐसा कुछ मिलाती थी कि उनका कभी दिन दिन भर सर भारी रहता था तो कभी आंखें भारी हो जातीं थी, हालांकि उस समय शायद माँ डिलीवरी होने के बाद वाले डिप्रेशन के दौर से गुज़र रहीं थीं ।
   खैर माँ साहेब का ध्यान इन सब बातों से हट जाये इसलिये जब मैं दो साल की हुई तब मेरे पापा मुझे और माँ को लेकर विदेश जा बसे, हम कुछ चार पांच साल ही वहाँ रहे कि काकी के गुज़र जाने के बाद काका साहेब ने बहुत ज़िद कर हमें वापस बुला लिया, उसके बाद माँ एक बार फिर उम्मीद से थीं लेकिन मन्दिर की सीढ़ियाँ उतरते हुए उनका पैर फिसला और सब बर्बाद हो गया, बस उसके बाद माँ ने कभी दुसरी औलाद के लिये नही सोचा और ये हमारे भाई साहब भी हैं जो माँ को कभी बेटे की कमी महसूस नही होने देते!!
   सच बताऊं बंसी राजा भैया ही हैं जिन्होंने मेरी मां को संभाले रखा है उनकी हर बात का ध्यान रखना दवाइयों का ध्यान रखना उन्हें हमेशा खुश रखना यह सारा काम भैया ही जिम्मेदारी से निभाते हैं, उनका हमारे लिए प्यार देखकर कभी यह लगता ही नहीं कि वह मेरे सगे भाई नहीं है।
   एक कमजोरी मेरे परिवार की ओर है जहां मेरी मां की तबीयत हमेशा खराब रहती थी वही मेरे पापा को भी बुरी लत है शाही लत!! पीने की लत!! वह सुबह शाम अपनी लाइब्रेरी में अपनी शराब में ही खोए रहते हैं ।।जब मैं छोटी थी तब पापा साहब ऐसे नहीं थे मुझसे बहुत प्यार करते थे, मेरे जीवन का स्वर्णिम काल था जब हम विदेश में रहे थे बहुत सारा कुछ तो याद नहीं लेकिन इतना याद है कि वहां पर मां और पापा बहुत खुश थे। वापस आने के बाद जाने क्यों पापा भी धीरे-धीरे अपने काम से उतरते चले गए पता नहीं किस बात का उनके मन पर बोझ था कि उन्होंने अपने आप को शराब में डुबो लिया मां अपनी बीमारी में पड़ी रहती थी सच कहूं तो मुझे पालने पोसने वाले राजा भैया ही हैं इन्होंने ही मुझे वह बनाया है जो मैं आज दिखती हूं ।।
      बिल्कुल पलकों में बिठा कर रखा, जीवन का सत्य असत्य सब कुछ समझाया और जब मैंने कलेक्टर बनने की इच्छा जाहिर की  तो एक राजा भाई ही थे जिन्होंने सारे घर वालों के खिलाफ अकेले खड़े होकर मुझे सपोर्ट किया वरना जैसा मेरा परिवार है मुझे कभी अपने शहर से इतनी दूर अकेले पढ़ाई के लिए आने मिलता ही नहीं।।
   मुझे इतना सपोर्ट करने वाले राजा भैया का जीवन भी इतना सरल नहीं है बंसी ,राजा भैय्या जब छै: साल के थे, उसी समय काका साहब यानी राजा भैया के पिता साहब किसी काम से बाहर दूसरे शहर गए थे किसी जमीदारी की वसूली के लिए , कोई बड़ा मुकदमा था जमीन जायदाद का ।।
    जमीन का एक बहुत बड़ा सा हिस्सा था जो हमारे दादा जी ने किसी को लीज पर दिया था लीज खत्म हो गई थी लेकिन सामने वाला वो टुकड़ा वापस करने को तैयार नहीं था जब दीवान साहब वहाँ से खाली हाथ वापस लौट आये तब काका साहब की शाही सवारी खुद गई थी बातचीत करने के लिए…… वहां क्या बात हुई क्या हुआ हमें नहीं पता…. लेकिन एक हफ्ते बाद जब काका साहब वापस लौटे तो उनके साथ छोटी मां थी!!
     उन्होंने वहां दूसरी शादी कर ली थी और वह सारी की सारी जमीन छोटी मां के पिता जिन्होंने लीज़  पर हमारे दादा से जमीन ली थी उनके नाम कर दी थी । हमारा पूरा परिवार सन्न रह गया था।
    उस समय राजा भैया सिर्फ छै  बरस के थे और मैं दो साल की।
    काका साहब के सामने किसी की कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं थी फिर भी मेरे पापा ने काका साहब से  बातचीत की लेकिन काका साहब ने मेरे पापा को ही झटक दिया और कमरे से बाहर निकाल दिया, बस उसी अपमान के बाद मेरे पापा मुझे और माँ को लेकर घर छोड़ कर चले गये।।
   फिर हम चार साल बाद वापस लौटे तब तक भाई दस बरस के हो चुके थे।
   असल में उसी समय एक हादसे में काकी साहेब नही रही, हम लोग तो वहां थे नहीं इसलिए कुछ देखा नहीं लेकिन सुनी सुनाई बातों से यह पता चला कि पिछले दो-तीन सालों से काकी साहब बहुत बीमार रहने लगी थी। अक्सर बिस्तर पर ही रहती थी, राजा भैया बहुत छोटे थे युवराज भाई भी कुछ बहुत ज्यादा बड़े तो थे नहीं लेकिन फिर भी काकू साहब दोनों बच्चों से मुंह फेर कर अपनी बीमारी से ही जूझती रहती थी। उनकी असमय की बीमारी ने ही शायद युवराज भैया को समय से पहले बड़ा कर दिया। युवराज भैया राजा भैया से 5 साल बड़े हैं उन्होंने भी बहुत कष्ट झेले बहुत सेवा की उन्होंने काकू साहब की लेकिन फिर भी उन्हें बचा नहीं पाए मेरी मां की पर्सनल हेल्पर ने हमें यह सब बताया कि छोटी मां के आने के बाद काकी  साहब बहुत परेशान रहने लग गई थी।
     उस समय तो मैं छोटी थी मुझे यह सब बातें समझ नहीं आया करती थी लेकिन अब समझ आता है उस समय छोटी मां नई-नई ब्याह कर आई थी एक सामान्य परिवार की औरत का इतना बड़ा महल देख कर चौंक  जाना स्वाभाविक था वह हर समय इसी जुगत में लगी रहती कि किस तरह काका साहब को अपने आप में व्यस्त रखें काका साहब भी अपनी नई नवेली बीवी की तरफ इतने उलझ गए कि दोनों बेटों और पहली बीवी की तरफ से उनका ध्यान बिल्कुल हट गया। शायद इन्हीं सब कारणों से काकी साहब असमय ही हम सब को छोड़ कर चली गई, उनके जाने की खबर जब काका साहब ने मेरे पापा को दी उसके बाद पापा तुरंत हम सबको लेकर वापस चले आए।।
     पूरे 4 साल बाद मैं युवराज भाई और राजा भैया से मिली थी पर हम तीनों का रिश्ता उतना ही पक्का था जितना 4 साल पहले था फिर हम तीनों साथ साथ पलने बढ़ने लग गए लेकिन ऐसा नहीं था कि हम तीनों बच्चों की दुनिया में और कोई नहीं था और लोग भी थे क्योंकि छोटी मां के भी दो जुड़वा लड़के हुए जो मुझसे सिर्फ तीन  साल ही छोटे थे।।
    
          इसी बीच फूफा साहब का सारा कारोबार उनके जुए की लत की भेंट चढ़ गया उनके पास एक फूटी कौड़ी नहीं बची उन्होंने अपना घर अपनी जमीन सब कुछ दांव पर लगाकर एक बड़ा दांव खेला था और जिसमें वह बुरी तरह से हार गये उसके बाद फूफू साहब भी अपने दोनों बच्चों के साथ हमारे दरवाजे चली आई और तब से हम सारे लोग साथ रहने लगे।।
    राजा भैया की मां यानी हमारी काकी साहब के गुजरने के बाद राजा भैया के जीवन में खूब सारी परेशानियां आई,, युवराज भाई तो बड़े हो चुके थे उन्होंने अपने आपको पूरी तरह अपनी पढ़ाई लिखाई में डुबो दिया था।
     युवराज भाई को किसी से कोई लेना देना नहीं था उनका जीवन उनकी किताबों और उनके स्कूल तक ही सीमित हो गया था ना उन्हें काका साहब के स्वास्थ्य से कोई मतलब था ना छोटी माँ से ना मेरे माता-पिता से।। लेकिन एक तरह से अच्छा ही था क्योंकि युवराज भाई समझ गए थे कि उनका पढ़ना लिखना जागरूक बनना बहुत जरूरी है वरना इतनी सारी जायदाद को लूटने खसोंटने वाले भी बहुत हैं उनकी व्यस्तता के कारण हम सभी खासकर मेरी जिम्मेदारी राज भैया पर आ गयी थी, बेचारे जिस उम्र में बच्चे अपनी माँ से अपनी पसंदीदा चीज़ की फ़रमाइश के लिये रोते ज़िद करतें हैं उस उम्र में वो उल्टा मेरी फ़रमाइशें पूरी करने लगे थे।
    काकी साहब की मौत का मेरी माँ को भी बहुत झटका लगा था, वो पहले ही कमज़ोर थी उनके जाने के बाद से बिस्तर ही पकड़ लिया और मेरी जिम्मेदारी भाई पर आ गयी।
    छोटी माँ अपने दोनो छौनों में व्यस्त रहतीं थीं लेकिन उन जैसी औरत मैंने दूसरी नही देखी। हमारे सामने व्यस्तता का बहाना कर भी उनकी पूरी नज़र राजा भैय्या और युवराज भाई पर ही टिकी रहती थी।

” मतलब?”

” मतलब ये बंसी कि वो नही चाहतीं थीं कि काका साहब के बाद सारी जिम्मेदारी इन दोनो भाईयों में से किसी को मिले, वो चाहतीं थी सारा सब कुछ उनके दोनो बेटों में बंट जाये, हमारी फुफू साहब भी उन्हें अच्छे से जान गईं थीं इसलिये वो हमेशा चाशनी टपकाती उन्हीं के पीछे पीछे घूमने लगी, घर की मुख्य तीन औरतों में एक बिस्तर पर पड़े जीवन काट रही है और दो अपने षडयंत्रों में लगी हैं।”

” जब तुम्हें ऐसा लगता था तो तुमने यह सब किसी से कहा क्यों नहीं?”

“किसे कहती बंसी?  मेरी मां तो बस पूजा पाठ में व्यस्त रहती हैं उनकी जिंदगी का अब एक ही उद्देश्य है कि मेरी किसी अच्छे लड़के से अच्छे घराने में शादी हो जाए उसके बाद वह सब कुछ छोड़ कर पापा को लेकर हरिद्वार चले जाना चाहती हैं उन्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता, कुछ उन्हीं के जैसे पापा का भी हाल है, युवराज भैय्या अब अपने परिवार में व्यस्त हैं उनकी शादी भी छोटी माँ ने अपने पहचान में करवाई, अपनी दूर की रिश्ते की भतीजी रूपा भाभी से, बचे हमारे भैय्या जी,उनसे कुछ भी कहना व्यर्थ है।

” क्यों?”

” क्योंकि वो छोटी माँ के खिलाफ कुछ नही सुनते, हालांकि कई बातों में वो हमारे घर में सदियों से चली आ रही रुढ़ियों को भी नही मानते ..

” जैसे?”

” जैसे हमारे यहाँ हम सभी ‘मैं ‘ ‘तुम’ ऐसा नही बोलते हमारे यहाँ बोलने बात करने का एक शिष्टाचार है उसे निभाना हम सभी के लिये ज़रूरी है मैं की जगह हम बोलना , सभी बड़े अभिभावकों के सम्बोधन में साहब लगाना लेकिन हमारे भाई साहब इन सभी कायदों की धज्जियां उड़ा देतें हैं, कारण पूछो तो कहतें हैं इन कायदों के पीछे कोई लॉजिक नही है, इसलिये नही मानूँगा, तभी तो मैंने कहा ना कुछ मायनों में कभी कभी बिगड़े नवाब बन जातें हैं और कभी बिल्कुल ही सीधी गाय।
     हमारे यहाँ तीज त्योहारों पर गांव खेड़े के लोग मिलने आतें हैं कर के नाम पर जिससे जितना हो सकता है चढ़ावा लेकर आतें हैं और दीवाली वाले दिन दीवान खाने में अपना चढ़ावा रख कर काका साहेब और बाकी बड़ों के पैर छू कर काका साहेब के हाथ से मिठाई लेकर हँसी खुशी चले जातें है, सदियों से ये परंपरा निभाई जा रही है शायद अंग्रजों ने ये भेंट देने की रस्म शुरु की थी जो उनके जाने के बाद गांव वालों के गले का कांटा बन गयी…..
    राजा भैय्या का इक्कीसवाँ  जन्मदिन बीता था उसके बाद की दीवाली पर भाई साहब इस रस्म पर अड़ गये, पहले तो उन्होंने अपना पेट काट कर लाये गरीबों के उन तोहफों को वापस किया उसके बाद सबको खुद के पैर छूने से मना कर दिया, दिवानखाने में उस दिन जबर्दस्त हंगामा हुआ था, काका साहब फूफा साहब दीवान अंकल तो नाराज़ होकर भीतर ही  चले गये बस अकेले युवराज भैय्या थे जिन्होने आगे बढ कर राजा भैय्या को गले लगा लिया।
   तुम्हें पता है बंसी घर पर मैं अकेली ही राजा भैया को राजा कहतीं हूँ, बाकी सब उन्हें राजकुमार या कुंवर कहतें है, और मैं भी जानबूझ कर उन्हें राजा भैय्या कहतीं हूँ क्योंकि मैं दिल से चाहतीं हूँ कि काका साहेब के बाद वो ही राजा बनें।”

” क्यों युवराज भैय्या क्यों नही?”

” हाँ कायदे से युवराज भैय्या को ही बनना था लेकिन बचपन से उनके दाहिने पैर की एक अंगुली नही थी और हमारे यहाँ राजा बनने के लिये ज़रूरी शर्त है कि सामने वाला शारीरिक और मानसिक रूप से किसी प्रकार भी अक्षम ना हो, बस इसलिये युवराज भैया नही बन सकते, और वो बचपन से इस बात को जानते थे इसलिये तो उन्होने इतनी सारी पढ़ाई की है जिससे राजा भैय्या को कभी कोई मुश्किल ना आये, मेरे दोनो भाई वाकई हीरा हैं लेकिन ….

  ” सॉरी पिंकी बीच में तुम्हारी बात काट रहीं हूँ, लेकिन एक बात पूछना था, मैंने अक्सर हमारे फ्लैट के बाहर दो आदमियों को टहलते हुए देखा है, अभी भी तुम जब नही थी तब दो एक बार मैंने नीचे राजा को उनसे बात करते भी देखा, वो लोग कौन हैं?”

” ओह्हो तो हमारी जासूस करमचंद ने पकड़ ही लिया।”

” बोल ना पिंकी कौन है वो दोनो धनुर्धर”

  ” मेरे बॉडीगार्ड हैं, यहाँ रहने आयी तब राजा भैय्या ने मेरे साथ इन्हें भेजा था, सामने के फ्लैट में रहतें हैं, पर जब मैं दिल्ली गयी तब ये बेचारे यहीं रह गये, इसलिये शायद जब भैय्या ने इन्हें यहाँ देखा तो इनकी खबर ले रहें होंगे।।

   दोनो सखियाँ बातों में लगीं थी की राजा वापस आ गया, दोनों को साथ साथ हँसते बोलते देख वो भी वही आकर बैठ गया__

” क्या हुआ भाई सोना नही है क्या आपको??”

  ” जब से मेरी संगत में हैं इनकी नींदे कम हो गयी हैं पिंकी।”

  अपनी बिन सोचे समझे कुछ भी कह देने की आदत से मजबूर बाँसुरी  फिर एक फुलझड़ी छोड़ कर नाश्ता बनाने रसोई में चली गयी…
   लेकिन उसकी बात सुन राजा पिंकी के सामने कट कर रह गया….

” जी हाँ वो तो तुम बता ही चुकी हो कि कैसे रात भर बैठ कर भाई साहब तुम्हें अपने कॉलेज के किस्से सुनातें हैं, भई हमें तो कभी नही सुनाया?”

  पिंकी की बात सुन राजा झेंप गया__” अरे वो तो उस दिन कुछ ऐसी बात छिड़ गयी थी बस इसिलिए

” तो हमें भी सुना दो कुछ कॉलेज के किस्से , आपकी अधुरी कहानियां….

” वो तो सुना दूंगा छुटकी पर पहले ये बताओ की तुम रामसिंह को अपने साथ दिल्ली क्यों नहीं लेकर गईं थीं ।

पिंकी ने राजा की बात सुन अपने कान पकड़ लिये__” सॉरी भाई इस बात के लिये तो हम माफी चाहतें हैं।”

   दोनों भाई बहनों की इस झूमाझटकी के बीच बांसुरी रसोई से नाश्ता और चाय लिये बाहर चली आयी__

  ” आओ अब पहले कुछ खा पी लो, इनकी कहानियां इनके गानों के साथ सुन लेना।”

   ” अच्छा तो भाई तुम्हें गाने भी सुनाते हैं?”

पिंकी ने सवालिया नजरों से राजा की तरफ देखा

  ” भाई सच बताना , आप अब भी गाते हो?”

  ” हाँ छुटकी, कभी कभी गा लेता हूँ, वो देख उधर क्या रखा है?”

  दीवार के सहारे लगी गिटार देख पिंकी की आँखे चमकने लगीं …..

  वो राजा के सीने से एक बार फिर जा लगी और उन दोनों को देख बांसुरी गिटार देख कर ऐसा खुश होने की क्या बात है, इस सोच में डूबी गिटार उठा लाई और राजा के सामने रख दी__” मैं शुरु करतीं हूँ, तुम आगे बढ़ा देना….

    तू है दिया मैं हूँ बाती, आजा मेरे जीवनसाथी
  कसमे वादे निभायेंगे हम, मिलते रहेंगे जनम जनम……..

क्रमशः

aparna..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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