जीवनसाथी – 19

जीवन साथी -19

       इन सपनों की तस्वीरों से
            इन यादो की जंजीरो से
      अपने दिल को कैसे, हम आज़ाद करेंगे

      ये मौसम चले गये तो, हम फरियाद करेंगे
      ये लम्हे, ये पल हम बरसो याद करेंगे……..

टैक्सी में चलते गाने को गुनगुनाती बांसुरी खिड़की से बाहर उगते सूरज को देखती खोई रही, तभी अचानक उसे जाने क्या याद आया, उसने राजा से समंदर के किनारे चलने की इच्छा जाहिर कर दी…..

   ” चल भाई बीच की तरफ मोड़ ले”

   ” भाऊ दुप्पट भाड़ा घेईल ( दुगुना भाड़ा लगेगा)

   ” छान भाऊ! तुम्ही च्सला !” (ठीक है, चलो)

   राजा के मुहँ से मराठी सुन बांसुरी सकते में आ गयी,

  ” तुम्हें मराठी आती है? तुमनें कभी बताया नही?

  ” मैडम मुझे फ़्रैंच और जैपनीज भी आती है, पर इसका मतलब ये थोड़े ही है कि मै अपनी शर्ट पर लिख कर चलूँ कि मैं पॉलीग्लॉट या मल्टीलिंगवल हूँ “

  ” अरे ये मेरा कहने का मतलब नही था मिस्टर पॉलीग्लॉट”

” जानता हूँ, तुम अक्सर वो कह जाती हो जो तुम कहना नही चाहती हो, और जो तुम कहना चाहती हो उसे कह नही पाती हो”
     राजा ने बांसुरी की आंखों में देख कर कहा , कुछ देर राजा को देख कर बांसुरी ने आंखें फेर लीं और एक बार फिर बाहर देखने लगी, कुछ देर में ही वो दोनो जुहू बीच पर पहुंच चुके थे…..

    भोर का उजाला चारों तरफ अच्छे से फैला नही था, कहीं कहीं अभी भी हल्की अंधियारी थी, ऐसे में सामने उफनता समंदर और चारों तरफ बहती हवा में यूँ लगा दोनों बहे जा रहे थे…..

बहुत आगे तक जा कर दोनों रेत पर ही थोड़ी थोड़ी दूरी पर बैठ गये….
     बहुत देर तक खामोश बैठे रहने के बाद बांसुरी ने एक बार राजा की तरफ धीरे से देखा, दोनों पैरों को घुटनों पर से मोड़ कर राजा ने अपनी बाहों के घेरे से पैरों को थामा हुआ था , आंखें बन्द किये वो जाने किन ख्यालों में खोया हुआ था, बांसुरी को उसे डिस्टर्ब करने का मन नही हुआ, वो वापस सामने देखने लगी तभी उसकी नज़र राजा के पैर के एकदम करीब पहुंच गए बिच्छू पर पड़ी काले रंग का बड़ा सा जहरीला बिच्छू बहुत खतरनाक नजर आ रहा था बांसुरी लपक कर उठी और उसने अपने हाथ से उस बिच्छू को उठाया और दूर ले जा कर फेंक दिया, बिच्छू को फेंकने के बाद समंदर के पानी से अपना हाथ धोकर वो जैसे  ही पलटी उसने देखा राजा उसके पीछे ही खड़ा था , उसके साथ ही एक और लड़का खड़ा था जो कुछ देर पहले ही वहाँ आया था अपनी चाय की टपरी लगाने। उसी ने बांसुरी को बिच्छू को उठा कर फेंकते देखा था, हालांकि ये सारी उठा पटक करते समय राजा की शान्ती में विघ्न ना पड़े इसका बांसुरी ने पूरा ख्याल रखा बावजूद रेत पर होने वाली खसर पसर ने उसका भांडा फोड़ दिया, आंखें खोले राजा कुछ समझ पाता तब तक चाय वाले पांडुरंग ने राजा को अमीष देवगन बन कर चीख चिल्ला कर सारी सच्चाई बता दी__

  “हो आपल्या बायकोने इथून विंचू घेतला ( तुम्हारी बीवी बिच्छू यहाँ से ले गयी)
    कुछ चायवाले की बात से और कुछ बांसुरी की जल्दबाजी से राजा को सब समझ आ गया, और वो भी बांसुरी के पीछे लपका, उसके पीछे चाय वाला उसके रेत पर छूटे मोबाईल को उठा कर दौड़ा ।

“पागल हो गई हो क्या तुम ? बिच्छू अगर जहरीला होता तो? मान लो अगर वह काट देता तो?”

” पर ना ही उसने काटा और ना ही वह जहरीला था तो अब क्यों टेंशन ले रहे हो।

” यार दूसरा भी उपाय होता है ना। मुझे जगा देती मैं पैर हटा लेता। वहां से सरक जाता तुम्हें जेम्स बॉन्ड बनने की क्या जरूरत थी खुद उठाकर बिच्छू हाथ से समंदर में बहाने चली हो।

” ओह तो आजकल जेम्स बांड समंदर में बिच्छू बहाते हैं।”

” अपना हाथ दिखाओ कहीं कुछ चोट तो नहीं लगी!

        ऐसा कहकर उसने बांसुरी के दोनों हाथ थाम लिए। सत्ताईस साल की उम्र का अनुभवी और परिपक्व राजा भी कभी-कभी ऐसी विवेक हीनता कर जाता था कि सामने वाला लजाकर रह जाये। पर अपने आप में बेखबर राजा ऐसी लोकाचार और शिष्टाचार की बातों को भूल जाता था। उसके पहले स्पर्श से कांपती झिझकती बांसुरी उसके हाथ में अपने हाथों को देखकर असहज हो रही थी लेकिन राजा पूरी सहजता से और बड़े मनोयोग से उसकी हथेली में बिच्छू के डंक को ढूंढता रहा आखिर त्रस्त होकर बांसुरी ने अपने हाथ उसके हाथ से छुड़ा लिए, राजा से नजर ना मिला पाते हुए उसने धीरे से कहा__” चलो चाय पी लेते हैं सुबह भी हो गई है”।

  ” शुक्र है डंक नहीं चुभा वरना बहुत मुसीबत हो जाती। तुम भी पागल हो बांसुरी कुछ भी कर जाती हो।”

   वह तो ऐसा बोल कर आगे निकल गया लेकिन उसके पीछे उसके कदमों के निशानों पर अपने पैरों को रखती बांसुरी उसके पीछे पीछे चलती यही सोच कर मुस्कुराती रही कि कुछ समय के लिए ही सही उसकी अनुगामिनी  तो बन पाई।

   चायवाले से चाय लेकर दोनों वापस एक निश्चित दूरी पर बैठकर चाय पीते हुए समंदर में खो गए।
   कुछ देर बाद बांसुरी उठ गई__” चलो अब घर चलते हैं”

दोनों फ्लैट पर पहुंचे तब तक पिंकी भी जाग चुकी थी अपनी किताब कॉपी फैलाए हुए वह कुछ नोट्स बनाने में व्यस्त थी। उन दोनों को देखकर उसने सवालों की झड़ी लगा दी __”कहां गायब थे आप दोनों।  दोनों के दोनों का फोन बंद था हमें समझ नहीं आ रहा था कि कहां हो? किसी मुसीबत में तो नहीं फंस गये। चलो आप दोनो फ्रेश हो लो हम चाय बना कर लातें हैं”

” क्या बात है आज प्रिंसेस चाय बनाएगी?”

पिंकी ने प्यार भरे बनावटी गुस्से से बांसुरी की तरफ देखा__” अच्छा तो क्या हमने इसके पहले कभी चाय नहीं पिलाई?”

” पिलाई है जी बिल्कुल पिलाई है इन पूरे 3 सालों में शायद चार या पांच बार तो बनाई ही होगी।”

पिंकी बांसुरी की बात पर जोर जोर से हंसने लगी__

” सच कहती हूं भाई यहां हमें बांसुरी ने मां साहब की कमी फील नहीं होने दी। हमारे सोकर उठने से पहले बेड टी बनाकर   पिलाने से लेकर रात में हमारे साथ जाग जाग कर हमको कॉफी पिलाने तक हर काम बिल्कुल एक मां की तरह किया एक बड़ी बहन की तरह।”

“बस करो पिंकी बहुत तारीफ हो गई अब जाओ रसोई में बना ही लो आज तुम चाय, मैं  नहा कर आती हूं ।”

बांसुरी के नहा कर आते तक में राजा भी फ्रेश होकर आ चुका था पिंकी तीन बड़े बॉल में मैगी और साथ में चाय बना कर ले आई तीनों हंसते खिलखिलाते इधर-उधर की बातें करते हुए चाय नाश्ता करते रहे। बातों ही बातों में राजा ने बांसुरी से आगे का उसका प्लान पूछा बांसुरी के ना में सिर हिलाने पर राजा ने कहा कि वेटर को यहां से फोन करने से कोई फायदा नहीं होगा बांसुरी को उससे मिलने ही जाना पड़ेगा मिलकर सबूत जमा करके ही बांसुरी आगे का कुछ काम कर सकती है। बांसुरी खुद भी यही सोच रही थी लेकिन बनारस जाने के पहले एक बार फिर उसे भास्कर से इजाजत लेने की कवायद करनी थी जो उसके लिए सबसे ज्यादा कठिन था, और उससे भी अधिक कठिन था अपने लिए ऑफिस से छुट्टियों की बात करना क्योंकि ऑफिस से तो उसे पूरा मटेरियल दे दिया गया था जिसे उसे थोड़ा सुधार के सजा संवार कर के दैनिक अपडेट लिखनी थी, हालांकि अब केस में घुसने पर उसे वह मटेरियल किसी काम का नहीं लग रहा था इसके साथ ही इस वेटर से बात करने के बाद अब मौसमी पर से भी उसका भरोसा थोड़ा हिल गया था वास्तविकता की तलाश बनारस में ही जाकर खत्म हो रही थी, बांसुरी ने अपने पिता से फोन पर बात की और उनसे सलाह मशविरा करने के बाद  आखिर उसने बनारस जाने का निर्णय ले ही लिया।
    बांसुरी के पिता को अपनी बेटी पर पूरा भरोसा था बचपन से कभी ताई जी दादी बुआ या मां उसे किसी काम के लिए रोक दे तो उसके पिता बढ़-चढ़कर उसका साथ देते आए थे ऐसे में जब उन्होंने अपनी बेटी की पसंद के वर को भी स्वीकार लिया था , वह किसी भी हाल में उनके विश्वास को चकनाचूर नहीं कर सकती थी उसका एक मन बार-बार उसे यही कह रहा था कि वह राजा से दूर हो जाए क्योंकि राजा की तरफ खिंच कर वह अपने घर वालों को भास्कर को सब को धोखा दे रही है लेकिन उसका दूसरा मन बार-बार उसे राजा की तरफ खींच रहा था। अपने आप से जूझती बांसुरी ने एक बार फिर राजा को बनारस चलने के लिए मना किया, लेकिन राजा को न मानना था ना वह माना और अगले दिन शाम की फ्लाइट बुक कर ली।

    लल्लन का पता ठिकाना मोबाइल नंबर सब कुछ बांसुरी के पास था राजा ने बीच में किसी को फोन करके लल्लन का नंबर नोट करवाया भी था, बांसुरी के पूछने पर उसने बस इतना कहा कि वहां पहुंच कर तुम्हें सब पता चल जाएगा। बांसुरी को खुद अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा था कि इस अनजान से लड़के के ऊपर वह क्यों खुद से भी ज्यादा भरोसा करती जा रही थी इतना भरोसा तो उसने आज तक भास्कर पर भी नहीं किया था । पर फिर भी जैसी उसकी मन की हालत थी उसने अपने आपको किस्मत के भरोसे छोड़ दिया था, दो महीने बाद होने वाली अपनी शादी के बारे में सोच कर उसने अपने आप को तैयार कर लिया था, अपने वर्तमान को बस वो जी लेना चाहती थी, वो भी समझ रही थी कि आज नही तो कल राजा वापस अपनी दुनिया में लौट ही जायेगा, और तब उसकी दुनिया का क्या होगा ये सोचने का अवकाश वो खुद को भी नही देना चाहती थी।

   दोनों वाराणसी के एयरपोर्ट पर जब उतरे तब तक शाम गहरा चुकी थी, राजा ने बांसुरी को शाम को होने वाली गंगा आरती के बारे में बताया और एयरपोर्ट से सीधा उसे घाट पर लेकर चला गया…..
     
    ” वाराणसी की गंगा जी की आरती जिसने नही देखी उसका जीवन व्यर्थ है, समझी।”

  ” मतलब आज के पहले मेरा जीवन व्यर्थ था?”
    बांसुरी ऐसा बोल कर मुस्कुरा उठी__” हाँ व्यर्थ ही तो था।”

   बांसुरी की आखिरी कही बात राजा सुन नही पाया, उसे आरती का कोई हिस्सा छोड़ना नही था, दोनों के घाट पर पहुंचने तक में हजारों की भीड़ वहाँ जमा हो चुकी थी, आरती शुरु हो चुकी थी!

   चारों तरफ रोशनी की अपूर्व छटा थी जैसे पूरा घाट दीवाली मना रहा हो, अपनी अपनी परिधि में सुव्यवस्थित सतर खड़े पण्डित सधे हुए हाथों से गंगा मैया की आरती गा रहे थे, एक साथ उठते और गिरते हवा में लहराते उनके हाथ जैसे अपना ही अनूठा राग गा रहे थे, महादेव की पावन नगरी का ये कैसा विस्मयकारी दृश्य था जहां जहां कण कण में प्रलयंकारी अवधूत रूप रूद्र नही बल्कि मृत्युन्जय रूप  विद्यमान था।
     कलकल बहती गंगा में उन शत सहस्त्र दीपों का रूप अपने सहज प्रकाश से दुगुनी तिगुनी सामर्थ्य से प्रज्वलित था।
      ऐसा अपूर्व रूप , ऐसी अपूर्व छटा!! जो देखे सम्मोहित हो जाये।

    और उस अभूतपूर्व दृश्य को आंखों ही आंखों में पीता वो खुद औघड़दानी शिव सा ही लग रहा था, सब कुछ देख लेने का लालच उसे पलक झपकने की आज्ञा भी नही दे रहा था, और उसके मनोरम रूप में खोयी बांसुरी खुद पलक झपकना भूल गयी थी।
    जितना ही बांसुरी उससे भागने का प्रयास करती जाती थी उतना ही उसके मोहक हाव भाव बांसुरी के हृदय को बेड़ियों में जकड़ते जा रहे थे…..
    शायद यही तो प्रेम होता है जब हृदय खुद सर झुका कर किसी का बंधन स्वीकारना चाहता है, जब मन साधिकार सामने वाले को उसके जाने बिना भी अपनी गुलामी सौंप देता है , जब किसी क्यों और कैसे का सवाल नही रह जाता, बस वो कहता है और हम बिना सोचे हाँ कह जातें हैं….
       धवल कवल बहती गंगा का प्रभाव था या उस सात्विक वातावरण का , बांसुरी की आंखों से आंसू बहने लगे ।
     ऐसा अक्सर होता है जब आप अपने आराध्य के सामने अपने पूरे भाव के साथ खड़े होतें हैं तो सारे मानसिक विकार पूरे आवेग के साथ आंखों से बह निकलते हैं, फिर यहाँ तो उसके आराध्य देवता के सामने लेकर आने वाला भी अब उसका आराध्य बन चुका था, अपने मन की दुर्बलता से विहल बांसुरी भी अपने आंसू रोक नही पाई…..

  ” अरे क्या हुआ बांसुरी? तुम रो क्यों रही हो?”

  जिसके कारण हृदय की पीड़ा थी वही डॉक्टर बना कारण पूछ रहा था….कुछ नही कह कर बांसुरी आरती समाप्ती के बाद लोगों को इधर उधर जाते देखती रही, दो तीन पण्डित उनके पास भी प्रसाद की टोकरी संभाले चले आये….
    राजा ने अँजुरी भर प्रसाद लेकर पण्डित जी के चरण स्पर्श कर लिये, बांसुरी वैसे ही गुमसुम खड़ी रही, पण्डित जी ने उसके हाथ में प्रसाद रखा और सर पर हाथ रख आशीर्वचन दे कर आगे निकल गये__

” ओम नम: पार्वती पतये हर हर महादेव, शिव पार्वती की जोड़ी अक्षुण्ण रहे, सौभाग्यवती भव!”

  जब तक बांसुरी या राज कुछ कहते पण्डित जी भीड़ में गायब हो गये।
    राजा की आंखें बिल्कुल बच्चों जैसी चमक रहीं थी

” आओ बांसुरी घाट की सैर कर के आते हैं।” और बिना उसकी तरफ देखे वो जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतर गया, उसके पीछे वो भी धीमे कदमों से चली आयी, नीचे की कुछ सीढिय़ां सदा पानी के कारण काई वाली थी, उनमें पैर रखते ही बांसुरी का पैर फिसला लेकिन गिरने से पहले ही उसे किसी ने थाम लिया,  राजा ही होगा सोच कर उसने आंखें उठाई तो सामने नाव वाला उसका हाथ थामे खड़ा था__

  ” संभल के मैडम, ई बनारस का घाट है, यहाँ अच्छे अच्छो के दिल फिसल जातें हैं कदम कौन बड़ी बात है।”
   बांसुरी ने अपना हाथ समेटा और उस संकरी सी नाव में आ बैठी, राजा एक किनारे बैठा घाट देखने में मगन था।

” सौ से जादा घाट हैं यहाँ, और मैडम जी दशाश्वमेध घाट पूरे इंडिया में वर्ल्ड फेमस है, जानती है काहे”

   नाव चलाने वाला बीस बाईस साल का लड़का था, इतनी सारी नावें बाड़े बजरे  होने के बाद भी उसकी संकरी सी नाव को ही राजा ने घूमने के लिये चुना था, और साथ ही पूरी बुकिंग कर ली थी, जिससे और किसी ग्राहक को वो ना बैठाए इसी से वो नाविक कम गाईड बना एक एक रुपये का हिसाब चुकाना चाह रहा था।

” काहे, तुम ही बता दो”

  ” भैय्या जी एक राजा रहे राजा दिवोदास वो यहाँ दस दशाश्वमेध यज्ञ किये रहे, नाम तो इसलिये पड़ा पर कई लोग कहे हम कैसे माने ये सच बात है कि नही फिर रानी पुटिया मन्दिर की खोदाई में कई यज्ञ कुंड निकला रहा, लोग एकदम हाथ जोड़ दिये, की घाट की बात तो सच्ची निकली लेकिन तब भी गंगा मैया का आरती यहाँ नही सुरु हुआ था, वो तो यहाँ के कुछ पाड़े हरिद्वार गये वहाँ की गंगा जी की आरती देख इनका भी ज्ञान चक्षु खुला, हमरी अम्मा बताती हैं कि पहले पहले सिर्फ तीन पण्डित ही आरती किये रहे, फिर धीरे धीरे गंगा मैया की आरती का ऐसा यसगान हुआ की अब तो देस बिदेस से लोग आतें हैं आरती देखने, अपने बच्चन साहब भी आ चुकें हैं।
    वाचाल नाविक की बातों को पूरा रस लेकर सुनते राजा के चेहरे पर आज इतने दिनों में पहली बार बांसुरी ने इतनी खुशी देखी थी__

   “जानती हो बांसुरी गंगा जी की गोद में एक घाट से दूसरे तक विचरते हुए कोई बिरला ही होगा जिसके मन में एक बार को ये लालच ना आया हो कि प्रभु मेरा अन्तिम समय अगर मेरी इच्छानुसार हो तो यहीं हो, इसी मणिकर्णिका घाट पर! क्यों गुरू सही कहे की नही?”

   ” सत्य वचन कहें हैं भैय्या जी , हमरी माई भी यही कहती हैं की मणिकर्णिका घाट हमेशा जिलाया रहता है ।”

   बांसुरी उन दोनों की एक दूसरे से होड़ लगाती ज्ञान पुंज भरी बातों से प्रकाशित हो रही थी, तभी उसे घाट पर नाव में चढ़ते समय किसी के द्वारा हाथ में पकड़ाया दोना याद आ गया, उसने दोने को हाथ मे लिया, कुछ फूलों के बीच दिये रखे थे और साथ ही थी दियासलाई!!

” दिये जलाकर क्या करना होता है?” बांसुरी के सवाल ने नाव वाले को दुगने उत्साह से भर दिया__

” कहतें हैं दिया जलाकर बहाने से……

  अभी वो अपनी बात पूरी करता कि राजा ने कुछ दुसरी बात में उसे उलझा दिया” प्रसाद आजकल कुछ बदल गया है क्या?”

  ” नही भैय्या जी ऐसा तो कुछ नही , आप क्या पहले भी आ चुके हैं।”

” हमें भी सौभाग्य मिला है कुछ साल यहाँ रहने का”

” गज़ब!! रहते कहाँ थे आप?”

” लंका में रहते थे, तुम कब से हो यहाँ?”

” भैय्या जी हम तो अस्सी घाट की ही पैदाइस हैं, यही बाप दादा पैदा हुए काम धंधा जमाये, हमरा मिष्ठान भण्डार है पान्डे ऐंड संस मिष्ठान भण्डार! ऊ अस्सी घाट के आगे मुहल्ला में कड़ाह चढ़ता है हमरे बाबा का, उनके नाम के खस्ते बड़े फेमस हैं, कल सुबह आईये जलपान ग्रहण करने, भौजाई को भी लेते आइएगा ।”

” तो तुम ये नाव काहे चलाने लगे गुरू?”

” अब का बोले ? पढ़ाई लिखाई में हमरा दीदा लगा नही , औ वो उबलते तेल की कढ़ैय्या हमें यमराज की कढ़ाई लगती है, डर बहुत लगता है कि कभी समोसा तलने में उंगली ना तला जाये।”

” झूठ ना बोलो पाड़े जी!! बात तो कुछ और है!”

” भैय्या जी कोनो जादू जानतें है का, काहे आपकी आंखे मगनीफिसेंट हैं?

” क्या हैं? बांसुरी के सवाल पर राजा ने जवाब दिया__” मैग्नीफीसेंट “

” देखिए हमरे बिना बताये भी आप जान गये,वो असल बात ये है की हमको ई गंगा मैय्या की लहरों से बहुते प्यार है जब यहाँ के घाट के पत्थरों पे लहरें उठती गिरती टकरातीं हैं ना तो लगता है जैसे घाट सांस ले रहा है।

  ” प्यार तो हमें भी बहुत है इस घाट से अब का बतायें बबुआ लेकिन यार हमरा घाट का प्यार हमको घड़ी घड़ी मोबाइल देखने को मजबूर नही करता।”

  ” कतई गरदा मचा दिये भैय्या जी।” राजा की बात पर नाव वाला लड़का ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा_” सुमन नाम है, यहीं पास के कन्या महबिद्यालय की छात्रा हैं, रोज सुबह नियम से महादेव के दरसन को आतीं हैं और शाम को गंगा जी की आरती देखने , तो बस ….
   
   राजा को बातों में डूबा देख बांसुरी ने उसे मेसेज भेजा__” लगता है साहब भूल गये कि हम बनारस किस लिये आये हैं।”

  ” याद है मेम साहब!! उसी के लिये माहौल बना रहा हूँ, आप बस भरोसा रखिये मुझ पर।”

  बांसुरी ने फोन किनारे किया और उन दोनों को बातों में लगा छोड़ लहरों में डूब गयी, पास से गुजरते बजरे पर कोई रेडियो सुन रहा था, गाने के बोल बांसुरी तक भी आ रहे थे……

             तू बन जा गली बनारस की
            मैं शाम तलक भटकू तुझमें

            तेरी बातें चटपट चाट सी हैं
            तेरी आँखें गंगा घाट सी हैं
            मैं घाट किनारे सो जाऊं..
          फिर सुबह सुबह जागूं तुझमें…..

क्रमश:

aparna.

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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