जीवनसाथी -8

जीवन साथी– 8

    राजा की नींद कुछ जल्दी ही खुल गयी, अभी सुबह पूरी तरह हुई नही थी, बाहर हल्का उजाला अन्धेरे की गोद में अब भी छिपा था, वो मुस्कुराते हुए उठ बैठा, सबसे पहले उसने बालकनी के पर्दे खोल कर स्लाइडिंग डोर खोल दिया, देखा तो बांसुरी बालकनी की कुर्सी पर बैठी लैपटॉप गोद में रखे कुछ पढ़ने में मगन थी, दरवाज़े की आवाज पर बांसुरी ने पलट कर देखा सामने खड़ा वो मुस्कुरा रहा था__

” गुड मॉर्निंग बांसुरी, आज ऑफिस नही है क्या?

” गुड मॉर्निंग!! हम्म ऑफिस तो है, ऑफिस का ही कुछ काम कर रही थी, आप जल्दी उठ गये, कुछ चाय या कॉफ़ी बना कर लाऊँ??”

” नही तुम अपना काम कर लो, आज मैं बना लाता हूँ कॉफ़ी, पर्कोलेटर में कॉफ़ी होगी ना??”

  ” राजकुमार अजातशत्रु जी हमारे पास कॉफ़ी पर्कोलेटर नही है, हम साधारण जनता बहुत साधारण तरीके से कॉफ़ी  बनातें और पीतें हैं।”

” ओके सॉरी, तो कैसे बनाते हो बता दो, मैं वैसे ही बना के ले आऊंगा”

  ” रहने दो , मैं बना लाती हूँ “

” अरे प्लीज़!! तुम बस बता दो, मैं लाता हूँ,तुम अपना काम करो।”

   बांसुरी के बताने पर राजा वहाँ से चला गया और बांसुरी एक बार फिर अपने लैपटॉप में डूब गयी।।
     लगभग आधा घंटा बीत गया ना राजा वापस आया ना कॉफ़ी, बांसुरी रसोई की तरफ लपकी कि पहली बार गैस चूल्हे पर काम करने में इस अनाड़ी ने कहीं खुद को चोट तो नही लगवा ली, रसोई में पहुंचने पर अलग ही नज़ारा था।
     रसोई के पीछे एक छोटी सी ड्राई बालकनी थी जहां बांसुरी लोग साधारणतया कपड़े सुखाया करते थे और साफ़ सफाई का सामान रखा होता था, उस बालकनी के नीचे अक्सर कबूतर आया करते थे जिन्हें डालने के लिये दाने लाकर भी बांसुरी वही एक डिब्बे में रखा करती थी।।
   बांसुरी रसोई में पहुंची तो देखा गैस बर्नर पर चढ़ा दूध खौल खौल कर ज़रा सा रह गया था, और राजा जी बालकनी में बैठे कबूतरों को दाना डालते हुए गाना भी सुना रहे हैं, हमेशा नीचे चहकने वाले कबूतर भी आज इतना अच्छा गवैया पाकर सीधे बालकनी में ही धमाचौकड़ी मचाने में व्यस्त थे__

    ” रे साईबो मारो जाने गुलाब नो छो….
     …………सुगंध जेना प्रीत नी रे….
   हा वातो तारा प्रीत नी रे…….

” बन गयी कॉफ़ी??”

  बांसुरी की आवाज सुन अपने में मगन राजा चौंक गया, दाने बिखराने के साथ साथ वो हाथ में कॉफ़ी का कप पकड़े उसे फेंटते भी जा रहा था__

” हाँ! बस लेकर आता हूँ, तुम चलो!!”

  बांसुरी ने उसके हाथ से कॉफ़ी कप लिया और अन्दर चली गयी, उसके पीछे अपने कपड़े झाड़ता हुआ वो भी अन्दर चला आया__

” बहुत प्यारा फ्लैट है तुम्हारा,कितने सारे पँछी आते हैं यहाँ, तुम रोज़ दाना डालती हो इन्हें?”

” हाँ!! रोज़ डालती हूँ, पर सुनो तुम्हें दानों का डिब्बा कहाँ से मिला?”

” मुझे कहां मिला? मैंने तो कुछ कुकीज़ यहाँ रखी थी वहीं तोड़ तोड़ कर खिला दी!!”

  बांसुरी ने अपना माथा पकड़ लिया__ हे भगवान!! क्या करुँ इस लड़के का, ये तो महामूर्ख है, इतनी महंगी मेरी स्विस कुकीज़ इसने कबूतरों को खिला दी, जिन्हें खुद गिन गिन कर खाती थी , बल्कि खाती कम बचाती ज्यादा थी।।
   बांसुरी अपने कूकिज़ के डिब्बे को खोलने ही जा रही थी कि राजा ने एक दूसरा डिब्बा उसके सामने कर दिया__

  ” ये वाली खिला रहा था, तुम्हारी वाली नही!”

   ” ये कौन सी है, मैं तो नही लेकर आयी ये वाली”

  ” ये मैं ले कर आया था, मुझे पिंकी ने बताया था तुम्हें कूकीज़ बहुत पसंद हैं।”

   राजा ने वहीं टेबल पर रखा एक दूसरा बॉक्स बाँसुरी के आगे कर दिया__
  ” तुम ये वाली खा सकती हो, असल में 2 बॉक्स ही ला पाया था, पर कल जब पता चला कि तुम एग्स नही खाती तो ये वाली कूकीज़ तुम्हारे काम की रही नही, इसिलिए आज पंछियों को दाने की जगह यही खिला दिया, ये दूसरा वाला एग लेस है। पिंकी भी ना, आधी अधुरी बात बताती है, ये तो बता दिया कि तुम्हें कूकीज़ पसंद हैं पर ये बताना भूल गयी की तुम अण्डे नही खाती, खैर चलो कॉफ़ी ठंडी ना हो जाये,।
   दूसरे बॉक्स से कूकीज़ निकाल कर राजा के प्लेट में रखते में बांसुरी ने कप में कॉफ़ी निकाल ली, और दोनो बाहर की बालकनी में वापस चले आये__

  ” एक बात पूछूँ राजा जी??”

  ” ओहो फिर फॉर्मल हो गयी, जी की ज़रूरत नही है, पूछों”

” आपको गुजराती भी आती है?”

  ” नही तो!!, मुझे गुजराती नही आती।”

  ” पर अभी आप गाना तो गुजराती में ही गा रहे थे ना!”

  ” ओह्ह अरे वो!! वो तो मुझे जो धुन पसंद आ जाये उसके गीत को मैं याद कर ही लेता हूँ चाहे फिर वो गुजराती हो, पंजाबी हो या तमिल तेलुगू। अच्छा तुम बताओ आज सुबह से इतना सीरियस होकर क्या पढ रही हो??”

“थोड़ा सीरियस सा केस आ गया है, मेरे रिसेंट बॉस चाहतें हैं मैं उस केस पर काम करुँ और उसकी कवरेज मैं लिखूँ ।”

” ओके!! पर कवरेज लिखने के लिये तुम्हें स्टोरी कवर करनी भी तो पड़ेगी।”

” हाँ!! आज सुबह सुबह बॉस का फोन आया तभी से उस केस से जुड़े हुए दूसरे तथ्य खंगाल रहीं हूँ, हालांकि भास्कर नही चाहते कि मैं इस प्रोजेक्ट पर काम करुँ।”

  ” क्यों? क्यों नही चाहते भास्कर??”

” क्योंकि केस ही अजीब है, ये असल में एक दूसरे लीडिंग अखबार के एडिटर के खिलाफ का केस है, उन एडिटर के खिलाफ उनकी एक वर्कर ने सेक्सुअल हेरस्मेंट का केस दायर किया था….
    अभी केस चल ही रहा है लेकिन हमारे बॉस चाहतें हैं, हमारे अखबार में उस केस की डेली अपडेट्स मैं लिखूँ ।।”

  ” ओके ! और भास्कर को ये लग रहा कि तुम इस सब  से दूर रहो।”

  ” हाँ, वो नही चाहते कि मैं कोई भी जोखिम वाला काम करुँ।”

  ” और तुम क्या चाहती हो??”

  ” सच कहूँ, तो मैं इस केस को कवर करना चाहतीं हूँ, इसलिये नही कि मैं अपनी एक ही ढर्रे की बोरिंग जॉब  से ऊब गयी हूँ, बल्कि इसलिये कि मैं सच में किसी लड़की के साथ गलत होते नही देख सकती, मुझे लगता है हर लड़की को इन्साफ मिलना चाहिए।”

” बिल्कुल सही कहा तुमने, पर बस एक छोटी सी बात कहना चाहता हूँ, तुमने ये क्यों कहा कि हर लड़की को इन्साफ मिलना चाहिए क्या हर लड़का गुनाहगार होता है?”

  ” अरे नही मेरा वो मतलब नही था।”

  ” मै समझता हूं तुम्हारा वो मतलब नही था, पर अगर तुम्हारा मन है कि तुम सच्चाई के लिये लड़ो तो तुम्हे बेशक इस केस पर काम करना चाहिए बस एक सजेशन देना चाहता हूँ, मानना नही मानना तुम्हारे ऊपर है।”

” हाँ बोलो ।”

” किसी भी केस में जब काम करो कभी भी दिमाग में पहले से बनाई अपनी थ्योरी के साथ काम मत शुरु करना, मेरे कहने का मतलब है अगर जजमेन्टल होकर काम शुरु करोगी तो बायस हो जाओगी , भेदभाव कर जाओगी , इसलिये तथ्यों को ध्यान से देख कर अच्छे से दोनो पक्षों को समझ कर ही लिखना, बाकी तो तुम मुझसे कहीं ज्यादा समझदार हो , सब कुछ समझती हो, इसलिये तो तुम्हारे बॉस इतना महत्वपूर्ण काम तुम्हें सौंपना चाहते हैं ।

  ” वो तो पता नही कि मुझे ये काम क्यों सौंपना चाहतें हैं, पर ये पक्का है कि मैं इस प्रोजेक्ट पर काम करना चाहती हूँ  और मैं कैसे भी भास्कर को अपने इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिये मना लूंगी।”

” गुड गर्ल !! अब रेडी हो जाओ, तुम लेट नही हो रही ऑफिस के लिये?”

” नही आज मुझे मेरे ऑफिस नही जाना बल्कि उस लड़की से मिलने जाना है, असल में उसके ऐसा इल्जाम लगाने के बाद अथॉरिटी ने उसे और एडिटर साहब दोनों को  फिलहाल सस्पेंड कर दिया है, सो उसने मुझे घर पर ही मिलने बुला लिया है।”

” ओके !! इसका मतलब तुम्हारी उससे बात हो चुकी है??”

” हाँ! मेरे बॉस ने सुबह ही मुझे उसका नम्बर भेज दिया था, मैंने जब उसे मेसेज किया तो बिना किसी ना नुकुर के वो मिलने को तैय्यार हो गयी और अपना एड्रेस मुझे भेज दिया।”

” स्ट्रेन्ज!!”

” क्यों ?? इसमें क्या स्ट्रेन्ज ??

“मुझे लगता था कोई रेप विक्टिम इतनी आसानी से दुनिया के सामने नही आना चाहेगी, पर उसने बिना देर किये तुम्हें अपना एड्रेस भी दे दिया और मिलने के लिये मान भी गयी।”

” हाँ तो? आखिर वो भी एक औरत है, और एक दुसरी औरत से अपनी तकलीफ बताना चाहती है, इसमें गलत क्या है? और वैसे भी उसका केस किसी से छिपा नही है, तो अब मुझसे ही छिपा के उसे क्या मिल जायेगा……
    बांसुरी अपनी बात खत्म नही कर पायी थी कि उसका फ़ोन बजने लगा….
    फ़ोन भास्कर का था__

” कल कहाँ गायब थीं? सौ बार कहा है तुम्हें, मैं फ़ोन करुँ और तुम ना उठाओ तो मेरा दिमाग खराब हो जाता है, पर तुम्हें मेरी कोई चिंता हो तब ना, बैठी होगी कुछ आड़ा तिरछा पढ़ते हुए या टीवी पर गाने सुनते हुए।”

” अरे नही भास्कर! मेरी बात तो सुनो!”

” क्या सुनूँ? पहले तो दिमाग खराब कर दोगी फिर इधर उधर का कोई बहाना मार दोगी…..

  ” बस करो बाबा, कितना गुस्सा करोगे ? अच्छा सुनो, वो नन्दा सर का सुबह सुबह फ़ोन आया था, वो कह रहे थे…..
   बांसुरी अपनी बात पूरी कर पाती इसके पहले ही भास्कर ने उसकी बात आधे में ही काट दी

“मैं पहले ही तुम्हें कह चुका हूँ, इस प्रोजेक्ट के लिये ना कर दो।”

” पर भास्कर !! सुनो तो”

” मैं कुछ नही सुनना चाहता, मैंने कह दिया मतलब कह दिया, अब अगर तुम नही मानती हो तो तुम जानो।”

  ” ये कैसी बात हुई भास्कर?? मैंने तो सर को हाँ कह दिया था, अब कैसे वापस पलटूँ अपनी बात से।”

” तो तुमने हाँ बोला ही क्यों, जब मैंने नंदा  से तुम्हारी बात होने के पहले ही तुम्हें आगाह कर दिया था कि तुम्हें इस प्रोजेक्ट को नही लेना है, तो फिर क्या ज़रूरत थी , तुम्हें हाँ बोलने की?? इसका मतलब तो यही हुआ कि मेरे बोलने का कोई महत्व नही है।”

” आई एम सॉरी भास्कर!! मैंने ऐसा सोचा ही नही, बस मैं ये काम करना चाहती थी, अपनी खुशी के लिये, खुद को प्रूव करने के लिये कि मैं भी कुछ कर सकती हूँ ….

  ” अरे तुम सब कुछ कर सकती हो बांसुरी मैं ये नही कह रहा कि तुम्हारी काबिलियत कम है, लेकिन मैं नही चाहता की तुम किसी भी तरह के पचड़े में पड़ो, अभी भी मौका है, मना कर दो।”

  ” मुझे भी तो समझने की कोशिश करो भास्कर, मैं ये काम करना चाहती हूँ मतलब चाहती हूँ, तुम अपने सामने किसी की सुनते ही नही….

  ” तो करो जो तुम्हारे जी में आये, जाओ फोड़ो अपना सर इन्हीं सब बकवास पर, और कुछ प्रॉब्लम आ जाये तो मुझे आकर मत कहना।” गुस्से में भास्कर ने फ़ोन काट दिया, बांसुरी फ़ोन हाथ में पकड़े चुपचाप बैठी रह गयी…..
     भास्कर का फ़ोन जब आया तभी राजा उठ कर अन्दर चला गया था, पर फ्लैट इतना बड़ा तो था नही कि अन्दर हॉल में बैठे इन्सान को बाहर बालकनी में होने वाली बातें सुनाई ना दें, ना चाहते हुए भी राजा को भास्कर और बांसुरी के बीच चलने वाली गर्मागर्मी सुनाई दे ही गयी थी…..

   वो चुपचाप आकर बांसुरी के सामने रखे मोढे पर झुक कर बैठने की कोशिश करने लगा, बहुत ही जटिलता और कठिनाई से उसने अपनी लम्बी टांगों को तोड़ मरोड कर अपने आप को मोढे पर बैठने लायक बनाने का भरसक प्रयास किया पर असफल होकर हताशा से बांसुरी की तरफ देखने लगा, उसकी ऐसी बच्चो जैसी हरकत देख बांसुरी को हँसी आ गयी__

” वो मोढ़ा तुम जैसे लम्बे चौड़े दैत्य असुर के लिये नही है समझे!”

” जी समझा!! ये आप जैसी दुबली पतली सूखी सड़ी छिपकली के लिये है, है ना?”

”  मैं सूखी सड़ी छिपकली लगती हूँ??”

  ” तो मैं कौन सा असुर लगता हूँ, अच्छे खासे हैंडसम बंदे को असुर बनाये बैठी हो।”

  ” अरे वो तो मज़ाक में कहा था, तुम आओ यहाँ बैठो, मैं मोढे पर बैठ जाऊंगी।”
  मुस्कुराती हुई बांसुरी झूले से उतर कर मोढे पर बैठ गयी पर राजा रेलिंग के सहारे खड़ा ही रहा__

” कुछ कहना चाहता हूँ बांसुरी! क्या मैं बोलूं?”

” ऑफ़कोर्स! बोलो ना।”

  ” देखो ये तुम्हारे दोनो के बीच की बात है, मुझे बीच में बोलने का कोई हक नही बनता, पर एक दोस्त की हैसियत से तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूँ ।”

” बोलो।”

  ” मैंने सारी बात तो नही सुनी, लेकिन जितना सुना और समझा मुझे यही लगा कि शायद भास्कर तुम्हें इस काम के लिये मना कर रहे थे, देखो मैं भी एक लड़का हूँ इसिलिए उनकी कन्सर्न समझ पा रहा हूं, हो सकता है वो तुम्हारी सुरक्षा को लेकर चिंतित हों, मेरा मतलब ये है कि वो यहाँ तुम्हारे पास हैं नही, तुम्हारे साथ कहीं आ जा नही सकते इसिलिए शायद उन्हें तुम्हारी सुरक्षा को लेकर डर लग रहा होगा।”

  ” अगर मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं तो यही बात मुझसे कहनी चाहिए ना, यूं आदेश सुनाने की क्या ज़रूरत की मैंने कह दिया तो तुम ये नही करोगी।”

  ” देखो बहुत लोग वो नही कह पाते जो कहना चाहते हैं, बल्कि हम में से ज्यादातर लोग वो नही कह पाते जो कहना होता है बल्कि उसकी जगह वो कह जातें हैं जो नही कहना चाहिए।”

” राजा प्लीज़!! पर मैं कोई फिलोसफी सुनने के मूड में नही हूँ ।”

  ” ये फिलोसफी नही मैडम साईकोलॉजी है, और एक बात कहूं, लड़के ऐसे ही होतें हैं उनसे तुम ज़िद कर के या रूठ कर कोई काम नही करवा सकती,  प्यार से उनके सामने अपनी बात ऐसे रखो कि उन्हें ये लगे तुम उनकी इच्छा से ही कर रही हो और अपने मन  की भी कर लो, समझीं?”
  बांसुरी ने ना में सर हिला दिया__

” मेरा मतलब ये है कि तुम्हारा बहुत मन है इस काम को करने का और भास्कर का बिल्कुल नही , अब ऐसे में यूं लड़ झगड कर काम पर जाओगी भी तो क्या तुम अपना 100% अपने काम को दे पाओगी, नही ना? इसिलिए मेरी मानो तो भास्कर से एक बार प्यार से बात कर के उसे अपनी इच्छा बता के तो देखो, बस ऐसे शब्दों में कहना जिससे उसे ये ना लगे कि तुम उसकी बात काट कर कोई काम करने जा रही हो।
    बांसुरी प्यार निभाना आसान नही होता, बहुत बार प्यार निभाने के लिये दोनों में से किसी एक को अपने स्वाभिमान को भी ताक पर रखना पड़ता है, पर अगर दोनों में से किसी के भी मन में ये आ गया कि मैं क्यों वो क्यों नही तो प्यार की दीवार दरकने लगती है, प्यार के बीच कभी मैं और तू होना ही नही चाहिए, प्यार हमेशा मैं तू से ऊपर बहुत ऊपर महसूस होता है जहां हम अपने अस्तित्व को सामने वाले के अस्तिस्त्व में घोल देते हैं ,मिला देते हैं, जब हमारे मन में ये नही रह जाये कि ‘मैंने तुम्हारे लिये कुछ किया’ क्योंकि उस लेवल पर पहुंचने के बाद हम अपने पार्टनर के लिये भी जो करतें हैं, वो अल्टीमेटली हमारे लिये,हमारी खुशी के लिये ही तो होता है, है ना?”

   बांसुरी मंत्रमुग्ध सी राजा को सुनती रही, काश इतना सुलझा हुआ भास्कर भी होता, पर राजा सही ही तो कह रहा है, क्या भास्कर में कोई गुण नही है? आखिर उसके भी कुछ गुणों से ही वो प्रभावित हुई थी ना फिर आज उसने किसी बात के लिये मना क्या किया, वो क्यों इतनी बिखर गयी, क्या प्यार निभाने की पहली सीढ़ी ही उसे पटखनी दे गयी, नही वो इतनी कमज़ोर नही है, और ना ही उसका चुना रिश्ता इतना कमज़ोर है, और अगर उसके और भास्कर के रिश्ते की डोर कहीं पर भी ढीली पड़ी भी तो वो उसे वापस अपने प्यार से कस लेगी, अपने रिश्ते के बीच कोई दरार नही आने देगी….

” थैंक यू राजा!! ” वो मुस्कुरा कर वहाँ से उठी और फ़ोन लेकर अन्दर जाने लगी__

  ” अरे क्या हो गया? कहाँ चल दी?”

    उसने मुड़ कर राजा को देखा और मुस्कुराते हुए उसे अपना मोबाइल दिखा दिया__

  ” भास्कर को फ़ोन कर के प्यार से मनाने जा रहीं हूँ ।”

   राजा ने हँस के उसे अपना अंगूठा ‘ all the best’ की मुद्रा में दिखाया और प्लेट में रखी आखिरी कुकी को उठा कर छोटे टुकड़े कर कुछ अपने मुहँ में डाला और कुछ कबूतरों को डाल कर वापस गुनगुनाने लगा….

” रे साईबो मारो जाने गुलाब नो छो….
     …………सुगंध जेना प्रीत नी रे….
   हा वातो तारा प्रीत नी रे…….

क्रमशः

aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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