जीवनसाथी -24

जीवनसाथी – 24


     राजा के आंखें बन्द करने के कुछ देर बाद बांसुरी  खिड़की के पास लगे सोफे पर ही बैठ गयी, और कुछ देर बाद वहीं सोफे के हत्थे पे सिर टिका कर दो दिन की जागती आंखें सो गईं।

    सुबह खिड़की से छन कर आती रोशनी उसके चेहरे पर पड़ कर उसे उठने को उकसा रहीं थी, लेकिन थकान से भारी पलकें खुलना नही चाहतीं थीं कुछ देर रोशनी को चेहरे पर पड़ने से रोकने की कोशिश के बाद आखिर बांसुरी ने आंखें खोल दी, वो उठ कर बैठी तो देखा सामने राजा जाग चुका था और उसे ही देख रहा था।
        सुबह की पाली की नर्स आ कर उसकी ड्रिप निकाल कर उसे खाली पेट खाने वाली दवा भी खिला चुकी थी। आज से राजा को लिक़्विड डाईट शुरु की जानी थी, नर्स अपना काम कर रही थी डेली रूटीन चार्ट भरने का, और राजा बड़े आराम से बांसुरी को देख रहा था।

    उसे ऐसे खुद को देखते पा कर बांसुरी हड़बड़ा गयी और एकाएक उसे रात की सारी बातें याद हो आयीं, वो धीरे से उठी और वॉशरूम के भीतर चली गयी।
    अपने चेहरे पर खूब सारे पानी के छींटे मारती वो यही सोच रही थी कि कल रात की कोई भी बात राजा को याद भी होगी या नही, कहीं दवाओं के नशे में तो वो बातें नही कर रहा था, क्या पता वो सच में वैसा कुछ सोच भी रहा है या नही, अभी यही सब सोच रही थी कि उसका फ़ोन बज उठा, जल्दी से चेहरे को पोंछती वो बाहर आयी और फ़ोन बन्द होने से पहले ही उसने उठा लिया। फ़ोन भास्कर का था।

” कहाँ हो यार तुम? एकदम ऐसे गायब हो जाती हो, कोई खबर नही, और क्या चल रहा है तुम्हारे केस का।”

  बांसुरी के पास सारी बातें बताने के अलावा कोई चारा नही बचा था, उसने बड़ी शालीनता से जितनी बातें ज़रुरी थी वो बता दी और छिपाने वाली बातों को छिपा भी गयी।
     मन ही मन उसे ऐसा करते हुए आत्मग्लानि भी बहुत थी पर भास्कर का स्वभाव जानते हुए उसे सब कुछ बताना इस वक्त उसे सही नही लगा।

  ” अब ये राजा कौन है , और उसे गोली मारी किसने?”

  ” बताया तो था भास्कर आपको। राजा पिंकी के बड़े भाई हैं और वो बेचारे मेरे साथ ही बनारस में थे जब उन्हें गोली लगी।”

” तो ये बेचारे राजा जी तुम्हारे साथ बनारस में कर क्या रहे थे?”

” वो उनका अपना कुछ काम था और मेरा अपना काम।”

” हाँ तो इसका मतलब ये हो गया कि दोनो साथ ही बनारस पहुंच गये,वाह!! और तुमने मुझे बताना भी ज़रूरी नही समझा। हद है बांसुरी!! अभी भी सोच लो, शादी तो मुझसे ही करोगी ना या अभी भी कोई डाऊट है?”
   बांसुरी भास्कर की डांट सुन कुछ समय के लिये सुन्न सी हो गयी, हाँ वो सच ही तो सब भूल गयी थी, अपनी सगाई भास्कर का स्वभाव अपने माता पिता।
  अगर वो सगाई तोड़ती है तो भास्कर से ज्यादा दुखी तो उसकी खुद की माँ हो जायेगी?? और फिर क्या उसकी सनातनी ताई, बुआ ठाकुरों के घर उसे ब्याहने को सहजता से तैय्यार हो जायेंगे।
    ऐसा सोचते ही वो एकदम से लजा कर गुलाबी हो गयी, अभी तो ऐसा कुछ हुआ भी नही और उसने राजा से शादी के सपने भी देख लिये, अपने सर को झटक उसने अपने विचारों को दूर किया।
    कैसे विचित्र दोराहे पर खड़ी थी वो जहां से एक तरफ सीधा रास्ता था जो भास्कर तक जाता था लेकिन आगे उसकी खुशियाँ उसमें थी या नही ये वो नही समझ पा रही थी, और दूसरा लेकिन कठिन रास्ता था जो राजा तक जाता था लेकिन उस रास्ते पर कितने भी कांटे हो उसी रास्ते में उसे खुशियाँ नज़र आ रहीं थीं।
    लेकिन क्या अपनी अकेली की खुशियों के लिये वो भास्कर और अपने घर वालों को सदा सदा के लिये एक कभी ना भरने वाला ज़ख्म दे सकती थी? खून के आंसू रुला सकती थी?
    क्या वो इतनी स्वार्थी हो सकती थी।

    कितना सोचा कितना सोचा और फिर नज़र पड़ी राजा की मुस्कुराती आंखों की तरफ…. और वो सब भूल बिसर गयी।
       उसे सिस्टर बिस्तर से उतार कर हल्के कदमों से चहलकदमी की सलाह देते हुए सहारा देकर चलाने की कोशिश कर रही थी।
    राजा को देख अनजाने ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी, अब राजा उसके बारे में जो भी सोचे लेकिन उसे अपने मन के बारे में सब पता चल गया था, अब उसे बिना देर किये भास्कर को सारी सच्चाई बतानी ही थी।
     यहाँ से जाते ही उसे अब सबसे पहले भास्कर से मिलना था और उसे सब बता कर अपने घर पर बात करनी थी, लेकिन कहीं राजा के मन में उसके लिये कुछ ना हुआ तो?

   पलंग से धीरे से उतर कर राजा अब हल्के कदमों से चलने की कोशिश कर रहा था, पिंकी ने उसे एक तरफ से सहारा दे रखा था, दायें हाथ पर हल्का बैंडेज देकर सपोर्ट के लिये बांधा गया था।

     वो इधर उधर फैली चीज़ों को समेट रही थी कि दरवाज़ा खोले प्रेम अन्दर चला आया, हाथ में थामी चाय की ट्रे उसने टेबल पर रखी और राजा की तरफ मुड़ कर बड़े अदब से आधा झुक कर उसने राजा के लिये अपना सम्मान दिखाया वो वापस उठा ही था कि राजा ने अपने एक हाथ से उसे अपनी तरफ खींच गले से लगा लिया।
      कुछ देर को राजा के गले से लगे रहने के बाद प्रेम दूर हुआ और धीरे से सबकी नजरें बचा कर उसने अपने आंसू पोंछ लिये__

  ” आज के बाद आपकी कोई मनमर्ज़ी नही चलेगी हुकुम, अब आप मेरे बिना कहीं अकेले नही जा सकते। “

” हुकुम मुझे पुकारते हो पर करते तो अपने ही मन की हो प्रेम!”

” अगर मैं अपने मन की कर पाता तो पहला तो आप पर हमला होता नही, दूसरा अगर मेरे सामने हो भी जाता तो मैं अब तक उन लोगों को मौत के घाट उतार चुका होता।”

” बस बस मेरे भाई!! शांत हो जा । इतना गुस्सा ठीक नही है। आगे का बताओ क्या सोचा है?”
  
   कह कर राजा ने बांसुरी की तरफ देखा, उसने नज़र नीचे झुका ली।

” छुट्टी के लिये बात कर ली है हुकुम! डॉक्टर तैय्यार नही थी, कह रही की दो दिन और रखने की ज़रूरत है, पर हमने कहा कि हम पूरा ध्यान रखते हुए आपको लेकर जायेंगे, अभी आयेंगी तब देखतें हैं क्या बोलती हैं।”

   राजा ने हाँ में सिर हिलाया और वापस धीरे से जाकर अपने पलंग पर बैठ गया।
  कुछ देर में ही मॉर्निंग राउंड लेने डॉक्टर चली आयी, पिंकी और प्रेम के बहुत कहने पर भी राजा की तुरंत छुट्टी करने के लिये वो नही मानी, पर इन लोगों की ज़िद के कारण उसने अगले दिन सुबह ही डिस्चार्ज देने की बात आखिर मान ली।
    डॉक्टर ने राजा को आज से पतला और हल्का खाना देने की बात कही थी, हालांकि राजा का खाना अस्पताल से ही मिलना था पर बाकी लोग भी थे जिन्होनें पिछले दिन से ही कुछ भी ढंग का खाया पिया नही थी।
    राजा को सामान्य बातचीत करते देख अब पिंकी भी सहज हो गयी थी__

” बंसी हम तो कैन्टीन की मैगी और सैंडविच खा कर बोर हो गयें हैं, हम प्रेम भैया के साथ बाहर जा रहे कुछ अच्छा सा खाने के लिये पैक करवा कर लातें है, तुम्हें कुछ खास खाने का मन हो तो बता दो।”
 
   इतनी देर बाद पिंकी के मुहँ से खुद के लिये बंसी सुन कर बांसुरी खुश हो गयी, लेकिन अभी भी उसे कुछ भी खाने पीने की इच्छा नही थी, उसने ना में सिर हिला दिया__

” चलो ठीक है, हम ही कुछ देख कर ले आयेंगे। वैसे हम चाहते थे कि तुम भी साथ चलो पर हमें पता है तुम जाओगी नही।” मुस्कुरा कर पिंकी प्रेम के साथ बाहर निकल गयी।

   उन दोनो के वहाँ से जाने के कुछ देर बाद ही नर्स भी चली गयी। पलंग पर बैठा राजा बांसुरी को देख कर समझने की कोशिश में था कि आखिर वो किस उलझन में फंसी है।

” कुछ परेशान हो बांसुरी?”

” मैं सोच रही थी अब जब पिंकी और प्रेम साहब भी आ गयें हैं तो मेरा यहाँ क्या काम ? अब मैं वापस लौट जाती हूँ।”

    बिना राजा की ओर देखे ही बांसुरी ने अपनी बात कह दी__

” एक बार इधर देखो मेरी तरफ। ” बांसुरी ने राजा को देखा

” सच में जाना चाहती हो?”

बांसुरी कुछ नही कह पायी…

” देखो इतने दिन मैं तुम्हारे फ्लैट पर रहा ,तुमने कितनी सारी कॉफ़ी बना बना कर पिलायी कितना कुछ खुद बना कर खिलाया अब मुझे भी मौका दो।
   मैं अपने सिर पर किसी का एहसान नही रखता, ज्यादा नही दो चार दिन के लिये ही चलो, ऑफिस में तुमने हफ्ते भर की छुट्टी ली ही थी, अभी तुम्हारी छुट्टी के दिन भी बाकी हैं…… अपने पैरंट्स को तो तुम मना ही लोगी, बस भास्कर की टेंशन है, है ना?

“भास्कर से हम बात कर लेंगे ।” दरवाज़ा खोले पिंकी खड़ी मुस्कुरा रही थी

” तुम इतनी जल्दी आ गयी पिंकी?”

” अभी हम गये ही कहाँ है? नीचे पहुँचे की याद आया फ़ोन ऊपर ही भूल गये हैं, वही लेने आये हैं।
  और बंसी तुम कान खोल कर सुन लो, तुम हमारे साथ हमारे घर चल रही हो, बस, समझीं।”

  बांसुरी का जवाब सुने बिना ही फिर पिंकी अपना फ़ोन उठाये बाहर निकल गयी__

” हो गयी प्रॉब्लम सॉल्व?”

” वो तो ठीक है लेकिन मैं सोच रही थी, छुट्टी तो तुम्हारी कल होनी है तो क्यों ना मैं आज फ्लाइट से मुम्बई चली जाऊं,और कल तुम्हारी छुट्टी होते तक वापस आ जाऊं।”

” देख लो ,तुम्हें जैसा ठीक लगे, वैसे मुझे लगता है अगर एक बार तुम यहाँ से चली गयी तो तुम्हारा वापस आना मुश्किल है।”
अपनी बात पूरी कर राजा वापस लेट गया और उसने अपनी आंखे बन्द कर ली, बांसुरी समझ रही थी कि उसकी बात से राजा नाराज़ हो गया था लेकिन वो भी किस मुसीबत में थी, वो उसे समझा नही पा रही थी।
   राजा को सोते देख वो कमरे से बाहर निकल एक बार फिर गणपति मन्दिर के बाहर पहुंच गयी__

” प्रभु अब तुम्ही इस द्वंद से बाहर निकालो, भास्कर से कितना झूठ बोलूं, और उनसे ऐसे झूठ बोल कर राजा के साथ चले जाना क्या सही होगा?”
   बांसुरी हाथ जोड़े मन ही मन प्रार्थना कर रही थी कि

” अरे बिटिया तुम परसों रात मन्दिर से धागा ले गयी थी ना, कैसा है तुम्हारा मरीज़ ठीक हुआ?”

हाँ कह कर वो वापस भगवान की मूर्ति की ओर देखने लगी__

  ” सिद्धि विनायक हैं सब कुछ सही कर देते हैं।

उसने हाँ कहा और वापस एक बार हाथ जोड़ कर ऊपर जाने लगी तभी उसका फ़ोन बजने लगा__

” हां बोलो भास्कर?”

” कहाँ हो? अब तक वहीं हो क्या?

” हाँ यहीं हूँ,बनारस में।”

” तुम्हारा फ्लैट का एड्रेस पूछना था अर्जेंट , तुम्हारा फ़ोन नही लग रहा था तो पिंकी को लगा लिया था। वो मुझसे कुछ पूछ रही थी…..

बांसुरी का दिल धक से रह गया__” क्या पूछ रही थी”

” कह रही थी बांसुरी तीन चार दिनों के लिये मेरे साथ मेरे घर जा सकती है क्या?” कह रही थी कोई जलसा है उनके यहाँ? सो क्या प्लान है तुम्हारा? जाओगी क्या?”

” मैंने तो अब तक कुछ नही सोचा था।”

” ठीक है , कोई बात नही चली जाओ पिंकी के साथ, लेकिन अपने फ़ोन का ध्यान रखना।”

” तुम्हें मेरे फ्लैट का एड्रेस किस लिये चाहिए था?”

” कुछ भेजना था , पर चलो अब तुम पिंकी के साथ घूम कर वापस आ जाओ, फिर भेज दूंगा।”

” मैं पक्का चली जाऊँ पिंकी के साथ?”

” हाँ भई चली जाओ, और कैसे बोलूं?”

   बांसुरी ने मुस्कुरा कर फ़ोन रखा और एक बार फिर गणपति बप्पा के पास हाथ जोड़े पहुंच गयी__

” अब मेरी नैय्या आपके ही हाथ में है प्रभु, मुझे तो अब सही गलत कुछ ना नज़र आ रहा ना समझ आ रहा। बस इतनी कृपा करना कि मुझसे कोई गलती ना हो।”

    भगवान को प्रणाम कर प्रसाद हाथ में लिये वो ऊपर चली गयी।
कमरे में पहुंची तो देखा राजा जाग गया था__

” कहाँ चलीं गईं थीं बांसुरी?”

” बस यहीं नीचे मन्दिर तक गयी थी, ये प्रसाद लायी हूँ तुम्हारे लिये, खा लो।”

  बांसुरी ने राजा की तरफ प्रसाद बढ़ा दिया राजा ने हाथ आगे करने की जगह मुहँ खोल दिया__

” खुद ही खिला दो, सीधा हाथ तो बंधा है ना मेरा।”

बांसुरी ने नीचे देखते हुए उसके मुहँ में छोटा सा पेड़े का टुकड़ा डाल दिया, राजा ने मुस्कुराते हुए उसे देखा__

” इतना शरमाती क्यों हो बांसुरी?”

” नही तो मैं कहाँ शरमा रही?”

” पक्का?”

” हाँ बिल्कुल पक्का।”

” तो फिर पानी भी पिला दो।”

  बांसुरी पानी का गिलास राजा को थमा कर जाने लगी__

” इससे भला तो मैं बेहोश ही था, कम से कम अपने हाथों से मेरा चेहरा पोंछती रहती थी, मेरी उंगलियाँ  थामे बैठी रहती थी……मेरा होश में आना तो मेरा नुक्सान करा गया।

   चुपचाप आकर उसने गिलास उसके मुहँ से लगा दिया__

” बस बस ! मेरा मुहँ बन्द करने का अच्छा तरीका ढूंढा है मैडम।”

” अच्छा जी चिट भी तुम्हारी पट भी तुम्हारी। ये अच्छा है राजा बाबू।”

” और क्या! जिस चीज़ पर उंगली रख दूँ वो चीज़ फिर हमारी, सुनो बांसुरी इधर आओ।”

  बांसुरी ने इशारे से पूछा–” क्यों”

” तुम पर उंगली रखनी है।” बोल कर राजा ज़ोर से हँसने लगा __” अरे बुरा मत मान जाना मेरी बात का। मैं मज़ाक कर रहा था। एक बात कहूँ?”

” हाँ कहो।”

” नही मुझे डर लगता है कहीं तुम नाराज़ ना हो जाओ।”

” बड़े आये मुझसे डरने वाले राजकुमार अजातशत्रु जी।”

” अगर तुम्हारी नाराज़गी का डर ना होता ना तो……

   बांसुरी का दिल बुरी तरह से धड़क रहा था कि आखिर ये क्या बोलने वाला है

” तो क्या?”

” तो ये कि अगर मैं शायर या कवि होता तो जो पल पल तुम्हारे चेहरे का रंग बदलता है ना उस पर …..

  उसी समय पिंकी और प्रेम  खाना लेकर वापस चले आये । राजा का भी खाना आ चुका था।
  पिंकी ने आते ही भास्कर से हुई बातचीत बांसुरी को बता दी, और उसे ये भी कह दिया कि कल सुबह यहाँ से डिस्चार्ज मिलते ही वो भी उन लोगों के साथ उनके घर के लिये निकल जायेगी।

    खाना खाते हुए हँसी मज़ाक के बीच राजा रह रह के जब भी बांसुरी को देखता उतनी ही बार बांसुरी के गले में निवाला अटक सा जाता था, वो खुद नही समझ पा रही थी कि कल तक जिसके साथ आराम से हर जगह घूम फिर ले रही थी आज उसे एक नज़र देखने पर ही वो क्यों ऐसे शर्म से गड़ी जा रही है।

  रात के खाने के बाद प्रेम भी कुछ देर वहीं कमरे में बैठा राजा से इधर उधर की बातें करता रहा फिर सुबह जल्दी निकलना है सोच कर नीचे हॉस्पिटल की डॉरमेटरी में सोने चला गया।
   बांसुरी ने अपनी माँ से भी एक बार पिंकी की बात करवा दी और अगले दिन उनके साथ ही निकलने की तैय्यारी कर ली।

   अगले दिन सुबह राउंड निपटा कर डिस्चार्ज पेपर तैय्यार करने में ही डॉक्टर ने बहुत समय लगा दिया।
राजा के लिये नाश्ते में पतला दलिया आया था, वहीं पिंकी और प्रेम ने प्रेम की लाई हुई कचौड़ियों का नाश्ता कर लिया, पर सबकी नज़र बचाती बांसुरी ने सिर्फ चाय ही पी, कुछ खाया नही।
       सारी औपचारिकता पूरी कर वहाँ से निकलने में ही उन्हें दोपहर हो गयी।
   बांसुरी जब अपना सामान समेटे पिंकी के साथ नीचे पार्किंग में आयी तब तक में राजा प्रेम के साथ गाड़ी की अगली सीट पर बैठ चुका था, प्रेम खुद गाड़ी को चलाने वाला था, प्रेम के पीछे की सीट पर बांसुरी और राजा के पीछे पिंकी बैठ गयी।
    प्रेम ने जैसे ही अपनी गाड़ी आगे निकालनी चाही, उसके बाजू से होती हुई दो काली एस यू वी उनके आगे निकल गयी, बांसुरी को कुछ समझ आता तब तक वो लोग मुख्य मार्ग पर आ चुके थे। बांसुरी ने अब ध्यान दिया तो उसे समझ आया कि उनकी गाड़ी के आगे दो गाडियाँ चल रहीं थीं और पीछे तीन।

      उसके तिर्यक कोण पर ही सामने राजा बैठा था जिसका चेहरा वो आसानी से देख पा रही थी।
  थोड़ा आगे बढ़ने पर ही राजा ने प्रेम से कहा कि कोई अच्छी सी फलों की दुकान देख कर गाड़ी रोक ले और फल खरीद कर रख ले, और साथ ही कोई ढंग का ढ़ाबा देख कर खाना खाने गाड़ी रोक ले।

    लगभग दो तीन घण्टे गाड़ी चलाने के बाद हाइवे पर प्रेम ने एक बड़े से आलिशान ढाबे में अपनी गाड़ी लगा दी, प्रेम की गाड़ी रुकते ही उसके आगे और पीछे चलने वाली गाडियाँ भी एक एक कर वहाँ पार्क होती गईं।
    खाने के लिये बैठने के बाद प्रेम उन गाड़ी वालों के पास चला गया, इन सब बातों को आश्चर्य से देखती बांसुरी के चेहरे पर की उलझन को देख राजा मुस्कुरा उठा__

” क्या हुआ बांसुरी?”

” ये सब कौन हैं? ये लोग भी तुम्हारे दुश्मन तो….

” अरे नही नही ! ये सारी मेरी सिक्योरिटी है, सारे प्रेम के ही लोग हैं ।

  बांसुरी एक एक कर सबको गिनने लगी…..

” पैंतीस लोग ……

” बड़ी जल्दी गिन लिया तुमने ” बांसुरी को बात बात पर चौंकते देख उसे छेड़ने में राजा को बड़ा मज़ा आ रहा था। खाना पिंकी ने ऑर्डर कर दिया था, पर सबसे किनारे बांसुरी चुपचाप सी ही बैठी थी, तभी प्रेम गाड़ी में से फल निकाल कर ले आया __

” हुकुम ये आपने जो जो कहा था हम सब ले आयें हैं, पर क्या इस वक्त आप सिर्फ फल खायेंगे।”

राजा ने मुस्कुराते हुए सारे फल बांसुरी की ओर कर दिये, वो एक बार फिर चकित हो गयी।

” नही प्रेम ये फ्रूट्स बांसुरी जी के लिये हैं, आज सोमवार है ना इनका आज के दिन फास्ट होता है।”

” अरे हाँ हम तो भूल ही गयीं थीं, इसिलिए बंसी ने सुबह नाश्ता भी नही किया, क्यों बन्सी हमें याद क्यों नही दिलाया ,सुबह भी तुम्हारे लिये फ्रूट मँगवा लेते ना।”

” पिंकी इतनी बार थोड़े ही खाती हूँ,फिर फास्ट रखने का मतलब ही क्या हुआ।”

” हाँ! लेकिन अभी चुपचाप अच्छी बच्ची की तरह खा लिजिये, लम्बी जर्नी करनी है अभी , खाली पेट ट्रैवल करना सही नही है।”

  राजा की बात सुन बांसुरी ने थोड़े से अंगूर उठा लिये और धीरे धीरे खाने लगी।

      आखिर कितना अपने मन को समझाती?  वो तो हर मोड़ पर उसके ऊपर छाता चला जा रहा था, और उसके आकर्षण में वो फिसलती चली जा रही थी।

   एक बार फिर सब गाड़ी में बैठे रास्तों को नापने निकल पड़े थे, मौसम भी उनका साथ दे रहा था,बहुत तेज़ बारीश तो नही थी लेकिन हल्की बूंदाबांदी मौसम को खुशगवार किये थी।

” प्रेम यार कुछ सुनाओ अच्छा सा “

” क्या सुनायें हुकुम?”

” नाम तो बड़ा सलमान खान वाला हीरो टाईप रखा है तुमने पर हो बिल्कुल बोरिंग । कुछ गाना वाना सुनाओ यार की माहौल बने। हमें देखो , हमें गाने बजाने की परमिशन नही है फिर भी हमारा बस चले तो हम सिर्फ गातें रहें।”

” हुकुम आपकी बात ही और है। आपका गाना सुना है हमनें लाजवाब गातें भी हैं और गिटार बजातें भी। आपकी एक राज़ की बात भी हम जानतें हैं।

” कौन सी राज़ की बात जानते हो भाई?”

” यही कि जब भी आप महल से बाहर निकलें है, जिस नये शहर जातें हैं वहाँ एक नया गिटार खरीदतें हैं और वहीं छोड़ आते हैं।”
  प्रेम अपनी बात पूरी कर बहुत शालीनता से हँस दिया

” लेकिन इस बार जहां गिटार छूटी है वहाँ मेरा बहुत कुछ छूट गया है” अपनी बात पूरी कर राजा ने एक हल्की सी नज़र बांसुरी पर डाली और फिर सामने देखने लगा।

” भाई आप ही कुछ सुना दो ना, बहुत अच्छा सा कोई सॉन्ग।”

” पक्का, मैं ही सुनाऊँ। पर एक शर्त पर सुनाउंगा”

” हाँ बोलिये भाई।”

” मेरा गाया गीत अगर पसंद आया तो फिर मैं जिसे कहूंगा उसे गाना पड़ेगा,बोलो मंज़ूर है?”

” मंज़ूर है भाई” बांसुरी और प्रेम के जवाब का इन्तजार किये बिना ही पिंकी उछल पड़ी __

” चलो अपने जीवन से जुड़ा कुछ सुनाता हूँ __

       खूबसूरत बात ये, चार पल का साथ ये
           सारी उमर मुझको रहेगा याद
     मैं अकेला था मगर, बन गई वो हमसफ़र
            वो मेरे साथ हो गई……..
   एक अजनबी हसीना से यूँ मुलाकात हो गई
  फिर क्या हुआ, ये ना पूछो कुछ ऐसी बात हो गई
        एक अजनबी हसीना से…

राजा आधा मुड़ कर पीछे की ओर पिंकी और बांसुरी की तरफ मुहँ किये गाता रहा, उसने गाते  हुए एक बार बांसुरी को देखा वो निर्निमेष पलकों से उसे ही देख रही थी।

  ” कैसा लगा मेरा गीत?” राजा के सवाल पर उसने शरमा कर नजरें नीचीं कर लीं।

  ” माइंडब्लोविंग हो भाई आप, चलो प्रेम भैया अब आपकी पारी , आप गाओ।”

  ” नही पिंकी! अब बांसुरी जी गायेन्गी, अगर बांसुरी जी को मेरा गाया पसंद नही आया तो बेशक ना गायें”

  राजा की अजीबोगरीब शर्त पर बांसुरी हड़बड़ा गयी__” नही ऐसी बात नही, आपने तो बहुत अच्छा गाया, पर मैं….”

” चलो बंसी फटाफट कुछ रोमांटिक सा सुना दो, कोई बहाना नही चलेगा, वहाँ फ्लैट पर तो भाई ये इतने गाने सुना सुना के हमें पका चुकी है कि क्या बताऊँ और अब यहाँ शरमाती बैठी है। तुम आखिर शरमा किस से रही हो, प्रेम भैया से?? अरे डोंट वरी वो बस चेहरे से खडूस है पर गाना बजाना उन्हें भी पसंद है।”

   बांसुरी भी समझ गयी थी कि पिंकी भी कुछ थोड़ा बहुत उसकी हालत समझ पा रही है, पर इसी थोड़े बहुत ने उसकी जान ले रखी थी, अगर उसके और राजा के बीच सब कुछ स्पष्ट होता तो शायद वो भी अपने मन और राजा की आंखों से इतनी त्रस्त ना होती।
    अभी तो हर सेकंड में जब भी राजा उसे एक पूरी नज़र से देखता जाने क्यों वो और ज़मीन में गड़ जाती।
   सबके बहुत ज़ोर देने पर भी जब वो गा नही पायी तब राजा ने ही एक और तराना छेड़ दिया__

” चलो मैं तुम्हारी तरफ से शुरु कर रहा हूं, पर इस गाने को पूरा तुम्हें ही करना पड़ेगा, मंज़ूर है बांसुरी?”

  हाँ में धीरे से सिर हिला कर वो फिर चुप लगा गयी

  चांदनी रातें हो तो चकोरी पागल-सी क्यों होती है
    जंगल में कोयल की कू-कू तू जाने या मैं जानूँ
    प्यार में होता है क्या जादू तू जाने या मैं जानूँ
    रहता नहीं क्यूँ दिल पर काबू तू जाने या मैं जानूँ


” बांसुरी गाने को पूरा कर दो” अपनी गहरी आंखों से उसे देखता वो आंखों ही आंखों में उससे बहुत प्यार से एक गुजारिश कर गया__
    अब बांसुरी के लिये खुद को रोकना मुश्किल था….

          जैसे हरियाली और सावन
            जैसे बरखा और बादल
           तेरे लिए मैं, मेरे लिए तू 
                तू जाने या मैं जानूँ…..
  प्यार में होता है क्या जादू तू जाने या मैं जानूँ…..

   क्रमशः


aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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