जीवनसाथी-25

जीवन साथी – 25

          जैसे हरियाली और सावन
जैसे बरखा और बादल
तेरे लिए मैं, मेरे लिए तू 
तू जाने या मैं जानूँ…..
  प्यार में होता है क्या जादू तू जाने या मैं जानूँ…..

   बांसुरी के गीत समाप्त करते ही राजा ने उसे आंखों आंखों में शुक्रिया अदा किया और वापस सामने मुड़ कर प्रेम को छेड़ने में लग गया__

” चलो भाई प्रेम अब तुम भी कुछ सुना दो– नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ ” इस तरह का कुछ एकदम जोश और जज़्बे से भरा हुआ जो तुम्हारी पर्सनैलीटि पर सूट भी करे।

    कुछ देर बाद बांसुरी ने पर्स निकाल कर दवा राजा की ओर बढ़ाई और पानी की बोतल पकड़ा दी।
   गाते बजाते खाते पीते रास्ता कटता जा रहा था, आठ साढ़े आठ के आसपास प्रेम ने फिर एक ढ़ाबा देख कर रात के खाने के लिये गाड़ी रोक दी__

  ” बंसी तुम अभी भी फल ही लोगी क्या?”
 
पिंकी के सवाल का जवाब बांसुरी की जगह राजा ने दिया__
  
” रात में तो बांसुरी खाना खा लेती है। है ना, क्यों बांसुरी ?”

हाँ में सिर हिला के वो फिर चुप बैठ गयी, राजा जितना ही सब याद रख के कर रहा था उतना ही बांसुरी का संकोच बढ़ता जा रहा था, वो उन सब से कैसे कहती कि उपवास वाले दिन वो बिना प्याज़ लहसन का खाना खाती है, हालांकि इसके पीछे का लॉजिक उसे भी पता नही था, बचपन से घर पर माँ ताई सभी को यही करते देखा था।
    उसने वेटर से धीमे से पूछा _” बिना प्याज़ लहसन का कुछ मिल सकता है क्या?

  उसे लगा था राजा प्रेम से कुछ विचार विमर्श में व्यस्त है उसका ध्यान नही जायेगा लेकिन राजा ने सुन ही लिया, वेटर की असमर्थता जताने पर राजा फिर बीच में बोल पड़ा __

  ” अगर कोई सब्जी बिना प्याज़ की नही है तो ऐसा करो सादे जीरा आलू और दही के साथ पराठे ले आओ”

” साब बस एक प्लेट जीरा आलू बनाना मुश्किल होगा”

” तो हम सभी के लिये वही ले आओ, अब तो बना पाओगे ना”

” जी साहब” कहता वेटर उन सब के लिये पानी और पापड़ रख वहाँ से चला गया।

  खा पीकर एक बार फिर सब आगे के सफर पर निकल पड़े __

” प्रेम और कितना वक्त लगेगा हमें पहुंचने में?”

” हुकुम बनारस से भोपाल का रास्ता लगभग पन्द्रह घण्टे का है और वहाँ से विजयराघवगढ़ लगभग साठ बासठ किलोमीटर मतलब और एक डेढ़ घन्टा पकड़ लिजिये। हम दबा कर चलायेंगे तो बारह तेरह घंटों में ही हम महल के सामने खड़े होंगे”

” अरे कोई जल्दी नही है ,आराम से चलाओ। दो तीन घण्टे आगे पहुंच भी गये तो आधी रात में सभी को डिस्टर्ब करना सही नही है।”

” जी हुकुम।”

” मेरा कहना है प्रेम ऐसी स्पीड में चलाओ की हम भोर के साथ ही रियासत में पहुँचे, क्यों ठीक है ना?”

” जी सरकार”

” यार तुम ये सारा वक्त मुझे जो हुकुम सरकार ऐसे बुलाते हो ना ऐसा लगता है जैसे मैं सत्ताईस का नही सत्तर साल का हूँ।”
  अपनी ही बात पर राजा ज़ोर से हँस पड़ा …..

” प्रेम तुम्हारा एक छोटा भाई भी है ना?”

” जी हाँ! मुम्बई ही रहने लगा है अब, वहीं से पत्रकारिता पर कोई कोर्स किया और अब वही नौकरी कर रहा, किसी अन्ग्रेजी अखबार के लिये लिखता है।

” तब तो बांसुरी जी भी उसे जानती होंगी? ” राजा प्रेम के सामने बांसुरी को आप का ही सम्बोधन दे रहा था__

” जी क्या नाम है?” बांसुरी के सवाल पर प्रेम थोड़ा हड़बड़ा गया फिर उसने बड़े धीरे से अपने छोटे भाई का नाम बता दिया__

” प्रताप सिंह चंदेल” ज़रूरत से एक शब्द भी ज्यादा बोलना प्रेम को आता ही ना था।

” तुम्हारे लिटररी सर्कल में तो अच्छा नाम होगा आखिर लड़का अन्ग्रेज़ी अखबार के लिये लिख रहा है। क्या है ना हम आज भी अंग्रेज़ों और उनकी अंग्रेज़ियत की गुलामी से बाहर नही निकल पाएँ हैं, हमारे यहाँ सभ्यता यानी अंग्रेज़ियत ही है जबकि उनके बीच रह के मुझे समझ आया कि असल जीवन में वो कितने फूहड़ होतें हैं, उन्हें जीवन जीना हम हिन्दुस्तानियों से सीखना चाहिए।”

” हाँ कहीं तो सुना है ये नाम पर अभी ठीक ठीक याद नही आ रहा।”

  कुछ देर इधर उधर की बातों के बाद  पिंकी और बांसुरी अपना अपना कोना थामे नींद में ढुलक गये। प्रेम को सारी रात गाड़ी चलानी थी इसी से उसके पास बैठे राजा ने भी एक पल को भी आंखें नही मूंदी और प्रेम के बार बार मना करने पर भी एक ही हाथ से स्टीयरिंग थामे कुछ दो तीन घंटो के लिये गाड़ी खुद चला कर प्रेम को भी कुछ आराम दे दिया, हालांकि प्रेम दुसरी गाड़ियों में साथ चलते सिक्योरिटी  में से किसी को बुलाने को भी तैय्यार था पर अपनी धुन के पक्के राजा ने उसकी एक ना सुनी।

   अगले दिन सुबह छै: साढ़े छै: के आसपास उनकी गाड़ियाँ विजयराघवगढ़ की सीमा में प्रवेश कर गयी। सूरज की उजली पीली किरणें बांसुरी के चेहरे पर पड़ती उसकी गुलाबी आभा को और बढ़ा गईं, उसे एकटक देखते राजा के चेहरे पर मुस्कान चली आयी उसने धीमी आवाज़ में पिंकी को पुकारा और जगाने लगा, उसकी आवाज़ सुन बांसुरी भी जाग गयी।

   चारों तरफ फैली हरियाली के साथ ही कुछ कुछ दूरी पर कुछ आठ दस की संख्या में खड़े लोग गाड़ी पर फूलों की बरसात कर रहे थे। अधमुंदी आंखों से गाड़ी के कांच पे टिकी बांसुरी उन लोगों को देखते ही चौंक कर उठ गयी, उसे इस तरह चौंकते देख राजा एक बार फिर मुस्कुरा दिया__

“यहाँ से हमारी रियासत शुरु होती है बांसुरी, ये हमारी रियासत की जनता है”

  आंखें फाड़े उन लोगों को देखती बांसुरी को यकीन नही हो रहा था__

” इन लोगों को बताया किसने कि तुम मेरा मतलब आप वापस लौट रहें हैं”

  राजा ने प्रेम की तरफ इशारा कर दिया ” इनके अलावा और कौन ये काम कर सकता है।”

” हुकुम आप इस रियासत के होने वाले राजा हैं, और दुसरी बात गद्दी पर बैठ कर शासन करने के अलावा आपने यहाँ के लोगों के दिलों पर राज किया है, एक एक घर की बूढ़ी औरत आपमें अपना बेटा देखती है और इस सबका कारण आपका खुद का स्नेहिल स्वभाव है, अब ऐसे राजा की वापसी से लोगों के चेहरों पर खुशी कैसे ना आयेगी?”

   प्रेम अब गाड़ी धीरे ही चला रहा था कि कुछ लोगों ने हाथ दे कर गाड़ी रुकवा ली__

” लिजिये आपके भक्त आ गये आपकी आरती उतारने”

  प्रेम ने राजा की तरफ का कांच उतार दिया और उसे गाड़ी से उतरने मना किया बावजूद राजा गाड़ी से उतर उन लोगों के बीच पहुंच गया, लगभग तीस पैंतीस की भीड़ जिनमें औरत आदमी बूढ़े बच्चे सभी शामिल थे में से किसी ने उसे तिलक लगाया किसी ने फूलों की माला गले में डाल दी और अधिकतर आदमी तो उसकी चरण रज लेने जमीन पर लोट गये। सभी का अभिवादन स्वीकार करते हुए उसने एक छोटे बच्चे को गोद में उठा कर प्यार किया और वापस नीचे उतारने के बाद अपने गले से सोने की चेन निकाल उस बच्चे के गले में डाल दी, एक बार फिर सबको प्रणाम कर वो वापस गाड़ी में बैठ गया।

” महल का खज़ाना लुटाने में मास्टरी है भाई की।”

  पिंकी के हँसने पर प्रेम भी धीरे से मुस्कुरा कर रह गया, लेकिन बांसुरी एक बार फिर उस पर दिल हार गयी…

   जैसे जैसे गाड़ी महल के करीब पहुंचने लगी लोगों की भीड़ भाड़ भी बढ़ने लगी थी।
   एक बहुत आलिशान प्रवेश द्वार जिसके दोनों ओर लगभग बीस फुट के पत्थरों से बने द्वारपाल सज्जित थे के भीतर प्रवेश करते ही महल की भव्यता के दर्शन होने शुरु हो गये थे।
        दूर से देखने पर वो शानदार महल युरोप के किसी पुराने गिरिजाघर सा लग रहा था, बांसुरी के आज तक के देखे महलों से काफी अलग।

    ऊंचे-ऊंचे गुंबदों को ऊपर की तरफ त्रिकोणाकार मोड़ देकर छोड़ दिया गया था, महल के मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक ऊपर दुसरी मंज़िल पर आगे की ओर बढ़ कर एक वृहदाकार विशाल गैलरी थी जहां शायद महाराजा जी जनता के जनदर्शन के लिये आया करते थे।
     बहुत सारी उँची मिनारों का अद्भुत संगम था वो महल! और उस महल की खूबसूरती से टक्कर लेती महल के सामने की बगिया थी।
   
   महल के गेट से लेकर महल का मुख्य द्वार ही चार पांच किलोमीटर था। महल की भव्यता का अंदाज़ा लगाने में असमर्थ बांसुरी की आंखें चौड़ी होती जा रही थीं।
   अब तक शांत गंभीर बैठी बांसुरी के अन्दर छिपी बालिका जैसे सब जानने को उत्सुक हो उठी थी__

” किस काल का बना है तुम्हारा महल पिंकी? ये मेरे देखे बाकी महलों से बहुत बहुत अलग है?”

  जवाब पिंकी की जगह उसके भाई से मिला__

” हमारा प्राचीन महल इस महल के पीछे है, ये महल तो हमारे दादा साहेब के पिता ठाकुर विजयराघव सिंह ने बनवाया था। उन्हें अंग्रजों की गुलामी मंज़ूर नही थी, वो उनसे गुलामी करवाना चाहते थे इसलिये उनके कारीगर युरोप से बुलवा कर उनके आर्किटेक्ट से डिसाईन करवा कर महल का खाका खिंचवाया था इसीसे इसकी बनावट में यूरोपियन शैली की झलक है।

” पिंकी तुम तो सच में प्रिंसेस निकली “

  पिंकी बांसुरी को देख कर हँस दी__

” तो तुमने आज तक क्या सोचा था, हम नकली राजकुमारी हैं।

” अरे नही! पता तो था राजकुमारी हो  लेकिन तुम्हारी भव्यता का अंदाज़ा नही था”

” देखते जाइये अभी तो बहुत कुछ है आपको दिखाने के लिये”

  महल की भव्यता में खोयी बांसुरी जैसे पलक झपकना ही भूल गयी थी, क्या क्या देखूँ, क्या छोडूं सोचती वो कभी आगे कभी पीछे देखती हर चीज़ के बारे में पिंकी से ढेरों सवाल किये जा रही थी।
    उसके बचपने पर मुस्कुराता राजा अपने भावी स्वागत के लिये खुद को तैय्यार करने में लगा था।

   गाड़ी मुख्य द्वार से कुछ पहले प्रेम ने खड़ी कर दी, प्रेम अपनी जगह से उतर कर राजा की तरफ का दरवाज़ा खोल कर खड़ा हुआ ही था कि एक वर्दीधारी  चाकर दौड़ता आया और राजा के पैरों के सामने से एक मखमली गलीचा महल की सीढियों तक बिछाता चला गया।
    राजा के गाड़ी से उतरते ही आस पास खड़े सभी ने उस पर पुष्पवर्षा करनी शुरु कर दी, राजा के पीछे प्रेम ने पिंकी की तरफ का दरवाज़ा भी खोल दिया, पिंकी के पीछे बांसुरी भी बड़े संकोच से उतर गयी, किसी राजमहल और उसके रहवासियों से उसका पहली बार पाला पड़ने वाला था।

     सामने ही सीढियों पर एक बिल्कुल राजा की कद काठी और उसी चेहरे मोहरे का आदमी मुस्कुराते हुए खड़ा था, और उसके बगल में सुनहरी गोटे ज़री से सजी गुलाबी सितारों वाली साड़ी पहने एक बहुत खूबसूरत सी औरत खड़ी थी। ये युवराज की पत्नि अनंतरूपा थी, और राजा की शक्ल सूरत वाला युवक युवराज था।
        अनंतरूपा के साथ ही एक और बहुत गोरी और दुबली नाज़ुक सी महिला खड़ी थीं, रूपा ने जहां हर तरह के गहनों से खुद को लाद रखा था वहीं वो एक लम्बी सी सोने के मोतियों के बीच रुद्राक्ष के मनके पिरोयी माला के अलावा और कोई गहना धारण नही किये थीं, एक हाथ में सिमरनी और दूसरे में मर्दानी घड़ी बांधे उनके व्यक्तित्व से बांसुरी जबर्दस्त ढंग से प्रभावित हुई जा रही थी।

उनके ठीक बाजू में एक दुसरी दुबली सी लड़की थी जिसके हाथ में सोने की थाली थी जिसमें आरती का सामान सजा था।

   राजा और पिंकी के सीढियों पर पहुंचते ही उस लड़की ने आरती का थाल अनंतरूपा के हाथ की ओर बढ़ा दिया, बड़ी नज़ाकत से अपने हाथों में आरती का थाल लिये अनंतरूपा दो कदम आगे आयीं और प्यार से राजा को देखते हुए आरती करने के बाद सोने की अंगूठी से सात बार राजा की नज़र उतारी और साथ खड़ी लड़की को पकड़ा कर तिलक लगाकर पिंकी की आरती करने लगी।
   
    उसके बाद रूपा के पीछे खड़ी महिला आगे चली आईं और एक बड़े चांदी के जल भरे लोटे से उन सब की एक बार और नज़र उतार कर लोटा साथ खड़ी सेविका को थमा दिया __

राजा ने आगे बढ़ कर उनके पैर जैसे ही छुए होंठों ही होंठो में बुदबुदाते हुए आशीर्वाद की झड़ी लगातीं उन्होने राजा का माथा चूम लिया और पिंकी और राजा को एक साथ ही अपने सीने से लगा लिया

” इधर बहुत मनमर्ज़ी करने लगे हैं आप कुंवर साहब।”
  
     रूपा की आवाज़ सुन राजा ने अपनी चाची से ध्यान हटा कर अपनी भाभी को देखा और मुस्कुरा उठा

” ऐसी तो कोई बात नही, मैं तो आपकी ही सुनता हूँ।”

बड़ी अदा से राजा अपनी भाभी के पैरों में झुक गया

” चलो हटो फरेबी ! यहाँ आपके बड़े भाई आपके बिना चिंता में घुले जा रहें और एक आप हैं एक बार महल से निकले नही कि वापस लौटना ही नही चाहते, बिगड़े शहज़ादे।”

” अब सारे ताने उलाहने यहीं दे लेंगी क्या आप?, उसे अन्दर तो आने दीजिये__ कह कर युवराज ने अपने भाई को गले से लगा लिया।
    गोली लगने की बात प्रेम फ़ोन पर पहले ही युवराज को बता चुका था।
     दोनों भाई एक दूसरे के गले से लगे एक दूसरे की पीड़ा को समझने की कोशिश में थे, और इसी कोशिश में बड़े यत्न से छिपाये आंसू ढुलक गये।

     बांसुरी दोनों भाइयों का मिलन देख समझ चुकी थी कि ये सामने खड़ी सुंदर सी राजसी जोड़ी युवराज भैय्या और रूपा भाभी हैं।
    उन दोनों के पीछे कतार में सजे सभी सेवक सेविकायें पारी पारी से आकर राजा के चरणों पर दूध ढ़ुलकाते चले गये। राजा के बाद वैसा ही सम्मान महल की राजकुमारी भुवनमोहिनी यानी पिंकी का भी हुआ।
    पिंकी को गले से लगाकर एक बार फिर युवराज भैय्या की आंखें नम हो गईं, इस सबसे निपट कर सबका ध्यान सबसे पीछे खड़ी छुई-मुई सी लड़की पर गया, युवराज भैया कुछ पूछते इसके पहले ही रूपा भाभी पिंकी से सवाल कर राजा को घूरने लगी__

  ” ये आपके साथ मेहमान कौन है बाई सा”

  ” हमारी सहेली है बांसुरी! हम और ये मुम्बई में एक साथ ही रहतें हैं, इस बार आते हुए हम इसे अपने साथ ही लेते आये सालाना जलसा देखने।”

” उस उतने से दड़बे में भी आप दो जनी रहती हैं, हाय! सांस कैसे आती होगी, हमें तो मुम्बई की हवा कभी रास ना आयी, कितना नमक है वहाँ के पानी में उफ्फ़!”

  ” इसिलिए तो अपनी रानी जी को हम यहाँ पृकृति के करीब ही रखते हैं हमेशा।”

   बांसुरी ने उन तीनों के सामने हाथ जोड़ दिये__

” आपका स्वागत है बांसुरी! अन्दर आईये।”
 
पिंकी की माँ ने आगे बढ़ कर उसके दोनो हाथ थाम लिये।
    उन्हें देख मुस्कुराते हुए युवराज ने भी बांसुरी को अन्दर आने कहा और  राजा का हाथ थामे महल के अन्दर चला गया, उनके पीछे प्रेम रूपा और पिंकी भी अपनी माँ का हाथ थामे अन्दर की ओर बढ़ चली, इतने सारे नौकर चाकर की फौज में खो ना जाऊं इस डर से बांसुरी भी पिंकी के पीछे तेज़ कदमों से अन्दर को भाग चली।

  सिर्फ कदकाठी ही नही आवाज़ में भी दोनों भाई एक से थे और हंसमुख स्वभाव में भी।

   बाहर की भव्यता से चकित बांसुरी ने जब दीवान खाना देखा तो हतप्रभ रह गयी।
   उसके फ्लोर के सभी चारों फ्लैट को मिला कर बने कुल क्षेत्रफल का तो  सिर्फ वो बड़ा सा हॉल था जहां महल से टक्कर लेता भव्य सजीला फर्नीचर चमक रहा था। उंचे उंचे रेशमी पर्दे, मखमली गुदगुदे कालीन, आदमकद ब्रोस के फूलदान और वैसी ही आदमकद मूर्तियाँ।
       एक से एक झाड़फानूस जिनमें से सबसे बीच का झूमर यूरोपियन शैली में बना अपने आप में आधुनिकता का समावेश लिये था, उसमें एक बार में लगभग आठ सौ मोमबत्तियाँ एक साथ जलाई जा सकती थी।

  महल की भव्यता और सुंदरता को आंखों ही आंखों में पीती बांसुरी का ध्यान इस बात पर बिल्कुल नही था कि महल को देख देख कर वो जैसे रिझी जा रही वैसे ही लोगों की नज़र बचा कर कोई उसे भी नजरों में ही पीता जा रहा था।

  ” बाई सा आप भी फ्रेश होकर आ जाइये, 9 बजे सभी नाश्ते पर मिलतें हैं।”

” बांसुरी को हम अपने साथ अपने कमरे में ही ले जातें हैं।”

” अरे क्यों? जब गेस्ट रूम खाली पड़ा है तो आप क्यों तकलीफ करेंगी, इनके लिये पहली मंज़िल वाला मेहमानो का कमरा खुलवा देतें हैं।”
 
  वैसे तो पिंकी अपनी मर्ज़ी की मालिक थी लेकिन रूपा के सामने वो भी थोड़ा सहम जाती थी। माँ से आंखों में ही विदा ले वो अपने कमरे की तरफ निकल गयी।

  रूपा खुद शाही परिवार से थी भले ही अंग्रजों के शासन के समय उसके दादा परदादाओं ने अपना राजकाज सब अन्ग्रेजी शासन को सौंप स्वयं एक तगड़ी पेंशन पर स्वीकारोक्ती दे दी थी फिर भी शाही खून का उबाल उसमें अब तक था।
         रूपा के पिता नेपाल की तराई में कहीं नाम के लिये एक छोटी मोटी सी  रियासत के अब भी मालिक थे, इसी से राजपूताने का अहंकार उसकी हर बात पर ना चाह के भी छलक आता था। इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान ही उसकी मुलाकात युवराज से हुई थी, लेकिन दोनों के बीच सिर्फ एक ही देश के होने से दोस्ती ही थी।
    पढ़ाई के बाद स्वदेश लौटने पर जब अनंतरूपा के पिता ने युवराज के घर विवाह प्रस्ताव भेजा तब पहले की जान पहचान के कारण बिना ज्यादा पूछ ताछ के ही युवराज ने अपने पिता से हामी भर दी।
     परिणाम सर्वदृष्ट था। दिखने सुनने में अपूर्व सुंदरी रूपा मन की कसैली ही निकली।
    बात बेबात पर अपने मायके की समृद्धि का गुण गान उसकी आदत में शुमार था, जिसे युवराज हमेशा उसका बचपना समझ माफ कर जाता था।

   रूपा की बात सुन पिंकी अपने कमरे की ओर बढ़ने लगी, उन दोनों की बात ठीक से ना समझ पाने के कारण बांसुरी वहीं खड़ी रह गयी, इस बीच राजा भी लम्बे लम्बे डग भरता अपने कमरे को निकल गया।

” जाइये आप भी पिंकी के साथ ही जाइये, वहाँ से मेनका आपको आपके कमरे तक ले जायेगी, अब से यही आपकी सेवा के लिये रहेंगी, अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो आप इनसे पूछ लीजियेगा।”

  हाँ में सर हिला कर बांसुरी एक बार फिर पिंकी के पीछे चल दी__

” क्या यार पिंकी, तुम्हारी भाभी तो पूरी तोप है, मुझे तो आंखों ही आंखों में जाने कितनी बार उड़ा दिया, मुझे तो यहाँ डर लग रहा पिंकी।”

  इतनी देर से संकोच में डूबी बांसुरी ने अकेले पाते  ही पिंकी का हाथ थाम लिया, राजा से कितना मिलता था पिंकी का चेहरा!

” अरे डरो मत हमारा महल शुरू में ऐसे ही डराता है लेकिन बाद में लोगों को इस महल से और यहां के रहने वालों से मोहब्बत हो जाती है समझी।”

”  पिंकी चाय की बहुत तलब थी क्या 9:00 बजे के पहले चाय नाश्ता कुछ नहीं मिलेगा?”

साथ चलने वाली मेनका कुछ सुन ना पाए इसलिए दोनों सखियां आपस में फुसफुसाते हुए धीमे-धीमे बात करते हुए ही आगे बढ़ रही थी…..

” मिलेगा मेरी जान सब कुछ मिलेगा आप अपने कमरे में तो पहुंचिये।”

  हॉल पार करके एक बहुत बड़ा गलियारा था जिसमें घर के पुरखों की आदम कद तस्वीरें सजी हुई थी।
    जितने बड़े बड़े ठाकुर इतनी बड़ी बड़ी मूछें कोई सूट बूट में शेर के ऊपर एक टांग रखकर खड़ा था तो किसी ने बारहसिंघा के सींगों का पूरा सेट अपने हाथ में थामा हुआ था।
    किसी के गले से लंबा चौड़ा पाइथन लटका हुआ था तो किसी ने जंगली भैंसे के सिर को थामा हुआ था।
कुल मिलाकर सभी तस्वीरें एक से बढ़कर एक वीरता का प्रदर्शन कर रही थी कई ग्रुप फोटोस भी सजी थी जिनमें बहुत सारे अंग्रेजों के साथ ठाकुर परिवार के गणमान्य पुरुष मंच साझा कर रहे थे।

   हर चित्र को ध्यान से देखती बांसुरी बार-बार पीछे रह जा रही थी, उसे देख पिंकी ने फिर आवाज लगा दी

” बाद में आराम से सारी तस्वीरें देख लेना यह तस्वीरें कहीं नहीं भागी जा रही। सालों से यही मौजूद है पर अगर हम नौ बजे नाश्ते के लिए नहीं पहुंचे तो फिर हमें नाश्ता नहीं मिलेगा।”

” ऐसा क्यों?”

” राज परिवार के अपने नियम होते हैं डियर बहुत कायदों में बन्धे होते हैं हम। वह सारी बातें धीरे-धीरे तुम्हें समझा दूंगी आज के लिए इतना ही समझ लो कि अभी आठ बजा है हमारे पास पूरा एक घंटा है चल कर फटाफट रेडी हो जाना ठीक पौने नौ पर तुम बाहर निकल आना , मेनका तुम्हें हमारे कमरे तक लेती आयेगी, ठीक नौ  बजे हमें नीचे वाले हॉल के बाजू वाले हॉल ” दावत-ए- खास” में जाना है।समझ गईं?”

“हम्म्म! एक बात बताओ पिंकी , अगर कोई नौ बजे नही पहुंचा तो क्या सच में नाश्ता नही मिलता?”

” पांच मिनट की मार्जिन चल जाती है पर कभी कभी।, लेकिन कोई विशेश कारण है जैसे खराब तबीयत या कुछ और तो पहले से बताना होता है, ऐसे समय में आपका नाश्ता आपके कमरे में उसी समय पर पहुंच जायेगा, समझीं।
   और सुनो, रोज़ सुबह हमारे सबके कमरों के बाहर ठीक आठ बजे वाद्य बजाया जाता है हमें उठाने के लिये, अगर आप उसके पहले उठ चुके तो अच्छी बात है वर्ना उसे सुन कर उठ जाइये और तैयार होकर नौ के पहले नीचे पहुंच जाइये, ये हमारें यहाँ का सुबह का नियम है, वैसे एक नियम और है सुबह सुबह सात बजे हमारी बगिया में बने शिव मन्दिर में दादी साहब पूजा करने जाती हैं, घर की अधिकतर औरतें तब तक जाग कर वहाँ उनके साथ ही पूजा करती हैं वैसे इस नियम पर दादी साहेब ने कोई कट्टरता नही रखी है, उनका मानना है पूजा पाठ अपनी अपनी श्रद्धा की विषयवस्तु है लेकिन जब तक काकू साहेब यानी राजा भैय्या की माँ जिंदा थी वो हमेशा दादी साहेब के साथ पूजा करती थी, उनके बाद ये बीड़ा हमारी मॉम उठा रहीं हैं, पर छोटी माँ अपने हिसाब से ही पूजा पाठ करती हैं, उनके दर्शन सुबह नौ बजे ही सबको मिलतें हैं।”

” तब तो तुम्हारी दादी पूजा पाठ कर चुकी होंगी फिर वो कहीं दिखी क्यों नही।”

” ये उनका एक्सरसाइज़ सेशन का समय है, फिसियोथेरेपिस्ट आती है इस वक्त, इसलिये वो भी हमें नौ बजे टेबल पर ही मिलेंगी।”

  गलियारे की समाप्ति पर ऊपर की ओर हल्का गोलाकार चढ़ाव था जिसे चढ़ते हुए ये अनुभव ही नही हो रहा था कि कोई चढ़ाव चढ़ा जा रहा है__

” यार पिंकी इतने बड़े महल में लिफ्ट क्यों नही लगाई?”

” लिफ्ट है लेकिन दुसरी तरफ, हम तो तुम्हें ऐसे ही घुमाना चाहते थे, अब ज्यादा बातें ना बनाओ, ये तुम्हारा कमरा आ गया है, इस कमरे के चार कमरे छोड़ कर हमारा कमरा है, ठीक है।”

बांसुरी अन्दर जाने में संकोच कर रही थी, उसका संकोच देख पिंकी उसे हाथ पकड़कर दरवाजे से भीतर ले गए।
     इतना बड़ा और आलीशान कमरा बांसुरी ने अपने जीवन काल में कभी नहीं देखा था। अपनी सज्जा में बेजोड़ वह कमरा अच्छे खासे सेवन स्टार होटल को चुनौती दे रहा था।

” पिंकी  कमरा तो बहुत सुंदर है, बस एक बात कहनी थी”

” हाँ कहो ना?”

” एक कप चाय मिल जाती तो उसके बाद फ्रेश होकर  मैं फटाफट नहा कर तैय्यार हो जाऊंगी।”

  पिंकी ने आंखों के इशारे से उसे फ्रिज के बाजू में बने लकड़ी के रैक की ओर इशारा कर दिया, जहां गरम पानी की इलेक्ट्रिक केतली के साथ ही अलग अलग चांदी के बरतनों में दूध चिनी, टी बैग्स और कॉफ़ी पड़ी थी और साथ ही रखा था एक कॉफ़ी पर्कोलेटर!
   जिसे देख अचानक बांसुरी को कुछ याद आया और वो मुस्कुरा कर रह गयी।

क्रमशः

aparna…
  
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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