जीवनसाथी-26

जीवन साथी–26

         पिंकी ने आंखों के इशारे से उसे फ्रिज के बाजू में बने लकड़ी के रैक की ओर इशारा कर दिया, जहां गरम पानी की इलेक्ट्रिक केतली के साथ ही अलग अलग चांदी के बरतनों में दूध चिनी, टी बैग्स और कॉफ़ी पड़ी थी और साथ ही रखा था एक कॉफ़ी पर्कोलेटर!
   जिसे देख अचानक बांसुरी को कुछ याद आया और वो मुस्कुरा कर रह गयी।
   
   उसे अपने वो सारे बचपने के काम याद आने लगे जो उसने राजा के साथ किये थे।
   पिंकी उसे कमरे में छोड़ अपने कमरे में चली गयी पर उसके पीछे से मेनका वहीं खड़ी रही, बांसुरी ने उसे इशारे से पूछा क्या है? उसने भी इशारे से ही कुछ नही जवाब दिया और हाथ बांधे खड़ी रही, राजमहल के उसूलों से अनभिज्ञ बांसुरी को एकान्त की आवश्यकता थी, उसने अपने शब्दों में भरसक चाशनी लपेट कर मेनका से कह ही दिया__

” मेनका जी अगर आपको तकलीफ ना हो तो आप भी बाहर चली जाइये मैं ज़रा आराम से फ्रेश होना चाहती थी।”

” जो हुकुम मालिक! वहाँ आपके पलंग के पास दीवार पर जो स्विच है उसे दबा कर आप जब चाहे मुझे बुला सकती हैं। पर मैं ये कहना चाहती थी कि एक बार आप कमरे को घूम कर देख लिजिये,गुसलखाना वगैरह ,किस नलके से ठंडा किस से गरम पानी आयेगा मैं सब बता देती हूँ।”

” अरे नही नही, वो कोई टेंशन नही है, मैं हैंडल कर लूंगी, आप जाइये, ऐंड थैंक यू सो मच!”

  मेनका मुस्कुरा कर उसे एक सलाम ठोंक बाहर निकल गयी__

  दौड़ कर कमरे का दरवाज़ा बन्द कर बांसुरी ने चैन की सांस ली, हे भगवान! ये राजमहल देखने भर में सुंदर लगतें हैं उसने कभी सोचा भी नही था कि इसके अन्दर के लोगों का जीवन ऐसा कठिन होता है।

   बांसुरी ने सबसे पहले पर्कोलेटर को ऑन कर अपने लिये कॉफ़ी बनाई और कॉफ़ी का कप थामे घूम घूम कर कमरे का मुआयना करने लगी, कमरे की दीवारों पर लगा हल्का गुलाबी गुलाबों का वॉलपेपर कमरे को ज़हाँ अंग्रेज़ियत दे रहा था वहीं उससे टक्कर लेती तांबे की बड़ी सी शकुन्तला की मूर्ति अलग ही राजसी छटा बिखेर रही थी।

   ” ज्यादा टाईम मत वेस्ट कर बांसुरी,कहीं नीचे पहुंचने में लेट हो गयी तो यहाँ की रानी माँ तुझे सीधे फायर ना कर दे”
   खुद से बात करती बान्सूरी ने कमरे में एक तरफ बने बडे से लकड़ी के दरवाज़े को खोला तो उसकी आंखें एक बार फिर चौंन्धिया गईं, इतना बड़ा और शानदार सजीला बाथरूम था कि अगर कभी कमरे में जगह ना हो तो बड़े मज़े से चादर बिछा कर वहां भी सो सकती थी।

    गीजर का स्विच ढूँढने में एक बार फिर मशक्कत में उलझी उसे विचार आया इसिलिए वो रंभा मेनका बार बार बोल रही थी, सब देख भाल के पूछ लो कुछ ना समझ आये तो दिक्कत हो जायेगी…., लेकिन अब यहाँ घुसने के बाद वापस निकल कर उसे बुलाना उसका आकर सब बताना फिर नहाना पूरे आधे घण्टे की बर्बादी थी …इसीसे बेचारी बिना कोई स्विच टटोले ही शॉवर ऑन कर खड़ी हो गयी, पर उससे निकलती मन भावन गरम पानी की फुहारों में उसका तन मन सब शीतल हो गया।
    उसे समझ आ गया कि यहाँ उसके फ्लैट जैसा गीजर सिस्टम नही है यहाँ तो सब ऑटोमैटिक था, मानव आहट से ही जलने बुझने वाले स्विच!!
    पानी से भी गुलाबों की भीनी खुशबू आ रही थी, जैसे वो किसी महकते गुलाबों के पोखरे में उतरी नहा रही थी।

   वहाँ टंगे साफ़ सुथरे गुलाबी बाथरोब को लपेट वहीं रखे हेयर ड्रायर से बाल सुखा कर बाहर आयी ही थी कि उसका ध्यान गया घड़ी पौने नौ बजा रही थी, हाथ में पकड़े टॉवेल को सुखाने की जगह ढूँढती बांसुरी ने एक दूसरे दरवाज़े को खोला और इत्तेफाक से वही कमरे की गैलरी निकली। वहाँ रखे स्टैंड पर टॉवेल डाल कर बांसुरी वहाँ बिछे बाँस के बने गोलाकार मोटे गद्दे और तोशक से सजी बड़ी सी आरामकुर्सी और झूले को देख ही रही थी कि उसकी नज़र सामने की बालकनी में खड़े राजा की तरफ चली गयी, वो भी उसे ही देख रहा था।

    उसे खुद को देखता देख बांसुरी को होश आया की उसके बाथरोब की लम्बाई सिर्फ घुटनों तक ही है, वो चौंक के वापस कमरे में भाग गयी। गहरे रंग की नेहरु जैकेट में वो कैसा दिख रहा था देख भी नही पायी पर उसने ज़रूर इतनी देर में उसे भले से देख लिया था।

  इतनी देर में उसके कमरे की बेल बज गयी__ ” बस पांच मिनट और लगेगा पिंकी”
   कह कर वो जल्दी जल्दी तैय्यार होने में लग गई। बनारस लेकर गये दो चार जोड़ी कपडों में से छाँट कर उसने गहरी मैरून कुरती पहनी और जल्दी जल्दी बाहर निकल आयी।
    दोनो सहेलियां दौड़ती भागती नीचे पहुंची तब तक दावत- ए- खास में बीचो-बीच बिछा लम्बा चौड़ा टेबल तरह तरह की खाने की चीज़ों से और कुर्सियाँ महल पर रहने वालों से भर चुकी थीं।

   पिंकी ने जाकर दादी साहब के बाद सभी बड़ों के पास हाथ जोड़े, बांसुरी ने अपनी जगह खड़े खड़े ही सबको हाथ जोड़कर टप से प्रणाम कर दिया, उसकी इस हरकत पर राजा हँस दिया लेकिन फिर सबको देखने के बाद चुपचाप अपनी प्लेट से खेलने लगा।

   सबसे सामने की पहली कुर्सी पर राजा के पिता बैठे थे उनके बायीं ओर की कुर्सी पर रानी साहिबा यानी राजा की छोटी माँ साहेब बैठी थीं, उनके ठीक सामने दादी थी जिन्होंने उस दिन बड़े लाड़ से अपने लाड़ले को अपने बाजू में बैठा रखा था, पर पिंकी के आते ही जब पिंकी प्रणाम करने के बाद दादी के गले में झूल गयी तो मुस्कुरा कर राजा ने अपनी कुर्सी पिंकी के लिये खाली की और सबसे किनारे चुप खड़ी बांसुरी के पास पहुंच गया।
     वो उसके लिये कुर्सी खींचने ही जा रहा था कि पीछे खड़े सहायक ने उन दोनो के लिये आजू बाजू रखी कुर्सियाँ खींच दी।

    टेबल पर सजे तरह तरह के व्यंजन देख बांसुरी को अपने फ्लैट की रसोई याद आ गयी और याद आ गयी वो शाम जब उसके सुबह के बनाये खाने को ही राजा ने कितने प्यार से और कितनी तारीफ करके रात में  खाया था, जबकि जिनके लिये उसने सुबह से मर मर के खाना बनाया था उनमें से किसी के मुहँ से एक बार भी नही फूटा कि खाना अच्छा बना है, ना भास्कर से ना उसकी मौसी से। वो तो हड़बड़ी में उस दिन सुबह खा भी कहां पायी थी, पर खाने का मज़ा तो शाम को ही आया था जब सारा खाना गर्म कर वो और राजा बालकनी में बैठ कर इधर उधर की गप्पे मारते हुए खा रहे थे।

    उसने धीरे से अपने बाजू में बैठे राजा की तरफ देखा वो मुस्कुराते हुए अपनी प्लेट देख रहा था, बांसुरी को अचानक सुबह का किस्सा याद आ गया, वो एकदम से शरमा कर रह गयी, वो जब तक अपनी सोच में डूबी थी उसकी प्लेट में तरह तरह की चीज़े थोड़ी थोड़ी मात्रा में परोस दी गईं थीं, एक छोटे बाऊल में हर रंग और रस के फल रखे थे।
    फ़ोर्क और नाइफ उठा कर वो सोच ही रही थी कि कहाँ से शुरु करुँ तभी उसकी गोद में राजा ने सबकी नज़र बचा कर कुछ डाल दिया, वो चौंक कर उसे देखती तब तक में राजा ने जूस का गिलास उसके सामने बढ़ाया और वापस अपनी प्लेट और चम्मच से खेलने लगा।

    एक सेब का टुकड़ा मुहँ में डाल बांसुरी ने धीरे से उसे कागज़ के मुड़े परचे को खोला और पढ़ने लगी

   “नाश्ते के खत्म होते समय पिंकी से कहना तुम्हें बाज़ार जाना है कुछ खरीदारी करने।”

  बांसुरी ने कनखियों से राजा को देखा वो शान्ती से अपना नाश्ता खा रहा था, बांसुरी ने अपनी प्लेट में कॉर्न के दानों से प्रश्नवाचक चिन्ह बनाया और अपनी जूस की गिलास थोड़ी सी राजा की तरफ सरका दी, जूस के ग्लास को देखने मुड़े राजा की नज़र बांसुरी की प्लेट पर पड़ी और उसे हँसी आ गयी, पानी पीकर उसने वापस एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा उसकी गोद में चुपके से डाल दिया, तभी उसके पिता की आवाज़ वहाँ हॉल में गरज उठी__

” जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कल सुबह से हमारा सालाना जलसा शुरू होगा, जो अपने नियम के अनुसार पूरे तीन दिन तक चलेगा।
   कल सुबह अष्टमी पूजा के लिए सभी आठ बजे तैयार होकर नीचे आ जाएं गढ़ी के पास वाले पहाड़ी मंदिर में बलि देने के साथ ही हमारी पूजा शुरू हो जाएगी।
      राजकुमार दशहरे के दिन आप रावण दहन करने वाले हैं आप पूरी तैयारी रखें, अपने हाथ को संभाल कर उस दिन तक के लिए तैयार कर लीजिए, क्योंकि धनुष आपको ही चलाना है हां अगर हाथ में ज्यादा तकलीफ है तो बता दीजिए विराट सारा काम देख लेंगे।”

  ” जी डैड मैं कर लूंगा।”

  राजा के पिता की कड़कती आवाज़ सुन बांसुरी के हाथ से चम्मच गिरते गिरते बचा, उसने फिर धीरे से वो पर्ची उठाई __” मुझे पता था तुम सवाल ज़रूर करोगी, जो बोल रहा हूँ वो करो, यहाँ से बाहर निकल कर सारे जवाब दूंगा।”

  अब तक महाराज जी और रानी साहिबा का नाश्ता हो चुका था, अब रानी साहिबा राजा से मुखातिब थीं__

  ” राजकुमार!! हाथ में लगी गोली के बारे में घर पर किसी को भी बताने की जरूरत नहीं समझी आपने। इतनी लापरवाही क्यों? आपकी जान आपके लिए कीमती ना हो लेकिन हम सबके लिए बेहद कीमती है समझ रहे हैं ना आप? आप की इस हरकत पर आपके बॉडीगार्ड प्रेम को नौकरी से निकालने का सोच लिया था  साहेब ने वह तो हमने आपकी और प्रेम की दोस्ती देखकर इन्हें रोक दिया और आप खुद सोचिए क्या मतलब है ऐसे बॉडीगार्ड और उनकी फौज का जब वह आपको कहीं पर भी प्रोटेक्ट कर ही नहीं पाते।
    एक तो आपकी ज़िद, दूसरे आपके बॉडीगार्ड। हमें तो लगता है हम आपकी पूरी सेना ही बदल दें।

  ” सॉरी मॉम !”

  सॉरी का गुलदस्ता अपनी छोटी माँ को थमा कर राजा फिर अपनी प्लेट में डूब गया।
       रानी साहिबा का हद से ज्यादा दमकीला चेहरा और उस पर उनकी हमेशा चढ़ी हुई भवें उनके रूप को सौम्यता की जगह घमंड की आभा से रंग रहीं थीं, उनके साथ की कुर्सियों में उनके दोनों जुड़वा  बेटे यानी राजा के सौतेले भाई विराज सिंह और विराट सिंह बैठे थे दोनों ही भाई राजपूतों की तरह लंबे चौड़े गोरे चिट्टे नौजवान थे।

    उनके ठीक सामने दो और राजा की उम्र के लड़के थे जो राजा की फुफू साहब के बेटे थे, उनके साथ की कुर्सियों पर राजा की फुफी और फूफा साहब विराजे थे।
  लड़कियों के नाम पर उस पूरे राजसी खानदान में एक अकेली पिंकी ही थी। वहां की कुर्सियां जितनी सजीली थी उस पर बैठे लोग भी एक से बढ़कर एक सजीले थे। किसी के वस्त्रों में गहनों में कोई ऐसी कमी ना थी कि कोई किसी से कम नजर आता। एकमात्र पिंकी की मां थी जो अपनी सादगी में लिपटी सौम्यता की मूर्ति होकर भी रानी साहेब को कड़क टक्कर दे रहीं थीं।

  खाते समय बात करने का नियम ना होने से सभी चुपचाप खा रहे थे लेकिन सभी लड़कों की निगाहें बार-बार बांसुरी की तरफ उठ ही जा रही थी।
    इन बातों से बेखबर राजा और बांसुरी एक दूसरे के इशारों में ही व्यस्त थे।

  राजा ने फिर एक छोटा सा पर्चा बांसुरी की गोद में डाल दिया__” जल्दी बोलो।”

उसी समय रानी साहिब एक बार फिर राजा और पिंकी से मुखातिब हुई__  आपके साथ यह लड़की कौन आई है पिंकी?”

” जी हमारी दोस्त है बांसुरी! मुंबई में ही काम करती है हम और बांसुरी वहां एक साथ एक ही फ्लैट में रहते हैं।”

” नाम तो बहुत प्यारा है बांसुरी।  पूरा नाम क्या लिखती हैं आप बांसुरी?”

  प्रश्न पूछते हुए अपनी आंखों से ही बांसुरी का पूरा एक्स-रे निकाल लिया रानी साहेब ने।

” जी बांसुरी तिवारी।”

” ओहो ब्राह्मण हैं आप। हमारी रसोई में तो रोज ही सामिष बनता है लेकिन अगर आप निरामिष खाना चाहती हैं तो आपके लिए बनवा दिया जाएगा, मां साहब ने तो वैसे भी बरसों पहले त्याग दिया था तब से उनके लिए महाराज सादा ही बनाते हैं आपके लिए भी उन्हीं से रसोई बनवा दी जाएगी।
    हमारा रसोईया भी ब्राह्मण है इसी से पुराने प्रचलन में उसे महाराज कहने की हमें आदत है।”

   रानी साहिबा ने अपना जहर बुझा तीर छोड़ ही दिया।

  उनकी बातें सुनती उनमें खोई बांसुरी अपना नाश्ता चुगना ही भूल गई थी तभी अचानक उसे राजा की बात याद आई और उसने जल्दी से अपनी बात रख दी

      “जी थैंक यू रानी जी। हम आज पिंकी के साथ थोड़ा बाहर जाना चाहते थे कुछ सामान लेना था। असल में हम बनारस से बहुत जल्दबाजी में यहां आ गये , हमारे पास ज्यादा कुछ सामान है नही इसिलिए….

” सही कहा बंसी हमें भी एक कुछ थोड़ा बहुत सामान लेना था काकी साहेब क्या हम और बांसुरी मार्केट चले जाएं?”

” बेशक जाइए प्रिंसेस! आपके बॉडीगार्ड आपके साथ चले जाएंगे।”

   इतनी देर से चुप बैठी दादी ने भी आवाज़ बुलंद कर ही दी__

” सिर्फ बॉडीगार्ड के साथ अकेले दोनों लड़कियां नहीं जाएंगी। राजकुमार भी इनके साथ जाएंगे। जाओगे ना राजकुमार?”

  टेबल के नीचे अपने हाथ की मुट्ठी बंद कर राजा ने बांसुरी को थम्स अप किया और दादी की तरफ बड़े अदब से देखकर हाँ में सर हिला दिया__

  ” जी जैसी आज्ञा।”

   नाश्ता खत्म कर महाराजा जी के अपनी जगह पर खड़े होते ही दादी को छोड़ एक एक कर सारे लोग खड़े हो गये, राजा ने उठते हुए बांसुरी को धीरे से हाथ से ही खड़े होने का इशारा किया और सतर खड़ा हो गया।
     उसके पीछे बांसुरी भी खड़ी हो गयी।

   महाराजा जी के वहां से निकलते ही फूफा साहब और दीवान साहब भी उनके पीछे-पीछे दीवान खाने की ओर चले गए युवराज भैया भी अपना नाश्ता खत्म कर चुके थे उन्हें किसी काम से कचहरी जाना था वहां के लिए निकल गए।
    रानी साहेब ने पिंकी से एक बार फिर पूछा किसी चीज की जरूरत तो नहीं है पिंकी के ना कहते हैं वह भी अपनी सबसे खास दासी के साथ वहां से  अपने कमरे की ओर चली गई।

    कमरे में अब सिर्फ दादी साहब राजा बांसुरी पिंकी और पिंकी की मां ही रह गए तब दादी ने एक बार फिर पिंकी और राजा को अपने गले से लगा लिया पिंकी  और राजा को जी भर कर प्यार करने के बाद उन्होंने बांसुरी को देखा ___

  ” बहुत प्यारी हैं आप बिल्कुल किसी गुड़िया के जैसी। ऐसा लगता है जैसे कहीं की शाही राजकुमारी हो।”
     अपनी बात पर दादी जोर से खिलखिला कर हंस पड़ी
   “अच्छा प्यारी प्यारी दादी अब हम बाद में बात करेंगे अगर ऐसे ही बातें करते रहे तो हमें देर हो जाएगी फिर दोपहर के खाने तक अगर हम नहीं पहुंचे तो बवाल मच जाएगा तो अब हम जाएं यहां से मार्केट भी तो दूर है ना।”

“हां हां  गुड़िया रानी जाओ।”

  ” पिंकी जल्दी आ जाना बेटा, राजा आप ध्यान रखना इस लड़की का अपने में नहीं रहती है यह होश खो जाती है बाज़ार देख कर।”

   ” हां मां अब जाने दो कहीं रूपा भाभी आ गई तो कहेंगी बाजार जाने की क्या जरूरत है? राज परिवार वालों के लिए तो सारा बाजार ही महल में आ जाता है, क्या कपड़े क्या सराफा?”
   कहती हंसती गिरती पड़ती पिंकी बांसुरी का हाथ थामे महल से बाहर निकल गई।

    तीनों के बाहर पहुंचते में 10 गाड़ियां एक के पीछे एक लगी हुई थी राजा के बॉडीगार्ड अपनी अपनी गाड़ियों में तैनात थे प्रेम अपनी गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठा  राजा का इंतजार कर रहा था, राजा मुस्कुराते हुए उसकी बगल की सीट में बैठ गया पिंकी और बांसुरी पीछे बैठ गए और उनका काफिला शहर की ओर मुड़ चला।

    शहर के सबसे बड़े मॉल के बाहर गाड़ी खड़ी कर वह लोग अंदर बढ़ गए। सिक्योरिटी के कुछ आदमी उनके आसपास थे और  कुछ दूर लेकिन इस तरह  से उनको घेरे हुए थे कि लोगों को ना पता चले इनके साथ सिक्योरिटी चल रही है।
    राजा को सिक्योरिटी लेकर चलने का बिल्कुल भी शौक नहीं था लेकिन अपने शहर में वह अपने गार्ड्स को खुद से दूर नहीं कर पाता था।

   पिंकी बहुत दिन बाद अपने शहर में शॉपिंग कर रही थी उसका उत्साह चरम पर था पूरे मॉल की कोई कपड़े की दुकान कोई जूते की दुकान कोई ज्वेलरी की दुकान उससे आज अछुती नहीं थी, बांसुरी को लिए वो इधर से उधर हर जगह से कुछ न कुछ सामान उठा रही थी , उसके साथ ही घूमते हुए बांसुरी ने भी अपने लिए कुछ दो तीन जोड़ी खूबसूरत कुर्ते एक डिजाइनर पर्स और एक सैंडल ले ली।
    कुछ एक ऐसे भी कपड़े पर्स और सैंडल थे जिन पर बांसुरी ने हाथ तो रखा और जो उसे पसंद भी बहुत आ रहे थे लेकिन उनकी ऊंची कीमत के कारण उसने उन्हें छोड़ दिया।
         उसकी खरीदारी जल्दी ही निपट गई थी लेकिन पिंकी का मन ही नहीं भर रहा था उसने पहली बार किसी राजकुमारी के साथ शॉपिंग की थी और उसे मन ही मन यह देखकर बहुत खुशी भी हो रही थी कि लड़कियां आखिर लड़कियां ही होती हैं चाहे वह मध्यमवर्गीय हो या राजकुमारी । उनके मन का बचपना कभी खत्म नहीं होता वह भी पूरे उत्साह के साथ पिंकी की खरीदारी करवा रही थी बीच-बीच में राजा को भी देखती जाती थी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि  लड़कियों के सेक्शन में राजा घूम घूम कर क्या कर रहा है? लेकिन बाद में उसने देखा कि राजा के भी हाथ में दो-तीन भरे हुई पॉलीबैग्स थे।

    बिलिंग काउंटर पर जब सभी का एक साथ हिसाब होने लगा तब बांसुरी ने अपना सामान अलग कर लिया पिंकी के बार बार कहने पर भी कि तुम्हारी खरीदी सारी चीजें हमारी तरफ से तोहफा होंगी बांसुरी ने ना कर दिया__

” क्या बांसुरी क्या हम इतने पराये हैं तुम्हारे लिये? अब हमारे और तुम्हारे बीच भी ये हिसाब किताब चलेगा, आज तक जब फ्लैट में तुम हमेशा राशन सब्जी फल ले आया करती थीं तब तो हमसे कभी तुमने उन चीज़ों के रुपये नही लिये फिर आज अगर हम तुम्हारा बिल दे देंगे तो तुम्हारा स्वाभिमान कैसे आहत हो जायेगा?

  ” अरे पिंकी कोई स्वाभिमान आहत नही होगा। बात बस ये है कि ये मैंने यूँ ही कैज़ुएली खरीदा है अपने शौक के लिये, तो मेरे शौक के लिये तुम क्यों पे करोगी हाँ तुम खुद मुझे कोई तोहफा देती तो बात अलग थी, मैं आँख बंद कर के ले लेती बिना उसकी कीमत देखे। समझीं।

    बांसुरी से बनावटी नाराज़गी दिखाती पिंकी ने आपने होंठ तीरछे घुमाये कि उसे देख बांसुरी और राजा दोनो ही हँसने लगे।
   अभी तक उन दोनो को अकेले में बात करने का कोई मौका नही मिल पाया था।
     पिंकी जब बिल की लाइन में खड़ी भुगतान कर रही थी और राजा बड़े ध्यान से उसे सामने वाले से सेल के ऊपर बहस करते सुन रहा था उसी समय बांसुरी धीरे से राजा के पीछे जा खड़ी हुई__

  ” नाश्ते की टेबल पर शॉपिंग जाने के लिये क्यों कहा?”

   राजा ने चौंक के देखा तो बांसुरी उसके एकदम पास ही खड़ी थी

  ” अरे रे इतने पास मत आओ मेरे।”

  राजा के अचानक ऐसा बोलते ही बांसुरी घबरा कर छिटक गयी __ ” क्या हो गया तुम्हें राजा?”

” मेरे पागलपन की छूत तुम्हें भी लग जायेगी”

  ” बस बातें बनवा लो इनसे, कभी सीधा जवाब देना तो सीखा ही नही, क्यों है ना राजा साहब?”

  ” प्यार आड़ी टेढ़ी गलियों पे चलने को मजबूर जो कर देता है? सीधे रास्ते ना रास आते हैं और ना किस्मत में होतें हैं!”

” ओहो फिलोसोफर जी, कायदे से इस छोटे से शॉपिंग वाले सवाल का जवाब दे दीजिये फिर आइंदा कोई सवाल ना करूंगी।”

  ” जिस दिन से आप सवाल करना छोड़ देंगी फिर मेरे जवाब किसके लिये जिन्दा रहेंगे।”

  ” जा रही मैं पिंकी के पास, उसका काम भी खत्म होने आ गया, और इतनी धीमी आवाज़ में बोला भी नही जा रहा मुझसे”

  राजा ने उसे मुस्कुरा कर देखा__

  ” तुम्हारे फ्लैट की खुली हवा के बाद महल में बहुत घुटन सी लग रही थी, अभी पूरा घर नाराज़ है मुझसे इसलिये अगर मैं कहता कहीं बाहर जाना है तो सबकी नाराज़गी और बढ़ जाती, और दुसरी बात मुझे जलसे की तैय्यारी करने का भी मन नही था।”

” राजकुमारों को भी काम करना पड़ता है भला?”

” हाँ बिल्कुल कल अपनी आंखों से देख लेना, हम सारे राजकुमारों की करामात। आज वहाँ सब उन्हीं तैय्यारियों में होंगे।”

  बांसुरी ने मुस्कुरा कर राजा की आंखों में देखा और हाँ कह दिया__

   ” ये इतना सारा सामान किसके लिये खरीद रखा है आपने राजा जी?”

  ” है कोई खास! ज़रूरी तो नही कि मेरे दिल की हर बात तुम्हें बताऊँ?”

  ” अच्छा ऐसा, तो मत बताओ। कौन सा मैं मरी जा रही जानने के लिये”

बांसुरी तुनक कर पिंकी की तरफ चली गयी , दोनो सखियों के आगे बढ़ते ही राजा भी अपने बैग्स थामे उनके पीछे हो लिया।

   **********

   रात के खाने के बाद बांसुरी कुछ देर के लिये पिंकी के साथ उसकी माँ के पास चली गयी। उन दोनो माँ बेटी को साथ बैठे देख उसे भी अपनी माँ की याद सताने लगी।
    कितना बड़ा और शानदार महल था। नौकरी के बाद से वो अपने हर महीने की तनख्वाह से अपनी माँ के लिये कुछ ना कुछ कीमती सामान ज़रूर लेती आयी थी। जब उसकी माँ उसके पास मुम्बई आयीं थीं तब उन्हें उसने हर मन्दिर के साथ साथ हर मॉल के भी दर्शन करवाये थे।
    अमूमन माँ बाप चाहतें हैं उनका बच्चा पूरी दुनिया घूमे, हर अच्छी वस्तु देखे पर बांसुरी ऐसा ही कुछ अपने माता पिता के लिये सोचा करती थी।
    आज उसे रह रह के यही लग रहा था कि काश उसकी माँ और पापा भी कभी ये महल देख पाते। फिर अपने बचपने पे मुस्कुराती बांसुरी ने अपना सिर झटक कर अपने विचारों को विराम दिया और घर पर फ़ोन लगा लिया।

  कुछ देर बाद पिंकी और उसकी माँ से विदा लेकर वो अपने कमरे में चली आयी।
     दरवाज़ा हल्के से धक्के से ही खुल गया, अन्दर जाने पर उसे लगा जैसे कोई इस कमरे में अभी अभी आकर गया है।

   कुछ देर इधर उधर देखने के बाद उसने दरवाज़ा बंद कर दिया।
     पलंग पर आकर बैठी ही थी कि वहीं रखे पैकेट्स पर उसकी नज़र पड़ी और वो चौंक कर खड़ी हो गयी। ये तो वही पैकेट्स थे जो उसने राजा के हाथ में देखे थे।
     धड़कते दिल के साथ उसने वो पैक खोल कर देखा तो देखती ही रह गयी।
    हर एक वो चीज़ जो उसने अलग अलग दुकानों पर देखी और पसंद की थी उसमें मौजूद थी। जिस सामान को उसने बस छू कर ऊलट पलट कर वापस रख दिया था वो तक वहाँ  मौजूद था।
    एक मखमली मैरून लहंगे के मखमल को गालों से लगाये वो आईने में खुद को देखती खड़ी थी और जब उसने कीमत देखी तो लाख रुपये का लहंगा उसे बिल्कुल ही मिट्टी लगने लगा था और उसने उसे वापस उसकी जगह पर रख दिया था।
     वही मखमली लहंगा उसके सामने मुस्कुरा रहा था,उसके साथ ही एक छोटी सी पर्ची रखी थी__

   ” बांसुरी!!
                ये सामान तुम्हारे किसी एहसान का बदला नही है और ना ही ये तुम्हारे आत्मसम्मान पर कोई चोट है क्योंकि अब हम दोनो उस मोड़ से थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं।
  पहले मैं तुम्हारी सहेली का भाई था पर अब तुम्हारा भी दोस्त हूँ। और दोस्तों के बीच लेन देन कोई व्यापार नही है, है ना बांसुरी क्योंकि अगर ऐसा होता तो मैं तुम्हें बनारस के अस्पताल में मेरे इलाज में खर्च रुपये जो तुमने वहाँ जमा किये थे वापस ना कर देता।
    दशहरे की शाम यही पहनना।
    
                राजकुमार अजातशत्रु सिंह!

  अपने धड़कते हृदय को समेटे बांसुरी ने वो चिट्ठी और लहंगा अपने सीने से लगा लिया, और एक बार फिर दो बूंद ढुलक कर उसके गालों तक चले आये।

क्रमशः

aparna…





लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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