जीवनसाथी-27

जीवनसाथी- 27


बांसुरी!!
                ये सामान तुम्हारे किसी एहसान का बदला नही है और ना ही ये तुम्हारे आत्मसम्मान पर कोई चोट है क्योंकि अब हम दोनो उस मोड़ से थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं।
  पहले मैं तुम्हारी सहेली का भाई था पर अब तुम्हारा भी दोस्त हूँ। और दोस्तों के बीच लेन देन कोई व्यापार नही है, है ना बांसुरी क्योंकि अगर ऐसा होता तो मैं तुम्हें बनारस के अस्पताल में मेरे इलाज में खर्च रुपये जो तुमने वहाँ जमा किये थे वापस ना कर देता।
    दशहरे की शाम यही पहनना।
    
                राजकुमार अजातशत्रु सिंह!

  अपने धड़कते हृदय को समेटे बांसुरी ने वो चिट्ठी और लहंगा अपने सीने से लगा लिया, और एक बार फिर दो बूंद ढुलक कर उसके गालों तक चले आये।

   उस सारे सामान को समेटती बांसुरी खुद में ही मुस्कुराती रही।
     प्यार का पहला खत लिखने वाले अल्हड़ लेखक ने ना कोई प्यार भरा सम्बोधन लिखा था उसके लिये और ना कोई और मीठी बात, लेकिन फिर भी सौ सौ बार पढ़ने और चूमने से भी मन नही भर रहा था।
     लिखने वाले की खुशबू पूरे खत पर चस्पा थी। उसकी उंगलियों के निशान हर एक उस सामान पर थे जो उसके लिये उसने वहाँ मॉल में घूम घूम कर खरीदा था ।
      लहंगे को सीने से लगाये बैठी बांसुरी ने उसे देखा __ हाँ इसे भी तो उसने अपने हाथों से ही छू कर खरीदा होगा” ऐसा सोचते ही अबीरी हो चुके अपने गालों की दहक से वो खुद जल उठी।

   सारा सामान सहेज कर आलमारी में डालने के बाद वो एक बार फिर बालकनी के दरवाज़े पर चली आयी, धीरे से दरवाज़े को खोल कर बीच में बनी दरार से उसने सामने राजा की बालकनी पर नज़र डाली पर कोई ना दिखा, इधर उधर जहां तक राजा के कमरे में उसकी नज़र पहुंच सकती थी उसने पहुंचाने की भरसक कोशिश की पर वो जाने कहाँ छिपा बैठा था कि नज़र ही ना आया।
    बेचारी दरवाज़ा बंद कर लौटने ही जा रही थी कि राजा की बालकनी का दरवाज़ा खुला और राजा एक हाथ में टैब थामे प्रेम के साथ कुछ बात करते हुए बालकनी में चला आया।
      उसे देखते ही बांसुरी का मन ऐसे उत्साह से भरा कि उसकी ठोकर से दरवाज़ा खुल गया, आहट सुन राजा और प्रेम दोनों की ही नज़र उस पर चली गयी।
    प्रेम ने तो तुरंत अपनी नज़र अपने हाथ में पकड़े लैपटॉप पर गड़ा दी पर राजा और बांसुरी एक दूसरे को देखते खोये रहे__

” हुकुम बैठ जाइये।” प्रेम की आवाज़ पर राजा ने हँस कर प्रेम को देखा और कुर्सी पर बैठने के बाद बांसुरी से इशारे में ही क्या हुआ पूछने लगा, बांसुरी ने भी कुछ नही का इशारा किया और मुस्कुराती हुई अन्दर चली गयी।

  कुछ देर बाद एक बार फिर झांक कर देखा तो प्रेम राजा के जख्मी हाथ को आगे पीछे मोड़ कर उसे चलवाने का अभ्यास करवा रहा था। क्यों इतनी जल्दी बैन्डेज खुलवा दिया राजा ने, सोचती बांसुरी अपने फ़ोन को ढूँढने लगी….
       अपने फ़ोन को चार्ज करने उठाया ही था कि देखा फिर भास्कर के कॉल मिस हो गये थे।
    उसे खुद पर खीझ होने लगी थी, क्यों वो बार बार भास्कर को मौका देती थी खुद को डांट लगाने का।
   भास्कर के बारे में सोचते हुए अचानक उसे भास्कर पर तरस आने लगा, उस बेचारे का क्या दोष? ठीक है वो थोड़ा ओवर पज़ेसिव ही तो है पर क्या ये बात सगाई से पहले बांसुरी नही जानती थी, फिर आखिर क्यों उसने शादी के लिये हाँ की। भास्कर ने उस पर किसी प्रकार का कोई दबाव तो डाला नही था, आखिर उस समय उसने यही तो सोचा था कि जब शादी करनी ही है तो किसी ऐसे लड़के से क्यों ना कर ली जाये जिसे पहले से थोड़ा बहुत जानती है लेकिन अब?
    जैसे ही उसके सामने भास्कर से बेटर ऑप्शन आया उसने फट से उसे चुन लिया?
    क्या वो सच में इतनी स्वार्थी है? वो क्यों इतना सोचती है? क्या प्यार में पड़ने वाले सभी लड़के लड़कियाँ उसी की तरह सोचते फिरते होंगे?
    उसके साथ ऐसा क्यों होने लगा है , जब वो अकेली होती है तो भास्कर ,उसके माँ पापा ताई बुआ सारे जहान की चिंताएं उसके सिर पर मंडराने लगती हैं और जैसे ही वो सामने आता है, पता नही क्या हो जाता है वो उसे देखते ही सब कुछ भूल जाती है , सारी चिंताएं सारी परेशानियां जैसे कपूर के धुयें सी वो उड़ा जाता है।
    जब तक पास होता है ऐसा लगता है वक्त थम गया है । क्यों इतनी भावुक होने लगी है वो आजकल कि खुशी हो या गम हर बात पर आंखें भर आती हैं?

   क्या यही प्यार है?

   सोचते सोचते बांसुरी की आँख लग गयी। सुबह आस पास चिड़ियों के चहचहाने से उसकी आँख खुली, घड़ी देखी सुबह के छै बज रहे थे।

  उसे याद आया रात सोने के पहले उसने दो तीन बार भास्कर को फोन लगाया था पर उसने उठाया नही, शायद नाराज़गी में बदला ले रहा था। उसने देखा भास्कर का मेसेज आया हुआ था ” 3 दिन की किसी वर्कशॉप का हिस्सा बनने उसे सिंगापोर जाना पड़ा था, इसलिये अभी उसका फ़ोन बंद ही रहेगा।”

   मुहँ हाथ धोकर बांसुरी अपने कमरे का दरवाज़ा खोल बाहर निकल आयी, उसके कमरे के बाहर के गलियारे में ही एक किनारे कुर्सी पर मेनका बैठी थी जो उसे देखते ही खड़ी हो गयी__

” अरे मेनका जी आप यहाँ?”

” आपकी खिदमत में है हुजूर। फर्माइये क्या चाहिए?”

” कुछ नही! मैं तो बस नीचे वॉक करने जा रही थी, सोचा जल्दी उठ ही गईं हूँ तो इस शानदार महल की जानदार बगिया की सैर कर ली जाये।”

” कौन सी बगिया में सैर करनी है आपको?”

” मतलब?”

” मतलब ये की महल को चारों ओर से पांच अलग अलग बगीचों ने घेर रखा है।”

” ओह्ह ऐसा, जो सामने पड़ जाये वही घूम आऊंगी।”

  वो मुस्कुरा कर आगे बढ़ ही रही थी कि मेनका ने फिर एक राग अलापा__

” हुकुम माफी!!

” किस बात की भई ?”

” आप ऐसे रात के कपड़ों में ही बाहर चली जायेंगी।”

” पूरा फुल नाईट सूट है यार! हॉट पैंट थोड़ी पहन रखी है मैंने? इसमें क्या बुराई है?”

” जी कपडों में कोई बुराई नही लेकिन महल के कायदे….”

“वो तो महल वासियों के लिये होते होंगे ना , मै तो मेहमान हूँ “

  मेनका सर झुकाये खड़ी रही, बांसुरी समझ गयी और वापस कमरे में जाकर नहा कर कपड़े बदल कर चली आयी, कुर्तियों की कमी होने से उसने सफेद फ़ेडेड जीन्स के साथ पीली टॉप पहन कर उँची सी पोनी टेल बनाई और निकल पड़ी, उसे लगा सुबह सुबह तो पूरा राजमहल सो रहा होगा।
     दरवाज़े से चुपके से झांकने पर इस बार भी बाहर खड़ी मेनका नज़र आ गयी__
    वो बाहर आयी एक मुस्कुराती नज़र मेनका पर डाल वो आगे बढ़ गयी। मेनका भी मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे हो ली__

” आप साथ ही चलेंगी मेरे?”

” जी हुकुम! कहीं आप रास्ता ना भटक जायें इसलिये छोटी रानी साहेब ने आपके साथ तैनात कर रखा है।”

  मेनका की बात बांसुरी के पल्ले नही पड़ी वो बगीचे की खूबसूरती देखती, हर एक फूल को सूंघती और उनकी तस्वीरें उतारती घूमती रही।
     उन फूलों के बीच जगह जगह पर कमल के तालाब भी थे, जिनके पास कभी अपनी सेल्फी खींचती कभी मेनका की तस्वीर लेती बांसुरी उस सुरम्य कानन में ऐसी खोयी कि कोई छिप कर उसे देख भी रहा है, इसका उसे भान ही ना हो पाया।

    मन्दिर से आती शंख घण्टे निनाद की आवाज़ सुन वो आवाज़ की तरफ बढ चली, संगमरमर के श्वेत भव्य मन्दिर में पण्डित जी पूजा करवा रहे थे,और घर की कुछ महिलायें दादी के साथ वहाँ खड़ी आरती गा रहीं थी। वो भी चुपके से हाथ जोड़े सबसे पीछे खड़ी हो गयी।
     आरती के बाद पण्डित जी प्रसाद बाँटते उस तक भी चले आये…
    दादी उसे देख खिल उठीं __

” बड़ी जल्दी उठ गईं आप? नींद तो सही आयी ना, डर तो नही लगा महल में।”

   मुस्कुरा कर ना में सर हिलाने के बाद बांसुरी ने उनके पैर छू लिये।
    रूपा भी वहीं खड़ी थी, बांसुरी को ऊपर से नीचे घूरती वो कहीं किसी कोने से इस सलोनी सी लड़की में चाह कर भी कोई एब नही निकाल पा रही थी। कैसा मोहिनी रूप था कि जो एक बार देखे कभी फिर इस चेहरे को भूल ना पाये।
   
  ” आठ बजे तक तैय्यार होना है, हम जातें है दादी साहेब वर्ना लेट हो जायेंगे।”

” हमें तो आप तैयार ही लग रही हैं अनंतरूपा, क्या और भी कोई सज धज बाकी है?”

“हाय क्या ऐसे खाली कोरे चले जायें, गहने तो पहनने ही होंगे ना!” बारह तोले का माणिक का जड़ाऊ हार ,झुमके और कंगन लहराती रूपा अपनी रेशमी साड़ी की लसर फसर संभालती वहाँ से निकल गयी।

दादी और पिंकी की माँ को प्रणाम कर बांसुरी भी वहाँ से निकल गई।

  *****

ठीक आठ बजे काफी सारी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में शाही खानदान अपनी कुलदेवी पूजा के लिए पहाड़ी मंदिर की ओर निकल चला। बांसुरी पिंकी के साथ उसकी गाड़ी में ही बैठी थी , राजा प्रेम के साथ दूसरी गाड़ी में था।
    बांसुरी का मन मायूस था वह पहली बार बलि प्रथा देखने जा रही थी उसे बचपन से ही इन सब बातों से बहुत दुख होता था उसके लिए जानवरों का जीवन भी उसके अपने जीवन की तरह ही अनमोल था, लेकिन यहां किसी से कुछ कहने का सवाल ही नहीं उठता था।
      एक वह था जिससे कहा जा सकता था लेकिन सुबह से उसके भी दर्शन नही हुए थे।

    मंदिर में पहले से ही पुजारियों का समूह राजा जी और उनके परिवार का इंतजार कर रहा था एक बकरे को नहला धुला कर एक लोहे के खूंटे से बांध कर तैयार रखा गया था।

   मंदिर में सर्वप्रथम अष्टमी पूजन करवा कर पंडित जी ने सभी को पारी पारी से तिलक लगाया और हाथों में कलेवा बांधने के बाद सब पर गंगाजल छिड़क कर उन्हें बलि वाले स्थान पर ले चले।
     बांसुरी सबसे पीछे थी। धीरे-धीरे नीचे देखती खुद में खोई वह कदम बढ़ा रही थी तभी ऐसा लगा उसके छोटे-छोटे कदमों से कदम मिलाने के लिए किसी ने अपनी लंबी लंबी टांगों को यथासंभव छोटे कदमों में तब्दील करने की कोशिश की है__

” क्या हुआ कुछ उदास लग रही हो?”

बांसुरी ने चौंक पर देखा राजा उसके साथ ही चल रहा था

” अरे तुम!  तुम यहां कैसे? तुम तो सबसे आगे चल रहे थे”

” हां बस आ गया तुम बताओ तुम्हारी उदासी का कारण क्या है?”

  “कुछ खास नही।”

  ” त्यौहार के इतने खास मौके पर तुम ऐसी उदास हो मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है। घरवालों की याद आ रही है क्या?”

  ” राजा सच बोलूं तो मुझे यह बलि देना, जानवरों को मारना, उन्हें खाना यह सब पसंद ही नहीं है। बस हिम्मत नहीं हो रही बलि देखने की।

“हम्म्म्म”

राजा के इस लंबे से हम्म्म के बाद बांसुरी ने कहना जारी रखा

” मैं समझती हूं तुम्हारे जीवन और तुम्हारे कल्चर का यह भी एक हिस्सा है, तुम इससे भाग नहीं सकते लेकिन क्या करूं मेरा मन नहीं मान रहा।
     क्या मैं  मंदिर में जाकर बैठ जाऊं मेरा तो वहां रहना भी कोई जरूरी नहीं।”

” अब मैं क्या कहूं, आधे रास्ते तो हम चले चुके हैं वह सामने ही तो बलिवेदी है जहां बकरे को बांधा गया है, तुम आओ देखते हैं क्या हो सकता है।”

अपनी बात पूरी कर लंबे-लंबे डग भरता वह दो तीन कदमों में ही उस जगह पर पहुंच गया ।
      उसके वहां पहुंचने के पांच 7 मिनट में ही घर के बाकी सदस्य भी एक-एक कर वहां पहुंच गए पंडित जी ने बकरे को तिलक लगाया माला पहनाई और कुछ मंत्र जाप करने लगे बकरा अपनी पूरी कोशिश करके मिमियाता रहा चिल्लाता रहा जैसे बार-बार प्रार्थना कर रहा हो कि __मुझे छोड़ दो मुझे मार कर तुम्हें क्या मिलेगा।
          बांसुरी पिंकी का हाथ थामे बहुत कठिनाई से अपनी रुलाई रोके खड़ी रही, और तभी राजा का छोटा भाई विराज हाथ में कटार लिए बलि देने के लिये आगे आया और उसने राजा की तरफ कटार बढ़ा दी।
    राजा ने कटार हाथ में ली और जैसे ही बकरे का सर कलम करने के लिए कटार उठाई बांसुरी ने तुरंत अपनी आंखें बंद कर ली__

” रुक जाइए राजकुमार अजातशत्रु।”

      पंडित जी की आवाज सुन बांसुरी ने आंखें खोल उन्हें देखा और उसके साथ साथ सभी बड़े अचरज से पंडित जी को और राजा को देखने लगे।
      पंडित जी ने बकरे के पैर की तरफ इशारा किया और सभी को संबोधित कर कहने लगे
      “महाराज क्षमा कीजिएगा जब बकरे को बलि के लिए लाया गया था, तब तो यह पूर्ण था लेकिन अभी इसके पैर में चोट लगी हुई है जहां से रक्त स्त्राव हो रहा है और ऐसे पशु को बलि के लिए पूर्ण नहीं माना जा सकता , इसलिए इस पशु की बलि नहीं दी जा सकती।
        और आप के महल के नियम अनुसार अगर एक पशु को एक बार जल अभिमंत्रित कर पूजा के लिए तैयार कर लिया गया तो इसका मतलब यह होता है कि देवी ने उसका भोग ग्रहण कर लिया अब किसी दूसरे पशु कि यहां बलि नहीं दी जा सकती इसलिए आज का बलि का कार्यक्रम बिना बलि के ही समाप्त किया जाता है क्षमा चाहता हूं महाराज।”

  ” पर यह अच्छा शगुन तो नहीं है पण्डित जी”

  “जी रानी साहिबा पर क्या किया जा सकता है। यह शुभ संकेत भी नहीं है।
    इतने सालों में आज तक कभी देवी की बलि खाली नहीं गई देवी का तिलक हमेशा ही रक्त से होता आया है।”

  ” क्या पंडित जी आप भी शुभ अशुभ के चक्कर में लगे हुए हैं आपके पास तो हर बात का काट है हमें पूरा विश्वास है कोई ना कोई उपाय तो आप निकाल ही लेंगे।”

  ” जी युवराज अब बकरे के स्थान पर सवा किलो काले तिल का प्रतीकात्मक बकरा बना कर काटा जा सकता है , अगर महाराज आज्ञा दे तो।”

   महाराज की आज्ञा से तुरंत ही  तिल मँगवा कर उसका बकरा बनाया गया और उसे ही राजा ने कटार से काट कर रस्म को पूरा किया, और माता का तिलक कर सभी के चरणों का वंदन करने के बाद युवराज के पास ही खड़ा हो गया।
     
      युवराज ने सबके सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करने के बाद महाराज के चरण स्पर्श किए और वापस मंदिर की तरह निकलने के लिए महाराज को निवेदन करते उनके पीछे पीछे निकल गया, उसके पीछे सभी आपस में चर्चा करते वहाँ से निकल गये।
     किसी को समझ नही आ रहा था कि इतनी खोजबीन जांच पड़ताल के बाद लाये बकरे के पैर से खून निकला कैसे।
      बांसुरी मन ही मन भगवान को धन्यवाद करती पिंकी के पीछे चली जा रही थी। पिंकी अपनी गाड़ी की जगह राजा की गाड़ी की तरफ आगे बढ़ गयी, राजा अपनी गाड़ी के दरवाज़े पर एक पैर टिकाये खड़ा उन्हीं लोगो का रास्ता देख रहा था कि एक छोटा बच्चा वहाँ दौड़ता चला आया।
   राजा के सामने आकर उसने हाथ बढ़ा दिया__

  ” अरे छोटू उस्ताद मैं तो तुझे भूल ही गया था। ”
 
       राजा ने अपनी जेब से ब्लेड निकाल कर उसकी हथेली पर रखने के बाद कुछ रुपये भी उसकी जेब में ठूंस दिये।

  ” और सुन इस सब के बारे में किसी से बोलना मत। और एक बात इन सब से तू अभी ना खेला कर इनसे खेलने के लिये बहुत छोटा है अभी ।”

  ” जी हुकुम” मुस्कुराता हुआ बालक जेब में ठूंसे रुपये निकाल गिनता वहाँ से भाग गया

  पिंकी और बांसुरी आश्चर्य से राजा की तरफ देखने लगीं__

  ” भाई!! इसका मतलब आपने?”
 
  ” ज्यादा दिमाग मत खर्च करो प्रिंसेस , अभी तुम्हारा इंटरव्यू बाकी है।”

  ” हे भगवान! मेरे भाई को कब सदबुद्धि देंगे, ये तो शगुन अपशगुन करा बैठे।”

  ” बस करो दादी अम्मा ! जल्दी गाड़ी में बैठो, देखो सबकी गाड़ियाँ आगे निकल गईं हम ही पीछे रह गये।”

  पिंकी के पीछे बांसुरी भी गाड़ी में बैठ गयी, बैठने से पहले उसने राजा की आंखों में देख धीरे से होंठों को गोल कर थैंक यू कहा। बड़ी अदा से सर झुका कर राजा ने उस आभार को ग्रहण किया और आगे अपनी सीट में बैठ गया।


    वहाँ से सारी गाड़ियाँ जलसे वाले मैदान की ओर बढ़ चली थीं।
     एक बड़े से मैदान को किसी छोटे स्टेडियम का रूप दिया गया था, गांव की जनता के साथ ही आस पास के गांव की भीड़ भी देखते ही बन रही थी।
   खचाखच भरे जन समूह में भी सभी के लिये बैठने की व्यवस्था थी, कोई अकेला भी ऐसा नही था जो खड़े होकर जलसे का हिस्सा बनने वाला था।
    राज परिवार के लिये अलग से केबिन तैयार था जहां शाही कुर्सियाँ ,गद्दियाँ और तोशक सजे थे।

     अपनी अपनी जगह सभी के बैठने के बाद सेवकों की कतार  एक एक कर जूस और नाश्ते की प्लेट लेकर सबकी सेवा में उपस्थित थी।

   सभी अपनी जगह थे पर वो नही था। रहने को वहाँ युवराज, विराज और विराट भी नही थे पर बांसुरी का ध्यान सिर्फ राजा की अनुपस्थिति पर ही केंद्रित था। उसने पिंकी से पूछना चाहा पर संकोच आड़े आ गया।
    नाश्ते की प्लेट से आ रही खुशबू ने सोयी भूख भी जगा दी थी, अभी वो तंदूरी पनीर फ़ोर्क में लगाने वाली थी कि उसे याद आया कि सुबह मन्दिर तो सभी भूखे ही गये थे, फिर नाश्ते के लिये राजा यहाँ क्यों नही है।
आखिर उससे नही रहा गया__

” पिंकी तुम्हारे भाई नज़र नही आ रहे।”

सिर्फ राजा के लिये पूछने में उसे अजीब संकोच हो रहा था।

” अभी सब के सब नज़र आयेंगे। सब तैय्यार होने जो गये हैं।

” पर किसके लिये?”

” बंसी तुम भी बड़ी  भुलक्कड़ हो, बताया तो था आज से सालाना जलसा है आज हमारे महल के सभी राजकुमार अपने करतब दिखाएँगे, अगर सुबह बलि दे दी जाती तो उसी बकरे का गोश्त आज खाने में पकता और यहीं नाश्ते के बाद खाना भी होता।
    यहाँ से तो अब शाम को ही महल लौटना होगा। कल सुबह कन्या पूजन में सारे गांव की कन्याओं को यहीं पहाड़ी मन्दिर में हवन के बाद भोजन कराया जायेगा उसके बाद आम जनता अपनी कला का प्रदर्शन करेगी और शाम को उनके लिये पुरस्कार वितरण किया जायेगा।

      फिर परसों शाम में राजा भैय्या रावण का वध करेंगे उसके पहले हमारे गांव के कलाकार छोटा सा कार्यक्रम भी देते हैं।”

   पिंकी की लम्बी चौड़ी बातों में बांसुरी को कोई रस नही मिल रहा था, वो बस ये जानना चाहती थी कि राजा ने कुछ खाया या नही लेकिन पिंकी अपने में मगन अपने महल के गुण गान में लगी थी।आखिर बांसुरी से ना रहा गया__

” वो सब ठीक है ये बताओ राजा ने कुछ खाया या नही।”

  पिंकी आश्चर्य से बांसुरी को देखने लगी__

” मेरा मतलब तुम्हारे भाइयों का नाश्ता?”

मन ही मन मुस्कुराती पिंकी ने धीरे से जवाब दिया__

” आज सारी कलाबाज़ी वो लोग खाली पेट ही करेंगे, सब खत्म होने के बाद ही वो लोग कुछ खायेंगे।”

” और राजा की दवाएं, मेरा मतलब दवा कब लेंगे , आज उनकी ड़ोज का आखिरी दिन है….
  अपनी बात पूरी करते करते बांसुरी अपना फ़ोन संभाले वहाँ से उठ कर बाहर चली गयी, पिंकी समझ गयी कि वो किसे फ़ोन लगाने जा रही है।
      रूपा की भी आंखें बांसुरी का पीछा तब तक करती रहीं जब तो वो केबिन के कांच से ओझल ना हो गयी।
    केबिन के दरवाज़े के बाहर पहुंच बांसुरी ने राजा को फ़ोन लगा लिया।

” हेलो! कहाँ हो?”

” जिस केबिन में तुम बैठी हो उसी के नीचे! क्यों क्या हुआ?”

  ” सुबह की खाली पेट वाली दवा ली?”

” बांसुरी! सुनो , अभी मैं कुछ नही ले सकता ,कुछ देर बाद….

  ” मैं कुछ नही जानती! अभी के अभी दवा लो और उसके बाद कुछ हल्का सा खा कर अपनी कालाबाजियां दिखाना।”

  ” अरे नही ले सकता अभी, समझा करो!”

” मैं नीचे आ रही हूँ, कहाँ हो?”

” रुको रुको तुम मत आओ, मैं ही आ रहा ऊपर।”

  राजा के बांसुरी तक पहुंचने में उसने अपने पर्स में रखी राजा की दवाएँ निकाली और एक सहायक से पानी और जूस भी मँगवा लिया

राजा के आते ही उसने उसके सामने दवा आगे बढ़ा दी__

” तो ये खिलाने तुम नीचे आ जाती?”

” बिल्कुल! आखिर नर्स हूँ तुम्हारी। अब आज तुम्हारी दवा खत्म मेरा काम भी खत्म। आखिर मेरे साथ बनारस मेरे काम से ही तो गये थे, मेरा भी कोई फर्ज बनता है।”

” ओह्ह तो ये सारी तीमारदारी फर्ज निभाने के लिये की जा रही है?”

” बिल्कुल! आपने क्या सोच लिया?”

” हाय! मैंने तो कुछ और ही सोच लिया था।”

  ” बताओ ज़रा , आखिर क्या सोचा था।”

” यहाँ से लौटने के बाद अगर शाम को मेरे कमरे में चाय पीना चाहोगी तो चाय के साथ….

  ” तो चाय के साथ बताओगे?”

  ” जी नही ! चाय के साथ बताना है या नही ये सोचूंगा”

” जाओ ! मुझे नही सुननी तुम्हारी बात, मैं तो जा रही ऊपर, बहुत भूख लग रही मुझे।”

 
  बांसुरी मुस्कुराने लगी उसे देख राजा भी हँसने लगा इस बात से अनजान की ऊपर केबिन में एक जोड़ी आंखें उन्हीं दोनों पर केंद्रित थीं।

” अब जा सकता हूँ?” जूस का ग्लास बांसुरी को वापस करते हुए उसने पूछा और लम्बे लम्बे कदम भरता वहाँ से निकल गया, बांसुरी भी अपना सामान वापस पर्स में डाल ऊपर चली आयी।

  कुछ देर में ही राजकुमारों की तलवारबाज़ी, भाला चलाना, तीरंदाजी , रायफल शूटिंग और इसी तरह की कुछ शाही प्रतियोगिताएँ होनी शुरु हो गयी, पर उम्मीद से इतर राजा अपने दायें हाथ का प्रयोग नही कर पाया।
     काफी सारे निश्चेतक दर्दनिवारक स्प्रे का प्रयोग करने पर भी उसे उस हाथ को उठाने में कुछ अधिक परिश्रम लग रहा था, बहुत अधिक पीड़ा थी जिसे देखते हुए युवराज ने उसे किसी भी प्रतियोगिता में भाग नही लेने दिया।

   सारी प्रतियोगिताएँ राजा के बिना ही संपन्न करनी पडीं , उसी सब के बीच में दोपहर का भोजन भी निपट गया और सब कुछ समाप्त कर महल लौटने में उन्हें शाम हो गयी।

  *****

   पूरे दिन की भागदौड़ के बाद अपने कमरे में पहुंचते ही बांसुरी पलंग पर कटे पेड़ सी ढह गयी__
 
   जहां महल के लोग राजा के भाग ना ले पाने से दुखी थे वहीं बांसुरी इस बात से कुछ अधिक ही प्रसन्न थी। उस पूरे मैदान में बैठी जनता सिर्फ और सिर्फ राजा के नाम के जयकारे लगा रही थी।
    उनका प्रिय राजकुमार प्रतियोगिता का हिस्सा नही बन पाने से दुखी था और उसी दुख को दूर करने जनता का प्यार किसी उँची पर्वत श्रृंखला से फ़ूटते शत सहस्र झरनों सा उच्शृंखल बहता जा रहा था।
    वैसे जनसमूह युवराज और राजा दोनो के जयकारे लगा रहा था पर जैसे ही राजा की चोट का सबको पता चला ऐसी करुण प्रेम की लहर बही कि “राजकुमार अजातशत्रु की जय हो” के आगे सारे नाम फिर फीके पड़ गये।

   क्या किसी एक मनुष्य से इतने सारे लोग इतना प्रेम कर सकते हैं? आखिर ऐसा है क्या राजकुमार अजातशत्रु में जो आम साधारण जनता में इतने लोकप्रिय हैं।
   उसने आज तक राजा महाराजाओं की कहानियां या तो अपनी स्कूल की किताबों में पढीं थीं या माँ से बचपन में सुनी थीं।
    
    बचपन में हर लड़की अपनी माँ से कहानी सुनती है कि परियों के लोक से उसका सपनों का राजकुमार आयेगा और उसे अपने साथ ले जायेगा, कुछ बड़ी होने पर वैसा ही अधूरा पूरा सा कोई सपना उसने भी देखा था, लेकिन कभी ये सोचा नही था कि ऐसे उसे सच में अपने सपनों का राजकुमार मिल जायेगा।
  फ़ोन में बजने वाले मेसेज बीप से उसका ध्यान फ़ोन पर गया__

  ” चाय आपका इन्तजार कर कर के ठंडी होने जा रही है। हो सके तो आ जाइये।”

  राजा के मेसेज के जवाब में उसने एक मुस्कुराती इमोज़ी भेज दी__

” इन्तजार का फल मीठा होता है राजा जी”

” कुछ अधिक लम्बा नही हो गया इन्तजार , ऐसे में तो मुझे डायबीटीज़ हो जायेगी।”

” नही होने दूंगी, चिंता ना करें। बस 5 मिनट दीजिये।”

  तैयार हो कर बांसुरी कमरे से बाहर निकली तो बाहर मेनका को ना देख उसने राहत की सांस ली और जल्दी जल्दी डग भरती राजा के कमरे की ओर चल पड़ी __

    दरवाज़े पे उसने दस्तक दी ही थी कि दरवाज़ा खुल गया__

   दरवाज़े से लेकर बालकनी तक एक गुलाबी मखमली कालीन बिछा था जिस पर गुलाब की पन्खुरियाँ पड़ी हुई थी।
     पूरा कमरा राजा की खुशबू से महक रहा था। कहीं कोने पर कोई हल्का संगीत बज रहा था।
     उस मदहोश करने वाले संगीत और खुशबू के बीच कमरे की सज्जा में खोयी बांसुरी दरवाज़े के भीतर ही ठिठक कर खड़ी रह गयी थी, कि राजा ने मुस्कुरा कर उसका स्वागत किया और उसे अपने साथ बालकनी की ओर ले चला__

” क्या हम चाय बालकनी में पियेंगे?”

” तुम्हें कमरा ज्यादा पसंद है तो यहाँ भी पी सकते हैं, पर मुझे तुम्हारे फ्लैट से लौटने के बाद अपनी बालकनी से मोहब्बत हो गयी है। बहुत सुकून मिलता है वहाँ बैठ कर।”

   बांसुरी आ तो गयी थी लेकिन राजा की तरफ आँख उठा कर देखने की उसकी हिम्मत ही नही हो रही थी।वो अपने इस हद से ज्यादा शरमा जाने की आदत से खुद परेशान थी, क्या बोलूं क्या नही अभी सोच ही रही थी कि दरवाज़े पर फिर किसी ने दस्तक दी__

” आ जाइये।” राजा की आवाज़ सुन एक सेवक अन्दर चला आया। राजा को प्रणाम कर उसने महाराजा जी का संदेश राजा से कह दिया__

  ” हुकुम ! राजा साहेब आपको तुरंत दीवानखाने में याद कर रहें हैं!”

” अभी ? पर क्यों? सिर्फ हमें या भैय्या भी वही हैं?”

  ” जी घर के सभी बड़े वहाँ पहुंच चुके हैं,बस आपका ही इन्तजार हो रहा है।”

  ” ठीक है चलो! मैं आता हूँ बांसुरी, तब तक तुम चाय पी लो, चाहो तो यहीं इन्तजार कर लेना या कमरे में चली जाना।”

” ठीक है” कहती बांसुरी भी राजा के पीछे पीछे कमरे से बाहर आ गयी।

  राजा लम्बे लम्बे डग भरता दीवानखाने के लिये सीढियों की ओर बढ गया उसके आंखों से ओझल होते ही बांसुरी भी अपने कमरे में जाने के लिये पलटी ही थी कि सामने ही रूपा से टक्कर होते होते बची__

” नजरें ज़मीन पर रखिये तो सही होगा वर्ना ऐसे ही इधर उधर टकराती रहीं तो भगवान भी आपको नही बचा पायेंगे।”

  रूपा के कटाक्ष को समझ ना पाने के कारण बांसुरी उसे देखती खड़ी रही__

” जी मैं समझी नही, आप कहना क्या चाहती हैं?

” इतनी नासमझ लगती तो नही हो, खैर कुंवर सा के लिये लड़कियाँ कोई अजूबा नही है , इस मुगालते में मत रहना की उनके कमरे तक पहुंचने वाली तुम पहली हो। इन राजकुमारों के शौक तुम्हें क्या पता? खैर मुझे क्या? तुम सीधी सी लगी इसलिये कह दिया।

   रूपा अपना जहरीला तीर छोड़ कर चली गयी, उसके पीछे भारी कदमों और आंसू भरी आंखों से रास्ता टटोलती बांसुरी अपने कमरे की ओर चल पड़ी ……..

क्रमशः

aparna …

  

 
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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