जीवनसाथी-29

जीवन साथी- 29

राजा मुस्कुरा कर उठ गया, और बिना देर किये वहाँ से बाहर निकल गया……

राजा की खुशी और पिंकी के मन की बात के बीच उलझी बांसुरी इसी उधेड़बुन में खोयी थी कि अब पिंकी को राजा से हुई बात कैसे बताये कि इसी बीच रूपा भाभी ने अपने स्वभाव के अनुरूप एक और विस्फोट कर ही दिया….

   ना चाहते हुए भी बांसुरी की आंखें तब तक राजा को पीछे से देखती रहीं जब तक वो नज़र आता रहा, उसके नजरों से ओझल होते ही उसने अपने हाथ में पकड़े खाली प्याले को देखा और नीचे रखने ही जा रही थी कि रूपा भाभी की आवाज़ कानों में पड़ी __


   ” थोड़ी और चाय ले लिजिये, हमारा भी साथ दे दीजिये, क्यों बाई सा ? आप भी एक और कप लेंगी। अब तो भई आपके साथ चाय पीने का हमें मौका ही कहाँ मिलेगा।”

    रूपा अपनी बात पूरी करती तब तक में बुआ जी भी अपने भारी भरकम शरीर को संभालती वहाँ चली आयी, उनके वहाँ आकर बैठते में ही पीछे से विराज और बुआ जी का लड़का जय भी चले आये…..
 
    पिंकी तो सामान्य थी लेकिन विराज और जय की उपस्थिति में बांसुरी सामान्य नही हो पा रही थी, विराज जहां चोरी छिपे उसे देख रहा था, जय बिना किसी लाग लपेट के आंखों ही में उसे निगल लेने को तैयार लग रहा था।
    जय की ऐसी ही आंखे उसने खाने की मेज़ पर भी देखी थी इसी से वो उस वक्त भी असहज हो बैठी थी वही असहजता उसे अब भी महसूस हो रही थी लेकिन इतने लोगों के बीच से अचानक उठ कर चले जाना शोभा नही देता इसीसे वो चुप चाप अपनी चाय पीती बैठी रही।

   ” आप दोनों यहाँ कहाँ घूम रहे, इतनी सारी तैय्यारियाँ पड़ी हैं , क्या अकेले कुंवर सा और साहेब ( युवराज) ही सारा काम देखेंगे।”

  ” हमारे दोनो भाई शेर है असली राजपुताना! उनके रहते हम छोटों को कुछ करने की ज़रूरत ही क्या है?”

  विराज के जवाब पर जय बत्तिसी दिखाता बांसुरी को घूरता रहा।
    उसकी नजरें रूपा से भी बच नही पायीं। कोई और दिन होता तो उसके लिये एक और मसालेदार चटपटी खबर और मनबहलाव का साधन यही हो जाता लेकिन आज उसके पास इस सबसे कहीं महत्वपूर्ण बात थी, जिसके लावे समेटती वो विस्फोट करने को पूरी तैय्यार बैठी थी।

  ” नही नही ! आप लोग जाइये यहाँ से। कुछ हम औरतों की आपस की भी तो बात हो सकती है ना।”

  रूपा के साथ ही बुआ जी के इसरार पर दोनों लड़के बिल्कुल ही बिना मन के मायूसी से वहाँ से उठ गये।
  विराज जय से बहुत अलग था, राजा का छोटा सौतेला भाई होने के कारण या बचपन से दोनों के बीच घर वालों द्वारा कराई प्रतियोगिताओं के कारण उसने सदा से राजा को अपना भाई कम प्रतिद्वंदी अधिक मान रखा था।
    आज इतने सालों में पहली बार वो हृदय से प्रसन्न था। आज के जलसे की प्रतियोगिता में वो पहली बार विजयी हुआ था, भले ही इसका मुख्य कारण राजा का किसी प्रतियोगिता में भाग नही लेना था लेकिन फिर भी विजय तो उसी की हुई थी…..
     कहीं ना कहीं उसके सम्राट बनने की इच्छा को हल्की ही सही हवा तो मिली ही थी।
    उसकी माँ साहेब ने बचपन से उसे एक ही सपना दिखाया था। युवराज तो अशक्त था लेकिन राजकुमार को राजा के पद से हटा कर वहाँ विराज या विराट को बैठाना छोटी रानी साहेब के लिये इतना आसान नही था।
    विराट स्वभाव से अलग था उसने युवराज और राजा में अपने सगे भाइयों सा स्नेह पाया था और उसका मान भी रखता था लेकिन विराज इस बात पर पूरी तरह अपनी माँ को पड़ा था, उसके लिये उसका स्वार्थ सबसे ऊपर था।

   जाते जाते विराज ने एक नज़र बांसुरी को देखा और दरवाज़े के एक ओर रखी छोटी तिपाई पर एक गुलाबी लिफ़ाफ़ा छोड़ दिया……
    सुबह जब बांसुरी बगीचे में मेनका के साथ इधर उधर घूमती फिर रही थी तब विराज ने छिप कर जाने कितनी सारी तस्वीरें उतार ली थी उसकी। किसी तस्वीर में कमल पुष्प पर रखे उसके होंठ नज़र आ रहे थे तो किसी में गुलाबों के साथ जुड़ी उसकी आंखे।
     सभी तस्वीरें बार बार देख कर भी खींचने वाले का मन नही भरा तो उसने उन तस्वीरों का प्रिंट निकाल कर अपनी सुबह की मॉडल के सुपुर्द करने की सोची और इसलिये लिफ़ाफ़ा थामे वो बांसुरी के कमरे तक चला आया था। वहाँ उसे ना पाकर वो जब पिंकी के कमरे के सामने से गुज़र रहा था तब उसने रूपा भाभी और बाकी लोगों की आवाज़ सुनी और जय के साथ भीतर चला आया, पर इतनी भीड़ भाड़ में उसे अपने मन की कहने का कोई अवसर नही मिला।
     इसी सब के बीच जब एक बार उसकी नज़र बांसुरी से मिली तब उसने बांसुरी को देखने के बाद अपने हाथ में थामे लिफाफे को देखा और नज़र नीचे कर ली।
   लिफ़ाफ़ा छोड़ते वक्त भी विराज इसी खुशफहमी में रहा कि बांसुरी ने उसे लिफ़ाफ़ा रखते देख लिया है, पर देखा किसी और ने था।

  ” लिजिये फुफू साहेब आप भी चाय लिजिये।”

  ” बहुरानी हम एक बार ले चुकी हैं चाय, ज्यादा चाय आजकल सुहाती ना है। और दुसरी बात काम भी सारा फैला पड़ा है, हम जा रहीं तैय्यारियाँ देखने।”

  ” काम भी देख लीजियेगा फुफू सा एक कप हमारे साथ भी पी लिजिये फिर कल को बाई सा भी पराई हो जायेंगी, फिर कहाँ उनका साथ मिलेगा। कहिये भला।”

  ” किन तैय्यारियों की बात कर रहीं है आप भाभी ?”

  ” ये लो जैसे राजकुमारी जी को कुछ पता ही नही, ऐसी भोली बनी बैठी हैं।”

  पिंकी को रूपा की गोल मोल बातें घुमाने की आदत पर अब गुस्सा आने लगा था__

” कोई मुझे साफ़ साफ़ बतायेगा भी कि किन तैयारियों की बातें हो रहीं हैं?”

   रूपा तो अभी लोहे को और तपाना चाहती थी पर स्वभाव की अधीर बुआ जी से ना रहा गया और उन्होने अनजाने ही हथौड़ा चला ही दिया__

  ” देहरादून से लाड़ो रानी तुम्हारे लिये रिश्ता आया है। दशहरे की अगली शाम आयेंगे वे लोग और कुंवर और तुमने एक दूजे को पसंद कर लिया तो तुरंत ही छेका हो जायेगा।”

  ” पहाड़ों की रानी बनने जा रहीं है बाई सा आप! कहीं सासरे जा कर हमें भूल ना जाइयेगा।”

  ” क्या कह रहीं है भाभी आप ? अभी कौन सा ससुराल चली जा रही मैं?

  ” रोके के बाद आप ज्यादा दिनों की मेहमान नही रहेंगी बाई सा! दीवाली के बाद आने वाली तुलसी विवाह पर आपके लग्न की बात भी सुन चुके हैं हम।”

  ” हमें एक बात समझ नहीं आ रही आप लोगों को इतनी क्या जल्दी पड़ी हुई है।”

  ” जल्दी किस बात की बाईसा शादी की उम्र भी तो हो गई है आपकी।”

  ” और हमारा एग्जाम पिछले दो साल से हम जिस परीक्षा की तैयारी में जी-जान से जुटे हैं उसके बारे में आप लोगों ने कुछ भी नहीं सोचा हमारा इंटरव्यू बाकी है अभी।”

  “हे राम जी हम कहां जाकर मरे! बाईसा आपको इतनी सी बात समझ नहीं आती आप इंटरव्यू सेलेक्ट भी हो गई और कलेक्टर बन भी गई तो क्या सरकार की गुलामी करेंगी आप ? अरे आप शाही खून हो और राज परिवार की हो,  आप गुलामी करने के लिए नहीं पैदा हुई गुलामी करवाने के लिए पैदा हुई हैं। हम राजपूत किसी की गुलामी नहीं करते फिर वह चाहे सरकार ही क्यों ना हो। आई बात समझ में आपके।
   आप घर भर की लाडली है इसलिए आपकी जिद को मानकर आपको पढ़ाई के लिए आपकी इच्छा से बाहर भेज दिया गया था पर इसका मतलब यह नहीं कि यहां पर कोई भी यह चाहता है कि आप कलेक्टर बने।
   आपके कलेक्ट्री के सपने से यहां किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता बाईसा।”

    पिंकी का दिल रोने का कर रहा था , अपने आप को भरसक संयत कर उसने एक आखिरी दांव खेला__

  ” खैर ! हमसे पूछा तो जायेगा ही हम तभी अपने मन की बात कह लेंगे।”

  “हे भगवान क्या आपको अपने ही खानदान के कायदों के बारे में मालूम नही है, फुफू सा क्या बाई सा आपकी दीदी के बारे में नही जानती?”

  अब तक सूखे मेवों पर एकाग्रता से केंद्रित अपने हाथ और जिह्वा को समेटे बुआ जी को वहाँ  अपनी उपस्थिति का भान हुआ……
     उन्होंने कुछ हल्के इशारे कर रूपा को समझाना चाहा पर रूपा जैसे आज बांसुरी के सामने ही महल की सारी सच्चाई बताने को व्यग्र हुई जा रही थी।

   ” क्या हुआ था फुफू साहब आपकी बाईसा को, हमने सुना है बहुत छोटी उम्र में उनका देहांत हो गया था।”

  रूपा की बात का जवाब पिंकी ने दिया__

” भाभी सा हमने सुना था उनकी जचकी बिगड़ गई थी”

  ” यह लो राजकुमारी जी ने यह सुन रखा है। वैसे हमें अंदाजा यहीं था। आपको फूलों की छड़ी से भी नहीं छुआ कभी आपकी मां साहब ने तो वह इतनी बड़ी और बुरी खबर आपको कैसे सुनाती भला?”

  रूपा की पहेलियां बुझाने की आदत से पिंकी अब बहुत परेशान हो उठी थी__” आप जो भी कहना चाहती हैं वह साफ-साफ बताइए ना।”

  ” हम साफ साफ ही तो कह रहे हैं, आपको समझ नहीं आ रहा तो हम क्या करें ?
     इस महल के कुछ कायदे और कानून हैं।
यह दोस्ती के नाम पर आप आम साधारण जनता को सिर पर जरूर बैठा सकते हैं, लेकिन उनसे शादी ब्याह नहीं कर सकते ।और अगर राज परिवार से बाहर इस घर का कोई भी शख्स शादी ब्याह करता है तो उसकी वही सजा होती है जो आपकी बड़ी फुफू साहब को मिली थी।”

   पिंकी आश्चर्य से अपनी बुआ की तरफ देखने लगी।
वहां बैठी बांसुरी समझ गई कि इस सारी बात में कुछ पंक्तियां उसे इंगित करके ही कही गई थी। अपमान से एक बार फिर उसकी आंखें भरने को हुई, लेकिन खिड़की से बाहर देखती वह अपने आप को संयमित कर बैठी रही।

  रूपा की आधी अधूरी बात को समेटने आखिर बुआ जी को अपना मुंह खोलना ही पड़ा __

” लाडो रानी हमारी भी एक बड़ी बहन थी। जिस समय की हम बात बता रहे हैं उस समय हम छोटे थे यही कोई 15 सोलह बरस के और बाई सा थी उन्नीस की।  उस समय हमारी बाईसा को दीवान खाने में काम करने वाले एक मुलाजिम से प्यार हो गया।
    घरवालों को जैसे ही इस बात की भनक लगी उनके लिए तुरंत ही रिश्ता ढूंढा जाने लगा। रिश्ता पक्का हो गया।
      अपनी सगाई के ठीक 1 दिन पहले रात में वह उसका हाथ थामे महल छोड़कर भाग गईं  पर वह नहीं जानती थी कि महल की पहुंच से भागना इतना आसान नहीं है। भाई साहब के बाशिंदों ने उन्हें ढूंढ निकाला और भाई साहब ने उन दोनों का अपनी कटार से गला काट दिया।
           उनकी सगाई वाली शाम उन दोनों के पार्थिव शरीर यहीं इसी महल के दीवान खाने में आसपास पड़े हुए थे।
        पूरे महल के लोगों को रोने की सख्त मनाही थी। हम छोटे थे हमसे हमारी बाईसा को इस हाल में नहीं देखा गया। हम सिसक उठे , हमें तुरंत वहां से बाहर भेज दिया गया।
          भाई साहब और बड़े बुजुर्गों का यही मानना था कि बाईसा ने खानदान के रीति-रिवाजों को ठुकरा कर अपनी मनमर्जी की है और इसीलिए उन्हें उनके किए पाप की सजा दी गई है इस सजा का हमें शोक नहीं जश्न मनाना चाहिए बहुत धूमधाम से बाईसा की अर्थी सजा कर उन्हें आग दी गई।”
  
   ठंड के मौसम में भी बांसुरी के शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी उसके माथे पर पसीने की बूंदे छलक उठी, कैसे लोग थे ये। क्या खानदान की मान मर्यादा की कीमत किसी इन्सान के जीवन से भी अधिक होती है।
      इनके लिये इनके रीति रिवाज महत्वपूर्ण हैं या रिश्ते नाते?
    पिंकी और रतन के लिये उसका कलेजा कसमसा कर रह गया।

   ” छोडिए भी फुफू साहेब आप और हम भी क्या बाते लेकर बैठ गये। कहाँ यहाँ दो दो खुशी के मौके मिल रहे और हम पुरानी बातों का कलेश जगा रहीं हैं।”

  ” दुसरी कौन सी खुशखबरी है बहुरानी?”

  ” लो क्या आपने भी नही सुनी? कुंवर सा की खुशखबरी।”

  ” नही तो ?”

  ” आप भी फुफू साहब! कभी खानसामे और रसोइये से फुरसत पाएँ तब तो महल की कोई बात आप तक पहुँचे। ”
    बुआ के साथ पिंकी की ओर नज़रे घुमा कर रूपा अपनी बात पूरी करने लगी__” बाई सा के लिये अभी रिश्ते की बात हमारे दूर के काका साहब ही तो लेकर आयें हैं, उन्होंने ही तो इतना उंचा खानदान सुझाया भी और वहाँ बात की शुरुवात भी की।”

  ” ये तो हम जानते हैं बहुरानी”

   ” फुफू साहब इन्हीं काका साहेब ने हमारे ब्याह के समय कुंवर सा को देखा था और तभी से हमारे कुंवर सा उन्हें अपनी इकलौती बेटी रेखा के लिये एकदम जँच गये थे, वो तो जाने कब से साहेब से इनके लिये बात कर चुके हैं। अब बाई सा के रोके के लिये मेहमानों के साथ उनका भी आना हो रहा है, काकी हमसे कह रही थी कि काका सा पूरी तैय्यारी से आ रहें हैं, सारा शगुन साइत ठीक हुआ तो वो भी कुंवर सा को टीका कर जायेंगे।”

  ” अरे पर क्या आप लोग भाई से एक बार पूछेंगे भी नही ?”

   ” बाई सा आपको क्या लगता है कुंवर सा आप जैसे भोला राम हैं? वो इस रियासत के होने वाले राजा हैं। आपसे हमसे कहीं ज्यादा दुनियादारी जानते हैं वो। वो अच्छे से जानतें हैं कि इस तरह के रिश्ते रियासत के नफे नुक्सान से भी जुड़े होतें हैं। अब आज के ज़माने में वैसे भी कौन सा राजपाट रह गया है, सभी तो किसी ना किसी व्यापार से जुड़े हैं या फिर अन्ग्रेज सरकार के ज़माने से चली आ रही पेंशन खा रहे। अपना साम्राज्य बनाये रखना है तो जो गिने चुने राजे रजवाड़े बचें हैं ना उनसे मधुर संबंध जोड़े रखना भी ज़रूरी है।
    वैसे हमें नही लगता कि कुंवर सा रेखा के बारे में नही जानते और अगर नही भी जानते होंगे तो जानने के बाद इस रिश्ते से कभी इन्कार नही करेंगे।
   मन बहलाना अलग बात है पर शादी ब्याह अपनी बराबरी में हो तभी रुचता है, हर कोई ऐरा गैरा राजपरिवार के कायदों को ना समझ सकता है और ना निभा सकता है। आखिर जो वर्णव्यवस्था हमारे पुरखों ने बनाई थी कुछ सोच समझ के ही तो बनाई थी ना वर्ना हर कोई तलवार उठा कर युद्ध करने क्यों नही चला आता, कलम घिसना अलग बात है वो तो एक बच्चे को भी थमा दी जाये तो पन्ने काले कर ही लेगा पर जो शमशीर को हवा में लहरा दे तो राजपूत जानो।

  अब तक खामोश बैठी बांसुरी पलट कर जवाब देने को तड़प उठी, उसे साफ़ साफ़ समझ आ रहा था कि इस राजपुताना इतिहास को सुनाने के पीछे रूपा की मंशा क्या है __

   ” कलम घिसना तो छोड़िये कलम पकड़ने की तहज़ीब भी हर किसी में हो ये ज़रूरी नही। जब अपने ऊपर मुसीबत आये उस वक्त क्या राजपूत और क्या कोई और हर कोई अपनी जान बचाने को तलवार हवा में लहरा लेगा लेकिन सिर्फ इतने से ही आप किसी एक को श्रेष्ठ नही मान सकतीं। जिसकी जहां ज़रूरत है वही वहाँ काम आयेगी।”

  ” ओहो आप तो बोलती भी हैं , हमें तो आप बस कमरे में सजाने वाली गुड़िया लगी थीं।”

   रूपा और बांसुरी की गर्म होती बहस के बीच पिंकी का दिमाग दुसरी तरफ उलझा हुआ था वहीं बुआ जी मेवों की तश्तरी साफ़ कर अपनी तीसरी चाय भी ढकोल चुकी थी, इन दोनों की बातों का कोई ओर छोर उनकी पकड़ में नही आ रहा था।
     रूपा से बहस करना कीचड़ भरे तालाब में पत्थर मारने सा था इसलिये बांसुरी चुप लगा गयी लेकिन अब बांसुरी के लिये वहाँ बैठना दुष्कर हो चला था, वो अपना फ़ोन उठाये धीरे से उठ गयी, उसके उठते ही पिंकी ने उसका हाथ पकड़ लिया__

  ” कुछ देर और बैठ जाओ हमारे साथ”

  ” नही पिंकी आज का ड्राफ्ट अब तक तैय्यार नही किया है, कुछ देर में ही निरमा का फोन आ जायेगा, उसे मेल भी तो करना है ना।”
     बांसुरी की बात सुन पिंकी ने उसका हाथ छोड़ दिया।
    पिंकी के कमरे के घुटन भरे वातावरण से बाहर निकल कर बांसुरी ने खुली हवा में चैन की सांस ली, बाहर बादल उमड़ घुमड रहे थे….वो अपने कमरे में पहुंची तब तक में बिना मौसम की बारीश शुरु हो चुकी थी।
     जब मन थका हो तो प्रकृति का आलिंगन बहुत शान्ति देता है….. बांसुरी भी अपनी लम्बी चौड़ी  बालकनी के उस हिस्से में आ खड़ी हुई जहां ऊपर छत नही थी।
     दोनों हाथ फैलाये आसमान की ओर चेहरा किये बंद आंखों से अपने चेहरे पर गिरती बूंदों में भीगती बांसुरी के मन का सारा क्लेश जैसे उन बूंदों के साथ ही बह गया।
     कुछ देर ऐसे ही सुकून के पल जीने के बाद उसने चेहरा नीचे कर आंखें खोली, सामने राजा अपनी बालकनी की दीवार पे टिक कर हाथ बांधे  खड़ा उसे ही एकटक देख रहा था…
      राजा से नजरें मिलते ही अपनी बाहें समेटे वो हड़बड़ा कर कमरे के अन्दर चली गयी।
   नहा कर बाहर निकलते में रात के खाने का समय हो चुका था।

  *********

  इधर बांसुरी के कमरे से जाते ही रूपा भाभी और बुआ जी एक बार फिर पिंकी को उसके भावी ससुराल के बारे में बढ़ा चढ़ा कर बताने में लग गये।
    पिंकी किसी तरह उनके वहाँ से निकलने की प्रतीक्षा करती रही….
    वहाँ से निकलते समय रूपा ने पिंकी और बुआ जी की नज़र बचाकर उस गुलाबी लिफाफे को उठाया और अपने आंचल में छिपाती बाहर निकल गयी।
    उनके जाते ही वो सीधे अपनी माँ के कमरे की ओर बढ़ चली। अब उसके पास व्यर्थ करने के लिये समय ही कहाँ बचा था, परसों दशहरा था और उसके अगले ही दिन उसके भावी ससुराल वाले धमकने वाले थे।

    रोई घबराई सी वो अपनी माँ के कक्ष में पहुंची वहाँ उन्हें ना पाकर वो और परेशान हो उठी, सहायिका के बताने पर कि शाम से दादी की तबीयत ठीक ना होने से माँ उनके कमरे में हैं वो दादी के कमरे की ओर बढ़ चली, दादी के कमरे में जाने से पहले सहायक से कह कर उसने राजा को भी दादी के कमरे में पहुंचने का संदेश भिजवा दिया।


  *********

  इधर मुम्बई में अपने क्यूबिक में बैठी निरमा जल्दी जल्दी काम निपटा रही थी, आज पूरे बीस दिन बाद प्रताप जर्नलिज्म पर कोई एडवांस कोर्स कर के न्यूयार्क से वापस लौट रहा था।
    उसकी फ्लाइट रात नौ बजे लैंड करनी थी उसके पहले ही निरमा को ऑफिस का काम समेट कर अपने घर जाकर रेडी भी होना था। आज उसकी खुशी उसका उत्साह संभल नही रहा था, बस परेशानी की एक छोटी सी वजह थी, आज अब तक बांसुरी ने अपना ड्राफ्ट नही भेजा था …….
       काम को जल्दी निपटाने के लिये ही वो बांसुरी को फ़ोन लगाने जा रही थी कि साथ काम करने वाला जयेश दो कप कॉफ़ी थामे उसकी टेबल पर चला आया।
    कॉफ़ी पीते हुए उसने बातों बातों में भास्कर की सिंगापुर वाली बात भी निरमा के कान में डाल दी थी।

    जयेश के जाते ही निरमा ने तुरंत बांसुरी को फ़ोन लगा लिया था। बांसुरी इस वक्त कहाँ है इसकी पूरी जानकारी फिलहाल उसे नही थी। जल्दी से अपनी बात समेटती निरमा ने बांसुरी को प्रताप के बारे में भी एक हल्का सा हिन्ट दे ही दिया था।

   प्रताप से निरमा की मुलाकात छै महीने पहले एक जर्नलिस्ट्स मीट के दौरान हुई थी, जहां “राजनीति के संदर्भ में पत्रकारिता ” विषय पर अपने ज्वलंत उद्गार पेश करता प्रताप वहाँ उपस्थित लगभग हर किसी को प्रभावित कर गया था। उसकी स्पीच के बाद किसने क्या बोला क्यों बोला इस ओर फिर निरमा का ध्यान ही नही गया।
     लंच के दौरान हुई एक छोटी सी औपचारिक मुलाकात में ही दोनों एक दूसरे से प्रभावित हुए बिना ना रह सके।
    जहां निरमा ने बचपन में अपने अभिभावकों को खोने के बाद अपने मामा मामी के पास रहते हुए कठिन परिश्रम से अपने भविश्य की नींव रखी थी वहीं कुछ इसी तरह का पारिवारिक इतिहास प्रताप का भी था।
    प्रताप ने तो इतने छोटे में अपने माता पिता को खो दिया था कि बिना तस्वीरों के उसे उनका चेहरा तक याद ना था, उसके परिवार में कोई था तो एकमात्र बड़ा भाई जो उसके लिये भगवान के समान पूजनीय था।
    दोनों भाइयों के छोटे से संसार में किसी बाहरी का प्रवेश निषेध था लेकिन जब उच्च शिक्षा के लिये प्रताप ने बाहर पढ़ने जाने की ज़िद की तो बड़ा भाई उसे रोक नही पाया ।
    पिछले पांच सालों से मुम्बई में बसा प्रताप जैसे ही कोई तीज त्योहार या छुट्टी का मौका पड़ता तुरंत घर पहुंच जाता लेकिन उसके भाई का अपने काम की व्यस्तता के कारण  उसके पास आना ना के बराबर ही हो पाता था।

   जब से प्रताप और निरमा मिले थे दोनो के ही रूखे सूखे जीवन में बहार आ गयी थी।
   निरमा तो अपने मामा मामी से प्रताप को मिलवा भी चुकी थी, लेकिन आज तक प्रताप को ही निरमा को अपने भाई से मिलवाने का मौका नही लगा था।
    दोनो अपना भविष्य एक दूसरे में देख कर खुश और संतुष्ट थे। एक आध बार बांसुरी ने निरमा को किसी के मेसेज पर मुस्कुराते शरमाते टोका भी पर निरमा बांसुरी को प्रताप से मिलवाने का मौका ना मिल पाने से उसे आज तक प्रताप के बारे सब कुछ बता भी नही पाई थी…..

    निरमा ने झट पट अपना काम निपटाया अपनी टेबल पर के बिखरे पेपर्स समेटे और एक नज़र घड़ी पर डाल ऑफिस से निकल गयी।
   उसने घर पर मामी को फ़ोन कर अपने देर से घर लौटने के बारे में बताया और वहाँ से सीधे एयरपोर्ट निकल गयी।

  **********

   नहा कर निकलने के बाद बांसुरी को कुछ हल्का महसूस हुआ , वहाँ रूपा भाभी के कटाक्ष सुन सुन के उसके सिर में दर्द हो गया था।
    रूपा की बात याद आते ही उसे उसका लौट कर आना और छत पर खड़े होकर भीगना याद आ गया और साथ ही याद आ गयी राजा की दो बड़ी बड़ी आंखे…. छी कभी कैसे बेशर्म हो कर घूरने लगता है राजा जैसे कभी किसी लड़की को देखा ही नही।
    अपनी ही बात पर लजा कर उसने अपना चेहरा हाथों से ढांप लिया , और फिर ये सोच कर कि यहाँ है ही कौन उसके चेहरे पर एक मुस्कान दौड़ गयी, वो धीरे से अपनी बालकनी के दरवाज़े को खोल राजा के कमरे की ओर देखने की कोशिश करने लगी।
    रात के आठ बजे भी कमरे की बत्तियां बंद देख उसे कुछ अजीब लगा, फिर ये सोच कर कि शायद नीचे दीवानखाने में या स्नूकर रुम में होगा वो वापस दरवाज़ा बंद कर अन्दर आ गयी।
   एक बार को उसे लगा कि पिंकी के कमरे तक जाकर उसका हाल चाल देख आये लेकिन मन की थकान शायद शरीर की थकान से कहीं ज्यादा तोड़ देती है , उसका कमरे से निकलने का जी नही किया।
  
   अपना फ़ोन उठाये उसने अपनी माँ को फ़ोन किया, उनका हाल चाल जानने के बाद वो निरमा को मेल करने बैठ गयी।

   लगभग हर आधे घण्टे पर मेनका उसे रात के खाने के लिये आ आकर याद दिलाती रही। आखिरी बार  मेनका के रात के खाने के लिये याद दिलाने पर उसने सिर दर्द की बात कह उसे वापस भेज दिया और एक कप कॉफ़ी बना कर बालकनी में चली आयी।
    आश्चर्य था कि रात के दस बज चुके थे पर राजा के कमरे में रौशनी नही हुई थी।
   कॉफ़ी खतम कर कमरे में आकर उसने राजा को फ़ोन लगाया लेकिन उसका फ़ोन बंद आ रहा था।

    अपने बिस्तर पर लेटी वो यही सोचती सो गयी कि राजा अगले दिन की तैय्यारियों में अपने फ़ोन को फिर कहीं भूल बैठा होगा।
      गहरी नींद में इन्सान सबसे ज्यादा मासूम और निस्छल होता है , वही हाल बांसुरी का था, चाहे कितनी भी परेशानियां हो नींद उसे बहुत प्यारी थी।
अपनी उसी प्यारी नींद को गले लगाये वो इस बात से बेखबर सोती रही कि अगले आने वाले दो दिन इस राजमहल में उसके कितने भयानक गुज़रने वालें हैं।

क्रमशः

aparna..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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