जीवनसाथी-30

जीवन साथी – 30

  
  पहले कुछ दिल से…..

   अभी कहानी के पिछ्ले एक या दो भाग आपको शायद कुछ दुखी कर गये, आगे आने वाले एक दो भाग आपको विचलित भी कर सकतें हैं, लेकिन विश्वास रखिये सारी कठिनाइयाँ पार कर के एक प्यारी सी प्रेम कहानी उभर के आयेगी।
    कहानी में मुख्य रूप से तीन प्रेम कहानियां एक साथ चलेंगी जो अलग अलग परिस्थितियों में एक दूसरे के जीवनसाथी बनतें हैं…..
         जिनमें से मुख्य पात्र राजा और बांसुरी के जीवन के साथ ही बाकी की दोनों कहानियां भी जुड़ी होंगी।
    मैं ये विवरण नही लिखना चाहती थी, मुझे लगा जैसे जैसे कहानी आगे बढेगी आप कहानी के साथ बढ़ते जायेंगे लेकिन कल के भाग के बाद इनबॉक्स में कई सारे सन्देश आ गये….. इसिलिए ये लिखना पड़ा।
…..हौसला रखिये बांसुरी के साथ कुछ गलत नही होगा।
     आप सभी के इतने ढ़ेर सारे प्यार से अभिभूत हूँ। मुझे पढ़ने और मेरा उत्साह बढ़ाने के लिये हृदय से आभारी हूँ …

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जीवनसाथी – 30

    गहरी नींद में इन्सान सबसे ज्यादा मासूम और निस्छल होता है , वही हाल बांसुरी का था, चाहे कितनी भी परेशानियां हो नींद उसे बहुत प्यारी थी।
अपनी उसी प्यारी नींद को गले लगाये वो इस बात से बेखबर सोती रही कि अगले आने वाले दो दिन इस राजमहल में उसके कितने भयानक गुज़रने वालें हैं।

      अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर तैयार हो कर उसने सबसे पहले पिंकी को ही फ़ोन लगाया , उसका नम्बर बंद आ रहा था, बांसुरी ने फ़ोन देखा तो रात लगभग ग्यारह बजे का पिंकी का सन्देश था__

  ” बांसुरी हमें कल मन्दिर नही जाना है, इसिलिए तुम सही समय पर तैयार होकर माँ के साथ मन्दिर चली जाना।”

    पिंकी का लास्ट सीन भी ग्यारह बजे रात ही दिखा रहा था। कल वो बेचारी रूपा भाभी की जलीकटी सुनती थक भी तो गयी थी, इसिलिए फोन बंद कर सो गयी होगी, सोच कर बांसुरी उसकी माँ के कमरे की ओर चली गयी।

     महल नवमी पूजन की तैय्यारी में जगमगा रहा था, एक बार फिर शाही परिवार की सवारी मन्दिर की ओर निकल गयी।
    नवमी हवन पूजन के बाद कंजिका पूजी गईं और और उन्हें पंक्तियों में बैठा कर घर की औरतें और लड़कें भोजन परोसने लगे।
    बांसुरी परोसते में बीच बीच में राजा की ओर देख लेती थी पर वो आज किसी और ही रंग में था, चेहरे पर  चिंता की लकीरें साफ़ साफ़ नज़र आ रही थीं।

      अपने हाथ के ड़ोंगे को एक किनारे रख वो धीरे से राजा तक पहुंच गयी, किसी से फ़ोन में बात करता राजा मन्दिर प्रांगण के किनारे निकल गया था।
  जैसे ही फ़ोन रख कर वो मुड़ा पीछे बांसुरी को खड़े पाया__

  ” क्या हुआ बांसुरी? तुम यहाँ कैसे?”

  ” तुम भी तो यहीं हो, तुम यहाँ कैसे?”

  ” मैं! मेरा एक ज़रूरी फ़ोन था , बस बात करने यहाँ आ गया था….
  
   ” क्या बात है राजा ? कुछ परेशान हो क्या?”

  ” नही बिल्कुल भी नही। चलो वहाँ चलतें हैं वर्ना सब सोचेंगे हम दोनो यहाँ क्या कर रहें हैं।”
   बिना बांसुरी की ओर देखे राजा आगे बढ़ गया।

  मन्दिर से लौट कर बांसुरी सीधे पिंकी के कमरे में उस्का हाल चाल जानने पहुंच गयी।
    कमरे के दरवाज़े पर दस्तक देने पर भी जब द्वार नही खुला तो वो दरवाज़े को अन्दर ठेलती भीतर चली गयी।

     बालकनी बाथरूम और अपने कमरे की छोटी स्टडी में भी जब पिंकी नज़र नही आयी तो बांसुरी को थोड़ी चिंता होने लगी।
    कल शाम की बातें याद आते ही उसे ये डर सताने लगा कि कहीं जल्दबाजी में पिंकी ने कोई गलत कदम तो नही उठा लिया।
   वो बार बार उसका फ़ोन लगाती कमरे के हर ओने कोने में जाने क्या ढूंढती रही, कि उसकी नज़र सेंटर टेबल के बीचो बीच रखी डायरी के ऊपर फड़फड़ाते एक पन्ने पर पड़ी, उसने दौड़ कर उसे उठा लिया_
     बांसुरी का डर सही निकला, वो पिंकी के खत को थामे अपना सर पकड़ कर वहीं बैठ गयी। उसे कपकपी सी छूट गयी, ये क्या बेवकूफी कर बैठी पिंकी, राजा जैसे भाई के होते इतना अधीर होने की क्या ज़रूरत थी।
   बांसुरी का दिमाग काम नही कर पा रहा था, उसने कांपते हाथों से राजा का नम्बर डायल किया, दो रिंग में ही राजा ने लपक कर फ़ोन उठा लिया__

    बांसुरी की कांपती आवाज़ सुनते ही बिना देर किये राजा पिंकी के कमरे में पहुंच गया, बांसुरी के हाथ से खत लेकर पढ़ने में उसे बमुश्किल पांच मिनट का वक्त भी नही लगा, खत बहुत बड़ा था भी नही, किसी लाग लपेट के बिना सीधे सपाट शब्दों में पिंकी ने अपने घर छोड़ कर जाने की बात लिख दी थी__

  माँ साहेब,
           हमें यह निर्णय लेते हुए बुरा तो बहुत लग रहा है लेकिन आप सब ने हमारे सामने और कोई रास्ता शेष रखा भी नही।
    हमारा सपना हमारे लिये हमारे जीवन जैसा है उसे खो कर जी नही पायेंगे। यहां रहे तो परसों सगाई के बाद आप हमारी शादी करवा कर हमें हमेशा के लिये विदेश भेज देंगी।
    हम जानतें है अगर हम पकड़े गये तब भी आपके राजमहल के कायदे हमें मौत के घाट उतार कर ही मानेंगे, तो हमने सोचा जब मरना ही है तो क्यों ना अपना सपना एक बार जी लें।
    हो सके तो हमे माफ कर दीजियेगा।

    आप सब की नादान गुड़िया
                  पिंकी!

    खत समाप्त करते ही राजा ने वहाँ रखी कुर्सी पर एक ज़ोर का पैर मारा और उसे दूर गिरा दिया। राजा के इस रूप को देख घबराई बांसुरी चौंक कर एक तरफ खड़ी हो गयी।
    राजा के सामने उस कमरे में रखा जो सामान आया उस सब को उठा कर इधर उधर फेंकता वो अपने गुस्से पर काबू नही रख पा रहा था।
     इस हो हल्ले को सुन बाहर खड़ी मेनका और पिंकी की सहायिका ने सभी को खबर कर दी।
  राजा साहेब और छोटी रानी को छोड़ महल के लगभग सभी रहवासी एक एक कर पिंकी के कमरे में जमा हो गये।
    दो दिनों से सबको नपा तुला बोलते खाते देखने की अभ्यस्त बांसुरी की आंखें उन सभी के अधीर सवालों जवाबों से परेशान होने लगी थीं।
    सभी गुस्से में कुछ ना कुछ बोल रहे थे, अपनी भड़ास निकाल रहे थे, एक पिंकी की माँ ही थी जो उसका खत पकड़े एक किनारे कुर्सी पर बैठी रोती ही जा रही थीं।
     शायद वो भी समझ गईं थीं कि उनके जिगर के टुकड़े से गलती नही गुनाह हो गया था जिसकी माफी अब इस जनम तो यहाँ मिलनी ना थी।

   बुआ के लड़कों के साथ ही विराज की चीखा चिल्ली से महल की दीवारें गूंजने लगीं थीं, ये लोग ऐसे नाराज़ दिख रहे थे कि कहीं गलती से पिंकी इनके सामने आ जाती तो वहींं सामने रखा फल काटने वाला चाकू जिससे एक दिन पहले ही वो सेब काट कर खा रही थी से उसके दो टुकड़े कर दो अलग दिशाओं में फेंक देते।
     फूफा साहब और दीवान जी के आने से माहौल और तीखा हो गया था।
       सभी इधर उधर करने में लगे थे। फूफा साहेब को देखते ही बुआ जी को तुरंत ध्यान आया की ये उनका मायका है और उनकी भतीजी उनके पति परमेश्वर के सामने उनकी नाक कटा कर भाग गयी, अपने नकली आंसू बहाती वो अलग अलग राग रगिनियों में कलपती रहीं__

  ” भाभी सा से कितना कहा था हमने उमर अच्छी नही है लड़की को बाहर पढ़ने ना भेजो , पर मायके में बैठी बिटिया के बोल कौन सुनता है भला, लो भाभी अब पड़ गयी कलेजे को ठंडक।”

  ” फुफू सा एक आप ही ने नही हमने भी साहब से कहा था, एक तो बाहर भेजना उसपे भी बॉम्बे, छी छी । पर कोई हमारी क्यों सुनेगा हम भी तो घर की बहू ही हैं ,कोई रानी तो हैं नही कि हमारी चले। और आप काकी सा को क्या दोष दे रहीं उनसे ज्यादा दोषी तो कुंवर सा हैं, ये ही गये थे अपनी लाड़कुंवर को बम्बई छोड़ने।
    उस समय भी हमने कहा, लड़कियों के लिये अच्छा शहर नही है, क्या ज़रूरत है अकेली जान को वहाँ छोड़ आने की, अब देखिए क्या हुआ। जाने कैसी संगत में थीं कि दो दिन महल का रहना रास ना आया। सपनों के लिये भाग गईं। बोलो ऐसा भी होता है कहीं, हमें तो लगता है फु साहब कोई लड़के वड़के का चक्कर होगा।”

  ” रूपा अगर आप थोड़ा शांत बैठे तो हम लोग आगे के लिये सोच लें कि करना क्या है?”
 
       युवराज को रूपा की बातें मौके पर बिल्कुल पसंद नही आईं लेकिन सब के सामने असभ्यता से बात करना उसके लिये और दुष्कर कार्य था, उसकी बात का जवाब दिया विराज ने__

  ” युवराज भाई साहब ! आप बस हम पर सब छोड़ दीजिये! हम पिंकी को छोड़ेंगे नही, जहां भी मिलेगी उसे उसके बाल पकड़ कर खींचते हुए यहाँ लेकर आयेंगे और राजा साहेब की कटार उस पापिन के कलेजे के पार कर देंगे”

  ” विराज! भूलिए मत , वो बहन है आपकी।”

   अपने गुस्से में विराज जो मुहँ में आया बोलता चला गया इस बात से बेखबर कि उसकी खुद की माँ यानी रानी साहेब भी वहाँ पहुंच चुकी थीं।

   ” हम जानतें हैं आपके अन्दर का राजपूती खून उबाल मार रहा है, आपके लिये असहनीय हो रहा है ये सब ! बिल्कुल राजा साहेब की छवि नज़र आ रही आपमें । कई सालों पहले का इतिहास जैसे खुद को दोहरा रहा है।
    दीवान साहब आप तुरंत अपने आदमियों को दौडाईये, अगर रात में भी भागी होंगी तब भी रियासत से अकेले बहुत दूर निकल पाना भुवन मोहिनी के लिये असम्भव है। वो जल्दी ही पकड़ में आ जायेंगी उसके बाद साहेब ही निर्णय लेंगे कि उनके साथ क्या किया जायेगा।”
    दीवान साहब के गुर्गों के साथ ही विराज ने अपने लड़कों को भी पिंकी को ढूंढने के लिये भेजना चाहा लेकिन राजा की कड़कती  ज़ोर की आवाज़ ने सब को शांत कर दिया__

  ” मैं ने ही सर पर चढ़ा रखा था ना , अब मैं ही उतारून्गा, आप में से किसी को परेशान होने की ज़रूरत नही है।
    अभी महल से बहुत ज्यादा दूर नही निकल पायी होगी पिंकी, कल सुबह तक यहीं इसी दीवनखाने में ला कर सबके सामने खड़ा ना कर दिया तो मैं खुद हमेशा के लिये ये महल छोड़ जाऊंगा।”

    राजा के कहे आखिरी शब्द वहाँ मौजूद कुछ लोगों के हृदय में शीतल जल की फुहारें छींट गये ” मैं खुद हमेशा के लिये ये महल छोड़ जाऊंगा” ।
    
    ” मेरे पीछे कोई नही आयेगा, चलो प्रेम! “

    प्रेम को साथ लिये राजा अपनी सिक्योरिटी के कुछ लोगों के साथ वहाँ से निकल गया।
     अपनी अपनी बहस में उलझे राजमहल के लोग एक एक कर कमरे से निकलते चले गये, बस पिंकी की माँ उस कमरे में अकेली रह गईं।
    पिंकी के पिता अपने दुख को दूर करने पहले ही वहाँ से निकल अपने कमरे की लाइब्रेरी में जा बैठे थे।

    बांसुरी ठगी सी खड़ी रह गयी थी। इन कुछ दिनों में उसका जीवन लहरों पर हिचकोले लेता जैसे बहुत उंचाई से उसे नीचे पटक गया था।
     जिन दो लोगों के भरोसे वो इस लम्बे चौड़े महल में चली आयी थी, वो दोनों ही उसके बारे में एक पल भी सोचे बिना उसे इन अनजानों के बीच अकेला छोड़ गये थे….
     उसके बावजूद वो अभी भी उन्हीं दोनों की चिंता में घुली जा रही थी।
    राजा का आज नया ही रूप उसके सामने आया था पर इतने गुस्से में भी उसके मुहँ से अपनी बहन के लिये कोई अपशब्द नही निकला था।
   वो अपने ही विचारों में खुद से ही उलझ पड़ी थी, अपशब्द नही निकले तो क्या गुस्सा तो तूफान सा ही था। क्यों उसकी बुराई में भी अच्छाई ढूँढना चाह रही थी वो।
  
    वो चुप चाप गिलास में पानी लिये पिंकी की माँ के पास चली आयी, उनके कंधे पर हाथ रखे उसने उनकी तरफ गिलास बढ़ा दिया, वो बांसुरी को देखते ही एक बार फिर बिलख उठीं।
      उसे खुद अपने स्वभाव पर आश्चर्य हो रहा था, जब जिसके साथ आयी थी वो ही चली गयी तो वो अब तक क्यों यहाँ मौजूद थी। क्यों खुद से आगे बढ़ कर पिंकी की माँ के आँसू पोंछती उनका खयाल रख रही थी। और सिर्फ उनकी ही चिंता से वो परेशान थी ऐसा भी नही था, खाने का वक्त होते ही उसे राजा की दादी का खयाल भी हो आया था। इधर कल से उनकी सेहत भी नरम गरम चल रही थी, महल की इस उठापटक में कहीं सब उनके बारे में भूल गये तो। उनके लिये समय पर भोजन करना कितना ज़रूरी था तभी तो वो दवाएं ले पायेंगी।
     पिंकी की माँ को पानी पिला कर वो कमरे से बाहर आयी उसकी आशानुरुप मेनका बाहर ही मिल गयी। दादी के खाने पीने की हिदायत उसे देकर पिंकी की माँ के लिये भी उसने खाना वहीं मँगवा लिया था।
   हालांकि वो भी जानती थी कि इस हाल में ना उनके गले से निवाला उतरना था ना उसके खुद के।

   पिंकी की माँ दादी का ध्यान रखती बांसुरी जैसे सिर्फ पिंकी की दोस्त होने का फर्ज ही अदा नही कर रही थी बल्कि उसके किये कार्य उस वक्त उसके दायरे से कहीं ऊपर के हो चले थे।

   उसने कई बार राजा को फ़ोन मिलाना चाहा लेकिन हर बार उसकी हिम्मत चूक गयी।
     बहुत जबर्दस्ती कर उसने पिंकी की माँ को थोड़ा बहुत खिला कर उनकी दवाएं देकर उन्हें सुला दिया, लेकिन वो वैसी ही भूखी प्यासी बैठी रही।

   शाम बीती, रात हो गयी लेकिन महल की हवाओं में राजा या पिंकी के लौटने की कोई सरगोशी नही गून्जी।
     महल की दासियों ने शाम की आरती निपटाई  महल की कोई महिला सदस्य आज सन्ध्या आरती का हिस्सा नही बनी।
    सुबह तक चहकता महल मनहूसियत का गढ़ बन चुका था।

   रात बड़ी देर तक अपनी बालकनी में टहलती बांसुरी की नज़र सामने राजा की बालकनी पर टिकी रहीं ये जानते हुए भी कि कमरे का मालिक इस वक्त वहाँ नही था।
    थक कर चूर होने पर वो अपने कमरे में चली आयी, आज इतनी रात बीत जाने पर भी उसकी आंखों से नींद गायब थी।
    किसी अनजानी आशंका से घबड़ाता उसका शन्कालू चित्त हर आहट पर चौंक चौंक कर बैठा जा रहा था।

      सुबह भोर के वक्त आँख लगी ही थी कि मेनका ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा भड़भड़ाने लगी__

    बांसुरी ने लपक कर दरवाज़ा खोला और मेनका घबराती हुई कमरे के अन्दर चली आयी__

” क्या हुआ मेनका ,आप ऐसी घबराई सी क्यों है।”

  ” वो बेबी साहब ….. नीचे…

  ” क्या ? पिंकी आ गयी…. मेनका की बात पूरी होने से पहले ही नाईट सूट में ही बांसुरी नीचे दौड़ गयी…. उसके पास शाही प्रोटोकॉल मानने और निभाने का वक्त नही था।
    भागते भागते ही उसकी खैरियत की दुआ करती वो दीवान खाने में पहुंची, तब तक में सारा राज महल वहाँ इकट्ठा हो चुका था__

   महल के सारे चाकरों के बीच से रास्ता बनाती वो अपने धड़कते हृदय पे काबू करने की भरसक कोशिश करती वो दरवाज़े को पार कर भीतर चली आयी।
    दीवानखाने में अन्दर सिर्फ राज परिवार के सदस्य ही मौजूद थे।
    एक तरफ आँसू बहाती रूपा खड़ी थी,उसके पास ही अपने आंसुओ को आंखों में ही रोकने की कोशिश करती बुआ जी खड़ी थीं।
     वो पिंकी की माँ को ढूंढ रही थी की उसकी नज़र नीचे कालीन पर बैठी पिंकी की माँ पर पड़ी, थोड़ा आगे बढ़ते ही उसे साफ़ और स्पष्ट दिख गया कि उनके सामने ही दो शव पड़े थे।

    आह! आखिर वही हो गया जिसके लिये रात भर उसका हृदय उद्वेलित था। वो धीरे से थोड़ा और आगे बढ़ी।
   उन दोनो शवों को सफ़ेद कफ़न से ढ़ाक रखा था, उसके एक ओर राजा नीचे सर किये बैठा था और उसकी हाथ के पास वो शाही कटार पड़ी थी जिससे उसने अपने खानदान की इज़्ज़त रूसवा होने से बचा ली थी।

    बांसुरी को एक क्षण को लगा जैसे उसके सामने वो पूरा कमरा घूम गया है। अपने सर को दोनो हाथों से पकड़े वो अपने आप को स्थिर करने की कोशिश करती रही।
     कुछ सम्भलते ही वो धीरे से पिंकी के पास जाकर बैठ गयी, हल्के से उसने उसके चेहरे पर लिपट कफ़न हटाने को हाथ बढ़ाया ही था कि आगे बढ कर बुआ जी ने उसे रोक लिया__

” देख नही पाओगी, चेहरा बहुत खराब हो गया है।”

  बहुत ज़ब्त कर उन्होने अपनी लाड़ली के लिये कहा और धीमी आवाज़ में सिसक उठी।
    
    बांसुरी का ज़ोर से चिल्ला कर रोने का जी कर रहा था, पर वहाँ की औरतों को कायदों में लिपटे अपने आँसूओ को पीते देख उसे अचानक उन सब पर तरस आने लगा।
    अब उसकी सहनशक्ति जवाब दे गयी, पिंकी के शरीर से लिपटी वो ज़ोर से चिल्ला कर रो उठी।

     उसका करुण रूदन महल में गूँज उठा, बुआ जी और मेनका उसे सम्भालने की कोशिश में लगे थे, लेकिन उसके आँसू रूकने का नाम नही ले रहे थे।
 
     पिंकी की यादों के आंसू, उसके साथ बिताये हर प्यारे पल के आँसू, पिंकी और रतन के मासूम प्यार के आंसू, राजा से पहली मुलाकात के आंसू,भास्कर की नाराज़गी के आँसू, रूपा की कड़वी बातों के आँसू उसकी खुद की किस्मत की लाचारगी के आंसू…..

  इतने दिनों से उसके मन में जितनी उथल पुथल ने उसे त्रस्त कर रखा था आज सारा सब कुछ बह जाने को व्याकुल था।

   उसे रोने से बार बार रोका जा रहा था , आखिर वो चीख उठी__

” मै इस राज महल का हिस्सा नहीं हूँ जो मैं यहाँ के कायदों को मानूं। आप के लिये ये जश्न की बात हो सकती है लेकिन मेरे लिये ऑनर किलिंग से ज्यादा कुछ नही।
    और जिसने इस बात को अंजाम दिया है वो मेरी नज़र में कातिल से अधिक कुछ नही।”

अपनी आखिरी पंक्ति कह कर उसने एक जलती नज़र राजा पर डाली और वहाँ से उठ कर अपने कमरे में चली गयी।

   जाने कब तक बैठी वो रोती ही रहती अगर मेनका एक बार फिर उसके कमरे में ना आती__

  ” जाइये दीदी ! एक आखिरी बार बेबी साहब को देख लिजिये।”

    बांसुरी तड़प कर रह गयी, पहले उसने वहाँ जाना ठीक नही समझा लेकिन आखिर उसका मन हार गया। अपनी सखी को एक आखिरी बिदाई देने वो उठ खड़ी हुई, वो बाहर निकल रही थी कि मेनका ने वापस उसे टोक दिया__

  ” दीदी अगर आप ये सफेद कपड़े….

   हाथ में पकड़े कपड़े मेनका ने बांसुरी की ओर जैसे ही बढ़ाए बांसुरी ने उसे खा जाने वाली नजरों से देखा और कमरे से बाहर निकल गयी।

    दो कदम चल कर ही उसकी हिम्मत चूक गयी, उसका सर ऐसा ज़ोर से चकराया कि पीछे आती मेनका नही संभालती तो वो वहीं गिर चुकी होती।
 
मेनका उसे संभाले वापस कमरे तक ले आयी, कुर्सी पर बैठे बांसुरी ने आंखे बंद कर ली।
    बंद आंखों में उसे रतन से पहली बार मिलवाती चहकती पिंकी नज़र आने लगी और एक बार फिर रोते रोते उसकी हिचकियां बंध गईं।

    ऐसे ही रोते उसे काफी समय बीत गया, कुछ देर बाद आकर मेनका ने उसे बताया की पिंकी और रतन का सारा कारज निपटा कर वे लोग वापस आ गयें हैं।

    अब एक एक सांस इस महल में बांसुरी को भारी लगने लगी थी। जब उसे यहाँ लेकर आने वाली ही नही बची तो उसके इस महल में रूकने का क्या औचित्य?
    अपना सामान समेट कर वो नहाने घुस गयी।
   नहा कर अपना सामान लिये वो कमरे से बाहर निकली की मेनका सामने ही मिल गयी__

  ” ऐसे खाली पेट मत निकलिये दीदी, आप कहें तो यहीं कुछ ले आती हूँ “

   आज तक मेनका की जासूसी से चिढ़ी बैठी बांसुरी को आज मेनका अपनी बहन सी लग रही थी। सुबह से एक वही थी जो उसके आगे पीछे घूमती इतने कठिन समय में भी उसका ध्यान रखे थी।

बांसुरी की भावुकता अपने चरम पर थी, उसे हर बात पर रोना आ रहा था, उसने मेनका के दोनो हाथ थाम लिये__

  ” मैं यहाँ से निकल रहीं हूँ अभी किसी को इस बारे में कोई खबर ना देना।”

   मेनका ने हाँ में सिर हिलाया और हाथ बढ़ा कर बांसुरी का बैग थाम लिया।
     पीछे की घुमावदार सीढियों से उसे लेकर जाती मेनका जाने किस गुप्त द्वार से उसे महल के पीछे के बगीचे की तरफ से बाहर तक छोड़ आयी।

    कृतज्ञता से मेनका को देख उसने एक नज़र महल पर डाली और वापस मुड़ कर तेज़ कदमों से आगे बढ़ गयी।

   अपना सामान संभाले जल्दी जल्दी कदम बढ़ाती वो चली जा रही थी कि उसके ठीक बाजू में आकर एक गाड़ी रुक गयी__

  ” आईये गाड़ी में बैठ जाइये।”

  ” मैं खुद चली जाऊंगी।”

” कहाँ तक पैदल जायेंगी, महल पहाड़ी पर बना है , यहाँ से पैदल उतरने में ही आपको रात हो जायेगी। आईये गाड़ी में बैठिए, आपको सही समय पर भोपाल एयरपोर्ट तक छोड़ देंगे।
     समय खराब मत किजीये, आईये बैठ जाइये।”

  बांसुरी ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और बैठ गयी, उसके बैठते ही प्रेम ने गाड़ी आगे बढा दी।

क्रमशः

aparna..
    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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