जीवनसाथी -31

जीवन साथी- 31



   “कहाँ तक पैदल जायेंगी, महल पहाड़ी पर बना है , यहाँ से पैदल उतरने में ही आपको रात हो जायेगी। आईये गाड़ी में बैठिए, आपको सही समय पर भोपाल एयरपोर्ट तक छोड़ देंगे।
     समय खराब मत किजीये, आईये बैठ जाइये।”

  बांसुरी ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और बैठ गयी, उसके बैठते ही प्रेम ने गाड़ी आगे बढा दी।

     बांसुरी के आँसू थे कि रुकने का नाम नही ले रहे था, और ना ही वो उन्हें पोन्छने की कोई कोशिश कर रही थी।
       इन कुछ दिनों में उसकी ज़िंदगी कितनी बदल गयी थी। ऐसा लग रहा था एक गोल लम्बा चक्कर लगा कर वो वापस वहीं लौट आयी थी, जहां से उस शाम अपनी ही सगाई में जाने को अपने फ्लैट से निकली थी।
    उस शाम के पहले उसका शांत जीवन अपने नीरस प्रवाह में बहा जा रहा था बिना किसी उथल-पुथल के।  कहने को तो भास्कर उसकी पसंद का वर था लेकिन प्रेम विवाह जैसा कुछ भी उन दोनों के बीच कभी ना दिखा।

     वो उत्साह वो उत्तेजना जो एक प्रेमी युगल में होनी चाहिए, उन दोनों के बीच कभी आ ही ना पाई, इसी बात को जब उसने एक बार माला से कहा था तब उसने उससे कहा भी था__” सगाई हो जाने दे बंसी सारा एक्साइटमेंट फील होने लगेगा, ये जो अँगूठीयाँ होतीं हैं ना इनका उंगलियों में पहनाना सिर्फ एक रिश्ते को बस नही जोड़ता ,ये जीवन को बदल भी देता है। बहुत ताकत होती है इनमें ये हमारे ग्रह नक्षत्र भी बदल जातीं हैं।
    देख लेना सगाई की अंगूठी पहनते ही तेरे भी ग्रह नक्षत्र फिरेंगे और तुझे भी प्यार हो जायेगा।”

    बात तो सच निकली , अंगूठी पहनने के बाद प्यार तो हुआ लेकिन जिससे होना था उससे नही किसी और से।

   माला की बात को उस समय उसने हँस के उड़ा दिया था, लेकिन उसे उस वक्त क्या मालूम था कि अपने राशिरत्न माणिक को पहनने की उसकी इच्छा ने सच ही उसके ग्रहों की चाल को ऐसी तीव्रता से बदला की वह खड़ी देखती रह गयी।

   सगाई की शाम से ही तो सब शुरु हो गया था, इधर अँगूठीयाँ बदलीं उधर उसकी सीट बदल गयी, उसी रात ही तो पहली बार राजा से मिलना हुआ था उसका और फिर सगाई के बाद जिस हृदय में भास्कर का वास होना था वहाँ कब उसे धकेल कर राजा मुस्कुराता खड़ा हो गया, वो खुद भी कहाँ समझ पायी।

  ” एयरपोर्ट आ गया है, आप चलिये मैं सामान लेकर आता हूँ।”

    बांसुरी की प्रेम को मना करने की हिम्मत नही हुई, उस धीर गंभीर कम बोलने वाले लड़के के सामने उसकी बोलती वैसे ही बंद हो जाती थी, और फिर राजा के किये का दोष प्रेम को देने का क्या मतलब। हत्यारा तो वो था अपनी बहन का।

    बुझे मन से बांसुरी अन्दर चली गयी, उसके पीछे प्रेम गाड़ी पार्किंग में लगाने चला गया।
     प्रेम के भीतर आते तक में वो अपना टिकट ले चुकी थी, उसकी फ्लाइट आने में दो घण्टे शेष थे।
  वहीं एक कुर्सी पर अपना सामान रख उसने प्रेम के सामने हाथ जोड़ दिये, बदले में प्रेम ने भी हाथ जोड़े और फिर अपनी सीमित शब्दावली में अपनी बात कह गया__

   ” आपके चेक इन तक आपके साथ ही रुकूंगा। जब आप सिक्योरिटी चेक क्लियर कर लेंगी तब वापस निकल जाऊंगा।”

   उसके शब्दों की दृढ़ता के सामने फिर वो कुछ ना कह सकी।
   उसी वक्त प्रेम का फ़ोन बज उठा__

“हेलो “

  ” भाई कहाँ थे आप! परसों शाम जब से मुम्बई पहुंचा हूँ,लगातार आपको फ़ोन लगाने की कोशिश कर रहा हूँ।

  ” हाँ मैं ज़रा व्यस्त था प्रताप! तू बता कैसा है,तेरी ट्रेनिंग कैसी हुई, और यहाँ कब आ रहा है मेरे पास।”

” आज राहत मिली है भाई मुझे, आपकी आवाज़ सुनने के बाद।
     एक तो आप अपनी ये फ़ोन बंद रखने की आदत छोड़िये, आखिर क्यों इतना महंगा फ़ोन रखा है आपने जब आपको यूज़ ही नही करना।”

  ” बेटा मैने कहा ना थोड़ा व्यस्त था हुकुम के साथ था।”

  ” राजा भैय्या का भी फ़ोन बंद आ रहा था, ये आप दोनों की आदतें भी तो एक सी हैं। खैर छोड़िये आप लोग सुधरने वालों मे से नही हैं । मैं ये कह रहा हूँ इस बार दीवाली पे जब घर आऊंगा ना तो आपके हुकुम से कह कर आपकी भी शादी करवा दूंगा, तब देखूँगा कैसे आप अपनी मनमर्ज़ी करोगे।”

  ” चल अब मैं रखता हूँ, काम पर हूँ।”

  ” भाई आप कब खाली रहते हो। चलो ठीक है मैं भी रखता हूँ, कल सुबह फ़ोन करूंगा, जल्दी से उठा लेना वर्ना मुझे फिर चिंता हो जाती है।”

  ” हम्म्म:” छोटा सा हाँ कह कर प्रेम ने फ़ोन रख दिया,अपने छोटे भाई को याद कर चेहरे पे एक हल्की सी मुस्कान चली आयी जिसे महसूस करते ही उसने वापस अपने चेहरे को कठोर कर लिया।

   ” ये खडूस भी मुस्कुराना जानता है” बांसुरी उसे देख फिर दूसरी ओर देखने लगी, एक बार और उसने प्रेम से जाने को कहा लेकिन वो सतर कंधों को स्थिर रखा सावधान की मुद्रा में वैसे ही बैठा रहा।

   इसी बीच दो बार किसी का फ़ोन, जिसके जवाब में उसने बस ” अभी नही” कहा और फ़ोन रख दिया।

   नियत समय पर फ्लाईट आयी और बांसुरी प्रेम से विदा लेकर चल पड़ी, कभी इस शहर इस महल में पलट कर ना लौटने की कसम खाती, लेकिन तब वो क्या जानती थी कि विधि उसको यहीं लौटा लाने को ही सब कुछ रच रही है।

  *********

    अगले दिन सुबह नींद खुली तब तक आठ बज चुके थे। रात बड़ी देर गये ही उसकी फ्लाईट मुम्बई पहुंची थी, अपने घर पहुंच कर जैसा सुकून मिलने का उसने सोचा था वैसा कुछ नही हुआ।
    
    उसके छोटे से फ्लैट में हर जगह राजा के निशान मौजूद थे। उसने अपने लिये कॉफ़ी बनाई और छान कर बाहर बालकनी में चली आयी, वहाँ के झूले के पास ही उसका गिटार रखा था।
    ऐसे कैसे खुला छोड़ गया, ज़रा भी जिम्मेदारी की भावना है ही नही, वो तुरंत अन्दर से गिटार का कवर लायी और कवर में कर उसे अन्दर रख आयी।
   हमेशा जिस कॉफ़ी कप में वो कॉफ़ी पिया करता था, उसी में आज हड़बड़ी में इसने अपनी कॉफ़ी छान ली थी।
     ” इतना क्या सोचना चार दिन को मेहमान बन कर आया था, अगर इसी कप में हमेशा पीता था तो क्या कप उसका हो गया, खरीदा तो मैंने ही था, और अगर आज गलती से इस कप में अपने लिये कॉफ़ी निकाल ली तो इसका हर्गिज़ ये मतलब नही है कि उससे अभी भी वो जुड़ी रहना चाहती है।”
    अपने ही मन के सवाल जवाबों से हैरान बांसुरी आज की छुट्टी लेना चाह रही थी लेकिन खुद से ही डर गयी कि ऐसे ही लगातार उसके बारे में सोचती रही तो कहीं पागल ना हो बैठे।
   खाली घर पर बैठे रहने से अच्छा है, ऑफिस ही चला जाये।
   अभी भास्कर को वापस लौटने में समय था, तब तक खुद को भी वो संभाल लेगी और भास्कर से शादी ना करने के बारे में भी बात कर लेगी, यही सब सोचती तैय्यार होने के लिये जब उसने अपनी आलमारी खोली तो सामने ही पिंकी की ब्लू टी शर्ट टँगी देख उसे पिंकी की बातें उसका रूठना मनाना लड़ना झगड़ना ,उसका रतन, उसका प्यार और आखिर में दोंनो के साथ रखे शव सब याद आ गया।
    टी शर्ट को सीने से लगाये रोती रोती वो वहीं पड़े पड़े कब सो गयी,पता भी ना चला। शाम तकरीबन पांच बजे के आसपास फ्लैट की बेल बजने से उसकी आँख खुली ।

    दरवाज़ा खोला तो देखा सामने निरमा खड़ी थी। आंखें मलती बांसुरी उसे देख रही थी कि निरमा ने आगे बढ उसे गले से लगा लिया__

  ” हाय! तू आ गयी मेरी जान! मैं कबसे तड़प रही थी तुझसे मिलने को”

    चहकती महकती निरमा को देख उसके चेहरे पर भी मुस्कान चली आयी, उसका निरमा को पिछला कोई वाकया बताने का मन नही किया, अपनी मनहूसियत की छूत वो किसी को नही देना चाहती थी।


  ” क्यों भई ऐसा क्या हुआ जो तू मुझसे मिलने को तड़प रही थी”

” हाँ अब तू सब भूल जा, कहा था ना किसी से मिलवाना है?”

  ” अरे हाँ! माफ करना निरमा मैं सच ही भूल गयी थी कि तुने ऐसा कुछ कहा था, आई एम सॉरी!”

  ” अरे पागल! इत्ती सी बात पर सॉरी की क्या ज़रूरत। बांसुरी कोई बात है क्या? बहुत उदास सी लग रही हो।”

  ” अरे नही यार , थोड़ा थक गईं हूँ बस और कुछ नही।”

  ” ओके! तू अभी गयी कहाँ थी, बनारस से कहीं और चली गयी थी ना, उसके बाद ठीक से बात ही कहाँ हो पायी,बस ऐसे ही जल्दबाजी में हुई।”

  ” हाँ भोपाल गयी थी।”

  ” भोपाल कैसे?”

  ” ऐसे ही ”

   “अच्छा सुन जल्दी से तैयार हो जा, बाहर चलतें है डिनर पे।”

” निरमा सच में बहुत थकान है यार, कभी और चलेंगे। ”

  ” नो मैडम ! आप चेंज कर के आईये, मैं कैब बुक कर रही। कहा ना किसी से मिलवाना है।

   एक तरह से जबर्दस्ती धकिया कर निरमा ने उसे तैय्यार होने भेजा और प्रताप को मिलने की जगह बताने को फ़ोन लगा दिया।

   दोनो कैब में सवार बातें करते जा रहे थे। बांसुरी इस वक्त भले ही अकेली रहना चाहती थी लेकिन निरमा का ऐसे अचानक आना उसे राहत दे गया था।
   एक दोस्त के छोड़ जाने की पीड़ा किसी वैसे ही दोस्त की संगत ही पूरा कर सकती थी।

    कैब में वो आगे बढ़ रहे थे कि बांसुरी का फ़ोन बजने लगा।

   ” हेलो भाभी! मैं चिंकी बोल रहीं हूँ।”

   ” हाँ बोलो चिंकी,कैसे हो तुम लोग?”

   ” भाभी हम लोग एक फंक्शन अटैंड करने वासी आये थे कि यहाँ पापा की तबीयत बिगड़ गयी, डॉक्टर को बुलाया तो उन्होने तुरंत एडमिट करने को कहा है, कह रहे अटैक आया है। हम लोग इन्हे लेकर रूबी हॉस्पिटल जा रहे, आप प्लीज़ आ जाइये।”


   ” ओह ! अचानक कैसे? ओके चिंकी तुम घबराओ मत, मैं तुरंत पहुंचती हूँ।
    निरमा मैं अभी डिनर पे नही जा पाऊंगी, मेरी मौसी सास की बेटी का फ़ोन था, मौसा जी को अटैक आया है मुझे तुरंत हॉस्पिटल पहुंचना पड़ेगा।”

  ” ओके! डोंट वरी बांसुरी! मैं भी साथ चलती हूँ।”

  कैब वाले को बोल वो दोनो हॉस्पिटल निकल गईं रास्ते से ही निरमा ने प्रताप को होटल आने से मना कर दिया।

    कभी कोई समय ऐसा आ ही जाता है जब ना चाहते हुए भी हर बात अपने हाथ से निकलती चली जाती है।
 
      पिंकी का दुख कम नही हो पा रहा था, राजा से नफरत कम नही हो पा रही थी, मन की उलझनें सिमट नही पा रहीं थी कि एक और बुरी खबर सुननी पड़ गयी।
 
      बांसुरी सोच के परेशान थी कि आखिर ऐसा क्या हो गया था कि सारा सब कुछ गहरा नीला होता जा रहा था, जैसे सुरमई बादलों से ढकी अंधियारी सी अकेली शाम हो जहां दिये जलना तो चाहतें है पर जल नही पा रहे थे।
    चारों ओर गहरी कालिमा थी बस और एक शोर था जिसमें उसके मन की आवाज़ें दफन हो रही थीं।

   जब कभी इन्सान अपने दुख से बहुत व्यथित हो और उसी वक्त उसके सामने कोई ऐसा व्यक्ति आये जो उससे कहीं ताजा चोट खाये बैठा हो तब उसके गम के सामने खुद के गम फीके लगने लगतें हैं।

     ऐसा ही कुछ बांसुरी के साथ हुआ। वो अस्पताल पहुंची ही थी कि चिंकी दौड़ कर उससे लिपट गयी, रो रोकर उसका बुरा हाल था। पापा को कुछ हो तो नही जायेगा यही सोच सोच कर वो बेहाल हुई जा रही थी।
    उसे संभालती वो अपनी मौसी सास के पास पहुंची, वो भी उसे देखते ही बिखर गईं। अब तक उनके बाकी रिश्तेदारों को भी बता दिया था, पर सभी दूर दराज़ के शहरों में थे, इतनी दूर तुरंत पहुंचना सम्भव ना था। जिनके घर वे लोग आये थे उनका अगले दिन तय कार्यक्रम था जिसमें फेर बदल करने खुद मौसी जी ने उन्हें मना कर रखा था।
    मौसा जी के सारे टेस्ट हो चुके थे, डॉक्टर ने आकर बताया कि उनके दो ब्लोकेज आयें हैं और जल्दी ही उन्हें एंजियोप्लास्टी करवानी होगी।

   मौसी और चिंकी का रो रोके बुरा हाल था, उन दोनों को संभालती बांसुरी ऑप्रेशन से जुड़ी बातचीत भी संभाले थी।
   मौसी कुछ भी सोच पाने की हालत में नही थीं उसने भास्कर को फ़ोन लगाने के लिये फ़ोन निकाला और उसका नम्बर डायल कर उसके फ़ोन उठाने का इन्तजार करने लगी।
   फ़ोन उठा, वही गहरी सी आवाज़ उसके कानों में घुल गयी__

  ” तुम ठीक से पहुंच गयी बांसुरी?”

   राजा की आवाज़ सुनते ही उसने चौंक के फ़ोन को देखा __ हे भगवान किस बेहोशी में थी कि दिमाग में भास्कर को सोचते हुए भी उंगलियाँ राजा का नम्बर  डायल कर गईं।

  ” हाँ ” बस छोटा सा जवाब देकर फ़ोन रखने ही वाली थी कि राजा एक बार फिर कुछ बोलने को आतुर लगा__

  ” सुनो बांसुरी! कैसी हो?”

   क्यों उसका नाम लेता है वो, हर किसी के मुहँ से तो उसने अपना नाम सुना है फिर जब वो बोलता है तभी क्यों लगता है कि उसका नाम खूबसूरत है।

  ” तुम्हें फ़ोन नही लगाया था, मैं तो भास्कर को फ़ोन करने जा रही थी, गलती से तुम्हारा नम्बर लग गया”

” एक बार मेरी बात भी सुन लो।”

” मेरे पास वक्त नही है, भास्कर के मौसा जी को दिल का दौरा पड़ा है, यहाँ कोई रिश्तेदार भी नही है।  भास्कर कल तक पहुंच पायेंगे। डॉक्टर तुरंत एंजियोप्लास्टी के लिये कह रहे, मौसी जी कोई भी निर्णय लेने में असमर्थ थी, मैं क्या निर्णय लूँ यही पूछने भास्कर को फ़ोन लगा रही थी। तुमसे मुझे कोई बात नही करनी।”

” इसमें किसी से भी पूछने की क्या बात है बांसुरी। जब तुरंत निर्णय लेने की बात आये तो कमज़ोर मत पड़ा करो। डॉक्टरों ने तुरंत ऑपरेट करने कहा है तो देर क्यों कर रही हो, जाकर उन्हें कहो कि ऑपरेशन शुरु करें , और सुनो….

  ” फ़ोन रख रहीं हूँ मैं”

   बांसुरी फ़ोन बंद कर तुरंत डॉक्टर के केबिन की ओर चल पड़ी, उनसे मिल कर उसने तुरंत ही उन्हें उनका काम शुरु करने कहा और बिलिन्ग काऊंटर पर चली गयी।

  सारी औपचारिकता पूरी कर वो मौसी जी के पास पहुंची, निरमा वहीं चिंकी के साथ बैठी उसका इन्तजार ही कर रही थी।

  ” भाभी बात हो गयी भैय्या से?”

   बांसुरी थोड़ा हड़बड़ा गयी फिर धीरे से हाँ में सर हिला कर वहीं एक किनारे बैठ गयी।
    निरमा ने उसके चेहरे पर के आते जाते भाव पढ़ तो लिये लेकिन उस समय कहा कुछ नही, वो भी उसके साथ चुप बैठी रही।

    कुछ देर में  डॉक्टर भी बाहर चले आये। ऑपरेशन हो चुका था और सफल रहा था।
    
     मौसा जी को ईंटेंसिव केयर युनिट में रखा गया था जहां किसी को अन्दर रुकने की अनुमति नही थी।
  सभी बाहर डॉरमेट्री में ही एक साथ बैठे रहे।

   मौसी जी के दो एक बार कहने पर भी बांसुरी उन्हीं के साथ बनी रही तो निरमा ने चिंकी को अपने साथ बांसुरी के फ्लैट में रुकने के लिये मना लिया।
   निरमा कभी कभी बांसुरी के साथ उसके फ्लैट में रुक जाया करती थी आज भी जब उसने अपनी मामी को वहाँ रुकने की बात कही तो उन्हें कोई आपत्ति नही हुई।

    चिंकी और निरमा के साथ बांसुरी भी नीचे कैन्टीन तक मौसी जी के लिये चाय लेने चली आयी।
        चिंकी से नज़र बचा के निरमा ने बांसुरी को देखा और अपना सवाल दाग दिया__

  “कौन था? ” चौंक कर बांसुरी ने निरमा को देखा और ना में सिर हिला दिया__

  ” ये कहीं तुम्हारी उस राजकुमारी का हैंडसम वाला भाई तो नही था?”

” तूने कब देख लिया?”

  ” तेरे मोबाइल पर ही तो देखा था….. बीच पर डॉग्स के साथ की उसकी सेल्फी ….
    वही था ना?”

  बांसुरी ने धीरे से हाँ कह दिया__

  ” क्या लफ़ड़ा कर रही है यार बंसी तू? क्या है ये चक्कर? इधर भास्कर सर उधर वो हीरो?”

  ” ऐसा कुछ नही है निरमा , तू गलत समझ रही।”

  ” मैं गलत समझूँ ,वही अच्छा है बंसी….

   बांसुरी चुप खड़ी रही__” शादी भास्कर से ही कर रही है ना?”

   निरमा के इस सवाल पर बांसुरी से कुछ कहते नही बना, उसके मुहँ से अब झूठ निकल नही रहा था और सच कहने की उसकी हिम्मत नही हो रही थी।

   काऊंटर से चाय लिये वो दोनो चिंकी तक चले आये …. उन्हें देखते ही चिंकी ने अपना फ़ोन बंद किया और निरमा के साथ जाने के लिये  खड़ी हो गयी__

  ” भाभी !! भैय्या कल दोपहर तक पहुंच जायेंगे। बड़ी मम्मी लोग भी उसी वक्त तक आ जायेंगे।
   अभी सब का फ़ोन यही पूछने आ रहा।”

   बांसुरी ने उसे देखा और मुस्कुरा दी, चिंकी आगे बढ़ कर उससे लिपट गयी___

  ” थैंक यू सो मच भाभी! आज मेरे एक फ़ोन पर आप अपना सारा काम छोड़ दौड़ती चली आयीं, थैंक यू!”

  ” अरे इसमें थैंक यू की क्या बात है चिंकी, तुम तो मुझे शर्मिंदा कर रही हो। ये तो मुझे करना ही था।”

  ” नही भाभी ऐसा नही है। आज कल तो लोग अपने सगे रिश्तेदारों के लिये भी कुछ नही करते,आपने तो बिना शादी हुए भी इतनी मदद….

   ” बस करो बाबा ऐसा कुछ स्पेशल नही कर दिया है मैंने , अगर मैं मदद नही भी करती तो कोई और करता। क्योंकि अगर ऊपरवाले ने परेशानी दी है तो उससे निकालने वाला भी दिया ही है।
    तुम्हारी मदद होना , मौसा जी का काम होना ये सब तो तुम्हारी किस्मत में लिखा था, मैं तो बस ज़रिया बन गयी। भगवान ने मुझे चुना तुम्हारी मदद के लिये बस , इतना ही मेरा काम है समझीं।”

   चिंकी एक बार फिर उसके गले से लग कर निरमा के साथ वहाँ से निकल गयी….
     वो कुछ देर वहीं खड़ी उन्हें जाते देखती रही।

    क्या होता जा रहा था उसे, वो जितना ही उससे भागना चाह रही थी, वो उतना ही उसके अन्दर समाता चला जा रहा था।
    अब तो उसके मुहँ से शब्द भी राजा के ही निकल रहे थे। ऐसा ही रहा तो उसे किसी को कुछ बताने की क्या ज़रूरत ,सब ऐसे ही उसका पागलपन देख उसकी हालत का अंदाज़ा लगा लेंगे।
     
मेरे जैसे बन जाओगे , जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा।
दीवारों से टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा।

   
 
     उफ्फ़ क्या सभी प्रेमियों की उसके जैसी ही हालत होती होगी?
   क्या जैसा पागलपन उसके सिर पर सवार है सभी के साथ ऐसा होता होगा।
  उसे तो लगा था उसे राजा से नफरत होने लगी है, लेकिन ये क्या था जो बार बार उसे उसकी तरफ खींच रहा था।
     वो वापस मुड़ कर मौसी जी के लिये चाय और सैंडविच लिये उनके पास चली गयी।
     उन्हें उनकी चाय पकड़ा कर वो अपनी चाय लिये खिड़की पर आकर खड़ी हो गयी थी।

   अगर कल की सुबह जो हुआ वो नही होता तो कल महल में दशहरे की धूम होती, राजा श्री राम बना रावण के पुतले का दहन कर रहा होता , और वो खुद …..वो भी तो उसी लहंगे को पहनने वाली थी जो राजा ने उसके लिये खरीदा था, गुस्से में उस लहंगे के साथ हर एक चीज़ जो उसने खरीदी थी वहीं छोड़ आयी थी।

  ” बांसुरी बेटा तुम्हारा फ़ोन बज रहा है!”

   मौसी की आवाज़ से वो अपनी सोच से बाहर निकली।  हे भगवान ऐसे कैसे चलेगा,वो तो जैसे इस संसार में रहते हुए भी यहाँ की नही रह गयी थी। तन यहाँ ज़रूर था, पर मन तो उसी निष्ठुर के पास छोड़ आयी थी।

   बांसुरी ने फ़ोन उठाया, उसकी माँ का फ़ोन था। सामान्य हाल चाल पूछने के बाद उसकी माँ ने कहा कि वो लोग भी कल ही वहाँ पहुंच जायेंगे, आखिर उनकी समधन की सगी बहन के पति की तबीयत खराब थी, ऐसे में नही पहुंच पाना शोभा नही देता।
    माँ से बात कर रही थी कि मौसी जी के पास भास्कर का फ़ोन आ गया। माँ का फ़ोन रखने के बाद मौसी ने उसे भास्कर का फ़ोन पकड़ा दिया__

” थैंक्स बाबू! आज तुमने जो किया है उसके लिये मेरा थैंक्स बहुत छोटा है, आज मासी के पास कोई ना था,तुमने बिल्कुल उनकी बहु के समान हर फर्ज निभाया, वही सब किया जो मैं वहाँ होता तो करता।”

  ”  ये तो मेरा फर्ज था भास्कर!”

  ” आजकल तो शादी के बाद भी बहुयें कितना फर्ज निभाती हैं बांसुरी? तुमने तो पहले ही इतना कुछ किया है मेरे और मेरी फैमिली के लिये”

  ” कब तक मुम्बई पहुंच जाओगे?”

  ” बस कल तक का इन्तजार कर लो, दोपहर तक पहुंच जाऊंगा, और सुनो……लव यू!”

   बांसुरी पलट कर कोई जवाब ना दे पायी। उसने सोचा था भास्कर से मिलते ही वो शादी के लिये मना कर देगी, लेकिन अब जैसी परिस्थितियां बन गईं थीं उनमें उसका फिलहाल कुछ भी कहना मुश्किल हो गया था।

    वापस खिड़की पर खड़ी वो चांद को देखती अपने विचारों में खो गयी…………..

  ******

…………
             उधर महल में उसी वक्त पर राजा भी अपनी बालकनी में बैठा उतनी ही बेबसी से चांद को निहार रहा था।
       अगर सब कुछ सही होता तो आज इस महल में कुछ अलग ही रौनक होनी थी, जिसकी जगह ऐसी मनहूसियत पसरी पड़ी थी।

    वो बिना कुछ खाये पिये जाने कितनी देर से वहाँ बैठा था__

” हुकुम! नीचे राजा साहेब ने आपको याद किया है।”

  उस वक्त उसका कहीं जाने का मन नही था, लेकिन राजा साहेब की बात टालना भी उस वक्त सही नही लगा, इधर कुछ समय से उनकी हद से ज्यादा पीने पिलाने की आदत के कारण उनके लीवर ने भी जवाब दे दिया था। उम्र भी हो चली थी इसी से तबीयत नरम गरम बनी ही रहती थी।

   बचपन में छोटी रानी साहेब के कारण अपनी माँ का हक छिनता देख उसके मन में अपने पिता के लिये बहुत अधिक प्रेम और सम्मान नही था, जो किशोर होते राजकुमार में और अधिक उग्र हो चला था। इसिलिए राजमहल के दकियानूसी कानूनों और प्रथाओं का वो घोर विरोधी था।
        लेकिन युवराज की लगातार समझाईश और खुद भी उम्र की परिपक्वता ने उसकी समझ और बुद्धि को भी विकसित कर दिया था।
    उसे छोटी माँ और उनके बच्चों से कभी कोई बैर ना था।
   उसका सारा गुस्स सारी नाराज़गी सिर्फ अपने पिता के लिये थी, लेकिन वो भी वक्त के साथ कम होती चली गयी।

   वो नीचे पहुंचा तब तक में घर के बाकी सदस्य भी वहाँ पहुंच चुके थे।
    
  ” राजकुमार! अगर ये सब ना हुआ होता तो आज की शाम आपका संबंध नेपाल राजवंश के घराने में होना तय था।
   इस सारी अनहोनी की सूचना उन्हें और बिष्ट परिवार को भेज दी गयी थी, लेकिन इस सब के बाद भी ठाकुर साहब चाह रहें हैं कि तेरहवीं आदी का कार्यक्रम निपटने के बाद तुम्हें टीका कर जायें।
   पिंकी के ऐसा करने के बाद हमारा चित्त बहुत दुखी है इसी से हम तुमसे बिना पूछे अब कुछ नही करना चाहते। तुम हाँ कहोगे तभी उन्हें सन्देश भेजेंगे वैसे अभी समय है तुम्हारे पास।”

  ” जी ” छोटा सा जवाब देकर वो वापस जाने के लिये खड़ा हो गया

  युवराज ने उसके कंधे पर हाथ रख उसे खाने के लिये रोका लेकिन ना में सिर हिला कर वो बाहर निकल गया।

   पता नही कैसी बिना मौसम की बारीश थी कि पानी के साथ  उतनी ही तेज़ बिज़ली भी चमक रही थी। कहीं बहुत ज़ोर की बिज़ली गिरी और बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट के साथ महल के एक हिस्से की बत्तियां बुझ गईं।
    हमेशा की जानी पहचानी सीढिय़ां थी, इसी से वो चढ़ता चला गया। सीढियोँ के मुहाने किसी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी और वो वहीं ठिठक कर खड़ा रह गया, उसने एकाएक जो सुना उस पर यकीन ना हुआ।
  दम साधे वो चुपचाप खड़ा वहाँ चल रही सारी बातचीत सुनता रहा और उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आयीं………


क्रमश:

aparna…






   

 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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