जीवनसाथी-32

जीवन साथी- 32

   
          पता नही कैसी बिना मौसम की बारीश थी कि पानी के साथ  उतनी ही तेज़ बिज़ली भी चमक रही थी। कहीं बहुत ज़ोर की बिज़ली गिरी और बादलों की तेज़ गड़गड़ाहट के साथ महल के एक हिस्से की बत्तियां बुझ गईं।
   
      हमेशा की जानी पहचानी सीढिय़ां थी, इसी से वो चढ़ता चला गया। सीढियोँ के मुहाने किसी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी और वो वहीं ठिठक कर खड़ा रह गया, उसने एकाएक जो सुना उस पर यकीन ना हुआ।
  दम साधे वो चुपचाप खड़ा वहाँ चल रही सारी बातचीत सुनता रहा और उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलक आयीं………

     महल के ही दो लोग बात कर रहे थे, उनकी जानकारी में महल का हर सदस्य नीचे भोजन कक्ष में था । वो लोग इस वक्त ऊपर कमरों में बिस्तर आदी की व्यवस्था को आये थे…..

” जितना बड़ा महल और महल के लोग, उतनी छोटी बातें इनकी, छी कितनी नीची सोच है।”

” क्यों ऐसा क्या हो गया?”

  ” ये बेबी साहब के साथ जो हुआ वो कम है क्या।”

  ” राजमहलों के लिये ये आम बात है, तू काहे इतना जलन पाल रही।”

   ” काहे ना पालें, तुम्हे क्या लगता है ये बेबी साहब को एक ही दिन में ठिकाने लगा दिया है इन लोगों ने।”

” तो फिर? तू क्या जानती है इस बारे में?”

  ” हम क्या क्या नही जानते ये पूछो? सब जानते हैं। ये बेबी साहब के साथ उनके बोडीगारड ( बॉडीगार्ड) भेजे गये थे ना कोई बोडीगारड नही थे मुखबीर थे जासूस वो भी मेडम जी के।

  ” हाय रे तेरा अन्ग्रेजी का शौक, रजवाड़ों में आकर भी तू मेड़म बोलती है।

  ” हाँ और हमारी मेड़म को हमारे मुहँ से अच्छा भी लगता है, अच्छा काम की बात सुनो भटकाओ मत हमें।
   मेड़म को पहले ही पता लग गया था कि बेबी साहब का कुछ लफ़ड़ा चल रहा है, बेबी साहब तो दिल्ली अकेली उसी लड़के के साथ घूम कर हनीमून भी मना आईं थी। “

  ” हाय क्या कर रही है तू?”

  ” हाँ तो! माता की कसम दिला लो। दोनो का लफ़ड़ा पता चलते ही अन्दर ही अन्दर मेड़म उनकी शादी की बात दूसरे रजवाड़ो में चलवाने लगी। मेड़म हमारी गज़ब शातिर हैं।
इतना तो समझ गईं थीं कि एक के साथ हनीमून मना कर दूसरे से ब्याह तो ना कर पायेंगी बेबी जी और या तो राजा साहब के सामने सच बोलेंगी या महल छोड़ कर भाग जायेंगी। दोनो ही सूरत में बेबी साहब को महल के लोग मार डालेंगे।
    बस यही उनकी चाल थी लेकिन चाल पूरी ना पड़ पायी और उलटी पड़ गयी।”

” कैसे उलटी पड़ गयी, वो जो चाहती थी वो तो हो ही गया।”

   ” अरे वो चाहती थीं उनके लड़के बेबी साहब को मार कर उन  की लाश उठा कर लायें, तभी तो राजा हुकुम के सामने उनकी बहादुरी उनका राजपुताना नज़र आता , पर उसके पहले ही  कुंवर सा तिड़ी कर गये।
    किसी ने सोचा भी ना था कि अपनी जान से प्यारी बहन को कुंवर सा ऐसी निर्ममता से मार भी सकते हैं।
 

  ” बात तो तेरी सच है, हममें से भी किसी ने कहाँ सोचा था कि कुंवर साहब ऐसा कर सकतें हैं।”

  ” मेड़म ने तो सोचा था कुंवर साहेब बेबी साहेब का साथ देंगे तो उनका भी पत्ता कट जायेगा, क्योंकि राजा साहब से इस बात पर उनकी बहस होगी ही और गहमागहमी में नाराज़ कुंवर सा महल छोड़ जायेंगे, लेकिन यहाँ तो पांसा उल्टा पड़ गया।
   मेड़म ने सोचा था बेबी साहब की मौत से दुखी कुंवर साहेब लड़ झगड़ कर चलते बनेंगे पर बेबी साहब को मार कर उन्होने तो अपनी गद्दी बचा ली।”

  ” गद्दी बचा ली से क्या मतलब। राजा बहादुर के बाद गद्दी छोटे हुकुम की ही तो है।”

   ” ऐसा कुछ ना है, कायदे से राजा बहादुर के बाद सबसे बड़े राजकुमार को गद्दी मिलती है, सो गद्दी युवराज हुकुम की होती है,अगर पैरों में पांचों उंगलियाँ होती तो वही हकदार थे। ”

  ” हाँ तो उनके बाद तो उनसे छोटे यानी हमारे कुंवर साहेब का ही तो हक हुआ।”

  ” हाँ हक तो उन्हीं का हुआ लेकिन उनमें कुछ भी कमी पायी जाने पर विराज सा विराट सा के साथ साथ जय सा विजय सा भी राजा बन सकतें हैं, और तो और दीवान साहब का बेटा समर भी।”

  ” दीवान का बेटा कैसे? वो राजमहल का अंश नही है।”

    ” है वो भी राजमहल का खून ही है। सालों पहले अभी के राजा साहेब के परदादा के पिता की दो रानियां थी, उन्हीं में से छोटी रानी को उस समय किसी उद्दंडता की सजा मिली की उन्हें महल छोड़ना पड़ा, बाद में बड़ी रानी की समझाईश पे राजा जी ने बुला तो लिया लेकिन उनके रहने का अलग इन्तेजाम कर दिया। राजकुमार बडी रानी का बेटा बना तब छोटी रानी को बुरा ना लगे इसलिये उनके बेटे को दीवान पद सौंप दिया, तबसे छोटी रानी के पोते पड़पोते वही पद संभालें हैं।
    अगर किसी पीढ़ी में ऐसा हुआ कि बड़ी रानी की संतति गद्दी संभालने लायक ना हुई तब दीवान साहब के बच्चे गद्दी के हकदार हो जायेंगे।”

  ” हे भगवान! तू तो सच में बहुत कुछ जानती है। पर ये बता तेरी मेड़म ने ये सब बताया तुझे।”

  ” हाँ वो मुझे बताएंगी ना कद्दू। छिप कर सुन लिया सब कुछ। अब ये ना पूछना की मेरी कौन सी वाली मेड़म ने कहा।”

  ” मैं यही सोच रहा था, क्योंकि तू किसी एक की पर्सनल हेल्पर तो बनी नही है अब तक। तेरा तो लगभग हर कमरे में काम पड़ता ही है।”

  ” तभी तो हर कमरे के अन्दर की बात भी पता रहती है हमें। ”

दोनो की बातें ना जाने और कितने राज़ राजा के सामने खोल जाती कि बत्तियां जल उठीं। अब तक छिपा खड़ा राजा तेज़ी से कदम बढ़ाते दो चार बची सीढ़ियाँ भी लाँघ गया लेकिन ऊपर बरामदे में उसे कोई ना मिला।
     उसके वहाँ पहुंचते में वहाँ खड़े दोनो लोग जाने कहाँ गायब हो चुके थे, दोनो मे से किसी ने एक दूसरे का नाम नही लिया था, महल में काम करने वाली चवालिस औरतों और बासठ पुरूष कर्मियों में से ये किसकी आवाज़ थी राजा पहचान नही पाया।

   सबसे ज्यादा चकित वो मेड़म जी की बात पर था, आखिर महल की इतनी महिलाओं में से कौन थी जो उसे हटा कर अपने बेटे को गद्दी पर बैठाना चाहती थी।
  उसकी बुआ जिनके दोनो बेटों जय विजय से बुआ को असीम स्नेह था, भले ही सामने से उन्होने कभी गद्दी का मोह नही दिखाया था लेकिन राजगद्दी मिलेगी तो कौन छोड़ना चाहेगा।
   रूपा भाभी की संतान उनका एक मात्र पुत्र अभी गद्दी पर बैठने के लिये बहुत छोटा था। इसलिये उनका उसके लिये ऐसा सोचना असम्भव था।
     दीवान जी का परिवार भी महल के पिछ्ले हिस्से में ही रहा करता था, उनका बेटा समर भी हर तरह से गद्दी के योग्य था ही इसलिये उनका ऐसा सोचना भी सम्भव था।

  इन सभी के बाद बचतीं थी छोटी माँ जिन्हें उसने कभी माँ का सम्बोधन नही दिया हमेशा मॉम ही कहा बावजूद वो उन पर अटूट विश्वास करता था। आज वो जो था उसमें पूरा हाथ मॉम का ही तो था, उसकी खुद की माँ तो उसे बिल्कुल अबोध उम्र में ही छोड़ गईं थीं। उसकी बनारस में आगे पढ़ने की इच्छा हो या विदेश की पढ़ाई, उसके हर एक निर्णय पर उन्होने ही पहले मुहर लगायी थी और डैड को भी मनाया था।
     उन्हें बस उसकी गाने बजाने की आदत से आपत्ति थी इसलिये ही तो वो महल में ना कभी गाता था ना उसकी गिटार वहाँ नज़र आती थी।
   उनसे उसे हमेशा स्नेह की छाँव ही मिली थी अपनापन मिला था, उन पर अविश्वास करना उसके लिये भगवान पर अविश्वास करने जैसा था।
 
   जब जलसे में उसका घोड़ा बिदक गया था और उसे पीठ से गिरा दूर तक खींचता चला गया था, तब जब तक उसकी बेहोशी नही टूटी मॉम पानी की एक बूंद तक पिये बिना मन्दिर में बैठी रहीं थीं। ऐसे ही जब उसे भाला लगा था तब भी उन्होने व्रत उठा लिया था।
   अभी गोली लगने के बाद भी उन्होने उसके अच्छे स्वास्थ्य के लिये महामृत्युन्जय पाठ के लिये पण्डित जी से कह रखा था, ये सब नही होता तो महल के मन्दिर में उसकी बेहतरी के लिये मॉम पाठ करवा रही होतीं…… क्या इतने सब के बाद भी वो उन पर शक कर सकता है, नही कभी नही। किसी सूरत में नही। मॉम ने कभी युवराज भैया उसमें विराज और विराट में कोई भेद नही किया। किसी गलती के लिये एक बार भले ही वो विराज या विराट को अपशब्द कह भी लें लेकिन आज तक उस पर उन्होने अपने गुस्से की आंच तक नही आने दी।
     ये तो उसकी खुद की कमी है कि वो अपनी माँ साहेब की जगह किसी को महसूस नही कर पाता इसलिये उन्हें माँ नही कहता लेकिन प्यार उनसे भी उसे कम तो नही है।
    मॉम ऐसा कभी, कभी नही कर सकतीं।

  अपनी सोच में डूबा वो अपनी बालकनी में टहलता रहा, बीच बीच में उसकी नज़र सामने वाली बंद बालकनी पर भी चली जाती , जहाँ सिर्फ दो दिन पहले तक ही वो खड़ी होती थी।
      कैसी गहरी आंखें थी उसकी और उतनी ही गहरी बातें। आज तक गिने चुने लोग ही तो उसके राजकुमार होने से प्रभावित नही थे, वो भी उन्हीं में से थी।
   उसके साथ उसने ज़िंदगी को कितने करीब से जिया था। कैसी छोटी सी बात पर भी कितना खुश हो जाया करती थी, सिर्फ एक बार उसके लिये कॉफ़ी बना कर वो लाया था उसके लिये कम से कम दस बाद उसने थैंक यू बोल दिया था।
   सिर्फ उसकी दोस्त का भाई ही तो था फिर भी उसके लिये कितना कुछ कर गयी थी। उसके कपड़े धोना हो, उसके लिये खाना बनाना हो, उसके बिखरे सामान को समेटना हो या उसकी गिटार की हिफाज़त करनी हो हर काम ऐसे सलीके से करती जैसे उसकी दोस्त नही बीवी हो।
      ” बांसुरी इतना कुछ किया फिर समझ क्यों नहीं पायीं मुझे। एक मौका तो देती अपनी बात रखने का। ना कुछ कहा ना सुना, चुपचाप सब छोड़ कर चली गईं।
   लेकिन मैं भी क्या करता, जब जब अपने मन की बात कहने की सोच कर आगे बढ़ा तुम्हारी सगाई की अंगूठी सामने आ गयी। मैं तो आज तक ये भी नही जान पाया कि तुमने मेरे लिये जो किया वो सिर्फ दोस्ती थी या प्यार।”

  ” कुमार! वहाँ कहाँ अन्धेरे में बैठे हैं आप? यहाँ आईये।”
      वो खुद में खोया था की रानी साहेब खुद उसके कमरे में चलीं आयीं, उन्हें देखते ही उसने उठ कर प्रणाम किया और भीतर चला आया__

” आप क्यों चली आयीं मुझे बुला लिया होता मॉम!”

” कुमार तुम्हारी तकलीफ हम समझतें हैं, आखिर घर भर की लाड़ली जो थी, पर किसे पता था ऐसे नाक कटा जायेगी। अब ज्यादा परेशान ना होईये, कब तक ऐसे भूखे प्यासे खुद से लड़ते रहेंगे आप? आपने कुछ गलत नही किया, एक राजपूत शेर का जो कर्तव्य है वही आपने पूरा किया, अब इस दुख से उबर जाइये, कल कुछ मेहमान पिंकी के गमी के लिये आ रहें हैं उनमें आपके होने वाले ससुर जी भी हैं, हम और राजा साहेब चाहतें हैं आप उन लोगों से अच्छे से मिल लें। देखिए कुमार आप भी जानतें हैं महल की माली हालत कुछ खास ठीक नही है। इतने बड़े महल की साज संभाल के लिये राज कोश को समय समय पर भरते रहना भी ज़रूरी है। इसिलिए लोगों से संबंध भी बनाये रखना ज़रूरी है।
    आप समझ रहे हैं ना हम क्या कहना चाहते हैं।”

” जी, समझ रहा हूँ।”
  
” खाना खा लिजिये कुमार! और कल समय पर तैयार होकर आ जाईयेगा। और सुनिये नींद भी पूरी लिजिये ऐसे तो आप बिमार पड़ जायेंगे।”
  रानी साहब ने राजा के बालों पर हाथ फिराया और बाहर निकल गईं। उनके पीछे उनकी सहायिकाओं की फौज के बाहर जाते ही राजा ने अपने सहयोगी से खाना वापस ले जाने कहा और वापस बालकनी में आ बैठा। 
   सहयोगी उसके लिये बादाम वाला दूध ले आया जिसे एक बार देख राजा ने वापस रख दिया, लेकिन बार बार उसके इसरार पर राजा ने उसे दूध की जगह कॉफ़ी बना लाने को कहा और फिर खुद में खो गया।
     कॉफ़ी का कप हाथ में आते ही उसे एक बार फिर मुम्बई और बांसुरी की यादें सताने लगी। कॉफ़ी खतम कर वहीं बैठे बैठे उसी ईज़ी चेयर पर उसे नींद आ गयी।

  

******

    चौबीस घण्टे का क्रिटिकल पिरियड निकल चुका था और अब भास्कर के मौसा जी खतरे से बाहर थे।
      सुबह निरमा चिंकी के साथ बांसुरी और मौसी के लिये घर से ही नाश्ता और चाय बना कर ले आयी।
      तब तक में मौसी की नंंद जिनके परिवार का कार्यक्रम था भी अपने कार्यक्रम से फुरसत पा कर अस्पताल चली आयीं, उनके साथ ही उनका बेटा बहु सभी थे। इतने लोगों का साथ पा कर मौसी जी को भी थोड़ी हिम्मत बंधी और बांसुरी के बार बार कहने पर नहाने आदी के लिये वो बांसुरी के साथ उसके फ्लैट पर जाने को मान गईं।

    लगभग दो तीन घण्टे फ्लैट में आराम कर लेने से मौसी जी भी फ्रेश हो गईं उन्हें साथ लिये बांसुरी वापस अस्पताल चली आयी, उन लोगों के आते ही बाकी लोग चले गये।

    भास्कर की फ्लाइट भी लैंड हो चुकी थी। कुछ ही देर में वो उन लोगों के साथ था। उसे देखते ही मौसी और चिंकी का सब्र एक बार फिर बह चला लेकिन राहत की बात यही थी कि मौसा जी अब पहले से काफी बेहतर थे।

    बांसुरी को आज किसी भी सूरत में ऑफिस में शक्ल दिखाना ज़रूरी था। इसिलिए जब उसने ऑफिस जाने की मंशा जाहिर की तो भास्कर भी उसके साथ हो लिया।
   निरमा बांसुरी और भास्कर ऑफिस के लिये साथ ही निकल रहे थे कि भास्कर के माता पिता भी पहुंच गये, सबसे मिलने के बाद वो लोग निश्चिंत होकर ऑफिस निकल गये, अब मासी जी के पास उनकी देखभाल के लिये लोग पहुंच चुके थे।

   ऑफिस में पिछले पेंडिंग काम निपटाते हुए कब शाम हो गयी बांसुरी को पता भी ना चला, आज ऑफिस में एडिटर की पोस्ट पर एक नयी जॉइनी आयी थी, शाम उन्हीं के लिये एक छोटी सी वेलकम पार्टी अरेंज की गयी थी, जिसमें साथ ले जाने के लिये भास्कर उसकी डेस्क पे चला आया। वैसे तो वो पुणे ब्रांच के लिये काम कर रहा था लेकिन सिंगापुर से लौटने के बाद उसे हेड ऑफिस ही रिपोर्ट करना था, इसी से आज की पार्टी का हिस्सा वो भी था।

    पार्टी असल में सिंगापुर ब्रांच खुलने की खुशी में थी। उस ब्रांच की हेड बन कर जाने वाली अदिती शर्मा अभी कुछ दिनों के लिये मुम्बई में एडिटर का पद सम्भालने आयीं थीं। अपना परिचय देने के बाद सबका परिचय लेती हँसती खिल्खिलाती अदिती सभी की टेबल पर खुद जा कर सबसे मिल भी रही थीं।
    ऐसे ही एक से दूसरे तक जाती अपना वाईन का ग्लास थामे वो बांसुरी और भास्कर की टेबल पर भी चली आयीं।

  ” हैलो गाईज़”

  ” हेलो मैम, प्लीज़ जॉइन अस।”  बांसुरी के ऐसा कहते ही भास्कर ने अदिती के लिये कुर्सी खिंची और उन दोनों का परिचय करवाने लगा

  ” बांसुरी ये अदिती हैं,और अदिती ये बांसुरी हैं, हमारे मुम्बई ब्रांच में हैं।”

   ” और आप भास्कर हैं जो मेरे साथ कॉलेज में पढ़ते थे।” अदिती की बात पर भास्कर मुस्कुरा कर नीचे देखने लगा और बांसुरी आश्चर्य से उन दोनो को

   ” हाँ बांसुरी हम दोनो कॉलेज में साथ ही थे,  मैं भास्कर की सीनियर थी, ऐंड आई मस्ट से ही वाज़ जीनियस , ए रियल जीनियस ”

  बासुँरी मुस्कुरा कर भास्कर को देखने लगी__

” अरे कुछ नही, इनकी आदत ही है सबको चने के झाड़ पर चढ़ाने की। ”

  ” अच्छा जी अगर ऐसा होता तो इतने सारे एम्प्लायीज़ में से तुम्हें ही सिंगापुर के लिये क्यों चुना गया, बताओ।”

  भास्कर ने अब तक बांसुरी को उस बाबत कुछ नही बताया था, वो एकाएक झेंप गया क्योंकि उसका मानना शुरु से यही था कि पति पत्नि के बीच हर बात को लेकर पारदर्शिता होनी चाहिए। अगर वो बांसुरी से कुछ ना छिपाने की उम्मीद करता था तो यही नियम वो खुद के लिये भी रखता था।
    जबकि बांसुरी को इस बात से कोई फर्क नही पड़ा।
वो अदिती और भास्कर की बात चीत के बीच चुपके से अपना फ़ोन खोले राजा की तस्वीर देख रही थी__

  ” ओह तो तुम ही वो बांसुरी हो जो भास्कर के होंठों पर सजने वाली हो।”

    राजा के बारे में सोचती बैठी बांसुरी ने असल मे कुछ दो चार बातों के बाद कुछ सुना ही नही था, इसी से उसे एकाएक अदिती की बात समझ नही आयी वो भौचक सी कभी उसे कभी भास्कर को देखने लगी, भास्कर ने उस वक्त मुस्कुरा कर बात संभाल ली__

  ” हाँ शादी की तारीख भी लगभग पक्की हो चुकी है,असल में दो तीन तारीखों पर विचार चल रहा है , अब देखते हैं क्या फायनल होता है।”

  ” लकी गर्ल बांसुरी ! ” बांसुरी के मुस्कुरा कर थैंक यू कहने पर अदिती आगे कहने लगी__

  ” सच कहूं तो मुझे कॉलेज में भास्कर पे क्रश था, पर ये इतना पढाकू और खडूस था कि इससे कभी कुछ कहने की हिम्मत ही नही हुई।”

    वाईन का दूसरा ग्लास अदिती पर अपना रंग दिखाने लगा था…..

    बांसुरी के सामने अदिती का ऐसा रहस्योद्घाटन भास्कर को अजीब दुविधा में डाल गया, वो वैसे भी विचारों से अपनी जड़ों से जुड़ा था।
   कभी कॉलेज के दिनों में वो खुद अदिती का बहुत बड़ा भक्त रह चुका था, लेकिन अपने संस्कारों से लिपटा भास्कर कभी अपनी जाति से बाहर और उम्र में बड़ी लड़की से अपने मन की बात कह नही पाया।
  
        अपने मन के भागते घोड़ों को साधने का तरीका उसे पढ़ाई में डूबना ही लगा, और उसकी ये डुबकी तब सार्थक हो उठी जब एक नामचीन अखबार के लिये अच्छे खासे मेहनताने पर उसे नौकरी मिल गयी।
   अदिती कॉलेज पूरा कर विदेश चली गयी और वापसी के बाद दिल्ली अपने गृहग्राम में उसने नौकरी पकड़ ली।
    सोशल नेटवर्किंग के ज़माने में वो दोनो भी हल्के फुल्के दोस्त बने रहे लेकिन कॉलेज वाले ज़ज़्बात दोनों ने ही कभी एक दूसरे से साझा नही किये।

     बांसुरी की भोली मोहिनी सी सूरत और उससे भी बढ़कर उसकी गम्भीरता उसके संस्कार सभी में भास्कर को अपने माता पिता के लिये एक उपयुक्त बहु दिखी और बिना किसी ताम झाम के उसने बांसुरी से शादी का प्रस्ताव रख दिया जिसे उसने भी स्वीकार कर लिया……

…….. लेकिन हर बार एक सीधी सपाट राह में साथ चलते दो लोग जीवनसाथी बन जायें ऐसा ज़रूरी तो नही ।
       लेकिन भगवान उन्हें किसी ना किसी तरीके से उनसे ज़रूर मिलवा देतें हैं जो असल में एक दूजे के लिये बने होतें हैं।

    पार्टी खत्म होने में समय था और भास्कर को अस्पताल लौटना था, इसी से वो अदिती से बिदा ले बांसुरी को साथ लिये उसके फ्लैट की ओर निकल गया।
   सुबह जब से आया  वो ठीक से बैठ भी नही पाया था। बांसुरी के फ्लैट पर उसके फ्रेश होते में बांसुरी ने दोनों के लिये कॉफ़ी बना ली।

    वो बाहर आया, और आराम से बैठ उसने कॉफ़ी का कप उठा लिया, तभी रसोई से बिस्किट्स का प्लेट लेकर आती बांसुरी ने उसे देखा और भाग कर उसके हाथ से कप छीन लिया__

  ” सॉरी भास्कर! ये मेरा वाला कप है, मैं इसी कप में कॉफ़ी पीती हूँ “

  ” अरे तो क्या हुआ, अगर आज मैने पी ली तो।”

    अब बांसुरी उसे क्या बताती कि इस कप में राजा की उंगलियों का स्पर्श था जिसे वो और किसी के हाथ में नही देख सकती थी।

  ” सॉरी मैं इस कप के लिये थोड़ी साइको हूँ ” बिना ज्यादा वाद विवाद किये उसने भास्कर के हाथ से कप छीन लिया और उसके हाथ में दूसरा कप थमा दिया।
   अपनी कॉफ़ी खत्म कर उसने दलिया पैक किया और अस्पताल जाने के लिये तैय्यार हो गयी। आज  उसके होने वाले सास ससुर भी आ चुके थे और रात तक उसकी माँ और पापा भी आने वाले थे, सभी के लिये लौट कर उसे खाने की तैयारियाँ भी करनी थी।

   तैय्यार होकर उसके कमरे से बाहर आते में भास्कर भी तैय्यार हो चुका था, बाँसुरी जैसे ही सारा सामान लिये आगे बढ़ी भास्कर ने पीछे से उसका हाथ पकड़ा वो पीछे मुड़ी ही थी कि भास्कर ने उसे गले से लगा लिया।

     भास्कर की बाहों में बांसुरी कसमसा कर रह गयी__

  ” थैंक यू सो मच बांसुरी फ़ॉर एवरीथिंग।”

   कुछ सेकंड खामोश रहने के बाद बांसुरी की निर्लिप्तता महसूस कर भास्कर ने उसे खुद से अलग किया और उसकी आंखों में झांक कर अपना सवाल पूछ लिया__

” किसी बात से परेशान हो? कुछ कहना चाहती हो?”

   बांसुरी चीख चीख कर कहना चाहती थी हाँ कहना चाहती हूँ कि  तुमसे प्यार नही करती। तुमसे शादी भी नही करना चाहती लेकिन अपने संकोची स्वभाव से मजबूर वो चुप रह गयी।
   उसने धीरे से ना में सर हिलाया और सामान और बैग उठाये आगे बढ़ गयी।

    माथे पर लकीरें लिये भास्कर भी कमरे की बत्तियां बुझाता उसके पीछे कमरे से निकला और दरवाज़े पर ताला लगाये चुपचाप उसके पीछे निकल गया।

    अस्पताल में उनके पहुंचते में बांसुरी के माँ पापा भी पहुंच चुके थे। एक दिन पहले की सारी मनहूसियत को जैसे सबने धो पोंछकर बहा दिया था। सारे रिश्तेदारों की मौजूदगी में अस्पताल में उत्सव सा माहौल बन गया था। मौसी जी भी बात बात पर हँसती मुस्कुराती बांसुरी के गुण गाये जा रहीं थीं।

     बांसुरी की तारीफों से प्रसन्न प्रमिला के लिये ये उसकी कोखजाई की तारीफ नही उसकी खुद की तारीफ थी, आखिर उसी के संस्कार थे जो उसकी लाड़ली इतनी समझदार निकली थी।

    अब मौसा जी की तबीयत से इतर बातों का रुख बांसुरी और भास्कर के विवाह की तैय्यारियों पर केंद्रित होकर रह गया था। इन सब बातों को सुनती अपनी परेशानी से अकेली जूझती बांसुरी ने आखिर राजा को एक बार फ़ोन करने का मन बनाया भी लेकिन सबसे नज़र बचा कर वो जब  उसका नम्बर डायल करने लगी तब अपने धड़कते दिल की आवाज़ से डर कर उसने फ़ोन वापस बंद कर दिया।

   क्या कहेगी उससे? और कैसे कहेगी? लड़की होकर क्या वो इतनी निर्लज्जता से अपनी बात उससे कह पायेगी जिसके मन की बात वो आज तक नही समझ पायी थी। और फिर जो लड़का अपनी बहन को जान से मार सकता है वो उसके लिये कितना वफादार होगा?

   ” क्या सोचती खड़ी हो यहाँ बांसुरी! चलो खाना ऑर्डर कर दिया था, सभी खाने पर तुम्हारा इन्तजार कर रहें हैं। खा कर फिर फ्लैट पर सभी औरतें तुम्हारे साथ चली जायेंगी, मैं और पापा रात यही रुक जायेंगे”

    भास्कर की बात सुन अपने विचारों से बाहर निकली वो उसके साथ डॉरमेट्री की ओर चल पड़ी। भास्कर उसके साथ नही जायेगा ये सुन कर उसे जैसे राहत सी मिल गयी थी।
     फिर भी अब और ज्यादा देर ना कर उसे अपने मन की बात किसी भी हाल में भास्कर से कहनी ही थी। वो जितना देर करेगी भास्कर की तकलीफ उतनी ही बढ़ती चली जायेगी__

” पहले भी तुम कम ही बोलतीं थीं पर अब तो बिल्कुल ही चुप हो गयी हो बंसी । इतना खुद में डूबे ना रहा करो, अपने आस पास के लोगों पर भी नज़र डालो यार। तुम्हारा होने वाला पति हूँ आखिर, अगर मन में कुछ है तो बताओ।”

    भास्कर की बात सुन उसने कुछ नही कहा और आगे बढ कर अपनी माँ के साथ खाना परोसने में हाथ बंटाने लगी।

क्रमशः

aparna…
      

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s