जीवनसाथी -33

जीवन साथी- 33

     जिस में जवान हो कर, बदनाम हम हुए
    उस शहर, उस गली, उस घर को सलाम
     जिसने हमें मिलाये, जिसने जुदा किया
    उस वक़्त, उस घड़ी, उस गज़र को सलाम
    ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम सलाम…..

    शाम ऑफिस से लौटने के बाद बांसुरी को कई दिनों बाद एकान्त के कुछ पल मिले थे, वो अपनी कॉफ़ी लिये बालकनी में बैठी थी, बाजू वाली बालकनी में कोई बैठा कैनवास पर इतनी तल्लीनता से पेंटिग कर रहा था कि उसके मोबाईल के रेडियो पर चलता गाना उसके पास की बालकनी तक सुनाई दे रहा है इसका आभास ही ना हुआ उसे।
    और उस गाने को सुनती बांसुरी बहुत दिनों बाद मुस्कुरा उठी__ ए प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम।

बांसुरी को वापस आये लगभग पन्द्रह दिन बीत चुके थे। मौसा जी की तबीयत भी सुधर चुकी थी, उन्हें अस्पताल से छुट्टी तो काफी पहले ही मिल गयी थी लेकिन एहतियात के तौर पर वो पुणे ना लौट कर वहीं मुम्बई में अपनी बहन के घर रुक गये थे।
    बाकी सभी लोग बांसुरी के फ्लैट पर रुके थे।
  दोनो समधिनों का उत्साह खत्म होने का नाम नही ले रहा था, दोनों कभी वी टी तो कभी कल्याण जा जा कर खरीदारी कर रहीं थीं।
    ज़रूरत के सामान का क्या कहना अब तो शौकिया खरीदारी की जा रही थी, उसके साथ ही मुफ्त में मुम्बई दर्शन का कार्यक्रम भी चालू था।
   मौसी जी अपनी मन्नत पूरी करने शनी देव के दर्शनों के लिये शिंगनापुर जाना चाहती थीं उसके लिये भास्कर ने एक बड़ी ट्रैवलर बुक कर सभी को भेज दिया था। दोनो समधि समधन के साथ मौसी और चिंकी दो दिन में अपनी यात्रा पूरी कर आये थे।
  
    पर उन दो दिनों में भास्कर के साथ अकेले रहने से बचने के लिये बांसुरी ने निरमा को भी अपने साथ ही रोक लिया था।
     
         क्यों वो उस अनजान के साथ तो आराम से अकेले रह गयी लेकिन अपने होने वाले पति के साथ रहने में उसे संकोच हो उठा इस बात की कोई कैफ़ियत वो खुद को नही दे पायी।

    आज सभी शिंगनापुर से लौटने वाले थे , इसी से बांसुरी ऑफिस से कुछ जल्दी घर लौट आयी थी, और अपने एकान्त पलों में राजा के कप में कॉफ़ी पीती उसके खयालों में खोयी गाने को सुनती मुस्कुरा रही थी।

    उसका फ़ोन रिंग होने से उसका ध्यान टूटा, इतने दिनों से जब भी उसका फ़ोन रिंग होता उसका दिल एक बार को ज़ोर से धड़क उठता __ कहीं राजा का फ़ोन तो नही।
    लेकिन इतने दिनों में ना उसका कोई फ़ोन आया ना कोई सन्देश।
  वो भी इस बात को समझती थी कि अपने महल के कायदों को निभाता वो तेरहवीं की पूजा के पहले वहाँ से नही निकल सकता लेकिन फ़ोन करने में भी कोई सूतक लगता है क्या?
     एक बार भी फ़ोन नही किया। कम से कम अपने मन की बात बताने को ही कर लेता। यही बताने की आखिर ऐसा क्या हुआ की उसे पिंकी को मारना पड़ गया, अरे ज्यादा से ज्यादा क्या होता एक बार फ़ोन नही उठाती, दुबारा नही उठाती पर आखिर कब तक उससे भाग पाती।

    बांसुरी ने फ़ोन देखा उसकी माँ का फ़ोन था__

” बंसी  कहाँ हो बिटिया”?

” घर आ गयी हूँ माँ! आप लोग कहाँ तक पहुँचे हैं?”

” हम चर्च गेट पर उतरने वालें हैं तुम और भास्कर भी आ जाओ, थोड़ा कुछ सामान खरीदना है उसके बाद क्योंकि समय नही बचेगा, हम लोगों को कल ही वापस निकलना भी तो है।”

  मन तो उसका बिल्कुल भी नही था लेकिन किसी को ना बोलना भी उस बेज़ुबान को आता नही था।
   अपना कप अन्दर रख वो तैय्यार होने चली गयी,साथ ही भास्कर को भी चर्चगेट पहुंचने का मेसेज भेज दिया।
   उसके वहाँ पहुंचने तक भास्कर भी ऑफिस का काम निपटा कर वहाँ पहुंच चुका था।

    सभी वामा में साड़ियों की खरीदारी के लिये पहुंच गये।
     वो क्यों इतनी संकोची थी कि जो शादी वो करना नही चाहती उसी की शॉपिंग के लिये मना भी नही कर पा रही। और फिर दुनिया की कौन सी ऐसी लड़की होगी जो कपडों की दुकान में आकर भी बेज़ार बैठी रहे।
         साड़ियों को अलटते पलटते उसकी नज़र एक साड़ी पर टिक कर रह गयी, हुबहू वही रंग वही मखमली बेल बूटे जैसे उस लहंगे पर थे। उसने उस साड़ी को उठा लिया __

   ” तुम्हें पसंद आ रही है क्या बांसुरी ” भास्कर की माँ के सवाल पर वो बस मुस्कुरा कर रह गयी

   ” ” मुझे उससे कहीं अधिक ये पसंद आ रही, ज़रा देखो” और उन्होंने आगे बढ़ कर अपनी पसंद की साड़ी उसके कंधे पर टिका दी

  ” देखिए बहन जी ! आपको कैसी लग रही।”

  बिटिया की होने वाली सास की पसंद को कौन सी माँ नकार सकती थी__” जी बहुत अच्छी है”

  ” तो बांसुरी तुम बताओ, तुम्हें कौन सी ज्यादा अच्छी लगी वो तुम्हारी वाली या ये मेरी वाली।” होने वाली सास के सवाल का जवाब उसके लिये टेढ़ी खीर थी। वो कुछ कहती कि बाजू में खड़ा भास्कर बोल उठा।

  ” इसमें पूछने वाली क्या बात है माँ जो आपको पसंद है ये वही पहनेगी, क्यों है ना बांसुरी? इतना सोचा मत करो माँ इसे आगे तुम्हारे हिसाबों में ही ढलना है और वैसे ही रहना है। ये बात बांसुरी भी जानती है।”

  अपनी बात पूरी कर भास्कर अगले काऊंटर पर खुद के लिये कुछ देखने चला गया, और हाथ में थामी साड़ी देखती बांसुरी का मन फिर किसी और काम में नही लगा।
    
    सभी बाहर से खा पीकर घर चले आये, अगले दिन सुबह ही सबकी ट्रेन थी।
    सुबह जल्दी उठ कर बांसुरी ने अपनी माँ की सहायता से सभी के रास्ते का खाना तैयार किया और खुद भी तैयार होकर भास्कर के साथ उन्हें छोड़ने स्टेशन तक चली आयी।
    कुछ भी हो आखिर माँ पापा के आ जाने से उसकी तकलीफ पे मरहम तो लग ही गया था, भले ही वो अपनी माँ से मन भर कर बात ना कर पायी हो पर उनकी गोद में सर रख कर उसने सुकून के कुछ पल चुरा ही लिये थे।

   भास्कर और बांसुरी के माता पिता साथ ही वापस निकल गये, इधर एक दिन पहले ही शॉपिंग के बाद उसकी मासी मौसा जी भी पुणे निकल चुके थे।

  भास्कर और बांसुरी स्टेशन से वापस ऑफिस चले आये।
      दोनो को साथ साथ ऑफिस में घुसते देख मुस्कुराती अदिती उन तक चली आयी। हाथ में थाम रखा लिफ़ाफ़ा भास्कर को दिखाती वो आंखों ही आंखों में मुस्कुराती रही__

” तुम्हारे लिये सरप्राइज़ है मिस्टर भास्कर! “

  ” तो दे दिजिये मैम,देर किस बात की है।”

  ” अभी नही ! पहले तुमसे पार्टी लूंगी तब ये लिफ़ाफ़ा तुम्हें मिलेगा।”

  ” जब बोलो, मैं तो तैयार बैठा हूँ पार्टी के लिये।”

   उन दोनों को बातें करते छोड़ बांसुरी अदिती का अभिवादन कर आगे बढ़ गयी।

   ” हम्म कहाँ  देंगे सर पार्टी”

  ” आप जहां कहे मैम, वैसे मैं पीता तो हूँ नही तो मेरी पार्टी आपको बोरिंग ही लगेगी।”

  ” अरे तो क्या हुआ? पीते नही हो तो क्या पिलाओगे भी नही, कंजूस! भई हमारे लिये तो पार्टी मतलब यही है अब विदेश रह कर पढ़ने का कोई साईड इफेक्ट तो होना ही चाहिए। वैसे इतना भी नही पीती हूँ की लीवर खराब हो जाये।”

  अदिती अपनी ही बात पर हँस पड़ी …..

  ” तो शाम को ऑफिस से साथ ही निकलेंगे डिनर के लिये “

  ” ओके ” कह भास्कर आगे बढ़ गया तभी अदिती ने उसे पीछे से आवाज़ लगा दी__

  ” भास्कर सुनो! बांसुरी से भी एक बार पूछ लो वो शाम को फ़्री है या नही?”

  ” उससे क्या पूछना फ़्री ही है वो।”

  ” अरे ये क्या बात हुई? कहीं उसका और कोई प्लान हुआ तो?”

  ” नो मैम डोंट वरी मुझसे पूछे बगैर कोई प्लान नही बनाती वो”

   ” हम्म बीवी चाहिए भास्कर या गुलाम”

  ” व्हाट? व्हाट डू यू मीन?”

   ” अगर मैं तुम्हारी होने वाली बीवी होती ना तो अब तक तुम्हें सुधार चुकी होती भास्कर, ऐंड आई मीन इट।”

   भास्कर माथे पर शिकन लिये उसे देखता रहा और वो अपनी उँची एड़ी की हील्स खटकाती वहाँ से चलती बनी।

   शाम को अदिती की कार में भास्कर और बांसुरी उसके साथ डिनर के लिये निकल चले। ड्राइविंग सीट पर बैठी अदिती ने अपने साथ सामने की सीट पर बांसुरी को बैठा लिया था।
   वैसे तो भास्कर के लिये किसी लड़की की ड्राइव पे पीछे बैठना थोड़ी शर्म की बात थी लेकिन अपने सर पर एडिटर की पोस्ट लिये बैठी अदिती की किसी बात को काटना उसने मुनासिब नही समझा।

    ऑर्किड के पार्किंग लाउंज में गाड़ी गार्ड को सौंप वो तीनो अन्दर चले गये।
    रास्ते भर अदिती और भास्कर अपने कॉलेज के दिनों को याद करते आये थे, दोनो की बातें सुनती बांसुरी एक आध हाँ हूँ के अलावा ज्यादातर समय चुप ही बैठी रही।

   ” ये लो तुम्हारा प्रमोशन लेटर।”

    ” प्रमोशन लेटर? आश्चर्य से भास्कर कभी अदिती को कभी उसके हाथ में लहराते लिफाफे को देखता रहा, उसे ये लगा था कि सिंगापुर ब्रांच में उसे ट्रांसफर किया जा रहा है लेकिन ये अप्रत्याशित प्रोमोशन उसे प्रसन्न कर गया।

   ” तुम हो भी इस काबिल भास्कर! ऑफिस ने एकदम सही बंदा चुना है, अच्छा सुनो तुम्हें जल्दी ही जॉइन भी करना पड़ेगा। तुम्हारी वीज़ा प्रोसेसिंग भी कल से स्टार्ट होने जा रही है।”
 
   भास्कर की आंखे खुशी से चमक उठी, उसने आगे बढ़ कर अदिती के हाथ थाम लिये__” थैंक यू सो मच अदिती। ये सब तुम्हारे कारण ही हो पाया है।”

   ” ऐसा कुछ नही है भास्कर। याद करो वो कॉलेज का टाईम, तब भी तो तुम्हें गोल्ड मैडल मिला था उसमें मेरा कौन सा हाथ था। ये सब तुम्हारी मेहनत का परिणाम है बस…..
      
    भास्कर और अदिती वहाँ बैठे अपनी बातों में व्यस्त थे, बांसुरी वहाँ चलती गज़ल नाईट को सुनती गानों में खोयी हुई थी__

  मेरे दिल में तू ही तू है दिल की दवा क्या करू
  दिल भी तू है, जाँ भी तू है तुझ पे फ़िदा क्या करूँ
    मेरे दिल में तू…

  खुद को खो के, तुझको पा कर क्या-क्या मिला क्या  कहूँ
     तेरी हो के जीने में क्या आया मज़ा क्या कहूँ….

बांसुरी को गज़ल में खोये देख अदिती ने भास्कर की ओर देखा__

   ” एक बात पूछूँ भास्कर?”
    
     ” यस मैम!”

     “किसे धोखा दे रहे हो भास्कर?”

  ” क्या मतलब अदिती, क्या कहना चाहती हो?”

   ” यही कि ये लड़की तुमसे बिल्कुल प्यार नही करती ना ही तुम्हारी आंखों में ऐसा कुछ नज़र आता है। फिर आखिर तुम दोनो शादी कर क्यों रहे हो?”

   अदिती ने सारी बातें बहुत धीमी आवाज़ में कहीं थीं लेकिन भास्कर उसकी बात पर हड़बड़ा गया और कुछ तेज़ आवाज़ में ही बांसुरी से अपने मन की कह गया__

  ” ये देखो बांसुरी ये जो तुम्हारी गानों में खोये रहने की आदत है ना उसके कारण अदिती को ये लग रहा कि तुम मुझसे प्यार नही करतीं।”

   बांसुरी चौंक कर कभी भास्कर कभी अदिती को देखने लगी।।

   ” कम ऑन भास्कर, सीन क्यों क्रियेट कर रहे हो? तुम दोनो की ज़िंदगी है जो चाहो करो। मैने तो बस वो कहा जो इतने दिनों में तुम दोनो को देख कर महसूस किया।”

   अदिती के ऐसा कहते ही भास्कर को भी अपनी गलती समझ आ गयी, वो एक पढ़ा लिखा शरीफ लड़का था, इस तरह एक फाईव स्टार होटल में आकर बद्तमीज़ी करने वाला व्यक्तित्व उसका नही था। वो सर झुका कर चुप बैठा रहा।

    ” यार अदिती प्यार शादी के बाद भी तो हो जाता है ना? आखिर हमारे पेरेन्ट्स की कौन सी लव मैरिज थी, पर आज सुखी हैं ना?”

   “इसका मतलब तुम दोनो को एक दूसरे से प्यार नही है ना?
         मुझे गलत मत समझना भास्कर। बस ये कहना चाहती थी कि शादी कैसी भी हो लव या अरेंज लेकिन अगर दोनो पार्टनर अपने रिश्ते को संवारने की कोशिश नही करते तो उनका रिश्ता मज़बूत नही हो पाता। घर पर लगे गमले के छोटे से प्लाण्ट को भी पूरी हिफाज़त से पानी रसद देना पड़ता है  तभी तो फलता फूलता है।

    ” तो तुम्हें ऐसा लगता है कि हम अपने रिश्ते को समय नही दे पा रहे?”

   ” सिर्फ समय की बात नही है, तुम दोनो अपने रिश्ते को कुछ भी नही दे पा रहे। ना समय और ना प्यार। तुम दोनो के रिश्ते में मुझे  वो प्यार ही नही दिखता  जो दिखना चाहिए। सामने वाले को पाने का जुनून ,प्यार की हदों को पार कर जाने का जुनून , एक दूसरे को पाने का जुनून इसमें से कुछ भी तो नही है यार तुम दोनों में।
     जिस कपल की शादी को सिर्फ पन्द्रह दिन बचें हों वो साथ रहते हुए भी ऐसे साधू  से कैसे रह सकतें हैं। तुम दोनो में एक दूसरे को पाने की तड़प दिखाई ही नही देती। देखो हो सकता है मैं तुम दोनो को थोड़ा ज्यादा बोल्ड लग रहीं होंगी लेकिन मेरे लिये तो प्यार का यही मतलब है।”
     
   अदिती आगे अपनी बात कहते हुए गहरी नजरों से बांसुरी को देखने लगी…..
    
      ” मैं अपने प्यार को कभी उसकी कॉलेज की फ्रेंड के साथ गप्पे मारते छोड़ कर इतने सुकून से गज़ल नही सुन सकती।
      ना ही ऑफिस में उन्हें अकेले बातें करता छोड़ आगे बढ सकतीं हूँ। अब ये सफाई मत देने लगना की हमें एक दूसरे पर अटूट  विश्वास है एन्ड ब्ला ब्ला….
       मैं जानती हूँ यार प्यार प्लेटोनिक भी होता है लेकिन वो वहाँ होता है जहां सामने वाले के मिलने की उम्मीद खत्म हो जाती है, और उसके बिना संसार इतना सूना लगता है कि फिर किसी और के बारे में ऐसा सोचा ही नही जाता।
       तुम दोनो जो भी सोचो मेरा तो यही मानना है, मैं अपनी कहूं तो मैं मेरे प्यार को किसी से पल भर के लिये भी शेयर नही कर सकती। हाँ शादी के बाद एक उम्र के बाद जब मैच्योरिटी आ जाये तब की बात और है…..
   खैर मैं कुछ ज्यादा ही बोल गयी, वो क्या है ना दो पैग अन्दर जाते ही मेरे अन्दर की ज्ञान देवी जाग जातीं हैं और मैं ऐसे ही ज्ञान देने लगतीं हूँ।” 
      तुम्हें मेरी कोई बात बुरी तो नही लगी बांसुरी?”

   बांसुरी को अदिती में अपनी मुहँफट बड़ी बहन वीणा नज़र आ रही थी, उस पल उसे ऐसा लगा कि अदिती के गले से लग अपने सारे दर्द बहा दे, इतने दिनों की तड़प को बह जाने दे…… और वही हुआ।
    वो सोचती रही और उसके बिना इजाज़त दिये भी उसकी दोनो अन्खियाँ बह निकली।

    अदिती ने अपनी कुर्सी बांसुरी की ओर खींची और जैसे ही उसके कंधों पर अपना हाथ रखा , बांसुरी दोनो हाथों से अपना चेहरा छिपाये रो पड़ी।

   भास्कर कभी अदिती को कभी बांसुरी को आश्चर्य से देख रहा था, उसे आंखों से आश्वासन देती अदिती ने सांत्वना के शब्दों से बांसुरी को तसल्ली दी और इशारे से भास्कर को आगे बढ़ने कहा।
     भास्कर और अदिती के बार बार पूछने पर आखिर बांसुरी को हिम्मत बंधी और उसने ट्रेन में राजा से सीट बदलने से लेकर उसके साथ रहने और हर जगह मदद करने की बात के साथ ही पिंकी और रतन को मारने तक की सारी बात उन दोनो को बता दी।

    सारी बात सुनता भास्कर कभी परेशान हो वहीं चहलकदमी करने लगता कभी बैठे बैठे ही अपना सिर पकड़ लेता, लेकिन सारी बात खत्म होते होते में उसे बांसुरी की उलझन और परेशानी देख उस मासूम सी लड़की पर नाराज़गी की जगह तरस आने लगा।
   वो लोग रेस्तराँ के गार्डन साईड पर बैठे थे इसी से लोगों की नजरों से दूर उन्हें आराम से अपनी बातें करने का मौका मिल पा रहा था।

  ” बांसुरी एक बात पूछूँ?”
  बांसुरी ने बड़ी हिम्मत से भास्कर की ओर देखा__

  ” तुमने पिंकी का चेहरा नही देखा तो रतन का तो चेहरा देखा होगा?”

   बांसुरी के ना में सिर हिलाने पर वो आगे अपनी बात कहने लगा__
       ” तो तुम्हें कैसे पता चला कि वो दोनो पिंकी और रतन ही थे।”

   ” वहाँ मौजूद सभी यही कह रहे थे।”
  
   ” तो सभी को ये कैसे पता चला? क्या किसी ने भी देखा था चेहरा?”

  ” नही चेहरा तो देखने लायक नही था “

  ” किसने कहा?”

  ” बुआ जी ने।”

  ” और तुमने मान लिया?”
   
   ” पिंकी के हाथ में उसकी घड़ी थी।”

  ” वाह बांसुरी! लो मैं घड़ी उतार के देता हूँ तुम पहन लो, तो क्या तुम भास्कर बन जाओगी।”

  ” कहना क्या चाहते हो भास्कर?”

   ” सिर्फ तुम्हारी बातें सुन के मैं राजा को इतना जान गया की मुझे पूरा विश्वास है वो लाशें या तो पिंकी रतन की नही हैं या राजा ने उन्हें नही मारा किसी और ने मारा और राजा उन्हें उठा के लाया बस था। पर तुम्हारी बुद्धि को क्या हो गया बंसी तुमने कैसे इस बात पर इतनी आसानी से यकीन कर लिया कि राजा अपनी बहन को मार सकता है।
   अरे तुम्हारी दो दिन की दोस्ती के लिये उसने वर्षों से चली आ रही बलि की प्रथा को रोक दिया ऐसे लड़के पे तुमने अविश्वास किया कैसे बंसी ?”

   इतने दिनों से मन में चल रहा द्वंद आखिर चटक गया। अपने ही मन के जालों में उलझी बांसुरी की उलझनों को जैसे एक झटके में भास्कर ने साफ कर के हटा दिया।
     दिनों से जमें काले बादलों के बरस जाने से जैसे सारी ऊमस प्यार की बरसात में भीगती पल भर में उड़ गयी।

    अपने मन में चलती रागिनी से प्रसन्न खुश बांसुरी भास्कर और अदिती से क्या कहे क्या नही सोचती इतने दिनों बाद दिल खोल के मुस्कुरा उठी।

  अदिती ने अपनी जगह से उठ कर बांसुरी को गले से लगा लिया__

” हर बात का सोल्युशन है, बस हम ये गलती कर जातें हैं कि अपनी परेशानी किसी से शेयर करने लायक नही समझते या किसी को अपनी परेशानी बताने लायक नही समझते।”

  ” किन शब्दों में आपका धन्यवाद करुँ, आज आपने जो किया है अदिती वो तो खुद मैं मेरे लिये नही कर पा रही थी।”

  ” बांसुरी हूँ तो मैं भी एक लड़की ही, तुम्हारी परेशानी कैसे नही समझ पाती? मुझे बात तो नही पता थी लेकिन तुम्हें हमेशा खुद में खोया उलझा हुआ सा देख कर ये तो समझ ही गयी कि तुम किसी बात की चोट लिये बैठी हो, और ये बात तुम्हारे पीछे भी मैंने भास्कर से दो तीन दफा कही भी। आखिर आज तुम्हारे सामने भी खुद को नही रोक पायी।”

   अदिती भास्कर को देख मुस्कुरा उठी__

   ” भास्कर तुम मुझे तुम्हारी शादी तोड़ने का ज़िम्मेदार तो नही समझोगे ना?”

  ” अदिती मैडम मेरी शादी टूट गयी ये किसने कहा तुमसे?”

   बांसुरी और अदिती भास्कर को देखने लगे वो मुस्कुराता हुआ अपनी खाने की प्लेट में खाना सर्व करता मज़े से खाने लगा।
     उस दिन की शाम बांसुरी के जीवन में एक राहत ले आयी। अगली सुबह उसका जीवन किस मोड़ मुड़ने वाला था इससे बेखबर वो कई रातों बाद चैन से सो पायी थी।

   *********

    उसी रात महल के दीवानखाने में घर के सभी बड़ों के साथ बाहर से आये कुछ खास मेहमान भी बैठे इधर उधर की बातों में लगे थे।

  राजा के रिश्ते के लिये रानी साहेब ने जिनके आने की बात कही थी उनका किसी कारण से उस समय आना ना हो पाया और वो तेरहवॉं होने पर ही महल आ पाये थे।
   उन्होंने अपने मन में पहले ही राजा को अपना जमाता मान रखा था लेकिन गमी में हुई मुलाकात के कारण उन्हें उस वक्त कोई शुभ बात करना सही नही लगा और एक औपचारिक मुलाकात में राजपाट से सम्बंधित महत्वपूर्ण चर्चाएं कर दो दिन रुक कर उन्हे। वापस निकलना था।

   उनकी बेटी रेखा की भी विदेश से लौटने की तारीख आस पास थी, इसिलिए भोपाल से उसे लेने के लिये ठाकुर साहब को मुम्बई जाना था, जहां से रेखा को लिये वो अपने घर निकलने वाले थे।

    उनके सम्मान में कहें या कहें रेखा से मुलाकात की सोच कर रानी साहेब ने राजा को उन्हें मुम्बई तक छोड़ आने का काम सौंपा दिया।
    राजा वैसे भी यही सोच रहा था कि किस बहाने से और कैसे वो एक बार मुम्बई के लिये निकले, क्योंकि जितनी बेसब्री उसे मुम्बई पहुंचने की थी उससे कहीं अधिक बेसब्री से कानपुर में बैठा प्रिंस राजा और उसके अगले आदेश की प्रतीक्षा कर रहा था।

    मेहमानों को मुम्बई छोड़ने की सहर्ष स्वीकृति देने के बाद अपने कमरे में लौटा राजा बहुत दिनों के बाद चैन की सांस ले पा रहा था।
   उसे अगली सुबह ही मुम्बई निकलना था, उसे कुछ बेहद ज़रूरी काम निबटाने तो थे ही लेकिन साथ ही वो भी तो थी, जिससे एक बार मिल कर उसे अपने दिल का हाल बताना भी ज़रूरी हो चला था।

  *******

  दुनिया भले जो कहे लेकिन जिनका साथ ज़िंदगी भर का होता है , जिनकी राहें हमेशा संग चलने को बनी होतीं हैं उनके ग्रह नक्षत्र भी एक ही रास्ते चल पड़तें हैं तभी तो वो शाम राजा और बांसुरी दोनो के लिये एक सुकून की शाम बन कर लौटी थी।

      अपने फ्लैट की बालकनी के झूले पर बैठी बांसुरी बड़े दिनों बाद इतने सुकून से आने वाली सुबह के किये जाने वालों काम के बारे में सोच रही थी। सबसे कठिन था भास्कर से बात करना जो अनजाने ही आसान हो गया था। अब उसे अपनी माँ से बात करना था, वहीं मन ही मन वो खुद को एक बार फिर राजा से बात करने को तैयार कर रही थी।
    इधर अपनी बालकनी में बैठा राजा किसी बहुत ज़रूरी काम को निपटाने की रूपरेखा बनाता बीच बीच में बांसुरी को याद कर मुस्कुराता जाता था।
    अपने साथ मुम्बई चलने के लिये उसने प्रेम से भी कह दिया था।

   सामने वाली बालकनी को देखती राजा की थकी आंखें कब मूंद गईं उसे भी पता ना चला और एक बार फिर वहीं वो गहरी नींद में सो गया।

क्रमशः

aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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