जीवनसाथी-34

जीवन साथी–34

    इधर अपनी बालकनी में बैठा राजा किसी बहुत ज़रूरी काम को निपटाने की रूपरेखा बनाता बीच बीच में बांसुरी को याद कर मुस्कुराता जाता था।
    अपने साथ मुम्बई चलने के लिये उसने प्रेम से भी कह दिया था।

   सामने वाली बालकनी को देखती राजा की थकी आंखें कब मूंद गईं उसे भी पता ना चला और एक बार फिर वहीं वो गहरी नींद में सो गया।


  ********

   सुबह नाश्ता निपटने के बाद ठाकुर साहब को साथ लिये राजा प्रेम के साथ भोपाल एयरपोर्ट के लिये निकल गया।
    जाने से पहले सभी का आशीर्वाद लेने के बाद वो पिंकी की माँ के कमरे में जाकर उनसे भी मिल आया। जब से पिंकी गयी थी उसकी माँ ने खुद को अपने कमरे तक ही सीमित कर लिया था। ना वो बाहर निकल कर किसी से मिलतीं ना उनके कमरे में आने वाले किसी से मिलती। एक राजा के अलावा और कोई ना था जिसे उनके कमरे में प्रवेश की अनुमति थी।

     रानी साहेब ने ठाकुर जी के सम्मान में उनके साथ बहुत सा सामान रख दिया था, सभी सामान को गाड़ी में चढ़ाने के बाद प्रेम ने राजा को बुला लिया।
   अपनी सिक्योरिटी की फौज को साथ ना ले जाने के लिये राजा को अपनी छोटी माँ के सामने बहुत प्रयत्न करना पड़ा, फिर प्रेम के पास रखे हर तरह के सुरक्षा साधनों की तसल्ली के बाद ही उन्होंने राजा को बस प्रेम के साथ जाने की अनुमति दे ही दी।
     राजा को दही खिला कर बिदा करने के बाद उन्होंने छिप कर अपनी आंखें पोंछ ली।

    भोपाल एयरपोर्ट पहुंचने के बाद उसने घर पर छोटी माँ को कॉल किया और फोन बंद कर अपने आने वाले सफर के बारे में सोचता भीतर चला गया।


  ***********


     भास्कर ऑफीस में किसी ड्राफ्ट पे कुछ काम कर रहा था कि उसके साथ काम करने वाले सुदीप ने अपना कोई आर्टीकल करेक्शन के लिये उससे डिस्कस करने उसे बुला लिया।
     अपने काम को अधूरा छोड़ना उसे पसंद नही था लेकिन सुदीप के इसरार पर वो उसकी डेस्क पर चला आया।
   उसे जो पॉइंट्स सही नही लगे उन्हें सही करने का बोल कर वो वापस लौटने लगा तो सुदीप ने हर एक पॉइंट के बारे में अपने विचार रखने शुरु कर दिये और उन्हें सही साबित करने में लग गया।
   एक दो बार अपनी बात रखने के बाद भास्कर का दिमाग गर्म होने लगा __

  ” यार जब मेरी बात सुननी ही नही थी तो ये एडवाइस लेने का शो ऑफ़ करने की क्या ज़रूरत थी।”

  ” मैं कोई शो ऑफ़ नही कर रहा। जानना चाहता था इसिलिए पूछा लेकिन तुम तो अपने मन की थोपना शुरु कर देते हो।”

  उन दोनों की चीखाचिल्ली सुन सारा ऑफिस उन्हें देखने लगा। बांसुरी भी अपने क्यूबिक से निकली वहाँ पहुंच गयी। तब तक में अदिती भी चली आयी।
    उसने आकर सभी को अपनी डेस्क पे जाने कहा और सुदीप को भी उसकी डेस्क पे भेज दिया जब सब वहाँ से चले गये तब भास्कर को अपने केबिन में अपने साथ लेकर जाते हुए अदिती ने पिओन को दो कप चाय लाने भी बोल दिया।

  ” लो गर्मागरम चाय पियो और दिमाग को ठंडा कर लो”

  ” मैं ठंडा ही हूँ यार! वही बकवास कर रहा था।”

  ” एक्सक्यूज़ मी । यू आर नॉट ठंडा, यू आर हॉट एक्चुली।”
       अदिती की बात सुन इतने गुस्से में भी भास्कर को हँसी आ गयी…

  ” बहुत बोल्ड हो गयी हो आजकल।”

  ” ना जी बोल्ड वैसे नही हुई, बस ज़बान ज़रा ज्यादा चलने लगी है।”

   भास्कर अदिती को देख मुस्कुरा दिया__

  ” परेशान हो ना भास्कर?”

  उसने बिना कोई जवाब दिये अपनी आंखें झुका ली

  “आज सुबह से तुम्हें देख रही हूँ। लगातार काम कर रहे हो, कोई टी ब्रेक तक नही लिया?

  ” मैं तो वैसे भी चाय कॉफ़ी कम ही पीता हूँ।”

  ” हम्म यार बड़े बोरिंग बंदे हो, चाय कॉफ़ी नही पीते ये तो ठीक है लेकिन तुम तो दारु भी नही पीते।”
    अपनी बात पूरी कर वो उसे देखने लगी। और अदिती की बात सुन वो ज़ोर से हँस पड़ा

” चाय कॉफ़ी की आदत फिर भी डाल लूंगा लेकिन दारु तो कभी नही।” भास्कर ने अपने कान पकड़ लिये

  ” वैसे अदिती तुम हंसाती बहुत हो, तुम्हारी बातें सुन के हँस हँस के बुरा हाल हो जाता है मेरा।”

   ” और तुम्हारी ये खोखली हँसी देख कर मेरा रोने का जी करने लगता है।”

  ” व्हाट डू यू मीन अदिती?”

  ” जब तुम्हारे जैसा सीरियस बंदा बात बात पर इतना ज़ोर से हँसे ना तो समझ जाओ पक्का अन्दर ही अन्दर टूटा हुआ और परेशान है वो। भास्कर एक ऐसी लड़की जो तुमसे बिल्कुल प्यार नही करती के साथ सारी ज़िंदगी परेशान रहने से तुम्हारी आज की परेशानी कहीं बेहतर है।
  अभी रो धो कर खुद को समझा भी लोगे लेकिन ऐसी शादी में जहां प्यार ही ना हो निभाना बहुत कठिन हो जाता है, और खास कर तब जब सामने वाला प्यार बनाये रखने के लिये कोई कोशिश भी नही करना चाहता हो। मैं ये सब इतने करीब से इसलिये समझ सकती हूँ क्योंकि मैंने अपने पेरेंट्स को अपनी शादी बचाने के लिये ज़िंदगी भर जूझते देखा है, और आखिर क्या हुआ दोनो सारी ज़िंदगी अपने रिश्ते को ढ़ोते रहे।
     अपनी असफल शादी का बोझ उन पर इतना भारी रहा कि दोनो ही कभी उससे उबर नही पाये।
पहले पहले जब झगडे होते थे तो बड़े बुजुर्गों ने समझाया एक आध बच्चा हो जाये सब ठीक हो जायेगा, फिर मैं हो गयी। मैं तो आयी लेकिन समस्याओं का समाधान नही ला पायी। बल्कि मेरे पैदा होने के बाद दोनो के झगड़े और बढ़ गये।
    दोनो ने एक दूसरे की अपेक्षाएं पूरा करने के लिये कभी कुछ नही किया लेकिन एक दूसरे से अपेक्षाएं खूब रखीं।”

    अदिती की आंखों में छलक आये आँसू भास्कर से भी नही छिपे रह सके।

धीरे से दरवाज़ा खोल कर बांसुरी भीतर चली आयी__

  ” आई एम सॉरी मैम, अगर कुछ पर्सनल है तो मैं बाहर चली जाती हूँ।”

  ” ओह नो बांसुरी! कम इन।”

    वहाँ रखी चाय ठंडी हो चुकी थी पर ना भास्कर ना अदिती किसी ने उसे छुआ तक नही था।

   ” बोलो बांसुरी? तुम्हें जो आर्टीकल दिया था वो कम्प्लीट हो गया”

   ” हाँ हो गया मैम, मैं वही दिखाने आयी थी।” बांसुरी ने चोर नजरों से भास्कर की ओर देखा वो उसे अपनी तरफ देखते ही दुसरी ओर देखने लगा।

   ” ओके बांसुरी। तुमने मेरा काफी काम आसान कर दिया। गाईज़ अगर तुम दोनो चाहो तो हम कहीं बाहर चल सकतें हैं, वैसे भी शाम तो हो ही गयी है। मुझे किसी को एक पैकेट भी पहुँचाना है महालक्ष्मी के पास।

   ” मैं तो चल सकती हूँ। मुझे महालक्ष्मी मन्दिर में दर्शन भी  करना है ।”

   बांसुरी ने अदिती को देख कर  जवाब दिया फिर भास्कर की ओर देखने लगी, भास्कर ने उसे देख कर इशारे से ही ” क्या है ” पूछा?

    ” मुझसे नाराज़ तो नही हो भास्कर?”

   भास्कर ने सिर झुका लिया, उसे चुपचाप देख अदिती ने अपना पर्स उठाया और भास्कर को हाथ पकड़ कर खड़ा  कर दिया__” चलो आज हम गर्ल्स के साथ डे आउट कर लो भास्कर।

   तीनों वहाँ से महालक्ष्मी के लिये निकल चले।

********

    मुम्बई में उतरते ही राजा ने अपना फ़ोन ऑन कर पहुंचने की खबर घर पर दी और प्रिंस को फ़ोन लगाने लगा।
   
    राजा के फ़ोन में बात करते में ही प्रेम ने सामान समेट कर वेटिंग लाउंज में ठाकुर साहब को बैठाया और उन्हें एक  कप कॉफ़ी पकड़ा कर राजा के पास चला आया।

    ” प्रेम ठाकुर साहब की बेटी आ जाये फिर उन्हें उनकी गाड़ी में बैठा कर हमें महालक्ष्मी मन्दिर चलना है। प्रिंस से बात हो गयी है, वो लोग भी आज निकल जायेंगे, कल शाम तक यहाँ पहुंच जायेंगे।”

   ” अच्छी बात है हुकुम! हम प्रताप को भी बता देतें हैं कि हम बॉम्बे पहुंच गये हैं।”

   राजा ने हाँ में सिर हिलाया और अपना फ़ोन लिये थोड़ा दूर खिसक कर खड़ा हो गया।
    कॉन्टैक्ट लिस्ट में नम्बर स्क्रोल करते हुए बांसुरी पे नज़र पड़ते ही उसकी उँगलियाँ वहीं थम के रह गयी। उस नाम पर उंगलियाँ फिराते हुए वो मुस्कुरा उठा__

  ” मैं आ गया हूँ बांसुरी। अब कल जो काम है उसके लिये मुझे तुम्हारी ज़रूरत तो पड़ेगी ही।

   मुस्कुरा कर उसने बांसुरी का नम्बर डायल कर दिया।

******

   ” कम ऑन भास्कर आज तुम्हें अपनी जान से प्यारी गाड़ी की ड्राइविंग सीट सौंप रहीं हूँ, मेरी जान को संभाल कर रखना।”

    अदिती ने भास्कर का मूड सही करने के लिये उसके सामने अपनी गाड़ी की चाबी बढ़ा दी।

  असल में पिछली शाम बांसुरी के सब कुछ बताने के तुरंत बाद भले ही भास्कर खुद को बिल्कुल सामान्य दिखाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसी समय उसका बांसुरी से झगड़ा ना करना, शिकायत ना करना, और हँसते मुसकुराते खाना खाते रहना अदिती को कुछ सही नही लगा  था।
    रहा सहा शक तब दूर हुआ जब रात में अचानक किसी काम से उसे ऑफिस लौटना पड़ा। उसे यही पता था कि फिलहाल भास्कर बांसुरी के कमरे पर ही रुका था पर वहाँ ऑफिस में भास्कर को उसके केबिन में छोटे से सोफे में सोता देख उसका दिल कसमसा कर रह गया था। उसने कांच के पास जाकर अन्दर झाँका तो देखा भास्कर कमरे की छत देखता चुपचाप पड़ा हुआ था।
    अदिती का उसी समय उसके केबिन में जाने का मन हुआ लेकिन समय की नज़ाकत देखते हुए वो अपना काम निपटा कर वापस लौट गयी।

   अगले दिन भी सुबह से उसने भास्कर को बिना खाये पिये काम में भिड़े देखा इसके साथ ही सदा का तेज़ तर्रार बात बात पर शेर सा गरजते रहने वाला भास्कर चुपचाप काम में लगा था। उसकी तकलीफ अदिती समझ रही थी लेकिन वो ये भी जानती थी कि किसी घाव को ठीक करने के लिये उसमें दवा लगानी ही पड़ती है। दवा लगाने से होने वाली जलन से बचने के लिये घाव को खुला छोड़ देने से वो नासूर बन जाता है।
   इसिलिए उसकी बातें भले ही भास्कर को कड़वी लगें लेकिन वो किसी भी हाल में अपने दोस्त के ज़ख्म को नासूर बनता नही देख सकती थी।

    बांसुरी के कोमल हृदय को भी वो इतने कम समय में अच्छे से समझ गयी थी। उस लड़की को वाकई ऐसे हमसफर की ज़रूरत थी जो उसे संभाल के रख सके।

    भास्कर ने चाबी अदिती को वापस कर दी__ ” तुम ही ड्राइव करो।”

   बांसुरी पहले ही पीछे बैठ चुकी थी, भास्कर के सामने बैठते ही अदिती ने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

    गाड़ी थोड़ा ही आगे बढ़ी थी कि बांसुरी का फ़ोन घनघना उठा।
   उसने पर्स से फ़ोन निकाला, उसे लगा उसके पीछे से ऑफिस से निरमा का फ़ोन होगा लेकिन उसकी धड़कन एकदम से राजा का स्क्रीन पे नाम देख कर तेज़ हों गईं।
     सब के सामने फ़ोन उठा लूं या नही वो सोचती रही और फ़ोन कट गया।

  *******

   बांसुरी के एक बार में फ़ोन ना उठाने पर राजा फ़ोन बंद कर प्रेम के पास चला आया, आते ही उसने उसके कंधे पर हाथ रखा जिससे प्रेम का ध्यान फ़ोन पर से हट कर राजा पे चला गया, वो भी राजा को देख मुस्कुरा दिया। उसी समय प्रताप ने फोन उठा लिया__

  ” कहाँ हो छोटे, हम और हुकुम पहुंच गयें है बॉम्बे।”

  ” ओह्ह भाई मैं बहुत बहुत खुश हूँ कि आखिर आपने समय निकाल ही लिया। सुनिये आपको अपने फ्लैट का एड्रेस मेसेज कर रहा हूँ। आप यहीं चले आइएगा। आप बिल्कुल परेशान मत होना आपके हुकुम के रहने लायक है मेरा फ्लैट।”

    उसकी बात सुन प्रेम और राजा दोनों ज़ोर से हँस पड़े, फोन के स्पीकर में थोड़ा झुक कर राजा प्रताप से बात करने लगा।

  ” हमारी चिंता मत करो प्रताप। तुम अपना काम निपटा लो, फिर शाम को तुम्हारे फ्लैट पे मिलेंगे।”

  ” अरे कहाँ मिल पायेंगे राजा भैया। आप लोगों की आदत है सरप्राइज़ देने की और इस बार आप लोगों को ही सरप्राइज मिल गया। मैं किसी काम से लोनावाला आया हुआ हूँ, परसों सुबह वापस लौटूंगा।
मेरे फ्लैट की चाबी बाजू वाली जोशी आँटी के पास रहती है, उनसे लेकर आप लोग वहाँ आराम करो, मैं परसो आकर मिलता हूँ।”

   ” कोई बात नही छोटे तू अपना काम निपटा ले, हमें और हुकुम को भी कल काम है। उसके बाद आराम से मिलतें हैं। और फ्लैट में रुकने के लिये एक बार हुकुम से पूछ लूं फिर बताऊंगा।”

  ” इसमें क्या पूछना प्रेम? प्रताप के रूम पर ही रुकेंगे।”

    प्रताप से बात कर दोनो दोस्त वेटिंग लाउंज की ओर वापस बढ गये।
    ठाकुर साहब द पायोनियर के पन्ने पलटते बैठे अपनी राजकुमारी का इन्तजार कर रहे थे।
   कुछ इधर उधर की बातों के बाद तीनों साथ बैठे रेखा का इन्तजार करते रहे, कुछ एक डेढ़ घण्टे में रेखा की फ्लाइट भी आ गयी।

    बेज़ पैंट और मैरून टॉप के ऊपर लम्बा सा श्रग डाले अपने छोटे कटे बालों के ऊपर धूप का चश्मा चढ़ाये रेखा दूर से ही हाथ हिलाती चली आयी।
    अपने पिता से मिलने के बाद उसने राजा की ओर हाथ बढ़ा दिया। राजा ने हाथ आगे बढ़ाने की जगह अपना बायां हाथ सीने पर रख कर प्रणाम की मुद्रा में हल्का सा झुक गया।
    रेखा के पिता प्रेम के साथ रेखा का सामान लेने बेल्ट पे चले गये।

    और वो राजा को देख मुस्कुरा उठी__

” हम याद हैं आपको। पहली बार तो बहुत छोटे थे तब मिले थे और दुबारा रूपा दीदी की शादी में।”

  ” जी बिल्कुल आप याद हैं मुझे।”

   ” तो फिर हाथ क्यों नही मिलाया? हमें कोई छूत की बीमारी है क्या राजकुमार अजातशत्रु जी”

  ” मैं जानता हूँ प्रिंसेस !आपको कोई बीमारी नही है, असल में बीमारी आपको नही मुझे है।”

  ” क्या हुआ है आपको ?”

  ” अभी कुछ दिनों पहले दाहिने हाथ में गलती से गोली लग गयी थी, तब सही समय पर डॉक्टर ने गोली तो निकाल दी लेकिन ये हाथ ठीक नही हुआ।”

  ” मतलब?”

  ” मतलब इस हाथ से मैं बिल्कुल बेज़ार हूँ, मेरा मतलब निकम्मा। ये हाथ लगभग बेकार हो गया है। ना कुछ पकड़ पाता हूँ, ना हिला डुला पाता हूँ। पता नही कभी ठीक भी हो पायेगा या नही।”

अब तक आंखों ही आंखों में राजा को पीती रेखा का ध्यान अब उसके हाथ पर जाकर अटक गया…

    कुछ थोड़ी बातों के बाद रेखा और उसके पिता ने राजा और प्रेम से विदा ली और अपने घर के लिये निकल गये। उनकी रियासत से उन्हें लेने के लिये भी गाड़ियों की फौज वहाँ मौजूद थी।
    हालांकि ठाकुर साहब के लिये राजा के हाथ से ज्यादा मायने विजयराघवगढ़ की गद्दी थी , जिसपे उनका होने वाला दामाद बैठने वाला था।
    राजा महाराजों की बात ही अलग होती है उनका एक आध हाथ पैर ना भी चले तो कौन बड़ी बात है।

   उन लोगों के निकलते ही राजा पूरे उत्साह से प्रेम के साथ मन्दिर के लिये निकल पड़ा।


   कैब बुक करने के बाद कैब ड्राईवर को पीछे की सीट पर भेज प्रेम को बाजू वाली सीट पर बैठा कर राजा खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। थोड़ी परेशानी तो अब भी थी लेकिन इतनी नही कि उस हाथ से गाड़ी ना चलायी जा सके।
   प्रेम राजा को देख मुस्कुरा उठा__

” आप नही सुधरेंगे हुकुम”

  प्रेम की बात पर राजा ठहाका लगा कर हँस दिया। पीछे बैठा ड्राईवर दोनों को आश्चर्य से देखता रहा__

  ” साब कहीं नाका पे पेपर चेक हुआ ना तो मेरा लाइसेंस खतम हो जायेगा।


  ” साहब बहुत खुश हैं बेटा। तो उन्हें कुछ देर चला लेने दे , नाके के पहले ही साहब तेरी गाड़ी तेरे हवाले कर देंगे। ठीक है?”

” हाऊ साब।”

  *********

    महालक्ष्मी मन्दिर में बांसुरी को उतार कर अदिती भास्कर के साथ आगे अपने काम से निकल गयी। उसे मरीन ड्राइव पर एक बुक किसी से लेनी थी और उसे कुछ पैकेट देना था, अपना काम पूरा कर वो भास्कर से कुछ देर वहीं बैठने की ज़िद कर बैठी__

  ” बांसुरी वहाँ अकेली हो जायेगी अदिती। इसिलिए वापस चलतें हैं।”

  ” क्यों अब भी इतनी चिंता कर रहे हो उसकी। उसे जाने दो भास्कर…..
   

  ” मैंने कब रोका है बांसुरी?”

  ” बांसुरी नही अदिती! मैं अदिती हूँ।
मेरी बात सुनो तुम उसे जान बूझ कर तो नही रोक रहे लेकिन तुम्हें ऐसे देख वो ना तो तुम्हें पूरी तरह से छोड़ पायेगी और ना राजा को अपना पायेगी। तुम्हारे कारण तीन ज़िन्दगियाँ ऐसे ही मझधार में रह जायेंगी भास्कर।
      मैं समझती हूं इतने लम्बे रिलेशन से बाहर निकलने में वक्त तो लगता है लेकिन एक बात और है वो ये कि तुम जैसे सोचोगे ज़िंदगी वैसी होती जायेगी। जब तक तुम उसे याद कर कर के रोते रहोगे तुम्हारी ज़िंदगी भी रोती रहेगी लेकिन जिस दिन तुम आगे बढ़ गये तुम्हारी ज़िंदगी भी आगे बढ़ जायेगी।
   भास्कर खुद को मत रोको, अगर गुस्सा आ रहा है तो ज़ोर से चिल्लाओ अपनी सारी फ्रस्ट्रेशन निकाल लो। अगर रोना आ रहा तो ज़ोर ज़ोर से रो लो। कुछ मत रखो अपने अन्दर…..
    अगर बांसुरी पर नाराज़ हो तो वो सारी नाराज़गी किसी और पर निकाल लो, जैसे मुझ पे।
   वैसे इस सब में बांसुरी की कोई गलती भी नही, गलती तो मेरी ही है। ना मैं कल इतना सब बोलती और ना तुम दोनों का रिश्ता ऐसे अधर में अटक जाता।”

  ” इसमें तुम्हारी क्या गलती अदिती, बल्कि तुम्हारे कारण बांसुरी सच्चाई बोल पायी, वर्ना वो डरपोक नादान लड़की शायद संकोच में शादी ही कर जाती और सही कह रही हो तुम हमारा दोनो का जीवन बर्बाद हो जाता…….
  

  ” पता है भास्कर हम अपने असल दुख से कम दुखी होतें हैं हम ज्यादा दुखी इस बात से हो जातें हैं कि अब लोग क्या कहेंगे, जैसे अभी तुम्हें लग रहा होगा कि सगाई टूट गयी तो मॉम डैड का क्या होगा, रिश्तेदार क्या सोचेंगे ऐंड ब्ला ब्ला…..
 
  वो एक सॉन्ग है ना — मतलबी हो जा ज़रा मतलबी । दुनिया की सुनता है क्यों खुद की भी सुन ले कभी।
     
     माइंड मत कर लेना गाने वाली बात मज़ाक ही है लेकिन सुनो भास्कर कल को जीवन तुम्हें अपने जीवनसाथी के साथ निभाना है उन्हें नही। मैं ये नही कह रही कि अपने घर परिवार के बारे में मत सोचो,मेरा बस ये कहना है कि थोड़ा खुद के लिये भी सोचो यार! तुम स्मार्ट हो डैशिंग हो लड़कियों की लाइन लग जायेगी तुम्हारे लिये।”

  अदिती की बात पर भास्कर खुल कर हँस पड़ा

  ” अब आप कंसोल करना बंद किजीये मैडम, मैं ठीक हूँ।”

” पक्का?”

” हम्म”

अदिती उसे देख मुस्कुरा उठी , दोनो वहाँ से उठे और मन्दिर बांसुरी को लेने वापस चल दिये……

   ” अभी तुम्हारे और हीलिंग सेशन्स लेने हैं मुझे”

   ” बिल्कुल मैडम जब चाहे तब ले लीजियेगा।”

    अदिती के साथ मन का गुबार निकाल कर भास्कर अब काफी हल्का महसूस कर रहा था। एक अलग से हल्के पन के साथ वो बीच बीच में अदिती पर भी एक नज़र डाल लेता था।
    एकदम पागल और सरफिरी लड़की है, वर्ना कौन बिना किसी स्वार्थ के अपने एम्प्लायी के लिये इतना करता है ये और बात थी कि भास्कर अदिती के लिये सिर्फ एम्प्लाई से कहीं अधिक था जो वो खुद अब तक नही जान पाया था।

  *******

    कल डिनर पर अपने मन की कह कर जितना सुकून बांसुरी ने महसूस किया था वो अगली सुबह तक कुछ कुछ चूकने लगा था।
    डिनर से लौटते वक्त भास्कर उसके साथ नही लौटा था , वहाँ तक भी ठीक था लेकिन सुबह से वो भास्कर के स्वभाव में अन्तर महसूस कर पा रही थी।

  पर अब उसके हाथ से सारी बातें निकल चुकी थीं, अब वो चाह कर भी भास्कर की कोई मदद नही कर सकती थी। उसने आज तक एक अपने बारे में छोड़ कर सबके बारे में सोचा था, लेकिन अब वो खुद के बारे में भी सोचना चाहती थी।
   माता के सामने हाथ जोड़े खड़ी वो मन ही मन माता से सभी की कुशलता की कामना कर रही थी की पण्डित जी की आवाज़ सुन चौंक कर उसने आंखे खोल दी__

” सदा सौभाग्यवती रहो। शिव पार्वती सी जोड़ी सदा सदा बनी रहे।”

   उसने चौंक कर अपने बाजू में देखा तो उसकी आंखे खुली की खुली रह गयी।
   ये यहां कैसे आ गया? उसे एकदम से अपनी आंखों पर भरोसा नही हुआ , उसके बाजू में खड़ा राजा मुस्कुरा रहा था।
   हाथ बढ़ा कर उसने पण्डित जी से प्रसाद लिया और प्रसाद वाला हाथ बांसुरी की ओर बढ़ा दिया।

   बांसुरी को उसे देखते ही अपने इतने सारे आंसू, इतने दिनों की कशमकश, पिंकी रतन सब याद आ गये और वो उसे अनदेखा कर आगे बढ गयी__

  ” रुक जाओ बांसुरी! सुनो तो सही मेरी बात।”

  ” अब क्या बचा सुनने के लिये राजा?”

  ” अभी सुना ही क्या है जो कह रही हो कि सुनने के लिये क्या बचा?”

   बांसुरी आगे बढ़ती सीढिय़ां उतर गयी, उसके पीछे राजा भी जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतरता गया

  ” अरे शताब्दी एक्सप्रेस रुक भी जा ”

  ” क्यों ?क्या करूंगी रुक कर।”

  ” कुछ नही करवाउन्गा। पर बात तो सुन लो”

   बांसुरी नीचे की सीढियों पर जाकर बैठ गयी, राजा भी उसके करीब आकर थम कर खड़ा रह गया।बांसुरी ने चेहरा ऊपर कर उसकी तरफ देखा__

” क्या है? बैठ भी जाओ अब । बोलो क्या बोलना था।”

   ” थैंक यू। कम से कम अपने शहर में तुमने मुझे पहचान तो लिया वर्ना कहाँ जाता मैं?”

” क्या बोल रहे हो राजा? कुछ भी ? तुम अच्छे से जानते हो कि पिंकी के साथ जो हुआ …..

  ” बांसुरी पिंकी के साथ जो हुआ सो हुआ, भूल जाओ उस बात को। देखो ये सब राज महल की बातें हैं अभी तुम्हें कुछ भी समझाना मुश्किल है। ”

राजा की बात सुन बांसुरी उठ कर जाने लगी तब एक बार फिर राजा ने उसे पीछे से आवाज़ देकर रोक लिया__

  ” अरे लेकिन मेरी बात तो सुनो। मुझे तुम्हारी एक मदद चाहिए प्लीज़।”

बांसुरी ने घूर कर एक नज़र राजा को देखा__” क्या ”

  ” बताता हूँ, दो मिनट ठहर कर सांस तो ले लूँ। भाग भाग कर थक गया हूँ।”

   राजा वहीं दीवार के सहारे टिक कर खड़े हुए बांसुरी को देख मुस्कुराता रहा, बांसुरी धीमे कदमों से चलती उसके पास चली आयी, तभी प्रेम हाथ में पेडों का प्रसाद लिये उन तक चला आया।

क्रमशः

aparna..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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