जीवनसाथी – 36

  जीवन साथी – 36

     सुबह !
          हर एक सुबह अपने साथ कई नई उमंगे आशायें,सपने उनको पूरा करने की कोशिश, उस कोशिश की सफलता असफलता जाने कितना कुछ खुद में समेटे आती है।
     उन सपनों और कोशिशों के बीच की जद्दोजहद है ज़िंदगी ! सब अपने सपनों सा साकार हुआ तो खुशनुमा वर्ना दुखों का पहाड़ सी ज़िंदगी।
    ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव पार करने में इन्हीं थकी हुई सी रातों और उमंगों से भरी सुबहों का हाथ ही तो होता है।
  हर गहरी अंधियारी के बाद एक आस का उजेला छाता है और हर किसी को खुद में समा लेता है।

    कई रातों की जागती आंखों के बाद राजा चैन से सो पाया था। उसकी ज़िंदगी बचपन से ही दुखों के साये में ही बड़ी हुई थी। ममता की छाँव उसी समय सर से सरक गयी जब उसे सबसे अधिक माँ की ज़रूरत थी।
    बच्चों को भी इतनी समझ होती है कि कहाँ ज़िद करनी है और कहाँ शरारतें।
कहने को महल में दो दर्ज़न से अधिक रिश्तेदार थे लेकिन एक बिना माँ के लड़के के नखरे सहने को कौन तैय्यार होता। दादी ने पूरी उम्र स्वतंत्रता सेनानी की बीवी की पदवी को ओढ़ कर निकाल दी थी उसके बाद अब उम्र की सन्ध्या बेला में अपने ओहदे से इतर बात बात पे रिरियाते बच्चे को सम्भालना कहाँ शोभा देता।
   बुआ की अपनी गृहस्थी थी। छोटी माँ खुद दो जुड़वा लड़कों  की माँ बनी इठला रहीं थीं। बचती थीं काकी माँ  यानी पिंकी की माँ! एक वही थी जो जितना बन पड़ता अपनी तरफ से हर सम्भव प्रयास करतीं कि युवराज और राजकुमार को माँ की कमी ना खले।पर किसी के सोच लेने से या कुछ प्रयास कर लेने से एक बच्चे को माँ की कमी नही खले ऐसा कैसे सम्भव है, और ना ही इसका कोई उपाय है।
   लेकिन उस एकाकी बचपन में मिले काकी के स्नेह का भार राजकुमार ने जीवन भर सीने से लगाये रखा, इसलिये काकी की बीमारी में पिंकी को बहन नही बेटी मान कर प्रेम किया। मात्र चार बरस का अन्तर होने पर भी राजा पिंकी का बड़ा भाई नही पिता ही बना रहा।
    पिंकी की समस्या राजा के जीवन की चुनौती हो उठती और राजा की चुनौतियां पिंकी के जीवन का भार।
   
                इतने स्नेहिल रिश्ते में अविश्वास का कोई तंतु कहीं भी ना था। देखने वालों की निगाहों का फेर था बस।
    और था राजा का रचा दृश्य जिसमें देखने वाले महल वासियों की आंखें ऐसी चुन्धिया गईं कि फिर सत्य असत्य का कोई फेर ना बचा।

   महल के रिचुअल्स निभाता कदम कदम पर उनकी हर बात सुनता और मानता राजा जैसे कोई और ही नया व्यक्तित्व बन चुका था। सारे आडम्बरों की ओट में खुद को छिपाते छिपाते वो भी थक चुका था, इसिलिए ठाकुर साहब के साथ मुम्बई निकलने पर उसकी खुशी का ठिकाना ना था।

  इतने दिनों बाद मुम्बई में खुल के सांस लेता राजा एक बार फिर अपने कॉलेज के दिनों का राजा बन चुका था।
     बांसुरी से मिल कर उसकी खुशी दुगुनी तिगुनी हो चुकी थी, वो खुद भी बांसुरी के लिये अपने मन की कोमलता से अपरिचित नही था लेकिन अपने खुद के लिये आज तक किसी से कुछ मांगना उसने सीखा ही नही था।
   उसे आज तक जो मिला और जो नही भी मिला सभी के लिये वो ऊपर वाले को धन्यवाद देता किसी बात की शिकायत करना जानता ही कहाँ  था।

   अभी भी वो सिर्फ बांसुरी से मिल कर ही खुश था उसे अब भी यही मालूम था कि कुछ समय में बांसुरी का विवाह होना निश्चित था।
    राजकुमार वर्तमान में जीने वाला व्यक्ति था, हो सकता है इसके पीछे का एक कारण उसकी जान पर हुए लगातार हमलें भी हों। लेकिन वो वर्तमान को ही मह्त्व देने वाला था और उसी में जीने वाला।

    आज वो बहुत खुश था क्योंकि आज उसके लिये अब तक की उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन जो था। पिछ्ले पन्द्रह दिन से चलने वाले नाटक का आज पटाक्षेप होना था।

    बांसुरी को मदद के लिये बुलाने का एक कारण ये भी था कि उसे अगली शाम ही वापस लौटना था उसके पहले वो चाहता था जितना हो सके समय वो उसके साथ बिता ले, उसके बाद तो बस वो और उसका महल और महल के कायदे और काम!

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  रात बहुत देर तक अपना आर्टीकल पूरा करने के बाद दो तीन बार ठीक से पढ़ कर जब बांसुरी ने तसदीक कर ली तब उसे निरमा को मेल कर दिया, साथ ही कुछ ज़रूरी फोटोग्राफ मेल करने के बाद उसने समय देखा घड़ी रात के तीन बजा रही थी।

     लैपटॉप बंद करने के बाद उसने अपना फ़ोन उठाया , वॉट्सएप्प खोला …. राजा के प्रोफाइल पर गयी… राजकुमार अजातशत्रु! उसे हँसी आ गयी, इतना बड़ा नाम है कि एक साथ स्क्रीन पर आता तक नही।
   ये जानते हुए भी कि उसकी तरफ से कोई बिना ज़रूरत का मेसेज नही आया होगा उसने वॉट्सएप्प खोला था लेकिन उसके आश्चर्य की सीमा ना रही जब राजकुमार के नाम पर दो नोटिफ़िकेशन दिखा रहा था। उसने झट से मेसेज खोला__

   सिटी मॉल, शार्प एट 11 लिखा था।
   नीचे वहाँ का मैप शेयर किया हुआ था।

  बांसुरी ने अपने माथे पर हल्का सा हाथ मार लिया!
              और क्या उम्मीद की जा सकती थी राजा जी से।
    अपनी जनता को ऐसे ही रूखे आश्वासन देने वाला खडूस राजा और भेज भी क्या सकता है।
   मिस यू बांसुरी के मेसेज की उम्मीद करना ही बेकार है।
    वो हँस कर फ़ोन बंद करने ही जा रही थी कि राजा के नाम के साथ ही ऑनलाइन दिखाने लगा, उसने घबरा कर फ़ोन बंद किया और सोने चली गयी।

     वैसे तो सुबह जल्दी उठने की आदत थी उसकी लेकिन रात देर तक जागने से उसने तय समय पर बजने वाले अलार्म को बंद किया और फिर सो गयी।
    कुछ समय ही बीता होगा कि बाथरूम से आती आवाज़ों से बांसुरी की नींद खुल गयी।

  ” क्या हुआ निरमा? तबीयत खराब है क्या? सुबह सुबह उल्टियाँ कैसे हो गयी?

   ” पता नही बांसुरी, कल असल में ऑफिस से लौटते हुए पानीपूरी खा ली थी, लगता है वही सूट नही की। तुम क्यों जाग गयी थोड़ी देर और सो लो।”

   ” अब तो नींद खुल ही गयी , मैं जा रही अपने लिये चाय बनाने, तुझे भी चाहिये?”

   ” नही बंसी , तू पी ले। मैं आजकल चाय नही पी रही।”

    चाय पीकर बांसुरी अपना बचा हुआ काम निपटा कर नहाने चली गयी, उसके नहा कर आते में ही निरमा ऑफिस के लिये तैय्यार हो चुकी थी।
 
    निरमा के ऑफिस के लिये निकलने के बाद वो नीचे रसोई में मामी जी का हाथ बटाने चली आयी। मामी ने उसे मना भी किया लेकिन उनसे बहुत ज़िद कर उसने आलू उबालने रखे और आटा लगा कर सबके नाश्ते की तैय्यारी करने लगी।
    
    ग्यारह बजे पहुंचना था , बांसुरी पन्द्रह मिनट पहले ही पहुंच चुकी थी। वहाँ पहुंच कर इधर उधर घूमते उसे पांच दस मिनट ही हुए होंगे की राजा और प्रेम भी चले आये__

   ” नाश्ता कर के आये हो?

    बांसुरी के सवाल पर दोनो हीं चौंक गये, बांसुरी के दिमाग से भले ही उतर गया हो लेकिन था तो राजा रॉयल फैमिली का जहां के नियम कायदे उसके खून में घुले थे, बचपन से एक नियत समय पर खाते अब इतनी आदत हो गयी थी कि बिना दरवाज़े पर बजी घंटी के नींद खुल जाती थी और ठीक नौ बजे भूख लग आती थी। दोनो अच्छे से खा पीकर ही आये थे।

” क्यों ? तुम नाश्ता लेकर आई हो? ” पूछने तक में राजा ने उसके बड़े से बैग में रखा टिफ़िन बॉक्स देख लिया था।

   ” हाँ मुझे लगा, आप दोनों में से पता नही कोई नाश्ता बना पायेगा या नही इसिलिये कुछ हल्का फुल्का सा ले आयी।”

  ” अरे क्यों नही। प्रेम तो कब से कह रहा था कि पहले कुछ खा लेते हैं फिर घूमेंगे”

   बांसुरी ने मुस्कुरा कर दोनों को देखा और किनारे पड़ी खाली बैंच पर बैठ कर टिफ़िन खोल कर दोनों का नाश्ता निकालने लगी। प्रेम ने राजा को देखा राजा ने आंखों ही से ‘थोड़ा सा खा लेना’ वाले भाव प्रेम को दिये और प्रेम बेचारा चुपचाप खड़ा रह गया।
    दोनों को दो दो आलू के पराठे पकड़ा कर बांसुरी एक तरफ हो गयी__

  ” आप लोग आराम से खाईये, अभी और भी हैं।”

   ” नही नही इतना बहुत है।” इतनी देर से चुप बैठा प्रेम घबरा गया, उसे देख राजा को हँसी आ गयी__

  ” तुम्हारे प्रेम भैय्या के कहने का मतलब है ज्यादा खा लिया तो फिर दौड़ भाग नही कर पायेंगे ना।”

    प्रेम राजा के नजदीक सरक आया__” आप किसी का दिल नही तोड़ सकते हुकुम ये तो पता है लेकिन इसके लिये हमारे पेट पर इतना अत्याचार क्यों”

  ” प्रेम के वशीभूत हो मर्यादा पुरुषोत्तम जुठे बेर तक खा गये थे, ये तो आलू के पराठें हीं हैं प्रेम। प्रेम से मिला प्रसाद ग्रहण कर लो।”  प्रेम ने राजा को देखा और बिना भूख के भी खाने लगा

   खा पीकर तीनों वहाँ से खरीदारी को निकल गये। समय कम था और काम अधिक। दूल्हा दुल्हन के कपड़े से लेकर पूजा पाठ का सामान , पटला, दूध दही फूल माला, गहने सब के लिये इधर से उधर भटकते सारे सामान को व्यवस्थित करते उन्हें शाम के चार बज गये।
    राजा को समय देख याद आया कि अब उसे स्टेशन भी जाना है, पर उसे जाने से रोक प्रेम स्टेशन के लिये निकल गया।

     शाम बांसुरी और राजा सारा सामान समेटे जब निकलने लगे तभी बांसुरी को याद आया की उसे शादी में जाना है जहां जाने के लिये वो निरमा के घर से निकलते हुए साथ में साड़ी भी रख कर लायी थी। पीली लहरिया निरमा ने जानबूझ कर उसके साथ यह कह कर रख दी थी __ ” तू पीले रंग में बिल्कुल सोने सी दमकती है बांसुरी “
    साड़ी के साथ ही उसने रेशमी धागों वाले मैचिंग झुमके भी उसके सामान में डाल दिये थे__
      ” इतने बड़े झुमके कहाँ पहनती हूँ निरमा”
    
    ” कोई बात नही, बहुत से काम ज़िंदगी में पहली बार भी किये जातें हैं, रख ले चुपचाप और पहन भी लेना। मैं तस्वीरें देखूँगी।”

   ” क्यों तू आयेगी नही?”

  ” यार जान ना पहचान, मैं खामखाँ की मेहमान। ना मैं तेरे राजा बाबू को जानती हूँ ना तेरे प्रेम भाई साहब को। और अभी तू खुद कन्फ्यूस है कि आखिर शादी किसकी है तो बता मैं आ के क्या करूंगी? पर सुन तू आज रात भी यहीं आ जाना, तुझे कुछ बहुत ज़रूरी बात बतानी है।”
   निरमा की बात सही ही थी। उसकी मान कर बांसुरी ने चुपचाप सारा सामान रख लिया था, वही सामान उठाये वो मॉल के चेन्जिंग रुम की ओर चली गयी।
    साड़ी पहन कर चेहरे पर हल्का मेक’प किये बालों को उसने खुला ही छोड़ दिया, दो बार झुमके पहन के वापस उतार दिये, पर बाहर निकलने से पहले उसने निरमा को याद कर झुमके पहन ही लिये।
    
    बांसुरी दूर से चलती चली आ रही थी और राजा की आंखें जैसे कुछ देर को झपकना ही भूल गयी थीं। क्या कोई इतना भी सुंदर हो सकता है।
   कुछ झेंपती सी सकुचाती बांसुरी उसके पास आकर खड़ी हो गयी__

   “चलें?” बांसुरी के सवाल पर छोटा सा हम्म बोल कर वो आगे बढ़ गया। बांसुरी बार बार अपने हिलते डुलते झुमकों से परेशान हो रही थी, वो राजा से पूछना चाह रही थी लेकिन संकोच से गड़ी जा रही थी, आखिर उसने पूछ ही लिया__

   ” सुनो! राजा ये झुमके बहुत गॉडी तो नही लग रहे ना?”

  ” हम्म! नही तो।” अब वो बेचारा चेहरे के अलावा कुछ देखता तब सही जवाब दे पाता। अपने छोटे से जवाब के बाद वो बाहर निकल गया।
  

  दोनों जब तक मन्दिर पहुँचे प्रेम मेहमानों के साथ वहाँ पहले ही पहुँच चुका था__

  ” राजा सच में प्रेम भैय्या की शादी है?”

  ” हाँ भई , क्यों प्रेम भैय्या शादी नही कर सकते?”

  ” हाँ कर सकते हैं लेकिन मुझे ऐसा लग रहा जैसे तुम मुझे बुद्धू बना रहे हो।” बांसुरी की बात सुन राजा मुस्कुराने लगा

   ” जाओ खुद मिल लो दूल्हा दुलहन मन्दिर के पीछे ट्रस्टी ऑफिस में बैठे होंगे।”

    सीढिय़ां चढ़ती बांसुरी जल्दी जल्दी मन्दिर के पीछे बने ऑफिस पहुंच गयी…
     
     ऑफिस पहुंचते ही उसकी आंखें खुशी से फटी रह गयी। सामने कुर्सियों पर ट्रस्टी, मन्दिर के मुख्य पण्डित उनके सहायकों के साथ ही एक तरफ पिंकी और रतन बैठे थे।
    वो भाग कर पिंकी के गले से लग गयी। दोनों सहेलियाँ एक दूसरे से लिपटी रोती ही रहतीं अगर राजा आकर उन्हें शांत ना कराता।
   भावनाओं का ज्वार भाटा शांत होने के बाद बांसुरी ने राजा को आड़े हाथों लिया__

“कितना रुलाया है तुमने मुझे जानते भी हो? कम से कम कुछ हिन्ट तो दे देते राजा।”

  ” कैसे और कब हिन्ट देता बांसुरी? इतने कम समय में रतन को दिल्ली से लाना था, पिंकी को सुरक्षित महल से निकाल कर ऐसी  जगह पहुँचाना था जहां महल का कोई आदमी ना पहुंच सके।और इसी सब के साथ दो ऐसी लाशों की व्यवस्था भी करनी थीं जिससे ये सारा ऑनर किलिंग का मामला लगे।
   क्योंकि अगर मैं नही करता तो जय या विराज ऐसा ज़रूर कर जाते। और अगर एक बार पिंकी उनके हत्थे चढ़ जाती तब या तो वो उसे जान से मार देते या पकड़ के महल के सुपुर्द कर ठाकुर साहब के यहाँ उसे बिदा कर देते।
    अब इतने सारे ज़रूरी काम अकेले निपटाता मैं कब तुम्हें ये सब बताता बोलो तो? और एक बात और थी?”

  ” वो क्या भाई ? वो भी बता दीजिये?”

  ” वो ये पिंकी कि उस समय इन्होने जो रोना धोना मचाया था उससे महल की छत दीवारें तक हिल पडीं थी। अब अगर सच्चाई पता होती तो ये सत्यान्वेशी सच की पूजारन कभी इतना सारा रो पातीं।”

  ” महल में और कौन कौन जानता है इस बारे में?”

” काकी साहेब और मेरे अलावा इस पूरे फॉल्स ऑनर किलिंग का मास्टरमाइंड?”

   ” मास्टरमाइंड कौन है राजा?”

  ” हमारे युवराज भैय्या। उन्हीं के एक दोस्त हैं जो हमिदिया में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं उनकी वाईफ भी वहीं डॉक्टर हैं। उन्हीं ने मेडिकल कॉलेज से दो ऐसी लाशों का प्रबंध कर दिया जिनके कोई दावेदार नही थे।”

  ” कमाल है , तुम्हें एक लड़का और एक लड़की की बॉडी भी मिल गयी। सब भगवान जी की कृपा थी।”

  ” भगवान की कृपा तो थी ही कि किसी ने खोल के देखा नही। दोनों लाशें लड़कों की ही थी। उनमें से एक जो ज़रा नाज़ुक बदन था उसे पिंकी की घड़ी पहना दी थी।”

   बांसुरी आश्चर्य से कभी पिंकी कभी रतन कभी राजा को देख रही थी__

  ” बांसुरी जी आपका तो फिर भी ठीक था, मुझे तो राजा भैय्या के मित्र ये प्रिंस बाबू सीधा किडनैप कर ले गये अपने साथ। ना बोले ना बतियाए बस उठा ले गये।”

  रतन की बात सुन बांसुरी का ध्यान सबसे किनारे चुपचाप मुस्कुराते खड़े प्रिंस पर चला गया__

  ” अरे प्रिंस आप यहाँ?  मुझे तो आज एक के बाद एक सरप्राइज़ेस मिल रहें हैं।”

  ” बस बांसुरी जी भैय्या जी आदेस करें और हम हाज़िर ना हों ऐसी गुस्ताखी नही कर सकते ना। ये हमरे प्रभु श्री राम है और हम राम भक्त हनुमान। जय राम जी की।”

  ” जय राम जी की प्रिंस”

   ” आप सभी घराती बराती का मेल मिलाप हो गया हो तो शादी रजिस्टर कर लें, बड़े साहब भी अपना खाता लिये आ गये हैं।” ट्रस्टी साहब के कहने पर सभी का ध्यान इस बात पर गया।
    उतनी देर में अदिती और भास्कर भी ऑफिस से आ चुके थे।
  
  सबके बाहर मन्दिर परिसर में जाते ही अदिती और बांसुरी ने पिंकी को तैयार किया और दुल्हन बनी पिंकी को लिये मंडप में चले आये।

    सात फेरों के सातों वचन सुनाते पण्डित जी उनका भावार्थ भी साथ ही समझाते गये। दूल्हा दुलहन के अलावा किसी का भी ध्यान क्या तो होगा मंत्रो और उनके भावार्थ में।
     भास्कर अपने फ़ोन में अपने वीज़ा की प्रोसेसिंग चेक कर रहा था, अदिती भी उसके फ़ोन में घुसी मदद कर रही थी। प्रिंस और उसके पण्टर एक तरफ हाथ बांधे खड़े कभी गेंदे के फूलों को सूंघ लेते कभी रजनीगंधा के फूलों की माला बनाये एक दूसरे को पहनाते अपना बहुमूल्य समय व्यतीत कर रहे थे।
   बीच बीच में रसभरी या रजनीगन्धा का प्रसाद भी बड़ी आत्मीयता से आपस में बांटा जा रहा था। भई पान मसाला नही तो पण्टर भी नही।
    बांसुरी देख तो पिंकी को रही थी लेकिन दिमाग में राजा और उसके कारनामे ही चल रहे थे। फॉल्स ऑनर किलिंग वाली बात अभी तक उसके दिमाग से नही निकल पायी थी। अपनी चचेरी बहन की खुशी के लिये भागता फिरता राजा आज फिर एक बार उसके हृदय पर पूरी तरह से छा गया था।
    आज जहां लोग रिश्तों नातों को भूलते जा रहें वहीं ये बावरा अपने हर रिश्ते को उतनी ही नज़ाकत से संभाल कर रखे हुए है।
     उसके बारे में सोच सोच कर मुस्कुराती बांसुरी सामने यज्ञवेदी में डाली जा रही आहूतियों को बड़े ध्यान से देख रही थी। जितनी तन्मयता से वो उसे देख रही थी , उतना ही मगन राजा उसे देखने में था।
      सामने जलती आग का रिफ्लेक्शन था या पहनी गयी पीली साड़ी का,उसका चेहरा भी तप कर कुंदन नज़र आ रहा था।
     प्रेम एक तरफ चुपचाप खड़ा था, प्रताप से उसकी बात हो चुकी थी। प्रताप को अगले दिन सुबह वापस आना था लेकिन काम समाप्त ना हो पाने से वो शाम तक पहुंचने वाला था।
     उससे एक बार मिल कर उसकी कुशलता और सफलता अपनी आंखों से देख कर रात में ही फिर प्रेम और राजा को वापस लौट जाना था।

      वैदिक विधि विधान से विवाह संपन्न होते ही रजिस्ट्रार साहब अपना खाता खोले वहीं दूल्हा दुलहन की जन्मपत्री बांचने बैठे।
   सारी ज़रूरी कागजी नियम भरने के बाद उन्हें दोनों पक्षों से कम से कम दो गवाहों की ज़रूरत थी।
   रतन की तरफ से जहां अदिती भास्कर ने साईन किया पिंकी की तरफ से राजा प्रेम और प्रिंस थे ही।
बांसुरी सोच में पड़ी थी कि वो किसकी तरफ से साईन करे __

” अभी बाराती बन कर कर दो बाद में तो तुम्हें घराती ही बनना है।” अदिती की बात सुन वो झेंप के रह गयी।
   आखिर उसने भी रतन की ओर से साइन कर ही दिया….

    हँसी खुशी के माहौल में वो शाम बीत गयी, सभी वहाँ से डिनर के लिये राजा के पहले से बुक किये वेन्यू बार्बिक्यू मेनशन  चले आये।

   ” अब आप कब लड्डू खिला रहे हैं राजकुमार अजातशत्रु जी। आपकी शादी होगी तो हमें भी महल घूमने का बहाना मिल जायेगा।”
    अदिती की बात पर राजा चुपके से मुस्कुरा कर रह गया__

  ” इस बारे में मैं क्या कहूँ, जब ऊपर वाला चाहेगा हमारी भी हो ही जायेगी। आखिर कोई ना कोई तो मेरे साथ चलने के लिये भी बनी ही होगी।

   सभी इधर उधर बैठने की व्यवस्था देख रहे थे और वो ये देख रहा था कि बांसुरी कहाँ बैठने वाली है। उसकी नजरों को अदिती ने पकड़ लिया__

” अब तो पता नही आपसे कब मिलना होगा? क्योंकि यहाँ से जाने के बाद मालूम नही आप कब वापस आयेंगे”

  ” अब मेरा वापस लौटना मुश्किल ही है अदिती जी , अब वहाँ का भी काम काज देखना है, आखिर कितना भागून्गा इन सब से,?
        क्या हुआ आज कुछ ज्यादा ही काम था क्या भास्कर साहब आज फ़ोन पर कुछ ज्यादा ही व्यस्त नज़र आ रहें हैं?”
   राजा के सवाल का जवाब भास्कर ने ही दिया__

  ” क्या करुँ राजकुमार जी, वो हुआ यूं कि ऑफिस वाले मुझे सिंगापुर दीवाली के बाद भेजने वाले थे लेकिन अब कुछ अर्जन्सी आ जाने से मुझे परसों ही फ्लाई करना है, बस उसी सब में भिड़ा हुआ हूँ राजा साहेब।”

  ” ओके !! तो शादी वहाँ से आने के बाद…..अपने मन को बहुत मज़बूत कर अपने मन के संकोच को एक किनारे रख आखिर राजा ने पूछ ही लिया

  ” शादी ? किसकी शादी?”

  ” आपकी और बांसुरी ….राजा की बात को आधे में ही काटता भास्कर अपनी बात बोल पड़ा

  ” राजा साहब मेरी और बांसुरी की शादी तो कैंसल हो गयी, आपको उसने बताया नही क्या?”

  ” नही? मुझे तो कुछ नही बताया उसने।”

   भास्कर बांसुरी को देख सोच में पड़ गया, अजीब लड़की है जिसके प्यार के कारण मुझसे होने वाली शादी ठुकरा गयी उसे बताया तक नही। लड़की आखिर चाहती क्या है? अपनी ही मन की बात पर फिर उसे हँसी आ गयी__
     हाँ ऐसी ही तो है ये, दूसरों के साथ अन्याय देख भले लड़ जाये पर खुद के लिये मुहँ से एक शब्द नही निकलेगा। अब अगर राजा वापस चला गया और इसने उससे कुछ ना कहा तो फिर ये बस उसका नाम जपती पूरी ज़िंदगी गुजार लेगी। पागल लड़की!

   राजा और भास्कर बुफ़े मैन्यु में सलाद काऊंटर पर साथ खड़े बातों में लगे थे। सभी अलग अलग काऊंटर पर ही थे और बांसुरी पूरी रोचकता से  पिंकी और रतन के साथ बैठी उनसे अब तक की सारी बातें सुन रही थी।
    पिंकी और रतन की खुशी का ठिकाना ना था। महल से भागना पिंकी जैसी शेरदिल लड़की के व्यक्तित्व का हिस्सा कहीं से नही था, लेकिन भविष्य में पड़ने वाली मुसीबतों से बचने के लिये उसे अपने बड़ों की बात मान कर ये रास्ता चुनना पड़ा था।

    उसके खुद के बॉडीगार्ड रतन की सारी जन्म कुंडली पहले ही महल पहुंचा चुके थे, इसीसे रतन के घर वालों की सुरक्षा के लिये ही पिंकी और रतन को रतन के घर ना भेज कर राजा ने प्रिंस के साथ भेज दिया था।
    इन्हीं कारणों से रतन के घर वालों को बुलाया भी नही था। हालांकि दबी ढंकी आवाज़ में उन्हें रतन की कुशलता और विवाह की जानकारी ज़रूर दे दी थी।
   
    हमारे समाज में माता पिता किसी भी वर्ग धर्म और जाति के हों आज भी अपनी संतान की शादी अपनी मर्ज़ी से इतर होते देख एक बार को दुखी ज़रूर होतें हैं। रतन मध्यमवर्गीय था दलित था लेकिन उसके परिवार में हर कोई उच्च शिक्षित और उंचें सरकारी पदों पर आसीन था। पिता अगर रेंजर के पद से रिटायर होने को थे तो भाई भी पी सी एस क्लियर करके “जिला अल्पसंख्यक अधिकारी” के पद पर कार्यरत था। इकलौती बड़ी बहन महिला एवं बाल विकास में अधिकारी थी तो जीजा खाद्य विपणन अधिकारी थे।
   इतने अधिकारीयों की संगत में शुरु से कुशाग्र बुद्धि रहा रतन का दिमाग आई एफ एस की ही ज़िद पकड़े बैठा था। उसे पिंकी की सुंदरता से कहीं अधिक उसकी बुद्धिमत्ता ने ही प्रभावित किया था, लेकिन इस सब के बावजूद इस तरह भाग भगौव्वल उसे पसंद नही आया था, लेकिन और कोई उपाय ना देख एक बार अपने घर वालों से पिंकी को मिलवा कर और उसके बारे में सारी जानकारी दे वो प्रिंस के साथ निकल गया था।
   
   आज भी विवाह संपन्न होने के बाद उसने अपनी माँ को जब फ़ोन लगाया तो फ़ोन पर उनकी सिसकी सुन फिर उससे और कुछ ना कहा गया, फ़ोन बंद कर वो अपनी नयी ज़िंदगी के नये सपनों में खुद को तलाशने की कोशिश में जुट गया।

    ” अरे भाई आप सिर्फ वेज ही ले रहे। सावन का महीना कब का खत्म हो गया है भाई फिर?” पिंकी की बात पर राजा मुस्कुरा कर अपना खाना खाने लगा

   ” मैंने नॉनवेज खाना छोड़ दिया है छुटकी…..

   ” अच्छा लेकिन कब से?”

   पिंकी की बात पर वो एक बार फिर ज़ोर से हँसा और उसके सिर पे एक हल्की सी चपत लगा दी।

   ” जल्दी जल्दी खाना खा लो, फिर तुम दोनों को तुम्हारे होटल छोड़ कर हम सब भी अपने अपने ठिकानों पे निकल जायेंगे। सुबह से कुछ ज्यादा ही भागदौड़ हो गयी है।

    अपनी सुहागरात के लिये रतन के साथ उसके रुकने का प्रबंध राजा किसी होटल में कर रहा है ये सोच कर ही पिंकी शर्म से गड़ गयी__

  ” नही भाई ! हम किसी होटल में नही रुकेंगे। आज तो हम बांसुरी के साथ उसके रूम पर ही रुकना चाहते हैं, आप और रतन अपना देख लो”

  ” अरे ऐसे कैसे? “

  ” हाँ तो और क्या? हम इतने दिनों बाद बंसी से मिले हैं।  बहुत सी बातें हैं और वैसे भी रतन को इंटरव्यू की तैय्यारी के लिये पढ़ाई करनी है, वो तो अभी भी बैठा बैठा यही सोच रहा होगा कि कब यहाँ से छुट्टी पाऊँ और वापस अपनी किताब खोल सकूं।”

  ” हाँ अपनी किताबें याद तो बहुत आ रहीं लेकिन इतना रूड हसबैंड भी नही हूँ कि शादी वाली रात ही अपनी वाइफ़ी को अकेला छोड़ दूँ। मैं तो कहता हूँ, राजा भैय्या प्रेम भैय्या और हम सब तुम्हारे साथ बंसी के रुम पर ही चलतें हैं। गाते बजाते नाईट आउट सा हो जायेगा, और पिछले दिनों से जो इतना तनाव बना हुआ था उससे भी थोड़ा राहत मिल जायेगी।”

  ” वॉव हसबैंड! तुमने तो हमारे मुहँ की बात छीन ली।”

  खाना पीना समाप्त होते ही अदिती और भास्कर वहाँ से निकल गये, जाते वक्त भास्कर ने बांसुरी की चाबी भी वापस लौटा दी, उसे अगली सुबह पुणे अपना सामान लेने जाना था।
      आखिर पिंकी और बांसुरी के कहने पर सब वहाँ से बांसुरी के घर के लिये निकल गये।
     प्रिंस को उसी रात वापस निकलना था, उसे उसके साथियों के साथ ट्रेन में बैठाने से पहले राजा ने गले से लगा लिया__

   ” प्रिंस तुम्हारी मदद के लिये थैंक्स बहुत छोटा शब्द है मेरे भाई”

  ” आपने भाई बोल दिया भैय्या जी इतना ही हमरे लिये बहुत है। कभी कुछो काम लगे हमे जरूर याद कीजियेगा।”

  ” बिल्कुल भाई! अब तुम्हारी बरात में आऊंगा नाचने।”

  ” भैय्या जी उसके पहले तो हम आयेंगे आपकी बरात में नागिन डांस करने।”

  राजा ज़ोर से खिलखिला कर हँस पड़ा। प्रिंस से बिदा लेकर वो सभी बांसुरी के घर की ओर निकल गये।

क्रमशः

aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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