जीवनसाथी-39

जीवन साथी- 39

……………..


       राजा ने पहली बार प्रेम को ऐसे अपना आपा खोते देखा था, वर्ना सदैव शांत और सयंत रहने वाला लड़का बड़ी से बड़ी आपदा में आज तक राजा के आगे ढाल बना खड़ा रहा था, लेकिन आज जैसे किसी सूखे ठूंठ सा ढह जाने को आतुर हो गया था।
    उसके जीवन में उसके भाई और राजा के अलावा और कुछ भी तो नही था। उसका पूरा घर प्रताप के बचपन से लेकर आज तक की वस्तुओं से ही पटा पड़ा था, हर दीवार पर प्रताप ने ही चुन चुन कर दोनो भाइयों की तस्वीरें लगा रखी थी।
       हर बार जब भी वो बॉम्बे से घर लौटता प्रेम के लिये और उस घर के लिये जाने कहाँ कहाँ से ढूंढ कर अतरंगी चीज़ें ले आता और घर के हर ओने कोने को सजा कर आत्ममुग्ध खड़ा देखता रहता।
    प्रेम के बगीचे में सैकड़ों देशी विदेशी फूल हों या कारनेशन सब कुछ प्रताप का ही लगाया था। प्रताप की हर पसंद जहां उसे शृँगार रस का प्रेमी बताती वहीं उससे उलट प्रेम अब तक वैरागी ही था।

     राजा प्रेम को संभाले बैंच तक ले आया। अजीब अफरा तफरी सा माहौल हो गया था, राजा जहां प्रेम को संभाल रहा था वहीं बांसुरी राजा को।
    वहीं किनारे पड़ा प्रताप का फ़ोन दो बार बज कर बंद हो गया, और तीसरी बार फिर बजने लगा।
   वहीं सफाई कर के निकलते वार्ड बॉय ने फ़ोन के हल्ले से परेशान होकर फ़ोन उठा लिया__

   ” हेल्लो प्रताप! फ़ोन क्यों नही उठा रहे थे?”

   ” हेलो कोण हे बाई!

    ” आप कौन बोल रहे, कहाँ से बोल रहें हैं।”

    ” मैं ये मैक्स हसपताल से बोल रा बाई यहाँ वार्ड बॉय है मै, हे जिस मुलगे चा फ़ोन हे ना वो यहीं एडमिट है।”  वार्ड बॉय को अधिक जानकारी थी नही, जितना मालूम था आधी हिंदी आधी मराठी में उसने सामने वाली को बता दिया, और फ़ोन वापस बैंच पर रख अपना सामान समेटे अगले वार्ड की ओर निकल गया।

     डॉक्टर आकर राजा से आगे की औपचारिकता पूरी करवाने लगे।
     जीवन और सांसों का कितना महत्व होता है ये अस्पताल में ही मालूम चलता है। जब तलक किसी इन्सान की एक भी धड़कन बाकी हो तब तलक पूरा स्टाफ़ चाहे डॉक्टर हो नर्सेस हों या कोई और अपना पूरा दम उसकी जान बचाने को झोंके रहतें हैं लेकिन आखिरी सांस के गिरते ही उनकी भी सारी शक्ति सारा उत्साह सब कुछ स्वाहा हो जाता है, उन्हें भी कुछ पलों का अवसाद घेर जाता है कि उस परमपिता की शक्ति के सामने कैसे वो निरुपाय रह जातें हैं? कैसे  उनकी सारी शिक्षा दीक्षा उनका ज्ञान सब कुछ फेल हो जाता है।
 
     खिलौना उतना ही चलेगा जितनी चाबी राम ने भरी होगी।
  
      आत्मा के चले जाने के बाद नश्वर शारीर सिर्फ एक बॉडी रह जाता है और रह जातीं हैं उस बॉडी की पोस्ट ट्रीटमेंट फ़ॉरमेलिटिज़।
   वही नर्स जो कुछ देर पहले तक क्षण क्षण में हाथ पकड़ कर नब्ज़ जांच रही होती है निर्विकार भाव से वार्ड बॉय से कहती पायी जातीं हैं ” बॉडी को बाहर हैंडओवर कर के, बैड शीट फटाफट चेंज करो, इमरजेन्सी में नया केस आया है, बैड नम्बर 4 ही अलॉट किया है उसे”
     ऐसा नही की उनके कलेजे पत्थर के होतें हैं और वे भावुक नही होते बल्कि भावुकता के लिये उनके पास समय नही होता।

     प्रेम के पास बैठा राजा चुपचाप नीचे देख रहा था, वहीं किनारे बांसुरी भी खड़ी थी, तभी रिसेप्शन से पूछ ताछ कर दौड़ती भागती निरमा वहाँ चली आयी__

   ” निरमा तू यहाँ कैसे?”

   बांसुरी को निरमा को वहां देख बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन खुद में व्यस्त निरमा का हाल ऐसा नही था कि वो बांसुरी की किसी बात का सही जवाब दे पाती__

  ” बांसुरी तू?”

   निरमा ने उसे देखा और एक मिनट रुकने का इशारा करती वही पास खड़े डॉक्टर के पास पहुंच गयी__

  ” डॉक्टर साहब! कोई प्रताप सिंह नाम का मरीज़ भर्ती हुआ है क्या?”

   निरमा का सवाल राजा के साथ साथ प्रेम के कानों में भी पड़ा

  ” यंग सा लड़का है उम्र यही कोई चौबीस पच्चीस के आसपास”

   डॉक्टर ने निरमा को देखा, फिर उसके पीछे झान्क कर वहाँ बैठे प्रेम को देखा और फिर निरमा से मुखातिब हुआ__

   ” हाँ जी एडमिट किया गया था कल रात,  लेकिन उन्हें बचाया नही जा सका।”

   ” क्या?  क्या बकवास कर रहे हो डॉक्टर? किसी और के बारे में बोल रहे होंगे आप? कोई कनफ्यूजन हो गया लगता है आपको?”

    ओटी से उसी वक्त प्रताप की बॉडी हैण्डओवर करने बाहर लायी गयी। बांसुरी अब तक निरमा के पास आ चुकी थी।
     निरमा की नज़र जैसे ही प्रताप के चेहरे पर पड़ी कुछ सेकंड के लिये उसके कानों में जैसे अजीब सी सनसन की आवाज़ होने लगी, चेहरा वो ध्यान से देखना चाह रही थी लेकिन चेहरे की लकीरें धूँधली होने लगीं,आंखों के आगे कुछ तारे से टिमटिमाए और उसका सर घूम गया।
     निरमा फर्श पर धड़ाम से गिरती इसके पहले ही प्रेम ने उसे संभाल लिया।
         तुरंत ही दूसरा स्ट्रेचर लाकर निरमा को उस पर लेटा कर इमर्जेन्सी में भर्ती कर लिया गया।
   
       दिमाग पर पड़ने वाले झटके को ना सह पाने के कारण बीपी अचानक गिरने से निरमा बेहोश हो गयी थी।
    स्ट्रेचर पर अन्दर ले जाते समय प्रेम ने उसका चेहरा देखा__ ये तो वही लड़की थी प्रताप के वॉलेट में जिसकी तस्वीर लगी थी।
     निरमा की हालत देख प्रेम की आंखों में फिर आंसू  चले आये।
    अब तक निरमा की हालत देख बांसुरी को भी कुछ हल्का सा समझ आ चुका था कि शायद प्रताप ही था जिसके बारे में निरमा ने उसे दो एक बार बताने की कोशिश की थी।
      वो अन्दर निरमा के पास ही खड़ी थी।

    **********

    प्रताप को गये पूरे दो दिन बीत चुके थे । उससे जुड़ी अस्पताल और थाने की सारी औपचारिकतायेँ पूरी हो चुकी थी, अब प्रेम के लिये मुम्बई में कुछ बचा भी नही था।
    विराना सा लगता ये शहर अब उसे काट खाने को दौड़ रहा था। प्रताप के कमरे में बांसुरी और पिंकी प्रताप का भी सारा सामान पैक कर रहे थे।
     उसका लैपटॉप का बैग और फ़ोन उठाये वो बाहर ले आयी__

  ” ये फ़ोन तो आप लोग ऊपर ही रख लिजिये, अन्दर सामान के साथ कहीं टूट फूट ना जाये।”

    बांसुरी ने फ़ोन प्रेम के सामने रखा और भीतर चली गयी।
 
    फ़ोन देख कर प्रेम को जैसे अचानक कुछ याद आया, उसने फ़ोन उठाया और उसमें से निरमा का मेसेज ढूँढने लगा। निरमा का मेसेज खोलते ही उसके सामने उसका मुरझाया सा चेहरा घूम गया।
    उसने साथ बैठे राजा के हाथ में मोबाइल थमा दिया।
     राजा ने भी एक एक कर निरमा के प्रताप को भेजे आखिरी मेसेज पढ़ डाले और अपना सिर पकड़ कर बैठ गया__

    ” बांसुरी ! ज़रा दो कप चाय बना लाओ, सर बहुत भारी हो रहा है।”

   बांसुरी तुरंत बाहर चली आयी, इशारे से उसने राजा से पूछा, राजा ने फ़ोन उसके हाथ में दे दिया। फ़ोन पकड़े वो अन्दर चाय चढ़ाने चली गयी।
      चाय चढ़ा कर मेसेज पढ़ते ही वो उल्टे पैर बाहर चली आयी___

   ” अब क्या होगा? मैं तो उस दिन के बाद से निरमा का हाल चाल भी नही पूछ पायी”

   बांसुरी का सवाल सुन राजा प्रेम की ओर देखने लगा।
     प्रेम ने राजा को देखा__

  ” मैं समझ नही पा रहा हूँ उस लड़की से कैसे बात करुँ लेकिन मुझे प्रताप की आखरी निशानी चाहिये। हालांकि मैं ये भी समझता हूँ कि उस लड़की की पूरी ज़िंदगी का सवाल है, वो नौ महीने तकलीफ सह कर मुझे बच्चा देगी या नही ये उससे पूछना बहुत मुश्किल है।”

     बांसुरी भी एक कुर्सी खींच कर वहीं बैठ गयी__

   ” मैं कुछ बोलूं? मेरे पास एक आइडिया है।”

  राजा बांसुरी की बिना सोचे समझे बोलने की आदत से परिचित था, उसे लगा बांसुरी कहीं कोई ऐसी बात ना बोल जाये जिससे प्रेम एक बार फिर दुख के सागर में डूब जाये, उसने बांसुरी की तरफ देख इशारे से क्या बोलना है पूछा और बांसुरी उसे देखती अपनी कुर्सी उन लोगों के और पास खींच लाई__

    ” प्रेम भैय्या! मेरी बात ध्यान से सुनियेगा …. आपका दुख बहुत ज्यादा बड़ा है लेकिन निरमा का दुख भी कहीं से कम नही है। वो और प्रताप तय कर चुके थे कि उन्हें शादी करनी ही है। इसिलिए ये सब….

    “वो सब प्रेम समझता है बांसुरी” …..राजा  के टोकने पर बांसुरी आगे कहने लगी__

  ” देखिए भैय्या निरमा के लिये भी ये बच्चा प्रताप की निशानी है और मैं जहां तक उसे जानती हूँ वो भले ही अकेले बच्चे को पाल लेगी लेकिन उसे मरने नही देगी। आप समझ रहे हैं ना मैं क्या कहना चाहतीं हूँ।”

   अबकी बार राजा थोड़ा असहज हो उठा__

  ” तुम कहना क्या चाहती हो बांसुरी? साफ़ साफ़ क्यों नही कहती?”

   ” राजा मैं ये कहना चाहती हूँ कि अगर प्रेम भैय्या और निरमा की शादी हो जाये तो प्रेम भैय्या को प्रताप की आखिरी निशानी भी मिल जायेगी, उस बच्चे के रूप में प्रताप वापस मिल जायेगा और निरमा के बच्चे को पिता का नाम भी मिल जायेगा। क्योंकि उन दोनों का प्यार जितना भी मज़बूत और पवित्र रहा हो समाज के लोग तो इस बात को गलत नज़र से ही…..

   बांसुरी की बात आधे में ही काट कर प्रेम ने अपनी बात रख दी__

    ” मैं तैय्यार हूँ।”

   राजा कभी प्रेम को कभी बांसुरी को आश्चर्य में डूबा देखता रहा__

  ” अरे ये बात अब तक मेरे दिमाग में क्यों नही आयी।”

   ” क्योंकि आप बांसुरी जितने स्मार्ट जो नही हैं”  तब तक में पिंकी भी अन्दर से बाहर चली आयी। वो अपने हाथ में फ़ोन पकड़े आयी थी,आकर उसने फ़ोन बांसुरी को थमा दिया__

” किसी का कॉल आ रहा था कट हो गया, देख लो”

   बांसुरी ने उसी नम्बर पर कॉल लगा लिया, निरमा की मामी ने फ़ोन उठाया और रोने बैठ गयी__

  ” बंसी बेटा अगर हो सके तो तुरंत घर आ जा”

  ” पर मामी जी हुआ क्या है?”

  ” फ़ोन में ज्यादा कुछ नही बता सकती बांसुरी, बस ये समझ ले कि ये लड़की पागल हो गयी है।”

  ” कुछ तो बताइये मामी जी, मुझे घबराहट हो रही है निरमा ठीक तो है ना?”

   ” इसकी तबीयत पिछले कुछ दिनों से ही खराब थी, रोज़ रोज़ की उल्टियाँ देख और इसका किसी खाने की चीज़ को ना देखना देख कर ही मैं समझ गयी थी, फिर जब ये परसों अस्पताल मे भर्ती थी तब छुट्टी के समय वहाँ की लेडी डॉक्टर ने इसकी हालत बता कर रहा सह संशय भी दूर कर दिया।
   अब देखो बिटिया वो लड़का भी तो रहा नही अब मैने धीरे से इस लड़की को समझाया भी कि चलो जो हुआ सो हुआ अब इस ढोल को गले बांध कर घूमने का क्या मतलब, छुट्टी पाओ भई समाज में रहना है तो यहाँ के कायदों से ही तो चलना पड़ेगा ना, कल को इसकी शादी भी तो होगी , फिर ? पर ये लड़की पूरी पागल हो रखी है। बिना कुछ बोले चुपचाप ऊपर चली गयी। मैं पीछे-पीछे गयी तो देखा सामान बान्ध रही है कहती है मामी मेरे कारण आपकी नाक नही कटनी चाहिये, मैं मेरे बच्चे को नही छोड़ सकती , इसे लेकर कहीं चली जाऊंगी। अब बांसुरी तू जल्दी आ जा इस पागल को समझा कि ऐसे पागलपन से इसे बदनामी के सिवा कुछ नही मिलना है।”

  ” जी मामी जी, किसी तरह उसे उलझा कर रोके रखिये मैं तुरंत पहुंच रहीं हूँ।”

   बांसुरी ने मामी से हुई बात चीत सभी को जल्दी से बताई और निरमा के घर के लिये निकल पड़ी।

   राजा और प्रेम के साथ जब बांसुरी ने निरमा के घर का दरवाज़ा खटकाया तो उसके साथ खड़े दोनों अपरिचित लड़कों के देख कुछ देर को मामी असमंजस में पड़ गयी__

  ” आप अन्दर चलिये मामी जी, मैं सब बताती हूँ।”

   निरमा की हालत जानने के बाद से मामा जी भी गुमसुम से अपने कमरे में ही बैठे थे, उसके बाद से ना वो बाहर निकले थे ना कुछ खाया पिया था, उनकी और निरमा की चिंता से थक कर और कोई उपाय ना देख ही मामी ने बांसुरी को फ़ोन लगा लिया था।

    मामी को प्रेम और राजा से परिचित करवाने के बाद बांसुरी ने प्रेम का निरमा के लिये विवाह प्रस्ताव भी मामी को बता दिया।
   सामने बैठे प्रेम में उन्हें वैसे तो कोई खोट नज़र नही आ रहा था लेकिन ये अजीब सा रिश्ता उनके वैदिक हिंदू धर्म से जुड़े संस्कारी गले से नीचे नही उतर पा रहा था।
  अगर प्रताप से शादी हो गयी होती तो रिश्ते में ये लड़का निरमा का जेठ होता? अब ऐसे में क्या जेठ से विवाह सम्भव है?
    उनका संस्कारी चित्त खिन्न हुआ जा रहा था, वो उठ कर रसोई में मेहमानों के लिये चाय चढ़ाने चली गईं।
  उनके पीछे बांसुरी भी रसोई में चली आयी__
 
  ” मामी जी आप बात को समझिये ना, बताइये और कोई उपाय है क्या?”

  ” पर बिटिया लड़का तो निरमा का जेठ लगता है। हमारे में ऐसे संबंध नही जुड़ा करते।”

  ” कैसे जेठ लगता है? प्रताप और निरमा की शादी हुई थी क्या?”

  ” पर कुलबोरनी वो सब तो कर ही गयी जो ब्याह के पहले करना पाप था। ” मामी जी ने आंचल से आंसू पोंछ लिये

   ” मामी जी वो सब बातें छोड़िये। देखिए निरमा बच्चे को गिराने के लिये कभी तैय्यार नही होगी, उसके लिये ये प्रताप की आखिरी निशानी है और उसके बच्चे को अगर कोई पिता का नाम दे सकता है तो वो बस प्रेम भैय्या हैं। मैं जा रहीं हूँ ऊपर निरमा से बात करने, आप तब तक धीरे से मामा जी को भी समझा लिजिये ना, वो दोनो बाहर अकेले बैठे हैं।”

   बांसुरी अपनी बात पूरी कर वहाँ से निकल रही थी की मामी ने एक बार फिर उसे टोक दिया___

  ” बंसी वो दूसरा लड़का कौन है ?”

   बांसुरी जाते हुए पलटी और हल्के से मुस्कुरा कर सीढ़ियाँ चढ़ गयी__” आकर बताती हूँ।”

   निरमा के कमरे का दरवाज़ा बंद था हल्के धक्के से खुल गया, बांसुरी अन्दर चली आयी।
   निरमा खिड़की के पास अपने घुटनो पर चेहरा टिकाये  कहीं दूर देखती बैठी थी। वो खुद में इतनी मगन थी कि बांसुरी के भीतर आने की आहट भी सुन नही पायी।
     बांसुरी उसके पास जाकर बैठ गयी।

  निरमा ने पलटकर बांसुरी को देखा तक नहीं वह बाहर ही देखती रही। बांसुरी  ने धीरे से निरमा के कंधे पर हाथ रखा निरमा की आंखों से आंसू बहने लगे, जिन्हें पोछने की उसने कोई कोशिश नही की।

   ” कितना रोएगी निरमा? बस कर अब।”

   ” अब इन्हीं का आसरा है बांसुरी। ”

  ” ऐसे मत बोल , ज़िंदगी में अगर दुख हैं तो सुख भी….

   ” प्लीज़ बांसुरी मुझे कोई झूठी तसल्ली मत दे मैं सब जानती हूं यह सुख दुख जीना मरना यह सारे नाटक मुझे नहीं सुनना कुछ भी …
    ….. मैं जैसी हूं ठीक हूं प्लीज तू चली जा यहां से मुझे कोई तसल्ली के शब्द नहीं चाहिए। और सुन मैं जानती हूँ तुझे यहाँ मेरी मामी ने बुलाया है मुझे समझाने बुझाने के लिये लेकिन……
     गुस्से और हताशा से निरमा का चेहरा लाल हो गया था , अपनी आंखों को पोछती वो आगे कहने लगी

   ….. तू एक बात ध्यान से सुन ले बांसुरी, मैं तुम में से किसी की बात नही मानने वाली। ये मेरा बच्चा है और मैं इसकी जिम्मेदारी अकेली ही उठा सकती हूँ।
     मेरे और प्रताप की सबसे सुंदर यादों का किस्सा है ये मैं किसी हाल में इसे नही खो सकती।”

  ” निरमा निरमा! मेरी बात तो सुन। मैंने तो एक बार भी नही कहा कि तू इस बच्चे को गिरा दे या इससे पीछा छुड़ा ले, बल्कि मैं तो इसी बारे में तेरी मदद करने आयीं हूँ।”

   निरमा ने खिड़की की तरफ से मुहँ बांसुरी की तरफ फेरा, इतनी देर में पहली बार उसने बांसुरी को देखा था पर उसे देख बांसुरी की रुलाई फूट पड़ी, इतनी सुंदर नाज़ुक सी लड़की ने इन दो ही दिन में अपना क्या हाल बना लिया था।
    क्यों कोई किसी से इतना टूट कर प्यार करने लगता है कि उसके जाने के बाद खुद भी ज़िंदगी से बेज़ार हुआ जाता है।
    सच उस दिन मौत भले ही प्रताप को ले गयी लेकिन उसने उसके पीछे से दो और  जिंदा लाशें छोड़ दी घुट घुट कर जीने के लिये।

    बांसुरी ने आगे बढ़ कर निरमा को गले से लगा लिया__

  ” निरमा प्रताप कहीं नही गया, तेरे अन्दर सांस ले रहा है वो अभी भी। हर वक्त तेरे साथ ही रहेगा लेकिन क्या तू ये चाहेगी कि कल उसे समाज की गंदी नजरों का सामना करना पड़े?  उसके अस्तित्व पर उठते सवालों के जवाब ना दे पाने की घुटन तेरा बच्चा महसूस करे? नही चाहेगी ना, और इसके लिये ज़रूरी है कि तू शादी कर ले। निरमा शान्ती से मेरी बात सुनना और समझना। तू प्रताप के बड़े भाई से शादी कर ले।”

   निरमा ने एक झटके से बांसुरी को खुद से दूर कर दिया__

  ” तू पागल हो गयी है क्या बंसी ?”

  ” मैं तो नही हुई लेकिन तू अगर शादी से इन्कार करेगी तो तुझसे बड़ी पागल कोई नही होगी”

   ” क्या बकवास है ये बांसुरी। मैं कभी उसके बड़े भाई से शादी नही कर सकती, वो तो रिश्ते से मेरे जेठ …

  ” हद है यार तुम दोनों मामी भांजी एक ही ज़बान बोलती हो, कहाँ से हुआ तेरा जेठ? बता मुझे। कब की तूने प्रताप से शादी।”

   ” फेरों की औपचारिकता ही तो बस पूरी नही हुई बांसुरी। उसके फ्लैट के हर कमरे में उसकी रसोई के हर डिब्बे में मेरी उंगलियों के निशान है जैसे मेरे तन और मन पर उसकी उंगलियों के निशान।
    अब बता कैसे करुँ किसी और से शादी? इतना आसान होता है क्या किसी और से प्यार करते हुए भी किसी दूसरे से शादी करना?”

   कुछ देर को बांसुरी को भी कुछ नही सूझा __

   ” बिल्कुल आसान नही होता निरमा जी। बल्कि कहूँगा कि बहुत मुश्किल होता है ऐसा करना। मैं समझ सकता हूँ क्योंकि मैंने भी कई रिश्ते बिना मर्ज़ी के निभाए हैं क्योंकि वो ऊपर वाले ने मेरी किस्मत में लिख रखे थे, ऐसे ही उसने जाने किस झोंक में आपकी किस्मत में ये सब लिख दिया। लेकिन इस सब में इसका तो कोई कसूर नही है। आप सिर्फ इस कारण की इसकी माँ हैं इससे एक अच्छी और खुशहाल ज़िंदगी का हक नही छीन सकती। उसे जितनी ज़रूरत एक माँ की होगी उतनी ही उसके सरंक्षण के लिये उसे एक पिता की भी दरकार होगी, तब ऐसे में कब तक आप उसे नकली बातों के झुनझुने से बहला पायेंगी।
  
     मामी जब ऊपर चाय लेकर आ रहीं थीं तभी उनके साथ राजा भी चला आया था।
   राजा की बात सुनती निरमा चुप बैठी रही__

   ” मान जा बेटी, तेरे मामा भी इसी हसरत में नीचे बैठे तेरा इन्तजार कर रहें हैं। तू ज्यादा देर लगाएगी सोचने में तो समय भी तो सरकता जायेगा। किस किस को जवाब देते फिरेंगे बेचारे इस बुढऊती में।

   निरमा चुप चाप सिर नीचे किये बैठी रही।

   ” निरमा बोल ना क्या सोचा तूने?” बांसुरी के सवाल पर एकदम धीमी सी आवाज़ में ” जो तुम सब को ठीक लगे कर लो” कह कर उठ कर बाथरूम में मुहँ धोने चली गयी।

   उसके जाते ही ऊपर की ओर मुहँ कर मामी ने अदृश्य रूप से दिखते भगवान के सामने हाथ जोड़ दिये__” राम जी रक्षा करना। मैं जानती थी मेरे व्रत उपवास भगवान ऐसे विफल नही जाने देंगे।

   ” आप लोग नीचे चलिये मैं निरमा को लेकर आती हूँ।”


    सभी नीचे बैठे थे निरमा को साथ लिये बांसुरी भी चली आयी। सभी बातें तुरत फुरत निपटाने की ही हो रहीं थी, मामा जी के किन्हीं परिचित का आर्य समाज में आना जाना था उन्हीं से बात कर उन्होने अगले दिन के लिये एक समय तय कर लिया ।
    मामा जी दो दिन बाद कमरे से बाहर निकले थे, दो दिन का अबोला आज बोल बोल कर पूरा किये दे रहे थे, राजा के साथ ही उनकी सारी बातचीत चल रही थी।
  मामी बांसुरी के साथ पूरे उत्साह से रसोई बनाने में जुटी हुई थीं, उनके मन का बोझ हट गया था।
   
   सभी के चेहरों पर हल्की ही सही मुस्कान आ गयी थी बस भावी दूल्हा दुलहन चुप चाप बैठे ज़मीन को ताक रहे थे।

    प्रेम ने बहुत हिम्मत कर एक बार निरमा को देखने के लिये आंखें उसकी तरफ उठायी पर उसकी बड़ी बड़ी डबडबाई आन्खे देख फिर उसकी दुबारा उसे देखने की हिम्मत ही नही हुई।


   ******

   अगले दिन निश्चित समय पर सभी एक साथ आर्य मन्दिर पहुँचे और माला बदलने की औपचारिकता के साथ ही विवाह की रस्में शुरु हो गयी।
    सादी सी पीली साड़ी में ना निरमा दुल्हन लग रही थी और  ना ही जीन्स टीशर्ट में प्रेम दूल्हा।
  पर थे तो वही दोनों दूल्हा दुल्हन। इसलिये पण्डित जी की हर बात सुनते मानते और विवाह की हर रस्म निभाते आखिर वो दोनों विवाह बंधन में बंध ही गये।
     सिन्दूर दान की रस्म के लिये बांसुरी ने सिंगरौटा प्रेम के सामने खोल दिया, उसमें से प्रेम चुटकी से सिन्दूर निकालने जा रहा था कि पंडित जी ने उसके हाथ में चांदी का सिक्का थमा दिया__

  ” इसमें सिंदूर पूरा भर कर मांग में भरो बेटा, सिंदूर चुटकी से भरने का खेल नही है। अब सिर्फ इसी जीवन के लिये नही बल्कि अगले सात जन्मों के लिये तुम दोनो पति पत्नि के रिश्ते में बँधते हो, आजीवन इस रिश्ते की पवित्रता और प्रेम को बनाये रखना।”

  प्रेम ने सिक्का लिया और कांपते हाथों से निरमा की मांग में सिंदूर भर दिया।
    उस समय पहली बार निरमा ने धीरे से आंखें ऊपर कर प्रेम का चेहरा एक पल को देखा और वापस नीचे देखने लगी।
    बहुत सारा सिंदूर माथे पर से फैल कर उसकी नाक पर गिर पड़ा, बांसुरी रुमाल निकाल साफ़ करने जा रही थी कि पंडित जी ने उसे टोक दिया__

  ” रहने दो ऐसे ही, सिंदूर नही पोन्छा जाता।”

  वो सहम कर पीछे हट गयी__

  ” और क्या बांसुरी पंडित जी सही कह रहे,नाक पर सिंदूर गिरना तो अपने इधर अच्छा शगुन मानतें हैं। कहतें हैं जिसकी नाक पर सिंदूर गिरता है उसका पति उसे खूब प्यार करता है।”

   मामी की प्रसन्नता उन्हें दो दिन पहले हुए हादसे को भी भुला चुकी थी, उनके लिये तो ये सिर्फ और सिर्फ खुशी का मौका था कि उनकी बेटी समान भांजी को इस बुरे वक्त में किसी ने इतने प्यार से उबार लिया था। हालांकि उनके लिये बेटा बेटी सब निरमा ही थी, उसकी शादी के कई अरमान भी थे लेकिन ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित हो गईं थीं उनमें निरमा ने शादी के लिये हाँ बोली और चट पट शादी निपट भी गयी यही अभी सबसे बड़ा सुकून था।

    विवाह संपन्न होते ही पिंकी और बांसुरी सभी का मुहँ मीठा कराने मिठाई लिये सबके पास पहुंच गये।
    राजा ने एक टुकड़ा उठाया और प्रेम के मुहँ में डाल कर उसे गले से लगा लिया__

   ” प्यार तो मैंने तुमसे हमेशा ही बहुत किया है प्रेम लेकिन आज तुम्हारे लिये मन में एक अलग सी आदर की भावना जाग गयी है। मैं जानता हूँ तुम कभी किसी के साथ ज्यादती नही होने दोगे और ये भी जानता हूँ कि इस रिश्ते को भी दिल से निभाओगे।
   वैसे तो तुम से छोटा हूँ फिर भी दिल खोल कर आशीर्वाद दे रहा हूँ खूब खुश रहो”

    प्रेम चुपचाप मिठाई निगल कर मुस्कुराता खड़ा रहा, उसे छोड़ राजा अगला टुकड़ा लिये निरमा के सामने जा खड़ा हुआ__

  ” भाभी हमारे परिवार में आपका स्वागत है! मैं आपका देवर अजातशत्रु! मेरे हाथ से तो मिठाई खानी ही पड़ेगी।”

    कुछ उसके परिचय देने का अंदाज़ निराला कुछ उसका अजीब सा नाम था कि निरमा जो अब तक मिठाई के लिये बांसुरी के साथ साथ मामी को भी मना कर चुकी थी राजा को मना नही कर पायी और चुपचाप उसके हाथ से मिठाई ले ली।

    प्रेम ने राजा को देखा और उसके साथ ही आगे बढ़ गया। उसके कंधे पर ड़ले उपवस्त्र से बंधी निरमा की चुन्नी खिंच गयी__

   ” अरे रुकिये! मैं भी तो हूँ। ” निरमा की आवाज़ सुन वो पलट कर खड़ा हो गया, और निरमा के आते ही वो सब वहाँ से घर के लिये निकल गये।

क्रमशः

aparna….




    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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