जीवनसाथी-41

जीवन साथी –41


     भास्कर की फ्लाईट लगभग सुबह साढ़े चार पर सिंगापुर लैंड हुई।
  अपना सामान समेट के बाहर आने के बाद वो टैक्सी के लिये देख ही रहा था कि अदिती का फ़ोन आ गया__

  ” पहुंच गये सेफली?”

  ” यस मैम! आप इतनी सुबह सुबह जाग गईं।”

  ” हम्म नींद ज़रा कच्ची ही लगी थी, अच्छा सुनो ऑफिस की गाड़ी तुम्हें लेने आती होगी, मैं गाड़ी का नम्बर और ड्राईवर का नाम नम्बर तुम्हें मेसेज कर रहीं हूँ, चेक कर लेना।”

  ” ओके ! और कुछ?”

  ” बस ! अभी के किये इतना ही काफी है।बाकी तुम रूम पर पहुंच जाओ फिर बातें करेंगे।”

  भास्कर मुस्कुराता हुआ टैक्सी का नम्बर ढ़ूँढ़ता आगे बढ गया।
  उसे खुद अपने आत्मविश्वास पर विश्वास नही हो रहा था । जिस दिन बांसुरी ने सारी बातें कही थी उस दिन उसने दिखाया हो या नही लेकिन दिल तो टूटा ही था। भले ही वो उसका प्यार ना रही हो लेकिन एक चाहत तो थी ही उसमें आखिर उसने अपनी भावी जीवनसन्गिनी को देख कितने सपने बुन लिये थे।
   उस बात के बाद उसे लगा था जैसे वो टूट जायेगा,बिखर जायेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ था। वो खुद आश्चर्य में था कि आखिर क्यों वो देवदास नही बन पा रहा था, कैसे उसने खुद को इतनी आसानी से संभाल लिया था, पर बार बार दिमाग पर ज़ोर देने के बावजूद वो इस बात की कोई कैफ़ियत खुद को नही दे पा रहा था।
    गमज़दा होने की जगह उसके अन्दर उत्साह का झरना क्यों फूटा जा रहा था? फिर ज्यादा सोच कर खुद को परेशान करने की जगह उसने खुद को समझा लिया कि ये सब काम में डूब जाने की वजह से ही हुआ है।

    वो अपने सिंगापोरियन फ्लैट पर पहुंच चुका था , और एक ही नज़र में उसे वो शांत सुथरी सी जगह पसंद आ गयी।
    फ्लैट के दरवाज़े पर ही एक पीले गुलाबों का बुके रखा था। चाबी दरवाज़े में घुमा कर वो बुके को हाथों में थामे घर के भीतर दाखिल हो गया।
     
       All the best ….. aditi..

  का टैग देख उसके चेहरे पे एक मुस्कान चली आयी।
गुलाबों को देखते ही उसे भेजने वाली का चेहरा नज़र आ गया था।
   वो मुस्कुरा कर उसे फ़ोन करने चला गया।

  *****

    राजा ने पहले ही प्रेम के अन्दर काम करने वालों को प्रेम के घर पर की साफ़ सफाई वगैरह करवाने की ताकीद कर दी थी।
    उन्हें भोपाल उतर कर अपनी रियासत पहुंचने में रात का नौ बज गया ….
     इतनी लम्बी यात्रा का निरमा के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है सारा वक्त प्रेम इसी उलझन में रहा। वो इंटरनेट पर अपने अजीबोगरीब सवाल डाल कर उससे भी अजीब उत्तरों को पढ़ पढ़ कर भ्रमित होता जा रहा था।
     एयरपोर्ट पर निरमा फ्रेश होने वॉश रूम गयी ।  हाथ मुहँ धोकर उसे कुछ राहत सी लगी, बहुत देर से बैठे बैठे पैरों में हल्की सूजन सी भी हो गयी थी।
  वो वॉशरूम से बाहर निकली ही थी कि सामने ही प्रेम इधर से उधर चहलकदमी करते दिख गया।
   वो उसके बाजू से गुज़र कर आगे बढ़ गयी, तब उसके पीछे धीमे कदमों से वो भी चला आया।
    निरमा के काँधे और पीठ पर टंगे बैग उसने उससे बिना कुछ कहे ही उतार कर खुद पकड़ लिये, प्रेम को एक नज़र देख निरमा आगे चली गयी।

     राजा और प्रेम को लेने महल से गाड़ी आ चुकी थी, ड्राईवर को पीछे दुसरी गाड़ी में आने को कह कर प्रेम ने ड्राइविंग सीट संभाल ली।

    प्रेम के बाजू वाली सीट पर बैठ कर राजा ने जैसे ही मोबाइल जेब से निकाल कर ऑन किया कि फ़ोन की घंटी घनघना उठी__

   ” कितनी देर से फ़ोन ट्राय कर रही थी, लग ही नही रहा था, अभी पहुँचे क्या??”

   ” सांस लोगी और मुझे भी लेने दोगी तब तो कुछ बोल पाऊंगा। और बांसुरी जी फ्लाइट में तो सभी को फ़ोन बंद रखना ही पड़ता है, चाहे ट्रैवल करने वाला कोई भी हो?”

  ” अच्छा? राजकुमार अजातशत्रु जी का जादू नही चला क्या एयर होस्टेस पर?”

  ” नही किसी एयरहोस्टेस का नाम बांसुरी जो नही था।”

    बांसुरी की खिलखिलाने की आवाज़ सुन वो भी चुपके से मुस्कुरा कर फिर चुप हो गया__

   ” चलो अब घर पहुंच कर बात करता हूँ, हाँ बाबा निरमा भाभी बिल्कुल ठीक हैं, हाँ हाँ तुम्हारे प्रेम भैय्या भी।”

     कहने को प्रेम राजा का मुख्य सुरक्षा कर्मी था लेकिन एक राजकुमार के मुख्य सुरक्षा अधिकारी के पद की गरिमा के आधार पर एक उंचे तगड़े वेतन के साथ साथ उसे कई अन्य सुविधायें भी महल से मिली थी।
   महल में काम करने वाले अधिकतर कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था महल परिसर में ही थी लेकिन उन सब में भी प्रेम के रहने को सबसे शानदार घर मिला हुआ था।
        दुमंजिले घर की देखभाल और साफ़ सफाई के लिये महल से ही ही एक सफाई कर्मी आया करता था और खाना बनाने को और घर की बाकी साज संभाल को एक बूढ़ी अम्मा को रानी माँ ने रख छोड़ा था।
   प्रेम उन्हें आदर से अम्मा ही कहा करता था।

    महल के मुख्य द्वार पर ही प्रेम की सिक्योरिटी टीम के सदस्य खड़े उसके स्वागत को उसकी बाट जोह रहे थे।

     प्रेम ने गाड़ी जैसे ही मुख्य महल की ओर मोड़ी राजा ने उससे पहले उसके घर चलने की गुजारिश कर दी__

  ” नही हुकुम पहले आपको सुरक्षित आपके महल पहुंचा दे फिर हम चले जायेंगे।”

   ” प्रेम बाबू, निरमा भाभी पहली बार आ रही हैं , उनका स्वागत क्या आप अकेले ही कर लेंगे, चलो अब ज्यादा बातें ना बनाओ, मोड़ लो। पहले तुम्हारे घर ही जायेंगे।

    प्रेम कभी राजा की बात टाल नही पाता था, उसने गाड़ी अपने घर की तरफ मोड़ ली।
   मेन गेट पर गाड़ी खड़ी कर प्रेम नीचे उतरा, उसे आज अपना ही घर बदला सा लग रहा था। बहुत ज्यादा ताम झाम करने को राजा ने ही मना कर रखा था वो भी समझता था कि इस वक्त बिना मतलब की साज सजावट दोनो के दिलों को दुखा सकती है। राजा के कहने पर प्रेम के मातहत ने गेट से लेकर मुख्य दरवाज़े तक फूलों की चादर सी बिछा दी थी। घर के दरवाज़े पर भी कुछ गेंदे की माला सजी थी।
    दरवाज़े पे हल्की चोट करते ही दरवाज़ा खुला और सामने अम्मा आरती का थाल लिये खड़ी नज़र आयीं।
   अम्मा ने आगे बढ़ कर प्रेम को तिलक लगाने के बाद निरमा के माथे पर भी कुमकुम का टीका लगा दिया।
   रिवाजों के कलश को बाएं पैर से भीतर ठेल कर निरमा ने घर भीतर प्रवेश किया, हालांकि उसे इन में से कुछ भी करने का मन नही था, लेकिन एक अपने मन की करनी को दुनिया से छिपाने आज उसे हर वो काम करना पड़ रहा था जो उसके मन मुताबिक ना था।

    इस घर के किसी भाग से वो परिचित नही थी लेकिन फिर भी इस घर की हवा में उसे सुकून की सांस आ रही थी।
    थकान के कारण बिना किसी के कुछ कहे ही वो आगे बढ़ कर सोफे पे बैठ गयी। उसके पीछे सारा सामान प्रेम और प्रेम का नौकर अन्दर लेता आया, राजा भी साथ ही अन्दर आकर बैठ गया। उन सब के वहाँ बैठते ही अम्मा रसोई से सबके लिये पानी और चाय ले आयीं….
       निरमा ने चाय के लिये अम्मा को इशारे से ही मना कर दिया__

  ” मुझे फ्रेश होना था, यहाँ कहाँ ….? निरमा के सवाल को अधूरा ही छोड़ प्रेम ने उसे उपर की ओर इशारा कर दिया__
 
  ” आईये मैं आपको आपके कमरे तक छोड़ दूँ।”

  दो दिनों में पहली बार प्रेम ने निरमा से कुछ कहा था, वो उसके पीछे चुपचाप सर झुकाये सीढ़ियाँ चढ़ गयी, अम्मा इस अजीब गुमसुम से नये नवेले जोड़े को देख और कुछ कह नही पायीं__

  ” प्रेम अब तुम घर ही रुको, मैं चलता हूँ ” राजा प्रेम की बात सुने बिना ही फिर महल के लिये निकल गया।

   ” हुकुम सुनिये तो….प्रेम की पुकार हवा में ही कहीं खो कर रह गयी।
  वो ऊपर टैरेस पर खड़ा राजा को जाते देखता रह गया।
    उसने नीचे आ कर बाकी मातहतों की भी छुट्टी कर उन्हें घर वापस भेज दिया __

  ” बेटा खाना बना कर इधर टेबल पर सब कुछ रख दिये हैं, तुम और बहुरिया खा लेना, हमें आज ज़रा रानी साहिबा ने भी बुलाया था, वहीं जा रहे।”

  ” ठीक है अम्मा, आप जाइये , मैं परोस लूंगा।”

  ” अरे तुम काहे परोसोगे,दुल्हन भी तो परोस सकती हैं। अच्छा नई नवेली भी तो हैं, आ जाओ बेटा, हमीं परोस के खिला के फिर जायेंगे।”

  ” अरे नही नही अम्मा तुम जाओ। रानी साहिबा ने किसी काम से ही याद किया होगा।”
   अम्मा के बार बार मना करने पर भी फिर प्रेम नही माना और उन्हें वापस भेज ही दिया।

    रसोई में जाकर उसने नीम्बू पानी बनाया और लाकर टेबल पर रख दिया…. निरमा से पहले आज तक उसने कभी किसी लड़की से बात तक नही की थी।
  
   उसके पिता किसी ज़माने में राज महल के मुनीम हुआ करते थे, एक हादसे में उनके और उनकी पत्नि के गुज़र जाने के बाद राजा जी ने प्रेम और प्रताप की जिम्मेदारी खुद उठा ली थी।
   मुनीम ने अपने जीवन काल में अपने किसी रिश्तेदार को कभी मुहँ नही लगाया था, इसी से उनकी मौत के बाद उनकी संतानों की तरफ से सभी रिश्तेदारों ने आन्खे मूंद ली थी।  कुछ एक आध आये भी तो मुनीम की लम्बी चौडी वसीयत के लालच में जिन्हें राजा जी की अनुभवी आंखों ने पहचान कर दूध की मक्खी सा रियासत के बाहर फेंक दिया।
    उस वक्त प्रेम ग्यारह का और प्रताप छै बरस का था। रुपये पैसों की कमी ना थी, पहले पहल खाना पीना राजभवन में ही हो जाता था, फिर स्कूल और बाकी वजहों से समय की दिक्कत होने लगी जिसके कारण  दोनों भाई महल परिसर में स्थित अपने घर पर ही खाने पीने लगे।
  
      रियासत में ही राजा जी का स्कूल था जहां राजमहल के बच्चों के साथ पढ़ते खेलते कूदते ही प्रेम प्रताप भी बड़े हुए थे।
   कॉलेज की पढ़ाई जहां प्रेम ने भोपाल से ही कर ली वहीं प्रताप की बाहर जाने की इच्छा पर भी मुहर लगा दी और उसे उसकी इच्छानुसार मुम्बई पढ़ने भेज दिया।
 
     राजा प्रेम और प्रताप के बीच की उमर का था, प्रेम से दो साल छोटा और प्रताप से तीन साल बड़ा, इसी से उसकी दोस्ती दोनो ही से बराबर थी।
     लेकिन उम्र बढ़ने के साथ राजा का झुकाव प्रेम की तरफ बढ़ता चला गया।
  राजा के पिता प्रेम को भी मुनिम गिरी थमाना चाहते थे पर अपने जिम के शौक के कारण दोनो ही दोस्तो ने अच्छा खासा सौष्ठव बनाये रखा था, उसके बाद एक के ऊपर एक राजा पे होते हमलों में उसकी रक्षा  करते प्रेम को राजा का मुख्य सुरक्षा अधिकारी नियुक्त कर दिया गया ।

      निरमा ऊपर जाने के बाद से नीचे उतरी ही नही थी।
     सुबह से भाग दौड़ कर के थक ना गयी हो , यही सोच कर प्रेम ऊपर चला आया। उसने निरमा को प्रताप के कमरे का पता बताया था, वो दरवाज़े के बाहर से उसे आवाज़ देना चाहता था लेकिन निरमा को क्या कह कर बुलाना सही रहेगा यही नही समझ पा रहा था, आखिर उसने पांच मिनट बाहर खड़े रहने के बाद धीरे से दरवाज़ा खटका दिया, अन्दर से कोई आवाज़ ना आने पर उसने धीरे से एक बार फिर खटका किया लेकिन जब फिर कोई आवाज़ ना आयी तो वो दरवाज़े को धीरे से अन्दर की ओर सरकाता भीतर चला आया।

     सफर की थकान से थकी निरमा बिस्तर पर अधलेटी ही सो गयी थी। आधे पैर बिस्तर से नीचे पड़े थे, एक हाथ आंखों के ऊपर रखा था, और दुपट्टा फर्श पर पड़ा था, ऐसा लग रहा था, पलंग के किनारे से टिकी बैठी निरमा की वैसी ही आंखे लग गईं थी।

   हाथ में पकड़े नीम्बू पानी को किनारे की तिपाई पर ढ़क कर रखने के बाद प्रेम ने आगे बढ़ कर दुपट्टा उठाया और वहीं एक कुर्सी पर रख दिया।
      खिड़की खुली रह गयी थी, जिससे ठंडी हवा अन्दर चली आ रही थी, उसने आगे बढ़ कर खिड़की बंद की….दोहड़ खोल कर निरमा के पैरों पर डाला और बत्ती बुझा कर बाहर निकल गया।

    जाते हुए उसने कमरे का दरवाज़ा भी बाहर की ओर खींच लिया। उस कमरे से लगा कमरा उसका खुद का था।
  उसने उपर आते समय ही निरमा का सारा सामान प्रताप वाले कमरे में रख कर उसे उसी वक्त बता दिया था कि आज से ये कमरा निरमा का है, और अगर उसे कुछ भी चाहिये तो बाजू वाले कमरे में वो खुद मौजूद रहेगा।

   कहने को तो उस समय कह गया लेकिन अब जब उस पूरे घर में उसके और निरमा के अलावा कोई ना था उसे एक अजीब सी बेचैनी ने घेरना शुरु कर दिया था।
    उसके ठीक बगल वाले कमरे में एक लड़की सो रही थी, पूरी दुनिया से निश्चिंत होकर। सिर्फ एक दीवार की दूरी पर थी वो, जिसे चार दिन पहले तक वो जानता तक नही था आज उसके पीछे सारी दुनिया छोड़ कर चली आयी थी…….उसकी जीवनसन्गिनी ….. या….उसके छोटे भाई की प्रेयसी…..
     कहीं उसने जल्दबाजी और बच्चे के लालच में कोई गलत फैसला तो नही ले लिया था।
   आज तक कोई उसके चारित्र पर उंगली उठाने की ज़ुर्रत ना कर सका था फिर आज अचानक बाजू वाले कमरे में सोयी लड़की क्यों उसके पुरुषत्व को ऐसे ललकार गयी थी।
     क्यों बार बार उसका ध्यान हर तरफ से हट कर उसी पे जा टिक रहा था।
     वो तो आज तक बहुत मज़बूत रहा था, फिर आज उसका कलेजा क्यों उस सामान्य सी लड़की के लिये पिघला जा रहा था?
   क्या ये सिर्फ सिम्पथी थी या और कुछ?

    हाँ सिर्फ और सिर्फ दया ही थी, उस बेज़ुबान की हालत पर तरस ही तो था ये…..
    खुद को समझाने पर भी प्रेम का मन ये बात मान क्यों नही पा रहा था।

   ज्यादा सोचने की उसकी आदत नही थी, वो अपने कमरे की बालकनी पे जा खड़ा हुआ , उसकी बालकनी ऐसी थी जहां से राजा का कमरा साफ़ नज़र आता था, उसने देखा उसके हुकुम भी अपनी बाल्कनी में फ़ोन लिये टहल रहे थे।
   उसके चेहरे पर बांसुरी को याद कर एक मुस्कान चली आयी, उसने सोचा एक बार बांसुरी को फ़ोन कर लेना चाहिये फिर राजा कों फ़ोन में बातें करते देख वो समझ गया कि हमेशा फ़ोन से भागने वाला राजा अगर फ़ोन पे है इसका मतलब वो किसी अति आवश्यक परिचर्चा में किसी अति महत्वपूर्ण व्यक्ति के साथ लगा हुआ है।
   और वो व्यक्ति बांसुरी ही होगी।

  मुस्कुरा कर वो वही रखी कुर्सी पर बैठा आस्माँ की ओर देखता अपने छोटे को याद करने लगा, वो भी तो उससे दूर उन्हीं किन्हीं तारों में शामिल हो गया था आखिर।

    मृत्यु का दुख अकल्पनीय होता है, और जब कोई अपना हमेशा के लिये छोड़ जाता है तब इस दुख का वारापर नही रहता लेकिन ये भी अकाट्य सत्य है कि  जाने वाले के साथ कोई दुनिया छोड़ कर नही जा पाता।
      आंसू भी एक हद तक बह कर सूखने लगतें हैं, और मानव मन खुद को उसी परिस्थिती में जिवित रहने को आवश्यक चीज़ें करने को बाध्य कर देता है।
    प्रताप की अकस्मात मृत्यु की चोट प्रेम के लिये बहुत बड़ी थी, इतनी बड़ी कि अगर प्रताप के बच्चे का सवाल ना होता तो उसका जाने क्या होता?
   लेकिन प्रताप के उस अंश में प्रेम को जीने का बहाना मिल गया। और फिर राजा ने भी इन तीन चार दिनों में उसे एक पल को अकेला ना छोड़ा था, उसके साथ ने भी संबल बन उसे प्रताप के दुख से उबार लिया था।

   मनुष्य की खुद के जिंदा रहने की जिजीविषा से ऊपर कुछ नही होता, यही मानव पृकृति है सहज स्वभाव है …..

******

इधर राजा वाकई उस वक्त बांसुरी से ही फ़ोन पर बात कर रहा था__

  ” अच्छे से पहुंच गये ना?”

  ” अरे कहाँ अच्छे से पहुंचा? आधा तो वहीं तुम्हारे पास रह गया”

  ” बस बातें बनवा लो ठाकुर साहब से”

  ” और मंत्र फूंकवा लो पंडिताईंन से, आंखों से ही जादू टोना सब कर जाती है…..

      दोनो अपने में मगन शायद सारी रात बातें करते बीता जाते कि उसी वक्त राजा की छोटी माँ उसके कमरे में चलीं आईं __

  ” कुमार ! आप बाहर हैं क्या?”

  छोटी माँ की आवाज़ सुन राजा कमरे में चला आया__

  ” आईये मॉम, बैठिए।

  ” आप अगर व्यस्त हैं कुमार तो हम बाद में आ जायेंगे।”

  ” नही मॉम ऐसी कोई बात नही, आप बताइये कैसे आना हुआ?”

  ” अपने बेटे के कमरे में आने के लिये भी हमें किसी बहाने की ज़रूरत है क्या?”

  ” कैसी बात कर रहीं हैं? आपने मुझे बुला भेजा होता, मैं ही आ जाता।”

  ” आप थक कर आये हैं, हम जानतें हैं….अच्छा कुमार आपसे कुछ पूछना था?”

  ” जी !”

   ” पहला तो हमें ये बताइये कि आपका दायां हाथ कैसा है? अभी भी बाजू में परेशानी है क्या?”

  ” नही मॉम! अब तो काफी आराम है, हाँ कभी कभी ज़रा दर्द उभरता है लेकिन वैसी कोई खास परेशानी नही है।”

  ” तो फिर ठाकुर साहब की बिटिया से ऐसा क्यों कहा आपने कुमार?”

   राजा को पता नही था कि रेखा और उसके पिता इतनी जल्दी उसकी कारगुज़ारी उसके घर पहुंचा जायेंगे।

   ” जी वो डॉक्टर ने जो कहा था वही बताया मॉम! वो लोग कुछ कह रहे थे क्या?”

   ” मिलने आना चाहते हैं, एक बार फिर से!”

   ” फिर क्यों? वो तो एक बार मिल चुके हैं ना”

  ” हमें क्या पता? अच्छा सुनो कुमार प्रेम के भाई के बारे में जो पता चला बड़ा दुखद था लेकिन एक बात समझ नही आयी कि अपने भाई की मौत के दो दिन में ही प्रेम ने शादी कैसे कर ली….

  राजा पहले से ही जानता था कि उसे इस सवाल का सामना करना ही पड़ेगा, और इसिलिए वो पूरी तैयारी से बैठा था__

  ” मॉम प्रेम के किसी दूर के रिश्तेदार ने प्रेम को कुछ समय पहले एक चिट्ठी भेजी थी। आप तो प्रेम का स्वभाव जानती ही हैं, दूर दूर के रिश्तों को भी बहुत मानता है, चिट्ठी में लिखा था की प्रेम के दादा ने अपने किसी मित्र की पोती से प्रेम का रिश्ता जोड़ रखा था, अब प्रेम के दादा तो रहे नही कि जिनसे बात पूछी जाती इसलिये चिट्ठी की बात माननी पड़ी … उसमें ये भी  लिखा था कि अब उस लड़की के दादा जी भी परलोक सिधार गयें है और लड़की फिलहाल अपने मामा मामी के पास रह रही है, दोनों की शादी तय थी।
  अभी जब हम लोग मुम्बई गये तब निरमा की मामी एकदम पीछे पड़ गयी कि सगाई वगैरह की औपचारिकता की जगह सीधा शादी की जाये, सभी खुश थे। प्रेम की तरफ से तो मैं ही बस था मैंने और मामी जी ने मिल कर पण्डित जी से बात की, दोनो की कुंडली के अनुसार जो तारीख निश्चित हुई उसी तारीख में शादी के लिये हम सभी ने इन दोनो को मना लिया, क्योंकि पण्डित के अनुसार अगर ये मुहूर्त छूटता तो फिर अगले दो साल इन  दोनों के लिये कोई मुहुर्त ना था। और शादी के दो दिन पहले ही एक हादसे में प्रताप…

   ” ओह्ह तो ये बात थी?”

  ” हाँ मॉम! फिर प्रेम को तो आप जानती ही हैं, दुख में तो था लेकिन फिर सबके समझाने पर उसने सबकी बात की लाज रखी और शादी करने को तैय्यार हो गया, लेकिन मॉम आप प्लीज़ उसके और निरमा के सामने ध्यान रखना कि ये सारी बातें उन दोनो के सामने कोई ना कहे, आप समझ सकतीं हैं ना मॉम!”

  ” हम समझतें हैं कुमार! सुनो हम सोच रहे कल दोनो को खाने पर बुला लेते हैं।”

  ” कुछ दिन रुक जाइये , वो थोड़ा उबर जाये फिर आप उसे खिला पिला कर खुश हो लीजियेगा।”

  ” अच्छी बात है ।”

   राजा प्रेम की रग रग से वाकिफ था, फ़िज़ूल के रीति-रिवाजों को जिन्हें निभाने का कोई ठोस कारण ना मालूम हो निभाने में प्रेम यकीन नही करता था, वहाँ मुम्बई में  निरमा की मामी के मन में भी एक बार को यह शंका उठी थी लेकिन पंडित जी की एक दिवसीय सर्वपूजा के मौलिक प्रयोग ने उनकी जिव्हा पर ताला जड़ दिया था, वैसे भी मन से तो वो खुद निरमा की अवस्था के कारण एक पल की भी देर नही चाहती थीं__

   ” ये सारे रिवाज इसिलिए होतें हैं मामी जी कि इसके बहाने ही रिश्तेदार जुड़ जातें हैं और शोकाकुल परिवार को ढाँढस बंधा जाते हैं, यहाँ ना रीति ना रिश्ता फिर काहे का ये सब दिखावा। और फिर जब वो कहीं गया ही नही तो मैं क्यों उसका श्राद्ध करुँ।”

   प्रेम अपने मन की भड़ास निकाल वहाँ से उठ कर बाहर निकल गया था, उसके ऐसा कहने के बाद फिर मामी जी के पास कोई और कारण बचता भी नही था।

  उसी समय राजा को समझ आ गया था कि ये सारे प्रश्न आगे भी उठेंगे और इसिलिए उसकी सोची कहानी आज मॉम को सुनाने के काम आ गयी। कहानी नाटकीय तो थी लेकिन सच्चाई सब को हज़म नही होती और दुसरी बात ये कि जिस शर्मिंदगी से निरमा को बचाने के लिये इतना बड़ा निर्णय लिया था वो बेमकसद बेमानी हो जाता।

   ” मॉम! आपसे कुछ बात कहनी थी।”

   ” हाँ बोलो कुमार!”

   ” कैसे कहूँ समझ नही पा रहा हूँ? असल में मैं रेखा से शादी नही कर पाऊंगा। बल्कि कहना चाहिये रेखा से ही क्या किसी भी लड़की…..

” लेकिन क्यों ? कोई प्रॉब्लम है?”

   ” मॉम! मैं किसी को पसंद करने लगा हूँ, लेकिन आपकी मर्ज़ी के खिलाफ जाकर कुछ नही करूंगा, ये आप भी जानती हैं……

    रानी साहेब के चेहरे का रंग पल पल बदलने लगा, वो कुछ सोचती वहाँ से उठ खड़ी हुईं, इधर से उधर टहलती हुई रानी साहेब के माथे पर शिकन उभर आयी।

    ” कुमार !
         ठाकुर साहब आपका टीका करने ही आ रहे हैं, उन्हें या उनकी बेटी को आपके हाथ वाले प्रॉब्लम से कोई शिकायत नही है…..और हम और साहेब सोच रहे थे कि उनके टीका करने के बाद ही आपका राजतिलक भी कर दिया जायेगा।
    अब सम्भालो अपना राजपाट और छुट्टी दो हमें। हम और साहेब कुछ समय के लिये आस्ट्रेलिया जाना चाहते थे लेकिन आपने ये नया धमाका कर दिया….लड़की कौन है ? कहाँ की है?”

  ” जी आप मिल चुकी हैं मॉम! बांसुरी!”

   रानी साहेब की त्योरियां चढ़ गईं लेकिन फिर उन्होने खुद को जल्दी ही संभाल लिया और मन की कड़वाहट को चेहरे पर आने नही दिया__

   ” पर वो तो एक साधारण परिवार की लड़की है ना शायद।”

   ” जी हाँ! लेकिन मुझे पता है आपके साथ रह कर वो आपकी तरह असाधारण बन जायेगी।”

  एक तीखी मुस्कान देकर रानी साहेब ने बोलना जारी रखा__

  ” हमारा वो मतलब नही था कुमार! हम कहना चाहते थे वो किसी राजघराने से नही है, एक सामान्य परिवार की सामान्य सी लड़की में आखिर आपने क्या देखा जो शादी के लिये सोच बैठे?
      देखीए आप राजकुमार हैं!  आपकी ज़िंदगी के महत्वपूर्ण निर्णय अकेले आप नही ले सकते। राज भवन के अपने प्रोटोकॉल होतें हैं, आपका विवाह कोई साधारण विवाह तो होगा नही जो किसी साधारण लड़की से हो जाये।
      विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णय को ऐसे चुटकी बजा के नही लिया जाता, कि हाँ ये लड़की अच्छी लगी इसी से कर लेंगे।
   कल को आपको अगर किसी बैकअप की ज़रूरत पड़ी तो आपके श्वसुर में इतनी काबिलियत तो हो कि आपको सपोर्ट कर सकें।
   आप हमारी बात समझ रहें हैं ना! वैसे कुमार आप हमारे सबसे समझदार बच्चे हैं। विराज का हाल तो पता ही है आपको, उनका आये दिन कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ चलता ही रहता है।

  ” क्या हुआ मॉम? फिर विराज ने कुछ किया क्या?”

  ” वो कब शांत बैठतें हैं ? अभी कल रात ही भोपाल के किसी बार में हंगामा कर दिया, फिर वही सब पुलिस का ड्रामा ! युवराज जाकर उन्हें वहाँ से लेकर आये ।
         वो तो साहेब का नाम सब जानतें हैं इसलिये अखबारों में नाम आने से बच जाता है पर इज्जत तो रखी नही है उन्होनें।
     अब तो ये डायनेस्टी राजभवन सब नाम का रह गया है कुमार! एक तरह से हम भी व्यवसायी ही तो बन कर रह गयें हैं। सोचिये अगर युवराज और आप ना संभाले तो हमारे इतने लम्बे चौड़े बिज़नेस का क्या होगा। विराट तो फिर भी कुछ सीखना चाहता है आप लोगों से और सीख भी रहा है लेकिन विराज ….

  ” मॉम वो भी संभल जायेगा, आप चिंता ना करें।”

   ” बहुत परेशानियाँ हैं कुमार, हम इस लड़के को लेकर बहुत चिंतित है अब ऐसे में आप अपना एक नया राग लेकर बैठ गये, हम क्या क्या देखें। इन्हीं सब चिंताओं का नमक खून में घुल घुल कर हमारी कनपटी पर हथौड़े मारता रहता है, साहेब खुद इतने रोग पाले बैठें हैं कि एक के लिये दवा देतें हैं तो दूसरा अंग बिगड़ा जाता है, अब वो खाने से ज्यादा दवाएं लेते हैं…आप बताइये क्या करें हम?”

    राजा के ज़ज़्बात दिल में घुमड़ रहे थे लेकिन शब्द ज़बान में कहीं अटक कर रह गये, रानी साहेब की परेशानियों के बीच अपनी खुद की शादी की बात कितनी तुच्छ और स्वार्थी लगने लगी थी…..

    जीवन क्यों वैसा नही हो पाता जैसा चाहा जाता है….कहने वाले कह गये कि जो मन का हुआ तो अच्छा और जो मन का ना हुआ तो वो और भी अच्छा।
   सुन कर सुकून तो मिल जाता है लेकिन क्या हर बार ये सही हो पाता है? रेखा से बेमन का रिश्ता जोड़ कर क्या वो खुश रह पायेगा?
   नही कभी नही ? आज तक उसने अपनी खुशी के लिये कभी किसी से कुछ नही मांगा था, उल्टा हर किसी की खुशी के लिये जी जान लगा दिया था । फिर ईश्वर उसके साथ कैसे ऐसी नाइंसाफ़ी कर सकतें हैं?

   बांसुरी हमेशा उसे कहती है ना __ “चिंता मत करो गणेश सब अच्छा करेंगे”
   आज उसका भी मन रो रोकर गणेश जी को पुकार रहा था, कुछ तो ऐसा कर दो प्रभु कि बिना कुछ किये ही बात बन जाये…..

    वो जाने कब से ज़मीन पर नजरें गड़ाये अपनी सोच में डूबा था, रानी साहेब उसके बालों पर एक बार स्नेह से हाथ फिरा कर बाहर निकल गईं थी।

    उसे बांसुरी की याद सताने लगी थी, उसे कॉल करने फ़ोन उठाया लेकिन फिर समय देख कर रुक गया, उसे मालूम था, अगले दिन सुबह सुबह बांसुरी को अपने घर के लिये निकलना था, वो भी अपने घर पर बात करने ही जा रही थी।
     लेकिन उससे किया वादा कि तुम पहुँचो मैं तुम्हारे पीछे पीछे पहुंचता हूँ अब कितना सार्थक हो पायेगा ये राजा नही समझ पा रहा था।

   कौन था जो उसकी समस्या समझ कर उसे दिलासा दे सकता था__ प्रेम?
   लेकिन प्रेम भी अब अकेला नही था, उसके साथ उसकी पत्नि थी, राजा के चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी__ उसके जीवन से जुड़े लोग कोई भी साधारण कहाँ था?
    रुपये पैसे रूतबे से किसी का व्यक्तित्व थोड़े ही तोला जा सकता है। ऐसे तो विराज प्रेम से कहीं अधिक ऊपर जा बैठता है पर सच्चाई उसका दिल जानता था।

    बस अब उसे अगली सुबह का इन्तजार था, जब उसे अपने महल वासीयों को इस बात का परिचय देना था कि उसकी पसंद सामान्य नही बल्कि असाधारण है…..

क्रमशः

aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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