जीवनसाथी-42

जीवन साथी-42


       सुबह सवेरे जल्दी उठ कर गणेश जी के सामने दीपक जला कर उन्हें प्रणाम कर बांसुरी अपने घर के लिये निकल गयी। अगले दिन दीवाली थी….आज रूप चौदस थी, बचपन से उसकी माँ आज के दिन उन दोनो बहनों को सुबह चार बजे ही उठा देती थी ….     अगरु चंदन का लेप कर ही आज के दिन उनके घर पर स्नान पूर्ण होता था और दीवाली के नये कपड़े भी आज ही पहने जाते थे।
     अमावस्या को किस ब्राम्हण घर में नये कपड़े पहने जाते हैं?
   उसने बचपन से चली आ रही प्रथा को आज भी निभा लिया, सुबह 6 बजे की फ्लाईट थी रायपुर के लिये।
       साढ़े सात पर रायपुर उतर वो कैब के लिये बाहर निकली की सामने खड़े माँ पापा पर उसकी नज़र पड़ गयी, वो भाग कर अपनी माँ के गले से लग गयी।

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    खिड़की से आती हल्की सी रोशनी के कारण या शायद प्यास से गला सूखने के कारण सुबह सवेरे ही निरमा की आँख खुल गयी।
    उसने देखा सिरहाने पानी की भरी बोतल और एक गिलास रखा था, पानी पीकर वो उठी और कमरे का दरवाज़ा खोल बाहर निकल आयी…..सामने हरियाला बगीचा लहलहा रहा था, एक से बढ कर एक पौधे फूल मुस्कुरा कर जैसे उसका स्वागत कर रहे थे….बहुत देर तक फूलों को देख कर भी मन नही भर रहा था, वहाँ से नज़रे हटी तो सामने महल पर जा टिकी।
    उसने अपने जीवन में पहली बार इतना भव्य महल देखा था, उसकी भव्यता में मंत्रमुग्ध वो कुछ देर को खुद को भी भूल गयी।
      अब तक मुम्बई में हुई सारी बातचीत से उसे इतना तो पता चल ही गया था कि राजा किसी रियासत का राजकुमार है, लेकिन वो रियासत ऐसी शानदार होगी ये उसने सोचा नही था…..

    वो खुद जिस घर की उपरी मंज़िल पर खड़ी थी वो भी कोई साधारण सा घर नही था।
     औरतें कितनी भी मुश्किल में हों लेकिन उन्हें अपने रहने की जगह , उसकी साज सजावट से एक अलग किस्म की मुहब्बत होती है एक अलग सा लगाव होता है….वही लगाव वही चाह उसे भी इस अनजाने घर को घूम कर देखने के लिये खींचने लगी…..
        वो अपने कमरे से बाहर निकल आयी , बाहर गोल बरामदे से होकर सीढ़ियाँ नीचे को जा रही थीं।
      इधर उधर घूमती वो नीचे उतरने जा रही थी कि अपने कमरे के बाजू वाले कमरे का दरवाज़ा हल्का खुला देख वो उसके पास चली आयी, अनजाने में हाथ से लगा हल्का सा धक्का दरवाज़ा खोल गया…..
    सामने पलंग पर प्रेम गहरी नींद सोया पड़ा था, जैसे जाने कितने दिनों बाद उसे नींद मिली थी। कमीज एक तरफ कुर्सी पर पड़ी थी। सिर्फ लोवर में उसे सोये देख निरमा एकदम से दुसरी तरफ मुहँ कर तुरंत बाहर निकल गयी, लेकिन उसी जल्दबाजी में दरवाज़े से हुई उसकी भिड़ंत की आवाज़ से वो चौंक कर जाग गया।
    हालांकि उसके पलटने तक में निरमा नीचे जा चुकी थी लेकिन फिर ये समझ आते ही कि शायद वो ही वहाँ गलती से चली आयी होगी उसे वापस दुबारा सोने का जी नही किया।
    निरमा रसोई की आलमारियों को खोलती बंद करती कुछ ढूंढने की कोशिश कर रही थी कि उतनी देर में वो भी वहीं चला आया__

  ” कुछ चाहिये आपको?”

  उसके प्रश्न के साथ ही वो एकाएक चौंक गयी__

  ” बहुत जल्दी जाग गये आप?”

  ” मैं इसी वक्त पर उठता हूँ …आप भी तो उठ गयी, नींद ठीक से आयी ना?”

  छोटा सा हाँ बोल वो वापस ढूंढने लगी__

  ” कॉफ़ी ढूंढ रही हूँ! आज कल चाय भाती नही , आज बड़े दिनों बाद मॉर्निंग सिकनेस कम है तो कॉफ़ी पीने का मन करने लगा।”

  ” ओके आप दूध चढ़ा लिजिये, कॉफ़ी अभी आ जायेगी।”

  ” नही नही ऐसी भी कोई खास ज़रूरत नही है….पर निरमा पीछे से आवाज़ लगाती रह गयी उतनी देर में प्रेम गाड़ी की चाबी उठाये बाहर निकल गया।

   निरमा भी मुहँ हाथ धोने चली गयी, उसके नहा धो कर नीचे आते में प्रेम ने कॉफ़ी चढ़ा ली थी__

   ” पता नही कैसी बनी होगी? मुझे किचन का कोई काम नही आता!”

   निरमा हल्का सा मुस्कुरा कर रह गयी__

” अब मन नही कर रहा, उसी समय तेज़ हूक उठी थी, एकदम से कॉफ़ी की खुशबू के लिये पागलपन छाया जा रहा था। पर अब ठीक हूं,अब ज़रूरत नही है।”

  ” हाँ ऐसा होता है, मैने इंटरनेट पर पढा है इस बारे में।”

  ” अच्छा?” अपने में खोयी सी निरमा ने प्रेम को देखा और सामने रखा कप आखिर उठा लिया।
  बेचारा बिना मुहँ धोये ही कॉफ़ी लेने भाग गया था अब ऐसे में उसकी बनाई कॉफ़ी ना पीना निरमा को अच्छा नही लगा।
   वो अपने गुमसुम स्वभाव से उसे परेशान नही करना चाहती थी।
   वैसे भी वो अभी महल चला जायेगा फिर रात से पहले लौटेगा नही तो उससे ज्यादा आमना सामना तो होना है नही।
   यही सोच कर उसे थोड़ी राहत थी…..
        अपने सीमित और नपेतुले शब्दो में प्रेम ने उसे घर पे आने वाले कामगारों और अम्मा के बारे में बता दिया और नहाने घुस गया।
      उसकी महल निकलने की तैय्यारी थी कि अम्मा उसके लिये चाय और नाश्ता बना लायी।
   उसी समय निरमा भी ऊपर से नीचे चली आयी।
अपने ध्यान में मगन प्रेम ने अम्मा को ही काम बताना शुरु कर दिया__

  ” अम्मा काली को बोल कर ऊपर दोनो कमरों में झाड़ू कटका करवा लेना और बिस्तर समेटवा लेना, खिड़कियाँ सारी खुलवा देना और बाथरूम भी दोनो साफ़ करवाना….

  ” अरे पर बाबू एक मिनट , ये दोनो कमरा काहे करवाना है तुम दोनो तो एक ही कमरे में सोये होगे ना! तो दूसरा काहे इतना साफ़ सफाई करा रहे, वो तो वैसे भी साफ़ रखा है।”

   अम्मा की बात सुन प्रेम और निरमा की नज़र एक सेकंड को एक दूसरे से मिली और प्रेम सर झुकाये बाहर निकल गया…..

   उसके जाते ही निरमा नीचे सोफे पर आराम से बैठ गयी, अम्मा उसके लिये भी नाश्ता ले आयीं लेकिन उसका इस वक्त नाश्ते को देखने का भी जी नही किया।
    कुछ देर चुपचाप टीवी पर इधर उधर चैनल बदलने के बाद वो एक डायरी और पेन लिये बाहर बगीचे में लगी बैंच पर जा बैठी।
    सामने महल नज़र आ रहा था….बाहर से इतना भव्य और सजीला दिखने वाला महल अन्दर से कितनी कडवाहट समेटे बैठा था ये देखने वालों को क्या मालूम चलता…..

……वहाँ उसी वक्त पर महल के भीतर हर एक कोई अपनी अपनी कुर्सी संभाले बैठा था, नाश्ते का वक्त था… राजा साहेब की एक रात पहले तबीयत कुछ सही ना होने के कारण वो आज अभी तक खाने की मेज़ पर नही आये थे…उन्हीं का इन्तजार हो रहा था।

  दादी से ये सुनते ही कि डैड की तबीयत रात में कुछ बिगड़ गई थी राजा का चेहरा लटक गया अब ऐसे बिगड़ी तबीयत में वह कैसे बांसुरी और अपने बारे में घर के सभी लोगों से बात कर पाएगा उसके मुरझाए चेहरे को देख एक पल को युवराज को कुछ खटका हुआ और उन्होंने उसे इशारे से पूछा भी, लेकिन सब ठीक है का इशारा कर वो चुप चाप क्या बोलना हैं कैसे बोलना है यही सोचता रहा।

    रानी साहेब के साथ जैसे ही राजा साहेब ने प्रवेश किया दादी के अलावा सभी  अपनी अपनी जगह पर खड़े हो गए अपनी कुर्सी पर पहुंचकर राजा साहब ने इशारा किया और अपनी जगह ले ली राजा ने देखा डैड का चेहरा वाकई मुरझा गया था ऐसा लग रहा था चेहरे का पूरा रक्त किसी ने निचोड़ लिया था वह क्यों इतने बीमार से नजर आ रहे थे आखिर ऐसी क्या बात थी जो एक ही रात में डैड की तबीयत पर इतना असर हो गया था ।
   वह अपनी बात कहना है या नहीं यही सोच रहा था कि मॉम ने अपनी बात छेड़ दी___

  ” हम आज आप सभी से कुछ बहुत जरूरी बात कहना  चाहते हैं….” रानी साहेब ने एक नजर राजा के ऊपर डाली फिर वहां बैठे सभी लोगों को देखते हुए उन्होंने आगे कहना जारी रखा

” कल रात हम  कुमार के कमरे में गए थे कुमार से हमारी कुछ बातचीत हुई है वही हमें आप सबसे शेयर करनी है हमें नहीं पता कुमार सही है या गलत लेकिन अगर उनके मन में कुछ आया है तो उस बात को आप सभी को मालूम होना चाहिए हम चाहते हैं यहां बैठे सभी लोग इस बात पर अपनी राय रखें और उसके बाद ही हम कोई फैसला लें।
     कुमार अपनी मर्जी से शादी करना चाहते हैं वह भी किसी राजघराने की राजकुमारी से नहीं एक अदना सी साधारण सी लड़की बांसुरी से…..  बांसुरी वही है जो पिंकी की दोस्त बनकर कुछ दिनों पहले हमारे महल में आई थी कुछ दिन यहां रहीं थीं। लड़की सीधी है सुंदर भी है लेकिन आखिर उसमें राजघराने का खून तो है नहीं….
      कुमार हमारा यही कहना है अगर पूर्वजों ने कुछ नियम बनाए हैं तो उनके पीछे कुछ ना कुछ वैज्ञानिक कारण भी है…..ये स्वजातीय विवाह सम्बंधों के भी अपने कारण होतें हैं बेटा! हम कैसे और क्या क्या समझायें…..
         वह साधारण सी लड़की क्या सच में हमारे खानदान की बहू बनने के योग्य है?  हमें तो नहीं लगता कि वह कहीं से भी आपके लायक है । लेकिन फिर भी आपने अपनी बात रखी है इसलिए हम चाहते हैं कि बाकी लोग भी इस बात पर अपनी राय दें।”

   राजा साहब अभी भी चुप बैठे थे अपने कांटे छुरी से खेलते वह फलों को धीरे धीरे निगल रहे थे।

   अब तक सभी चुप बैठे थे , रानी साहेब ने युवराज की तरफ देखा__

  ” आपका क्या कहना है युवराज?”

  ” माँ साहेब अगर हमारी बात पूछे तो हमें राजकुमार की पसंद पर कोई एतराज़ नही है…..
  आपकी सारी बातें भी हम मानतें हैं ,स्वजातीय विवाह के अपने बहुत से कारण होतें हैं जो आवश्यक भी हैं.. ये भी मानतें हैं लेकिन हमें उस लड़की में राजकुमार की पत्नि बनने की अयोग्यता तो बिल्कुल नज़र नही आ रही।”

  ” लेकिन आगे कुमार को ही राजा बनना है ऐसे में बाहर की लड़की से विवाह करने से राजा को गद्दी छोड़नी पड़ेगी!”

   रानी साहेब की बात सुन वहाँ बैठे कुछ चेहरों पर मुस्कान चली आयी…..और कुछ चेहरों पर नाराज़गी..

  ” लेकिन क्यों माँ साहेब? हम जहां तक राजमहल और विवाह के नियम जानतें हैं ….अगर कोई राजकुमारी बाहर विवाह करती है तो उसे ज़रूर शाही पद छोड़ना पड़ता है लेकिन एक राजकुमार तो बाहर विवाह कर सकता है….आज भी हमारे समाज में विवाह के बाद औरत ही अपने नाम के साथ पति का नाम जोड़ती है पति को तो कभी ऐसा नहीं करना पड़ता तो जाहिर है बांसुरी का नाम राजकुमार के साथ जुड़ेगा तो विवाह के बाद वो भी राजमहल का हिस्सा हो जायेगी, और जिस दिन इन दोनों की संतान ने जन्म ले लिया उसी दिन बालक जन्म की पूजा के साथ ही उसे भी शाही खून मान लिया जायेगा क्योंकि तब वो होने वाले राजकुमार की माँ हो चुकी होगी।
     मैने तो डायनेस्टी के जितने नियम पढ़ें हैं उनका सार यही कहता है कि एक साधारण परिवार की लड़की भी राजमहल की बहू बन सकती है बाकी आप सभी मुझसे बड़े और श्रेष्ठ हैं आप लोग सलाह दीजिये, काका साहेब आपका क्या कहना है”?

   पिंकी के जाने के बाद से भले ही पिंकी की माँ इस टेबल का हिस्सा ना बनती हो उसके पिता अपने बड़े भाई के सम्मान में रोज़ उनके साथ ही खाते थे, प्रारंभ से ही उनका वरद हस्त युवराज पर था, ये दोनों चाचा भतीजा की जोड़ी ही राजमहल के व्यवसाय को फलने फूलने पे बाध्य किये थी, हालांकि अपने उखड़ते स्वास्थ्य से परेशान काका साहेब प्रत्यक्ष तो काम कम ही करते थे लेकिन परोक्ष रूप से युवराज को उन्होनें कभी अकेला नही छोड़ा था…..
    उनकी सलाह के बिना युवराज किसी भी तरह के कानूनी पेंच नही खेलता था….हर पुर्जे हर पन्ने को उन्हें दिखा पढ़ा कर ही वो किसी भी निर्णय पर पहुंचता था।
   फिर आज परिवार के इतने महत्वपूर्ण संवाद के समय वो बिना अपने काका साहेब से पूछे आगे कैसे बढ़ता?

   ” भाभी साहेब जैसा युवराज ने कहा हम उसकी हर एक बात से इत्तेफाक रखते हैं…..  हमारे तो इतिहास में भी कई जगह ऐसे विवाह का उल्लेख है भी। और फिर आज तो लोग बहुत आगे पहुंच चुकें हैं….
     देखिए घर की लड़की बाहर विवाह करेगी तो वो बाहर वालों का नाम लगाएगी इसलिये वो राजमहल से बेदखल कर दी जायेगी लेकिन एक बाहर की लड़की हमारे महल का हिस्सा बन सकती है…..और फिर ये तो जात की भी छोटी नही है।
     हमारा बस इतना ही कहना है शेष आप और राजा साहेब तय करें….हम आपके हर निर्णय में आपके साथ हैं।”

    राजा सबकी बातें सुनता चुप चाप बैठा था__

  ” आप क्या चाहतें हैं कुमार?”

   दादी साहेब की आवाज़ सुनते ही चौंक कर राजा ने सर ऊपर किया, दादी और उसके पिता दोनो उसे ही देख रहे थे, इतनी देर में पहली बार राजा साहेब ने कुछ कहा__

  ” कुमार! महल के नियम आसान नही होते….राजपूत खून ही ऐसा सहनशील होता है कि पूरी कट्टरता से वो इन नियमों को निभा पाता है।
    इन्हीं नियमों की कट्टरता ही कभी बाहर वालों के लिये गले की फांस बन जाती है….
   आपको क्या लगता है पिंकी के ऐसे चले जाने से सब खुश हैं? हम खुश हैं? बिल्कुल नही! लेकिन क्या करें आप बच्चे इन बातों को समझते ही नही।
   अब अगर पिंकी उस दो कौड़ी के लड़के से विवाह कर लेती तो क्या वो लड़का यहाँ का दामाद बन जाता? क्या वो इस योग्य था?
   देखिए राजमहलों का जन्म भी सभी को नसीब नही होता,  ये सब पूर्व जन्मों  के कर्म होतें हैं…..
      फिर भी हम ये समझाना चाहतें हैं कि वो लड़की कभी यहाँ के कठिन नियमों का पालन नही कर पायेगी और दुसरी बात अगर हम तुम्हें इस विवाह प्रस्ताव की मंजूरी दे देते हैं तो ये पिंकी के साथ भेदभाव नही होगा?
   हमारे नाम पर लोग क्या कहेंगे, बेटी को तो मरवा दिया और बेटे की उसकी पसंद से शादी करवा दी।
   आप खुद सोचिये कुमार? आप अपनी ज़िद से बाहर आईये ….जो सम्भव हो वैसी बात किजीये। असम्भव बहुत से कार्य हैं जिनमें से एक है अपनी डूबती नैय्या को पार लगाना और इस कार्य में ठाकुर साहब ही हमारा सहयोग कर सकतें हैं।”

  ” भाई साहेब अगर आप आज्ञा दें तो हम भी कुछ कहना चाहतें हैं__”

   सबकी बात चीत के बीच पिंकी की माँ भी बड़े दिनों बाद वहीं चली आईं थीं, राजा ने एक रात पहले ही रानी साहेब के जाने के बाद उनके कमरे का ही रुख किया था…..बिना किसी फरियाद के शान्ति से उनकी गोद में सिर रख कर रोना चाहता था, पिंकी से हुई मुलाकात का किस्सा भी कहना था, लेकिन इस सब के बाद भी उसने एक बार भी अपनी काकी से अपने लिये बोलने की बात नही कही थी।

   ” हाँ बिल्कुल! पहले ये बतायें कि आपकी तबीयत कैसी है?”

   ” हम ठीक हैं भाई साहेब! हम ये कहना चाहते थे कि पिंकी की हरकत के कारण राजकुमार की बात को हल्का मत किजीये आप! पिंकी ने तो किसी से कुछ कहना बताना ही ज़रूरी नही समझा, चुपचाप निकल गयी किसी के भी पीछे। हमारी बेटी है तो क्या हुआ,  उसका गुनाह माफी के लायक नही है।, उसके साथ जो हुआ उसमें इस महल के किसी व्यक्ति की कोई गलती नही थी….
  दुसरी बात राजकुमार ने अपने मन की बात सबके सामने रखी है, लड़की हमें भी ठीक लगी थी, जात भी ऐसी नही है कि ऐतराज किया जाये, लड़की ब्राम्हण है आखिर, और हम राजपूत तो ब्राम्हणों के पैर छूते आयें है सदियों से….
  तो अगर हमारे मन की पूछी जाये तो हम चाहतें हैं कि राजकुमार का विवाह बांसुरी से हो जाये।”

  ” कुसुम आप के कुमार के प्रति स्नेह से सभी परिचित हैं, सभी जानतें हैं आपके लाड़ को,  लेकिन ऐसे मोह में अँधा होकर क्या इतना बड़ा निर्णय लिया जा सकता है? फिर ठाकुर साहब को भी तो जवाब देना है। उनकी रेखा हमारी देखी भाली है और उनकी दिल से इच्छा थी कि रेखा हमारे परिवार की बहू बने”

  ” जीजी सा, रेखा तो हमारे परिवार की बहू बन ही सकती है बल्कि आप सभी चाहें तो ज़रूर बनेगी भी”

  ” आप कहना क्या चाहतीं हैं कुसुम!”

  ” हम कहना चाहतें हैं कि रेखा के इस घर की बहु बनने के लिये उसका विवाह राजकुमार से ही होना ज़रूरी तो नही, इनके पीछे और भी तो राजकुमार हैं, विराज विराट हैं जय और विजय भी हैं, क्या इनमें से किसी का विवाह रेखा से नही हो सकता? जीजी सा हम सच कहें तो हमें तो रेखा शुरु से ही विराज के लिये अधिक पसंद थी, हमने युवराज के विवाह में उसे देखा है। सुंदर सलोनी सी रेखा विराज के हर तरह से योग्य है….माँ साहेब आपका क्या कहना है?”

    रानी साहेब ने सोचा भी नही था कि ऐसे एक एक कर घर के सदस्य राजा की तरफ होते चले जायेंगे, उन्होंने अधीरता से अपनी सास की तरफ देखा, वो भी मुस्कुराती बैठी थी__

  ” सही कह रही हो कुसुम! हम ना कहते थे बहुयें तो दोनो हमारी बड़ी होशियार है लेकिन कुसुम बहुत कुशाग्र है। हम कुसुम की बात का पूरी तरह समर्थन करतें हैं, अगर किसी को एतराज़ है तो अभी बता दे।”

दादी ने राजा साहेब को देखा वो चुपचाप अपना नाश्ता खा रहे थे__

” आप का क्या विचार है ?” अपनी माँ के सामने तो आज भी वो उनके बेटे ही थे…..

” जब आप सभी का यही सोचना है तो हम मना करने वाले कौन होतें हैं?”

   राजा के आश्चर्य का ठिकाना ना था, उसे कल रात की बात के बाद लगा नही था कि इतनी आसानी से बात बन जायेगी, अब उससे नाश्ते का एक निवाला भी खाया नही जा रहा था…..

   विराज के पेट में कुलबुलाहट शुरु हो गयी थी, वो अभी रेखा क्या किसी से विवाह को प्रस्तुत नही था लेकिन इस सब जंजाल में वो बलि का बकरा बन कर रह गया था, उसके लिये विवाह से मतलब पैरों में पहनने वाली बेडियाँ बस थीं जिनके बाद उसकी आज़ादी, रातों का घूमना हुल्लड़बाजी का समाप्त होना था….उसके लिये आज तक लड़कियाँ सिर्फ मन बहलाव का साधन रहीं थी अब एकाएक ये विवाह प्रस्ताव उसके लिये मुसीबतों के पहाड़ समान था लेकिन वहाँ बड़ों की सभा के बीच खाने के बीच बोलने की सुविधा बच्चों के लिये नही थी इसी से अपने मन के भावों को ज़ब्त किये वो चुप बैठा रहा, एक जलती नज़र अपनी माँ पर डालने के बाद वो वापस अपनी प्लेट में खो गया।

    राजा ने जल्दी जल्दी दो चार उल्टे सीधे कौर डाले और राजा साहेब के निकलते ही अपने कमरे में जाने लगा….राजा के पीछे ही पैर पटकता विराज भी बाहर निकल गया…

   ” कुमार आप और युवराज आप , दीवान खाने में  कुछ एक आध घण्टे में पहुंच जाइयेगा, दीवान साहब को सभी से कोई चर्चा करनी है।”

  “जी “कहता राजा अपने कमरे के लिये निकल गया…..कमरे में पहुंचते ही उसने बांसुरी को फ़ोन लगाया, एक बार लम्बी रिंग गयी…दुबारा फिर गयी और तीसरी बार में फोन बंद बताने लगा….

      इधर रूप चौदस के दिन बांसुरी की बुआ और ताई अपने अपने घरों का काम निपटा कर बांसुरी के घर आ धमकी थी, अचानक ब्याह तीन महीने पीछे क्यों खिसका गयी प्रमिला इसी सवाल में खुद के दिमाग को मथती दोनो अलग अलग अटकलें लगाती बैठीं थी कि प्रमिला रसोई से चाय और कचौड़ियाँ लिये बाहर चली आयी…..

    खुले आंगन के एक ओर ऊपर की तरफ की सीढियों पर बांसुरी भी आ बैठी थी। घर पहुंचते ही सबसे पहले वो भाग कर अपने कमरे में फ़ोन को चार्ज पर लगाने गयी थी लेकिन पॉवर ऑफ़ होने से फोन चार्ज नही कर पायी।
   उसी समय बुआ जी के उसे पुकारने से वो फटाफट हाथ मुहँ धोकर नीचे चली गयी।

    बुआ जी ताई जी बातों में लगी थीं….बांसुरी अकेले में अपनी माँ से मन की बात कहना चाहती थी लेकिन__

   ” पर्मिला जे बात का भई जो ब्याह तीन महीना टार दिया? कुछ तो हुआ होगा?”
    बुआ जी की आंखों के अंगारे बांसुरी के साथ प्रमिला को भी जलाने लगे__

  ” अरे जिज्जी ! कुछ नही वो तो जमाई जी को कुछ काम से बाहर जाना पड़ा इसिलिए ब्याह पीछे किया, वो भी बस तीन महीने ही। अच्छा है ना समय भी मिल गया तैय्यारी का।”

   ” किसको चरा रही है प्रमिला जिज्जी को या हमें! सारी तैय्यारी तो हुई रख्खी है….दुल्हन के कपड़ा गहना हों या लेनदेन के, पाटा टुकरिया से लेकर लावा तक तो खरीद डाला है फिर और कौन तैय्यारी बच गयी……

   ये बम ताई की तरफ से गिराया गया था, सब महिलाओं की पंचायत जमते देख बांसुरी के पिता चौक से पान खा के आते हैं बोल कर निकल गये….

ताई और बुआ की निरर्थक और निरंतर प्रश्नावली से तंग आकर आखिर बांसुरी सीढियों से उतर वहीं आ कर बैठ गयी….और फिर सिलसिलेवार उसने सारी बातें वहाँ बैठी तीनों महिलाओं को कह सुनाई…..

     सारी बात सुनती प्रमिला वहीं दीवार का सहारा लिये दो मिनट को खुद को संभालती खड़ी रह गयी, किसी को एकाएक कुछ सूझा ही नही, आखिर घर में काम करने वाली गुड्डी को एक और चाय लाने बोल बुआ जी ने शंखनाद किया और उनकी रण भेरी चारों दिशाओं में गूँज उठी__

” हम तो पहले ही कहतीं थी, इत्ता ना पढाओ बिटियन को…अब देख लिया …. ठाकुरों में ब्याह की ज़िद पकड़ ली ना छोरी ने ..अब ?

  ताई ने झूठ मूठ आंचल आंखों मे रख आभासी आंसू पोंछे और शुरु हो गयी__

” काहे बिटिया जब हमारे में इत्ता अच्छा लड़का मिल गया रहा तो फिर ई सब काहे लाड़ो? तुम जानती नही हो, ई ठाकुरों के हियाँ बामणो का गुजारा नही है ….इनके घर की तो औरतें भी लड़ाका होती हैं, पूरी खर्राट , सास नानदे जीना मुहाल कर देगी बिटिया….. बड़े सारे तेवर होतें हैं इनके ……समझाओ इसे हो प्रमिला , एक तो बंसी के मुहँ में वैसने जबान नही है उस पर उस घर की औरतें गिद्ध चील बनी नोच ना खाईं तो हमारा नाम बदल देना…..

   बांसुरी अपनी सोच में डूबी थी, अच्छा हुआ राजा तुम कोई असलम अहमद नही हो वर्ना तो आज यहीं महाभारत छिड़ गया होता, सिर्फ ठाकुर होने से ही इतनी पंचायत हुई जा रही। उसका ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपनी माँ पर था कि कहीं वो इस झटके से उबर नही पायीं तो…उसकी नजरें बस अपनी माँ पर केंद्रित थी….वो चुपचाप दीवार के सहारे टिकी बैठी थीं, शायद ये सोचती कि लगी लगाई शादी को तोड़ कर उनकी लड़की अब अचानक एक ठाकुर से ब्याह के पीछे क्यों पड़ गयी…..प्यार मुहब्बत कोर्टशिप जैसी बातें उसकी माँ और ताई जैसी औरतों के लिये कितनी बेमानी है ये उसे आज समझ आ गया था।

” ऐसा कुछ नही है ताई जी, मैं मिल चुकी हूँ, और वैसे एक बात है राजा की माँ नही हैं,  छोटी माँ यानी सौतेली…….

   बांसुरी की बात पूरी होने देने तक का अवकाश भी बुआ जी के पास ना था…

” राम राम! बिना सास का घर भी कोई घर होता है? यही सब दुनियादारी तो आजकल के बच्चे समझते नही, सौतेली माँ का पाला छोरा कैसा होगा? इस दुनिया मे सबसे अधिक कठकरेजी कोई होती है तो सौतेली माँ। ना ना लाड़ो तेरा जीना मुहाल कर देगी वो औरत…लेकिन सुनो तुम मिल कहाँ ली उनसे?

    जब ओखली में सर दे ही दिया तो मूसल से क्या डरना….बांसुरी ने अपनी भोपाल यात्रा वृतांत भी सुना दिया….ताई का जहां मुहँ खुला का खुला रह गया, बुआ जी अपनी आंखों से ही अग्निवर्षा करती प्रमिला को झुलसाने लगीं….

   ” राम राम!! जे छोरी तो ब्याह से पहले ही अपने सासरे का चक्कर लगा आयी, कुछ लाज शरम है कि नही, तुझे बाहर पढ़ने और नौकरी करने भेजा है या यही सब ….राम जी! पर्मिला अब तो बात ही खतम कर दी इस लड़की ने..

  ” अरे बुआ जी आप कहाँ से कहाँ पहुंच जाती हैं, मेरी दोस्त पिंकी का भी तो घर है वो, मैं तो उसी के साथ गयी थी….

    ताई की झूठ मूठ रोने की नौटंकी चालू थी कि तभी बांसुरी के पिता गोद में वीणा के बेटे को उठाये भीतर चले आये, उनके पीछे अपनी नयी साड़ी  की रेशमी लसर फसर के साथ वीणा भी….

   “बांसुरी लड़का खुद क्या करता है? राजे रजवाड़े से अलग उसका खुद का कोई काम धंधा है? पढ़ा कहाँ तक है?

   एक मध्यवर्गीय पिता के लिये आवश्यक क्वालिफिकेशन की पूछताछ उन्होने भी शुरु कर दी…
बांसुरी को पता नही था कि उसके पापा दरवाज़े के बाहर खड़े कई बातें सुन चुके थे….
  राजा की पढ़ाई काम धन्धे का ब्योरा देते तक में वीणा बुआ और ताई जी से राजा के क्रेडेंन्शियल्स निकलवा चुकी थी__

   ” अब समझी , इनकी सगाई के दिन इसी लड़के का फोन आया था, संग रहने के लिये…मैने तो तभी कहा कि जब इतना रईस है तो होटल में काहे नही ठहरता? लेकिन वीणा की सुनता कौन है, वीणा तो बस मेक’प में रंगी पुती ज़बान से ज़हरीली जो है, लेकिन ताई कहती हमेशा सच ही हूँ, अब इसे भी क्या ज़रूरत रही एक लड़के को अपने साथ रखने की।

   बांसुरी ने ताई और बुआ को बताने योग्य बातें ही चुन कर बताई थीं जिनमें राजा का मुम्बई उसके साथ रहना वो छिपा गयी थी अब वीणा के आने से वो एक बात भी पानी में तेल सी ऊपर तैर आयी….हैरान परेशान बांसुरी भी अब तैय्यार बैठी थी…हर सवाल के लिये…हर आपत्ति के लिये…..हर बाधा और रुकावट का सामना करने के लिये….

   गुड्डी के चाय लाते ही कुछ देर को आसमान साफ़ हुआ और ताई बुआ के साथ वीणा भी चाय की चुस्कियों में डूब गयी….

    बांसुरी को अचानक अपने फोन का खयाल आया, वो तो कब से ऊपर ही पड़ा था, वो सीढ़ियाँ लान्घती अपने कमरे में पहुंची फ़ोन बंद पड़ा था…अब तक पॉवर आ चुका था, फोन को प्लग कर उसने ऑन किया, राजा के दो मिस्ड कॉल थे, उसका दिल एक पल को धड़क उठा, कि कहीं वो नाराज़ ना हो गया हो, उसने मेसेज खोला__

  ” कहाँ बिज़ी हो मैडम? समझ सकता हूँ अपने घर पहुंच गयी हो आखिर! मम्मी पापा के सामने कौन राजा? कहाँ का राजा? अच्छा सुनो तुम्हारे लिये यानी हमारे लिये एक गुड न्यूज़ है…अभी नीचे जा रहा हूँ किसी काम से मॉम ने बुलाया है, रात में बताऊंगा , तब तक तुम अपने घर वालों की कंपनी एन्जॉय करो।”

उस छोटे से मेसेज को भी पन्द्रह बार पढ़ कर भी मन नही भर रहा था, अरे कुछ तो बिना काम का भी लिख जाता, बस ज़रूरी बातें लिखी और हो गया, एक लव यू तक नही लिखा गया साहेब से….वैसे आजतक उसने कहा भी तो नही….

       राजा के मेसेज को पढ़ते ही उसके चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी ….”कितना सुलझा हुआ है वो और मैं ? ज़रा सी बुआ की कड़वी बातों से सुलग उठती हूँ, उनका ऐसा कहना तो उनकी तरफ से जायज़ ही है, अब बातों को सही करना मेरा काम है”
    
  खुद मे खोयी खुद से बातें करती बांसुरी ने देखा निरमा के भी चार मिस्ड कॉल थे….

……. वो घर पहुंच कर निरमा को फ़ोन करना भूल भी तो गयी थी, आजकल वैसे भी उसे राजा के अलावा और याद ही कौन रहता है?
  पर चार चार कॉल? निरमा ठीक तो होगी ना?
…….

क्रमशः

aparna…






  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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