जीवनसाथी-43

जीवन साथी–43


            वो घर पहुंच कर निरमा को फ़ोन करना भूल भी तो गयी थी, आजकल वैसे भी उसे राजा के अलावा और याद ही कौन रहता है?
  पर चार चार कॉल? निरमा ठीक तो होगी ना?

  उसने तुरंत निरमा को फ़ोन किया ….रिंग पे रिंग जाती रही, निरमा ने फोन नही उठाया….

********

    दोपहर का खाना बना कर अम्मा रख चुकी थीं लेकिन उनकी ये नवेली मालकिन खाने की तरफ से एकदम बेज़ार थी।

   निरमा नीचे हॉल के लम्बे सोफे पर पैर फैलाये टिक कर बैठी डायरी लिख रही थी, कुछ देर उसके सामने बैठे बैठे अम्मा जब हद बोर हो गईं तो उठ कर टीवी चला लिया__
    निरमा ने एक नज़र टीवी पर चलते धारावाहिक नागिन की हेलन सी बलखाती मॉर्डन नागिन पर डाली और उठ कर ऊपर चली गयी__

  ” अरे रुक जाओ बहुरिया, हम बंद किये देते हैं।”

  ” नही अम्मा जी ! आप देखिए, मैं तो वैसे भी लिख रही हूँ, मेरा काम तो ऊपर भी हो जायेगा।”

  ” खाना लगा दूं, सुबह नाश्ता भी नही खाया है तुमने।”

  ” मैंने दूध ले लिया था, आप परेशान ना हों।”

  ” बहुरिया, बाबू खाने के लिये नही आते, अक्सर महल में  राजकुमार जी के साथ ही उनका खाना होता है, तो तुम खाई लो।”

  निरमा ने एक नज़र अम्मा पर डाली और “अभी तो भूख नही है अम्मा, लगेगी तब खा लूंगी, आप और सुमित्रा खा लिजिये  ” कह कर ऊपर चली गयी।
      
   उसके नजरों से ओझल होते ही काम वाली सुमित्रा को अम्मा ने आवाज़ लगा दी …. बहुत देर तक चुप बैठे रहने से अम्मा का जी घबड़ा जाता था, उन्हें हर घड़ी दो घड़ी में महल और इधर उधर देखी सुनी बातों की जुगाली करने का भारी शौक था।

     “अरे नई नई शादी में खाने पहनने का कित्ता शौक रहता है लेकिन जे तो अजीबे लड़की है, जब देखो कुछ ना कुछ पढ़ती रहती है या डायरी उठा कर लिखना शुरु कर देती है।
   हम तो फलाने की परछायी बनी घूमती थीं, मजाल जो काम पे जाने के अलावा कभी उन्हें अकेला छोड़ा हो।
    पर ये दोनो तो कहीं से लगते ही नही कि एक दूसरे के आदमी औरत हैं।
 
    ”  अब मरद भी का करे जिज्जी, जब महरिया ऐसन नीरस हो तो बेचारा घर छोड़ कर काम में ही तो भिड़ा रहेगा ना। वर्ना ऐसा सोने सा लड़का क्या ब्याह के दूजे दिन ही काम पे निकल जाता लेकिन दुल्हनिया को तो जैसे साहब से कोई लेना देना ही नही. हम अपने मन की कहें तो दुल्हनीया फिजूल धुंआ कर रही है साहब का…..”
 
   सुमित्रा को तीन का पांच करने में महारथ थी। वो महल के पिछ्ले हिस्से में बने कामगारों वाले घर में रहती थी और उसकी दूरबीन सी आंखें महल के मामलों में पूरी तरह उलझी रहतीं थीँ।
 
    “अब हम भी का बोलें ,  लम्बा चौड़ा है, दिखने में भी ठीक है, ठीक क्या सुंदर ही है और कमाता तो लाखों में है,फिर आखिर जे काहे ऐसी उदास पड़ी रहतीं हैं?”

  अम्मा की चिंता का सुमित्रा पे लेशमात्र फर्क नही पड़ा था, उसे तो बस इसी बात में रस मिल रहा था कि नयी बहुरिया के लक्षन सही ना थे।

   निरमा ऊपर जाते समय अपना फोन नीचे सोफे पर ही भूल गयी थी, उसी समय बांसुरी ने फ़ोन लगाया। जब दो बार में भी निरमा ने फ़ोन नही उठाया तो बांसुरी ने घबरा कर प्रेम को फोन लगा लिया।

   इधर निरमा का निरंतर लिखते पढ़ते सिर दर्द करने लगा था….खाने को देख उसका जी घबराता था, खाली पेट निरंतर लिखने से सर भारी होने लगा तो वो एक बार फिर नहाने घुस गयी__

  ” अम्मा सुनो ! मैं नहाने जा रहीं हूँ …वो दूसरे कमरे में गरम पानी नही आता इसलिये इनके कमरे में ही नहा लेती हूँ।”

  ” इनके काहे कह रही हो बहुरिया, अब तुम्हारा ही है बाबू भी और उसका कमरा भी।”

” हम्म” कह कर वो कपड़े थामे प्रेम के कमरे में घुस रही थी कि अम्मा ने आवाज़ लगा दी__

  ” बहुरिया हम जे सुमित्रा को लेकर पीछे घोड़ों के अस्तबल जा रहे, बाबू के घोड़े को कल जखम हुआ रहा ज़रा हल्दी और कडुआ तेल लेप आतें हैं।”

    अम्मा कटोरी में हल्दी तेल लिये सुमित्रा के साथ निकल गयी…प्रेम या किसी और के इस वक्त आने का कोई सवाल ही नही उठता था।

   कपड़े वापस अपने कमरे में रखे वो बस अपना बाथथ्रोब लेकर ही प्रेम के बाथरूम में घुस गयी।

*********


     भास्कर सुबह से व्यस्त था लेकिन बार बार घड़ी देखता वो अदिती को कॉल करने का इन्तजार कर रहा था….उधर अदिती भी सुबह से अखबार के कॉलम करीने से सजाने में व्यस्त थी, किसी भी ज्वेलरी शॉप कपडों की शॉप वालों का विज्ञापन छूट ना जाये, आखिर असली स्पॉन्सर तो ये ही थे।
  वो दीवाली पे किसी को नाराज़ करने का जोखिम उठाना नही चाहती थी…..

   लंच ब्रेक पे अपने केबिन में बैठी अदिती के पास खाने तक का वक्त नही था, उसने एक चाय मंगवाई और भास्कर को फ़ोन करने के लिये जैसे ही मोबाइल उठाया उधर से भास्कर का फोन चला आया__

  ” कैसे हो? क्या चल रहा?”

  ” बस यार ! ठीक ही है सब, पहली बार दीवाली पर घर से बाहर हूँ, अच्छा नही लग रहा….

  “हम्म कोई नही। मैं भी चाहती थी कि तुम दीवाली के बाद जाओ लेकिन फिर लगा कि काम सबसे पहले बाकी सब बाद में। ”

  ” अच्छा सुनो अदिती! यार शाम को यहाँ हम इंडियन्स के लिये ये लोग दीवाली पार्टी ओर्गैनाईज़ कर रहे, क्या पहनूँ सोच रहा हूँ? कुरता या फॉर्मल ?

  “भास्कर आज फॉर्मल्स ही पहनो। ये गोरे ना हम इंडियन्स को कपडों से ही तोलतें हैं, कल लक्ष्मी पूजा में कुरता डाल लेना और सुनो तुम्हारी वो लाईट ग्रे शर्ट है ना एरो की , अरे वही जिसमें हल्की सी शाइन है वही पहनना पर ब्लैक पैंट के साथ नही, डार्क ग्रे पैंट के साथ पहनना। ब्लैक थोड़ा लाउड हो जाता है।
   ये गोरे ना कमीने रंगों का भी बड़ा हिसाब रखतें हैं।

” ओह्हो हो मैडम!! यार इतनी अन्ग्रेज तबीयत की लड़की और गालियाँ ठेठ देसी?”

  ” सर जी मैं दिल से खालिस देसी ही हूँ ,  खाना पीना और गाली देसी ही अच्छी लगती है बिदेसी तो बस एक ही चीज़…

” समझ गया! तो ग्रे शर्ट ऐंड डार्क ग्रे पैंट फायनल।”

  “ओके! तो रखूं फ़ोन, तुम्हारा काम तो हो गया।”

  “हाँ मेरा तो हो गया, तुम क्या पहनोगी शाम की पार्टी में, आज तो वहाँ भी होगी दीवाली पार्टी।”

  ” आज शाम की पार्टी में नही जाऊंगी भास्कर, आज मुझे भी शाम को पूजा पाठ करना है और कल लक्ष्मी पूजा में चढ़ाने के लिये भोग की मिठाई भी बनानी है ना?”

  ” वॉट? भोग की मिठाई?

  ” क्यों? तुम्हारे घर पे दीवाली में मिठाई का भोग नही लगता क्या?”

  ” लगता है मैडम! मैं तो ये सुन कर चौंक गया कि तुम जैसी लड़की भी मिठाई बना लेती है।”

  ” वॉट डू यू मीन बाय तुम जैसी लड़की? क्या मिठाई बनाने वाली लड़कियों के चार हाथ होतें है या पच्चीस उंगलियाँ। यार अगर ज़रा मॉर्डन कपड़े पहन लिये इंग्लिश बोल ली तो तुम लड़के बाय डिफॉल्ट ये मान लेते हो ना कि लड़की को ना खाना बनाना आता होगा ना घर संभालना बट बेबी इन बातों से ऊपर उठो। एक सलवार कमीज पहनने वाली भी घरेलू काम काज मे ठप हो सकती है और मिनी पहनने वाली भी शेफ हो सकती है….

  ” ओके ओके! असल में मैं चौंक इसलिये गया क्योंकि पहले कभी तुमने बताया नही ना । एनीवेज क्या क्या बनाने वाली हो फिर ?”

  ” सब बना कर फोटो क्लिक कर के तुम्हें भेज दूंगी, मन भर के देख लेना।”

  ” पर मैं तो खाना भी चाहता हूँ।”

” जब मैं वहाँ आऊंगी तब साथ में लेकर आ जाऊंगी, ठीक है?”

  ” पक्का?”

  ” हाँ भई ! और है ही कौन ? यहाँ तो जो भी मिठाई बनाती हूँ, सोसाइटी के पास एक ओर्फेनेज ( अनाथालय) में देकर आ जाती हूँ, मेरे त्योहार तो वहीं बीतते हैं। मॉम या डैड किसी एक के पास जाना मुझे अच्छा नही लगता।”

   अदिती की आवाज़ में एक उदासी तैर गयी….

  “मैं कुछ नही जानता, मुझे तो हर एक मिठाई चाहिये जो जो तुम्हें बनाना आता हो।”

  ” तो फिर बॉस तैय्यार रहो खाने के लिये क्योंकि मुझे कुमाऊँ की बाल मिठाई से लेकर बंगाल के सन्देश भी आते हैं, महाराष्ट्र की पुरनपोली आती है तो गुजराती बासुँदी भी….और तो और मुझे बकलावा भी बनाना आता है समझे मिस्टर।”

  ” ओह माय गॉड! तुम तो सुपर शेफ निकलीं, और आज तक कभी बताया तक नही कि कहीं मैं खाने ना चला आऊँ?”

  ” बनाने वाला बनाता ही इसिलिए है कि किसी को खिला सके…चलो अब जाती हूँ लंच ब्रेक भी खतम हो गया है, बहुत सारा काम अब भी बाकी है।”

  ” अपना ध्यान रखना अदिती, बाद में बात करता हूँ, बाय।”

  *******

 
बांसुरी से बात करने के बाद प्रेम थोड़ा परेशान हो गया उसे लगा पता नही क्या बात है जो निरमा फ़ोन नही उठा पायी, उसने भी सबसे पहले निरमा को फ़ोन ही लगाया ….
    फ़ोन नीचे रखा था और निरमा ऊपर थी, अम्मा और सुमित्रा भी वहाँ नही थे, प्रेम के दोनों बार के कॉल भी मिस हो गये तो राजा से बात कर वो तुरंत अपने घर की ओर चल दिया…..

   इधर उसी वक्त पर राजा को रानी साहेब ने युवराज के साथ दीवानखाने में बुला रखा था, राजा प्रेम से विदा ले दीवानखाने की ओर चल दिया।

   दीवानखाने में राजा के पहुंचने तक में दीवान साहब, उनका बेटा समर, विराज,काका साहेब, फूफा साहब और युवराज मौजूद थे..उसके पहुंचने के कुछ देर में ही रानी साहेब राज साहब के साथ चलीं आयीं और उसके कुछ देर में दादी भी।
  जब सभी अपनी अपनी जगह बैठ गये तब रानी साहब ने अपनी जगह से थोड़ा आगे आकर बोलना शुरु किया__

    ” जैसा कि आप  सभी जानतें ही हैं कि ठाकुर साहब के घर से कुमार के लिये रिश्ता आया था…. वो चाहतें हैं उनकी बेटी का विवाह इस रियासत के भावी राजा से हो … उन्होने इस बारे में हमसे और साहेब से उसी समय बात की थी। वो कुमार से रिश्ते के लिये सिर्फ इसी लिये इतने उत्सुक थे , लेकिन अब अगर कुमार अपनी मर्ज़ी से राजपरिवार से बाहर विवाह रचातें हैं तो उनसे मिलने वाली भविश्य में किसी भी तरह की मदद के लिये हम नही सोच पायेंगे।”

  ” लेकिन बहु सुबह भी तो इस बात पर विचार हुआ था कि विराज के लिये ठाकुर साहब से बात की जा सकती है।”

  ” पर माँ साहेब ये बतायें कि क्या ठाकुर साहब को विवाह के लिये मनाने के लिये आप विराज को कुमार की जगह गद्दी पर बैठा देंगी? क्या महल के लोग इस बात के लिये तैय्यार होंगे?
   हम अच्छे से जानतें हैं ठाकुर साहब को सिर्फ राजगद्दी का लालच है, वो अपनी बेटी को यहाँ के राजा की ही पत्नि बनाना चाहतें हैं, कुमार इस विवाह के लिये तैय्यार नही और विराज आप सबके अनुसार गद्दी के योग्य नही।”

  रानी साहेब की बात सुन कुछ देर को दीवान खाने में सन्नाटा छा गया, किसी को कुछ नही सूझ रहा था,तभी युवराज ने रानी साहब की ओर देख कर अपनी बात रखी__

   ” माँ साहेब एक बार आप उनसे बात कर के तो देखिए, हमें लगता है वो हमारे परिवार के साथ रिश्ता जोड़ना चाहतें हैं ना कि राजगद्दी के साथ।”

  ” नही युवराज! तुम्हारी माँ  साहेब सही कह रही हैं, उन्होने अपनी मंशा पहले ही जाहिर कर दी थी। हम भी तो थे वहाँ, उस वक्त हममे से किसी को इस बात पर कोई एतराज़ नही था।”

   सब एक दूसरे को देखते चुप बैठे थे कि विराज अपनी जगह से खड़ा हो गया__

  ” वाह वाह! आप लोगों की सोच की दाद देता हूँ मैं, जब विवाह की बारी आयी तो सबने एक साथ मेरा नाम आगे कर दिया और जैसे ही गद्दी पर बैठने की बात आयी सब चुप बैठ गये।
   मैं मानता हूँ मैं कुमार के जितना लायक शायद नही हूँ लेकिन अगर युवराज भाई साहब, कुमार और समर मेरा साथ देंगे मेरी मदद करेंगे तो क्या मैं तब भी राज पाट नही देख पाऊंगा, अरे वैसे भी अब इस ओल्ड डायनेस्टी में रखा क्या है? कुछ चलाने को बचा ही क्या है। हमारे सारे बिज़नेस वैसे भी युवराज भाई साहब और काका सा देख रहे, बस एक गद्दी पर बैठने की औपचारिकता के लिये भी आप लोग मुझे नाकाबिल समझते हैं, आप लोगों की सोच को नमन है मेरा।”


  ” शांत हो जाओ विराज! मेरे भाई ये तुमसे किसने कह दिया कि तुम मुझसे कम काबिल हो, ऐसा यहाँ कोई नही सोचता। हम दोनों एक से ही तो हैं भाई!”

  ” तो फिर क्या बात है कुमार? तुम ही बताओ, आखिर लोग क्यों इतना सोच रहे? सिर्फ गद्दी पर बैठने से क्या बदल जायेगा?  अगर हम एक से हैं तो गद्दी पर कुमार बैठे या विराज? किसी को इस बात से फर्क नही पड़ना चाहिये…कुछ गलत कहा क्या मैंने?”

  ” नही तुमने कुछ गलत नही कहा। मॉम अगर बात बस यहीं आकर अटक रही है तो हमारी डायनेस्टी के भले के लिये जो सबसे सही निर्णय होगा वही लिजिये प्लीज़।
  आप सभी अच्छे से जानतें हैं कि मुझे कभी भी गद्दी का कोई लालच नही रहा, और वैसे भी गद्दी पर बैठने वाले के पीछे राजप्रसाद को चलाने के सारे निर्णय तो युवराज भैय्या को ही लेने हैं तो फिर चाहे मैं बैठूँ या विराज! मेरे लिये ये दोनो बातें एक बराबर ही हैं।
   मैं अपनी जगह विराज को आगे करता हूँ।”

   राजा की बात पूरी होते ही युवराज अपनी जगह से उठ गया__

  ” राजकुमार तुम समझ नही रहे, गद्दी सिर्फ नाम की गद्दी नही है। आज भले ही महल का सारा व्यापार हम और काका सा देखतें हैं लेकिन हर एक छोटे से छोटे परचे पुर्जे पर भी पिता सा हुकुम के साईन लगतें है, उनकी नज़र से गुज़रे बिना  हम कोई निर्णय नही ले सकते। उनके गद्दी छोड़ते ही ये सारी जिम्मेदारी ऐसे किन्हीं हाथों में जानी चाहिये जो विश्वसनीय हों”

  ” वाह बड़े भैया इसका मतलब आप कहना चाहतें हैं कि हम भरोसे के लायक नहीं हैं, अरे हम भी इसी राज परिवार का हिस्सा है,हम भी हुकुम के खून हैं लेकिन जाने कुमार में ऐसे क्या हीरे मोती सजे हैं जो हम हर किसी की आँख में खटकतें हैं।”

   ” हम ये नही कह रहे विराज लेकिन बहुत सी ऐसी बातें हैं जहां आप अक्सर अपनी सीमायें लाँघ जातें हैं, अब ज्यादा बातों की चीर फाड़ हम भी नही करना चाहते।”

  ” नही!  किजीये ना प्लीज़ किजीये..हम भी तो जानें , आखिर ऐसा क्या कर दिया हमनें। अरे जो थोड़ा बहुत पी पिलाकर अगर कोई बवाल मचा भी दिया तो वो सब राजसी खून को शोभा देता है , अब आखिर कुमार भी तो एक मामूली सी लड़की से शादी के लिये ही इतना ….

   “ज़बान को लगाम दीजिये विराज! आप की नाराज़गी हम समझतें हैं पर इसका मतलब ये नही कि साहेब और माँ सा के सामने आप कुछ भी कह जायें।”

  रानी साहेब की बात सुन ठंडा होने की जगह विराज का गुस्सा और बढ़ गया__

   ” माँ साहेब! आपने तो आजतक हमारा पक्ष कभी  लिया ही नही,  आप तो शुरु से हर बात के लिये कुमार का पक्ष लेती आयीं हैं, हम यकीन से कह सकतें हैं अगर कुमार की जगह हम किसी लड़की से शादी की बात कहते तो इतना सोचना विचारना होता ही नही, हमें आप पहले ही नही हो सकता कह कर चुप करवा देतीं लेकिन बात तो आपके लाड़ले की है ना. …आप सारे लोग पक्षपाती हैं…

   विराज अपनी बात कह रहा था कि समर अपनी जगह से उठ कर युवराज भैय्या तक आया और उनके पीछे अपनी कुर्सी लगाये उनके कानों के पास पहुंच कुछ मन्त्रणा करने लगा।
     समर के पिता दीवान साहब चुप बैठे सारा माजरा समझने की कोशिश कर रहे थे कि रानी साहेब की आवाज़ एक बार फिर गरज़ उठी__

  ” हाँ सही कह रहे हो तुम! भले ही हमारी कोख के जने तुम हो लेकिन कुमार के लिये जो हमारा प्यार है तुम कभी उसके हकदार नही बन पाये, हम मानतें हैं आज तक हमारा हर निर्णय कुमार के पक्ष में ही रहता आया है और इसी सब मोह  में शायद हम तुम्हारे और विराट के साथ पक्षपात भी कर गये….आज हम अपनी गलतियों का पश्चाताप करना चाहतें हैं।

  रानी साहेब कुछ देर को शांत हो गईं….

  ” हम कुमार की जगह विराज को गद्दी पर बैठाने का प्रस्ताव रखतें हैं, क्योंकि हमें अब इससे आगे कुछ सूझ नही रहा है….हमें लगता है इसी निर्णय के साथ हम ठाकुर साहब को अपने राजवंश से जोड़े रख पायेंगे क्योंकि रेखा कुमारी का इस घर में बहू बन कर आना भी बहुत ज़रूरी है। और सिर्फ एक इसी कीमत पर कुमार आपका विवाह बांसुरी से हो पायेगा…आप सभी क्या सोचतें हैं आप भी अपनी राय दीजिये , साहेब ?”

  एकाएक दीवान खाने का माहौल बदल गया, कोई कुछ कहने की हालत में नही था,  एक राजा ही था जिसके ओर छोर से प्रसन्नता टपक रही थी….
   वहीं एक ओर युवराज और समर आपस में सर भिड़ाये किसी गूढ़ मंत्रणा में लगे थे।

    राजा साहब चुपचाप बैठे अपनी सिगार के छल्ले उड़ाते किसी गहरी सोच में डूब गये थे…

   ” हमारी बात किसी ने सुनी नही या जवाब देने लायक बात नही लगी”

  ” माँ साहेब आपकी बात कौन काट सकता है? अगर पिता हुकुम का यही आदेश है और अगर राजकुमार और विराज को आपत्ति नही है तो हमें भी आपत्ति नही है…दोनो ही हमारे छोटे भाई हैं दोनो में से गद्दी पर जो भी बैठे इनके पीछे इनका सहारा बने हम हमेशा खड़े रहेंगे….चाहे राजकुमार हो या विराज ! हम अकेला तो किसी को भी नही छोड़ेंगे।” अपनी बात कह कर युवराज विराज की तरफ देखने लगा, युवराज की निर्भिक आंखों की ताब विराज सह नही पाया और मुहँ फेर कर दादी सा के पैर छूने चला गया__

  ” आशीर्वाद दीजिये दादी सा , आपके पोते का राजतिलक होना है अब!”

  दादी ने दोनों हाथ उठा कर विराज के सर पर रख दिये __

  ” फिर अब देर करने का क्या मतलब बहुरानी , ठाकुर साहब के घर भी प्रस्ताव भेज दीजिये और बांसुरी के घर भी।”

  ” माँ सा हम ठाकुर साहब के घर तो रिश्ता भिजवा देंगे लेकिन उस लड़की के घरवालों को तो यहाँ खुद आना पड़ेगा….क्या राजा खुद जनता के घर कभी जातें हैं, उनकी खुशकिस्मती है कि कुमार ने उनकी लड़की को पसंद कर लिया और राज्परिवार ने बिना किसी नखरे के उनकी लड़की के लिये हाँ बोल दी, लेकिन अब ये तो नही हो पायेगा कि हम झोली फैलाये उनके देहरी चढ़ जायें, कुमार आप उस लड़की को कह दीजियेगा की अपने घर वालों को यहाँ भेज दे।
   पिंकी के जाने के एक महीने बीतने तक में कोई शुभ काम हो जाये तो पिंकी का दोष भी महल के माथे से कट जायेगा, पण्डित जी ने कहा था….
   अच्छा है अब दो दो शुभ काम एक साथ हो जायेंगे।
  माँ सा कल की पूजा की तैय्यारियाँ भी हमें देखनी हैं, हम अब कल लक्ष्मी पूजा की तैय्यारियों के लिये जाना चाहतें हैं अगर आप आज्ञा दें।”

   रानी साहेब का इशारा पा कर एक एक कर सभी अपने स्थान से उठ गये, राजा साहेब के निकलते ही सब अपने अपने कमरों में चले गये, एक युवराज और समर को छोड़ कर ।
    सबके वहाँ से जाते ही समर कुछ दो एक किताबे दीवान खाने की लाइब्रेरी से निकाल लाया और युवराज को अपनी कही बातों के लिखित सबूत दिखाने लगा।
   समर से वैसे भी युवराज बहुत प्रभावित था उसकी कही बातों के प्रमाण पा कर युवराज की आंखों में चमक आ गयी और उसने आगे बढ कर समर को गले से लगा लिया।
   दोनो निश्चिंत होकर अपने अपने कमरों की ओर निकल गये।

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    प्रेम भागा दौड़ा सा अपने घर पहुंचा, नीचे ही सदर दरवाज़ा उसे खुला ही मिल गया।
    भीतर जाते ही हॉल में चलता टीवी और सोफे पर पड़ा निरमा का फोन देख उसे एकदम से समझ नही आया कि अपना फ़ोन ऐसे छोड़ कर आखिर निरमा चली कहाँ गयी….

    उसने नीचे रसोई, आंगन , मेहमानों का कमरा, परछी हर जगह एक नज़र मार ली, पर उसे ना अम्मा नज़र आयीं ना निरमा, यहाँ तक की घर पर काम करने वाला कोई नौकर भी नही था।
    पीछे के अस्तबल के अलावा उसने सब देखा लिया था, वो झट सीढ़ियाँ चढ़ ऊपर प्रताप के कमरे के सामने पहुंच गया, कमरे का दरवाज़ा खुला पड़ा था और निरमा वहाँ भी नही थी, ऊपर ही एक बड़ा हॉल था जिसमें एक ओर बहुत सुंदर मन्दिर बना था, उसी से लगी बालकनी और छत थी, लेकिन निरमा कहीं ना थी।
   हर जगह से मायूस हो वो अपने कमरे में आकर बैड पर बैठा सोच ही रहा था कि निरमा को कहाँ ढूँढने जाये कि उसके बाथरूम का दरवाज़ा खुला और निरमा गीले बालों को झटकती बाहर चली आयी।
    निरमा को सामने देखते ही उसके चेहरे पर एक सुकून भरी शान्ति छा गयी लेकिन प्रेम को इस तरह सामने देख निरमा अपनी अवस्था से पानी पानी हो गयी__

  ” वो उस कमरे में गरम पानी ठीक से नही आता इसिलिए मैं यहाँ …..

अपनी बात पूरी करने से पहले ही निरमा का सर घूम गया और वो अपने आपको संभाल नही पायी, वो नीचे गिरती इसके पहले ही प्रेम ने उसे लपक लिया और बाहों में उठा कर आगे अपने पलंग में संभाल कर लेटा दिया__

    लगभग दस बारह मिनट में निरमा की आंखें खुली, उसने देखा उसके सामने ही आराम कुर्सी पे बैठा प्रेम अपने मोबाइल पर तल्लीनता से कुछ पढ रहा था और वो खुद उसी के पलंग पर उसी की चादर ओढे आराम से पड़ी थी….
     उसे बेहोश होने से पहले की सारी बातें अचानक याद आ गयी और वो एक बार फिर शर्म से पानी पानी हो गयी।
    ये भी क्या सोच रहा होगा एक बाथ्रोब लेकर ही नहाने घुस गयी, छी ऐसा भी कोई करता है भला।
 
  ” आपको होश आ गया! अभी कैसा लग रहा, आप ठीक हैं?”

  प्रेम की बात सुन उसने हाँ में सर हिला दिया__

  ” आप ज़रा बाहर जायेंगे तो मैं चेंज कर लूंगी।”

  ” हाँ श्योर” प्रेम के बाहर जाते ही उसने चैन की सांस ली…ये कहाँ से आ गया, अम्मा तो कह रही थी एक बार जाता है तो शाम से पहले वापस नही आता? फिर?

    अपने विचित्र मूड स्विंग के कारण निरमा को ये तक होश नही था कि कल दोपहर के बाद से उसने कुछ भी ढंग से खाया पिया नही था, सोडियम लो हो जाने से ही कमज़ोरी से उसे चक्कर आ गया था, और अब कपड़े बदलने के बाद उसे बहुत ज़ोर की भूख लग रही थी।
   उसे चक्कर आने पर उसे बिस्तर पर छोड़ प्रेम नीचे अम्मा को बुलाने ही भागा था लेकिन जाते हुए उसे लगा कि कहीं अम्मा जैसी अनुभवी औरत ने निरमा की दशा जान ली तो आस पास हर जगह बात फैला देगी इसलिये उनके पास पहुंच कर फिर उसने कुछ नही कहा।
  अम्मा ने जल्दी छुट्टी की इच्छा जताई तो उसके लिये भी उसने हाँ कह दिया।
  अम्मा के अनुसार सुबह का ही सारा भोजन जस का तस रखा था, उन्होने रात के लिये क्या बनाना है पूछा पर प्रेम के मना करने पर सुमित्रा के साथ ही वो भी घर चली गईं।

   नीचे का दरवाज़ा बंद कर वो वापस अपने कमरे में आकर निरमा के पास बैठा इंटरनेट पर प्रेग्नेंसी और उसके लक्षणों और उपचारों के बारे में पढ़ता बैठा था की उसकी नज़र निरमा पर पड़ी जो होश में आकर इधर उधर देख रही थी।

    ” आ जाइये” निरमा की आवाज़ सुन वो दरवाज़ा खोल अन्दर गया, निरमा अब तक में अपना गुलाबी दुपट्टा ओढ़ते हुए वहाँ से निकलने लगी।
    निरमा के पीछे पीछे वो भी नीचे उतर आया।
  कमज़ोरी से निरमा से कुछ किया नही जा रहा था, आखिर रसोई में थोड़ा इधर उधर कर वो थक गयी और वापस हॉल में चली आयी__

” क्या हुआ? कुछ चाहिये था आपको?”

  निरमा ने एकदम उदास आंखों से प्रेम को देखा__

  ” मुझे बहुत ज़ोर से भूख लग रही है, कल से कुछ खाया नही ना!”

   ” ओह्ह! खाना तो सारा बना रखा है , मैं परोस के ले आऊँ?”

  ” ये खाना देख कर खाने का मन ही नही कर रहा, एक लौकी बनी है दुसरा करेला, दाल भी काली दाल बनी है मैं वो भी नही खाती।”

  ” अच्छा! तो आपको जो खाना था वो बता देना चाहिये था ना, अम्मा बना देती। अच्छा अभी बताओ कि अभी क्या खाने का मन है?”

   निरमा के चेहरे की शिकन थोड़ी कम हो गयी__

  ” आप क्या करोगे? बनाओगे? “

  ” कोशिश तो कर ही सकता हूँ।”

  ” मुझे ना पकौड़े खाने का मन है वो भी बैंगन के और प्याज़ के और साथ में टमाटर धनिया की चटनी। ये तो हमारे तरफ का देसी खाना है , आप कैसे बनाओगे?

  ” आप बस दस मिनट बांसुरी से बात किजीये मैं अभी आया।”

   ” बांसुरी से क्यों?”

  ” वो तुम्हें मेरा मतलब आपको फ़ोन कर रही थी, आपका नही लगा इसलिये मुझे लगा लिया था।”

  ” ओह”  कह कर निरमा ने बांसुरी को फ़ोन लगा लिया और प्रेम अपने फ़ोन पर पकौड़े बनाने की रेसिपी ढूँढ़ता रसोई में चला गया….

  लगभग पन्द्रह बीस मिनट में एक बड़ी सी प्लेट में आलू, प्याज़ , बैगंन और पनीर के पकौड़े टमाटर की चटनी के साथ लिये प्रेम हॉल में चला आया, उसे देखते ही निरमा ने उठ कर उसके हाथ से ट्रे उठा कर सामने टेबल पर रख दी, प्रेम वापस रसोई में जाकर दो बड़ी बड़ी कप में चाय भी लेकर आ गया__

  निरमा ने फ़ोन रखा और प्लेट की तरफ देख कर मुस्कुरा उठी__

  ” इतने सारे पकौड़े कौन खायेगा? आपने तो कुछ ज्यादा ही बना लिये!”

  ” हम दोनो के लिये हैं, दोनो मिल कर खतम कर लेंगे।”
  हाँ कह कर निरमा ने जो खाना शुरु किया कि पूरे दो दिन की भूख उसने पूरी प्लेट साफ़ कर के ही मिटाई। उसे भी ऐसा लगा जैसे कई दिनों बाद उसने ढंग से कुछ खाया था, उसे खाना इतना अच्छा लग रहा था कि चाय छोड़ चुकी निरमा पकौडों के साथ आज चाय भी पी गयी।

   उसे ऐसे लगातार खाते देख प्रेम के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी, और उसे खुद को खाते देख वो झेंप गयी__

  ” क्या करुँ? आज ऐसी ज़ोर की भूख लग गयी थी कि बिल्कुल कंट्रोल नही हुआ, आपने टेस्ट किया या नही?”

  ” हाँ हाँ खाया ना, एक दो मुझे भी मिल गये”

  ” बस!” उसकी हँसी फ़ोन की रिंग में छिप कर रह गयी।
  प्रेम के मोबाइल पर राजा का फ़ोन आ रहा था, जिसे उठाये प्रेम टहलते हुए राजा से बात करने लगा, लेकिन बात खतम होते होते प्रेम के चेहरे पर खुशी की जगह चिंता की लकीरें खिंच गईं।

क्रमशः

aparna..

   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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