जीवनसाथी-44

जीवनसाथी–44


   प्रेम के मोबाइल पर राजा का फ़ोन आ रहा था, जिसे उठाये प्रेम टहलते हुए राजा से बात करने लगा, लेकिन बात खतम होते होते प्रेम के चेहरे पर खुशी की जगह चिंता की लकीरें खिंच गईं__

  ” हुकुम आप इतने सब के बाद भी खुश हैं?”

  ” ये बहुत बड़ी खुशी की बात ही है प्रेम क्योंकि, मैं शुरु से यही चाहता था कि विराज गद्दी पर बैठे।”

  ” उसकी सच्चाई जानते हुए भी?”

  ” बचपने में भूल हो जाती है प्रेम! अच्छा सुनो तुम यहाँ थे नही इसलिये तुम्हें ही सबसे पहले फ़ोन किया अब ज़रा अपनी उनको भी बता दूँ …”

  ” जी हुकुम!….


   ********

   ” जे मोड़ी ऊपर के गयी वापिस नीचे आना ही भूल गयी पर्मिला?” बुआ की तल्ख आवाज़ सुन बांसुरी फ़ोन वापस रख नीचे चली आयी

    कुछ देर लोकाचार की बातें भाई भाभी को सीखा पढा कर शाम ढ़लती देख बुआ जी अपने घर सलट गयी उनके पीछे से ताई ने भी रात के खाने के लिये आलू बड़ी की सब्जी और कढ़ी जैसी  कुछ सामग्रियाँ समेटी और निकल गयी, पीछे से तीन प्राणी रह गये तब चौदस की सन्ध्या बाती होने के बाद बांसुरी के पिता ने उसे बुलाया और बड़े प्यार से अपने पास बैठा कर सारी बातें जाननी चाही….
    एक बेटी अपने पिता से जितना बता सकती थी उतना बांसुरी ने अपने पापा को बता दिया, प्रमिला के माथे पर तो चिंता की लकीरें खिंच आयीं लेकिन बांसुरी के पिता वैसे ही सामान्य बने रहे__

  ” बंसी ! बेटा उन लोगों से मिलना कैसे हो सकता है? क्या उनसे मिलने के लिये हमें भोपाल जाना होगा?”

   बांसुरी खुशी से अपने पापा से लिपट गयी__

  ” एक बार और सोच लिजिये जी! आप दुनो बाप बेटी तो पगला गयें हैं, एक तो ठाकुर उसपे कहीं के राजा महाराजा! कैसे निबाह करेगी हमारी बिटिया? बहुत नियम धरम होतें हैं कायदा कानून होतें हैं ?कैसे करेगी लाड़ो”

  ” देखो बंसी की माँ तुम भी तो अपने सासरे निभा लीं ना तो बस मेरी बेटी भी निभा लेगी….लड़कियाँ पैदा ही होती है सोलह कलाओं से युक्त! हर बेटी अपने घर को संवार ही लेती है , ससुराल को अपना ही लेती है, तुम निरर्थक सोचो मत दिमाग पे ज़ोर पड़ेगा।”

   ” लिजिये चाय पीजिए और ठन्डे दिमाग से एक बार और सोच लिजिये”

  ” अरे सोच लिये हैं जी, जो भी होगा देखा जायेगा…अपने माँ पापा को बातें करते छोड़ वो अपनी चाय लिये ऊपर अपने कमरे में भाग गयी__

  अपना फ़ोन हाथ में लिये छत पर खिले गमलों के पास मोढे पर बैठी वो राजा को फ़ोन करने ही जा रही थी कि उसका फ़ोन आ गया__

  ” तुरंत उठा लिया फ़ोन! क्या हाथ में ही पकड़ कर बैठी थीं?”

  ” जी हाँ! आप सुबह कुछ गुड न्यूज़ देने वाले थे ना?”

  ” हाँ बिल्कुल और वो भी एक नही दो।”

  ” मेरे पास भी एक गुड न्यूज़ है।”

  ” क्या बात है! तो तुम्हीं पहले कह दो बाबू!”

  ” बाबू? ये क्या है राजा? तुम तो हमेशा बांसुरी कहते थे?”

  ” हाँ यार अभी भी बांसुरी ही कहता हूँ लेकिन तुम इतनी प्यारी सी हो ना कि बाबू भी कह लूंगा कभी कभी।”

   ” चलो बताओ क्या बोलने वाले थे सुबह?”

   ” तुम्हीं  सोचो!”

  ” घर वाले मान गये क्या?”

   ” हां जी! तुमसे शादी की बात पर महल की रज़ामंदी की मुहर लग गयी है….और एक खुशखबरी भी है, वो ये कि हमारे साथ ही विराज की भी शादी होगी, रेखा कुमारी के साथ!”

  ” सच्ची! मुझे नही लगा था कि तुम्हारे घर वाले इतनी आसानी से मान जायेंगे, और सुनो ये रेखा कुमारी कौन है?”

  ” रेखा कुमारी! अरे ये वहीं हैं जिनका रिश्ता मेरे लिये आया था पहले, लेकिन जब मैंने तुम्हारी बात रखी तब उनका परिवार नाराज़ ना हो जाये इसलिये उनकी और विराज की बात चलाई जायेगी, सबको उम्मीद है उनके पिता मान जायेंगे, ना मानने का सवाल ही नही उठता आखिर रियासत के होने वाले राजा से शादी की लिये कौन सा परिवार मना करेगा?”

  ” हाँ वो तो है! वेट तुमने अभी अभी क्या कहा? रियासत का भावी राजा? कौन विराज?

  ” हाँ जी बिल्कुल यही कहा!”

  ” लेकिन राजा! भावी महाराज तो तुम हो ना, तुम गद्दी पर बैठने वाले थे ना?”

” पर अब मैं नही बैठ रहा बांसुरी! एक तरह से मॉम की और बाकी लोगों की यही शर्त थी__ तुम या राजगद्दी! जाहिर है तुम्हारे सामने उस गद्दी की कोई कीमत नही! ”

   बांसुरी को एकदम चुप पाकर राजा ने फिर कहना शुरु किया__” क्या हुआ? तुम रो रही हो बाबू?”

” राजा! मैं सोच भी नही सकती थी कि तुम मुझसे इतना प्यार करते हो! मुझे खुद पर ही रश्क हो गया। आज तक ज़िंदगी से कभी कोई शिकायत नही रही लेकिन अब अपनी ज़िंदगी से ही इश्क़ हो गया…”

  “ओह्हो राइटर साहिबा , ले आईं अपनी शहद घुली बोली….”

  “हाँ और सुनो, कभी तुम्हारे ऊपर एक किताब ज़रूर लिखूंगी और नाम क्या होगा जानते हो?”

  ” हाँ- राजकुमार अजातशत्रु सिंह ” प्रेम दीवाना”।”

  ” जी नही , कहानी का नाम होगा “जीवनसाथी” जो हम बने , एक दूजे के…अच्छा सुनो एक फोर्मैलिटी थी, अगर बुरा ना मानो तो पूछूँ?”

  ” हाँ बिल्कुल!”

  ” तुम्हारी जन्मतिथी,समय और जगह के नाम के साथ बता पाओगे!…..
    ….,  क्या करुँ पँडित की बेटी हूँ ना, पापा एक बार हमारी कुंडली भी मिलाना चाहतें हैं…”

  ” अरे यार ! अब ये सब क्या नया नया लेकर आ रही हो। ”


  ” मान जाओ ना! पापा की ये इच्छा पूरी हो जाये।
     हमारे लिये वो भी तो  खुद को मना ही रहे आखिर।”

   ” मतलब! एक मिनट अभी अभी क्या कहा? कुंडली मांग रहे इसका मतलब वो भी मान गये।”

  ” जी हाँ बुद्धू राम! इतनी देर में समझ आयी बात तुम्हें।”

  ” पर बांसुरी मान लो कुंडली नही मिली तो?”

  ” कैसे नही मिलेगी? जब हम मिल गये तो कुंडली तो मिल के रहेगी, तुम बस दादी से पूछ कर सब सही सही भेज दो”

   ” सुनो एक काम करो तुम अपनी डिटेल्स भेज दो, तुम्हारी कुंडली से पर्फेक्ट मैच करती अपनी कुंडली बनवा कर तुम्हें भेज दूंगा , पूरे छत्तीस गुण ना मिला दिये तो कहना!”

  ” कितने बदमाश हो ना तुम, और सुनो छत्तीस गुण मिलने भी नही चाहिये, श्री राम और सीता माता के मिले थे तो उन्हें हमेशा कष्ट मिले जीवन में, समझे। अब बिना ज्यादा दिमाग लगाये मुझे सही सही डिटेल्स भेज दो , मैं जा रही नीचे, माँ की भी मदद करवा दूं कल दीवाली है ना।”

   ” ठीक है, मैं भी ज़रा काम धाम देख लूँ, इतने दिन से अपने ऑफिस का रुख नही किया है।”


   ***********


     शाम होते ही कमरे में अन्धेरा बढ़ते देख पिंकी ने उठ कर लाइट्स जला लीं और अपनी किताब बंद कर अन्दर जाने लगी__

  ” अब तुम कहाँ उठ कर चल दी? फिर से ब्रेक?”

  ” रतन! बेबी कल दीवाली है, कुछ तो तैय्यारी कर लें…

  ” बेबी हमारी दीवाली होली सब कुछ फरवरी के बाद है। यू नो ना कि हमारा सेलेक्शन कितना ज़रूरी है। शादी कर चुके हैं, एक सामान्य डिग्री के अलावा हाथ में कुछ नही है….मेरे लिये यू पी एस सी की सीट मेरी जान से ज्यादा कीमती है।”

   पिंकी ने मायुस होकर रतन की आंखों में देखा__

   ” यार अभी अभी तो मेन्स देकर उठे हैं, और तुम हो कि बिना ब्रेक लिये शुरु हो गये, ऐसा भी कौन पढाकू होता है जो नई नवेली बीवी को भूल कर बस किताबों में घुसा रहता है, यू आर सो अनरोमांटिक।”

   ” ओह्हो मेरी नई नवेली! तू हमेशा मेरे लिये ऐसी ही रहेगी, बस अभी पढ़ लेने दे…..एक बार सेलेक्ट हो जाऊं उसके बाद तुझे बताता हूँ रोमांस क्या होता है।”

  ” अच्छा! थोड़ा सा ट्रेलर तो अभी भी दिखा सकते हो, पूरी पिक्चर बाद में देख लेंगे।”

  ” नो मैडम! बंदा जब पढ़ाई करता है तो सिर्फ पढ़ाई करता है समझीं। जब मुहब्बत करूंगा तब सिर्फ मुहब्बत ही करूंगा, थक जाओगी मेरे प्यार से…”

  “हां जैसे अभी थक रही हूँ, तुम्हारी रूल बुक से। यार रतन तुम तो महल से ज्यादा नियम कानून वाले निकले यार! चार बजे सुबह चाबुक मार के कौन सा पति होगा जो अपनी बीवी को पढ़ाई के लिये जगाता है….

  पिंकी की बात पूरी भी नही हुई कि रतन ने उसे टोक दिया__

” हो गया राजपुतानी! पिछले पांच मिनट से चपर चपर कर रही हो, कितना बोलती हो यार! अब ब्रेक भी कम्प्लीट  हो गया, फ्रेश हो गये हम दोनों। अब आओ चुप चाप पढ़ने बैठ जाओ।”

  ” मैं तो चौदस का दिया जलाने जा रही थी”  रतन के घूर कर देखते ही पिंकी ने बड़ी मासूमियत से उसे देखा__

  ” पक्के नास्तिक हो ना!”
हाँ कह कर वो वापस किताब खोलने लगा__

” अच्छा सुनो! आज खाना बनाने की टर्न मेरी है ना तो मैं कुछ अच्छा सा पकाने जा रहीं हूँ।”

  अबकी बार रतन वाकई गुस्से में आ गया__

  ” खाना बनाने की टर्न मेरी थी और मैं सिर्फ खिचड़ी बनाने वाला था।
     इस सब में क्यों टाईम वेस्ट कर रही हो यार! तुम्हें क्यों समझ नही आ रहा पिंकी की तुम्हारा वेस्ट किया एक एक मिनट तुम्हारे प्रतिद्वंदी के समय में दुगुनी बढ़त करता जा रहा है।
   यार मुझे तो ऐसा लग रहा तुमने यू पी एस सी को हँसी खेल समझ रखा है,  तुम्हें क्या लगता है तुम्हारा नाम पढ़ कर वहाँ तुम्हें कोई रियायत मिल जायेगी, मैडम अच्छे खासे राजमहल वालों की बोलती बंद हो जाती है वहाँ।
   प्लीज़ अपना नही तो कम से कम मेरा तो सोचो! राजा भैय्या जब इस घर की चाबी मेरे हाथ में रख रहे थे उस वक्त जानती हो मैं अन्दर से कांप रहा था, इतना बड़ा आदमी उतने ही बड़े दिल के साथ मुझे अपनी बहन पूरे भरोसे के साथ सौंप गया, अगर मैं सेलेक्ट नही हो पाया तो उन्हें क्या मुहँ दिखाऊँगा?
    तुम कहती हो रोमांस नही करते, प्यार नही करते, अरे बुद्धू लड़की क्या मेरे लिये आसान है तेरे साथ रहते हुए भी तुझसे दूर रहना?
     नही! बिल्कुल भी नही!
       लेकिन मैं चाहता हूँ पहले कुछ बन जाऊँ, तुम्हारे भाई के विश्वास को पूरा कर जाऊं और सच कहुँ तो उसके बाद ही पिंकी हम असल जीवन में पति पत्नि बन पायेंंगे, इस बात को जितना जल्दी समझ सको तुम भी समझ लो।
    तब तक हम सिर्फ रुम पार्टनर्स है।”

  पिंकी कुछ देर को असमंजस में खड़ी रह गयी, उसे एकाएक कोई बात नही सूझी।
   रतन की बात सौ प्रतिशत सही थी, आखिर उसके भाई ने सिर्फ उसके कहने पर पूरे महल से अलग जा कर उसे यहाँ रतन के साथ जीने और अपने सपने को पूरा करने का मौका दिया था, और वो बिना बात के सभी बातों को बिगाड़ने पर तुली थी। अपनी बेवकूफी पर खिसिया कर वो चुपचाप मुस्कुराते हुए रसोई की ओर बढ़ गयी__

  ” ओके ! मिस्टर हसबैंड! मैं बस चाय बनाने जा रहीं हूँ। तुम्हारी टर्न है तो खाना तुम्ही बनाओ मैं चाय के साथ वापस पढ़ने बैठ जाऊंगी।”

  ” ठीक है! फिर मेरे लिये भी एक कप चाय बना ही लाओ।”

  ” जो आज्ञा साहेब!” कहती पिंकी रसोई की ओर बढ़ गयी।


   ********

   दीपावली पूजा सभी घरों में संपन्न हो गयी।
महल में बिना ताम झाम के पूजा होनी थी तब भी जहां महल वासीयों और कामगारों के मेवे मिष्ठान्न में ही हजारों फूँक गये…… वहीं ढ़ेर सारी मिठाइयों और तोहफों के साथ अदिती ने अनाथालय में और भास्कर ने विडियो कोंफ्रेसींग में दीवाली पूजा कर ली।
   बांसुरी का सारा परिवार आसपास ही रहता था, सभी अपने अपने घरों की दिया बाती कर बांसुरी के ही घर इकट्ठा हो गये, वहीं रतन और पिंकी ने भी एक छोटी सी पूजा निपटा कर कुछ पांच छै कैंडल्स जला कर ही दीपोत्सव मना लिया।
     एक तो वैसे ही महल में नही मननी थी दूजा खुद प्रेम का मन गवाही नही दे रहा था, सो उसने भी बस लक्ष्मी पूजा की औपचारिकता ही पूरी कर दी। लेकिन उसी शाम महल से रानी साहब रूपा भाभी के साथ नयी बहू से मिलने चली आयीं।
   निरमा के गले में एक सतलड़ा नवरत्न हार डाल कर उन्होंने एक बार फिर राजा का दिल जीत लिया।

  ********

    दीवाली के बाद दिन जैसे पंख लगा कर उड़ रहे थे। सभी अपने कामों में मसरूफ थे….एक राजा और बांसुरी के अलावा।
   उस समय की बातचीत के बाद आखिर दादी से पूछ ताछ कर राजा ने अपनी जन्मतिथि और बाकी बातें बांसुरी को बता दी, और साथ ही ठाकुर साहब बात पक्की करने आ रहें हैं ये खबर भी दे दी।
    बांसुरी को भी किसी तरीके से अपने पिता को राजा के घर भेजना था, आखिर उसने हिम्मत करके अपनी माँ से इस बारे में बात कर ही ली।
   शाम को पति देव के ऑफिस से घर आते ही पानी और चाय की ट्रे के साथ प्रमिला गरम गरम मुन्गौड़ियां भी ले आयी__

  ” क्या बात है भई ! अभी तो बच्चे भी नही हैं फिर भी आज कड़ाहा चढ़ा दिया”

   ” आप तो ऐसे कह रहे जैसे हम आपके लिये कछू बनाते ही नही।”

  ” बनाती काहे नही हो, कद्दू, घिया, तोरी सब हमरे लाने ही तो बनाती हो ये मनहूस शक्कर की बीमारी ना हुई खाना मुहाल हो गया।
    वीणा भी बहुत दिन हुए आयी नही नाती को लेकर।”

  ” हम्म! ए जी सुनिये बंसी का फोन आया रहा, वो उस लड़के का पत्री भेजी है का तुम्हें?”

  ” अरे हां! सुबह ऑफिस में थे तब भेजी थी, वो भी अपने ऑफिस पहुंची थी उसी समय। सुनो ये चाय जरा ढ़ाक दो हम पैर हाथ धो कर बिटिया की कुंडली देख लें एक बार, फिर पीते रहेंगे।”

  ” अरे पी लिजिये फिर देखते रहियेगा..” पर फिर किसी की सुने बिना ही पैर हाथ धो कर अपने पिता के दिये छोटे से शीशम के कलात्मक बक्से से उन्होने अपनी प्राणाधिक्य पुत्री की कुंडली निकाली और एक बार शिवलिंग से छू कर उसे आंखों से लगा कर अपना चश्मा सही किये खोल कर पढ़ने लगे…..

  ” अरी सुनती हो, ज़रा वहाँ कमरे से हमारा लैपटॉप भी ले आना …”

  ” क्यों ? अब उसकी क्या ज़रूरत?”

   ” तुम्हारे जमाई की कुंडली नही आयी है, हमे एक बार बनानी पड़ेगी। एक बार लैपटॉप में देख लेंगे फिर इधर हम अपनी गणना कर लेंगे।”

    राजा की गृह गणना, ग्रहों की दृष्टी सब कुछ पत्रे पर उतारते पण्डित जी के चेहरे पर कई भाव आते जाते रहे, और आखिर डेढ़ घण्टे के परिश्रम के बाद उनके चेहरे पर एक स्थायी स्मित तैर गया__

   ” का भवा छोटे, आज जे सँझा के बखत किसका पत्रा बिचरवा रहे हो”?

   अपनी दीदी को आया देख वो सहसा कुछ कह नही पाये, कि प्रमिला ने आकर बात संभाल ली__

  ” पांव परते हैं जिज्जी! चाय लिजिये..बंसी के पापा आप भी लिजिये, भजिया बड़ा सब ठंडा कर डाले।”

   बुआ की गिद्ध दृष्टी से ना कुछ कभी छिपा था ना छिपेगा, उन्होने झट आगे बढ़ पकड़ ही लिया कि कुंडली बंसी की थी__

  ” काय पर्मिला तुम दोनों ने गले में पाथर बान्ध के तलैय्या में कूदने को प्रण कर ही लिया क्या? जे तुम दोनो को दिख काहे नही रहा, अरे ठाकुरों के घर हमारी छोरी निभा ना सके है।”

  ” जिज्जी दोनो के साढ़े अट्ठाईस गुण मिलतें हैं, लड़के की कुंडली में तीन तीन शुभ गृह उच्च में बैठे उसे राजा बना कर मानेंगे , इसके साथ ही लड़के के चन्द्र से दसवें गृह के स्थान पर भी शुभ गृह आमल योग बना रहे , इसे कभी कोई स्वास्थ्य और धन का क्लेश ना होगा । और तो और राजा के द्वितीय स्थान का स्वामी स्वयं बृहस्पति है वो भी एकादश में इसे कभी धन सम्बंधित कोई कष्ट ना होने देगा और सबसे अच्छी बात गजकेसरी योग है राजा की कुंडली में ! बस एक बात थोड़ी सी चिंता में डाल रही….

” वो क्या जी? कोई दोष भी निकल आया क्या लड़के की कुंडली में?”

  ” लड़के की कुंडली में तो कोई दोष ना है प्रमिला , दोष तो हमारी बंसी की कुंडली में भी नही है पर तुम्हारी कन्या सिंह लग्न और सिंह राशि की जातक है …..जो जब तक शांत है तभी तक शांत है।
     लेकिन जिस दिन दहाड़ पड़ी उस दिन फिर राजा की कुंडली भी उसे ना रोक पायेगी। दोनो की कुंडली में एक साथ कोई दोष नही दिखता लेकिन कुछ छोटा मोटा क्लेश तो होगा कभी, अगर उस क्लेश को दोनो पार कर गये तब तो जीवन सफल समझो पर नही कर पाये तो….

  ” अरे शुभ शुभ बोलो, अभी तो ब्याह भी ना हुआ तुम अभी से का पसारा फैलाये बैठे हो, कुंडली मिल गयी ना बस! अब एक सुदिन देख कर तुम और बड़े भैया नंदोई जी के साथ हो आओ वहाँ से।”

  ” हम तो कहतीं हैं एक बार और सोच लो , पैर पुजाई में का उस राजपूत के चरन धोओगे दोनो?”

  ” अब का कहें जिज्जी! जो हमरी बिटिया का वर वो हमरे लिये तो साक्षात बिष्णु भगवान समान हुआ ना, अब लग्न के बखत  वहाँ पाटे में बैठे बेटी दामाद लक्ष्मी बिष्णु ठहरे अब उसमें का बामण का ठाकुर देखेंगे, चरन तो धोएंगे ही ना।”
    बिटिया की प्रस्तावित शादी सोच प्रमिला की आंखें भीग गयी, उसकी लाख टके की बात ने मर्मस्थल पर चोट किया, बुआ जी स्वयं पानी का गिलास थामे प्रमिला का सर सहलाती खड़ी रहीं।

    आखिर एक सुदिन ठहरा और  बांसुरी और राजा से बात कर बांसुरी के पिता अपने बड़े  भाई और दामाद को साथ लिये भोपाल के लिये निकल गये….वो अपनी हैसियत के मुताबिक ट्रेन से ही जाना चाहते थे लेकिन ऑफीसर दामाद बाबू के पास पैसों की कमी ना थी, कमी थी समय की। इसिलिए जाना और आना फ्लाइट से ही तय हुआ। सुबह सात बजे भोपाल एयरपोर्ट पर उतरा बांसुरी का परिवार अभी इसी उधेड़बुन में था कि रियासत के लिये टैक्सी कहाँ से ली जाये कि हँसता मुस्कुराता राजा उनकी तरफ भागा सा चला आया।
     बांसुरी पिता को माँ के माध्यम से तस्वीर दिखा चुकी थी इसलिये इस लम्बे सजीले से लड़के को देख तिवारी जी समझ गये कि यही उनका भावी जमाता है।
   राजा ने आगे बढ़ कर बांसुरी के पिता के पैर छू लिये__” खुश रहो! चिरंजीव भव! वैसे हमारे में दामाद  पैर नही छूते।”

  ” लेकिन हमारे यहाँ छूते हैं”  राजा की चिरपरिचित मुस्कान ने वहाँ उपस्थित तीनों के दिल जीत लिये।

   सबको अपनी गाड़ी में बैठाए राजा अपनी रियासत की ओर निकल गया….उसके मोबाइल पर मेसेज की बीप बजी__

  ” पापा पहुंच गये ना?”

  ” हाँ बाबू! पहुंच गये। ”

  ” तुम टाईम पर पहुंच गये थे ना?”

  ” रात भर सोया ही नही था कि ससुर जी आ रहें हैं, उनकी फ्लाइट के दो घण्टे पहले पहुंच गया था।”

  ” गुड माय बेबी।”

” अब मेसेज करना बंद करोगी, तब तो आराम से गाड़ी चला पाऊंगा। एक हाथ से टाईप कर रहा हूँ और एक हाथ में स्टीयरिंग…”

  ” ओके ओके! तुम आराम से जाओ! और सुनो पापा को अकेले मत छोड़ना। तुम्हारा महल देख कर घबरा ना जायें। समझ रहे हो ना, मैं क्या कह रही।”

  ” डोंट वरी बाबू! मैं सब समझ रहा हूँ, मैं सब संभाल लूंगा , अब तो बस बैंड बजने और घोड़ी चढ़ने का इन्तजार है…

     फ़ोन को एक किनारे रख अपने होने वाले ससुरालियों से बातें करता राजा गाड़ी को भगाता चला गया।

क्रमशः

  aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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