जीवनसाथी -46

जीवनसाथी-46


       कहा जाता है जीवन मृत्यु और विवाह हमारे पैदा होने के पहले ही ईश्वर हमारे भाग्य में लिख जातें हैं…..और जब जो होना होता है वही होता है, उसमें फिर कहीं कोई रुकावट कोई रोड़ा नही आता।

   बहुत बार भले ही मनुष्य अपने प्रारब्ध को समझ ना पाये लेकिन नियती उससे वो सब करवाती जाती है, जिसे करने के लिये उसका जन्म हुआ है।

  भास्कर को सिंगापुर आकर दिन बीत चुके थे लेकिन अदिती का वहाँ आना हर बार टलता जा रहा था।
  भास्कर जो कभी अपने हर निर्णय पर मज़बूती से टिका खड़ा होता था धीरे धीरे रोजमर्रा की सामान्य बातों के लिये भी अदिती से सलाह मशवरा कब लेने लग गया उसे भी पता नही चला…
     अदिती कब माखन में मिसरी सी दूध में चिनी सी उसके जीवन में घुलती चली गयी उसे इसका भान ही नही हुआ लेकिन वक्त सदा सर्वदा एक सा हो ये ज़रूरी तो नही।
 
      अदिती की सिंगापुर जाने की टिकट हो चुकी थी, उसे उसी रात निकलना था कि अदिती के पिता का फ़ोन आ गया। उनसे बात कर पता चला कि अदिती की माँ कोलोन कैन्सर से जूझती अपनी अन्तिम घडियां बिता रहीं हैं ….
   माता पिता संतान से नाराज़ हो या संतान अपने माता पिता से लेकिन एक कोई नाज़ुक और महीन धागा ऐसा बंधा होता है दोनो के बीच कि कोई भी  संकट हो या कोई भी  विपत्ति पडे… उन्हें पास ले ही आती है।
    फ़ोन में बात करने के बाद से ही रोती धोती अदिती अपनी माँ के पास जाने की तैय्यारियाँ करने लगी कि,  बिना किसी पूर्व सूचना के उसके पिता वहीं उसे लेने चले आये।
    पति पत्नि आपसी वैमनस्य से अलग ज़रूर हो गये थे लेकिन दोनों के ही जीवन में उन दोनो के अलावा और कोई बाहरी व्यक्ति नही था, ऐसे में अपने अन्तिम समय में अदिती की माँ को सबसे पहले अपने पति की ही याद आयी…
   अदिती के पिता लगभग छै महीने से इस बीमारी के बारे में जानते थे लेकिन अदिती परेशान हो जायेगी सोच कर उन्होने उससे कुछ नही कहा था।
    कई बार अदिती को सब बता देने की बात उन्होने दबी ज़बान से अपनी पत्नि के सामने रखी भी लेकिन माँ आखिर माँ थी, उन्हें उम्मीद थी कि कैसे भी हो वो ठीक हो जायेंगी और एक बार ठीक होने के बाद वो अदिती को खुद सब कुछ बता देंगी…अपनी कीमोथेरेपी के कठिन अध्यायों का हिस्सा वो अपनी राजकुमारी को नही बनने देना चाहतीं थीं….
     पूरी ज़िंदगी भले ही अलग अलग विचारों के कारण पति पत्नि ने एक दूसरे का जीवन दूभर कर दिया था लेकिन अपनी ज़िन्दगी की सांझ में इस कठिन बीमारी ने दोनों के अभिमान को चूर चूर कर दिया…
               पूरी ज़िंदगी लड झगड कर बिता देने के बाद कुछ समय पहले ही दोनो अलग हुए थे लेकिन नियती को शायद मंज़ूर ना था ,जिसने उन्हें वापस ऐसे मिलवा दिया।
मेजर साहब ऐसे तो अपने कायदों और उसूलों से बंधे अपनी जीवन नैय्या पार लगा गये थे लेकिन अब ऐसी कठिन घड़ी में अपनी जीवन सन्गिनी की सारी भूलों को भुला कर वो एक बार फिर उसके साथ कंधे से कंधा मिलाए उसकी लड़ाई में उसका साथ दे रहे थे।
   अपनी पत्नि की जितनी सम्भव सेवा वो कर सकते थे उन्होने की और आज जब ऐसा लगा की बात हाथ से निकलती जा रही है तब वो स्वयं अपनी बेटी को उसकी माँ से मिलवाने के इरादे से उसे लेने चले आये।

    मुम्बई से सिर्फ दो घण्टे का रास्ता था, लेकिन वही रास्ता अदिती को पहाड़ सा लगने लगा था, उसे अपनी माँ से करी गयी खुद की ज़्यादती रह रह के याद आ रही थी।
   ये सत्य था कि उसके माता पिता की दिन रात की बहस और वाद विवाद ने उसके बचपन को कड़वा कर दिया था लेकिन उसकी शिक्षा दीक्षा, उसकी ज़रूरतों पर उनके खट्टे रिश्ते का प्रभाव दोनो ने नही पड़ने दिया था….रोज़ रोज़ की चिकचिक से उसे दूर रखने उन लोगों ने उसे सबसे अच्छे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया था……
        ऊटी नीलगीरि के सेंट लॉरेंस से अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो खुद अपनी मर्ज़ी से पत्रकारिता की पढ़ाई के लिये आगे बढ़ गयी थी….हालांकि उसकी माँ का सपना उसे डॉक्टर बनाने का था लेकिन उन्होने कभी उस पर अपनी कोई ख्वाहिश नही थोपी थी।
   बचपन से आज तक की अपनी माँ की यादों को संजोती अदिती अपने आँसूओ से भीगती जैसे खुद को ही भूल बैठी थी।
   पिता के साथ निकलते समय जल्दबाजी में वो अपना फ़ोन अपने कमरे में ही भूल गयी….


   *****

   बांसुरी की छुट्टियाँ मंज़ूर हो गईं थीं, उसकी माँ वैसे भी सारी तैय्यारियाँ कर चुकी थी तो ऐसा कोई काम था नही जो बांसुरी के जाये बिना ना हो पाता, इसिलिए बांसुरी अपना छुट्टी पर जाने के पहले का सारा काम निपटा कर ही छुट्टियाँ ले रही थी जिससे उसे वापस आने में अगर देर हो गयी तो उसका किया रखा काम ना बिगड़े…..
….हालांकि अभी वो इस बात को सोच कर थोड़ा परेशान भी थी कि आगे उसकी नौकरी का क्या होगा? क्या राजा को शादी के बाद वहीं छोड़ कर वो वापस मुम्बई आ पायेगी….वो बहुत सोचती लेकिन इसका कोई जवाब अपने भीतर ढूंढ़ नही पाती।
   वैसे तो उसकी और राजा की ढ़ेर सारी बातें होतीं थी…रात भर बातें, बातों का सिलसिला खत्म ही किसी की नींद से होता था, कभी वो हाँ हूँ करती चुप हो जाती तो राजा समझ जाता, कभी वो हुन्कारे भरते भरते अचानक चुप हो जाता तो वो समझ जाती और मुस्कुरा कर बाकी बातें अगले दिन के लिये बचा कर फ़ोन रख देती।
    कितनी बातें थी दोनों के बीच, एक दूसरे के बचपन की बातें , स्कूल कॉलेज की यादों के साथ साथ उनके भविष्य के सपनों की उड़ान….इतनी बातें होतीं फिर भी बातों का दौर था कि खत्म ही ना होता था….
    पर इतनी सारी लुभावनी बातों में आज तक बांसुरी की नौकरी का ज़िक्र नही हो पाया, ना राजा ने उससे कभी ये पूछा कि वो आगे क्या करने वाली है और ना ही बांसुरी कभी कह पायी कि वो शादी के बाद भी नौकरी करती रहना चाहती है…..

    ऑफिस में अपना सारा काम निपटा कर बांसुरी चाय लेकर अपने क्यूबिक में आकर बैठी ही थी कि राजा का फ़ोन आने लगा। ये वक्त तो उसका भी अपने ऑफिस के कामों को देखने का होता है, इस बेवक्त में फ़ोन कैसे सोचते हुए उसने फटाफट फ़ोन उठा लिया__

  ” मेरे बारे में ही सोच रहीं थीं ना?”

  ” हाँ और क्या? अब और काम भी क्या बचा है मेरे पास…”

  ” सच बोलो।”

  ” हाँ  जी सच ही कह रही राजा साहेब! आज अपना बचा खुचा काम भी हैण्डओवर कर दिया सपना को।”

  ” ओके! मतलब अब ऑफिशीयली फ़्री हो गयी हो ना!”

  ” बिल्कुल फ़्री हो गईं हूँ, पर आप तो व्यस्त होंगे आपकी रियासत के कामों में।”

  ” व्यस्त तो था लेकिन आज से मैंने भी छुट्टी ले ली है…

  “वाह क्या बात है! पर आपकी आज से ली छुट्टियों से मेरा क्या फायदा?”

  ” अरे रानी साहिबा आप आदेश तो किजीये आपके फायदे के लिये जान ना लगा दी तो कहना।”

  ” जान लेकर क्या करूंगी? मुझे तो आप और आपका वक्त चाहिये, पिछले दो दिन से हम दोनो इतने व्यस्त हो गये थे कि ढंग से बात भी नही कर पाये”

  ” कितने घण्टे का वक्त चाहिये आपको, बोलिये?”

  ” पूछ तो ऐसे रहे जैसे अभी हाज़िर हो जायेंगे सामने”

  बांसुरी ने ऑफिस में इधर उधर नज़र दौड़ाते हुए कहा…..
उसे राजा की कार्गुज़रियों पे भरोसा कम ही था..

  ” आप आज्ञा दीजिये हुकुम!  गुलाम आपकी खिदमत में हाज़िर हो जायेगा।”

  ” तुम मुम्बई में हो? कहाँ हो अभी? प्लीज़ जोक्स मत करो राजा, आजकल वैसे भी कुछ ज्यादा ही इमोशनल होने लगी हूँ।”

   ” बाहर आ जाओ अपने ऑफिस के मेन गेट पर”

  बांसुरी चाय की कप टेबल पर रखे बाहर की ओर दौड़ पड़ी …

     ऑफिस दसवें माले पर था, लिफ्ट में सवार बांसुरी जैसे ही नीचे पहुंची, लिफ्ट का दरवाज़ा खुलते ही कांच के मुख्य द्वार के बाहर राजा हाथ बांधे अपनी चिर परिचित मुद्रा में खड़ा मुस्कुरा रहा था।
उसे देखते ही बांसुरी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान दौड़ गयी, उसका मन तो किया कि भाग कर राजा के सीने से लग जाये लेकिन ऑफिस वहाँ के कर्मचारी और आस पास पसरी भीड़ ने उसे ऐसा करने से रोक दिया__

  ” अरे पहले पता होता कि तुम इतनी खुश हो जाओगी तो मैं पहले ही आ गया होता!”

  ” बड़े आये, पहले आने वाले। तुम्हें फुरसत होती तब तो आते। देख रही हूँ जबसे हमारी शादी तय हुई है कुछ ज्यादा ही व्यस्त नही हो गये हो।

  ” हाँ यार हो तो गया हूँ, पता नही जितना ही समेटना चाहता हूँ काम उतना ही फैलता  जा रहा है, इसलिये तो चुपचाप निकल आया, तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ने।”

  ” मतलब? तुम मेरे साथ रायपुर तक जाओगे?”

  ” हाँ जी, कल सुबह की तुम्हारी फ्लाइट है ना, उसी में हम साथ रायपुर चलेंगे, एयरपोर्ट से तुम घर चली जाना मैं भोपाल निकल जाऊंगा, फिर परसों तो तुम्हें भी भोपाल पहुंचना ही है।”

” ओह्हो तो शादी के चार दिन पहले दुल्हे राजा दुलहन को उसके मायके छोड़ने आये हैं! क्या बात है!”

   ” क्या करुँ ? लग ही नही रहा था लव मैरिज हो रही है, मुझे तो ऐसा लगा मैने आज तक ध्यान से अपनी बांसुरी को देखा तक नही।”

  ” उस दिन तो बड़ी शेरों-शायरी कर रहे थे, दांत देखे बाल देखे, और अब ध्यान से देखा तक नही?

  ” अब मैडम जी यहीं गेट पे खड़े खड़े बात करने का इरादा है या कहीं चल के सुकून से बैठेंगे हम”

  ” बस दो मिनट राजा! तुम यहीं रुको, मैं अभी अपना पर्स लेकर आती हूँ।”

  बांसुरी पलक झपकते गयी और अपना पर्स संभाले वापस आ गयी….

  ” बड़ी जल्दी चली आईं तुम? बॉस को बताया भी या नही? वैसे तुम्हारी बॉस तो अदिती है ना अभी, क्या हाल चाल हैं उनके?”

   ” बताती हूँ बाबा सब बताती हूँ….अदिती की बडी याद आ रही है तुम्हें? क्या बात है? चलो चलो सब बताती हूं …… पहले ऑफिस से बाहर चलें , वर्ना यहाँ सब समझ जायेंगे कि दिन दिन भर मेरा फ़ोन कहाँ एंगेज रहता था, और ….

  ” तो समझ जाने दो, गलत क्या है इसमें।”

  ” गलत कुछ नही लेकिन फिर ये सब तुमसे पार्टी लेकर ही तुम्हें छोड़ेंगे, और आज का पूरा दिन अकेले बीताने का सपना अधूरा रह जायेगा।”

   राजा हँसते हुए आगे बढ गया, अपना आउटपंच कर बांसुरी भी उसके पीछे वहाँ से बाहर निकल गयी।

   बाहर आकर बांसुरी कैब बुलाने जा रही थी कि उसने देखा पार्किंग से राजा बुलेट में सवार उसकी तरफ आ रहा है….आश्चर्य से बांसुरी की आंखें फैल गईं__

  ” ये किसकी रॉयल एनफील्ड है?”

  ” आपकी है हुकुम! आप आईये तो सही।” बांसुरी आश्चर्य से कभी राजा को कभी बुलेट को देखती खड़ी थी….

   ” क्या हुआ? अरे भई सच में तुम्हारी ही है। तुम्हारा ही तो सपना था शादी के पहले एक बार बुलेट चलाना चाहती हूँ ….बांसुरी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान दौड़ गयी__

  ” हद करते हो राजा! वो तो मैंने ऐसे ही कह दिया था।”

  ” ओह मतलब तुम्हें बुलेट चलाने का शौक नही है?”

  ” नही नही ऐसा नही है …मेरा मतलब था …अरे यार कौन करता है इतना….

   ” चलाना चाहती हो ना ! तो आ जाओ सामने बैठो और भर लो अपने सपनों की उड़ान …

   “पर राजा मुझे चलाना आता थोड़े ना है?”
 
   ” बचपन में साईकल तो चलायी होगी ना, कॉलेज में स्कूटी भी चलाई होगी…तो बस वैसे ही बैलेंस बनाना है , बाकी तुम उसी पर ध्यान देना, गियर मैं चेंज करता जाऊंगा”

   ” पक्का ?”

  ” हाँ जी हुकुम! पक्का…आईये मैं पीछे सरकता हूँ, आप आगे बैठ जाइये..”

   बांसुरी ने एक बार राजा को देखा, एक बार आसमान की तरफ देख मन ही मन भगवान को स्मरण किया और हैंडल पर हाथ रखे सामने बैठ गयी…गाड़ी को शुरु करने और आगे बढ़ाने की सारी बातें बताता राजा बांसुरी को बिना डरे चलाने की सलाह देता रहा, और उससे सुन कर धीरे धीरे बांसुरी ने गाड़ी को आगे बढ़ा ही लिया….

    एक दो बार हैंडल इधर उधर लहराया ज़रूर लेकिन भागा नही क्योंकि बांसुरी के पकड़ने के बावजूद राजा ने दोनो तरफ से हैंडल पकड़ रखा था, थोड़ी ही देर में बैलेंस सध गया और बुलेट हवा से बातें करती मुम्बई की सड़कों पर सरपट भागने लगी…..

  ” बहुत ट्रैफिक होता है मुम्बई में राजा! डर लग रहा है मुझे।”

  ” तुम्हारी ड्राईविंग देख कर लग तो नही रहा कि तुम्हें डर लग रहा है?”

   ” अच्छा जी! डर के मारे ही तो मेन रोड की जगह ऐसी खाली सड़क पर घुमा रखी है मैंने गाड़ी..

  “ओह अच्छा ! मुझे तो लगा हमारी हुकुम का रोड़ पर बुलेट में रोमांस करने का मूड है इसलिये ऐसे सुनसान रास्तों पर ले आयी हो…

  ” फिर शुरु हो गये ना ! एक ही भूत सवार रहता है तुम पर। अच्छा बताओ सबसे पहले कहाँ लेकर चलूँ तुम्हें।”

   ” जहां चाहो ले चलो।”

  ” तुम्हें डर तो नही लग रहा मुझ जैसी अल्हड़ ड्राईवर के साथ बैठने में?”

  ” अब तो पूरी जिंदगी तुम्हारे हाथों में दे दी है बाबू, जैसे चाहो जहां चाहो मोड़ लो…तुम्हारे साथ कोई डर नही मुझे….मुझे ये भी पता है कि अब तो यमराज आ गये ना तब भी तुम्हारे साथ रहा तो वो भी मुझे ले जा नही पायेंगे।”

  ” ये सब बकवास ज़रूरी है ना, यमराज ऐंड ऑल दैट …”

  ” सच कह रहा हूँ …..बांसुरी सुनो लक्ष्मी मन्दिर ले चलो, आज के दिन की शुरुवात वहीं से करतें हैं।

   बांसुरी ने मुस्कुरा कर बुलेट मन्दिर की तरफ ले ली। महालक्ष्मी मन्दिर से निकल कर वो दोनो सिद्धि विनायक के भी दर्शन कर आये…गाड़ी थोड़ी दूर पर पार्क की हुई थी इसलिये दोनो पैदल ही चले जा रहे थे….

” खाना कहाँ खायेंगे बांसुरी? बहुत भूख लगी है?”

  ” अरे तुम तो सुबह सुबह निकले होगे ना, बिना कुछ खाये पिये, देखो जब तुमसे दूर रहती हूँ तो दिन भर दिमाग में तुमने कुछ खाया या नही ठीक से सो पाये की नही यही सब चलता है और आज साथ हो तो तुमसे मिलकर ऐसी खो गयी हूँ कि तुम्हारा ही खयाल ना रहा, चलो यहीं पास में एक अच्छा रेस्तराँ  हैं वही चलते हैं….

   ” सासु की थाली? बोलकर राजा ज़ोर से हँस पड़ा
बांसुरी भी उसके साथ ही हँस पड़ी।

रेस्तराँ में बैठे दोनों ने खाने का ऑर्डर दिया और एक बार फिर बातों में खो गये __

राजा ने सामने टेबल पर रखे बांसुरी के मोबाईल को उठा कर देखा और मुस्कुरा उठा__

  ” तो मेरा गिफ्ट पसंद आया तुम्हें?”

  ” आज वाला तो बहुत पसंद आया लेकिन उस दिन जो तुमने पापा के हाथ से भेजा था वो तो अब तक मैं देख ही कहाँ पाई हूँ?”

  ” क्यों? राजा के चेहरे पर शिकन चली आयी__

  ” अरे बुद्धू मैं तो बॉम्बे आ चुकी थी ना जब पापा तुम्हारे घर गये थे, वहाँ से पन्द्रह दिन बाद की तारीख पक्की कर आये अब इस बीच मैं कहाँ से छुट्टी लेकर जा पाती, इसिलिए कल सुबह की ही टिकट करवाई हैं सीधे शादी से चार दिन पहले की…

  ” ओके ! हम्म मतलब तुम्हें ये भी पता नही चल पाया की मैं तुम्हारे पापा को कैसा लगा?

  ” वो तो तुरंत ही पता चल गया था।

  ” कैसे?”

  ” मैने पापा के पहुंचने के समय पर ही माँ को कॉल किया और माँ से कहा कि प्लीज़ फ़ोन होल्ड कर के आप पापा से बात करो, तो माँ और ताई खोद खोद कर तुम्हारे और सबके बारे में पूछती रहीं और फ़ोन में मैं सारी बातें सुनती रही…

   “हम्म इंटेलिजेंट गर्ल! तो ससुर जी को कैसा लगा मैं”

   ” बोले लड़का ठीक है! हमारी बांसुरी के सामने उन्नीस ही है लेकिन चलेगा, अब बिटिया की पसंद के सामने किया क्या जा सकता है….

   “ओह्ह तो ये बात है, मतलब इतनी बटरिंग करने के बाद भी मैं पसंद नही आया, इससे तो अच्छा अपने असली रूप में ही रहता”

  ” कौन सा है तुम्हारा असली रूप ? राजा ? बोलो बताओ ज़रा? तो मतलब आज तक तुम झूठ कह रहे थे मुझसे?”

  ” क्यों झूठ पे तुम्हारा अकेले का कॉपीराईट है? जब तुम धड़ल्ले से बोल सकती हो तो मैं नही बोल सकता…
   राजा के मुस्कुराते ही बांसुरी भी खिलखिला उठी

  ” बुद्धू! तुम तो पापा को अपनी बेटी से कहीं अधिक पसंद आ गये हो, इतनी तारीफ कर रहे थे तुम्हारी कि क्या बताऊँ?
    कैसे चिढ़ गये ना जैसे ही थोड़ी बुराई की हुकुम की।”

  ” ओह्हो रानी साहिबा मैं कोई चिढा विढ़ा नही  समझीं, मैं तो बस चेक कर रहा था तुम्हें, अच्छा उस समय अदिती के लिये क्या बताने जा रही थीं तुम….

  *******

    भास्कर की मीटिंग थी, मीटिंग में कौन सी शर्ट के साथ किस टाई को मैच करना सही रहेगा यही पूछने के लिये वो सुबह से  दस बार अदिती का फ़ोन लगा चुका था, पूरी पूरी रिंग जाने के बाद भी अदिती ने फ़ोन नही उठाया …
     किसी का भी उसका फ़ोन ना उठाना उसे बहुत नागवार होता था और इसी बात पर उसकी नाक पे सिमटा गुस्सा फैलता फूलता दिमाग तक पसर जाता था पर वो अदिती के स्वभाव से वाकिफ था, वो कभी इतनी बेपरवाह नही हो सकती थी, इसलिये गुस्से की जगह एक हल्की सी चिंता ने भास्कर को घेर लिया।
    खैर जो समझ आया पहन के वो मीटिंग के लिये चला गया, दिन भर तो काम और काम की व्यस्तता ने घेरे रखा लेकिन शाम को लौट के आने के बाद एक बार फिर वही सूनापन उसे घेरने लगा, उसे खुद ही नही पता चला था कि कब अदिती की गुड मॉर्निंग से उसकी नींदे खुलने लगी और उसी के गुड नाईट से उसकी रातें सपनों में खोने लगीं थी।
  
        उसने उस शाम जान बूझ कर फिर अदिती को फ़ोन नही किया…तीन दिन बीत गये , उसने जान बूझ कर फ़ोन नही किया जबकि हर घड़ी हर पल उसे फ़ोन अपनी ओर खींचता रहा लेकिन अपने मन को कड़ा किये वो इन्तजार करता रहा कि अखिर कभी तो वो खुद फ़ोन करेगी . ……
    
             लेकिन अब उसे टूट कर ये एहसास होने लगा था कि अदिती तो उसकी रगों में खून सी बहने लगी थी, इतना टूट कर आज तक उसे किसी की याद नही आयी थी, इतने सारे काम के बीच भी वो बार बार उसे याद कर तड़प उठता…..
  
              उसकी जिन कमीज़ों को वो सबसे ज्यादा पसंद करती थी ,वही पहनता…अदिती ने उसे कुछ आसान नाश्ते बनाने की विडियो भेजी थी ,जिसमें वो खुद खाना बनाती नज़र आ रही थी, उन्हीं गिने चुने विडियो को देखता वो रोज़ ही लगभग वही खाना बनाता खाता दिन काट रहा था…..
    धीरे धीरे कर के पूरे दस दिन गुज़र गये और इन दस दिनों में वो जाने कितनी बार अदिती का फोटो देख रोने को मचल उठा लेकिन आखिर लड़का था, ऐसे कैसे रो लेता, और कोई नहीं तो उसका खुद का मन तो जान ही जाता कि वो रो रहा है भले मन ही मन सिसकता वो पूरी पूरी रातें आंखों में काटने लगा था।
    बीच में एक आध बार फ़ोन लगाने पर भी रिंग गयी थी……

      ..उसने पूरे बारह दिन बाद एक बार फिर फ़ोन लगाया…फोन बंद आ रहा था।
    
        आखिर इतने दिनों से उसने धैर्य का जो चोला ओढ़ रखा था वो उड़ गया, अब उसके मन से वो सारे किन्तु परन्तु दूर हो गये जिनके कारण आज तक उसने ऑफिस में किसी को फ़ोन करके अदिती के बारे में खोज खबर नही ली थी….
    इन दस बारह दिनों में उसके मन ने कई बार कहा कि अगर वो फ़ोन नही उठा रही तो ऑफिस में फ़ोन करके तो उसकी मालूमात पता की जा सकती है लेकिन फिर भास्कर के वही चार लोग आकर सामने खड़े हो गये जो उसके इस प्रकार पूछने को जाने क्या सोच कर कहानी बना लें और कहीं इस तरह पूछने से अदिती का नाम खराब हुआ तो? यही सब सोच कर वो अपने दिल की बात अनसुना कर अपने काम में व्यस्तता के बहाने ढ़ूँढ़ता रहा लेकिन आज उसका सारा धैर्य चूक गया।
   अदिती के फ़ोन के बंद आने पर उसने अपने एक ऑफिस कुलीग को फ़ोन मिला लिया, इधर उधर की बातें करते आखिर उसने अपना जी कड़ा कर उससे अदिती के लिये पूछ ही लिया__
   लेकिन उसके जवाब ने भास्कर के पांव तले की ज़मीन खिसका दी__

  ” यार मैम तो लगभग दो हफ्ते पहले ही सिंगापुर निकल गयी।”

  ” सिंगापुर निकल गईं? वो भी दो हफ्ते पहले? लेकिन यहाँ तो पहुंची नही….

   ” ऐसा कैसे हो सकता है यार! तू वहाँ चेक कर अच्छे से क्योंकि यहाँ तो उनकी जिस दिन फेयरवेल पार्टी थी उसके अगले दिन से वो ऑफिस ही नही आयीं हैं।”

  ” अबे क्या चेक करुँ , कोई सामान थोड़े ही है कि आकर लॉकर में पड़ा हो, यहाँ आती तो इसी ऑफिस में आती ना, और वैसे भी इंडिया से किसी के भी आने की सूचना मुझे सबसे पहले मिलती है….

   ” पर यार यहाँ भी मैडम नही आ रहीं हैं, तू एक बार उनके किसी दोस्त रिश्तेदार से पता कर ले भाई..

  ” किसी का नम्बर नही है यार मेरे पास। ना वो फ़ोन उठा रही , ना मेसेज का जवाब दे रही, मेल्स भी नही चेक कर रही …मुझे तो  बड़ी टेंशन सी होने लगी है, क्या करूं?

   ” कोई नही यारा! हो सकता है अपने किसी बॉयफ्रेंड या फ्रेंड्स के साथ कहीं वेकेशन पे चली गईं हों, यार बड़े लोग तो ऐसे ही चिल करतें हैं, फोन वोन सब भूल भाल के….

   ” नही यार, ना तो उसका कोई बॉयफ्रेंड है और ना इतने करीबी उसके कोई दोस्त हैं जिनके साथ वो फ़ोन बंद कर के निकल जाये…

   ” तू क्या इतना सोच रहा है यार, आ जायेंगी जहां भी गयी होंगी। ”

  ” मैं नही सोचूंगा तो और कौन सोचेगा !! आज तक बस वही सोचती आयी थी मेरी लाईफ को सही करने के बारे में…मेरी हर गलती को बर्दाश्त करती प्यार से सुधारती चली गयी और आज जब मैं हर बात के लिये उस पर निर्भर हो गया तो बिना बताये पता नही कहां चली गयी….मुझे लग रहा है किसी ना किसी मुसीबत में है वो वर्ना कैसे भी कर के मुझसे बात ज़रूर करती।

  ” तो अब क्या करेगा तू?”

  ” आज रात ही वापस आ रहा इंडिया…वहाँ आकर ही अब पता चलेगा कि आखिर मेरी अदिती अचानक कहाँ चली गयी।”

  क्रमशः

  aparna..

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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