जीवनसाथी-47

जीवन साथी – 47


    महल में शादी की तैय्यारियाँ ज़ोरों पर थीं। भले ही महल दुखी था कि कुछ दिन पहले ही महल की राजकुमारी नही रही थी, लेकिन महल के अपने कायदे होतें हैं जिनकी कीमत इन्सान की ज़िंदगी से कहीं अधिक कीमती होती है….
     उस पर तुर्रा ये था कि पण्ड़ित के अनुसार अगर महल में जल्दी ही विवाह जैसा कोई शुभ कार्य हो जाये तो महल में एक बार फिर शुभ कार्यों का सुयोग प्रारंभ हो जायेगा।

     साज सज्जा में वैसे भी कहीं कमी ना थी, महल के आधे से अधिक नौकर घिस मांज के महल के कोने कोने को चमका रहे थे, महल के सारे झाड़फानूसों को उतारा गया था, रानी साहेब का आदेश था विवाह की रात सभी झाड़फानूसों में एक सी मोम बत्तियां लगा कर जब जलाया जाये तो महल दूर से ऐसा दिखना चाहिये जैसे सितारों से सजा आसमान या ढ़ेर से जुगनूओं से भरा रोशन किनारा!

     सारा महल लगभग हफ्ते भर से शादी की तैय्यारियों में डूबा था और दूल्हे का कोई अता पता ना था।
  राजा हर बार की तरह इस बार भी महल में किसी से बिना कुछ बोले मुम्बई निकल गया था, जाने से पहले प्रेम से __” बस एक दिन संभाल लेना, कल वापस आ जाऊंगा” बोल कर निकल पड़ा था।
  सारे महल को पता था, जहां राजा वहाँ प्रेम! और जहां प्रेम वहाँ राजा! ऐसे में पूरे चौबीस घंटों के लिये महल में खुद नज़र आते हुए राजा को छिपाये रखना मुश्किल था, क्योंकि और तो सब भले ध्यान ना दें लेकिन युवराज भैय्या की तीखी नज़र से बचना मुश्किल था।
    सुबह सुबह  राजा को एयरपोर्ट छोड़ कर लौटते हुए वो इसी सोच में गुम था। अगली सुबह उसे इसी वक्त राजा को लेने भी आना था, लेकिन महल तक आज वापस लौटना सही भी नही था।
  सोच सोच में वो अपने घर पहुंच गया।  उस वक्त तक अम्मा या और कोई नौकर आया नही था।
  उसने रसोई में जाकर अपने लिये चाय चढाई और मुहँ हाथ धोने ऊपर चढ़ ही रहा था कि निरमा के कमरे के बाथरूम से उसे उसकी आवाज़ें आने लगी, आवाज़ से कुछ सही समझ ना आने से वो कमरे का दरवाज़ा खोल भीतर चला गया…थोड़ी देर में निरमा टॉवेल से चेहरा पोंछती बाहर चली आयी__

  ” क्या हुआ ? तबीयत खराब है क्या?” प्रेम के चिंता से भरे सवाल को सुन निरमा को हँसी आ गयी….

   ” रोज़ सुबह सुबह कुछ देर के लिये मेरी तबीयत खराब हो ही जाती है, नॉशिया वोमिटिंग होती ही है।”

  ” ओह्ह! अच्छा….मुझे लगा जाने क्या हो गया?”

  ” क्यों वोमिटिंग पे आपने गूगल नही किया”  निरमा को प्रेम की हर बात को गूगल पे सर्च करने की आदत याद आ गयी, और निरमा की बात सुन प्रेम झेंप कर रह गया__

  ” सुनिये मैं चाय बना रहा था? आप लेंगी?”

  ” हाँ थोड़ी सी ले लूंगी, आप चल कर बैठिए मैं आकर छान लूंगी।”

   प्रेम के कुछ देर बाद निरमा भी नीचे चली आयी, उसके आते तक में प्रेम ने चाय छान ली थी, उसे चुपचाप चाय के कप से उठते धुंए में खोये देख निरमा ने पूछ ही लिया__

  ” क्या हुआ? कुछ परेशान लग रहे? निरमा की बात सुन प्रेम चौंक गया__

   ” नही, ऐसा तो कुछ नही….

   “इतनी सुबह सुबह कहाँ चले गये थे?” सवाल पूछ कर निरमा खुद ही शर्मसार हो उठी,, ऐसे बात बात पर सवाल पूछने वाला उसका स्वभाव नही था? क्या सोच रहा होगा वो भी कि कुछ ज्यादा ही चौधरानी बन रही है। वो वापस अपनी चाय में सर झुकाये उसकी खुशबू ना सूंघने का प्रयत्न करती बैठी रही

  ” क्या बताऊँ, कहाँ गया था? ये हुकुम भी ना किसी दिन फंसा के मानेंगे मुझे।” और प्रेम ने राजा के मुम्बई जाने की दास्ताँ निरमा को बता दी।
   वो चुपचाप मुस्कुरा कर रह गयी, अचानक उसे प्रताप की ऐसी ही हरकतें याद आ गईं, वो भी तो ऐसे ही उसे सरप्राइज़ करने के लिये कुछ ना कुछ नया सोचता ही रहता था, और आखिर उसके आखिरी सरप्राइज ने उसकी ही जान…..वो इस बात को पूरा सोच भी नही पायी और कांप के रह गयी, सामने बैठा प्रेम राजा के किन कारनामों को गिना रहा था, क्या बता रहा था, उसे कुछ होश नही था__

  ” आप सुन रही हैं ना? हेलो! निरमा जी….

   उसने धीरे से निरमा के हाथ में पकड़े कप को उसके हाथ से लेकर टेबल पर रख दिया, वो चौंक कर जैसे नींद से जागी__


  ” सॉरी! आप कुछ कह रहे थे क्या? मैं सुन नही पायी,तबीयत कुछ ठीक नही लग रही, मैं ऊपर जाऊं?”

  ” हाँ हाँ,बिल्कुल! आप आराम किजीये।” निरमा फिर बिना उसकी ओर देखे ही ऊपर चली गयी। वो अपनी नज़र अखबार पे गड़ाये निरमा की अचानक बिगडी तबीयत के सूत्र सुलझाने की कोशिश करता रहा।

   *********


   सुबह सवेरे मुम्बई में लैंड करते ही भास्कर सीधा ऑफिस ही जाना चाहता था लेकिन इतनी सुबह गार्ड के अलावा किसी के मिलने की संभावना ना होने से वो एयरपोर्ट में ही फ्रेश होकर बाहर निकला और सीधा अदिती के फ्लैट पर पहुंच गया।
    अदिती सोलो फ्लैट रेंटल की जगह एक फैमिली के साथ पीजी रहा करती थी। जिसमें फर्स्ट फ्लोर पर मकान माल्किन थी और दूसरे फ्लोर पर अदिती का दो बेडरूम हॉल का घर था, इन दोनो ही फ्लैट में अन्दर से भी सीढ़ियाँ थी इसीसे मकान मालकिन को अदिती के बारे में सब पता होने की आशा थी।
  पर अक्सर यही होता है, हम अगर किसी तार को सुलझा कर समेटना चाहें तो वो बिना वजह जाने कैसे और उलझता जाता है।
    वो अदिती के पते पर पहुंच तो गया लेकिन….फ्लैट पर पड़ा बड़ा सा ताला जैसे उसे मुहँ चिढ़ा रहा था।
कुछ देर इधर उधर तांक झांक कर वो वापस निकल ही रहा था कि एक टैक्सी दरवाज़े पर आकर रुकी, जान पहचान का तो कोई नही उतरा क्योंकि वैसे भी उसका मकान मालिक से कोई पूर्व परिचय नही था, लेकिन नाम पूछने पर उसके आश्चर्य की सीमा ना रही कि ये परिवार मकान मालिक का ही था जो पन्द्रह दिन की छुट्टियाँ मना कर वापस लौटे थे__

  “बेटा वो दीवाली थी ना, वो हम अपने पुश्तैनी घर ही मनाते हैं, इस बार कुछ ज्यादा रुक गये, आप आईये अन्दर।”

  पन्द्रह दिन पहले तो अदिती से उसकी बात हुई थी, इसका मतलब ये लोग शायद ही अदिती के बारे में कोई खबर रखते होंगे, मन मसोस कर उसने अदिती के बारे में पूछा पर जैसा उसने सोचा था, उन्हें उसके बारे में कुछ पता नही था, पर एक अच्छी बात ये थी कि मकान मालिक के पास से उसे अदिती के घर का पता मिल गया।
    अदिती का पता मिलते ही वो वहाँ से ऑफिस निकल गया, पर जैसी उम्मीद थी वहाँ भी उसे अदिती के घर के पते के अलावा कुछ ना मिला।
  ऑफिस की औपचारिकतायें निभा कर वो अदिती के घर के लिये निकल गया….
    पहली बार धड़कते दिल से उसने अपने अभिभावकों के अलावा किसी और के लिये भगवान से झोली फैला के कुछ मांगा था।
  वो रास्ते भर अदिती की सलामती और कुशलता की दुआ मांगता रहा।

  *******

   “पता है बांसुरी पूरी दुनिया में ऐसी कौन सी चीज़ है जिसे देख कर बांसुरी सम्मोहित हो जाती है?”

   राजा के सवाल पर बांसुरी आश्चर्य से राजा की ओर देखने लगी,और ना में सिर हिला दिया__

  ” मुझे नही पता, तुम ही बता दो…

   ” छप्पन व्यंजनों से सजी खाने की थाली! बस बांसुरी भूखी होनी चाहिये और उसके सामने खाना आना चाहिये उसके बाद तो फिर कौन सा राजा कहाँ का राजा?”

  ” ओह्हो राजा जी, ऐसे तो फिर आपकी गिनती करवाऊँ कि आप किन किन चीज़ों से सम्मोहित होतें हैं?

   ” मैं तो भई बस एक ही चीज़ से अपने होश भुला बैठता हूँ, और वो चीज़ है बांसुरी “

  वो सामने बैठी झेंप गयी__

  ” ओहो मैडम आपकी बात नही कह रहा, मैं तो उस बजाने वाली बांसुरी की बात कर रहा था।”

  ” अच्छा बच्चू! अभी बताऊं किसकी बात कर रहे थे?”

   ” खाना जल्दी खतम करो यार ! तुम बहुत धीमे खाती हो….मैं जो जो सोच के आया था, कुछ नही हो पाया है अब तक….

  ” ऐसा क्या सोच के आये थे, जो हुआ नही अब तक?”

  ” पहले यहाँ से निकलें फिर बताता हूँ ….

   खा पीकर दोनो बाहर निकले तब राजा ने गाड़ी खुद संभाल ली….बांसुरी को पीछे बैठाए वो उसे एक लम्बी ड्राइव पर ले गया…..
    पहले ज़रा पीछे सरक के बैठी बांसुरी धीरे से थोड़ा आगे सरक गयी और फिर बातों में आ रहे व्यवधान को हटाने आखिर राजा के कंधे पर सर रखे बैठी वो अपने ऑफिस और घर पर चल रही शादी की तैय्यारियों का ब्योरा देती रही…….

     काफी दूर निकल जाने पर एक छोटा सा बीच नज़र आने लगा था, लेकिन आवाजाही काफी कम थी…..

” ये कौन सी जगह है? मुम्बई में इतनी खाली जगह भी कोई है? मालूम नही था, तुम्हें कैसे पता चला?”

  ” बस मालूम करना पड़ता है, क्योंकि मुझे मेरा भी तो सपना पूरा करना था ना?

  बांसुरी राजा की तरफ देखने लगी__

  ” ऐसे ना मुझे तुम देखो, सीने से लगा लूंगा..तुमको मैं चुरा लूंगा तुमसे…..

   राजा की बात पर उसे हँसी आ गयी__

” आओ कर लो अपना सपना पूरा …

   बांसुरी मुस्कुरा कर बाईक से टिक कर खड़ी थी,

  ” पक्का? नाराज़ तो नही हो जाओगी?”

  ” नही ! बिल्कुल नही!”

  ” सोच लो!”

  ” सोच लिया!

  राजा को अपने पास आते देख बांसुरी की आंखें बंद हो गयी…..
    वो उसकी खुशबू अपने बहुत पास महसूस कर पा रही थी, उसके गालों पर आती लटों को उसने धीरे से हटा दिया, और सारे बालों को एक साथ हटा कर एक तरफ के काँधे पर समेट दिया….
     कुछ देर में ही उसे लगा उसकी गरदन पर कुछ भारी सा महसूस हो रहा है, उसने अपना हाथ बढ़ा कर अपनी गरदन पर रखा और चौंक कर आंखें खोल दी…
     उसकी गरदन पर माणिक का सेट झिलमिला रहा था__

  ” ये क्या है राजा ?”

  ” तुम्हारे टोटके , और क्या?”

  ” अरे पर उस दिन तो मैंने ऐसे ही कह दिया था, तुमने इतना सीरियसली ले लिया…

  “पर उस दिन कहा तो तुमने बहुत सीरियस वे में ही था ना, कि राजा मेरी राशि को डायमंड्स पता नही सूट करेंगे या नही कहीं इतने डायमंड्स पहनने से कुछ गड़बड़ ना हो जाये, जब मैंने तुम्हें मॉम के खरीदे सेट की तस्वीर भेजी थी….

बांसुरी मुस्कुराने लगी__

” हाँ लेकिन फिर ये सेट क्यों लिया?”

  ” तुम्हारी बात को उस समय तुम्हारे सामने तो हवा में उड़ा गया था, लेकिन बाद में अपने राजपुरोहित जी के पास पहुंचा तो उन्होने उसका तोड़ ये बताया कि तुम्हारे राशि रत्न का उतना ही हैवी सेट तुम साथ में पहन लो….बस इसी लिये ले लिया।
  

  ” तुम भी ये सब इतना मानते हो?”

  ” मैं नही मानता यार! मैं ये सब कुछ नही मानता लेकिन तुम इस सब पर विश्वास करती हो और मैं तुम्हारे विश्वास पर विश्वास करता हूँ …समझी

   बांसुरी ने हाँ में सिर हिलाया और भाग कर उसके सीने से लग गयी…..
   जब धडकनें धड़कनों की सरगम में खोने लगे, सांसों में सांसे मिलने लगे तब दो दिलों को किसी की क्या परवाह होती है….

  ******

    नीचे अम्मा के आने के पहले ही प्रेम को घर से कहीं निकल जाना था वर्ना महल में ये बात पहुंच जाती कि प्रेम तो यहीं हैं आखिर फिर राजा अकेले कहाँ चला गया।
   कुछ सोच कर वो ऊपर चला गया, निरमा के कमरे के बाहर से उसे आवाज़ देता वो उससे कुछ जानना चाहता था__

  ” अन्दर आ जाइये”

  निरमा कुछ पढ़ रही थी, प्रेम के अन्दर आते ही उसने किताब एक तरफ रख दी__

” मैं भोपाल निकल रहा हूँ, आपके लिये कुछ लाना है क्या?”

  ” नही मुझे कुछ नही चाहिये।”

  ” फिर भी , एक बार देख लीजिए, कुछ सामान चाहिये हो शायद…

   “नही फिलहाल किसी सामान की ज़रूरत नही..

  ” जी ! असल में महल में शादी है पांच दिन बाद, तो मैं सोच रहा था आप भी कुछ ले लेतीं…शादी में पहनने के लिये

  निरमा ने प्रेम की तरफ देखा, वैसे वो सही कह रहा था….उसकी खुद की शादी जैसे हुई उसने या किसी ने भी कोई खरीदारी नही की थी, बस मामी तुरंत पास की दुकान से नेग के नाम पर पांच नयी साड़ियाँ ले आयीं थीँ, पर ना उन साड़ियों के ब्लाउज तैय्यार थे और ना ही साथ पहनने के लिये मैचींग चूडियाँ वगैरह थीं।
    और किसी की शादी होती तो वो शायद एक बार ना भी जाती पर शादी तो उसकी बंसी की थी और वो भी राजा भैय्या से… उसके ना जाने का तो सवाल ही ना था…अब तबीयत भी तो पहले से बेहतर थी, जाने को वो भी प्रेम के साथ शॉपिंग के लिये जा सकती थी…लेकिन संकोच में बोले कैसे ?
    उसने तो एक बार भी साथ चलने के लिये पूछा ही नही? बस यही पूछा क्या चाहिये__

  ” सुनिये! आप लिस्ट बना कर भी दे सकती हैं? मैं ले आऊँगा।”

   आदमी को इतना भी पर्फेक्ट नही होना चाहिये कि औरतों की खरीदारी भी खुद कर लें…उसने चुपके से हाँ में सर हिला दिया__

  ” आप बैठिए ना मैं लिस्ट बना देती हूँ ..

प्रेम के सामने बैठी वो लिस्ट तैय्यार करती रही, बीच में एक बार उसने आलमारी खोली और फिर वापस बंद कर दी। लिस्ट तैय्यार कर उसने प्रेम के हाथ में थमा दी__

  ” एक बार पढ़ लीजिए, जो समझ ना आये मैं बता दूंगी।”

   प्रेम एक एक चीज़ को ध्यान से पढ़ता आगे बढ़ता गया __

” ये क्या चीज़ है?” उसने लिस्ट निरमा के सामने कर दी

  ” सेफ्टी पिन”

  ” अच्छा! इसे कैसे यूज़ करतें हैं?”

  निरमा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट आ गयी__

  ” जी इसे साड़ी बांधते समय यूज़ किया जाता है..

  ” ओह्ह! और ये भी पिन ही लिखा है? ये क्या है?”

  ” ये हेयर पिन और जूड़ा पिन है, बाल बांधते समय इसे यूज़ किया जाता है, आपको सर दर्द पालने की ज़रूरत नही है, आप दुकान वाले को लिस्ट देंगे ना तो वो आपको सब सामान पकड़ा देगा।”

  ” लेकिन मैं तो भोपाल में मॉल की शॉप से सामान लेने वाला था….अगर थकी ना हों तो आप भी साथ चलिये….”

पूछने को पूछ तो लिया लेकिन खुद ही पूछने के बाद झेंप गया। उसे निरमा को अपने कारण परेशान करना पसंद नही था, वो उस पर अपने कोई विचार कभी भी थोपना नही चाहता था….वो निरमा को उसकी यादों के साथ अकेले छोड़े रखना चाहता था, पर आज जाने किस झोंक में उससे साथ चलने को कह गया।
  पता नही कहीं वो बुरा ना मान जाये सोच कर तुरंत ही उसने अपनी बात संभाल ली….

  ” चलो कोई नही! आप आराम किजीये, मॉल में किसी लेडी हेल्पर की मदद ले लूंगा।”
   वो लिस्ट थामे वापस मुड़ गया__

” आप बस दस मिनट नीचे इंतज़ार किजीये, मैं अभी तैय्यार हो कर आती हूँ।”

  प्रेम चौंक कर पीछे मुड़ गया, उसे खुद को देखता देख निरमा भी शरमा कर उठ बैठी…उसे तैय्यार होने छोड़ कर वो मुस्कुराता हुआ नीचे उतर गया।

   अम्मा के लिये घर की चाबियाँ घर के बाहर रखे बड़े से गमले के पीछे छिपा कर वो दोनो भोपाल के लिये निकल गये।

********


   ” बांसुरी! ये तुम्हारा नेक पीस चुभ रहा है।”

  ” हाँ तो! ”

  ” अरे तो इसे निकाल भी तो सकती हो, अब पहन लिया तो क्या कभी उतारोगी ही नही।”

  ” कम से कम यहाँ इस बियाबान सूनसान में तो कतई नही उतारने वाली, कोई चोर उचक्का उठा ले गया तो।”

  ” हद करती हो यार! यहाँ कौन चोर उचक्का दिख रहा तुम्हें।”

  ” चोर उच्क्के अपना इंट्रोडक्शन देकर थोड़े ही आते हैं….अचानक ही टपक पड़तें हैं समझे।”

  ” हम्म समझा!”

  ” क्या समझे?”

  ” ये कि यहाँ मेरा काम नही बनने वाला, चलो तुम्हारे फ्लैट पर चलतें हैं।”

  ” बहुत बेशरम नही हो गये हो?”

” नही! मैं तो ऐसा ही हूँ ….तुम बताओ तुम्हें ऐसा नही पसंद तो सोचा जायेगा….बोलो।

  ” मुझे तो तुम सारे के सारे पसंद हो, तुम्हारा हर रूप पसंद है, तुम्हारे हर रंग से प्यार है”

  ” ओह्हो शायरा जी! जब लेखक तारीफ करतें हैं तो कितनी लज्जत होती है ना शब्दो में…और एक मैं हूँ मुझे तो ढंग से तारीफ करना भी नही आता…

   “कोई बात नही, तुम मेरे लिये कोई गाना ही सुना दो….

   बातें करते दोनो दूर तक पैदल चलते चले गये। बहुत दूर जाने के बाद रेत पर समंदर किनारे बैठे दोनों सागर की लहरों का आना जाना देखते रहे।
    कुछ दिनों पहले भी एक शाम ऐसी आयी थी जब एक दूसरे से छै फीट की दूरी पे बैठे दोनो सूर्योदय साथ साथ देख रहे थे….
   आज एक बार फिर वही समंदर था, वही रेत, वही आस्माँ पर आज सूर्य डूब रहा था, और उस डूबते सूरज की थकान के गवाह बनते दोनो एक दूसरे का हाथ थामे अपने जीवन के सूर्योदय की नींव रख रहे थे।
   राजा के काँधे पर सर रखे बांसुरी अपनी किस्मत पर इठलाती मुस्कुराती बैठी अपने भावी जीवन की आनंद उदधि में आकन्ठ डूबी अपने चमकीले सपनों के ताने बाने बुन रही थी।
     दूर दराज़ से भटकता कोई चाय वाला उधर से निकला और दोनों ही चौंक गये__

” चाय मिलेगी भाई?”

” हौ साब ! किस्मत अच्छा है आपका, बस दोन कप ही बचा था।”

  ” किस्मत तो अच्छी चल रही है भाई, बस पलटी ना खाये, लाओ दो कप दे दो।”
   राजा ने चाय लेकर पांच सौ का नोट उसकी ओर बढ़ा दिया

  ” साब छुट्टे पैसे नही है ….

   ” भाई मेरी शादी है, उसी खुशी में रख लो।”

चाय वाला दोनों को दुआएं देता आगे बढ़ गया, चाय पीकर वो दोनो भी वहाँ से उठ गये।
 
  ” बांसुरी अपनी शादी का जोड़ा खरीदना चाहोगी, अपनी मर्ज़ी से?”

  ” लेकिन वो तो रानी साहेब अपनी पसंद का लेना चाहती हैं ना?”

  ” हाँ! लेकिन मुझे लगा शायद तुम अपनी पसंद का पहनना चाहो।”

  ” राजा जब तुम मिल गये, तो अब इन सब बातों से क्या फर्क पड़ता है? रानी साहेब को अपनी इच्छा पूरी कर लेने दो। मैं उनकी पसंद के कपड़े पहन लूंगी।”

   राजा ने बांसुरी को गले से लगाया और दोनो वापस निकल गये।
    फ्लैट पर पहुंचने के बाद हाथ मुहँ धोकर बांसुरी रसोई में घुस गयी__

” क्यों परेशान हो रही हो यार! बाहर से ही खा पी कर आ जाते ना।”

  ” नही! मेरा बहुत मन था कि तुम्हें अपने हाथ से कुछ बना के खिलाऊँ! अच्छा बताओ क्या खाना चाहते हो।”

” कुछ भी बना लो ! जो जल्दी बन जाये।”

  ” अच्छा ऐसा क्यों? राज महल में रोज़ छप्पन व्यंजन खाने वाले राजा जी आखिर आज क्यों एक ही डिश खायें,उनकी बेगम भी उन्हें छप्पन ना सही कम से कम चार पांच डिशेस तो बना कर खिला ही सकती है।”

  ” जब खाने से भी टेस्टी कुछ चख लिया तो अब तुम छै बनाओ या छप्पन क्या फर्क पड़ेगा।”

  ” कितने बदमाश होते जा रहे हो….

मुस्कुरा कर बांसुरी रसोई में चली गयी और राजा बांसुरी के बैडरुम से अपनी गिटार उठा लाया।

  खा पीकर दोनो बालकनी में बैठे थे , राजा  अपनी गिटार संभाले कुछ गुनगुना रहा था।

  *******

  भास्कर अम्बागढ़ी पहुंच गया, लेकिन इस दो घण्टे में उसके दिल पर क्या क्या बीती ये वो ही जानता था।
   मनुष्य का मन उसके मुताबिक ही सोचना शुरु कर देता है, इसिलिए जब कभी हम कुछ नकारात्मक सोचना शुरु करतें हैं तो फिर हर विचार हमें और गहरे गर्त में धकेलता चला जाता है।
    ऐसा ही कुछ भास्कर के साथ हुआ, अपनी परेशानी में आखिर उसे वो नाम ध्यान आ गया जो आज तक उसे हर मुसीबत से बचाता आया था। उसने अपनी माँ को फ़ोन लगाया और अदिती के साथ साथ बांसुरी से रिश्ते के टूटने तक की सारी व्यथा एक लय में बताता चला गया।
  दुनिया में और कोई समझे ना समझे एक माँ से अधिक अपने बेटे को कोई नही समझ सकता। उन्होंने उसके हर निर्णय मे उसके साथ खड़े रहने की हामी भर दी, कुछ थोड़ी राहत महसूस करता भास्कर आखिर अदिती के घर पहुंच गया।
  अदिती के घर पे नौकर के अलावा कोई ना था, नौकर ने घर की मालकिन की खराब तबीयत का ब्योरा देते हुए उसे अस्पताल का पता बता दिया।
   अस्पताल पहुंचते ही आई सी यू के बाहर थकी हारी सी बैठी अदिती को देखते ही भास्कर की जान में जान आयी  उसे एकबारगी लगा आगे बढ़ कर अदिती को गले से लगा ले, लेकिन कुछ उसके संस्कार और कुछ आस पास के लोग ऐसा करने से उसे रोक गये।
   धीमे कदमों से उसके पास पहुंच उसने धीरे से अदिती के कंधे पर हाथ रख दिया। अपने हाथों में अपना चेहरा टिकाये आंखें बंद कर के बैठी अदिती ने आंखें खोल ऊपर देखा__

” भास्कर तुम ? यहाँ कैसे?

” पहले ये बताओ कि तुम कैसी हो?

” मैं ठीक हूँ भास्कर! मम्मी एडमिट हैं। मम्मी की तबीयत अचानक बिगड़ने से पापा मुझे लेने चले आये, और मेरा सिंगापोर आना कैन्सिल हो गया, पर तुम यहाँ अचानक कैसे चले आये?”

  ” तुम्हें फ़ोन लगाया, तुमने उठाया नही, मुझे लगा बिज़ी होंगी जब भी फ़्री होगी कॉल बैक कर ही लोगी, लेकिन तुम्हारा कोई कॉल नही आया….तब चिंता होनी शुरु हो गयी और जब तुम्हारा फ़ोन बंद आने लगा तब तो फिर पुछो ही मत, ऐसी टेंशन बढ़ी कि सीधा इंडिया लैंड किया। पर तुम्हें ठीक ठाक देख कर राहत मिल गयी….

  वो दोनो बात कर ही रहे थे कि अदिती के पिता उन तक चले आये, अदिती ने अपने पिता से भास्कर को मिलाया और पिछले दिनों की सारी बातें उसे सुनाने बैठ गयी कि कैसे उसे देख कर माँ की तबीयत सुधरने लगी, इसलिये माँ की देखभाल में वो ऐसे व्यस्त हो गयी कि फ़ोन मेल्स सब भूल भाल कर रह गयी। लेकिन दो दिन पहले ही अचानक उसकी माँ थोड़ा सीरियस हो गईं, दर्द इतना तेज़ हो गया कि सिडेटिव्स देकर ही उन्हें सुलाया जा सका, लेकिन ड़ोज कुछ अधिक हो जाने से दो दिन बाद आज उनकी नींद टूटी लेकिन आज सुबह से ही वो काफी ठीक महसूस कर रहीं थीं__

” तुम्हारे चरन तो मेरी फैमिली के लिये बहुत लकी हैं भास्कर ! देखो तुम्हारे लैंड करते ही माँ की तबीयत सुधरने लगी….

  भास्कर के भी उनसे मिलने की इच्छा जाहिर करते ही वो तीनों उनसे मिलने भीतर चले गये।

**********

  झूले पर बैठी बांसुरी इधर उधर झूले को हल्के से हिलाती बैठी राजा को सुनती रही, राजा ने उसे वही गीत एक बार फिर गाकर सुनाया जिसे सुन कर दोनो की दोस्ती शुरु हुई थी__

  ” चलो अब मेरे लिये कुछ सुनाओ ना! प्लीज़!

  ” इतने प्यार से मुझे देखते हुए प्लीज़ मत बोलो यार, फिर मैं कोई गलती ना कर जाऊं।”

  ” मैं दीवार बनी तुम्हारी गलती को रोकने सामने खड़ी हो जाऊंगी।”

  ” अच्छा तब तो गुनाह कर जाऊंगा।” राजा मुस्कुराने लगा

  ” तुम्हें मुझे छेड़ने में बहुत मज़ा आता है ना, ये नही कि अपनी होने वाली बीवी के लिये कुछ अच्छा सा सुना दें, बस परेशान करते रहेंगे….

   “देखो अभी तुम्हें देख के जो भाव आ रहे उसी पे सुनाता हूँ, पर प्रॉमिस करो नाराज़ नही होंगी।”

” पक्का पक्का पक्का! नही होंगी , जल्दी सुनाओ।”

” हम्म तो सुनो __

   धीमी-धीमी भीनी-भीनी, खुशबू है तेरा बदन।
   सुलगे महके पिघले दहके क्यों ना बहके मेरा मन….

   गाने को सुनती बांसुरी कभी मुस्कुराती कभी शरमाती बैठी रही….गाना खत्म होते में वो उठ कर अन्दर जाने लगी__

  ” ऐसे कैसे चल दीं? तुम भी तो मेरे लिये कुछ गा कर जाओ।”

ना में सर हिला कर वो जाने लगी तो राजा ने उसका हाथ थाम लिया__” तब तक नही छोडूंगा,जब तक गाओगी नही।”

  ” तब तो कभी नही गाउन्गी क्योंकि मैं तो चाहती ही नही कि तुम मेरा हाथ छोड़ो”

  ” स्मार्ट आन्सर! चलो जल्दी जल्दी गाओ…

   ” ठीक है फिर, सुनो!__

   ” ये दिल और उनकी निगाहों के साये..
     मुझे घेर लेते हैं बाहों के साये…..

राजा ने धीरे से आकर बांसुरी को अपनी बाहों के घेरे में घेर लिया…..
    दोनों एक दूसरे के गले से लगे काफी देर तक वहीं खड़े रह गये और उन दोनो के प्यार का गवाह बनता चांद भी मुस्कुरातें हुए बादलों की ओट में छिप गया….
    
” अब जाओ बांसुरी गाना बजाना बहुत हो गया, अब जाओ सो जाओ। सुबह हमें जल्दी उठना है….

     बेडरूम के दरवाज़े के बाहर  खड़े खड़े राजा ने कहा और दरवाज़ा बंद करने खींच लिया, दरवाज़ा बंद होने से पहले ही बांसुरी ने रोक लिया__

  ” दरवाज़ा क्यों बंद कर रहे? मुझ पर भरोसा नही है?

  ” बिल्कुल नही! ” राजा ज़ोर से हँसने लगा
  पहले की तरह ही तुम कमरे में सो जाओ और मैं बाहर काउच पर”

  ” पर मुझे तो नींद ही नही आ रही राजा! देखो बारह बज ही गये हैं, चार बजे हमें उठना पड़ेगा रेडी होकर एयरपोर्ट निकलने ….

  ” कोई बात नही! थोड़ी देर आराम कर लेते हैं वर्ना कल से फिर घर पर शादी के रिचुअल्स शुरु हो जायेंगे और हमें आराम करने का मौका नही मिलेगा।”

   झूठी नाराज़गी दिखाती बांसुरी कमरे में चली गयी और राजा मुस्कुराते हुए कुशन को थामे काउच पर ही फैल गया।

   बिस्तर पर लेटी बांसुरी खुद ही अकेले मुस्कुराती हुई खोयी सी थी, आज का पूरा दिन कितना प्यारा बीता था, इतनी सारी बातें हुई दोनो के बीच! पर तभी उसे याद आया कि वो हर बार की तरह इस बार भी राजा से पूछना ही भूल गयी कि किसी दूसरे नम्बर से आखिर क्यों वो उसे उसकी महल में खींची तस्वीरें भेज रहा है, ये काम तो वो अपने नम्बर से भी कर ही सकता है।
   हालांकि इस बात से वो बिल्कुल परेशान नही थी क्योंकि सामान्यतः आज कल हर कोई दो नम्बर रखता ही है, बस आश्चर्य उसे इसी बात का था कि सारी बातें अपने नम्बर से करते हुए तस्वीरें बस एक अलग नम्बर से उसे क्यों भेज रहा है।
    खैर! अगले दिन सुबह एयरपोर्ट जाते वक्त पूछ लूंगी सोच कर वो एक बार फिर अपने और राजा की आज की ली हुई तस्वीरों को देखने में खो गयी…..

क्रमशः

    
aparna…


   
    

   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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