जीवनसाथी -48

जीवन साथी — 48


      महल से भोपाल की दूरी ऐसे तो ज्यादा नही थी लेकिन निरमा को साथ ले कर चलते हुए प्रेम जैसे एहतियात बरत रहा था, और जितनी धीमी गति से एस यू वी चला रहा था, उससे ऐसा लग रहा था शाम तक तो वो लोग भोपाल ही पहुंच पायेंगे__

  ” आप ऐसे ही गाड़ी चलातें हैं हमेशा?”
  निरमा की बात समझ ना पाने से प्रेम चौंक गया

” हाँ! क्यों?”

  ” तब तो साईकल पर चलने वाले भी आपसे आगे बढ़ जाते होंगे….

निरमा को हँसते देख वो भी मुस्कुराने लगा….

  ” वो मैंने कहीं पढ़ा था कि ऐसे में झटके नही लगने चाहिये इसिलिए थोड़ा धीमे ….”

  “हाँ पर सैवेंटी 80 में भी चला सकतें हैं उतनी स्पीड में भी झटके नहीं लगेंगे, डोंट वरी! गूगल हर बार सही हो ऐसा ज़रूरी नही।”

  हाँ में सर हिला के प्रेम ने गति थोड़ी बढ़ा दी।

  ******

     अदिती की माँ ने दो दिन बाद आंखें खोली थी,वो सबसे पहले अपनी बेटी को ही देखना चाहती थीं।
    अदिती ने उन्हें अपने हाथों से सूप पिलाने के बाद दवा खिलाई और उन्हें आराम करता छोड़ बाहर आ बैठी थी।
   माँ की हालत सोचती बैठी थी कि भास्कर वहाँ अचानक पहुंच उसे चौंका गया था….

  सारे गिले शिकवों के बाद अदिती भास्कर को भी माँ से मिलवाने अन्दर ले गयी ….
    भास्कर को देख पता नही अदिती की माँ ने क्या समझा उन्होने उसे अपने पास बुला कर बैठा लिया और अपने हाथों में उसका हाथ थामे अपने मन की बात उससे कहने लगीं__

  ” कभी आदि का साथ मत छोड़ना…थोड़ी पगली सी है मेरी बेटी लेकिन बहुत समझदार भी है, और बहुत भावुक भी।”

  भास्कर ने उनकी बात के समर्थन के लिये अपने दोनों हाथों से उनका हाथ थाम कर हल्का सा दबा दिया जैसे कहना चाहता हो कि आप निश्चिंत रहें।

  ” कुछ खाना चाहोगी? अदिती के पिता के सवाल पर उन्होने ना में सर हिला दिया__

  ” थोड़ी चाय पिला सकतें हैं? अदिती की माँ ने बहुत कठिनाई से उन्हें देख कर पूछा

  ” चाय ज़हर हो गयी है तुम्हारे लिये…इस सादे सूप के अलावा कुछ नही पिला सकता”

  लाचारगी से अदिती के पिता ने खिड़की की तरफ मुहँ घुमा लिया__

  ” सुनिये! अब मेरा समय आ गया है, आप चाहे कितने परहेज़ करवा लो….जब जीवन ही ज़हर हो गया हो तो बाकी चीज़ों का क्या सोचना? अब नही रोक पाओगे?

  “रोका तो पहले भी नही मैंने, हालांकि रोक तो पहले भी सकता था, पर अपने ईगो के सामने कहाँ तुम्हें देख पाया, काश उसी वक्त रोक लिया होता।”

  ” अब ये सब बातें क्यों? कुछ गलतियाँ तो मैंने भी की थी …

  ” हाँ! गलती दोनो ही की थी और सज़ा मिली आदि को…रुको मैं चाय लेकर आता हूँ तुम्हारे लिये।

  अपनी आंखें पोन्छते अदिती के पापा वहाँ से बाहर निकल गये…..

   थक कर अदिति की माँ ने भी आंखें बंद कर लीं, दो बूंद आंसू उनकी आंखों की कोर भी भीगा गये।
     भास्कर उनके बैड के पास बैठा था, और अदिती खिड़की के पास खड़ी बाहर देखती अपने आँसूओं को बहने से रोकने का असफल प्रयास कर रही थी__

  ” बहुत बार ऐसा होता है आँटी जी कि जब दो अच्छे लोग साथ मिल कर भी एक अच्छी ज़िंदगी संग संग नही गुजार पाते…गलती शायद दोनो की ही होती है या शायद किसी की नही….समय ही साथ नही दे पाता लेकिन आज देखिए..अपनी उम्र के इस पड़ाव पर जब आप अपनी ज़िंदगी के तकलीफ भरे दिन बिता रहीं है तब आखिर अंकल आ ही गये आपके पास, आपको सम्भालने।
    यही तो है हमारा इंडियन सिस्टम ! हमारे यहाँ ये जो गठजोड़ किया जाता है ना वो वाकई जन्मों का बंधन होता है।
  अभी कुछ दिनों से अपने देश से बाहर रहने का मौका मिला, विदेशियों को पास से देखने का मौका मिला ….वे लोग भी भावुक होतें हैं बहुत भावुक! मेरे ऑफिस के साथ लगे ऑफिस में काम करता है ज़ुआन! अक्सर मैं और वो साथ ही आते जाते थे, लंच भी साथ करते थे…आंटी आप बोर तो नही हो रहीं ना?”

  ” नही बेटा जी! आपको सुनना अच्छा लग रहा है..

  “आप जानती हैं ज़ुआन चालीस बरस का है लेकिन मुझसे कुछ दो तीन साल छोटा ही नज़र आता है, उसके माँ बाप लिव इन में थे, और उसके पैदा होने के पहले उन्होने शादी की, उसके बाद उसकी एक छोटी बहन और हुई लेकिन शादी के बारह सालों बाद उसके माँ बाप अलग हो गये,और दोनो ने दो अलग लोगों से शादी कर ली, बच्चे भी हुए….अब ज़ुआन का लम्बा चौड़ा खुशहाल परिवार है,उसके सेपरेटेड पैरंट्स अपनी अपनी फैमिली के साथ ज़ुआन और उसकी बहन को साथ लेकर छुट्टियाँ मनातें हैं त्योहार मनातें हैं, और ये सारे लोग साथ में खुश भी रहतें हैं….हमारे यहाँ तो हम ये सोच भी नही सकते।
      बस  कल्चर की बात है, वे लोग हर बात पर अपनी खुशी सबसे ऊपर रखते हैं और हम अपने रिश्तों की।
   आपको पता है ज़ुआन ने दो साल पहले शादी की , दोनो के बीच सब अच्छा चल रहा था कि अभी कुछ महिनों से उसकी बीवी को डिप्रेशन की शिकायत होने लगी।
    ज़ुआन उससे बहुत प्यार करता है लेकिन वो अभी अपने अवसाद के समय में अकेले रहना चाहती थी, और उसने उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए उसे ऐसे वक्त में अकेला छोड़ दिया।
  मुझे उन लोगों का ये प्यार समझ नही आता जिसमें उन्हें अपने प्यार को जाहिर करने के लिये ये दिखाना पड़ता है कि वो एक दूसरे के पर्सनल स्पेस को भी सम्मान देतें हैं।
  उसके साथ रहते हुए ये नही लगा कि वो गलत है, लेकिन एक शाम बातों बातों में मैंने उससे अपने दिल की बात भी कह ही दी कि मैं अपनी जीवनसन्गिनी को अपनाने के बाद कभी अकेला नही छोड़  सकता, किसी हाल में नही। अगर वो अकेला रहना चाहे तब भी नही, उसकी इच्छा के सम्मान के लिये एक दो घण्टे उसे अकेले बिताने शायद दे दूं लेकिन मुझे छोड़ कर वो अकेले एक घर में अपनी बीमारी से अकेले जूझे ये मैं कभी बर्दाश्त नही कर पाऊंगा,….
   और मुझे लगता है अंकल  भी कुछ कुछ मेरी सोच वालें हैं इसिलिए भले ही उन्होने आपको आपके सुखों में अकेले छोड़ दिया लेकिन आपकी बीमारी में आपके पास चले आये, यही तो होतें हैं सच्चे हमसफर।
   और अब मुझे आपसे मिलने के बाद पूरा यकीन है आप बिल्कुल ठीक हो जायेंगी, जहां इतना प्यार करने वाला पति है इतनी प्यारी बेटी है….

   भास्कर की बात बीच में ही काट कर अदिती की माँ ने अपनी बात कह दी__

  ” और इतना केयरिंग दामाद!”

  ” स्टॉप इट मॉम! भास्कर सिर्फ मेरा दोस्त है। इससे ज्यादा नही…

   अदिती के पिता तब तक चार कप में चाय लिये वहाँ चले आये

   ” इट्स ओके आदि! यू नो योर मॉम, वो आज कल ऐसे ही इमोशनल होने लगी है हर बात पर। लो तुम दोनो बाहर बैठ कर चाय पियो तब तक मैं इन्हें चाय पिलाता हूँ।”

   हाँ में सर हिला कर अदिती अपना कप थामे बाहर निकल गयी और उसके पीछे भास्कर भी चुपचाप चला आया।
     जहां जिस जगह पर कोई एक व्यक्ति शारीरिक रूप से बीमार होता है वहाँ अक्सर उसके आस पास वो बीमारी अदृश्य रूप से सभी को धीमे से अपने लपेटे में लेने लगती है एक बीमार व्यक्ति से जुड़ा हर सद्स्य मानसिक थकान और परेशानी मह्सूस करने लगता है इसलिये शायद डॉक्टर हमेशा भगवान पर विश्वास रखने और अपने मरीज़ को खुश रखने की सलाह देते दिखायी दे जातें हैं।
   ऐसा ही कुछ माहौल अस्पताल का नज़र आ रहा था, अदिती की माँ की बीमारी ने अदिती के चेहरे की सदाबहार मुस्कान छीन ली थी और उसे इस तरह धीर गंभीर देख भास्कर अन्दर से परेशान हो उठा था।

   दोनो साथ में चलते हुए सीढियों पर जा बैठे, साथ में चाय पीते हुए भी हमेशा की वाचाल चंचल अदिती एकदम खामोश थी, आखिर अपनी सारी हिम्मत समेट कर भास्कर ने अदिती से अपने मन की बात कह ही दी__

  ” अदिती! ” अदिती ने उसकी तरफ देखा …

  “आई लव यू अदिती ऐंड आई रियली मीन इट…
  मुझसे शादी कर लो …प्लीज़।

  अदिती आश्चर्य से भास्कर को देखती रह गयी__

  ” भास्कर मैं तुम्हारे टाईप की नही हूँ।”

  ” वॉट मेरा टाईप अदिती?”

  ” मतलब मुझसे ये उम्मीद नही की जा सकती कि शादी हो गयी तो मैं अपनी जॉब छोड़ दूंगी…

  “तुम आराम से अपनी जॉब संभालना, कोई नही बोलेगा तुम्हें जॉब छोड़ने..

  “अरे मेरे कहने का मतलब है , साड़ी, सर में पल्ला, हाथ भर चूड़ीयाँ ये सब बदलाव मैं खुद में शायद नही ला पाऊँ….

   ” मैं तुम्हें बदलने नही कह रहा अदिती…

  ” पर मैं तुम्हें जानती हूँ भास्कर! तुम अपने ट्रेडिशन से बहुत जुड़े हो, तुम्हें हर चीज़ पर्फेक्ट चाहिये और मैं बिल्कुल पर्फेक्ट नही हूँ।
   अगर तुम सोचो की शादी होते ही मैं एकता कपूर की सिरियल की हिरोइन की तरह फुल मेक’प में सुबह सवेरे आरती गा कर घर भर को जगाऊँ उसके बाद सबके लिये नाश्ता बनाऊँ फिर ऑफिस से आकर घर भर का डिनर,और रात में सोने के पहले सासु माँ के पैर दबाऊँ …..

   “वेट वेट वेट मैडम! मैंने कब कहा कि मैं तुमसे ये सब करवाउन्गा, मैं तो बस ये कह रहा कि आकर मुझे बस संभाल लेना बाकी सब मैं सम्भाल लूंगा…

    अदिती ने भास्कर की तरफ देखा और उसकी आंखों में खुशी के आँसूं छलक उठे __

  ” तुमसे बड़ी हूँ  मैं”

  ” हाँ तो अच्छा है ना, मुझे वैसे भी बड़े बुजुर्गों की कंपनी पसंद है।
   झूठे गुस्से से उसे देखती अदिती मुस्कुरा उठी और भास्कर ने आगे बढ कर उसे अपने सीने से लगा लिया।
     उसी वक्त फ़ोन बजने से उसने जेब से मोबाइल निकाला …बांसुरी का फ़ोन था…वो अपनी शादी में आने के लिये उसे और अदिती को न्योता देना चाहती थी, भास्कर ने अदिती से ही उसकी बात करवा दी…अदिती से उसकी माँ की तबीयत के बारे में सुन कर और इसी कारण आने की असमर्थता जान कर फिर बांसुरी ने उससे आगे कुछ नही कहा।
  बांसुरी को ढ़ेर सारा आशीर्वाद और प्यार देकर अदिती ने फ़ोन रखा और भास्कर की ओर देख मुस्कुरा उठी__

  ” चलो मॉम को भी खुशखबरी सुना देते हैं।”
दोनो साथ ही भीतर चले गयें।

********

     बहुत दिनों बाद निरमा कहीं बाहर घूमने निकली थी, नवम्बर के महीने की हल्की हल्की सी ठंड में धूप बहुत सुहानी लग रही थी….
       रास्ते में एक बड़े तालाब के किनारे प्रेम ने कुछ देर को गाड़ी रोक दी उसे कुछ ज़रूरी फ़ोन कॉल करने थे।
  वो जब तक अपने दो चार कॉल निपटा के आया गाड़ी में से निरमा उतर कर कहीं जा चुकी थी, उसे इधर उधर ढूँढ़ता वो तालाब के किनारे तक पहुंच गया, वहीं एक खाली पड़ी बैंच पर बैठी वो सामने खेलते बच्चों को देखती खोयी हुई थी।
   वो पास की दुकान से उसके लिये नारियल पानी ले आया, उसके सामने हाथ बढ़ाते ही जैसे वो चौंक गयी __

” आप चौंकती बहुत है ना?”

  हाँ में सर हिला कर वो चुपचाप नारियल पानी पीने लगी….
   सामने खेलते बच्चे कागज़ की नाव बनाने की कोशिश कर रहे थे , और बार बार असफल होते जा रहे थे….प्रेम उसके पास से उठ कर उन बच्चों तक चला गया और उनके हाथ से कागज़ ले कर छोटी छोटी कई सारी रंग बिरंगी नाव बना कर उनके साथ तालाब में तैराने लगा।
   बच्चों को हँसते खेलते छोड़ वो वापस आकर निरमा के पास बैठ गया….
    काफी देर तक दोनो चुप चाप वहीं बैठे रहे। उधर से गुज़रती हुई एक लड़की निरमा के पास चली आयी__

  ” आप ज़रा सरक जायेंगी तो मैं इधर बैठ सकूंगी वैसे भी आप दोनो के बीच इतनी जगह खाली पड़ी है कि दो और लोग आराम से बैठ जायें।”

  उसके ऐसा कहते ही निरमा तुरंत सरक गयी लेकिन प्रेम फिर खड़ा हो गया__

” अब चलना चाहिये, वर्ना देर हो जायेगी, आपने कुछ खाया भी नही है।”

  उसकी बात सुन निरमा भी खड़ी हो गयी। दोनो आगे बढ़ रहे थे कि तेज़ कदमों से आगे बढ़ता प्रेम एक जूस कॉर्नर पर रुक गया__

  ” कौन सा जूस लेंगी आप?”

  ” कोई सा नही…!

  ‘” अरे क्यों? सुबह से कुछ खाया नही है ना “

  ” कुछ अनहेल्दी खा सकतीं हूँ क्या?”
 
   ” हाँ  हाँ क्यों नही। ऐसे वक्त में जो खाने का मन करे वो अनहेल्दी नही माना जाता …
   निरमा ने हाँ में सर हिलाया और प्रेम को पीछे छोड़ती पानी पूरी के स्टॉल पर चली आयी।
 
  ” आराम से खाना, बहुत हड़बड़ाना मत! ” निरमा के उस दिन के पकौड़े वाली बात याद कर प्रेम ने हिदायत दी और हाथ बांधे किनारे खड़ा हो गया

  ” क्या हुआ आप नही खायेंगे?”

  ” नही मैं ये सब नही खाता…

   अच्छा कह निरमा पानीपूरी में व्यस्त हो गयी।
वहाँ से मॉल निकल कर सारा दिन दोनों का घूमने में निकल गया। अपने लिये कुछ अच्छे कपडों के साथ ही और सारा सामान लेती निरमा ने प्रेम से छिप कर  उसके लिये भी कुछ कपड़े खरीद लिये।
    निरमा की बाकी शॉपिंग में चुपचाप हाथ बांधे इधर से उधर टहलते प्रेम का काम सिर्फ बिल पे आकर ठहर जाता था लेकिन जब वो उसे सैंडल खरीदते समय हेल्पर बार बार उँची हील्स खरीदने के लिये ज़ोर देने लगा तब आखिर प्रेम को बीच में कूदना ही पड़ा __

  ” आप अपने हिसाब से कुछ आरामदायक ही लीजिए, इतनी उँची हील्स में चलते हुए गिरने का डर बना रहेगा।”

  निरमा ने बिना किसी बहस के जो सैंडल प्रेम ने सामने रखी उसे ही ले लिया।
सारा सामान संभाले वो लोग बाहर ही खाना खा कर देर रात गये घर वापस लौट आये….
     सुबह उसे जल्दी उठ कर राजा को लेने वापस भोपाल जाना था, इसिलिए निरमा को उसके कमरे में छोड़ वो अपने कमरे में चला गया।
     नहा धो कर बिस्तर पर पड़ते ही वो कई दिनों बाद मीठी नींद में सो गया।

  ********

    बांसुरी! बांसुरी! की आवाज़ सुन बांसुरी चौंक के उठ बैठी….अभी कुछ देर पहले तक तो जाग रही थी, जाने कब उसे इतनी गहरी नींद लग गयी…..
     
  ” उठो घोड़े बेच कर सो गयी तुम तो, घर नही जाना है क्या? आज से तीन दिन बाद शादी है हमारी।”

    तीन बाद शादी है, सोचते ही वो गुलाबी सी हो गयी। कैसी गहरी नींद सो गयी थी…वो फटाफट तैय्यार होने चली गयी।
     तैय्यार होकर दोनो एयरपोर्ट के लिये निकल ही रहे थे कि __
 
  ” एक मिनट राजा! मैं कुछ भूल गयी हुँ।”

  वो भागकर अन्दर से राजा का गिटार उठा लाई__

  ” ये क्या? इसे कहाँ लेकर जाओगी?”

  ” अपने साथ लेकर जाऊंगी, तुम्हारे पीछे इसके साथ मेरी बहुत प्यारी यादें जुड़ी हैं….और सुनो इधर आओ ”

  ” क्या हुआ?”

  बांसुरी ने अपने पर्स से अपना काजल निकाला और राजा के माथे के ज़रा से बाल पीछे कर उसे काजल का टीका लगाने लगी__

  ” अरे अरे रुको क्या कर रही हो यार?”

  ” नज़र का टीका लगा रही हूँ …जिससे तुम्हें और हमारी खुशियों को नज़र ना लगे”
  उसे काजल का टीका लगा कर वापस रखते देख राजा ने उससे लेकर काजल उसके माथे पर भी एक किनारे लगा दिया__

  ” तुम्हें भी नज़र ना लगे! अब चलो वर्ना देर हो जायेगी…

   दोनों ही साथ मे एयरपोर्ट के लिये निकल गये।
नियत समय पर दोनो ही ने अपनी फ्लाईट ली और अपनी आगे की जिंदगी की नींव रखने चल पडे…
    

   ************

  सवेरे सवेरे अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी बांसुरी को उसकी ताई ने वहीं खड़ा कर दिया__

  ” रुक जा छोरी, ज़रा पानी सर से उतार दूं तब भीतर आना।”

  बांसुरी हाँ में सर हिलाती चुप चाप बाहर ही खड़ी रही।
   उसके सर से पानी उतार होंठो ही होंठों में कुछ बुदबुदाती ताई उसे अन्दर ले आयी__

” पूरी दुनिया की जो अलायें बलाएँ ले कर आयी होगी सब दरवाज़े से ही भगानी पड़ती हैं ना।

  बांसुरी के घर में ताई,बुआ जी और वीणा आ चुके थे, बाकी मेहमानों के दोपहर तक पहुंचने की संभावना थी।
   बहुत अधिक मेहमानों को वो लोग खुद भी साथ नही ले जाना चाहते थे।
   लगभग सारी तैय्यारियाँ हो चुकी थी, बांसुरी का सामान भी उसकी माँ और दीदी मिल कर बांध चुके थे।
    रात की ट्रेन थी, जो उन्हें अगले दिन सुबह सुबह भोपाल पहुंचाने वाली थी।
   शादी ब्याह का समय ऐसा होता है जब लगने लगता है घर में कोई त्योहार मनाया जा रहा हो। सामान पे सामान एक तरफ लगाया जा रहा था, सभी व्यस्त थे…शादी के सारे रिवाज वहीं शुरु होने थे…ओली पड़ने से लेकर बिदाई तक इसलिये यहाँ कुछ ना होते देख बुआ जी ने सबको बोल कर आज सत्यनारायण कथा रखवा ली थी, उनका मानना था बेटी को बिदा करने से पहले उसे कथा वार्ता सुना के भेजना चाहिये और जब बहु घर आये तब उसे कथा वार्ता सुनाना चाहिये।
    बांसुरी नहा धो कर अपने कमरे में तैय्यार बैठी थी कि उसकी ताई की बहु उसके लिये नाश्ता और चाय लिये वहीं चली आयी __

  ” लेन देन की साड़ियाँ देखीं बंसी तुमने ? कैसी लगी? हम गये थे चाची जी के साथ, खूब महंगी महंगी लेकर आये हैं….

  बांसुरी मुस्कुरा के रह गयी, तभी नारियल लेने कमरे में आती ताई ने अपनी बहु की बात सुन ली__

  ”  देखो बहुरिया साड़ियाँ कितनी भी महंगी हम लोग ले लें उनकी बराबरी तो कर नही सकते इसलिये ये सब बातें मत लेकर बैठो , बहुत काम फैला पड़ा है वो देख लो पहले….

  “अच्छा इसिलिए दूल्हा का जोड़ा आप लोग नही खरीदी क्या?”

  बांसुरी आश्चर्य से ताई की ओर देखने लगी__

  “क्यों नही खरीदा ताई? अब वो क्या पहनेंगे शादी में? दूल्हे का जोड़ा तो उसके ससुराल से ही जाता है ना? आप परेशान ना हो आप लोग जो भी खरीदेंगे उसे वो बहुत प्यार से पहनेंगे, मैं उन्हें अच्छे से जानती हूँ ….

  ताई आकर बांसुरी के पास बैठ गयी, प्यार से उसके सर में हाथ फिराते हुए वो उससे बातें करने लगीं__

  ” बिटिया हमारी बात को दिल से मत लगाना लेकिन जो समझाना चाहतें हैं उसे समझना। हम भी संपन्न परिवार से हैं खाने पहनने की कोई कमी नही है, हमारे पूरे परिवार में हर कोई अच्छी नौकरी में हैं लेकिन बिटिया वो लोग राजे महाराजे हैं।
   लाड़ो तेरी शादी के लिये तेरे पापा ने पच्चीस लाख रखे थे लेकिन तू जानती है तेरे दूल्हे का जोड़ा ही तेरी सास ने इक्कीस लाख का खरीदा है….तेरा जोड़ा इकतीस लाख का है , तेरे लहंगें में खालिस सोने की जरी गोटे का काम है बिटिया।”
    ताई ने आंखों से काजल निकाल बांसुरी के कान के पीछे  एक किनारे लगाया और वापस अपनी बात कहने लगीं__

   ” मेरी चिरैय्या तुझे भगवान बुरी नज़र से बचाये…हर माँ बाप यही चाहतें हैं कि उनकी बिटिया का ब्याह किसी राजकुमार से हो, आज देख प्रमिला और लल्ला जी का ये सपना पूरा होने जा रहा है।”

  तब तक में बांसुरी की माँ भी अपनी जेठानी को ढूँढती ऊपर चली आयी….

   “क्या जिज्जी आप भी सुबह सुबह का लेकर बैठ गयी , चलिये नीचे पण्डित जी कथा शुरु करने जा रहे हैं।”

  ” तुम चलो प्रमिला, मेरी चिरैय्या ससुराल जा रही है उसे कुछ थोड़ा सीखा पढ़ा तो दें,फिर आतें हैं नीचे।”

   कहने को तो प्रमिला की भी आंखें बांसुरी को देख  बार बार भरने को आ रहीं थीं लेकिन खुद को संयत किये वो काम में लगी थी, उसकी जेठानी के कोई बेटी ना थी वो शुरु से ही बांसुरी से बहुत प्रेम करती थीं …उन दोनों को वहाँ छोड़ वो नारियल लिये नीचे उतर गयी।

   ” बिटिया इसिलिए कहतें हैं की शादी ब्याह बराबरी वालों में ही रूचता है …अब हम लोग कितना भी महंगा कुछ भी दें लें उनकी बराबरी नही कर सकते ना।
   बिटिया देखो जो हम बता रही हैं ध्यान से सुनना, अब तक तुम मायके की देहरी पे उड़ती फिरती चिड़िया सी थी लेकिन अब ससुराल की देहरी की इज़्ज़त बन जाओगी…वहाँ हर किसी को अपने स्नेह से मोह लेना, अपनी सास को वैसा ही प्यार और सम्मान देना जैसा अपनी माँ को देती आयी हो लेकिन उनसे बदले में ये अपेक्षा कभी मत रखना कि वो तुम्हें बहु की जगह बेटी मान ले…सारे रिश्ते उलझे से होते हैं बिटिया अपनी समझदारी से सबके तार सुलझाते चलना।
  छोटी छोटी बात पर मुहँ मत फुला लेना….देखो हो सकता है हमारे दिये गहने कपड़े उन्हें पसंद ना आयें, लेकिन हो सकता है वो तुम्हारे सामने ये बात ना कहें तो अगर वो इन्हें ना पहने तो इसे अपने स्वाभिमान की बात मत बना लेना लाड़ो।
   एक बात और ध्यान रखना ,कभी अपनी सास ननंद की शिकायत पति से लगाने ना बैठ जाना…देखो बिटिया रानी मर्द तभी तक प्रेमी होता है जब तक उसे प्रेमिका मिल ना जाये , ब्याह के बाद कितना भी झुठलाना चाहो लेकिन हर प्रेमी पति में बदल ही जाता है …क्योंकि प्रेमियों के लिये दुनिया के दस्तूर नही बने होते ना …इसलिये वही आदमी जो पहले हर रीति रिवाज का खण्डन करता है पति बनते ही उतने ही जोर शोर से हर रिवाज निभाने लगता है…क्योंकि पति बनने के बाद उसकी जिम्मेदारी जो बढ जाती है , एक तरफ माँ और एक तरफ बीवी…दोनो अपनी तरफ खींचना चाहती हैं लेकिन ऐसे में कभी भी लाड़ो रानी अपने पति को अपनी तरफ खींचने की कोशिश मत करना क्योंकि ऐसी तनातनी में अक्सर रिश्तों की डोर चटक जाती है…अपने रिश्ते को पूरा समय देना और पति को भी।
   अगर किसी छोटी मोटी बात पर वो थोड़ा बहुत रूठ भी जाये तो तुम रिसिया ना जाना गुड़िया, जहां तक हो सके प्यार से बात संभाल लेना…

   ताई आँसूं पोछती अपनी लाड़ली को समझाती रहीं और वो चुपचाप अपने पैर के अंगूठे से खेलती सर नीचे किये आँसूं बहाती सुनती रही….

   लड़कियों के जीवन का सबसे कठिन समय ब्याह का समय ही होता है शायद!
   जिस घर में जन्म लिया ,जहां चलना सीखा बोलना सीखा उस घर को हमेशा के लिये छोड़ कर एक नये घर में जाना, अपने सारे रिश्ते नाते , अपनी माँ  पिता बहने भाई अड़ोसी पड़ोसी सखी सहेलियां, अपना कमरा अपनी छत अपनी सीढिय़ां सब कुछ छोड़ कर जाना…अपनी वो कुर्सी जिस पर बैठे बिना दिमाग काम नही करता था, अपना वो बिस्तर अपनी तकिया जिसके बिना कहीं और सोना दूभर हो जाता था, अपने कमरे की खिड़की पे चढ़ी रातरानी की बेल जिसकी खुशबू से मन बावरा हुआ जाता था…सब छोड़ना पड़ता है।
   अपने कमरे में यहां वहाँ लिखा खुद का नाम कितना याद आयेगा ससुराल जाने के बाद ….सोच सोच कर बांसुरी का रोना ही नही थम रहा था, ताई उसे अपने गले से लगाये ढाँढस बंधाती रही__

  ” अरे काहे बिदाई से पहले रो रुला के अपशकुन कर रहीं हैं बंसी ” बंसी की भाभी की बात का जवाब दिया ताई ने

  “कोई अपशकुन नही होता, हमारी अम्मा कहतीं थी ब्याह के पहले छोरी खूब रोती है तो ब्याह के बाद खूब खुश रहे हैं समझीं। एक आजकल की छोरियां है..खुद अपने ब्याह में नाचती फिरें हैं , घाघरे के ऊपर काला चस्मा लगा के चूड़ा और पहन लेवें हैं और खुद को हिरोइन समझ के नाच नाच के ससुराल जाती हैं और दो ही महीने में खोटे सिक्के सी फेर दी जाती हैं।”

  ” अरे अम्मा जी तो बांसुरी कौन सी आपके जमाने की है, है तो आजकल के जनरेशन की ही। हो सकता है इनकी ससुराल वाले लेडीज़ सन्गीत में इन्हें भी नाचने बोलें, आज कल लेडीज़ संगीत ऐसे ही होता है अम्मा जी, बाकायदे कोरियोग्राफर बुलाते हैं लोग… हमारी तरफ से तो कोई तैय्यारी ही नहीं है…नाक ना कट जाये उन के सामने।”

  ” राजपूतों के यहाँ ब्याह रहें हैं, उनकी औरतें हम से ज्यादा कायदा पर्दा करती हैं बहुरिया। फिर भी अगर नाचना गाना हुआ भी तो तुम तो कभी तिवारी खानदान की नाक ना कटने दोगी हम जानतें हैं…
   चलो नीचे चलो, कथा शुरु होने वाली होगी और सुनो बांसुरी को कलावा बंधवा देना, हम जा रही कसरावन बनवाने….”

  “काहे बनवा रहीं अम्मा जी, इनके राजमहल में कौन चिन्हेगा कसरावन है कि नही?”

  ” हैं तो हमारी तरफ के ही ना कैसे नही जानेंगे….रानी साहेब ना भी जाने तो बंसी की ददिया सास भी तो हैं , बुज़ुर्ग हैं ये सब का मह्त्व जानती होंगी समझी…चलो अब देर ना करो, नीचे से बुलौआ आता ही होगा।”

    दोनो सास बहु अपने अपने काम सोचती सीढ़ियाँ उतर गईं उनके पीछे बांसुरी भी मुहँ हाथ धो कर चेहरा सुधार कर नीचे चली गयी, वो अपना रोता चेहरा लिये माँ के सामने नही जाना चाहती थी, वर्ना एक बार फिर दोनो माँ बेटी साथ बैठी आँसू बहाती रह जाती….
   नीचे जाने के लिये सीढियों पर थी कि उसका मोबाइल घनघना उठा , दुसरी तरफ राजा था…वो उसका नाम देख मुस्कुरा उठी, वही नाम जिसका कभी उसने मज़ाक उड़ाया था आज उसका भाग्य बनने जा रहा था….
           राजकुमार अजातशत्रु सिंह!!

क्रमशः

aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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