जीवनसाथी-49

जीवन साथी -49

 
           तू बिन बताए, मुझे ले चल कहीं
           जहाँ तू मुस्कुराए, मेरी मंज़िल वहीं…..

    नीचे उतरती बांसुरी सीढियों पर थी कि उसका फ़ोन बज उठा, रिंग टोन सुन कर उसके होंठों पर मुस्कान चली आयी, राजा के नम्बर पर ये ट्यून असाइन कर रखी थी उसने__

  ” माँ तुम चलो नीचे, मैं बस पांच मिनट में आयी।”

   फ़ोन उठाये वो वापस कमरे में पहुंच गयी__

  ” पहुंच गये अच्छे से?”

  ” हाँ पहुंच गया, आपके प्रेम भैय्या लेने भी आ गये थे,  चुपचाप सबसे छिप कर अपने कमरे में भी पहुंच चुका हूँ। तुम क्या कर रही हो अभी?

  ” घर पर पूजा है, सत्यनारायण कथा है बस उसी में बैठने जा रही हूँ ..

  “ओके मैं भी नहा धोकर दादी से मिल आता हूँ, प्रेम कह रहा था कल रात उनकी तबीयत कुछ बिगड़ गयी थी।”

  ” ओह्ह ! ठीक है उनसे मिल कर बताना कैसी हैं अभी दादी जी?”

  ” अब सा लगाने की आदत डालनी पड़ेगी मैडम दादी सा या दादी साहेब , जो तुम्हें जन्चे।”

  ” तुम लोग ऐसे बात कर के बोर नही हो जाते माँ साहेब पिता साहेब …मुझे तो ये डर है कि इतना लम्बा सम्बोधन बोलने में मैं क्या बोलने आयी थी वही ना भूल जाऊं!”

  ” कुछ भूलने नही दूंगा हुकुम! मैं तुम्हारे पीछे ही खड़ा रहूँगा हमेशा।”

  ” अच्छा ! एक बात बताओ शादी के बाद मुझे तुम्हें क्या कह कर पुकारना होगा?”

  ” जो कहना चाहो बोल सकती हो, वैसे हमारे यहाँ के ट्रेडिशन के हिसाब से सभी औरतें अपने पतियों को साहब ही बुलाती हैं लेकिन तुम्हारे लिये कोई कम्प्लशन नही है, तुम अभी जो बुलाती हो वही बोलना।”

  “ठीक है …..साहेब !! अब मैं नीचे जा रही वर्ना भाभी मुझे लेने ऊपर ही आ जायेंगी।”

  ” ओके पर सुनो एक बात बतानी थी।”

  ” हाँ बोलो!”

  ” आज रात मेरी बैचलर्स पार्टी है….आज लंच प्रेम के घर पे है उसकी सारी टीम और मैं और उसके बाद रात में पार्टी”

  ” ओके ! लेकिन ये मुझे बताने का मतलब?”

  ” मतलब ये कि तुमने कहा था ना तुम्हारे फ्लैट में ड्रिंक्स नही कर सकते तो तबसे मैंने की ही नही। लेकिन आज तो थोड़ी बनती है, सभी दोस्त भी रहेंगे तो मना कैसे करूंगा।”

  ” तो मैंने कब मना किया? लेकिन मैं अपने मन की बात कहुँ तो मुझे नही पसंद…

   “अच्छा?झूठी !  तुम्हारा तो सपना था शादी से पहले ड्रिंक करने का?”

  ” तुमने पूरा कहाँ किया?”

  ” अच्छा जी तो मैंने पूरा नही किया इसलिये मैं भी पी नही सकता?
      वैसे मुझे याद था तुम्हारा सपना……, लेकिन कल रात हम अकेले थे इसिलिए नही ले के आया, कहीं तुम बहक जातीं तो..”

  “ओहो राजकुमार अजातशत्रु जी बातें ना बनाइये, मैं जानती हूँ मना करूंगी तब भी पियोगे ही, इसिलिए पी लेना लेकिन आराम से ….बहुत ज्यादा मत लेना।”

  ” ओके हुकुम! अब जाइये आप पूजा में बैठिए मैं भी जा रहा फ्रेश हो लूँ।”

   बांसुरी की धुली आंखों में अब आँसूओ की जगह मुस्कान सजी थी….
     वो जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतरती नीचे चली गयी।


  ******

   राजा को महल में छोड़ने के बाद प्रेम के वापस आते तक में निरमा भी जाग चुकी थी, बगीचे में टहलती फूल पौधों को देखती वो खुद में खोयी हुई थी।
  उसे अपने में मगन देख प्रेम भीतर चला गया।
अम्मा ने प्रेम को देख उसके लिये चाय चढ़ा दी…

  ” कल कहीं बाहर चले गये रहे बाबू? बहुरिया भी संगे थी क्या?”

  ” हाँ इन्हें कुछ खरीदारी करनी थी तो ये भी हम लोगों के साथ चली आयीं।”

  ” हाँ वही हम सोचे कि कुंवर सा के साथ तो अकेले ही जातें हैं बाबू, आज मेहरिया हमारा मतलब माल्किन कैसे चल दीं।”

  ” अम्मा मालकिन कहने की ज़रूरत नही है आप बहुरिया ही कहें” उन लोगों की बातों के बीच निरमा भी अन्दर चली आयी।
तभी जैसे अचानक प्रेम को कुछ याद आ गया__

  ” अरे अम्मा सुनो आज दोपहर में कुछ दोस्त खाने पर आयेंगे और हुकुम भी। तो कुछ अच्छा सा बना लेना”

  ” कितने लोग आयेंगे?” प्रेम की बात पर निरमा ने अपना प्रश्न उछाल दिया__

  ” लगभग आठ दस लड़के होंगे और हुकुम!”

  ” ठीक है! खाना तो तैय्यार हो जायेगा लेकिन अगर आज सुबह के खाने पे उन्हें बुलाना था तो कल रात से ही बता देना चाहिये था ना, अब मान लो छोले राजमा बनाना हुआ तो अभी तुरंत कैसे बनाये?, उन्हें एक रात पहले भिगोना पड़ता है ना?”

  ” ओह अच्छा! अब क्या करुँ? शाम का बोल दूं क्या? अरे पर शाम को पॉसिबल नही है…..शाम को हुकुम की बैचलर पार्टी है ,उनके सारे दोस्त आ रहे हैं।”

  प्रेम के चेहरे की घबराहट देख निरमा के चेहरे पे मुस्कान चली आयी__

  ” मेरा ये मतलब नही है, तैय्यारी तो सारी अभी भी हो जायेगी , आप जाइये फ्रेश हो लीजिए, मैं और अम्मा सब संभाल लेंगे।”

  ” असल में ये सारे लड़के जो मेरे अन्दर काम करतें हैं बहुत समय से शादी की पार्टी देने के लिये पीछे पड़े थे, और उन्हीं में से एक ने आज लंच पे घर आने का प्लान बना लिया , फिर मैंने हुकुम से बात की तो वो भी तैय्यार हो गये…पर आप ज्यादा परेशान मत होईये, अम्मा संभाल लेंगी।”

     ” का हुई गा बहुरिया तबीयत ठीक नही है का?
और काहे परेशान ना हो? तुम्हरी औरत है तुम्हरे दोस्तन के लिये पकाए में ऐसी कौन बड़ी बात हो गयी, वैसे हम तो हैं ही मदद के लिये , सुमित्रा भी आती ही होगी..”

    ” ठीक है ” कह कर प्रेम ऊपर चला गया, और निरमा क्या क्या बनाना है ये सोचती अम्मा को ज़रूरी बातें बताती लंच की तैय्यारियों में लग गयी।

      दोपहर की दावत हँसी मजाक और कहकहों के लम्बे दौर के साथ खत्म हुई….सभी के वहाँ से निकलते में शाम के चार बज गये। सबसे अखिर में राजा प्रेम को साथ लिये ही निकल गया__

  ” निरमा खाना बहुत अच्छा बनाया था आपने! आपकी सहेली को भी सिखा दीजियेगा उन्हें घास फूस के अलावा कुछ बनाना नही आता।”
   राजा की बात पर निरमा ज़ोर से हँस पड़ी __

  ” हम सब भी उसे घास फूस ही बोलते थे, और वैसे मैंने तो सुना है आपने खुद ने राजसी आहार त्याग दिया है।”
 
  ” ज़िंदगी भर के लिये नही छोड़ा भाई, बस अभी खाने का मन नही करता था, हाँ ये भी हो सकता है कि आगे कभी ना खाऊँ और ये भी हो सकता है कि खा भी लूं।”

  ” खैर बांसुरी को कोई दिक्कत भी नही होगी।”

  ”  अब ये तो साथ रहने लगेंगे तब पता चलेगा कि आपकी सहेली को हम कितना पसंद आयेंगे और कितना नापसंद। अच्छा भाभी जी आज प्रेम को अपने साथ लेकर जा रहा हूँ, पार्टी के लिये…रात में हो सकता है लौटने में देर हो जाये, और ये भी हो सकता है कि प्रेम आज महल में ही रुक जाये मेरे साथ! आप को कोई आपत्ति तो नही है ना?”

   निरमा ने प्रेम की तरफ देखा __

  ” राजा भैय्या आप कितनी भी देर रोक लीजियेगा लेकिन रात में इन्हें भेज दीजियेगा…इतने बड़े घर में मुझे अकेले डर ……

  “मैं आ जाऊँगा।” निरमा की बात आधे में ही काट कर प्रेम ने अपनी बात कह दी।
  प्रेम के उतावले पन पर राजा ज़ोर से हँस दिया__

  ” अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था, मैं भी आपके पतिदेव को रात में नही रोकूँगा …

  मुस्कुरा कर राजा निकल गया……
                   प्रेम निरमा को इतने शानदार लंच और मेहमाननवाज़ी के लिये आभार कहना चाहता था, वो जाते समय उससे कहना चाहता था कि उसे काफी थकान हो गयी होगी इसलिये अब वो आराम कर ले लेकिन अपने संकोच के कारण वो कुछ ना कह सका और एक नज़र उसे देख राजा के साथ आगे बढ गया।
       उन लोगो के जाते ही निरमा भी अन्दर जाकर हॉल के सोफे पर ही लेट गयी, आज कुछ ज्यादा ही भाग दौड़ कर ली थी उसने। उस समय तो पता नही चलता लेकिन बाद में ऐसी थकान होती है कि खाना भी नही खाया जाता।
    अम्मा खाना गर्म कर उसके लिये परोस लाईं __

  ” अम्मा आप भी अपना खाना परोस लाईये ”

  ” नही बहुरिया पहले तुम खा लो, कुछ लगेगा तो और परोस दूँ फिर अपना ले आऊंगी।”

  ” मुझे और कुछ नही लगेगा, बल्कि मेरे हिसाब से ये कुछ ज्यादा ही परोस दिया आपने, जाइये अपना भी ले आईये।”

    दोनो साथ बैठी खाती रहीं ,साथ ही निरमा ने बांसुरी को फ़ोन भी लगा लिया__

” क्या कर रही है हिरोइन?”

” कुछ नही यार! सुबह से इतना रोना आ रहा कि क्या बोलूं?”

  ” क्यों? रोना क्यों आ रहा , तुझे तो अभी गाना चाहिये- राजा की आयेगी बारात रन्गीली होगी रात, मगन तू नाचेगी”

  ” ओये फिल्मी! चुप कर , कोई नाच गाना नही यार! बहुत सेंटी हो रहीं हूं अभी, पता नही आजकल हर बात पे रोना आ रहा है…

  ” हम्म होता है यार ऐसा भी होता है, मेरी तो खैर जिस परिस्थिती में शादी हुई …खैर छोड़! मैंने तो ये बताने के लिये फ़ोन किया था कि तेरे सैंय्या जी जबर्दस्त तरीके से तुझे मिस कर रहे हैं , तेरा गम भुलाने के लिये बैचलर पार्टी करने चले गयें हैं।”

  ” जानती हूँ, बता कर गयें हैं।”

   ” हम्म तब ठीक है।”

   ” तेरी तबीयत कैसी है? अब मैं आ रही हूँ ना तेरा अच्छे से ख्याल रख लूंगी।”

  ” बड़ी आयी खयाल रखने वाली…… तेरे राजा जी को देख के लग तो नही रहा कि एक पल को भी तुझे छोड़ेंगे।”

  ” चुप कर यार!”

  ” सही कह रहीं हूँ, अभी से उनमें जोरू के गुलाम वाले लक्षण दिख रहें हैं, तेरे पीछे पीछे तेरा पर्स उठाये ना घूमे तो देख लेना।”

  ” हाँ बिल्कुल जैसे प्रेम भैय्या तेरे बैग्स उठाये घूमते हैं।”

  ” तुझे कैसे पता?”

  ” अब तू अपनी शॉपिंग में भले मुझे भूल जा पर उन्होने तो याद रखा और मेरे कहने पे तेरी तस्वीर भी भेज दी, एक बात बोलूं निरमा तू बहुत प्यारी लग रही थी।”

  कुछ देर को निरमा को समझ ही नही कि वो क्या कहे, पहली बार हुआ था कि प्रेम के किसी कृत्य के कारण वो शरमा के गुलाबी हो गयी थी।

  ” वो सब छोड़ ये बता मेरा भेजा गिफ्ट कैसा लगा, तेरे राजा जी ने भी मेरे पैकेट में अपना कुछ सामान फिट कर दिया था”

  ” अच्छा याद दिलाया तूने नीरू, मैं तो यार देखना ही भूल गयी थी।”

  ” हाँ बेटा अब तुम्हें अजातशत्रु जी के अलावा और कुछ याद रहे तब तो?”

  ” बस पांच मिनट रुक मेरी जान अभी पैकेट खोलती हूँ, होल्ड कर!”

   बांसुरी लपक कर आलमारी से पैकेट निकाल लायी, पहला हिस्सा खोलते ही एक बहुत खूबसूरत सी नारंगी रंग की साड़ी निकली __

” नीरू ये साड़ी तो हमने साथ ही खरीदी थी ना, वही है ना?”

  ” हाँ तुझे उसी समय बहुत पसंद आयी थी, और हम इसका दूसरा पीस ढूँढ ढूँढ के थक गये थे,पर एक ही पीस मिला और तुने मुझे थमा दी थी।”

  ” पर यार ये तो तुझे बहुत पसंद आयी थी, फिर मुझे क्यों दे दी?”

  ” पसंद सिर्फ इसलिये आयी थी क्योंकि इसी कलर का कुरता प्रताप के पास था, हम दीवाली पे एक साथ ये पहनने वाले थे…जब ना कुरता रहा ना पहनने वाला तो मैं क्या करती बांसुरी इसका। पर साड़ी मुझे बहुत प्यारी थी, लेकिन जब भी इसे देखती वो याद आ जाता इसलिये लगा कि मैं तो इसे शायद ही पहन पाऊँ लेकिन हाँ मेरी इतनी प्यारी साड़ी को अगर मेरी प्यारी सहेली पहन लेगी तो ज़रूर मेरा दिल बहुत खुश हो जायेगा”

  ” लव यू निरमा!”

  ” लव यू की बच्ची अब ज़रा अपने सैंय्या जी वाला गिफ्ट भी तो खोल या मुझसे छिप के खोलना है… वैसे मैं तो डैम श्योर हूं सेवन पीस नाईटी ही होगी… वो भी उनके फ़ेवरेट कलर की…..ब्लू।”

  ” चुप कर ! ऐसा कुछ नही होगा, और तुझे किसने बताया उनका फ़ेवरेट कलर ब्लू है?”

” यार एडम और ईव के ज़माने से चला आ रहा है लड़कों का कलर ब्लू और लड़कियों का पिंक!! पता नही पर मुझे तो ये पिंक कलर देखते ही चिढ़ हो जाती है, वैसे बेबी पिंक नाईट वियर भी हो सकता है…

कहने को तो कह गयी लेकिन उस पार्सल को खोलते हुए बांसुरी का दिल भी बहुत ज़ोरों से धड़कने लगा… पता नही क्या भेजा होगा, कहीं निरमा की बात सच हुई तो…वो झटके उठ कर दरवाज़ा बंद कर आयी, कहीं वाकई कोई ऐसी वैसी चीज़ भेज दी होगी और कहीं उसी समय बुआ या ताई चलीं आयी तो वो शर्म से पानी पानी हो जायेगी।
    दरवाज़ा बंद कर आराम से बैठ उसने धीरे से पार्सल खोल दिया__

   अन्दर का सामान देख उसकी आंखें आश्चर्य से और चौड़ी हो गयी, उसने किनारे रखा फ़ोन उठा लिया…

  “खोल लिया? अब बता भी दे किस कलर की ड्रेस है?”

  ” निरमा सच बताऊँ क्या भेजा है?”

  ” हाँ बाबा, जल्दी बता?”

   ” समझ नही आ रहा यार ये सब राजा ने क्यों भेजा?”

  ” ओह मेरी सस्पेंस क्वीन! प्लीज़ बोल जल्दी , क्या है?”

  ” यार इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेस का सिलेबस भेजा है।”

  ” वॉट? ठीक से देख, कहीं इधर उधर कुछ और होगा?”

  ” देख लिया यार ! और कुछ नही है, एक चिट्ठी है,इसे भी पढ के सुनाऊँ या इसे अकेले पढ़ लूं?”

  ” सिलेबस भेजने वाले प्रेमी की चिट्ठी अकेले पढ़ने के तो कतई काबिल ना होगी, सुना ही दे क्या लिखा है?”

  ” बांसुरी!
    शादी के बाद शायद मुम्बई रह कर तुम अपनी जॉब जारी ना रख पाओ, लेकिन अगर करना चाहोगी तो मैं रोकूँगा भी नही।
    लेकिन चाहता तो यहीं हूँ कि अब कभी हमें अलग ना रहना पड़े , इसिलिए ये सिलेबस भेजा है….
…अगर चाहो तो तैय्यारी कर सकती हो।
    अपने ही शहर की जिलाधीश रहोगी तो तुम्हारे काम करने की इच्छा भी पूरी हो जायेगी, और मेरी हमेशा साथ रहने की भी।
   ये मेरा आदेश नही है सिर्फ एक खयाल है मेरा।  तुम्हें क्या करना है और क्या नही ये पूरी तरह तुम्हारा निर्णय होगा…

    तुम्हारा …..

    राजकुमार !!

   ” हे भगवान! ये तुम्हारी कोर्टशिप है ? चल मेरा खाना खतम हो गया, तुझसे बातें करने के चक्कर में कुछ ज्यादा ही खा गयी आज, अम्मा कब का खा पी के चली भी गईं।”

  निरमा ने बाद में बात करने की बात कह फ़ोन रख दिया।
     इधर बांसुरी मुस्कुरा कर सब कुछ समेट अपने बैग में रख आयी…माफ करना राजा लेकिन अब तुम्हारा सपना जो भी हो मेरा बस एक ही सपना है….. तुम! अब तुमसे अधिक और तुमसे अलग किसी चीज़ को पाने की तमन्ना नही रही।
   हर इच्छा हर ख्वाहिश तुम्हारे सामने बौनी हो गयी है।
  वो कमरे का दरवाज़ा खोल नीचे उतर गयी।
 
    कथा और पूजा संपन्न होने के बाद आरती की थाली पूरे घर में फिराने को उसकी बुआ ने उसे ही थमा दी….

    कथा के बाद खाना पीना निपटा ही था कि उसकी कुछ सखियाँ मिलने चली आईं और उनके जाने में उन लोगों का भी निकलने का समय हो गया।

   स्टेशन निकलने के लिये सारा सामान गाड़ियों पर चढ़ रहा था, लोग अपनी अपनी जगह बना रहे थे, सब इधर उधर आस पास ही थे …..एक होने वाली दुल्हन ही नदारद थी, वीणा बांसुरी को लेने अन्दर जाने लगी तो उसकी माँ उसे रोक खुद भीतर चली गयी।
    अपने कमरे में अपनी आलमारी खोल के खड़ी बांसुरी चुप चाप अपनी किताबों पर हाथ फेरती खड़ी थी__

  ” बांसुरी! बिटिया चलो वर्ना देर हो जायेगी।” माँ की आवाज़ सुन उसकी आंखों से दो बूंद फिर लुढ़क कर उसके गालों तक चले आये__

  ” कित्ता रोएगी बिटिया! सुन ये तेरा घर था और तेरा घर ही रहेगा हमेशा, चाहे तू ब्याह के कितना भी दूर चली जाये समझी।”
  बांसुरी हाँ में सर हिला के इधर उधर देखती रह गयी__

  ” मेरे जाने के बाद मेरे कमरे को मेहमानों का कमरा तो नही बना दोगी माँ?”

” ऐसे कैसे बना देंगे? ये कमरा तेरा था और तेरा ही रहेगा हमेशा?”

  ” और शादी के बाद कहीं मुझे ही तो मेहमान नही बना दोगी?”

  ” पागल बच्चा।” आगे बढ कर माँ ने बेटी को अपने गले से लगा लिया…

” सपनों सी ज़िंदगी होने जा रही है तेरी और तू …चल अब नीचे।”

   दोनों जनी आँसूं पोछती नीचे चली गईं।
 
   ट्रेन में सवार होते ही शादी वाला माहौल बन गया, नही नही में भी पच्चीस तीस लोग हो ही चुके थे, कुछ रिश्तेदार जो इंदौर भोपाल उज्जैन विदिशा के थे वो सीधे शादी वाले दिन या उससे एक दिन पहले पहुंचने वाले थे।
    एक के बाद एक सात केबिन रिज़र्व थी, सभी लोग बैठने की व्यवस्था ऐसे कर रहे थे कि सारे बड़े बुज़ुर्ग एक तरफ हो जाये और सारे बच्चे एक साथ।
   अपनी माँ के पास बैठी बांसुरी को उसके जीजा जी अपने साथ ही खींच कर ले गये।
   बातों और अंताक्षरी का ऐसा दौर शुरु हुआ कि हर कोई एक दूसरे पर भारी ही पड़ रहा था, एक तरफ सारे मर्द थे तो दुसरी तरफ औरतें…गानों की बरसात के बीच समोसों कचौड़ियों और चाय के राउंड भी निपटते जा रहे थे…….
      गाड़ी अपने वेग से भागती चली जा रही थी और गाड़ी की छुक-छुक बांसुरी को बार बार राजा से हुई पहली मुलाकात याद दिलाए जा रही थी…..

   *******

  महल के पिछ्ले हिस्से में बने भव्य हॉल को अक्सर घर पर होने वाले समारोहों के लिये उपयोग में लिया जाता था.. ….वो हिस्सा महल से सीधे सम्पर्क में नही आता था, बीच में पड़ने वाला इंद्रधनुष तालाब दोनों महलों के मध्य अच्छा खासा अन्तराल बना जाता था, इसी का फायदा उठा कर घर भर के लड़कों की पार्टियों का अड्डा वही था।
   वैसे तो राजा पार्टी के लिये बाहर ही जाना चाहता था लेकिन सुरक्षा कारणों से उसे और विराज को महल के उसी हिस्से में ऊपर नीचे अपनी अपनी पार्टी कर लेने के लिये रानी माँ ने मना लिया था।

  पार्टी महल की थी और उसपे बैचलर्स पार्टी थी…. महंगी विलायती शराब की नदियाँ बह रहीं थी…उस दिन महल के पिछ्ले मुख्य द्वार को खोल दिया गया था जिससे आने वाले मेहमानों के कारण महल के निवासियों को परेशानी का सामना ना करना पड़े …
  पार्टी हॉल बिल्कुल किसी आलिशान फाईव स्टार होटल के पब को भी शर्मिंदा करने को तैय्यार था।
सारी रौनकें जैसे वहीं समा गयीं थीं। पूरा हॉल लड़कों से भरा था, ऊपर भी और नीचे भी।
  ऊपर विराज के दोस्त थे और नीचे राजा के दोस्त, कुछ राजा के बिज़नेस पार्टनर्स कुछ उसके ऑफिस एम्प्लायी और बाकी प्रेम के लड़के।
   कुल मिलाकर माहौल रंगीन था, और जैसे जैसे रात गहराती जा रही थी, रंगीनियत बढ़ती जा रही थी।
    कुछ देर बाद एक लम्बा चौड़ा सा गिटार के शेप का केक लाया गया, उसके साथ ही एक तीन मंजिला केक और लाया गया …दोनो भाइयों से केक साथ ही कटवाने का प्लान था युवराज भैय्या का।
  वो अब तक पार्टी में नही थे, और अभी भी सिर्फ केक कटिंग के लिये ही आये थे।
   राजा और विराज ने साथ ही केक काटा और युवराज भैय्या के बाद एक दूसरे को खिला कर गले से लग गये__

  ” खूब खुश रहो मेरे भाई विराज!”

  ” खुश रहने के बहाने तो हम ढूँढ ही लेते हैं कुमार! बस दुआ करो कोई रुकावट ना आये।”

  ” तुम्हारी खुशियों के रास्ते की हर रुकावट मैं दूर कर जाऊंगा।”

  ” मेरी खुशियों की रुकावट हटाने के चक्कर में अपनी खुशियों से नज़र ना हटा बैठना कहीं?”

  विराज की बात पर राजा ज़ोर से हँस पड़ा, वहीं खड़े समर ने उससे पूछ ही लिया__

” क्यों विराज सा , ऐसा कहने का आपका कोई विशेष प्रयोजन”

  ” ना!!  कोई विशेष प्रयोजन नही। हम तो बस मज़ाक कर रहे थे…. पर क्या है ना समर हमारी और कुमार की शादी एक ही दिन एक ही मुहूर्त में हो रही है …

  “हाँ तो क्या हुआ? ऐसा तो अक्सर राजमहलों में होता आया है..

  “राजमहलों में तो दुलहनों का बदलना भी होता आया है, बस वही कुछ याद आ गया था।
  हमारे यहाँ की शादियों में दुलहन घूंघट में होती है ना तो कहीं हमारी और कुमार की दुल्हनें ना बदल जायें…बस इसी बात का डर है।” अपनी बात पूरी करता विराज एक ओर लुढ़क गया

   राजा ने अपने गुस्से को ज़ब्त करने अपना ग्लास खाली किया और दूसरा ग्लास उठा लिया, और अपना फ़ोन जेब से निकाले वहाँ से हट कर कुछ देर को बाहर बगीचे में चला आया…उसने फोन देखा बांसुरी के मिस्ड कॉल्स थे, उसने तुरंत उसे कॉल मिला लिया…कुछ देर में ही फ़ोन उठ गया__

” फ़ोन किया था तुमने?”

” हाँ उस वक्त तुम्हारी बहुत याद आ रही थी, नेट्वर्क भी था तो लगा लिया फिर जब तुमने उठाया नही तो समझ गयी कि राजा साहब अपनी पार्टी में व्यस्त होंगे…”

  ” हाँ व्यस्त भी था और इतनी तेज़ म्यूज़िक की आवाज़ थी अन्दर की फ़ोन सुनाई भी नही दिया।”

  ” हम्म! हमारी तो सोने की तैय्यारी हो चुकी थी, सब सो भी चुके , मैं इसिलिये वॉशरूम एरिया में आकर बात कर रहीं हूँ।”

” अकेले आयी हो?”

  ” और क्या? पूरी बारात लेकर आऊंगी तुमसे बात करने?”

  ” अरे नही बांसुरी! फिर अभी बात वात मत करो, तुम सीधे अपनी सीट पर जाओ”

  ” राजा वहाँ सब सो रहे बाबा समझो! वहाँ से बात नही कर पाऊंगी।”

  ” कोई बात नही! मत करना लेकिन इस वक्त ट्रेन के गेट के पास खड़े होकर तुम्हारा बात करना सेफ नही है, प्लीज़ बाबू जाओ अपनी सीट पर! ”

  ” ओके बाबा! जा रही , अच्छा सुनो ! कल सुबह सात बजे तक पहुंच जाऊंगी, तुम आओगे लेने?”

  ” ये भी कोई पूछने की बात है? आज सुबह ही एक दूसरे से मिले थे फिर भी मन नही भरा…जल्दी से आ जाओ बांसुरी …अब बिल्कुल रहा नही जा रहा।”

  ” हम्म”

  ” क्या हम्म! कितना शरमाती हो यार? मैं कुछ भी कहता हूँ तुम शरमा जाती हो ”

    राजा की हँसी सुन बांसुरी भी निश्चिंत होकर अपनी सीट पर चली गयी। उससे बात करने के बाद वो वहीं कुछ देर टहलता रहा इधर अन्दर प्रेम ने आगे बढ़ कर समर की सहायता से विराज को उठा कर ऊपर ले जाना चाहा__

  ” अरे हमें क्यों संभाल रहे हो, इतनी चढ़ी नही है अभी , हम होश में हैं समझे तुम क्या नाम है तुम्हारा?”

  “जी हुकुम! प्रेम नाम है मेरा!

  ” हाँ प्रेम! वो क्या है प्रेम हम तुम्हारे कुमार जैसे नहीं हैं जो नौकरों का भी नाम याद रखें, हमारे पास बहुत से काम जो होतें हैं…समझते हो ना?”

  ” जी हुकुम!”

  ” तो समझ जाओ  फिर ! बने रहना अपने हुकुम के साथ…इन्हें गोलियाँ खाने की बुरी आदत जो है।”
  अपनी बात कह वो एक बार फिर वहीं लुढ़क गया। प्रेम और समर उसे उसके दोस्तों की मंडली के पास ऊपर छोड़ आये  …..
   रात गहराती जा रही थी, किसी का वहाँ से निकलने का मन नही था, लेकिन सुबह सवेरे बांसुरी का परिवार पहुंचने वाला था और दोपहर तक में ठाकुर साहब का। सबकी अगुआई को भी जाना था इसी से बिना मन के ही पार्टी भी अपने अंत को बढ चली।

    राजा से बिदा ले प्रेम घर पहुंचा तब तक आधी रात बीत चुकी थी…दरवाज़ा खोल कर भीतर वो कुछ गुनगुनाते हुए आया और हॉल की लाइट्स जलाते ही वहाँ सोफे पर लेटी निरमा पर उसकी नज़र पड़ गयी, निरमा को वहीं सोये देख वो दबे पांव रसोई की ओर पानी लेने बढ गया….
    पानी लिये पीने जा ही रहा था कि निरमा की आवाज़ उसके कानों में पड़ी __

  ” क्या चाहिये आपको? नीम्बू पानी या कॉफ़ी?

  ” कुछ नही चाहिये! आप जाइये आराम किजीये…

  “मैं आराम ही कर रही थी, आपको किसी चीज़ की ज़रूरत ना पड़ जाये सोचकर मैने तैय्यारी रखी थी”

निरमा ने वहीं रखे नीम्बूओं की तरफ इशारा कर दिया, उसकी बात सुन प्रेम हँसने लगा__

  ” मैं पीता नही हूँ निरमा! मैं तो बस हुकुम की पार्टी थी इसिलिए चला गया था वर्ना ऐसी पार्टीज़  में जाता भी नही….
   जाइये आप भी सो जाइये , मैं भी सोने जा रहा, सुबह आपकी सहेली के परिवार को रिसीव करने भी जाना है।”

   हाँ कह कर निरमा एक तरफ हो गयी, प्रेम के ऊपर जाते ही रसोई का सामान समेट वो भी उसके पीछे ऊपर चली गयी।

क्रमशः

aparna..


   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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