जीवनसाथी-50

जीवन साथी–50

                 ” सगाई “

      रानी साहेब ने सुरक्षा कारणों से राजा को स्टेशन जाने के लिये मना कर दिया….चाह के भी राजा,  बांसुरी और उसके परिवार के स्वागत के लिये नही पहुंच पाया लेकिन स्वागत में कोई कमी नही थी।
   
    स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही बांसुरी और उसके परिवार के वहाँ उतरते ही सामने उनके स्वागत के लिये खड़े युवराज भैय्या, काका सा , समर ,प्रेम और विजय  जय के साथ विराट पे सबकी नज़र चली गयी। सबके हाथों में बांसुरी के परिवार के लिये फूल थे….
    महल की औरतों की शायद ऐसे सार्वजनिक स्थानो में जाने की मनाही थी बावजूद काकी सा यानी पिंकी की माँ और फुफू सा बांसुरी के स्वागत के लिये पहुंच ही गईं थी…..
     सभी को देख कर बांसुरी के परिवार वालों के चेहरे भी खिल गये थे पर राजा को  ना देख बांसुरी का चेहरा मुरझा गया था__

” दिल छोटा ना करें बहुरानी , अब उन्हीं के साथ पूरा जीवन बिताना है….उन्हें अब महल से उनकी सुरक्षा के कारण ही नही निकलने दिया जा रहा।”

  ” जी काकी जी! मैं समझ सकती हूँ।”
उसने आगे बढ़ कर काकी और बुआ के पैर छुए और उनके साथ ही आगे बढ गयी। सभी के गाड़ियों में बैठते ही गाडियाँ महल की ओर दौड़ चलीं।

   ” हवा हो या पत्ते संवरने लगे हैं
     फूलों के  दिल भी मचलने लगे हैं।
      वो आये हमारे शहर में कुछ ऐसे
      शहर भर के मौसम बदलने लगे हैं।।”

   गाड़ी आगे बढते ही बांसुरी ने अपना फ़ोन निकाला, उसके मेसेज करने के पहले ही राजा का मेसेज आ चुका था….
     सुबह से छाए हल्के बादल और बहती मीठी हवा मौसम खुशनुमा बना रही थी , बाकी कसर राजा के मेसेज ने पूरी कर दी….

   “आखिर साहब से आते नही बना?”

  ” तो क्या हुआ? रास्ते में हर जगह मेरे निशान पाओगी … बस बढते जाओ आगे..”

   ” अच्छा ऐसा?”

   “हाँ जी!”

   स्टेशन के बाहर निकलते ही चौक पर गाडियाँ कुछ सैकेण्ड के लिये रुकी कि बांसुरी के कांच पर किसी ने ठक ठक की, उसने कांच उतारा तो सामने खड़ी औरत ने गुलाब उसकी ओर बढ़ा दिया__

  ” नही हमें नही खरीदना”

  ” आपको पैसा नही देना है मैडम! ये आपके लिये ही है , फ़्री में।”

  उसने आगे बढ कर गुलाब ले लिया। गुलाब के साथ राजा की लिखी एक पर्ची भी थी__

      ” ये ना सोचना तुम्हारे साथ नही हूँ ….
        आंखें बंद करो तुम्हारे पास मैं ही हूँ ..

मुस्कुरा कर पर्ची अपने पर्स में डाल कर बांसुरी ने पीछे सीट पर सर रखा और आंखें मूंद लीं….

   विजयराघवगढ़ की सीमा प्रारंभ होते ही जगह जगह छोटे बड़े समूहों में खड़े लोगों ने गाड़ियों पर फूल फेंकना शुरु कर दिया….
   बांसुरी के परिवार के लिये ये बिल्कुल नया अनुभव था__

” बंसी बेटा देख तो सारे गांव वाले कैसे उमड़े पड़े हैं”

  ताई की आवाज़ सुन बांसुरी की नींद खुल गयी, वो भी आंखे मलते बाहर का नज़ारा देख कर चौंक गयी उसे राजा की वापसी वाला दृश्य याद आ गया।
   कुछ और आगे बढ़ने पर ग्राम प्रधान के साथ कई औरतें बच्चे बुजुर्गों ने हाथ दे कर गाडियाँ रुकवा लीं।
  बांसुरी प्रेम वाली गाड़ी में थी__

  ” बांसुरी! ये सभी लोग अपनी होने वाली महारानी से मिलना चाहतें हैं। अगर तुम चाहो तो नीचे उतर कर सब से मिल सकती हो।”

  प्रेम की बात सुन बांसुरी आश्चर्य से बाहर की भीड़ देखने लगी__

  ” घबराओ मत, ये सभी लोग हुकुम से बहुत प्यार करतें हैं, उनके राज तिलक और विवाह की उनसे अधिक प्रतीक्षा इन सभी को है।
   हुकुम के विवाह में पूरे गांव का न्योता है, ये सभी उनसे इतना प्यार करतें हैं कि उनके एक एक पल की खबर सभी को है, सब बस हुकुम की होने वाली दुल्हन की एक झलक पाने और स्वागत करने ही इकट्ठा हुए हैं”

   बांसुरी जब तक कुछ सोच पाती युवराज और समर अपनी अपनी गाड़ियों से उतर कर उसके पास पहुंच चुके थे।
   बांसुरी के गाड़ी से उतरते ही उस पर फूलों की बरसात होने लगी___

  ” आप सभी से इन्हें मिलाते हुए बहुत खुशी हो रही है, ये हैं आप सभी के लाड़ले राजकुमार अजातशत्रु की होने वाली दुलहन बांसुरी! और आप सभी की होने वाली महारानी , रानी साहेब बांसुरी!”

   इतनी भीड़ के सामने हाथ जोड़े खड़ी बांसुरी संकोच से गड़ी जा रही थी, युवराज भैय्या जितने प्यार से उसका परिचय सभी को दे रहे थे, उतने ही प्यार से जनता भी हाथों हाथ उसे ले रही थी।
   तभी समर और विराट दो लोगों की सहायता से कुछ टोकनीयों में समान लिये चले आये, और बांसुरी के हाथों सभी को दिलवाने लगे__

  ” ये क्या है समर जी?”

  ” कुछ खास नही है रानी हुकुम! ये हमारी होने वाली रानी साहेब यानी आपकी  तरफ से जनता के लिये कुछ तोहफ़े हैं। ”

    कुछ औरतें आगे बढ़ कर बांसुरी को तिलक कर आरती उतारने लगीं और वो शरमाती हुई खड़ी रही, उसे जब  समझ नही आया कि उसे क्या करना चाहिये  तो उसने आगे बढ़ कर उनके सामने हाथ जोड़ लिये….
   सच ही तो कह रहा था राजा, मैं साथ भले ही ना हुँ लेकिन मेरा एहसास हमेशा साथ रहेगा….., सारे रास्ते भर…..
  आखिर आज ये सभी लोग राजा के  मोह के कारण ही तो उसे देखने ऐसे भीड़ लगाये चले आये थे।
   युवराज भैया ने आगे बढ़ कर सभी को विवाह का निमन्त्रण दिया और बांसुरी को लिये गाड़ी की ओर मुड़ गया__

  ” सही कहा था समर तुमने, कुमार की दुल्हन को देखने जनता की भीड़ ज़रूर उमड़ेगी, अच्छा ही किया तोहफ़े साथ लेते आये”

  ” जी युवराज सा ! मुझे कुमार की पॉपुलैरिटी का आभास था, मुझे लगा ही था कि आज इन्हें एक झलक देखने लोग उमड़ पड़ेंगे, हालांकि प्रोटोकॉल के हिसाब से हम होने वाली रानी का चेहरा नही दिखा  सकते थे लेकिन हमारे कुमार भी तो ज़रा अलग मिजाज़ के हैं ना।”

  हँसते हुए युवराज और समर बांसुरी को उसकी गाड़ी में बैठा कर अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ गये__

  ” वाह बंसी पहला ही स्वागत बड़ा ज़ोरदार हुआ, अब देखते हैं आगे क्या होता है?”

   बांसुरी की बहन वीणा चहक उठी, बांसुरी के भीतर आते ही गाड़ियाँ आगे बढ गईं।
    

   महल के मुख्य द्वार पर आरती का थाल सजाये औरतें खड़ी थी…और एक तरफ ढोली खड़े सुर ताल मिला रहे थे….सबके पहुंचतें ही सभी का आरती और फूल माला से स्वागत कर उन्हें मेहमानो के लिये बने महल में पहुंचा दिया गया।
   उन्हें वहाँ पहुंचाने तक युवराज समर और प्रेम उनके साथ ही थे।
   किसी आलिशान होटल के शानदार कमरों सा सजीला महल उनके स्वागत में तैय्यार था।
   बांसुरी के परिवार के लिये ये बिल्कुल नया अनुभव था, लेकिन युवराज प्रेम और समर बराबर इस बात का ध्यान रख रहे थे कि उन लोगों को किसी प्रकार का कोई संकोच ना होने पाये।
   सबको उनके कमरों पर आराम करने के लिये छोड़ कर वो लोग बाकी तैय्यारियों के लिये निकल गये।

    बांसुरी की माँ ताई और बुआ अपनी पूजा पाठ की सामग्री देखती जोड़ती पण्डित जी से पूछ पूछ कर तैय्यारियों में लग गयी थीं।
   रानी साहेब के बताये अनुसार आज शाम ही ओली और तिलक की रस्म के बाद सगाई होनी थी, कल उनकी चाक पूजा होनी थी जिसके बाद हल्दी मेहंदी की रस्में थी ,और अगले दिन फेरे होने थे।

    रानी साहेब ने एक विशेष पत्र लिख कर उन सभी से राजपूती विवाह प्रथाओं के अनुसार ही विवाह होने की गुजारिश की थी…..
   बांसुरी के परिवार वाले पहले ही इतनी चकाचौंध देख चकित थे, बिना कारण किसी भी बात पर बखेड़ा खड़ा करने का कोई औचित्य नही था।
  बाँसुरी के पिता पहले ही अपने परिवार के सदस्यों से हाथ जोड़ बिनती कर चुके थे कि महल में वो लोग जो जो कहते जायेंगे हमें उन्हीं के अनुरुप सब करते जाना है।

   महल की ओर से सभी महिलाओं के किये राजपूती पोशाक और पुरूषों के लिये गुलाबी पगड़ी भेज दी गयी थी।
    बांसुरी के परिवार वालों को ये कपड़े पहनने में कोई आपत्ति नही थी।

   बांसुरी के लिये बहुत सुंदर सुनहरी रंग की पोशाक आयी थी।

   नौकर चाकर मिठाइयों के थाल सजाये सबके कमरों में दौड़ दौड़ कर पहुंचा रहे थे, नाश्ते चाय के साथ जिसे जिस चीज़ की चाह होती वो ज़बान पे आते ही सामने प्रस्तुत हो रहा था, परिवार के पुरूष जैसे फूफा जी जिजाजी तो बस बार बार जांचने के लिये ही कुछ ना कुछ मँगवा  रहे थे__

  ” क्यों लाला! मगही पान मिल जायेगा यहाँ?” फूफा जी के सवाल पर वहीं खड़ा नौकर मुस्कुरा उठा__

  ” जी मिल जायेगा , आप आदेश करें बस”

  ” तो ज़रा चाय के बाद लेते आना फिर।”
  
   ” ए जी भूल ना जाइयेगा लड़की वालें है आप…. बराती ना बन जाइये” बुआ जी के याद दिलाने पर फूफा जी आराम से गावतकिया अपनी पीठ के नीचे लगाते और पसर गये ,और साथ बैठे लोगों को अपने ज़माने के अपनी शादी के किस्से सुनाने लगे…

   सभी अपने में व्यस्त थे और बांसुरी अपने कमरे की हर खिड़की, बालकनी से झांक झांक कर राजा के कमरे को पहचानने की कोशिश में लगी थी।
महल इतना बड़ा था,और सारे ही कमरे बाहर से ऐसे थे कि देख कर समझ ही नही आ रहा था कि वो किस महल के किस हिस्से में इस वक्त मौजूद थी
  अपने कमरे की बालकनी  से इधर उधर देख रही थी कि उसका फ़ोन घनघना उठा…फ़ोन उसी का था जिसके फ़ोन की प्रतीक्षा थी….

  “मुझे ढूंढ़ रही हो ना?”

  राजा की बात सुन बांसुरी चौंक गयी

  ” कहाँ हो तुम?”

  ” सामने ही तो हूँ …इतनी देर से सामने खड़ा तुम्हें खुद को ढूँढते देख देख के मुस्कुरा रहा हूँ …

बांसुरी चारों ओर देखती भी जा रही थी …

  “झूठे! कहीं नज़र तो आ नही रहे…एक तो तुम्हारा ये भूल भुलैया महल, मुझे तो यहाँ की सारी मीनारें सारे कमरे बाहर से एक से ही लगतें हैं…पता नही बाद में कैसे पहचानूंगी?”

  ” पहचान लोगी, मैं रहूँगा ना साथ में… तुम्हारा हाथ पकड़ के महल का एक एक हिस्सा घुमाऊँगा ।”

  ” वो तो जब घुमाओगे तब देखा जाएगा …अभी कम से कम नज़र तो आ जाओ।”

  ” उफ्फ़ देखो ज़रा! मेरी दुल्हन कैसी उतावली हुई जा रही है”

  ” रहने दो, नही देखना! मैं ज़ा रही अन्दर! आजकल कुछ ज्यादा ही भाव खाने लगे हो!”

  ” हुँ भी तो भाव खाने लायक!”

  ” वो तो मैं ही जानती हूँ कि किस लायक हो”

  ” अच्छा! ज़रा बताइये हुकुम!, किस लायक हूँ? ”

  ” बेशुमार बेईन्तिहा ढ़ेर सारा प्यार करने लायक”

  ” ओह्हो लेखिका जी आ गयी अपने मूड में, अपने ठीक सामने से ज़रा लेफ्ट की तरफ चेहरा करो और दूसरी मंज़िल पर देखो”

   बांसुरी झट उधर मुड़ गयी, सामने राजा बालकनी में खड़ा उसे देख शैतानी से मुस्कुरा रहा था….

  “अब खुश?”

  ” हम्म” उसे अचानक देख वो शरमा के भीतर जाने लगी__

  ” क्या हुआ? कहाँ जा रही हो? हो गया तुम्हारा?, उतर गया इश्क़ का बुखार?”

  ” हाँ उतर गया।” वो मुस्कुरा कर अन्दर चली गयी।

  उसके कुछ देर बाद ही रानी साहेब की सहायिकायें शाम को बांसुरी के पहनने वाले कपड़े गहने जेवर सब उसके कमरे में पहुंचा गईं।

   राजा के कहने पर वो अपनी बड़ी बहन वीणा अपनी माँ , ताई के साथ रानी साहब और दादी सा से भी मिल आयी…

  शाम में रूपा ब्युटिशियन के साथ बांसुरी के कमरे में चली आयी__

  ” इस सबकी ज़रूरत है क्या भाभी जी?”

  ” हाँ आप तो सुंदर हैं ही लेकिन हीरे को भी पहनने के पहले तराशना तो पड़ता ही है। है ना?”

  बांसुरी हाँ कह कर चुप रह गयी…कभी कभी उसे भी लगता कि राजा के प्यार में वो कहीं खुद को ही तो भूलने नही लगी थी।
    उसके अस्तित्व में इतनी एकाकार होती जा रही थी कि जैसे उसका उसमें कुछ था ही नही, कभी नही। वो तो हमेशा से सिर्फ उसकी प्रेयसी ही थी…कई जन्मों से।
   पर इस तरह खुद को भूलना भी कितना सुखद था, कितना मोहक!
   ना कोई नारी मुक्ति की फरियाद ना कोई आज़ादी की ललकार।
  उसने तो अपनी इच्छा से इस बन्धन को स्वीकारा था…
   राजा के विवाह प्रस्ताव रखने के बाद उसने एक घड़ी का भी समय बर्बाद नही किया था कुछ सोचने में और हाँ कह गयी थी….. जैसे सदियों से उसकी आत्मा बस राजा के इसी सवाल के इन्तजार में थी।
   ना उस वक्त उसे राजमहल की राजशाही याद आयी ना यहाँ के घुटन भरे कायदे कानूनों की जंजीरे…बस कुछ याद था तो उसका चेहरा और वो।
   जैसे राजा के सिवा सारा संसार उसके लिये बेमानी था__
 
  ” आप सोचती बहुत हैं?” रूपा की आवाज़ पर वो चौंक के अपने विचारों से बाहर आ गयी

  ” आप मुझे आप क्यों बुलाती हैं भाभी जी मेरा मतलब भाभी सा!”

   ” हमारे यहाँ हर किसी को आदर सम्मान दिया जाता है बाई सा,…रिश्तों में फिर गरीबी अमीरी नही देखी जाती।”

  ” फिर भी! आप चाहें तो मुझे तुम ही कहिये।”

  ” नही! हमें राजमहलों के कायदों की आदत है, और आप भी इनकी आदत डाल लीजिए वर्ना बाहर के लोगों के लिये ये सोने का घुटन भरा पिंजरा ही है बस।
  रेखा  का परिवार भी पहुंच चुका है …उनके पास हमारी फुफू सा की बहु जया को छोड़ कर हम यहाँ चले आये।”

  बांसुरी को रूपा की बातें समझ नही आयीं, वो उसके साथ प्रेम व्यवहार दिखा रहीं थीं या नाराज़गी उसकी समझ से परे था।

    अनुभवी ब्युटिशियन का हाथ लगते ही बांसुरी वाकई तपे कुंदन सी दमक उठी।
      सगाई के नियत समय के कुछ पहले ही बांसुरी के परिवार वालों को लेने प्रेम चला आया, प्रेम के साथ ही निरमा भी पहली बार महल में आयी। उसका मन तो सीधे बांसुरी के पास उड़ कर पहुंच जाने का था लेकिन प्रेम पहले उसे लेकर रानी साहेब से मिलवाने ले गया। दादी सा, काकी सा फुफू सा सभी से मिलने के बाद प्रेम उसे लिये बांसुरी के परिवार के पास चला आया।
सबसे मिल कर वो बांसुरी के कमरे की ओर बढ चली और बाकी लोगों को साथ लिये प्रेम सगाई वाले कक्ष की ओर।

   निरमा को देखते ही बांसुरी को राहत सी मिल गयी__

  ” अभी आने की फुरसत मिली है तुझे है ना?”

  ” हाँ यार क्या करती, ये सुबह तुम लोगों को लाकर छोड़ने के बाद ठाकुर साहब के परिवार को लेने चले गये।
   फिर वापस आते ही राजा भैया का फ़ोन आ गया कि कानपुर से उनके कुछ दोस्त आ रहें हैं, बस ये फिर उड़ गये उन लोगों को लेने। असल में सभी खास मेहमान थे इसिलिए इनका जाना भी ज़रूरी था…सुबह से बिना खाये पिये घूम रहे थे, इसिलिये इनका रास्ता देखती रह गयी और तेरे पास नही आ पायी।”

  ” हाँ भई अब किसी की दोस्त होने से पहले किसी की बीवी जो हो।”

  ” ऐसा कुछ नही है। तू ज्यादा सोच मत और सुन इधर आ तुझे नज़र का टीका लगा दूं, कहीं मेरी ही नज़र ना लग जाये।”

  मेनका के आकर आवाज़ देते ही वीणा और निरमा बांसुरी को साथ लिये सगाई वाले भवन की ओर बढ़ चले।

    सगाई के लिये दोनो पक्षों के पुरोहित एक तरफ आसन जमाये बैठे थे…

    शहर भर के पुराने रईसों के अलावा अलग अलग प्रदेशों रियासतों के राजवंश भी इस विवाह में सम्मिलित होने आने वाले थे….वहाँ के मंत्री नेता सभी इस चिरप्रतिक्षित विवाह के गवाह बनना चाहते थे, सभी का जमावड़ा विवाह के दिन ही होना  था…

    युवराज और काका सा ऐसे सारे डेलिगेट्स को  निपटाने की तैय्यारी पूर्व में ही कर चुके थे ……
     आज सगाई के लिये ज्यादा लोगों का बुलावा नही था, आज सिर्फ परिवारों और कुछ एक करीबियों की उपास्थिती में ही ओली आदी का कार्यक्रम होना था

समर और प्रेम वधु पक्ष के लोगों का ध्यान रख रहे थे…

राजा के साथ पढ़े दूर दराज विदेशों में बसे मित्र भी इतने छोटे अन्तराल में भेजे निमन्त्रण पर भी शादी वाले दिन पहुंचने वाले थे……

     नियत समय पर राजपूती अचकन में सजे दोनो रंगीले बन्ने अपनी अपनी केसरिया पाग संभाले कमर पे कटार लगाये मुस्कुराते हुए कक्ष में दाखिल हुए, रानी सा ने आगे बढ कर दोनो की नज़र उतार कर पास खड़े ढोली को दी और साथ खड़ी सेविका के कलश के दर्शन करवा कर दोनो को एक साथ लिये कक्ष में एक तरफ रखी गणपति की मूर्ति को माथा टिकवाने ले चली।
      रानी सा खुद गुलाबी मोतियों और सितारों से सजी राजपुतानी पोशाक में शानदार लग रहीं थीं। वैसे भी वो स्वयं कहतीं थीं कि राजपुताना अपने वीरों के गर्म खून के लिये जितना जाना जाता है उतना ही अपनी राजपूत रानियों की सुंदरता के लिये भी, इसिलिए अपने बनाव सिंगार से उन्हें विशेष प्रेम था।

   सगाई के लिये गिने चुने मेहमान ही बुलाये गये थे, ठाकुर साहब और तिवारी परिवार भी अपने परिधान में जम रहे थे…..
     
   विराट युवराज भैय्या के साथ ही मेहमानों की साज संभाल में लगा था, विराज का मामेरा ( मामा पक्ष)भी वहाँ मौजूद था, अपने उन्हीं ममेरे भाइयों और एक आध दोस्तों से मिलता जुलता विराज इधर उधर हो रहा था, वहीं राजा के मामा घर से भी पड़ला ले कर उसके नाना और मामा स्वयं आये थे….माँ अब नही थी तो क्या हुआ माँ का मायका तो ग्वालियर घराना था …जहां की मेहमान नवाज़ी सभी राजवंशों में सुप्रसिद्ध थी।
       आज की राजा की अचकन भी उसके नाना ही लाये थे।
     राजा उन सभी से पारी पारी मिलता आगे बढ़ रहा था कि कानपुर से आयी उसकी ताजातरीन मित्र मंडली पर उसकी नज़र पड़ गयी…प्रिंस और उसके दो चार चेलों को देखते ही वो उनकी ओर बढ़ गया__

  ” का भैया जी! मज़ाक मज़ाक में बहुते बड़ा महल खड़ा कर डाले।”

  ” अब क्या करें प्रिंस मज़ाक करने की हमारी आदत जाती जो नही।”
  हँसते हुए उसने प्रिंस को गले से लगा लिया, प्रिंस भी यारों का यार था, उसे कहीं से भी कृष्ण सुदामा वाली फीलिंग्स नही आ रही थी, क्योंकि राजा उसके लिये शुरु से उसका हीरो था उसकी कान्पुरिया बोली में भैय्या जी! राजा असली ज़िंदगी में भी राजा है ये तो प्रिंस को बहुत बाद में पता चला…
    शायद इसिलिए वो राजा का इतना करीबी हो पाया… राजा के शौक जो निराले थे…उसकी राजशाही  जान कर उससे प्रेम या मित्रता करने वाले उसे भाते भी कहाँ थे…वर्ना आज वो बांसुरी से कहाँ ब्याह कर रहा होता।

  ” तो भैय्या जी भौजाई कहाँ हैं?

  “बस आ रही होंगी ….

  ” भैय्या जी आपका तोहफा लेकर आयें हैं…

   राजा चौंक कर प्रिंस की तरफ देखने लगा, फिर चुपके से उसने उसे शांत रहने का इशारा किया और उसका हाथ थामे ही थोड़ा आगे कक्ष के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया।

    मुख्य द्वार पर फूलों का तोरण सजा था, एक किनारे शहनाई वाले थे, तो दुसरी ओर ढोली….
   कुछ देर में ही शहनाई ने अपने स्वर बदले और कुछ चार पांच सहायिकायें गुलाब की पंखुडियां बिखेरती चली आयीं…..
    उनके पीछे एक एक कर रूपा भाभी, जय की पत्नि यानी बुआ सा की बहू जया, काकी सा आदी के अन्दर प्रवेश करने के बाद दोनों सजीली बाई सा यानी बांसुरी और रेखा ने प्रवेश किया….
       रेखा ने जहां चांदी के रंग की पोशाक पहनी थी, बांसुरी सुनहरी पोशाक में थी।

   दोनों धीर मंथर गति से चलती स्टेज की ओर चली आ रहीं थी…वहाँ मौजूद सभी की निगाहें दोनो दुलहनों पर ही थी, लेकिन बांसुरी को पहली बार राजपूती पोशाक में देख कर राजा की पलकें ही झपकना भूल गईं थी__

  ” परसों से अपने कमरे में बैठा कर मन भर देख लेना”

  राजा के ठीक पीछे खड़े  समर की बात पर राजा झेंप गया__

  ” गिरते पड़ते चलने की आदत है इनकी, इसिलिए देख रहा हूँ कि इतनी लम्बी पोशाक में कहीं पैर फंसा के गिर ना जायें।”

  ” समझ सकता हूँ हुकुम।” समर मुस्कुरा कर आगे बढ गया….

    साथ ही लगे दो पाटों पर बांसुरी और रेखा को बैठा दिया गया।
   दोनों तरफ के पंडितों ने जल सिंचित कर कुमारी पूजा प्रारंभ कर दी….
    उनकी पूजा के बाद रानी साहेब ने आगे बढ़ कर पहले बांसुरी फिर रेखा के माथे पर तिलक लगा कर उन्हें कंगन चढ़ाये और उसके बाद उनकी ओली में कपड़े जेवर नारियल फल मिठाई डाल कर ओली भर दी।
   तिलक लगाते समय राजा साहब भी साथ ही थे, अपनी कटार उन्होने नेग स्वरूप बांसुरी और रेखा के सामने रखी जिसे शीश नवा कर दोनों बाई सा ने अपने होने वाले ससुर से आशीर्वाद लिया, उसके बाद महल भर की औरतें एक एक कर उन दोनों की ओली भर भर कर एक किनारे होती गईं।
   
   इस रस्म के बाद दोनो बन्नो का भी इसी तरह तिलक संपन्न हुआ और दोनो जोड़ों को सगाई के लिये हॉल के बीचो बीच बने गोलाकार स्टेज पर ले जाया गया।
    एक थाल रूपा ने तो एक थाल जया ने थाम रखा था।
   सोने की थालियों मे गुलाब की पंखुडियों के बीच छोटी छोटी गणपति की स्वर्ण प्रतिमा के दोनो ओर सगाई की अँगूठीयाँ रखीं थीं।

     दोनों जोड़ों को घेरे परिवार के लोग हाथों मे फूलों की पंखुडियां सम्भाले प्रतीक्षारत थे..
   रानी साहेब की पैनी नज़र रूपा की थाली पर पड़ी और उनके चेहरे का रंग उतर गया…उन्होने दोनो जोड़ों के लिये हैरी विंस्टन के हीरों की यूरोपियन अँगूठीयाँ खरीदी थीं लेकिन राजा की उंगली में पहनाई जाने वाली अंगूठी हीरे की ज़रूर थी पर हैरी विंस्टन तो नही लग रही थी….
    उन्होने एक तीखी नज़र बांसुरी पर डाली लेकिन फिर भीड़ भाड़ देख कर चुप लगा गईं।
    पंडितों ने मन्त्रोचार शुरु किया और राजा ने बांसुरी की और विराज ने रेखा की उंगली में अंगूठी पहना दी….
   बांसुरी ने एक नज़र राजा को देखा जैसे कुछ पूछ रही हो, उसकी आंखों से आश्वस्त हो उसने उसकी लम्बी सी उंगली में अपने पिता की खरीदी अंगूठी पहना दी, इसके साथ ही रेखा ने भी विराज को अंगूठी पहना दी।
    आस पास खड़े सभी लोगों ने दोनो जोड़ों पर पुष्प वर्षा करनी शुरु कर दी….रूपा ने आगे बढ कर राजा को मीठा चखाया और फिर वही टुकड़ा बांसुरी की ओर बढ़ा दिया, बांसुरी ने शरमा कर अपना मुहँ आगे कर दिया….
    दोनो जोड़े दादी सा का आशीर्वाद लेकर एक एक कर सभी बड़ों का आशीर्वाद लेने आगे बढ गये…….

    क्रमशः


aparna….



  



        





 

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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