जीवनसाथी-51

जीवन साथी–51



    सगाई के अगले दिन राजपरिवार को कुल देवी का आशीर्वाद लेने जाना था…. राज पुरोहित के द्वारा मन्दिर में करायी जाने वाली पूजा के बाद ही सभी मांगलिक कार्यक्रम शुरु होने थे, प्रेम भी निरमा को बांसुरी के पास छोड़ कर राजा के साथ निकल गया।

    बांसुरी का परिवार मायन और हल्दी की तैय्यारियों में लग गया।

   राजा और प्रेम के साथ प्रिंस भी उनकी गाड़ी में मौजूद था__

  ” भैय्या जी आपका गिफ्ट कब दें आपको, कुछ आधा अधूरा हम ले आयें हैं बाकी लल्लन भैय्या ला रहें हैं कल”

   गाड़ी में सिर्फ वही लोग मौजूद थे…

  ” लल्लन मेरा मतलब रोहित कब तक पहुँचेगा ?”

  ” कल सुबह पहुंच जायेंगे भैय्या जी, फेरे तो शाम के हैं ना आपके।”

   ” हाँ लेकिन अब यहाँ पूजा से लौटने के बाद मैं तो व्यस्त हो जाऊंगा…

   “कोई बात नही भैय्या जी ,हम सब कुछ सम्भाल कर रखे हैं, लेकिन एक बात कहना चाहतें हैं …आप अपने ही महल में सुरक्षित नही हैं, हमरी मानिये तो ब्याह के बाद भौजी को लेकर कहीं दूर चले जाइये…क्योंकि हमें लग रहा ब्याह के बाद भौजी भी महल में सुरक्षित नही रहेंगी।”

  ” कहना क्या चाहते हो प्रिंस?”

  ” भैय्या जी लल्लन भैय्या आप पर गोली चलाने वाले का पूरा हिस्ट्री निकाल कर भेजे हैं हमारे हाथ से…  पोथा पत्रा है पूरा.. हम वापस जाने से पहले आप को थमा देंगे…

  ” लिखा क्या है उसमें?”

  ” भैय्या जी वो तो पढ़े नही हम! पहला तो दूसरे का पिरेम पत्र पढ़ने की आदत नही और दूसरा….

  ” काला अक्षर भैन्सिया बराबर” प्रिंस की बात उसके चेले ने पूरी कर दी

  ” अच्छा बेटा! भैन्सिया नज़र आ रही तुमको ,दे खिंच के एक रेपटा …अभी गोरु गोबर सब नज़र आ जायेगा।

  राजा उन दोनो की चुहल सुन हँसने लगा__


  ” अरे काहे भड़क रहे हो प्रिंस! शेर भी कभी पढ़ाई करता है भला? और तुम भी यार क्या लगाये हो सुबह सुबह….प्रिंस वैसे ही गुणों की खान है।”

  ” भैय्या जी एक आप ही तो हैं जो इस नाचीज को समझतें हैं ….

  “नाचीज़ होता है भैय्या जी” वही चेला एक बार फिर चहका

  प्रिंस उसे घूरता उसके पहले ही प्रेम ने गाड़ी मन्दिर परिसर में एक किनारे कर रोक दी।
    मन्दिर में पूजा संपन्न होते तक प्रेम और उसके लड़के मन्दिर परिसर के चारों ओर नज़र रखे हुए थे।

    मन्दिर से वापस आते ही महल की सभी महिलाओं को साथ लिये रानी साहिब चाक पूजा के लिये महल के बगीचे में मन्दिर के पास चली गईं….
   इस पूजा में विशेष रूप से कुम्हार को बुलाया जाता है….रानी साहिब ने गांव के सभी कुम्हार परिवारों को न्योता भेज दिया था….बड़ा सा बगीचा कुम्हार जोड़ों से भरा हुआ था, ये सभी लोग मिट्टी के बने गणपति, कलश और अपने औजार साथ लेकर आये थे।
   सभी के लाये कलशों को विषम संख्या में सजाने के बाद वो सभी बैठे रानी सा की बाट जोह रहे थे।
  आते ही रानी सा ने गणपति पूजन के बाद कुम्हारों के हाथों में खुद अपने हाथों से कलावा बांधा और सभी को कपड़े जेवर बताशे मिठाइयाँ धान गुड मौली दान में देने के बाद अपना कंठ हार निकाल कर वहाँ रखे एक कलश को पहना दिया, उनके पीछे महल की शेष महिलाओं ने भी अपने अपने जेवर कलश को पहनाये और हल्दी कूटने का नेग करने चली गयी।

   बड़ी धूम धाम से दोनों सजीले बन्नों की हल्दी रस्म हुई ….हालांकि जब से प्रिंस से बात हुई थी राजा का मन अस्थिर हुआ जा रहा था, उसे विराज पर कभी भरोसा नही था…अन्दर ही अन्दर वो भी जानता था कि उसके ऊपर हुए हमलों के पीछे विराज ही है लेकिन एकदम से ये बात दुनिया के सामने आ जाये ऐसा वो नही चाहता था….
   मन ही मन उसने ठान ही लिया कि जो भी हो जाये पर वो गद्दी पर किसी कीमत पर नही बैठेगा।
     उसने एक नज़र पास बैठे विराज पर डाली , विराज खुद में मगन रूपा भाभी और जया भाभी के साथ चुहलबाज़ी में लगा हुआ था।
    उसके हँसते खिलखिलाते रूप को देख कर कोई सोच भी नही सकता था कि विराज उसके लिये मन में इतना पाप लिये बैठा है।

   शाम को मेहंदी की रस्म महल के पीछे वाले बगीचे में होनी थी…तीनों परिवारों की मेहंदी साथ ही होनी थी इसिलिए बगीचे को उसी के हिसाब से सजा लिया गया था…
      बांसुरी के हाथ में मेहंदी वाली मेहंदी लगा रही थी__

  ” के नाम लिख दूं बाई सा?”

  दिन भर में पचास बार राजा का नाम लेने वाली बांसुरी शर्म से अभी उसका नाम नही ले पायी।

  ” कुंवर सा का नाम नही जानती क्या?”

  मेनका की बात सुन मेहंदी वाली मुस्कुरा उठी__

  ” दोनों कुंवर सा का एक ही रोज़ ब्याह हैं ना? दोनो में से किसका नाम लिखूं, ये पूछ रही?”

  ” राजकुमार अजातशत्रु!” चट से बांसुरी ने कहा और उसके उतावलेपन पर वहाँ बैठी सभी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी…..

  राजा अपने कमरे से प्रेम के साथ निकल ही रहा था कि किसी ने आकर बताया कि उससे मिलने कोई आया है।
   बाहर दीवान खाने में उसने देखा लल्लन उसका इन्तजार कर रहा था…..
   लल्लन से मिल कर राजा उसे अपने कमरे की तरफ लेकर जा ही रहा था कि उसकी बुआ का लड़का विजय उसे बुलाने चला आया, उसे किसी तरह समझा बुझा कर वापस कर राजा अभी कमरे तक पहुंच ही पाया था की रानी साहेब के सन्देश के साथ एक बार फिर उनकी सहायिका मौजूद थी।
  लल्लन को अपने कमरे में तैय्यार होने छोड़ कर राजा मेहंदी रस्म के लिये चला गया।
  लल्लन के तैय्यार होते ही उसे लिये प्रेम और प्रिंस भी वहीं पहुंच गये।
     दुलहनों के हाथों में मेहंदी सज रही थी, एक हल्के से रेशमी पर्दे की ओट के दुसरी ओर दूल्हे भी बैठे थे।
    एक किनारे बने स्टेज पर तरह तरह के कलाकार अपने नृत्य गीत प्रदर्शन में लगे थे…लेडीज़ संगीत का कार्यक्रम था लेकिन राजपूत औरतें दूसरें मर्दों के सामने भला कैसे नाच गा सकती थीं।
    मन तो रेखा का भी ठुमकने का हो रहा था पर अपनी माँ की तीखी नजरों से सहमी वो चुप बैठी थी।  राजा के कुछ कॉलेज के दोस्त अब तक पहुंच चुके थे जो राजा की गायकी से परिचित थे सब के सब उसके पीछे पड़ गये लेकिन रानी साहेब के सामने वो आज तक नही गाया था, इसिलिये ना उसे गाना था ना उसने गाया….लेकिन जब उन्हीं दोस्तों की फौज ने बांसुरी को गाने के लिये कहा और बांसुरी ने राजा से आंखों ही आंखों में पूछा तो उसने पलकें झपक कर उसे गाने को सहमती दे दी__

    ” ये कौन आया लगे मन भाया
      ज़िंदगी के पास मुझे कौन ले आया
     ओ रब्बा कोई तो बताये चैन होता है क्या
      जैसा मेरा खो गया, सबका खोता है क्या?
     

   बांसुरी के गीत पर बजने वाली तालियों ने रेखा के मन में भी कुलबुलाहट मचा दी….

    चुपके से रूपा भाभी से सलाह मशविरा कर अगले गीत पर वो अपनी सखियों बहनों के पीछे धीरे से उठ कर खुद भी ठुमके लगाने लगी__

” नाराज ना होना बहुरानी, आजकल की लड़कियाँ है नाचना गाना इनके खून में होता है, और वैसे भी अभी सबसे छोटी बहु यही बन रही है।

   रानी साहेब के बाजू में बैठी दादी सा ने उनके बदलते तेवर देख बात संभाल ली। रानी साहेब तेज़ कितनी भी हों अभी भी अपनी सास का कायदा करती ही थीं इसीसे एक आग्नेय दृष्टी रेखा पर डाल कर चुप लगा गईं।

   रेखा घूमर पर झूम झूम कर घूमर कर रही थी कि प्रेम और प्रिंस के पीछे आते एक लम्बे गोरे से लड़के पर उसकी नज़र पड़ी और उसके पैर जैसे खुद ही थिरकना भूल गये….वो उसे देख सोच में पड़ गयी कि…..आखिर रोहित का इस राजभवन से क्या संबंध है?

   उसकी नज़र रोहित पर पड़ी,रोहित की उस पर और उसके बाद वो एक कदम भी नाच नही पायी, धीरे से अपना घूंघट संभालती वो रूपा भाभी सा के एक ओर जाकर बैठ गयी, रोहित ने एक नज़र उसे देख कर मुहँ फेर लिया …और किसी का ध्यान तो इन दोनो पर नही गया लेकिन रूपा भाभी की तीखी नजरों से ये भी नही बच पाये__

  ” क्या हुआ बाई सा? एकदम से रूक गईं आप?”

  ” कुछ नही भाभी सा, ज़रा सर घूम गया था।”

  ” जी ज़रा खुद को संभाले रखिये , कल फेरे होने हैं आपके….किसी की नज़र नही लगनी चाहिये आखिर आप ही तो होने वाली रानी साहेब हैं।”


” जी ” अभी तक रास रंग में खोयी रेखा का मन फिर किसी बात में नही लगा, उसके सामने ही एक ओर विराज उसका होने वाला पति बैठा था और दुसरी ओर रोहित था, इंस्पेक्टर रोहित! जिसके साथ जाने कितनी मीठी यादें वो बनारस में छोड़ आयी थी।
   सभी कुछ तो उसी की ज़िद थी, रोहित को पाना भी और छोड़ना भी।
   खैर वो जितना रोहित को जानती थी वो कभी अपने मुहँ से उसकी कोई बदनामी यहाँ नही होने देगा, वो अगर अभी यहाँ आया भी है तो उसके कारण तो नही ही आया होगा।
    अपने विचारों से निकल कर वो पास बैठी मेहंदी वाली से अपने हाथ में लिखा नाम विराज सही करवाने में लग गयी।

   उस रात सारे रीति रिवाज होते खाना निबटते आधी रात गये राजा अपने कमरे में पहुंच पाया, सारा वक्त आसपास कोई ना कोई था इसी से प्रिंस या रोहित से उसकी कोई बात नही हो पायी थी, और असल बात यह भी थी कि शायद कहीं ना कहीं वो भी सच्चाई से भागना चाहता था, और शादी जैसे मौके पर सच्चाई जान कर वो अपना मन खट्टा नही करना चाह रहा था, हालांकि आज नही तो कल रोहित उसे सारी सच्चाई से रुबरु कराने ही वाला था।
   रोहित प्रिंस उसके बाकी दोस्तों के साथ मेहमानों वाले हिस्से में रुके थे।
    रात इतनी बीत चुकी थी कि बांसुरी से भी एक दो बातें कर के वो सो गया।
   अगले दिन उनके जीवन का सबसे स्वर्णिम दिन आने वाला था, उनके विवाह का दिन…उनके स्वप्नों के पूरा होने का दिन।


********

अदिती की माँ की तबीयत में कुछ बहुत अधिक सुधार तो नही हुआ था लेकिन अब वो इस स्थिति में थीं कि उन्हें चौबीस घण्टे एक नर्स की निगरानी में घर पर रखा जा सकता था, ये सुनते ही उन्होने वापस लौटने की ज़िद पकड़ ली__

” शुरु से ही बहुत ज़िद्दी हो, हमेशा अपने मन की ही करती आयी हो। कभी सुनी है क्या किसी और की?”

  अदिती के पिता की बात पर वो मुस्कुरा कर रह गयी

” अब अन्तिम पड़ाव है मेरा, अब तो खुशी खुशी हर ज़िद पूरी कर दो।”

  ” कोई और रास्ता बचा है क्या?” उन सभी को वहाँ छोड़ वो डिस्चार्ज पेपर तैय्यार करवाने बाहर डॉक्टर के पास चले गये।

   शाम तक में हॉस्पिटल की सारी औपचारिकता पूरी कर वो लोग घर चले आये।
  भास्कर की छुट्टियाँ भी खत्म होने को थीं__

” अदिती मैं सोच रहा हूँ, अपने पेरेंट्स को एक बार बुला लेता हूँ,तुमसे मिलना भी हो जायेगा और हमारी शादी की डेट भी तय हो जायेगी, देखो और देर करना सही नही है ना?”

   भास्कर की बात पूरी होने तक में अदिती के पिता भी वहीं चले आये__

” सही कह रहे हो भास्कर! लेकिन एक बार अपने पेरेंट्स को हमारे बारे में सब कुछ बता देना।”

” ओह्ह प्लीज़ अंकल ! ऐसी कोई बात नही होगी, आप चिंता ना करें।”

” बेटा चिंता तो अब साथ नही छोड़ने वाली, ज़िंदगी भर यही टीस रही कि हम साथ क्यों नही चल पाये… अगर कहीं वो आगे निकल गयी थी तो मैं ही कदम जल्दी बढ़ा लेता या मैं पीछे रह गया तो वो ही दो कदम ठहर कर मेरा इन्तजार कर लेती….पता नही गलती किसकी थी और क्यों हुई? लेकिन बस हो गयी। शायद हमारा नसीब ही ऐसा था।
   ज़िंदगी आसान नही होती , ये कदम कदम पर इम्तिहान लेती है तुम्हारा, यहाँ तक की उस वक्त भी जब तुम सब से ज्यादा खुश रहते हो उस वक्त भी ज़िंदगी यही जांच रही होती है कि अपनी सफलता तुम पचा सकते हो या नही।
   सुनने में शायद मेरी बातें तुम्हें अजीब लग रही होंगी, लेकिन अब जाकर जो बात समझ आयी वो यही है… हर हाल में हर परिस्थिती में ऊपर वाले का शुक्र मनाओ , जितना हो सके लोगों को माफ करते चलो , सबसे प्यार करते चलो जाने कब मझधार में कोई अपना साथ छोड़ जाये…
   और उस तरह किसी के चले जाने के बाद हमारे पास उसकी चंद तस्वीरों और यादों के अलावा क्या बचता है, कुछ भी तो नही।
   फिर क्यों हम उस वक्त जब वो हमारे करीब होता है उसे इस बात का एहसास नही दिला पाते कि वो हमारे लिये कितना महत्वपूर्ण है, क्यों हम उसे इतना फ़ॉर ग्रान्टेड ले लेते हैं।
   काश किसी के साथ छोड़ जाने के पहले ही हम इस सच्चाई को समझ ले तो रिश्ते कितने मीठे हो जायेंगे और ज़िंदगी कितनी आसान।”

  अदिती के पिता अपनी रौ में बोलते चले जा रहे थे, लेकिन भास्कर की आंखें भीग गयी थीं, वो भी तो अनजाने में बांसुरी के साथ यही कर बैठा था। उसने अपने और बांसुरी के रिश्ते की डोर को कभी प्यार से संभाला ही नही, रिश्ता तय होने से पहले वो उसका बॉस था और सगाई के बाद भी बॉस ही बना रहा, प्रेमी बनने की तो उसने कभी सोची ही नही।
  अपने गर्व में घमंड में उसने डोर इतनी कस के अपनी ओर खींच ली कि बांसुरी सम्भालते संभालते भी कहाँ संभाल पायी, आखिर चट से वो डोर टूट गयी और ऐसी टूटी की सारे मोती यहाँ वहाँ बिखर गये…
    इतनी प्यारी लड़की के साथ वो क्यों ऐसा निष्ठुर होता चला गया…फ़ोन में किससे बात कर रही थीं? ये किसे मेसेज भेजा ? ये मिस्टर खान के नाम से किसका नम्बर सेव कर रखा है? इतनी छोटी स्कर्ट तुम नही पहनोगी? अब सगाई हो गयी है ढंग के कपड़े पहना करो? ये क्या इतना डीप नेक कोई पहनता है भला, अपने टेलर से इसमें कपड़ा लगवा लो और सुनो अब कोई लेडी टेलर ढूंढ़ लो मुझे तुम्हारा जेंट्स टेलर के पास जाना पसंद नही….सच में उसने कैसे उसे परेशान कर रखा था …भले ही होने वाला पति था लेकिन उसकी नामौजूदगी में उसके फ़ोन के मेसेज और कॉल चेक करने का क्या अधिकार था उसे?
    और वो बेचारी हर बात चुपचाप हाँ हूँ कर मान ही जाती थी, बस मिस्टर खान के नाम पर भड़क उठी थी क्योंकि उसे खुद याद नही था कि किसका नम्बर है? आखिर उसके सामने ही उसने उस नम्बर पर कॉल लगा लिया था, ऑफिस मे ए सी रिपेयर करने वाला बंदा निकला था जिसका नम्बर उसने ही बांसुरी के मोबाइल पर कभी सेव करवाया था।
  उस बात के बाद बेचारी की आंखों में आंसू आ गये थे लेकिन वो कहाँ पिघला था? अपने जूतों की सोल चट चट बजाता उसके सामने से निकल गया था।
कपड़े भी तो उसी के हिसाबों के ही पहनने लगी थी वो__

  ” क्या सोच रहे हो भास्कर?”

  अदिती जाने कब उसके पास आकर बैठ गयी, उसके हाथ में चाय का कप थमाते हुए उसने भास्कर से पूछ लिया__
   किसके बारे में सोच रहा था ये वो क्या अब अदिती को बता सकता था।
    कल तक जब अदिती सिर्फ दोस्त थी वो बड़े आराम से उसके सामने अपना दिल खोल के रख सकता था, तब उसने कभी अदिती से अपने मन की कोई बात नही की तो अब तो वो उसकी प्रेयसी थी, क्या अब अपने मन में बांसुरी के लिये जागती दुर्बलता वो उससे कह पायेगा…नही कभी नही।
   ये इन्सान का मन क्यों उसके बस में नही होता… कल तक अदिती के लिये इतनी ममता और स्नेह जाग गया था , आज भी प्यार अदिती की तरफ ही था लेकिन एक अलग सी दया भावना बांसुरी के लिये जो जागने लगी थी उससे भास्कर खुद डर गया।
     भले ही बांसुरी के लिये सिर्फ एक पश्चाताप ही जागा हो पर अब उसके लिये अपने मन में जागी कोई भावना वो अदिती से नही बता सकता था।
    सब कुछ सही चलता हुआ भगवान को क्यों पसंद नही आता। वो अदिती को कोई धोखा नही देना चाहता था। अपने मन में अब चुपके से भी बांसुरी को नही आने देना चाहता था…
   उसने अपने मन के विचारों को एक झटके में खुद से दूर किया और सामने बैठी अदिती को गले से लगा लिया__

  ” मैं तुमसे तुरंत शादी करना चाहता हूँ अदिती!”

  ” भास्कर ! तुम ठीक हो ना?”

” मैं अब और अकेले नही रह सकता, मैं आज ही माँ को फ़ोन कर रहा हूँ, कल उन लोगों के आते ही परसों शादी कर लेंगे”

  ” ओके बाबा! रिलैक्स, सब ठीक है अभी। मॉम भी ठीक हैं, सबसे पास की ही डेट निकाल लेंगे।”

  ” नही मैंने कहा ना परसों यानी परसों। फिर कहीं मेरा मन बदल गया तो मत दोष देना।”

  ” अच्छा जी ! तो ऐसी बात है मन भी बदल सकता है आपका! तब तो फिर देख ही लिया जाये कि क्या मन है आपका?”

  ” मज़ाक कर रहा था यार! अंकल की बातें सुन कर थोड़ा सेंटी हो गया था।”

  ” चलो कोई नही! आओ तुम्हें अपना छोटा सा शहर घुमा कर लाती हूँ …पहाड़ों पर बसा बहुत प्यारा शहर है मेरा।” बच्चों सी मचलती अदिती को देख भास्कर एक बार फिर उसकी मुस्कान में खो गया।

  दोनो साथ साथ पहाड़ी मन्दिर की ओर निकल चले।
   
********
     दोनों दूल्हों के पलड़े सजाये दूल्हों के भाई रानी माँ से आशीर्वाद लेने पहुंच गये, सभी को तिलक कर के रानी साहेब ने घरातियों के लिये भेज दिये….

   बांसुरी और रेखा के रुकने वाले महल के सामने के खुले आंगन में दोनों वधुओं के लिये पांच सौ एक पलड़े सजे थे…राजपूत रस्मों के अनुसार पड़ला देखने के बाद ही दुलहन तैय्यार होती हैं।
    इनमें दुलहन के लिये पोशाक ,साड़ियाँ, नारियल मौली बताशे लौंग इलायची मिठाइयाँ फल के साथ ही हरा धनिया और पुदिना भी था__

  ” जे का पर्मिला, लाड़ो की सास ने जे धनिया पुदिना काहे भेजा है? सिल् बट्टा और भेज देती तो हम लाड़ों के साथ बिदाई में चटनी पीस भेज देती।”
   इतना सारा साजो सामान देख कर सभी की आंखें फटी जा रहीं थी, बुआ जी की प्रसन्नता हर ओर छोर से बह रही थी।

  ” बुआ जी हरा धनिया और पुदिना इस बात के संकेत स्वरूप भेजा जाता है कि बन्ना बन्नी का भविष्य भी ऐसे ही हरियाला हरा भरा रहे।”

  पलड़ों को लाल रेशमी वस्त्रों से ढ़के पाटों पर सजाते हुए जय ने बुआ जी की शंका का समाधान कर दिया।
विवाह राजसी था इसिलिए हर वस्तु राजसी थी, सभी सामान हाथियों पर लाद कर लाया गया था।
    देखने वाले देख देख थक रहे थे पर सजाने वाले सामान पर सामान सजाते चले जा रहे थे।
  पांच सौ से अधिक सोने की थालियों में कपड़े, जेवर, बरी, गठजोरा, चूड़ा सिंदूर चुकिला बिनौटे सजे थे। तरह तरह के रानिहार थे आड़ थी कंगन झुमके अँगूठीयाँ चूडियाँ और थी सोने की पायलें__

” लाड़ो अब कर लियो अपना सोने की पायल पहनने का शौक पूरा।”
   थालियों का सामान खाली करती ताई चहक उठी__


” तेरी तो पाजेब भी सोने की चढ़ी है।”  हँसी ठिठोली करती औरतें सारा साजो सामान सहेज कर दुलहन को तैय्यार करने चली गईं।
    आज शाम के फेरे थे, बांसुरी को तैय्यार करने रूपा भाभी ने पार्लर वाली भेज दी थी और खुद अपने कमरे में तैय्यार हो रही थीं।
   बांसुरी को ब्राम्हणों की रीत के अनुसार उसकी ताई ने व्रत करवा दिया था, उनके अनुसार व्रति कन्या का ही दान किया जाता है वो भी व्रत रख कर। इसलिये बांसुरी के साथ साथ उसके माता पिता ताई और ताऊ जी का भी व्रत था….
   रानी साहेब ने हर फंक्शन के लिये एक सौ एक पकवानों की लम्बी लाइन लगवाई थी जिसे कई मौकों पर अपने रीति रिवाजों के कारण तिवारी परिवार ने झांका तक नही था।
    मातृका पूजन में भी परिवार की औरतों ने बड़ा और कढ़ी खुद ही बनाई थी नियमानुसार…हालांकि इन नियमों से तिवारी परिवार ने पहले ही रानी साहब को अवगत करवा दिया था।

   बांसुरी आईने के सामने बैठी निरमा का रास्ता देख रही थी, आखिर झुंझला कर उसने उसे फ़ोन लगा ही लिया__

  ” कहाँ हैं तू? अभी तक फुरसत नही मिली ना?”

” अरे आ रही बाबा! बस थोड़ा फलाहार बना रही थी इसलिये देर हो गयी, बस दस मिनट में तैय्यार होकर पहुंच रही हूँ।”

  ” मेरे फेरों के दिन तू फलाहार करेगी?”

  ” अरे नही ! अब तुझे ना तेरे राजा जी के अलावा कुछ याद तो रहता नही, तेरा और चाचा जी चाची जी का भी फास्ट है ना ताऊजी और ताई जी का भी, तो तेरे प्रेम भैय्या ने मुझसे कहा कुछ फलाहार बनाने को।”

  ” ओह्ह अच्छा! यार मुझे तो सच ये भी ध्यान नही रहा कि मैं सुबह से भूखी हूँ।”

  ” हाँ बेटा अब तो तू आज रात फेरे हो जायें फिर सीधे सुहाग की थाली खाना अपने राजपूताने में…चल अब बातों में मत उलझा, मैं तैय्यार होने जा रही।”

   सारा खाना पैक करने के बाद निरमा ऊपर चली गयी…..
    तैय्यार हो कर वो साड़ी पहन  चुकी थी, बस ब्लाउज में पीछे लगी डोरी बांधनी बची थी….उस दिन शॉपिंग मे उसने  दर्ज़न भर रेडीमेड डिजाइनर ब्लाउज खरीद लिये थे ये नईं जगह थी, यहाँ टेलर ढूँढना कपड़े सिलवाना एक अलग मुसीबत थी, लेकिन ये डिजाइनर ब्लाउज भी एक नयी मुसीबत बने उसे मुहँ चिढा रहे थे। डीप नेक के नाम पर खूब कपड़ा बचा लिया था डिजाइनर ने और फिर उसी नेक को सम्भालने रेशमी डोरियां और टाँक दी थी, खुद से होकर पीछे हाथ कर ये डोरी बांधना बड़ी आफत थी, जिसके लिये उसने दो तीन बार अम्मा को आवाज़ लगाई और जब नीचे से कोई आवाज़ नही आयी तो उठ कर उन्हें बुलाने ही जा रही थी कि प्रेम धीरे से अन्दर चला आया__

  ” क्या हुआ अम्मा को बुला रही थीं आप?”

” हाँ वो कुछ काम था।”

” वो तो शाम से ही महल चलीं गईं हैं आज वहाँ काम बहुत है ना”

  दूर से झिलमिलाता महल नज़र आ रहा था, उसकी रोशनी देख निरमा मुस्कुरा उठी

  ” मैं कुछ मदद कर सकता हूँ क्या?”

  पूछ कर वो चुपचाप खड़ा हो गया…सुबह से वो जो महल के लिये निकला था अभी दस पन्द्रह मिनट पहले ही वापस तैय्यार होने आया था।
   निरमा खुद सुबह हल्दी मेहंदी के बाद बांसुरी के बहुत रोकने पर भी घर चली आयी थी। जाने क्यों आजकल उसे यही अपना घर अपना कमरा ही भाने लगा था, जब बहुत थकान लगने लगती तब वो कहीं बाहर ज्यादा देर  नही रह पाती थी। दोपहर में घर आ कर उसने कुछ एक आध घण्टे की नींद भी पूरी कर ली थी इसलिये अभी उसे फ्रेश लग रहा था।
   खुद जब तैय्यार होने जा रही थी उसी वक्त जाने क्या सोच कर वो अपनी शॉपिंग के साथ खरीदी शर्ट और पैंट प्रेम के कमरे में धर आयी थी…
    पहनने का मन हुआ तो पहन लेगा, और नही भी पहना तो भी कौन सा आसमान फट जायेगा।

  लेकिन ये क्या, वो तो नहा धोकर जिन कपडों को निरमा निकाल कर रख आयी थी वही पहने उसके सामने खड़ा था, कुछ देर को वो उसे देखती रह गयी, फिर तुरंत ही पलट कर सामने आईने की तरफ बढ गयी__

  ” नही कोई काम नही ,आप चलिये मैं बस पांच मिनट में आयी।”
    अपने ही हाथों से डोरी को बांधने की कोशिश कर रही थी कि वो उसके ठीक पीछे आकर खड़ा हो गया, धीरे से उसके हाथों से रेशमी डोर को पकड़ उसने उसमें गांठ लगा दी।
    कितना अद्भुत स्पर्श था,कितना कोमल! निरमा ने चेहरा ऊपर किया,कि शायद वो पीछे ही खड़ा होगा पर गांठ लगाने वाला गांठ लगा कर जा चुका था।
   मुस्कुरा कर पलंग पर पड़े अपने पर्स को उठाये वो भी उसके पीछे पीछे नीचे उतर गयी….

क्रमशः

aparna..

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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