जीवनसाथी-52

जीवन साथी -52


      शाम के चार साढ़े चार हो रहे थे…रतन अपनी सीटिंग्स में बहुत मज़बूत था, एक बार पढ़ने बैठ जाने के बाद उसे ना वक्त का होश रहता ना खाने पीने का लेकिन पिंकी उससे थोड़ी उलट थी…
   वो लगातार बैठ नही पाती थी, लगभग हर आधे एक घण्टे में उसे उठ कर एक चक्कर लगाने की आदत सी थी…कभी रसोई कभी वॉशरुम कभी छत कभी बालकनी….उड़ती तितली सी घर का एक चक्कर लगा कर फिर किताब खोल लेती…
   उसका रोज़ का यही हाल था, लेकिन आज उसकी बेचैनी का कारण दूसरा था….आज उसके सबसे प्यारे भाई की शादी थी वो भी उसकी प्यारी सहेली बांसुरी के साथ।
    राजा भैय्या और बांसुरी की शादी!
     उसके भी सपनों की शादी… दोनों की प्रेम कहानी पता चलने पर उसने भी कितने सपने देख लिये थे , वो अक्सर ही राजा को बांसुरी के नाम से छेड़ा करती थी __

   ” भाई गृह प्रवेश के समय बांसुरी के लहंगे की मगजी में मैं ही नथ टांकूंगी और निकलवाने का लम्बा सा नेग निकलवाऊंगी आपसे ।”

  और उसका भाई हँस के उसके सर पर हाथ रख देता था__

  ” मेरी लाड़ो पूरा महल तेरा है ,तू कहे तो तेरे दूल्हे को ही अपने यहाँ का राजा बनवा दूंगा”

  ” अच्छा बड़े आये राजा बनाने वाले? आपके ब्याह से पहले मैं ससुराल नही जाने वाली, समझे। हर एक रस्म का डबल ट्रिपल नेग वसूलने के बाद अपनी शादी का सोचूंगी ….उसके पहले अपनी लाड़ली भाभी सा से थोड़े नखरे तो दिखा लूं”

  ” जो जी में आये कर लेना प्रिंसेस! तुझे रोका किसने है।”

दोनो भाई बहन का रिश्ता ही कुछ अलग सा था , कभी राजा उसके लिये पिता समान था तो कभी दोस्त, कभी गाईड तो कभी गुरू और आज उसके सबसे खास दिन पर वो उसके पास नही थी।
   कभी कभी परिस्थितियां क्यों ऐसी लाचारगी पैदा कर देती हैं कि हर एक सांस बोझिल सी हो उठती है।

      उससे कहाँ गलती हुई थी आखिर, एक ऐसा लड़का जिससे उसके विचार शौक आदतें मिलती थी, उससे प्यार कर लेना कितना बड़ा गुनाह हो गया था, सिर्फ इसलिये क्योंकि वो उसकी जात का नही था।
  आज कैसे मझधार में खड़ी थी वो, ना उससे पूरी तरह अपने रिश्ते नाते छोड़े जा रहे थे ना अपनी राजसी आदतें और रतन को तो छोड़ने का सवाल ही नही उठता था।

  जिंदगी कभी परियों की कहानियों सी सहज सरल क्यों नही होतीं, हर एक सीधे रास्ते के बाद क्यों एक अँधा मोड़ मुहँ बाये खड़ा होता है।
   लगभग चार पांच दिन से राजा रोज़ ही रात को उसे फ़ोन कर के बात कर रहा था, पर सिर्फ कुछ घड़ी बात कर लेने से या विडियो कॉल पर एक दूजे को देख लेने से मन कहाँ भरता है, साथ में रहना अलग ही होता है।
  आज भाई के फेरे थे और यही सोचती वो बालकनी में उदास खड़ी थी कि रतन दो कप में चाय लिये उसके पास चला आया….

” राजा भैय्या आयेंगे शोना तुझसे मिलने ।”

  ” पर रतन अभी का क्या करूं। बहुत याद आ रही सब की। भाई अपनी शादी की शेरवानी में बिल्कुल हीरो लगेंगे ना …मुझे तो पूरा महल देखने का मन है, माँ काकी सा फुफु सा,रूपा भाभी जया भाभी और सबसे ज्यादा तो बाँसुरी हमारी ट्रेडिशनल पोशाक में सब कितनी सुंदर लग रहीं होंगी ना , माथे पर लगा बोर नाक पर बड़ी सी गोल नथ और हाथ भर चूड़ा, मैं तो ये सब पहन भी नही पायी।”

  बनावटी गुस्से से उसने रतन को एक बार देखा __

” पोस्टिंग मिल जाये उसके बाद एक बार और शादी करेंगे बाबू! फिर अपने सारे शौक पूरे कर लेना, हो सकता है तब तक तुम्हारे घर वालों के मन भी पिघल जायें”

  ” काकी सा की जनरेशन तक तो ये बर्फ पिघलनी मुश्किल ही है रतन …आओ चाय पी ले ठंडी हो जायेगी, उसके बाद तुम मुझे कोंस्टीट्यूशन पढा देना!”

  ” जी हुकुम! पढा दूंगा, और कोई आज्ञा?

  ” एक और बात! आज रात खाने के लिये हम कहीं बाहर जा सकते हैं क्या? आज भाई की शादी वाले दिन तो कुछ ढंग का खिला दो ,वही रोज़ रोज़ का खिचड़ी दलिया खिला खिला के पका दिया है तुमने।”

  रतन पिंकी की बात सुन ज़ोर से हँस पड़ा __

  ” अब यार जो चीज़ जल्दी बनेगी मैं तो अपनी पारी में वही बनाऊँगा ना, चलो ठीक है आज अपनी प्रिंसेस को हम बाहर रॉयल डिनर के लिये लेकर जायेंगे।”

  दोनो चाय पी रहे थे कि घर की डोर बेल बज उठी। रतन  दरवाज़ा खोलने गया तो पार्सल आया हुआ था, वो पार्सल संभाले भीतर चला आया__

” मेरे नाम से कोई पार्सल है।”

  ” मन्गवाई होंगी तुमने कुछ और किताबें।”

  ” नही अभी मैंने तो कुछ ऑर्डर नही किया। ” पार्सल आश्चर्य जनक रूप से बड़ा था, रतन के पार्सल खोलते ही दोनो के चेहरों पर मुस्कान थिरक गयी….
   पार्सल में रतन के लिये अचकन और पिंकी के लिये हल्के हरे रंग की सुंदर सी पोशाक के साथ कुछ जेवर भी थे …और थी राजा की चिट्ठी__

  ” मेरी प्यारी छुटकी
   तुम्हारे बिना ये रस्में बहुत फीकी हैं,  लेकिन निभानी तो पड़ेंगी वरना अपनी पंडिताईंन को महल में कैसे लेकर आ पाऊंगा।
   हर रस्म में हर रिवाज में तू मुस्कुराती नज़र आ रही है मेरी बहना।
    जल्दी ही मिलने भी आऊँगा। गिफ्ट रैप मे एक डिनर कूपन भी है ताज का… रतन सा आज के दिन थोड़ा समय निकाल कर पिंकी को कुछ देर के लिये ही सही बाहर ले जाना , वर्ना जानता हूँ वो पढ़े लिखे बिना बस इधर उधर की सोच कर अपना और आप का समय खराब करेगी।
   घोड़ी चढ़ने के पहले फ़ोन करूंगा

  राजकुमार अजातशत्रु सिंह!”


   पिंकी की आंखें भर आयी, इतना व्यस्त होने के बाद भी कैसे उसका भाई उसके लिये समय निकाल ले रहा था, रतन ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया।

   *******

  निरमा को बांसुरी के पास छोड़ कर प्रेम राजा के पास चला गया …बांसुरी को तैय्यार करने दो दो पार्लर वालीं लगी थी, और बांसुरी उदास सा चेहरा लिये खुद के ही चेहरे को आईने में निहारती बैठी थी__

  ” अब क्या हुआ? क्यों ऐसी शकल लटका के बैठी है?”

   बांसुरी ने निरमा को देखा और झट उसका हाथ पकड़ लिया__

  ” अब बहुत डर लग रहा है नीरू… पता नही कैसी घबराहट सी हो रही है।”

  ” होती है बंसी , लड़कियों के साथ ऐसा होता है, उन्हें ही तो सब कुछ छोड़ना पड़ता है ना, अपना घर अपने रिश्ते … पर तू घबरा मत राजा भैय्या बहुत अच्छे हैं।”

  “तुझे कैसे समझाऊँ नीरू, पता नही मैं इन लोगों के नियम कायदे निभा पाऊंगी या नही, फिलहाल तो ऐसी अवस्था में पहुंच गईं हूं कि उनके नाम से भी डर लग रहा।”

  ” पागल है क्या तू, इतना प्यार करने वाला पति मिल रहा है और सबसे बड़ी बात जिसे तुने चाहा वही तुझे मिलने वाला है फिर भी इतना घबरा रही है, इतना डर मत तुझे खा नही जायेंगे राजा भैया, तू कहे तो बात करवाऊँ।”

  ” नही ! अभी मायके वालों के अलावा किसी से बात करने का मन नही कर रहा है…

  “फिर भी . “..उससे पूछते में निरमा ने राजा को फ़ोन भी लगा दिया था, उसने भी बांसुरी की घबराहट सुन ली थी __

  ” क्या हुआ मेरी शेरनी! आज इतनी सहमी हुई क्यों है?”

  ” राजा तुम! मेरी सारी बातें सुन ली तुमने।”

  ” हाँ सुन ली, और एक बात बताऊं, मैं तो बिल्कुल तुमको पूरा का पूरा खाने को तैय्यार बैठा हूँ …बस अब आ जाओ तुम।”

  ” राजा ! और डरा रहे हो ना?”

  ” अरे पागल! इतना इमोशनल क्यों हो रही हो, देखो हमारी शादी के बाद जब हम घूमने जायेंगे तब पहले तुम्हें तुम्हारे रायपुर ही ले जाऊंगा, मन भर के सबसे मिल लेना और एक बात …मुझे लेकर कभी डरना मत मैं आज तक जैसा था हमेशा वैसा ही रहूँगा , अपनी बांसुरी से बहुत प्यार करने वाला राजा, अपनी बांसुरी की हर बात सुनने वाला राजा …तुम्हारे लिये यहाँ कुछ भी नही बदलेगा सब कुछ वैसा ही रहेगा, पहले जैसा। समझीं

  ” हाँ समझी।”

” अब कुछ हल्का लगा?”

  ” हम्म अच्छा सुनो राजा, अब मैं तुम्हें राजा नही कहूँगी।”

  ” फिर ? फिर क्या कहोगी?”

  ” ये तो कल ही पता चलेगा , जब हम तुम्हारे कमरे में होंगे एक साथ।”

  मुस्कुरा कर राजा ने फ़ोन रख दिया, उसे तैय्यार करने वाले लड़के ने उसे बैठाया और उसकी केसरिया पाग संवारने लगा।

    ******

   दोनों तरफ के घराती अपनी सारी तैय्यारियों के साथ बरातियों के स्वागत को खड़े थे…बड़े बड़े हाथी, पालकियों राजसी ब्यूक में सजी बारात राजप्रासाद से निकल कर मन्दिर तक जाकर वापस फेरों वाले भवन के लिये लौट रही थी…
    घोड़ियों पर सवार सजीले बन्नों को भर भर कर देखने पर भी उन्हें और देखने का मोह खत्म ना हो रहा था….
    गुलाबों की पंखुड़ियां उनके रास्तों पर कालीनों सी बिछी जा रही थी, दोनो वरों को वधुओं के भाईयों ने घोड़ी से उतारा और उनके साथ चलते युवराज भैय्या ने सामने द्वार पर द्वारचार को खड़ी कलश पकड़ी औरतों को नेग थमा कर दूल्हों को अन्दर ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया….
    अपनी अपनी तलवार से सामने द्वार पर लगे रेशमी तोरण को हिला कर दूल्हे अन्दर आये कि दुल्हनों की माताएँ ग्यारह दियों की आरती सजाये सामने चली आयीं।
  अपने अपने जमाता को टीका कर नज़र उतार कर सासु ने रुपयों की गठरी ढोली को दे दी।

    वरों की मंगल पूजा द्वार पर निपटने तक घरातियों की तरफ से बुआ और ताई बन्ना बन्नी गा गाकर नेग भी किये जा रहीं थी__

  ” ताई इनकी बारात में औरतें नज़र नही आ रहीं?”

वीणा की बात का जवाब ताई की जगह दिया बुआ ने __

” राजपूतों में औरतें बारात में ना जावें हैं छोरी, अरी हमारे में भी कहाँ जातीं हैं औरतें, जे तो आजकल की लड़कियों के शौक हैं कि मर्दों के आगे नाचती फिरें हैं बारात में…. वर्ना शोभा देवे है कभी? ” अपनी बात को और मजबूती देने बुआ ने अपने सर का पल्लू और कस के पकड़ लिया

  वीणा का खुद का मन ढोली की थाप पे थिरकने का कर रहा था, लेकिन उनकी बातें सुन वो मुहँ बनाती अपने बेटे को कुछ खिलाने अन्दर चली गयी…हालांकि उसका खुद का मन वहाँ की रंगीनियाँ छोड़ने का कतई नही हो रहा था लेकिन ऐसे ही मौकों पर उसकी एकमात्र संतान कभी खाने के नाम पर तो कभी सूसू पॉटी के नाम पर उसका जीना मुहाल किये रहती थी, और जब हर तरफ से पीछा छुड़ाने की कोशिश नाकाम हो जाती तब उसे उसकी ज़िद माननी ही पड़ती थी।
  वो अन्दर जा ही रही थी कि उसे ढूंढते उसके श्रीमान जी चले आये __

  ” अरे यहाँ कहाँ घूम रही हो आओ उधर तुम्हें दिखाएं कुछ। मानना पड़ेगा वीणा, बंसी की ससुराल और दूल्हा दोनो ही लाजवाब है।”

  ” अरे कहाँ घूमून्गी मैं ये लड़का चैन से मरने दे तब ना, तब से भूख भूख चिल्ला रहा है।”

  ” अरे तो इधर आओ ना, वहाँ देखो पांच सौ तरह के तो स्टार्टर ही हैं, अब हो जाता है बच्चा है भूख लग आयी होगी, तुम अपने सजने में जो लगी होंगी। चलो पहले गोलु को खिला लें उसके बाद तुम्हें उधर ले चलूँगा,स्टेज पर यहाँ के लोकल लोगों ने क्या कार्यक्रम प्रस्तुत कियें हैं भई वाह।”

   ” अरे अभी कहाँ देख पाऊंगी ये सब! अब आप सम्भालिये इसे मैं चली बंसी के पास। उसे भी तो लाना है ना स्टेज तक, आपको पता है शुद्ध चंदन की डोली आयी है बंसी के लिये, अभी उसी पालकी में उसे स्टेज तक आना है फिर कल उसी में उसकी बिदाई की रस्म होगी।”

  ” बड़े लोग हैं बड़ी बातें …जाओ फिर जल्दी जल्दी निपटा कर आओ सब कुछ, हम भी अपनी रानी साहिबा के साथ ही डिनर का मज़ा लेना चाहतें हैं भई ।”

वीणा भागती सी बांसुरी के पास पहुंच गयी….
बांसुरी का ब्राइडल फोटो शूट चल रहा था, जिसमें तरह तरह के पोज़ देने में उसे बड़ी झिझक सी हो रही थी__
 
  ” बारात आ गयी है।” वीणा का ये वाक्य सुनते ही वहाँ की लगभग सारी औरतें लड़कियाँ अपना काम धाम छोड़ दूल्हे को देखने बाहर भाग गयी।
  महल के एक और हिस्से में सजती दुल्हन को भी छोड़ जब सारी औरतें बाहर चली गईं तब अपने लहन्गे को सही करती रेखा ने आईने में देखा,उसके कमरे के दरवाज़े पर रोहित खड़ा था।
   वो भाग कर उस तक पहुंच गयी, रोहित का हाथ पकड़ उसने उसे अन्दर खींचा और दरवाज़ा बंद कर दिया__

  ” तुम यहाँ क्या कर रहे हो रोहित?”

  ” मैं तुम्हारे कारण यहां नही आया रेखा!”

  ” वो तो हम जानतें हैं लेकिन यहाँ आने का कारण?”

   ” एक बात पूछना चाहता हूँ,सच बताओगी?”

  ” पूछो?”

   ” तुमने उस रात भावनाओं में बह कर जो बात कह दी थी मेरे सामने , वो कितनी सच थी? और आखिर तुम क्यों इस सब का हिस्सा बन रही हो रेखा?”

  ” हम इनमें से किसी बात का हिस्सा नही हैं रोहित… कुछ पलों का ही सही लेकिन प्यार तो तुमसे ही किया था, लेकिन हम तब भी जानते थे कि तुम्हारा और हमारा कोई भविष्य  नही है, हमारे पिता अति महात्वकांक्षी हैं…बाकी सारी बातें जो तुम्हें उस रात तुम्हारे कमरे में कहीं थीं एक एक बात सच है।”

  ” बस एक बात समझ नही आती आखिर तुम्हारे पिता को राजकुमार पर गोली चलवाने की क्या ज़रूरत थी?”

  ” ये तो हम भी नही जानते लेकिन इतना जानतें है कि उनकी चाह बस ये है कि उनकी बेटी रानी साहेब का स्थान ले और जो उसके आड़े आयेगा उसे शायद वो रास्ते से हटाने को कुछ भी कर जायेंगे…. विराज बन्ना की माँ साहेब से हमारे पिता के अच्छे दोस्ताना संबंध हैं, और इस से ज्यादा कुछ नही पता।”

  ” इसका मतलब इस सब के पीछे रानी साहेब…?

  “हमें नही पता , हम किसी बात के लिये भी श्योर नही हैं, अब तुम जाओ यहाँ से,कोई आ गया तो बहुत आफत हो जायेगी।”

   रोहित वहाँ से जा ही रहा था कि रेखा पीछे से उससे लिपट गयी__

  ” हमें माफ कर देना रोहित! हमारे पापा हुकुम के खिलाफ जाने की हिम्मत नही थी हमारी।”

  रोहित ने एक हाथ से रेखा का हाथ पकड़ा और उसे खुद से अलग कर दिया__

” आप भी मुझे माफ कर दीजियेगा प्रिंसेस।” उसे खुद से अलग करता वो बाहर निकल गया।

*****

   निरमा वीणा और बाकी सखियों ने बांसुरी को संभाल कर आगे खड़ी पालकी में बैठा दिया ….
मैरून और हरी पोशाक मे सजी बांसुरी के चेहरे पर वैसे ही गुलाल बिखरा पड़ा था, उसके डोली में बैठते ही एक औरत ने आकर उसका घूंघट काढ़ दिया…
    वीणा ने उसके हाथों में चांदी के खोल वाला सजा संवरा नारियल पकड़ा दिया , तभी बांसुरी को जैसे कुछ याद आ गया__

  ” निरमा वहाँ मेरे कमरे में एक पान का पत्ता रखा है प्लीज़ ला दोगी।”

  ” जो हुकुम बांसुरी सा!अभी लाई।

और निरमा अन्दर से वो पान का पत्ता उठा लाई, उसे निरमा से लेकर बांसुरी ने अपने नारियल के ऊपर रख लिया, निरमा उसके कान में फुसफुसाई__

  ” अब ये क्या नया टोटका है आपका पंडिताईंन जी”

  ” ये मेरा नही मेरे साहब का टोटका है, उन्होने भेजा था कि किसी भी हाल में अपने हाथ के नारियल पर ये रख कर लाना….सनकी तो हैं कुछ ना कुछ सुर बिगड़ा ही रहता है उनका।”

  ” और अब उनके बिगड़े सुर पूरी तरह से बर्बाद करने तुम जा ही रही हो। तुम दोनो के लक्षन अभी से दिख रहे कि अब दीन दुनिया से तुम दोनो को कोई लेना देना ही नही होगा।”

  बांसुरी मुस्कुरा कर नीचे देखने लगी।उसके साथ ही रेखा की पालकी भी चली आयी।

   स्टेज के कुछ पहले ही पालकियां रोक दी गईं , उसके बाद दुलहनों को उतार कर चारों तरफ से लाल चुनरी की आड़ में लिये दुलहनों के भाई उन्हें स्टेज तक पहुंचा आये।

    लम्बे चौड़े मैदान के एक ओर गोलाकार बड़ा सा शानदार रोशनियों और फूलों से सजा स्टेज था, जिसमें बीच में सजी विशाल गणपति प्रतिमा के दोनो ओर वर वधु के बैठने को सोफे लगे थे….चारों तरफ बिछे राजसी तोशक के बीच 
राजा अपनी जगह और विराज अपनी जगह मौजूद था, दोनो दुल्हनों को स्टेज पर पहुंचा कर लोग किनारे होकर वरमाला लाने उतर गये, बांसुरी ने नज़र उठा कर देखा सामने राजा को मुस्कुराते देख वो उसकी ओर बढ गयी, उसके बाजू में बैठते ही राजा ने उसके हाथ का नारियल देखा और धीरे से उसके कान में गुनगुना गया__

  ” इस पत्ते को फेरों तक मत छोड़ना ।” चुपचाप हाँ में सिर हिला कर वो सर झुकाये बैठी रही और वो मुस्कुराता बैठा रहा।

    पार्टी अपने रंग में थी लगभग पचास साठ नर्तकों की जोडियाँ रंग बिरंगे कपडों में स्टेज के ठीक सामने अपना प्रदर्शन करने प्रस्तुत थी__

        पेथल पुरमा सुनले ओ चोरिया
       झूमे नगरिया जब जब ये घूमे..
         कमरिया रे थारी कमरिया …..


    कुछ देर बाद वरमाला की रस्म के लिये सभी दोस्त सहेलियाँ भी स्टेज पर पहुंच गये….
     दोनों जोड़ों के लिये ताज़े गुलाबों की लम्बी लम्बी मालाएं चेन्नई से सुबह ही मन्गवाई गईं थीं…सभी दोस्तों के उचकाने पर विराज और तन कर खड़ा हो गया, रेखा कुछ और उँची होने की कोशिश करती कि वो और तन जाता, आखिर कुछ मान मनौव्वल हँसी मज़ाक के बाद रेखा ने उसकी तरफ माला उछाल दी जिसे नीचे गिरने से पहले विराज ने पकड़ा और गले में डाल लिया, रेखा को पहनाने आगे बढने पर रेखा भी कुछ लुका छिपी कर आगे आ ही गयी..
…चढ़ाने वालों ने राजा को भी खूब चढ़ाया लेकिन हाथ में गुलाबों की माला थामे बांसुरी ने जब राजा को देखा तो उसे देख मुस्कुराते हुए राजा ने उसके सामने अपनी गरदन झुका दी__

  ” ये क्या कुमार अभी से झुक गये।” एक दोस्त की बात पर समर मुस्कुरा उठा__

  ” हुकुम की हर बात निराली है”

राजा ने भी बांसुरी के गले में माला डाल दी…. वहाँ से दुलहनों को मंडप में गणेश पूजन के लिये ले जाया गया तो दूल्हों के दोस्त एक बार फिर हाथों में ग्लास थामे स्टेज पर ही ठुमकने चले आये।
    विराज ने तो दोस्तों का साथ देना शुरु भी कर दिया लेकिन राजा ने साफ़ मना कर दिया…

” अरे एक आध लेने में किसी को कुछ पता नही चलेगा।”

  प्रेम ने राजा के सामने बढ़ा ग्लास लेकर किनारे रख दिया__

” हुकुम आज वाकई नही लेंगे ।”

  ” ये क्या बात हुई यार कुमार! अपनी ही शादी में नही पियोगे?”

  राजा ने बिना बात बढ़ाए मुस्कुरा कर इशारे से ही मना किया और एक ओर चला गया, आज रह रह के उसे पिंकी की बहुत याद आ रही थी, लेकिन इतनी भीड़ भाड़ में उससे बात करना सही नही था, इसी से चुप बैठा रहा।

   कुछ देर में हरियाले बन्नों की भी मंडप में पुकार मची, दोनों के ही भावी श्वसुर अपने अपने जमाता का हाथ थामे उन्हें मंडप तक ले आये।

    पीली रेशमी साड़ी में सर पर मौर सजाये गठरी सी बैठी बांसुरी को देख राजा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी।
   आमने सामने बैठे दोनो आज लाज से एक दूसरे को आंखें उठा कर देख भी नही पाये।
  विधिवत मन्त्रोच्चार के बीच दोनों के हाथों पर हल्दी माड़ कर बांसुरी के माता पिता ने राजा के हाथ में उसका हाथ रख कर कुश के साथ कन्या का दान कर दिया।
कन्या दान की रस्म के साथ ही वहीं बैठी बुज़ुर्ग औरतों ने एक स्वर में बिदाई बन्ना बन्नी गाना जो शुरु किया कि वहाँ बैठी सभी औरतों की आंखें भीग गईं।
  बांसुरी के आँसू वैसे ही नही थम रहे थे, धीरे से उसे उठा कर वीणा ने राजा के दाईं ओर बैठा दिया।
   कुछ और मंत्रों के बाद फेरों के लिये दोनों का गठबंधन कर उनके हाथों को एक रेशमी कपड़े से लपेट कर रस्म शुरु की गयी।
   फेरों के संपन्न होते ही बांसुरी को बायीं ओर बैठा कर पांव पूजने की रस्म शुरु हुई…..जिसमें वही ताई जो ठाकुरों के पैर कैसे पूजोगे लल्ला जी पर अड़ी हुई थी, आज सबसे पहले आकर राजा और बांसुरी के परात में रखे पैरों को धोकर पूज गयी, राजा के गले में सोने के चेन डाल अपनी लाड़ली को कंगन पहना कर उसकी   नज़र उतारी और आंचल से आंसू पोंछती एक किनारे खड़ी हो गईं…..
     जितनी भावुकता से वो आंसू बहा रही थीं उतनी ही त्वरित गति से उनके बाद रस्म निभाने वालों को नियम कायदे बतातीं हंसी ठिठोली में भी लग गईं__

  ” रे वीणा तू अकेले ही पैर पूजेगी, जमाई जी को उधर ही बैठने दे”

  ” क्यों ताई?”

  ” अरे वो भी तो हमारे दामाद है ,वो अपनी साली और साढ़ू के पैर थोड़े ना पूजेन्गे , पगली।”

    लम्बी चौड़ी पैर पुजाई के बाद सोने की अंगूठी में सिंदूर ले कर राजा ने बांसुरी की मांग सजा दी…..

    हवन संपन्न होने तक में भोर का तारा भी उदित होने लगा था….वर वधु को तारा के दर्शन करवा कर विवाह पूरा हुआ।
     दोनो जोड़ों ने पंडितों से आशीर्वाद लेने के बाद वहाँ उपस्थित सभी बड़ों से आशीर्वाद लिया…
    कोहबर में होने वाले नेग चार के लिये दूल्हे को ले जाने से पहले दूल्हे की सुनहरी जूतियों की ढूँढ मची, बांसुरी की कोई छोटी बहन तो थी नही, इसी से वीणा और निरमा के कन्धों पर ही ये जिम्मेदारी आन पड़ी थी…
   प्रेम किसी काम से बाहर गया हुआ था….निरमा बांसुरी को अपने पीछे कर राजा के सामने खड़ी हो गयी__

” ऐसे खाली खाली तो आपको जाने नही देंगे राजा जी! नेग निकालिये सालियों का!”

  ” हर जगह तो नेग निबटाते आये हैं हमारे राजा जी।” राजा की तरफ से समर आगे कूद पड़ा

  ” आप कौन?” निरमा ने लापरवाही से उसकी बात उड़ा दी

  ” मैं खामखाँ!” समर की बात पर सब ज़ोर से हँस पड़े ..

   “वो तो दिख रहें हैं…पर जब बात जीजा साली की हो तो बीच में किसी को बोलने का हक नही होता।”

  ” बात में दम है , लेकिन लेकिन बात जब राजा साहब के खज़ाने के लुटने की हो तो हुकुम का खन्जांची तो बोलेगा ही।”

  ” ओह्हो तो ये बात है? आप मुंशी हैं जीजू के!”

  ” जी मैं एकाउंटेंट कम लीगल एडवाइज़र कम वकील हुँ इनका!”

  ” आपकी शादी के लिये लड़की नही देखी जा रही जो इतना बड़ा सी वी प्रेजेंट कर दिया….तो राजा साहब जूतों के नेग में निकालिये अपनी सबसे कीमती चीज़!”

   राजा मुस्कुरा कर आगे बढ़ आया__

  ” अपनी सबसे कीमती चीज़ अपनी परछायी आपको दे चुका हूँ ”

प्रेम आकर कहीं पीछे खड़ा निरमा को मुग्ध दृष्टी से देख रहा था, आज बांसुरी की शादी की खुशी में जैसे असली निरमा जो प्रताप के दुख में कहीं किसी कंदरा में जा छिपी थी वापस बाहर आ गयी थी।
    प्रेम को पीछे से खींच कर समर सामने ले आया और निरमा के सामने खड़ा कर दिया__

  ” लीजिए आपके लिये बेशकीमती तोहफा ले आयें हैं अब ये मत कहियेगा कि खन्जाची कंजूस है, हुकुम ने कहा और हम ले आये।” प्रेम को अचानक सामने देख और राजा और समर की बातें सुन निरमा झेंप गयी और चुपचाप वहाँ से हट गयी, कुछ देर में चांदी की थाली में राजा की जूतियाँ लाकर उन्हें अपने आंचल से पोंछ कर उसने राजा के पहनने को उसके सामने रख दी।
    अपने सामने पैरों के पास बैठी निरमा को राजा ने झुक कर उठा लिया__

  ” पहले भैय्या बना लिया था, फिर भाभी बन गयी और अब साली साहिबा बन गयी…इतने सारे अनमोल रिश्ते जुड़ गयें हैं आपसे कि हर तोहफा छोटा है।” राजा ने समर की ओर देखा, समर ने निरमा और वीणा की ओर कंगनों का जोड़ा बढ़ा दिया।
   बहुत ना नुकुर के बाद प्रेम के इशारा करने पर आखिर निरमा और वीणा ने तोहफ़े रख लिये।


  बिदाई से पहले बिदाई की तैय्यारियों के लिये वर पक्ष को समय देने के लिये दूल्हा दुल्हन को लिये परिवार वाले उनके बनाये कोहबर में बाती मिलाने और बाकी रस्मों के लिये  चले गये।

    तेल धार और बाती मिलाने के बाद कुंवर कलेवा में आजु बाजू बैठे बांसुरी और राजा संकोच से कुछ खा भी नही पा रहे थे….चारों तरफ से औरतें अपने कुंवर सा को घेरे खड़ी कुछ ना कुछ उन्हें खिलाना चाह रही थी कि वीणा के पतिदेव ने सभी से प्रार्थना कर उन्हें थोड़ा अकेले छोड़ने की विनती कर दी__

  ” अरे ऐसे घेर घार के बैठ जाओगे तो कहाँ से कुछ खाते पीते बनेगा, दोनों कल से व्रत रखे हैं…मम्मी जी अगर आप लोगों का नेग चार हो गया हो तो कुमार और बांसुरी को हम लोग उधर ले जातें हैं, दोनो आराम से नाश्ता तो कर लें कम से कम।”

   दामाद बाबू की बात टालने का सवाल ही नही उठता था, नेग हो ही चुका था, इसलिये ताई और माँ बांसुरी की बिदाई की तैय्यारियों में लग गयी, और एक तरफ लगे गोल बड़े से मेज़ को घेर कर लगभग सभी जोड़े नये नवेले जोड़े के आस पास बैठ गये__

  ” अब आप दोनो आराम से एक दूसरे को खिलाते हुए खा सकतें हैं”…..

   जीजा जी की बात पर राजा ने उन्हें मुस्कुरा कर आंखों में आभार व्यक्त किया और अपनी प्लेट से गाजर का हलुवा बांसुरी की ओर बढ़ा दिया….

   वहीं सामने प्रेम भी बैठा था, निरमा बांसुरी के पास थी…वीणा दी ने उसे उठा कर प्रेम के बाजू वाली कुर्सी पर बैठा दिया और निरमा की प्लेट उसके सामने से हटा ली__

  ” आप दोनो भी तो नया नवेला जोड़ा हैं आप भी एक ही प्लेट से खाइए।”

  प्लेट में पकौड़े रखे थे, जिन्हें देख प्रेम को निरमा की पकौडों की वीकनेस याद आ गयी

  ” इनके साथ खाऊँ? ” प्रेम के सवाल पर बांसुरी के जीजा ने जवाब दिया

  ” अब ब्याह उन्हीं से हुआ है तो खाना पीना सोना सब इन्ही के साथ ही होगा आपका….इस जनम तो और कोई नही मिलने वाली , जो है उसी में काम चलाओ हमारी तरह।”

  ” अच्छा तो आप बस काम चला रहें हैं?”

   ” अरे नही भई हम तो बस समझा रहें हैं कि अब इस जनम जिसके साथ बंध गये उसी के साथ सर फोड़ना है ….

   उन दोनो की चुहलबाज़ी सुनता प्रेम हँसने लगा

  ” हँसने की बात नही बाबू, खिलाओ हो अपनी दुल्हनिया को अपने हाथ से, राज की बात बतायें , प्यार बढ़ता है संग खाने से ….

  “जे बात जीजा जी ! तो साथ साथ खाने से प्यार बढ़ता है ….

प्रिंस की बात पर जीजा जी ने उसे देखा __

” कुँवारे हो अभी तक, जभी इतनी बत्तिसी दिख रही …अब इन्हें देखो अभी शादी को एक महीना हुआ होगा मज़ाल है जो किसी ने इनका एक दांत भी कभी देखा हो, हैं निरमा क्या बात है भई या तो तुने बड़ा डरा रखा है या इन्होने हंसी बड़ी महंगी कर रखी है।”

  ” नही जीजा जी मैं कहाँ डरा पाऊंगी इन्हें, हँसते हैं कभी कभी लेकिन जब हँसते है तो लगता है सारा संसार हँसने लगा।”

   जीजा जी की बात पर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया देती निरमा जाने कैसे अपने मन की बात कह गयी और प्रेम के गले में कुछ फंस के रह गया, उसने निरमा की तरफ देखा लेकिन अपनी बात का मतलब समझ वो बेचारी शरमा कर दुसरी तरफ देखने लगी।

    बिदाई एक महल से दूसरे महल के बीच ही होनी थी पर होनी तो थी ही…..
    बिदाई की तैय्यारियों के बाद…बिदाई की साड़ी में अपने हाथों से लावे उलीचती बांसुरी एक एक कर सबके गले से लग रोती आंसू बहाती अपने गठजोड़े को संभालती राजा की राजसी ब्यूक में उसके बगल में बैठी, पानी की घूंट ले बिदा हो गयी।
     नारियल को चक्के के नीचे दबाती उनकी गाड़ी धीर मंथर गति से मन्दिर के लिये आगे बढ़ गयी…..

      क्रमश:

aparna….




     

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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