जीवनसाथी-54

जीवन साथी–54


     महल अभी भी मेहमानों से भरा था, रात के खाने की व्यवस्था इसलिये बगीचे में ही की गयी थी…जो वहाँ आना चाहे उनके लिये और जो थकान से ना आ पाये उनके कमरों तक ही रात्रिभोज पहुंचा दिया गया था।
युवराज भैय्या समर के साथ सारी व्यवस्था खुद देख रहे थे, पर लगभग दोपहर से उन्होने राजा को कहीं नही देखा था, आखिर थक कर उन्होने शाम में उसे फ़ोन किया तो रिंग बज कर फ़ोन बंद हो गया।
    रात का सारा काम निपटाने के बाद जब अधिकतर मेहमान दीवान खाने में किसी ना किसी आमोद प्रमोद मनोरंजन में डूबे थे या सोने चले गये थे, तब अपने साथ समर को लिये युवराज राजा के मित्रों के कमरों की तरफ चले…
   उन्हें रात के खाने के वक्त प्रिंस रोहित यहाँ तक की प्रेम भी नज़र नही आया था।

   दरवाज़े पर थाप देने के कुछ सैकेण्ड में ही प्रिंस ने आकर दरवाज़ा खोल दिया…भीतर जाते ही उन्होने राजा को एक तरफ सर झुकाए खुद में गुम बैठे देखा तो चौंक कर प्रेम की तरफ मुड़ गये, कि आखिर जिस विवाह के लिये राजा खुद इतना लालयित था उसके संपन्न होने के बाद अपनी पहली ही रात में वो रात के दस बजे अपनी दुल्हन को अकेला छोड़ यहाँ क्या कर रहा है?”

   युवराज भैय्या और समर को बैठा कर रोहित ने सिलसिलेवार हर एक बात बता दी….
   एक पल को युवराज भैय्या की आंखों के आगे जैसे सारा ब्रम्हाण्ड घूम गया, वो अपना सर थामे बैठे रह गये अगर समर और प्रेम ने तुरंत थामा नही होता तो शायद वो चकरा कर नीचे गिर चुके होते।
     प्रेम ने पानी का गिलास आगे बढ़ाया जिसे एक घूंट में गटगट पीकर उन्होने थोड़ा पानी अपने चेहरे पर भी छिड़क लिया।
      थोड़े अवकाश के बाद वो उठ कर राजा तक गये और उसके काँधे पर अपना हाथ रख दिया, अब तक अपने विचारों में गुम राजा का इस बात पर ध्यान तक नही गया था कि युवराज भैय्या वहाँ आ चुके हैं, उन्हें एकाएक अपने सामने देख वो चौंक गया और एकदम से अपना सारा धैर्य खो बैठा।

   दोनो भाइयों की स्थिति एक सी थी, दोनो ने अपनी माँ को खोने के बाद अपनी नयी माता में ही अपनी माँ को पा लिया था, आज तक ना युवराज ना राजा किसी ने भी विराज और विराट को सौतेला भाई नही माना था, लेकिन आज उनके सामने इतनी बड़ी सच्चाई के ऐसे एकाएक सामने आ जाने से जैसे उनका सुखस्वप्न टूट कर बिखर गया था।
   राजा अपने भाई के गले से लगा बच्चों की तरह बिलख उठा__

  ” भैय्या आप तो जानते हैं मुझे कभी इस गद्दी का लालच नही था, तो आखिर मॉम को ये सब करवाने की क्या ज़रूरत थी, एक बार मुझसे कह कर तो देखतीं, मैं तो उनकी आज्ञा पर हँसते हँसते खुद ही दुनिया छोड़ जाता।”

” आज के दिन कैसी अशुभ बातें बोल रहे हो कुमार…. मरने मारने की आखिर ज़रूरत क्या है? एक अदद गद्दी के लिये ? कितना खोखला पन था उनके बनाये हर संबंध में? उफ्फ़ इतना ज़हर घुला है उनके मन में हम दोनों भाइयों के लिये।

  ” भैय्या आप कल के कल विराज के राज तिलक की तैय्यारियाँ शुरु करवा दीजिये, अब जितनी जल्दी वो गद्दी पर बैठ जाये उतना अच्छा है।”

राजा की बात पर अभी युवराज कुछ कहता उसके पहले ही समर वहाँ उनके पास आ बैठा।

” गुस्ताखी माफ युवराज सा! पर मैं कुछ कहना चाहता हूँ।”

  समर की ओर देख युवराज ने आंखों से ही उसे कहने का इशारा किया__

  ” मैं समझ सकता हूँ आप दोनों पर क्या बीत रही है, लेकिन फिर भी मैं यही कहना चाहता हूं कि गद्दी का अधिकारी किसी तरह से विराज नहीं हो सकता! अधिकारों की बात छोड़ भी दी जाए तो गद्दी पर बैठने के लायक भी विराज नहीं है…..
    आप दोनों अच्छे से उसका स्वभाव जानते हैं। हमारा राज्य अभी वैसे भी बहुत तरह की समस्याओं से घिरा हुआ है, ऐसे समय में राजगद्दी पर बैठने के लिए एक सुयोग्य व्यक्ति की ही जरूरत है, जो  सही समय पर सही समाधान और सही निर्णय ले सके, लेकिन विराज किसी भी तरीके से राजगद्दी के योग्य नहीं है, आप लोग मेरी बात पर विचार करके देखें।
          मोह माया प्रेम संबंध रिश्ते नाते सब एक तरफ लेकिन एक राजा का अपनी प्रजा के लिए कर्तव्य सबसे ऊपर होता है।
        आपके पिता साहब ने भी हमेशा अपने नियम अपने कायदे अपने रिश्ते नातों को अपने कर्तव्य से नीचे ही रखा, अगर वह नियम कायदों का पालन नहीं करते तो आज युवराज सा राजा घोषित हो चुके होते हैं और ऐसे में विराज या विराट किसी की भी हैसियत ना थी कि वह इस जगह के लिए कोई षड्यंत्र कर पाता। अभी आप दोनों विहल हैं, अपनी भावनाओं में खोए हुए हैं, दुखी हैं…. मैं समझता हूं इस बात को, लेकिन एक बार ठंडे दिमाग से सोच कर देखें हुकुम!

    आप एक बार सोच कर देखिए क्या आपका आपकी जनता के लिए कोई कर्तव्य नहीं है ? सिर्फ इसलिए कि आप को जान से मारने की कोशिश आपकी ही सौतेली मां और सौतेले भाई ने की तो आप उन्हें पूरी तरह से माफ करके जनता के साथ छल नहीं कर रहे हैं ?अपने दुख में आप इतने दुखी हो गए कि आपने जनता की तरफ से अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ लिया, क्या यही है राजकुमार अजातशत्रु ?
         आप तो अपने आप को भूल गए, आप अपने व्यक्तित्व को भूल गए , आज 27 साल की उम्र तक में आपने जो जो कमाया आप ने वो सब कुछ सिर्फ एक खट्टे संबंध के कारण भुला दिया…. यह कैसा न्याय है हुकुम?
    आप राजा बनकर पैदा हुए हैं, आप राजा बनने के लिये पैदा हुए हैं… आप राज महल में पैदा हुए हैं…
इसलिए हर बार आप वह नहीं कर सकते जो आपका मन कहे, बल्कि हर बार आपको वह करना पड़ेगा जो आपका कर्तव्य है , आपका वह कर्तव्य जो आपको आपकी प्रजा के लिए कटिबद्ध करता है… आपका वह कर्तव्य जो आपको आपकी वंशावली के नाम को आगे ले जाने के लिए प्रेरित करता है …..आपका वह कर्तव्य जो आपको सच्चाई और ईमानदारी के मार्ग से कभी डिगने नहीं देता है….

   आपके इतने सारे कर्तव्यों को छोड़कर आप सिर्फ एक मोह से भरे बिगड़े संबंध का रोना लेकर बैठे रहेंगे ये आपको शोभा नहीं देता,  यह हमारे राजकुमार अजातशत्रु सिंह बुंदेला को शोभा नहीं देता….
   मेरा प्रस्ताव तो यही है कि अब डंके की चोट पर पूरी शान से आपका हमारे राजकुमार अजातशत्रु का ही राजतिलक संपन्न हो।
   युवराज हुकुम अगर कुछ अधिक बोल गया हूँ तो क्षमा चाहूँगा, पर मैं अपने मन की बात बोलने से खुद को रोक नही पाया। ”

  युवराज ने आगे बढ कर समर को गले से लगा लिया__

” नीति की बातों में तुम से कोई नहीं जीत सकता समर। आज तक हमारे काम में जब जहां भी कोई समस्या आई है तुमने चुटकियों में उसका हल निकाल कर हमारे सामने प्रस्तुत किया है, आज भी जब हम दोनों भाइयों को राह नहीं सूझ रही थी, तुमने चुटकियों में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। तुमने बिल्कुल सच कहा राजपूत परंपरा के अनुसार किसी राजा को इतनी भावुकता शोभा नहीं देती ।
    हम राजपूतों के जीवन में हमेशा से सबसे पहले हमारा कर्तव्य होता आया है उसके बाद ही हम अपनी भावनाओं को चुन सकते हैं समर मैं तुम्हारी बातों से पूरी तरह सहमत हूं। प्रेम तुम राजा के अभिन्न मित्र भी हो, इस बारे में तुम्हारा क्या विचार है।”

  ” युवराज हुकुम ! मैं शुरु से ही हुकुम की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता आया हूँ, अभी भी यही कहना चाहता हूँ कि राजगद्दी पर तो हुकुम ही विराजें लेकिन तब तक अगर किसी को बाहर इन बातों की खोज खबर ना लगे तो ज्यादा अच्छा होगा, क्योंकि जब बिना कुछ हुए ही इतनी बार हमले हो गये तो राजतिलक के समय या उसके बाद तो वो लोग इनकी जान के पीछे ही पड़ जायेंगे।”

” हाँ आपका कहना भी सही हैं प्रेम! युवराज सा हम सभी को इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा, खास कर आपको हुकुम ! हो सके तो आप अपनी दुल्हन से भी इस बात का ज़िक्र नही छेड़ेंंगे क्योंकि एक तो उनके लिये महल नया है उस पर नये नये रिश्ते में जुड़ते ही महल की ऐसी काली सच्चाई उनके सामने आयी तो ये बहुत गलत हो जायेगा उनके साथ! आप समझ रहें हैं ना मैं क्या कह रहा हूँ।”

समर की बात पर हाँ में सर हिला कर राजा वैसे ही चुप बैठा रहा।

  सभी बैठे आगे क्या कैसे करना है पर विचार विमर्श करते रहे… सारी बातों के तय होते ही युवराज को थोड़ी राहत मिली …नज़र घड़ी पर गयी, समय का घन्टा रात के दो बजा रहा था__

” राजा ! तुम अब तक यहीं बैठे हो…आज तो तुम्हें तुम्हारे कमरे में होना चाहिये था ना! चलो अभी के अभी जाओ और सुनो तुम्हारा फ़ोन कहाँ है? मैने फ़ोन किया तब भी उठाया नही तुमने, ज़रूर बांसुरी भी कर रही होगी।”

इतनी देर में राजा को सच अपने फ़ोन का कोई होश नही था….उसने इधर उधर ढूंढा किसी तोशक के नीचे दबा पड़ा फ़ोन मिलते ही वो अपना फ़ोन उठाये सभी से विदा ले अपने कमरे में चला आया।

   दरवाज़ा अन्दर से बंद नही था, बस पट लगे हुए थे, धीमे से दरवाज़ा खोल वो भीतर चला गया।
  रातरानी की खुशबू से पूरा कमरा महक रहा था, वो धीरे धीरे चलते हुए बिस्तर तक आया, बांसुरी एक किनारे अपने राजसी कपडों में ही उसका इन्तजार करती सो गयी थी…..
    खिड़की से छन कर आती चांदनी उसके चेहरे पर छिटकी पड़ी थी….सुंदर तो वैसे ही थी उस पर दुलहन का जोड़ा और दिन भर की थकान ने चेहरे को और सुकोमल क्लान्तता से भर दिया था…..

  राजा कुछ देर को उसे देखता जैसे सब कुछ भूल बैठा था, उसे लगा हाथ लगा कर जगा ले उसे , लेकिन फिर उसकी दिन भर की थकान का सोच उसे जगाये बिना ही एक किनारा पकड़े उसकी तरफ मुहँ किये उसे देखते देखते वो भी सो गया।

बहुत सुबह का ही अलार्म लगा कर सोयी थी बांसुरी! उसे उसके कमरे में छोड़ते समय रूपा भाभी उसके कान में चुपके से रस घोल गयी थी__

” आज की रात कुंवर सा को ज्यादा परेशान मत करना, तुम्हें भी सुबह महल के मन्दिर की आरती में शामिल होने जल्दी उठना पड़ेगा ना इसलिये जल्दी जल्दी काम निपटा लेना”  और हँसती खिलखिलाती बाहर चली गई थी।

  सुबह अलार्म की आवाज़ पर उसकी नींद खुली तो सामने सोये राजा पर उसकी नज़र पड़ी और चेहरे पर मुस्कान चली आयी।
    ये भी तो एक कारण था आपसे शादी करने का साहेब कि रोज़ सुबह उठूँ तो सबसे पहले आप ही दिखें।
     वो धीमे से उसके पास खिसक आयी, धीरे से राजा के चेहरे पर झुक ही रही थी कि राजा ने आंखें खोल उसे अपनी बाहों में भर लिया__

  ” हाय आप ऐसे कैसे उठ गये?”

” ऐसे कैसे उठ गया मतलब? जैसे सब उठतें हैं, जैसे तुम उठीं, वैसे क्या करना चाह रही थीं।”

  ” कुछ नही! छोड़ो मुझे, रात तो समय पर आये नही, मैं रास्ता देखती देखती सो गये और अब बड़ा बाहों में भरे बैठें हैं।

” बैठें कहाँ हैं हम तो लेटे हैं हुकुम।”

” हाँ हाँ वही अब छोड़ो मुझे! मुझे जल्दी तैय्यार होना है मन्दिर की आरती के लिये।”

” हो जाना तैय्यार , पहले अपने पर्सनल भगवान को तो खुश कर लो, फिर करते रहना आरती।”

” नही बिल्कुल नही! आपका समय निकल गया समझे आप, अब छोड़ो जल्दी से।”

  “ठीक है” कह कर  राजा ने अपनी बाहों की पकड़ ढीली कर दी__
   बांसुरी ने बनावटी गुस्से से उसे देखा__” छोड़ भी दिया?  अजीब हो!!”
    कहती बिस्तर से उठ गुसलखाने में घुस गयी….
वो उसे जाते देख मुस्कुराता रहा, फिर उठ कर बाहर बालकनी में चला आया, वहाँ बैठते ही उसे कल रात की एक एक बात याद आने लगी, और साथ ही ये भी कि अब वो चाहे ना चाहे उसे गद्दी पर बैठना ही होगा, लेकिन ठाकुर साहब अब तक वहाँ विराज का राजतिलक देखने ही रुके थे, उनके लिये उसका राजतिलक देखना कितना बड़ा झटका होगा और फिर उसके बाद वो उससे अपना प्रतिशोध निकालने को कुछ भी तो कर सकतें हैं। उस वक्त वो क्या करेगा?

  वो अपनी सोच में गुम था कि बांसुरी दो कप में कॉफ़ी लिये चली आयी__

” ये कब  और कैसे बना लाईं तुम?”

” आपके कमरे में कॉफ़ी पर्क्युलेटर है साहेब! बस उसी में हमारी मुम्बई की यादें ताजा करने बना लायी।”

  मुस्कुरा कर बांसुरी सामने ही बैठ गयी, गुलाबी रेशमी ओवर कोट पर उसके भीगे भीगे बाल और माथे पर भीगे बालों के कारण बह आया सिंदूर उसे और भी मोहक बना रहा था, हाथ में चूड़े के कारण उसके हल्के से हिलने डुलने पर भी खन खन करती चूडियाँ  जैसे बार बार उसकी ओर ध्यान देने को मजबूर कर रहीं थीं।
   राजा उसे देखता मुस्कुराता रहा__

” क्या हुआ? क्यों मुस्कुरा रहे हो?”

” कुछ नही , बस ऐसे ही, मुझे तुम्हारे फ्लैट के रूल्स याद आ गये……कैसे बताया था तुमने याद है , हमारे फ्लैट में ड्रिंक नही कर सकते।”

  वो शरमा कर मुस्कुराती नीचे देखने लगी__

” आज रात तो एक से बढ कर एक विदेशी सुरा आसव सब लेकर आउँगा ,तुम्हें चखाने।”

” छी मैं नही पीती!”

  ” हम्म पता है , पीती नही हो पर पीने की अभिलाषा है, है ना।”

  ” लो तुम्हारी बातों में मैं लेट हो जाऊंगी, वैसे भी ये तुम्हारी राजपूती पोशाक हो या साड़ी, पहनने में मुझे बहुत वक्त लग जाता है।”

” हम्म अब पहनाने में तो मदद नही कर सकता, उतारने में कहोगी तो पूरी मदद कर दूंगा।”

” चुप करो! सुबह सुबह शुरु हो गये।”
हँसती खिल्खिलाती बांसुरी अन्दर जा कर तैय्यार होने लगी।
   उसे इतना खुश देख राजा की हिम्मत ही नही थी उसके सामने कोई भी बात कहने की और समर की बात भी सहीं थी, अभी ज़रूरत भी क्या थी उसे कुछ भी बताने की।
   वो अपनी सोच में में गुम खुद भी नहाने और तैय्यार होने चला गया।

*********

   सुबह निरमा की नींद आंखों में पड़ती सूरज की रोशनी से खुली, एक मीठी सी अंगडाई के साथ वो झटके से उठ बैठी…
   आज तो बांसुरी के परिवार वालों का सुबह का खाना पीना उसके घर पर ही था, बांसुरी भी पग फेरे की रस्म के लिये आने वाली थी, इतना सारा काम था… वो सारे कामों की लिस्ट बनाते बनाते जल्दी से फ्रेश होने चली गयी।
   नहा धोकर नीचे उतरी तो देखा प्रेम नीचे ही सोफे पर सोया पड़ा था, रात शायद इतनी देर से लौटा कि कपड़े बदलने का भी होश नही था, जबकि सोने से पहले वो उसका नाईट सूट निकाल उसके कमरे में रख आयी थी।
  उसे सोते देख उसने कमरे की खिड़कियों पर पड़े पर्दे जिन्हें कुछ देर पहले ही उसने अपनी रोज़ की आदत के अनुसार खोल दिया था कि सूरज की रोशनी भीतर आये उन्हें वापस धीरे से खींच कर बंद कर दिया और रसोई में चली गयी।
     चाय चढ़ा कर वो बाकी तैय्यारियों में लग गयी।

*******

       बांसुरी तैय्यार होकर मन्दिर पहुंच गयी, पूजा अर्चना आरती के बाद वहीं से उसे दादी सा के कमरे में जाना था, तबीयत के कारण वो कल मुहँ दिखाई के रस्म में भी पहुंच नही पायीं थीं।
   राजा सीधे दादी सा के कमरे में ही पहुंचने वाला था।
बांसुरी और रेखा को साथ लिये रानी साहेब अपनी सास से आशीर्वाद दिलवाने ले गईं__

” हमारी परंपरा के अनुसार आप लोग पहली बार अपनी दादी सास से मिलेंगी तो इसलिये आप लोगों को उन्हें कुछ उपहार देना होगा”

रानी साहेब ने बांसुरी को देखा__” आप तो साथ कुछ लेकर आयी नही होंगी”

” मैं लाईं हूँ, हमारे यहाँ भी ऐसा होता है इसलिये माँ ने दादी सा के लिये भी कुछ भेजा है।”

” हम्म, चलिये फिर, हमे लगा अगर ना लाई हों तो हम ही कुछ मँगवा देते।”
  रानी साहेब के पीछे दोनो नयी बहुयें सर झुकाये अपना घूंघट संभाले चली गईं__

   दादी साहेब के कमरे में राजा पहले ही बैठा उन लोगों का इन्तजार कर रहा था, लेकिन विराज का कोई अता पता नही था।

   दादी साहेब ने मुहँ दिखाई कर बांसुरी का माथा चूम लिया__

” सीता राम सी जोड़ी है, दोनो का साथ सदा सदा बना रहे”

  ” सीता राम को तो चौदह बरस का बनवास झेलना पड़ गया था माँ साहेब ! कौन सा सुख देखा उन्होंने, जब साथ थे महल ना था और जब महल मिला साथ छूट गया…”
   रानी साहेब की बात पर राजा ने एक नज़र उन्हें देखा और वापस दादी की ओर देखने लगा__

“इसका कारण ये है कि दोनो जब साथ थे उन्हें महल की कमी ही नही लगी, लेकिन जब भगवान को अकेले जानकी को छोड़ कर महल में रहना पड़ा तब वो तप कर कंचन बन गये, पुरुषोत्तम बन गये… जैसे राम सिया की जोड़ी है सदा से शाश्वत एक दूसरे में सम्पूर्ण, जिन्हें एक दूजे के अलावा संसार फीका लगे ऐसी ही सम्पूर्ण जोड़ी बनो मेरे बच्चो! यही आशीर्वाद है तुम्हारी बूढ़ी दादी का। अब आजकल तबीयत साथ नही देती, जाने कब बुलावा आ जाये उस पार से …ईश्वर का हर बात के लिये धन्यवाद करते हैं हम और इस बात के लिये सबसे अधिक कि अपने लाड़लों की बहुओं का मुहँ देख सके….
    दादी साहेब ने वहीं एक किनारे खड़ी अपनी सहायिका को बुला कर उसे इशारों में कुछ कहा, वो तुरंत उनकी बात समझ एक ओर रखी आलमारी की ओर गयी और उसमें से दो सेट हार के निकाल लायी, उसमें से एक सेट खोल कर बांसुरी को दिखाते हुए दादी साहेब ने उसे भेंट कर दिया__

” ये राजा रत्नमाल की महारानी का हार था, इसकी कीमत कोई नही आंक सका, जब अंग्रेजों ने उन्हें सन्धि प्रस्ताव भेजा और उन्होने मना कर दिया तब छल से रातों रात उनके महल पर हमला कर अंग्रेजों ने खूब लूट पाट मचायी और राजा जी को बन्दी बना लिया, उसी समय हमारे दादा ससुर वहाँ पहुँचे, वो काश्मीर की यात्रा से लौटते में अपने लाव लश्कर के साथ ही वहाँ पहुँचे थे, हालांकि युद्ध की उनकी कोई तैय्यारी ना थी लेकिन वीरता में कम तो थे नही, उन अंग्रेज़ों को लोहे के चने चबवा दिये थे…सारे गोरे रत्नमाल जी महाराज का सारा लूट का माल वहाँ छोड़ चले गये, तब महारानी सा ने हमारे दादा ससुर को अपना भाई मान कर ये कीमती हार भेंट किया….हमारे ब्याह के बखत ये हार हमारी दादी सा हुकुम ने हमें पहनाया और कहा ये हार उसी बहु के कंठ में सजना चाहिये जो इस हार को पहनने वाला कीमती कंठ भी रखती हो….”
   बांसुरी ने हार लेकर एक बार फिर दादी साहेब को प्रणाम किया और बैठ गयी, दूसरा भी माणिक्य मुक्ता से सजा नवरत्न हार था, अपनी अलभ्य कारीगरी से जगमगाता वो भी अपनी अनुपम छटा बिखेर रहा था, उसे रेखा को दे उन्होंने उसके सर पर भी हाथ रख दिया__

” ये तो सही नही है दादी सा हुकुम! आखिर हम किस बात में बांसुरी से कम हुए, ज़रा बताइये?”

  रेखा की बात सुन बांसुरी ने तुरंत अपनी गोद में रखा हार रेखा की ओर बढ़ा दिया, जिसे देख दादी साहेब मुस्कुरा उठी__

” खुद देख लीजिए इसी बात में।” मुस्कुरा कर दादी सा ने बांसुरी के हाथ पकड़ कर उसका हार उसी की गोद में रख दिया__

” किस चीज़ की कमी है आपको रेखा? ” रानी साहेब के तेवर बिगड़ने को थे कि दरवाज़े पर थाप देते युवराज और समर अन्दर चले आये।
 
” आप दोनो इस वक्त यहाँ? ” रानी साहेब के सवाल पर युवराज ने जवाब दिया__

” माँ साहेब पिछ्ले दो चार दिन से इतनी व्यस्तता थी कि दादी हुकुम से मिलना ही नही हो पा रहा था, इसिलिए आज हमने सोचा सुबह महादेव के दर्शनों के बाद दादी हुकुम के दर्शन कर लें, उसके बाद ही नाश्ता करेंगे। अच्छा आप बता देंगी की कुलदेवी के मन्दिर कब जाना है तो उस हिसाब से तैय्यारी कर ली जायेगी, फिर राजतिलक भी तो होना है।”

” हम्म हम राज पुरोहित जी से बात कर के बतातें हैं, चलिये ठीक है आप लोग माँ सा के साथ बैठिए, हम जातें हैं नाश्ते की तैय्यारियाँ देख लें, मेहमान भी इन्तजार कर रहे होंगे , वैसे बांसुरी के मायके वाले तो प्रेम के घर चले गये होंगे।”

  बांसुरी के मन में बहुत देर से कुलबुलाहट मची थी कि मायके वालों से मिलने जाने के लिये उसे माँ साहेब से पूछना तो पड़ेगा ही, पर पूछे कैसे?
  आखिर जब उन्होने बात छेड़ ही दी तो बांसुरी ने भी अपनी सारी हिम्मत समेटी और पूछ बैठी__

” माँ साहेब! मुझे आपसे कुछ पूछना था?क्या मैं प्रेम भैय्या के घर अपने घर वालों से मिलने जा सकती हूँ , असल में निरमा ने बुलाया था।”

जितनी ही धीमी और मीठी आवाज़ में उसने पूछा उतनी ही तेज़ और कठोर स्वर में उसे जवाब मिला__

” ठीक है नाश्ते के बाद एक घण्टे के लिये चले जाइयेगा …लेकिन समय का ध्यान रखियेगा!”

  ” माँ साहेब! वो निरमा कह रही थी अगर मैं शाम तक वहाँ सब के साथ रुक जाऊँ तो?”

” सवाल ही नही उठता! यहाँ पूरा घर मेहमानों से भरा है, ऐसे में कोई भी नयी बहु से मिलने को कहेगा तो हम क्या जवाब देंगे कि एक ही दिन पहले विदाई हो कर आयी बहु मायके वालों के साथ बैठी है। ऐसा नही हो सकता, हमने जितनी देर को कहा उतनी देर में आ जाइयेगा।” फिर बिना उसका कोई जवाब सुने वो उठ कर वहाँ से चली गईं__

  बांसुरी ने एक बार राजा की तरफ देखा और वो भी रानी साहेब के पीछे चली गयी, उसे लगा राजा उसके पीछे आ जायेगा लेकिन वो युवराज भैय्या और समर के साथ वहीं रूक गया।

    नाश्ते की तैय्यारियाँ वैसे भी सारे नौकर चाकर कर ही रहे थे, उस हॉल के एक ओर बने बड़े से कमरे में बहुत सी तरह के लेन देन के सामान को फैलाये बैठी रूपा भाभी किसे क्या देना है किसे क्या नही पर जया से चर्चा कर रहीं थीं….तभी वहाँ रानी साहेब बांसुरी और रेखा को साथ लिये पहुंच गयी।
  कुछ मिनटों में ही उन्होने वहाँ उपस्थित सभी को समझा दिया कि क्या किसे दिया जायेगा।
  वैसे राजमहल के तोहफ़े थे तो लाजिमी है सभी महंगे और कीमती थे लेकिन रेखा के परिवार के लिये अलग किये गये तोहफों और बांसुरी के परिवार के लिये अलग किये तोहफों में अन्तर साफ़ झलक रहा था, और जिसे देख अपमान से बांसुरी की आंखें भर आयी।
   उसके परिवार के लिये रखे तोहफो के साथ ही घर की सहायिकाओं के तोहफ़े भी रखे थे, ये बात उसे और कचोट गयी लेकिन कुछ देर में ही वो अपने घर वालों के साथ होगी यही सोच कर उसने खुद को तसल्ली दे ली।
         महल के मेहमानों के नाश्ते की व्यवस्था दीवानखाने मे की गयी थी और सारी महिलाओं की व्यवस्था महल के डाईनिंग में थी, चूंकि पुरूषों को बाहर ही खाना था इसलिये नाश्ते पर भी राजा से मुलाकात होने का कोई संयोग ना था।
   कल भी दोपहर से गया रात में लौटा था, आज भी दादी सा से मिलने के बाद उसके साथ लौटने की जगह वहीं रह गया, अब वो कैसे उसे बुलाये और निरमा के घर निकले इसी उधेड़ बुन में उससे ढंग से कुछ खाया भी नही गया…..
     जैसे तैसे दो चार उल्टे सीधे निवाले निगल कर वो चाय ले कर बैठी रही….
   उसे ये राज महल की चाय भी रास नही आ रही थी, चाय मांगते ही सहायिका आगे आकर कप में खौलता पानी और टी बैग डाल जाती, और फिर कुछ देर में मिल्क और शुगर क्यूब…. उसे इस नकली चाय पर भी गुस्सा आ रहा था,  बांसुरी के मन में ऊहापोह था … हाय रे महल सोने का कप और उसपे नकली चाय इससे तो हमारे चीनी मिट्टी के कप भले हैं कम से कम चाय तो स्वाद भरी बनती है…अदरक इलाइची डाल कर खौला खौला कर बनाई गाढ़े दूध की चाय का एक घूंट भीतर जाते ही जो सनसनी रगों में दौड़ती है उसका मुकाबला ये चाय कैसे करे, ऐसे ही थोड़े ना चाय को अमृत कहा गया है__

” कहाँ खोयिं हैं देवरानी सा, लगता है कुंवर सा ने रात भर सोने ना दिया आपको, इसलिये नींद भगाने चाय ही बस गुटक रहीं हैं।”

  रूपा की ठिठोली का जवाब दिये बिना वो बस मुस्कुरा कर रह गयी, ये तो बस वो ही जानती थी कि कुंवर सा ने उसे कितना जगाया था।
    रेखा की कुछ रिश्ते की बहनें थी और भी कई सारी रिश्ते की ताई सा काकी सा फु सा बैठी हंसी ठिठोली करती नाश्ता करती रहीं लेकिन बांसुरी का मन वहाँ फिर किसी काम में नही लगा….
   वहाँ सभी बैठे खा पी रहे थे तो अकेले उसका उठ जाना शोभा भी नही देता, इसी से चुपचाप बैठी घूंघट के नीचे अपना चेहरा लिये वो सबकी बातें सुनती रही_

” बांसुरी अगर आपका नाश्ता हो गया है और आप अभी जाना चाहती हैं तो निकल जाइये, हम किसी से कह कर आपको प्रेम के घर पहुंचवा देते हैं।”

रानी साहेब की बात सुन उसे लगा जैसे भगवान ने उसकी सुन ली, वो तुरंत ही खड़ी हो गयी__

” जी माँ साहेब हुकुम!”

उसके मायके जाने के उतावले पन को देख वहाँ बैठी सभी एक बार को हँस पड़ी, एक हल्की सी रेखा रानी सा के होंठों पर भी आकर ओझल हो गयी।
   किसी को भेज कर ड्राईवर को पिछ्ले बगीचे के पीछे के दरवाज़े पर गाड़ी लगाने को कह रानी साहेब ने सहायिकाओं से कह उसके घर भिजवाने वाली मिठाइयाँ फल और तोहफ़े गाड़ी में चढ़ाने को कह दिया__

” सामने घर के अधिकतर पुरूष सद्स्य बैठे हैं, वहाँ से आपका निकलना नही हो पायेगा, आप इस तरफ के दरवाज़े से निकल जायें।

  हाँ में सर हिला कर वो जाने को हुई कि रूपा भाभी ने उसे इशारे से माँ साहेब के पैर छूने की याद दिला दी, फटाफट माँ साहेब साथ बाकी सभी बड़ी बुजुर्गों के पैर छूती अंत में रूपा भाभी के पैर छूने को झुकती बांसुरी ने धीरे से रूपा भाभी के कान में थैंक यू बोल दिया__

” हम तो बैठे ही हैं आपकी मदद करने। जल्दी वापस आ जाना, हिटलर का भरोसा नही है।” रूपा ने इतना फुसफुसा के कहा फिर भी साथ बैठी जया ने सुन ही लिया __

” क्या भाभी सा कुछ भी! सामने ही हैं, सुन लिया तो?”

” तो हम कौन सा किसी से डरतें हैं।”  उन तीनों की हल्की खिलखिलाहट के साथ ही बांसुरी  सब से विदा ले झट से गाड़ी में जा बैठी।
     गाड़ी में बैठते ही उसने राजा को फ़ोन लगा लिया लेकिन एक या दो रिंग के बाद ही उसने फ़ोन काट दिया।
  गुस्से में फ़ोन वापस अपने पर्स में डाल उसने अपना लम्बा सा घूंघट पीछे किया और चैन की सांस ली…..

क्रमशः

aparna..

   
  
 

   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s