जीवनसाथी-55

जीवन साथी –55


  
गुस्से में फ़ोन वापस अपने पर्स में डाल उसने अपना लम्बा सा घूंघट पीछे किया और चैन की सांस ली….

  लड़कियों का जीवन इसिलिए कठिन होता है…. अपने प्रेमी पति को बिना देखे भी चैन नही मिलता और ना मायके वालों का मोह छूटता है, दो पाटों के बीच पिस कर रह जाती है ज़िंदगी, जिसने तारतम्य बैठा लिया वो सुखी वर्ना बस इसी रस्साकशी में जीवन गुजर जाता है।

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   सात बजे तक अम्मा भी चलीं आयीं तब तक में निरमा काफी सारे काम निपटा कर नहा कर पूजा कर रही थी…अम्मा ने आते ही रसोई में बरतनों की उठापटक कर अपनी उपास्थिती दर्ज करवा दी, ऊपर पूजा में बैठी निरमा को जैसे ही रसोई से आवाज़ें आनी शुरु हुई वो आरती पूरी कर लगभग भागती सी सीढिय़ां पार कर नीचे पहुंच गयी__

” कितना शोर मचा रही हो अम्मा! देख नही रही यही सोयें हैं ये।”

  ” अरे हमरा तनिको धियान नही गया बहुरिया…. तुम्हरे लाने चाय बना दें।”

” नही मैं चाय नही लूंगी अभी! आप ऐसा करें फटाफट ये बड़े उतार दें … मैने दो अलग अलग बरतनों में दाल पीस रख छोड़ी है, उरद के बड़े उधर दही में भिगो दिजियेगा उसके बाद ये टमाटर धनिया मिर्ची की चटनी ज़रा अपने स्टाइल में वो पत्थर के सिल पर पीस दिजियेगा।
  मूंगोड़ियों के साथ यही तीखी चटनी अच्छी लगेगी….

” काहे टिमाटर की सास के साथ नही खावे हैं का मेहमान ?”

  ” काहे जिज्जी अब टिमाटर की भी सास पैदा हो गयी? “

सुमित्रा की बात पर तीनों हँस पड़ी __

” और का का बनाना है बहुरिया बता दो, हम तैय्यारी कर लें।”

  ” खीर मैने सुबह ही बना कर ठंडी करने रख दी है, ये गोभी आलू, भिन्डी और कद्दू निकाल रखा हैं आप काट कर एकदम देसी छौंक में कद्दू छौंक देना और कढ़ी भी…भिन्डी का भी मसाला तैय्यार कर चुकी हूँ बस आप चीरा लगा के भर कर तेल में छोड़ देना, गोभी और मटर पनीर और बाकी मैं बना लूंगी।”

  ” अच्छी बात है, पर श्री गणेश तो हम चाय पीकर ही करेंगे, अपने लिये चढ़ाने जा रहें हैं, फिर पूछ रहे तुम्हारे लाने में भी चढ़ा दें।

” ठीक है! चढ़ा दो मोरी अम्मा, बिना पिये छोडोगी थोड़े ना मुझे?”

  उन्हें चाय बनाता छोड़ वो बाहर के कमरे में आयी और कमरा समेटने लगी, वैसे भी बच्चे तो थे नही कि कुछ भी फैलता, घर उसका हमेशा साफ़ सुथरा जमा हुआ ही रहता….फिर भी उसे साफ़ सफाई का कीड़ा था, हर साफ़ चीज़ को भी वो नियम से रोज़ साफ़ करती , हर खिड़की पोंछती, हर गलीचा बुहारती …. सुमित्रा से हर चार दिन में दीवारों के किनारे झड़वाती कि कहीं जाले ना लग जायें, हर एक सीढ़ी उसके आने के बाद से चमकने लगी थी….लेकिन सुमित्रा को ये नयी मालकिन फूटी आँख ना सुहाती….
   जब देखो तब तरतीब से जमी चीज़ों को हटा हटा कर सफाई करवाती, यहाँ तक की बाहर का लोहे का गेट भी रोज़ धुलवाती, निरमा का सख्त आदेश था कि झाड़न के अलावा रसोई की सफाई के कपड़े हों या पोन्छा वो भी रोज़ साबुन से धोकर सुखाया जाये…
   अब घर पर काम करने वाले क्या जाने कि उसके बिचारी के पास अपना मन बहलाने के लिये कुछ ना कुछ करते रहने के अलावा चारा भी क्या था….
  हॉल में लगी हर चीज़ को पोंछती निरमा प्रताप की तस्वीर के सामने से चुपचाप हट जाया करती, आखिर उसी पर से तो मन हटाने के लिये इतने प्रयत्न थे , फिर उसी की तस्वीर देख वो प्रयत्न विफल ना हो जाते।

निरमा के आने के पहले सुमित्रा को इस घर में बहुत आराम था, जब मालिक कोई अकेला आदमी हो तो नौकरों की मौज हो ही जाती है। अम्मा अक्सर नीचे जब खाना पकाने में लगीं होतीं उस वक्त ऊपर के हिस्से में कभी मन से तो कभी बेमन कभी पूरा तो अक्सर अधूरा ही पोन्छा मार कर सुमित्रा चली आती थी। कई बार तो साहब के पैंट या शर्ट की जेब से झान्कते सौ दो सौ के नोट पर भी उसने हाथ साफ़ कर दिया था… ज़रूरात थी उस पर रुपये जेब से खुद झांक कर कह रहे थे ,ले जाओ हमें तो वो बेचारी क्या करती, चुपके से निकाल लिये…और साहब भी इतने बुद्धिमान की चार दिन बाद भी जेब से पार रुपयों का होश नही था।
  पहली बार ना पकड़ाई तो मन थोड़ा और चंचल हुआ और अब अपनी चार हज़ार महीने की तन्ख्वाह के ऊपर हर महीने सात आठ सौ अलग से पार कर जाती, लेकिन ये नयी मालकिन के आ जाने से उसकी कई चीज़ों पर रोक लग गयी।
   अब साहब के कपड़े धोने के लिये भी मालकिन ही निकाल कर देतीं तो ऊपरी कमाई वैसे ही ढ़प हो गयी उस पर हर जगह भले ही पीछे पीछे ना घूमे पर अपनी गिद्ध सी नज़र ज़रूर उसकी गरदन पर टिकाये रखती जिससे उसकी मेहनत में भी इज़ाफा हो गया था।
  पहले तो आधी देर काम होता था, बाकी के आधी देर टीवी पर ‘नागिन ‘चला के अम्मा के साथ महल और आसपास की चर्चा में निकल जाता था, अब इस नयी मालकिन के आने से टीवी पर भी रोक लग गयी थी,” जब खुद ही नही देखतीं तो हमें क्या देखने देंगी”  एक बार बहुत भन्ना के उसने अम्मा के सामने शिकायत भी की थी लेकिन सीढियों से उतरती निरमा ना सुन ले इसी से अम्मा ने आँख दिखा कर उसे चुप करा दिया था।

  अम्मा चाय लिये हॉल में आयीं तब तक निरमा सारे कमरे को व्यवस्थित कर चुकी थी, और सुमित्रा को झाड़फानूस की सफाई कैसे करना है एकदम धीमी आवाज़ में समझा रही थी।
   टेबल पर अम्मा ने चाय रखी और निरमा को धीमे से आवाज़ दे उठी__

” बहुरिया ! चाय ले लो, और सुनो तुम्हारे केशन का पानी बाबू पर टपक रहा है, बाल ज़रा पोंछ लो वर्ना सर्दी लग जायेगी। वैसने बड़ी ठंड है।”

  बड़े काउच के पास ही खड़ी वो उसके ऊपर सजे रैक पर के सामान को साफ़ कर रही थी, अम्मा की बात सुन उसका ध्यान गया कि इतनी देर से उसके बालों से पानी टपक टपक कर प्रेम के सीने पर की कमीज का हिस्सा भीग गया था, और शायद ठंड से ही अपने हाथ और सिकोड़े वो थकान से उठ नही रहा था।
   बाल एक झटके में पीछे करने के चक्कर में बालों का पानी प्रेम के चेहरे पर भी छिटक गया और चौंक कर वो उठ बैठा….
   उठते ही उसका ध्यान अपनी भीगी कमीज पर चला गया और उसे नींद में ठंड लगने का राज़ समझ आ गया…वो ऊपर जा ही रहा था कि अम्मा ने पानी के गिलास के साथ चाय भी उसके सामने रख दी।
   निरमा से अम्मा और सुमित्रा के सामने प्रेम से अचानक कुछ कहते ही नही बना, और वो चाय पीकर ऊपर चला गया।

    लगभग दस बजे तक बांसुरी के परिवार वाले निरमा के घर चले आये ….उसके सबको चाय नाश्ता करवाते में प्रेम भी उसकी मदद करता रहा ….
    खाने की तैय्यारियाँ वो वैसे भी कर ही चुकी थी… इसलिये आगे के काम अम्मा और सुमित्रा को समझा कर वो बांसुरी की माँ ताई और दीदी के संग लिये ऊपर चली आयी।
    बांसुरी की बुआ की ननंंद भोपाल रहती थीं इसीसे नाश्ता निबटने के बाद वो और फूफा जी भोपाल निकल गये थे उनसे मिलने।
      सारी औरतें चाय के कप थामे निरमा के कमरे में बिना किसी औपचारिकता के आराम से बैठी महल और महलवासियों की बातों में लगीं थीं कि बांसुरी की गाड़ी पोर्च में आ रुकी।
   बांसुरी में सामान उतरवा लेने का भी सब्र नही था, प्रेम को सामने देखते ही उसे सब देख लेने की गुजारिश कर वो अन्दर भाग गयी। आज प्रेम के घर पहुंच कर उसे वाकई लग रहा था वो अपने मायके पहुंच गयी है…..
    भाग कर अपने पिता के गले से लगते ही उसे लगा वो रो पड़ेगी लेकिन फिर खुद को संभाल कर नीचे सबसे मिल कर वो ऊपर चली गयी।
    एक एक कर सबसे गले लगने के बाद अपनी माँ के गले में दोनो बाहें डाल वो उनके पास ही बैठ गयी।
पीली राजपुतानी पोशाक में उपर से नीचे तक सोने से लदी लकदक करती बांसुरी को देख उसकी माँ ने उसकी नज़र उतार ली__

” कैसी है मेरी लाड़ो?”

” खुद देख लो।” उसका चहकता जवाब सुन सभी आश्वस्त हो गईं, वीना तो एक एक कर उसके हार ही इधर उधर कर देखे जा रही थी, सुबह का दादी सा का पहनाया हार अलग ही दमक रहा था__

” सुमित्रा, गरम मूंगोड़ियों की एक प्लेट ऊपर ही ले आ”

निरमा की बात सुन बांसुरी उसे देख बोल पड़ी __

” यार अभी खाऊंगी कुछ नही! तू सबसे पहले एक जानदार चाय पिलवा दे, खूब अदरक वाली और अच्छी खौलाई हुई, सिर्फ दूध पत्ती ना उबाल के दे देना।”

” क्यों तेरे महल में चाय ना मिली तुझे?”

” मिलती है यार लेकिन वो हीरे मोती सी चाय सुहाती जो नही।”

दोनो सहेलियाँ सर से सर भिड़ाये हँस पड़ी, काफी देर तक गपशप करने के बाद बांसुरी की माँ और ताई बांसुरी के लिये अपने हाथों से रसाज बनाने के लिये रसोई में चलीं गयीं….वीना का बेटा भी इधर उधर भाग भाग कर थक कर सो गया, उसे लिये वीना दूसरे कमरे में चली गयी….
   दोनो सखियाँ अकेली रह गई , निरमा मुस्कुराने लगी बांसुरी को देख देख कर__

” क्या हुआ? ऐसे क्यों मुस्कुरा रही है?

” अब बता भी दे…”

” क्या बता दूँ?”

” यही कि कितना सताया तेरे राजा जी ने।”

बांसुरी मुहँ बनाये दूसरी ओर देखने लगी__

” रात में मेरे सोने के बाद कब आये कमरे में मुझे पता तक नही चला, सच में सता ही दिया मेरे राजा जी ने।”

” चल झूठी, जो लड़का शादी के लिये ऐसे जूझे पड़ा था वो ही अपनी पहली रात में गायब!”

” और क्या? मैं झूठ क्यों बोलूंगी भला , अब हो गया ना , शादी हो गयी निश्चिंत हो गये राजा साहेब।”

” हम्म वैसे कल रात ये भी बहुत देर से आये , शायद ढाई-तीन के आस पास, क्योंकि दरवाज़े की हल्की सी आवाज़ पर भी मेरी नींद खुल जाती है आजकल… हालांकि मैंने देखा तो नही पर अंदाज़ा लगा रही, मतलब ये लोग साथ ही रहे होंगे ….बांसुरी मुझे लग रहा कोई बात तो ज़रूर है, क्योंकि ये कभी ऐसा करते नही, चाहे कितनी देर से आ जायें पर कभी बाहर के कपडों में ये सोते नही लेकिन कल तो जूते तक नही उतारे, मतलब ज़रूर कुछ चिंता में रहे होंगे।”

” वाह जी वाह आप बड़ा नोटिस कर रही हैं आजकल वैसे नीरू ये सब दोस्त मिल कर पी रहे होंगे कहीं बैठ कर।”

” नही कभी नही! पहला तो ये पीते नही और दुसरी बात हल्का सा शक मुझे भी हुआ तो मैने सुबह इनके चेहरे के पास जाकर सूंघ कर भी देख लिया लिकर की कोई स्मेल नही थी।”

” क्या बात है नीरू ! जब इतने पास पहुंच गयी तो आगे बढ कर चूम भी…

“चुप कर यार! मैं कहाँ तुझे छेड़ने का प्लान बनाती बैठी थी और तू मुझ पर ही शुरु हो गयी।”

  दोनो हँसती खिलखिलाती बातों में मगन थीं कि प्रेम उपर चला आया__

” निरमा! दो बज गया है, खाना भी लगवा ही देतीं , आंटी कब से किचन में काम पे लगीं हैं, ज़रा आप देख लो।”

” अरे ये सब इस बातूनी के चक्कर में हुआ है तबसे अपने अजातशत्रु जी के किस्से सुना सुना कर पका रही है मुझे।”  एक बांसुरी ही थी जिसके साथ निरमा पुरानी निरमा बन जाया करती थी वर्ना तो अधिकतर समय बस ज़रूरत भर की बातें बोल चुप हो जाया करती।

  अपनी बात पूरी करते करते निरमा जल्दी से पलंग से उतर कर भागने के चक्कर में अपनी ही साड़ी में फंस कर गिरते गिरते बची__

” अरे आराम से! संभाल कर चलो निरमा।” प्रेम की बात पूरी होने से पहले बांसुरी ने अपना राग छेड़ दिया

“अच्छा बेटा! और तू जो प्रेम भैया के किस्से सुना रही थी , उनका क्या?

बांसुरी ने बस कहने को कह दिया लेकिन प्रेम के सामने उसका खुद का नाम सुन निरमा झेंप कर उसे देखे बिना ही नीचे चली गयी।

   एक घण्टे में लौटने का मन नही था, उस पर एक घन्टा सिर्फ पांच मिनट में ही बीत गया था, किसी तरह कुछ देर और रुकने की पर्मिशन राजा दिलवा देता तो कितना अच्छा होता सोचती बांसुरी राजा को फ़ोन करने जा रही थी कि उसी का फ़ोन आ गया….सौ साल की उम्र है साहेब की मुस्कुराती बांसुरी ने फोन उठा लिया__

” मिल गयी फुरसत! याद आ गया कि एक बीवी भी है।”

” बीवी के ही कारण तो सब कुछ भुला रखा है, अभी आप हैं कहाँ हुकुम?”

” बस कहने भर को हुकुम, बाकी तो गुलाम ही हूँ आपकी, सुबह से कहना चाहती थी कि आज मम्मी पापा निकल जायेंगे वापस, तो निरमा के घर जाना है सबसे मिलने, पर आप सुने तब ना?”

” ओह्ह! तो तुम पहुंच गयी हो ना?”

” हाँ मैं पहुंच गईं हूँ,और सुनो ना एक बात कहनी थी..”

“कहो?”

“मम्मी लोग शाम को निकल जायेंगे तो मैं कुछ देर और रह सकती हूँ क्या सबके साथ? माँ साहेब ने कहा था एक घण्टे में वापस आ जाना …

” अब ये तो तुम्हारे और मॉम के बीच की बात हो गयी, मैं क्या बोलूं…बहुत मन है क्या रुकने का?”

” हम्म बहुत।”

” ओके रुक जाओ , मैं मॉम से बात कर लूंगा…मुझे भी तो मिलने आना ही है , तो मैं ऐसा करता हूँ शाम को ही आऊँगा तो हम भी एयरपोर्ट तक साथ ही चलेंगे छोड़ने…खुश!”

” बहुत खुश , बहुत बहुत ज्यादा खुश, चलो अब मैं नीचे जा रही , सबका खाना पीना चल रहा है, और सुनो ?”

” कहिये हुकुम अब क्या है?”

” तुमने खाना खाया? ”

” चलिये आपको याद तो आया, अभी तक कुछ खा नही पाया हूँ, समर के साथ ऑफिस में था एक्चुली, अभी उसी के साथ थोड़ा काम से बाहर भी जाना है …

” अरे कुछ खा कर ही निकलना ना प्लीज़!”

राजा ने हँस कर हामी भरी और फ़ोन बंद कर मुस्कुराने लगा उसे मुस्कुराते देख समर के चेहरे पर भी एक हल्की सी मुस्कान आकर चली गयी__

“हुकुम ! आप कुछ खा लीजिए, तब तक मैं ऑफिस से सारे पेपर्स भी ले आता हूँ।” समर राजा को दीवानखाने में छोड़ ऑफिस निकल गया।

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    टेबल पर मोटी मोटी किताबें फैलाये बैठी पिंकी कभी कुछ तो कभी कुछ उठा कर देख रही थी…. शाम का वक्त हो चला था, रतन नहा कर आने के बाद रसोई से दो बड़े कप में चाय लिये चला आया।
    उनके घर का कोना कोना ऐसा था जैसे वो किसी बैचलर का घर है….फर्नीचर जो घर के साथ मिला था उस्के अलावा दोनो ने कुछ नही खरीदा था…रसोई में भी दो कप दो प्लेट ऐसे दो दो के जोड़े में ज़रूरत भर के बरतन थे।
रतन का सारा वक्त सिर्फ पढ़ने में निकलता फिर भी वो अपनी पढ़ाई से संतुष्ट नही हो पाता था, वहीं पिंकी दिमाग से तेज़ होने पर भी जाने क्यों उतनी शिद्दत से पढ लिख नही पा रही थी, हालांकि यहाँ तक का सफर भी उसने रतन के साथ की पढ़ाई के बूते ही पार किया था लेकिन अब जब इंटरव्यू को चंद रोज़ ही बाकी थे उसका संयम डिगा जा रहा था, पढ़ाई से अधिक वो ब्रेक पे फोकस करती, लेकिन मज़े की बात यह थी कि इस सब के बावजूद उसे अपने सिलेक्शन का सौ प्रतिशत विश्वास था।

” किताबों को देखने से नही मैडम पढ़ने से दिमाग में घुसेगा।”

” यस सर , वही तो सोच रहें हैं हम कि कहाँ से शुरु करें।”

” यार तुझे रोज़ रोज़ यही समस्या क्यों आती है? सोने से पहले अपने अगले दिन का चार्ट क्यों नही रेडी कर के सोती कि अगले दिन क्या क्या पढना है।”

  वैसे तो रतन नाराज़ कम ही होता था लेकिन आज जाने क्यों उसका दिमाग खिसक गया__

” लाओ ज़रा वो दर्शन वाली बुक दो, देखूँ आखिर इतने दिन से कौन सी चरस बो रही हो?”

” ओह्ह मिस्टर कानपुरिया! तुम हमारा टेस्ट लोगे?”

” हाँ तो और कौन लेगा भाई, हमी ना तुमसे ब्याह कियें हैं, तो हमरी जोरू जी ज़रा कायदे से किताब खिसका दीजिये इधर और अब इधर उधर की बातों में हमारा टाईम ना वेस्ट किजीये।”

” छोड़ो भी रतन, तुम तो हमारे मास्टर जी बन गये, चाय पी के हम अपना पढ़ते हैं तुम अपना पढ़ो।”

रतन ने  गुस्से से अपनी चाय का कप टेबल पर पटका और किताब खुद हो कर खींच ली, किताब खोल उसने पहला सवाल पुछा __

” सांख्य दर्शन के प्रवर्तक बोलो?”

पिंकी को याद भी रहा होगा तो रतन के तीखे चेहरे को देख भूल गयी__

” गौतम ने?” पिंकी का जवाब सुन रतन की त्योरियां चढ़ गईं

” अच्छा ? फिर न्याय किसने दिया?

” सॉरी वो ….”

” पिंकी अब यहाँ तक आने के बाद तुम्हारे इस सॉरी का क्या करुँ मैं,?
      यार बच्चे बच्चे को याद रहते हैं ये नाम।
इतना ही आसान होता तो हर घर का दूसरा बच्चा सिविल सर्विसेस में ही होता,  तुम्हें समझ क्यों नही आता यार, मज़ाक बना रखा है तुमने सबकुछ!
ना ढंग से खुद पढ लिख रही हो ना मुझे पढ़ने देती हो।”

” तुम्हें कब रोक है हमने? बोलो ज़रा ? सारा दिन यही तो करते हो बस पढ़ाई पढ़ाई पढ़ाई…यार तुम्हें तो कोटे का भी बेनिफिट मिलेगा फिर क्यों दिल जला जला के पढ़ रहे हो?”

” बस इसी बात से बचने के लिये। मुझे रिज़रवेशन के बिना खुद को सेलेक्शन लिस्ट में देखना है। रतन सूर्यवंशी सेलेक्तेड इन जनरल कैटगरी…तुम मेरी तकलीफ मेरी पीड़ा नहीं समझोगी….  तुमने वह सब देखा नहीं झेला नहीं है ना इसलिए।”

“सॉरी रतन तुम तो बुरा मान गए, हम तो बस ऐसे ही कह रहे थे, तुम्हारा सिलेक्शन पक्का है बेबी और हम भी तुम्हारे पीछे-पीछे कैसे भी पार हो ही जाएंगे।”

” इतना आसान नहीं है पिंकी!! जितना तुम्हें लग रहा है , अभी भी वक्त है किसी वाजिब कैंडिडेट की सीट खाने से अच्छा है कि तुम पढ़ाई छोड़ दो और अपने महल वापस लौट जाओ, क्योंकि तुम मेरी जिंदगी नहीं जी पा रही हो मुझे साफ नजर आ रहा है।
        रात में कई कई  बार मैं खाना खाना ही भूल जाता हूं पढ़ाई के चक्कर में…….
     और मेरे कारण तुम रोती झींकती कुढ़ती हुई सो जाती हो, मुझे भी बुरा लगता है यार यह सब देखकर…..
      लेकिन मैं क्या करूं? मैं जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा…… अभी मेरे दिमाग में मेरी सीट और मेरे सिलेक्शन के अलावा कुछ नहीं चल रहा…..
     मैं तुम्हें अगले 2 महीने तक बिल्कुल समय नहीं दे सकता, अगर तुम सीरियसली पढ़ना चाहती हो तो मेरे साथ रुको वरना तुम अपने महल वापस लौट जाओ।”

    “सीरियसली आई एम सो सो सो सॉरी! रतन आइंदा अब कभी तुम्हें मौका नहीं दूंगी कुछ भी कहने का पक्का वादा करती हूं ।
    अब खूब पढ़ूंगी तुमसे भी ज्यादा तुम तो सिर्फ एक ही टाइम का खाना खाना भूलते हो मैं लंच और डिनर दोनों भूल जाऊंगी देखना!”

“तो फिर चलो यह जो चार किताबें तुम्हारे सामने पड़ी हैं  ना , उनके पांच नंबर के पेज नंबर से लेकर साठ  नंबर के पेज तक पढ़ो…. बस सिर्फ डेढ़ घंटा है तुम्हारे पास ….
.. ठीक डेढ़ घंटे बाद मैं किसी भी पेज पर का कोई भी सवाल पूछ लूंगा अगर तुम नहीं बता पाई तो…”

“तो- तो क्या?”

     रतन ने पास पड़ी हुई एक पेंसिल उठा ली और उसे पिंकी को दिखाते हुए मुस्कुराने लगा____

    ” तुम्हारी हथेलियों को उल्टा करके तुम्हारी फिंगर्स पर इस पेंसिल से मार पड़ेगी, समझ जाओ! कितनी तेज मार पड़ती है तुम्हें तो तुम्हारे स्कूल में भी कभी मार नहीं पड़ी होगी?”

“ओ माय गॉड ! इतने क्रूर हो तुम?
         तुम मुझे मारोगे क्रूर सिंह कहीं के….”

   “बिल्कुल मारूंगा मेरी चंद्रकांता! मारना ही  पड़ेगा यार !क्योंकि तुम लातों की भूत ना बल्कि भूतनी हो, और तक तुम्हें पिटाई नहीं पड़ेगी ना,  तुम्हारे दिमाग में कुछ नही घुसने वाला।
    तुम्हारा टाइम अब शुरू हो रहा है…. अब इधर उधर की बकवास की जगह अपना पूरा टाइम मैनेज करो और रट्टा मारने में लग जाओ बेबी……. रेडी स्टेडी गो।।

एक नजर रतन को गुस्से में देख पिंकी वापस किताबें खोलकर पढ़ने में जुट गई, और रतन मजे से अपनी चाय पीते हुए उसके सोफे के पीछे इधर-उधर टहलते हुए अपना सुबह का याद किया हुआ कोई पाठ याद करता रहा।

**********

      बांसुरी के परिवार वाले पहले ही राजा साहब रानी साहब और दादी सा से विदा लेकर अपना सारा सामान साथ ले कर हीआए थे…… अब उन्हें निरमा के घर से ही सीधे एयरपोर्ट निकलना था, बांसुरी को भी शाम तक रुकने के लिए राजा कह चुका था।
      खाना पीना निपटने के बाद सब आराम करने चले गए और सारी औरतें एक साथ निरमा के कमरे में बैठी गप्पों में लगी रही, शाम होते होते राजा भी चला आया….
    निरमा नीचे सभी को चाय देकर ऊपर ट्रे लिये चली आयी__

” आ गयें हैं आपके राजा साहेब भी।”

राजा का नाम सुनते ही बांसुरी की आंखें चमक उठीं, वो उठ ही रही थी कि निरमा ने उसे बैठा दिया __

” चाय पी कर ऊपर ही आयेंगे, आंटी लोगों से मिलने… बस उसके बाद तो एयरपोर्ट के लिये निकलना ही है। तू भी तो जायेगी ना?”

” हाँ! तू भी चल ना, लौटते में तेरा साथ हो जायेगा?”

” चल झूठी! तेरे उनके रहते तुझे किसी और के साथ की क्या ज़रूरत…..
   बांसुरी की माँ और ताई तैय्यार होने चली गईं थी, वीना भी बच्चे की देख भाल में व्यस्त थी__

” लौटते वक्त शानदार हाइवे है बस तुम्हारी हनीमून डेस्टिनेशन मिल गयी तुम दोनो को।

  निरमा की बात सुन बांसुरी लजा कर अपनी कप को देखने लगी__

” तू ना बहुत पटर पटर करने लगी है नीरू, देखना कहीं तेरा बेबी जबर्दस्त बातूनी ना निकल जाये…
   बांसुरी की बात के बीच ही अम्मा कुछ पूछने कमरे में चलीं आयीं और दोनों सखियाँ उन्हें देख एकदम से चुप हो गईं।
    अम्मा खुद क्या पूछने आयीं थी वही भूल निरमा को टुकुर टुकुर ताकने लगीं__

” अरे क्या हुआ अम्मा ,ऐसे काहे देख रही हो। पूरियां बन गईं ना और कलौंजी?”

” हाँ देखो यही तो आये रहे पूछने…कि बहुरिया पूड़ी तो छान डारी हैं हमने कलौंजी भी हुई गयी,अब ऊ सब सामान को जतन से रख उख तो दो।”

” हाँ आप चलिये, मैं आ रही नीचे। ” निरमा बांसुरी की ओर मुड़ गयी__

” भई तेरे सासरे से भले ही टोकरियां भर भर के मेवे मिठाई भेज दे तेरी सासु माँ लेकिन घर जाकर तो चाचा जी और चाची उसी से पेट नही भर सकते ना इसिलिए थोड़ी सी पुड़ियां साथ रख दे रहीं हूँ, घर पहुंच कर फिर कहाँ खाना बनाने का जी करेगा?”

बांसुरी मुस्कुरा कर निरमा के गले से लग गयी।
सभी सही समय पर एयरपोर्ट के लिये निकल गये……

   यही तो असली बिदाई थी फिर जाने कब अपने ही घर वालों से भेंट हो …. किसी के आंसू थम नही रहे थे, आखिर खुद को संभाल कर बांसुरी के घर वाले अन्दर चले गये।
   सबको जाते देखती खड़ी बांसुरी को राजा ने धीरे से पकड़ा और साथ लिये बाहर निकल गया।
    बांसुरी के बहुत कहने पर निरमा भी चली आयी थी, निरमा राजा और बांसुरी के साथ आगे बढ़ती उन्हीं की गाड़ी में बैठने लगी__

” क्या भाभी जी! आप यहाँ कहाँ मेरी गाड़ी में चली आ रहीं हैं, एक तो वहाँ मेरा दोस्त अकेले इतना लम्बा रास्ता ड्राइव करने में बोर हो जायेगा और दूसरा आप हम नये नवेलों के बीच कबाब में हड्डी बन फंस जायेंगी।”

  राजा ने हँसते हुआ कहा और उसकी बात सुन निरमा भी मुस्कुरा उठी__

” ये विदाई के चक्कर में इमोशनल हो गयी सो भूल ही गयी कि आपको अभी डिस्टर्ब ना करुँ। आप भी क्या याद करेंगे जाइये ऐश किजीये, मैं भी जा रही।”

दोनो जोड़े वहाँ से निकले और राजा की बतायी जगह पर डिनर के लिये निकल गये….
    खाते पीते,घुमते-फिरते उन्हे काफी रात हो गयी थी, वैसे राजा रानी साहेब को बता चुका था फिर भी अब तक वो अपनी सहायिका से दो बार राजा की वापसी के बारे में पूछ चुकी थीं।

     निरमा की थकान को ध्यान में रखते हुए प्रेम उसे लिये घर निकल गया और राजा बांसुरी को साथ लिये बड़ा तालाब की तरफ निकल गया।
     एक बैंच पर बाहों में बाहें डाले दोनो बैठे रहे। सामने दिखता नीला काला पानी बांसुरी के अन्दर जहां उसके नये जीवन के सपनों उसकी उमन्गों में रंग भर रहा था वहीं राजा के मन में अजीब सा कोलाहल मचा रहा था….कभी उसे लगता बांसुरी से एकबारगी अपना दिल खोल के रख दे, और राजमहल से जुड़ा हर षडयंत्र हर काला खेल उसे बता दे पर दूसरे ही पल लगता  कि आखिर कैसे वो अपनी ताज़ी ताज़ी शादी को इन सब षड़यंत्रों से मैला कर दे, अखिर क्या सोचेगी वो …हैं तो ये सब राजा के ही घर परिवार के लोग।
   वो अपनी सोच में मगन था कि उसका ध्यान गया उसकी हथेली से खेलती वो उसके बहुत करीब बैठी उसे ध्यान से देख रही थी।
अपने चेहरे पर बांसुरी की सांसे महसूस करते ही उसने उसे देखा और उसका चेहरा अपने दोनो हाथों में थाम लिया __

” साब! इधर बैठने का टाईम खतम! आप लोग उठिए साब अब यहाँ से …”
    एक गार्ड आकर अपना दंडा ठक ठक करता वहाँ इधर उधर सीढियों और बाकी जगह बैठे लोगों को भगाने लगा….राजा भी बांसुरी का हाथ थामे खड़ा हो गया__

” कहाँ जा रहे अब हम? महल वापस जा रहे क्या?”

बांसुरी के सवाल पर राजा मुस्कुराता उसे देखने लगा__

” और कहाँ जायेंगे हुकुम? वही तो ठिकाना है हमारा?”

  ” हाँ पर इतना तेज़ गाड़ी क्यों भगा रहे हो? आराम से भी तो चल सकतें हैं।”

” कल रात का अधूरा काम जो पूरा करना है?”

राजा  हँसते हुए वापस बांसुरी को छेड़ने लगा …वो लोग अभी आधे रास्ते ही थे कि उसका फ़ोन रिंग होने लगा__

” कुमार कहाँ हैं आप?”  फ़ोन उठाते ही रानी साहेब की तीखी आवाज़ गूँज उठी….

“बस मॉम रास्ते में हूँ, आधे घण्टे में पहुंच जाऊंगा।”

” जल्दी आईये , यहाँ बड़ा अनर्थ हो गया है।”

” क्या हुआ मॉम! सुबह तक तो सब ठीक था?”

  ” आप जल्दी आ जाइये , हमने डॉक्टर साहब को बुला लिया है…आपकी दादी साहेब को स्ट्रोक हुआ लगता है शायद… अभी डॉक्टर लगें हैं जांच करने में, बस आप आ जाइये।”

  ” मैं तुरंत पहुंच रहा हूँ ….

क्रमशः

aparna..
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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