जीवनसाथी-56

जीवन साथी– 56

   

     जिसको भी देखिए वो अधूरा सा है यहाँ
      जैसे कहीं हो और वो आधा रखा हुआ
     वो जब जहाँ जुड़े वहीं जुदाईयाँ मिले
     ये कैसी भीड़ है बस यहाँ, तनहाईयाँ मिले…..

रानी साहेब के फ़ोन के बाद राजा की गाड़ी की तेज़ी और बढ़ गयी, उसने एफ एम पर चलते गाने को बंद किया और तेज़ी से गाड़ी महल की ओर भगाने लगा….

 महल पहुंचते ही  दोनो भागते हुए दादी साहेब के कमरे की ओर बढ़ गये….महल का हर सदस्य कमरे के बैठक वाले हिस्से में मौजूद था, अन्दर सोने वाले कमरे में दादी साहेब के साथ बस काकी सा मौजूद थी….
     उसके पहुंचते ही युवराज भैय्या उसकी तरफ चले आये__

” तुम्हें दो बार पूछ चुकी हैं दादी सा, आओ चलो मिल लो।”

” डॉक्टर कहाँ है भैय्या?”

” डॉक्टर साहब कुछ ज़रूरी दवाएं और मशीनें लेने निकलें हैं, बस आते ही होंगे…

  “हुआ क्या है दादी सा को?”

  ” फिलहाल तो स्ट्रोक ही कह रहें हैं, आओ कुमार।”

राजा के अन्दर जाते ही काकी सा एक ओर हो गयी, वो दादी सा के बहुत पास उनका हाथ थामे बैठ गया__

” युवराज ! कुमार आ गये ?”

” हाँ दादी सा मैं आ गया हूँ, ये क्या कर लिया आपने? सुबह तक तो आप ठीक थीं, फिर अचानक…

” कुमार जीवन ऐसे ही चलता है, मालूम तो होता है कि इन्सान बीमार है मरने वाला है पर एक दिन अचानक ही चला जाता है।”

” ये सब क्या कह रही हैं दादी सा आप? आप आराम किजीये…

“नही कुमार, हमें अपने मन की कह लेने दो… तिल्लोत्तमा!  ज़रा बाहर से अपनी जेठानी और जेठ को भी बुला लाओ।”

दादी सा ने कई दिनों बाद शायद सालों बाद अपनी छोटी बहु यानी पिंकी की माँ को उनका नाम लेकर पुकारा था… वो बाहर जा ही रहीं थीं कि उन्हें रोक युवराज बाहर चला गया और सब को साथ लिये वापस आ गया__

” युवराज ज़रा राज पुरोहित को भी बुलाना।”

  दादी सा के आदेश पर राज पुरोहित को साथ लिये समर चला आया…दादी सा की अवस्था अधिक बोलने की लग नही रही थी…
   स्पष्ट था कि हृदय में उठती पीड़ा उन्हें त्रास दे रही थी और वो थोड़ा सा कुछ बोल कर ही थक जा रहीं थीं, फिर भी अपनी सारी हिम्मत समेट कर उन्होंने सामने सोफे पर बैठे अपने बेटे बहु यानी राजा साहेब और रानी साहेब को देखते हुए कहना शुरु किया__

” वैसे तो रियासत के राजा आप हैं लेकिन हमारे लिये तो आजीवन हमारे बेटे ही रहेंगे…. एक राजपुतानी हैं हम…… इसिलिए शायद हमें कुछ मांगने की कभी आदत ही नही रही। जब हम बच्चीं थी तब भी सबसे छोटी लाड़ली राजकुमारी थीं हम, हमारे पिता हुकुम लाड़ लाड़ में हर काम हमसे पूछ कर ही करतें बारह की उमर में हम यहाँ इस रियासत मे ब्याह कर आ गईं …
  आपके पिता हुकुम ने भी कभी हमारी कोई बात नही टाली … आपका ये छोटा बेटा कुमार बिल्कुल अपने दादा सा की परछायी सा दिखता है, वहीं चौड़ा माथा, वैसी ही गहरी आंखें और बिल्कुल वही कद काठी… अफसोस इसी बात का है कि वो कुमार के पैदा होने के पहले ही चले गये।”

” माँ साहेब हुकुम आप कम बोलिये, डॉक्टर ने मना किया है।”

” डॉक्टरों का तो काम ही यही है, जब कुछ समझ नही आता तो कह देते हैं मरीज़ को आराम करने दो।
आप हमारी बात सुनिये राज्यवर्धन ….
    हम अपनी आखिरी इच्छा आपसे कहना चाहतें हैं, ये एक तरह से हमारा आदेश ही होगा लेकिन मानना नही मानना आपके हाथ में हैं।”

  बेटे ने माँ के दोनो हाथ थाम लिये __

” आप हुकुम किजीये माँ साहेब, आपकी हर इच्छा पूरी करने का वचन देते हैं हम!”

” सोच लीजिए कहीं फिर आपके वचन के पालन के लिये कोई और वचन टूट ना जाये।”

” आपसे बढ़ कर आज भी हमारे लिये कोई नही माँ साहेब! अगर आपकी बात पूरी नही कर पाये तो अपनी ही तलवार से अपना सर काट कर आपके चरणों में रख देंगे।”

” अरे ये क्या कह गये आप साहेब?”
 
   इतनी देर से शांत खड़ी रानी साहेब के मन में धुकधुकी सी चल रही थी उस पर राजा साहेब की आखिरी बात ने उनके प्राण हलक में फंसा दिये।

” तो सुनो राजा राज्यवर्धन सिंह बुंदेला हम आपकी जगह अब राजगद्दी पर आपके उत्तराधिकारी राजकुमार अजातशत्रु सिंह को राजा बना देखना चाहतें हैं ….एक बार अपने कुमार को राजा बना देख लें फिर हम शांति से अपनी आँखें हमेशा के लिये बंद कर लेंगे।”

  ” पर ऐसा कैसे हो सकता है माँ साहेब?”

रानी साहेब के प्रश्न की तरफ माँ बेटे में से किसी का ध्यान नही गया….

” आपकी इच्छा अवश्य पूरी होगी, हम अभी शकुन साइत दिखवा लेते हैं….

“नही ! हमनें राजपुरोहित को इसी लिये बुलवाया है, अभी हमारे सामने मंगलाचरण पढ कर कुमार के माथे तिलक करवा दीजिये, उसके बाद गद्दी पर की पूजा कल करवाते रहियेगा।”

” कोई हमारी बात भी सुनेगा, माँ साहेब ऐसा नही हो सकता, कुमार ने खुद वचन दिया था कि वो गद्दी पर नही बैठेंगे, इसी शर्त पर तो उनका विवाह एक ऐसी लड़की से मान्य हुआ जो राजपूत नही है।”

” ठीक कह रही हो बहुरानी! आज हमारी इच्छा पूरी हो जाने दो, हमारे जाते ही कुमार की जगह अपने लाड़ले को बैठा लेना गद्दी पर।”

” आप गलत समझ रहीं है माँ साहेब, लाड़ले तो हमारे कुमार ही हैं, हमें विराज को गद्दी पर बैठाने का कोई शौक नही है।

” फिर इतना विचार क्यों कर रहीं हैं आप?, बच्चों का वचन माता पिता की इच्छा से बढ़ कर नही होता…
हमारी राजशाही की किताब में कोई तो उपाय वचन भंग का भी दिया ही होगा।”

दादी सा की बात पर युवराज ने समर की तरफ देखा__

” हुकुम आप आज्ञा दें तो हम कुछ कह सकतें हैं?”

राजा साहेब ने इशारे से समर की बात पर हाँ कह दिया__

” कुलदेवी पूजा में कुमार सा के हाथों एक नारियल रखवा कर उनसे वचन भंग की क्षमा याचना करवाई जा सकती है।
  आपके प्राचीन इतिहास में कई जगह इस बात का उल्लेख है, वैसे तो आप लोगों में वचन तोड़ा नही जाता लेकिन अंग्रेजों के शासन के समय बहुत बार जब वो किसी बात पर किसी राजा को उसी की प्रतिज्ञा में उलझाने की कोशिश करते उसी वक्त पर वचन भंग की उपादेयता को ध्यान में रखते हुए ऐसा प्रारूप भी रचा गया था।”

” मतलब वचन तोड़ने का कोई दोष कुमार को नही लगेगा?”

” नही युवराज सा इन्हें कोई दोष नही लगेगा, आईये पुरोहित जी , आप इधर सामने आ जाइये।”

   फिर तो चट पट सब होता चला गया, संगम की नदियों के जल को कुमार पर छिड़क कर राज पुरोहित ने वहीं अपने मंत्रों के पाठ के साथ चंदन कुंकुम रोली का तिलक राजा साहेब की ओर बढ़ा दिया और  उन पवित्र मंत्रों के साथ राजा साहेब ने अपने पैंतालीस सालों के अनुभवों की गद्दी अपना वैभव अपने लाड़ले के माथे कर दिया…राजकुमार के भाल पर तिलक करने के लिये राजा साहेब ने अपनी छोटी सी कटार निकाल अपने अंगूठे पर चीरा लगाया और उसका तिलक कर दिया…
    अगले दिन ही सारे रिवाजों के साथ राज तिलक का मुहूर्त राज पुरोहित ने निकाला और उनके निकाले मुहूर्त पर दादी साहेब की मुस्कान ने मुहर लगा दी।
   एक एक कर सभी अपने अपने कमरों में चले गये, राजा दादी साहेब का हाथ पकड़े वहीं बैठ गया, सबके निकलते ही युवराज ने समर की ओर देखा__

” सब रटे बैठे हो समर? हमारी वंशावली हो या नियमावली, कुछ तुमसे छूटा नही है।”

” क्या करें युवराज सा , हुकुम को राजगद्दी पर बैठाना बहुत ज़रूरी था….विराज सा की हरकतें दिन पर दिन बढ़ती ही जा रहीं हैं और दुसरी बात इनका जीवन सुरक्षित करने का भी यही एकमात्र तरीका सही लगा ।”

  राजा आश्चर्य से समर की ओर देखने लगा __

” हुकुम इतना चौंकिये मत, मैने दादी साहेब की तबीयत खराब नही की है।”

” फिर क्या किया समर? आप की और युवराज भैय्या की बातें मुझे समझ नही आ रहीं।”

” जिस दिन आप अपनी दुल्हन के साथ दादी सा से आशीर्वाद लेने आये थे, उसी दिन आप लोगों के सामने ही हम और समर भी आये, सबके जाने के बाद तुम्हारे वचन और बाकी बातों के बाद तुम भी रोहित और प्रिंस के पास चले गये तब दादी सा से हमारा सलाह मशविरा हुआ, वो तो पहले ही नही चाहती थीं की विराज गद्दी पर बैठे इसलिये उन्होने ही कहा कि कुछ ऐसा करना पड़ेगा जिससे किसी के पास आपत्ति करने की कोई गुंजाइश ही ना बचे।”

राजा ने दादी साहेब की ओर देखा, वो धीमे धीमे मुस्कुरा रहीं थी__

” हम बचपन से ही बड़े शरारती थे कुमार, अब अगर राज्यवर्धन खुद अपना दिमाग चला लेते तो हमे ये सब करना ही नही पड़ता।”

  दादी साहेब की बात सुन राजा के चेहरे पर मुस्कान चली आयी__

” हुकुम ज़रूरी तो नही कि गलत कामों के लिये ही षड्यंत्र किये जायें, कभी किसी अच्छे कार्य को पूरा करने भी षड्यंत्र रचने पड़ जातें हैं, आप कहें तो आपके ही इतिहास के उदाहरण सुना दूं।”

” नही रहने दो, मुझे पता है तुम्हें सब याद है।”

” जी हुकुम, मैने तो डंके की चोट पर आपको बैठाने की बात कही थी, अगर कोई आपत्ति करता तो तलवार से फैसला हो जाता , लेकिन दादी साहेब हुकुम ने ये शांति भरा रास्ता चुना जो हम सब को पसंद आ गया।
  बस इसके लिये पिछ्ले दस दिन से इन्होने अपनी हार्ट की दवाएं लेना बंद कर रखा था, और आज सुबह एक ऐसी दवा ली जिससे इनकी धड़कन ज़रा देर को तेज़ हो गयी, जिससे डॉक्टर की निकाली रिपोर्ट अगर कहीं और भेज कर पता भी की जाये तो कोई संशय ना पैदा हो, वैसे कल से दादी सा हुकुम की रेगुलर दवाएं शुरु हो जायेंगी तो पांच छै दिन में वो पूरी स्वस्थ भी हो जायेंगी”

  समर अब तक खड़ा ही था, युवराज ने उसे भी हाथ पकड़ कर बैठा दिया__

” चाय लोगे समर या कुछ और?”

” नही युवराज सा अब कुछ नही लूंगा, दादी सा की नर्स बाहर सोफे पर सो गयी होगी, उसे जगा कर अन्दर भेजता हूँ, आप लोग भी अपने अपने कमरे में जाकर कुछ देर आराम कर लीजिए, कल फिर सुबह राजतिलक होना है हुकुम का।”

दादी साहेब के पैर छूकर एक एक कर तीनों बाहर निकल गये।

   विवाह की दुसरी रात भी राजा को अपने कमरे में पहुंचते आधी रात बीत चुकी थी….
  बांसुरी आज भी उसका रास्ता तकती जाने कब गहरी नींद सो चुकी थी, यही तो विशेषता थी उसकी कि एक बार सो जाये फिर उसके कान में ढोल भी पीट लो अपनी नींद पूरी किये बिना उसका जागना मुश्किल था।
  अपनी गहरी नींद में शायद उसे ही देखती मुस्कुरा रही थी, राजा ने आगे बढ़ उसके अधरों पर अपने अधर रख दिये…. हल्की सी आँख खोल एक बार उसे देख वो फिर अपनी मीठी नींद में खो गयी और राजा उसके सामने आराम कुर्सी पर बैठा अपने आने वाले भविष्य के बारे में सोचता बैठा रह गया।

   अगले दिन राजभवन का ही नही राजा और बांसुरी के जीवन का भी अति महत्वपूर्ण दिन था…..

सारी तैय्यारियाँ पूर्वनियोजित सी तय समय पर होती चली गईं, शायद ये तैय्यारियाँ महल में होने वाले विवाह से पूर्व ही निश्चित कर ली गयीं थी…युवराज और समर को सुबह से सांस लेनें की फुरसत नही थी, सभी अपने में मगन काम में लगे थे और रानी साहेब अपने कोप भवन में चुपचाप सर दर्द का बहाना किये मुहँ ढाके पडीं थीं।
    राज तिलक के मुहूर्त के कुछ समय पहले आखिर विराट के समझाने बुझाने पर वो भी निकलने ही वाली थीं कि राजा खुद उनके कमरे में चला आया__

” कैसी तबीयत है आपकी मॉम?”

” हम ठीक हैं कुमार, बस हम आ ही रहे थे आपके राजतिलक के लिये।”

” मॉम अगर आज आपकी सेहत दुरुस्त नही है तो हम बाद में भी ये कार्यक्रम रख सकतें हैं, आप जानती हैं आपसे बढ़कर तिलक नही है मेरे लिये।”

रानी साहेब ने आगे बढ कर राजा का हाथ थाम लिया और उसे लिये दीवान खाने की ओर बढ चलीं।

  राज परिसर में सभी अपनी निर्धारित जगहों पर बैठे थे, घर की औरतों की व्यवस्था भी एक झीने से पर्दे की ओट में की गयी थी…
  रेखा के पिता और उसका भाई भी वहाँ मौजूद थे जिनसे रात ही रानी साहेब की बात हो चुकी थी, अपने गुस्से को जज़्ब किये वो भी अपने आसन पर बैठे राजतिलक होने का रास्ता देख रहे थे।
   विराज नाराज़गी में सुबह से जो निकला था अभी तक वापस नही लौटा था, उसकी नाराज़गी जग जाहिर ना हो जाये सोच उसे वापस बुलाने के लिये बार बार फ़ोन कर आखिर थक कर रानी साहेब ने फ़ोन पटक दिया था।
  
    सुबह से मौसम साफ़ था, और सूर्य अपनी असंख्य रश्मियों के साथ दमक रहा था।
   एक सौ एक पंडितों के मंत्रोच्चार के बीच एक बार फिर पूरे विधि विधान से राजा के पिता राजा राज्यवर्धन सिंह ने अपने बेटे राजकुमार का राजतिलक कर दिया।
 
           राजगद्दी पर राजा के बैठते ही सभी गुरूजनों ने उस पर पुष्पवर्षा करनी आरम्भ कर दी, उसके एक ओर युवराज भैय्या और समर खड़े थे तो दुसरी ओर राज माता।
   वो भी समझ गईं थीं कि ये सिर्फ गद्दी पर बैठने वाला नही बदल रहा था , बल्कि साथ ही बदल रहा था उनका भविष्य ….  इस बदलाव के साथ जो एक सबसे बड़ा बदलाव आने वाला था उनके जीवन में वो था आज से उनकी रानी साहेब की पदवी का छिन जाना।
   उनके लिये जितना असहनीय विराज की जगह राजा का गद्दी पर बैठना था उतना ही असहनीय था उस दो कौड़ी की साधारण लड़की का रानी साहेब बांसुरी बन जाना।
   अपमान से तिलमिलाती हुई भी वो अपने आप को संभाले हुए थीं कि तभी राजपुरोहित ने बांसुरी के लिये पुकार लगा दी।
    
     मेनका उसका लम्बा सा आंचल पीछे से थामे उसे राजगद्दी तक ले आयी।
   लम्बा सा घूंघट नाक तक खींचे वो वहीं खड़ी रह गयी, तब कुछ और मंत्रों के साथ उसके ऊपर भी कुछ हल्दी कुंकुम का छिड़काव कर राजपुरोहित ने कुंकुम की थाली रानी साहेब की ओर बढ़ा दी, उन्होने भरे मन से हाथ में सिंदूर चंदन ले उसकी ओर बढ़ाया, एक हाथ से ज़रूरत भर का घूंघट ऊपर कर बांसुरी उनकी ओर देखने लगी, उसके माथे पर भी एक लम्बा तिलक खींच मन मार कर आखिर उन्हें वो कहना ही पड़ा जिसे वो कहने से बचना चाह रहीं थीं__

” आज से आप राजा अजातशत्रु सिंह की पटरानी महारानी रानी बांसुरी अजातशत्रु सिंह होतीं हैं। ईश्वर आपको दीर्घायु करें और आप दोनो की जोड़ी बनाये रखें।राजमहल के नियमों के अनुसार आज से आपका नया नाम होगा….

कुछ देर रुक कर उन्होने राजपुरोहित की ओर देखा और फिर आगे कहने लगीं__

” आज से आपको बांसुरी की जगह रानी अपूर्वा अजातशत्रु सिंह के नाम से…..

“नही! रुकिये माँ साहेब हुकुम।”

बांसुरी की धीमी सी आवाज़ सुन रानी साहेब चौंक के रुक गईं, कह क्या रही है ये लड़की?

बांसुरी राजा की ओर देखने लगी__

” साहेब! मैं अपना नाम नही बद्लूंगी। मेरी माँ ने बहुत लाड़ से ये नाम रखा था, आज तेईस बरसों तक जिस नाम से मेरी पहचान थी आज एक झटके में मैं उस नाम को नही छोड़ सकती, अगर आप कहें तो।”

राजा ने उसे आश्वस्त कर राज पुरोहित की तरफ देखा, सभी असमंजस में थे__

” अब आप यहाँ के राजा साहेब की रानी हैं आपकी इच्छा कोई कैसे काट सकता है भला, आप रानी हैं आखिर आपकी इच्छा का  सम्मान किया जायेगा , ठीक है ना राज माता?”

  समर के कहने पर कुंकुम की थाली एक तरह से पटक पर रानी साहेब ने अपने हाथ का कुंकुम पोन्छा और अपनी जगह में जा बैठी।

       उत्तेजना से अपनी फूलती सांसो को शांत करती बांसुरी भी धीमे से बैठ गयी। कहने को कह तो गयी थी लेकिन इतने सारे लोगों , बड़े बुजुर्गों , राजे रजवाड़ों के सामने जहां राजपूत औरतों का एक नाखून तक किसी के सामने नज़र नही आता वहाँ उस भरी सभा में अपने नाम के लिये उसका ऐसे खड़े हो जाना कितना सही था कितना गलत यही सोचती बैठी उसकी हिम्मत ही नही हो रही थी कि वो अपने सामने इतने लोगों को देख भी पाये।
   मन में मचलती अजीब सी गुदगुदी और घबराहट के बीच उसने एक बार राजा की तरफ देखा, वो उसे देख मुस्कुरा उठा ….
  
     एक छोटे से शहर की साधारण सी लड़की जिसने अपने लिये आजतक सिर्फ छोटे छोटे सपने ही बुने थे आज अचानक ऐसे किसी रियासत की रानी बन जायेगी उसके लिये किसी अचम्भे से कम ना था। सब कुछ जैसे सपना सा लग रहा था।

   “आज तक हमारे राजपूताने में ऐसा कभी ना देखा ना सुना, बचपन से सुवर्णा नाम था हमारा, हमें भी अपना नाम प्यारा था पर जब यहाँ सत्यभामा रख दिया गया तब हमने तो आपत्ति नही की, क्योंकि हम नियम जानतें थे ना, क्या ये नियमविरुद्ध नही है, परम्पराओं के विरुद्ध नही है?”

रानी साहेब ने पास खड़े समर की ओर अपना प्रश्न उछाल दिया, समर उन्हें देख मुस्कुरा उठा__

” समय के साथ नियमों में शिथिलता भी देनी पड़ जाती है ना राजमाता हुकुम, अब आप जैसी सुलझी पीढ़ी जो नही रही…हो सकता है पहले किसी ने आवाज़ उठा दी होती तो बहुत पहले ही ये परंपरा बदल चुकी होती।”  बड़े अदब से उन्हें झुक कर उनकी शंका का समाधान कर समर वापस अपनी जगह खड़ा हो गया
 
   राज पुरोहित के कहने पर राजा और बांसुरी कुलदेवी के दर्शनों के लिये आगे बढ़ गये, उनके चलते ही सारे लोग उनके साथ उनके पीछे चल पड़े।
  बाहर प्रेम अपनी गाड़ी महल के ठीक बाहर लगाये उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।
   राजा और बांसुरी के बैठते ही उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी …..

मौसम बदलने लगा था, सुबह से चमकता सूर्य काले बादलों की ओट में जा छिपा था, गहरे गहरे काले बादलों से घिरा आसमान और तेज़ चलती हवाओं से ज़मीन जैसे कांपने लगी थी।
  आधे घण्टे में सभी कुलदेवी मन्दिर के सामने पहुंच चुके थे।

   नीचे गाडियाँ एक ओर पार्क करने के बाद राजा और बांसुरी अपने सुरक्षाकर्मियों से घिरे सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे कि एक ज़ोर की आवाज़ उनके कानों में पड़ी, चौंक कर इधर उधर देखने पर दिखा एक औघड़ बाबा सीढियों के किनारे उंचे पड़े पत्थर पर शांत बैठा उन्हीं की ओर देख रहा था।
   सालों से जल स्पर्श ना होने से उसके बालों में जटा जूट बंध गये थे, अपने पूरे शरीर पर भस्म रमाये वो अपनी जलती आंखों से राजा को ही घूर रहा था__

“आखिर जो नही चाहता था वो तुझे करना ही पड़ गया ना”

उसकी बात सुन सामने चल रहे दो कर्मी उसे भगाने और चुप कराने लगे__

” ये बाबा क्या बोल रहा है, जानता भी है कौन हैं, राजा साहेब हैं।”

” ये तुम्हारा राजा होगा लेकिन मैं तो बस उसकी बादशाहत ही मानता हूँ, मेरे लिये उसके बनाये सभी एक बराबर हैं चाहे वो राजा हो या तू।” उस सन्यासी ने श्रद्धा से आंखे बंद कर ऊपर आसमान की ओर इशारा कर दिया, तब तक में राजा और बांसुरी भी उसके पास पहुंच चुके थे__

” बहुत संयम से काम लेना पड़ेगा तुझे , अगर कभी अपना आपा खो गयी तो इसे भी खो देगी।”

  बांसुरी की आंखों में देखता वो अपनी बात बोल वहाँ से अपना चर्मपत्र उठाये चलता बना लेकिन जाते जाते बांसुरी के मन में एक संशय पैदा कर गया__

” मैं एक बार उन बाबा से मिल आऊँ?”

” क्या इन सब बकवास पर विश्वास कर रही हो बांसुरी, अगर इतना ही ज्ञानी होता तो खुद ऐसे फटेहाल थोड़ी ही घूमता।”

अपना चिमटा जो वो भूल गया था उसे लेने आये उस अवधूत ने राजा की बात सुन ली__

” मैं जानता हूँ तू घमंडी नही है, पर ये गद्दी अच्छे अच्छों का दिमाग घूमा के रख देती हैं…
  सबसे पहला ध्यान अपनी जीवन रक्षा पे दे और इसकी भी….आने वाले दो साल बहुत कठिन हैं , अलग रहने का योग भी दिख रहा है तेरे माथे पर।
और सुन ले मैं कौन होता हूँ फटेहाल घूमने वाला, ये तो वो ऊपर वाला है जिसने मुझे इस हाल में और तुझे इस हाल में रखा है।”

  ” ये तो कुछ भी कह गये बाबा जी आप नाराज़ ना हों” बांसुरी आगे बढ़ उसके पैर छूने जा रही थी कि वो दूर हट गया__

” चिंता ना कर, दीर्घायु है तेरा पति।”
एक बार फिर वो अपना सामान समेटे वहाँ से निकल गया।

  मन्दिर की ओर बढ़ते राजा और बांसुरी दोनो के ही दिमाग से लेकिन वो नही निकल पाया।

क्रमशः

    

aparna…

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s