जीवनसाथी-57

जीवन साथी –57




  “चिंता ना कर, दीर्घायु है तेरा पति।”
एक बार फिर वो अपना सामान समेटे वहाँ से निकल गया।

  मन्दिर की ओर बढ़ते राजा और बांसुरी दोनो के ही दिमाग से लेकिन वो निकल नही पाया।


  मन्दिर की पूजा अर्चना के समय कहीं से विराज भी पहुंच ही गया….
   दोनो जोड़ों से पूजा करवा कर पण्डित जी ने वहीं कथा पाठ भी करवा दिया, सारे कार्य निपटने के बाद उन लोगों को महल ही लौटना था, आज ही जनता के लिये महाराज और महारानी का जन दर्शन कार्यक्रम था जिसके बाद सारी रियासत के लोगों का भोज होना था।
   इसी से युवराज और समर महल में रुक कर बाकी कार्यक्रम की तैय्यारियाँ देख रहे थे।

  मन्दिर में ही अलग से एक नारियल और प्रतिकात्मक बलि करवा कर पण्डित जी ने वचन भंग की क्षमाप्रार्थना भी करवा ली।

  वहाँ से लौटते ही महल के सामने के खाली मैदान पर जन सैलाब अपने प्रिय राजा के दर्शनों के लिये उमड़ा पड़ा था।
    सभा में अपने छोटे से उद्बोधन के बाद सभी को कुछ ना कुछ तोहफ़े बांटने के बाद राजा बांसुरी, विराज और रेखा महल की ओर बढ़ चले….

   शाम इसी सब में कब बीत गयी पता भी ना चला, रेखा के परिवार वाले भी राजपरिवार से विदा ले अपने घर को निकल गये। ठाकुर साहेब की नाराज़गी कम नही हुई थी, उनसे नज़र मिलाने की हिम्मत ना होने से उनके निकलते समय राज माता बाहर नही आयीं, तबीयत खराब होने का संदेश उनकी सहायिका राजा साहेब तक पहुंचा गयी।
   राजा साहेब खुद ठाकुर साहेब को छोड़ने भोपाल तक गये और उन्हें उनकी फ्लाइट में बैठा कर ही वापस लौटे।

   आज बहुत दिनों बाद सिर्फ राज परिवार के लोग ही थे तो रात के खाने पर सबका एक साथ होना लाजिमी था।
    नाराज़गी के बावजूद विराज भी रात्रिभोज में रेखा के साथ मौजूद था।
  भोजन निपटते ही युवराज ने समर से कुछ मँगवाया और एक एक लिफ़ाफ़ा राजा और विराज के हाथों पर रख दिया__

” ये हमारी तरफ से एक छोटी सी भेंट है आप दोनो के लिये”

  ” पर ये है क्या युवराज भैय्या?”

  युवराज मुस्कुरा उठा__

” पिछले दस पन्द्रह दिनों से शादी की भागदौड़ में आप सभी थक गये होंगे, ये आप दोनो जोड़ों के घूमने फिरने और छुट्टियाँ मनाकर रिलैक्स होने की टिकट हैं।
अब हमने अपनी तरफ से करवा दी हैं, जगह आप लोगों को ज़रूर पसंद आयेगी।
   पर दोनों जोड़ों की डेस्टिनेशन अलग अलग है, सरप्राइज़ है….”

युवराज ने मुस्कुरा कर समर की तरफ देखा__

” जी इसमें आप लोगों की टिकट के साथ होटल बूकिंग और बाकी सारी डिटेल्स हैं, विराज सा आपका पन्द्रह दिन का टूर है लेकिन हुकुम आपके लिये सिर्फ चार दिन की छुट्टियाँ ही निकाली जा सकीं हैं…असल में काफी सारा काम पेंडिंग पड़ा है इसीसे…

“छुट्टियों पर अभी ही जाना ज़रूरी तो नही, मैं काम निपटा कर भी जा सकता हूँ ।”

  राजा की बात पर युवराज मुस्कुरा उठा__

” अब ये सारा काम निपटने का नही है कुमार, एक बार इस सब में फंसे उसके बाद कहाँ की छुट्टियाँ ….और फिर हर काम अपने समय पर ही हो जाये तभी उसकी महत्ता है।”

” जी जैसा आप सब ठीक समझें, लेकिन क्या यहाँ भी हमें अपनी सिक्योरिटी साथ ले जानी होगी?”

” नही! इस बार आपके लिये बाहर से सिक्योरिटी हायर कर ली है, जिससे आपके घूमने फिरने में कोई रुकावट ना आये, वो लोग आपके  सामने आये बिना ही आपकी सुरक्षा का ध्यान रख लेंगे।”

समर की बात पूरी होते ही युवराज ने अपनी बात कहनी शुरु कर दी__

  ” अब आप लोग तैय्यारियाँ कर लीजिए, अभी दो घण्टे में ही आप लोगों को निकलना होगा, कुछ घंटों बाद की ही फ्लाइट है …विराज आपके लिये और कुमार के लिये एक सी व्यवस्था कर दी है हमने, किसी चीज़ की ज़रूरत हो बेहिचक कह देना।

    खाने के साथ ही सारी बातें भी हो चुकी थीं …एक एक कर सारे लोग उठ कर चले गये, राजा भी जाते जाते बांसुरी की तरफ साथ चलने के लिये देखने लगा,उसे इशारे से कमरे में जाने के लिये कह वो राजमाता के पीछे चली गयी__

” माँ साहेब हुकुम! मुझे आप से कुछ कहना था?”

” कहिये! ”

” मैं सुबह की अपनी बात के लिये माफी मांगना चाहती हूँ …
   बांसुरी कुछ देर नीचे देखती अपने पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रही फिर धीमे से हिम्मत कर आगे बोलने लगी__
    “असल में मैं मेरे नाम के लिये और मेरी माँ के लिये मैं कुछ ज्यादा ही पज़ेसिव हूँ …और सुबह जब एकदम से ये कहा गया कि मुझे नाम बदलना पड़ेगा तो मैं खुद पर काबू ही नही कर पायी।
   मैं जानती हूँ मुझे सब के सामने आपकी बात नही काटनी चाहिये थी, पर विश्वास किजीये आपकी बात काटने के लिये मैंने ऐसा नही कहा, बस अपने मन की बात ही वहाँ रखी।
   मैं जानती हूँ, मैं बाद में भी आपसे कह सकती थी लेकिन फिर वक्त निकल जाता, और मुझे सारा जीवन उस नये नाम के साथ बिताना पड़ता जो पहले कभी मेरा था ही नही।
   ब्याह के बाद हर चीज़ तो मायके की छूट ही जाती है, एक नाम ही तो लड़की के पास बचा रह जाता है…जिंदगी भर दुनिया उसे उसके माँ पिता के दिये नाम से जानी जाये अगर ऐसा कोई लड़की सोचती है तो क्या इसमें कुछ गलत है?
  आप चाहें तो अपने दिये नाम से बुला सकती हैं, अब तो मैं भी आपके परिवार का हिस्सा हूँ, आपके रिवाज आपका रहन सहन खान पान सब अपनाना ही है, इसिलिए चाहती थी कि नाम मेरे मायके का ही रह जाये।
अगर मेरी बात ने आपका दिल दुखाया है तो मैं हृदय से क्षमा प्रार्थी हूं माँ साहेब!
   एक बेटी के मन की बात समझ कर मुझे माफ कर दिजियेगा।”

  बांसुरी ने झुक कर राजमाता के पैर छू लिये__

” उठिए बांसुरी! झूठ नही कहेंगे हम, बुरा तो हमें बहुत लगा लेकिन आपकी बात भी सत्य है… हम आपसे नाराज़ नही हैं, माता पिता कभी बच्चों की गलतियों पर कुछ देर को दुखी भले हो जायें लेकिन नाराज़ तो नही हो सकते ना। जाइये आप तैय्यारियाँ कीजिये कुमार आपका रास्ता देख रहें होंगे।”

   बांसुरी ने मुस्कुरा कर एक बार फिर उनका अभिवादन किया और अपने कमरे की ओर चली गई , पिछली बार महल में रुकने पर जो सहायिका उसके लिये नियुक्त हुई थी वही अब भी उसके साथ साथ उसके आगे पीछे घूमती थी।

  कमरे में पहुंचते ही बांसुरी ने मेनका को जल्दी जल्दी सारा काम समझाया और  खुद तैय्यार होने चली गयी।

*******

      …. आज अगर भर आई है, बूंदे बरस जायेंगी,
       कल क्या पता किनके लिए आँखें तरस जायेंगी।
       जाने कब गुम हुआ, कहाँ खोया इक आंसू छुपा के रखा था…..
         तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूँ मैं
        हो हैरान हूँ मैं….

     सुरमई शाम के धुंधलके में छत पर एक किनारे लगी बेंच पर बैठी निरमा मोबाइल पर गाने को सुनती खुद में खोयी हुई थी…..
   आंखों में आँसू झिलमिला रहे थे लेकिन वो बिना पोंछे दूर डूबते सूरज को देख रही थी, जाने कितनी देर से वो यहाँ बैठी थी और ना जाने कितनी बार अब तक इस गाने को रिवाइंड कर कर के सुन चुकी थी….

   उसे याद आ रही थी वो शाम जब प्रताप के फ्लैट पर  वो सीधे अपने ऑफिस से पहुंच गयी थी।
  वो जाने क्या लिखता बैठा था, उसके घर पर उस वक्त यही गाना तो चल रहा था, फ्लैट की एक चाबी उसके पास भी होती थी, प्रताप को बेल की आवाज़ से चिढ़ थी वो अक्सर कहता था__” यार अच्छे खासे मूड में लिखता रहता हूँ कि ये बेल बजती है और दिमाग से सब कुछ स्किप हो जाता है, सो तुम प्लीज़ बेल मत बजाया करो, दरवाज़ा खोल सीधे अन्दर चली आया करो।”
   उसके बाद से उसने कभी उस फ्लैट की बेल नही बजाई…उस शाम भी जब चुपके से अन्दर घुसी प्रताप अपने लैपटॉप पे कुछ लिखने में ही भिड़ा था, बस हर बार गाना खत्म होने पर रिवाइंड कर लेता…
   वो आकर चुपचाप रसोई में चली गयी थी। रात के लिये खाना बनाने के बाद उसने चाय चढा ली थी।
   चाय लेकर जब तक बाहर आयी प्रताप का भी काफी काम निपट चुका था, वो उसे देख मुस्कुरा उठा था …उसका खिला चेहरा देख वो भी खिल उठी…. और आगे बढ कर उसके मोबाइल पर चलते इस गाने को बंद कर दिया था__

” अरे आखिरी अन्तरा बाकी था और तुमने बंद कर दिया, क्यों भई ?”

” मुझे ना ये मनहूस गाना बिल्कुल पसंद नही है, जाने क्या है इस गीत में जो रात दिन सुनते रहते हो।”

  ” अब पसंद है तो है… वैसे ये गाना प्रेम भैय्या को बहुत पसंद है, वैसे तो वो गाने कम ही सुनते हैं पर इसे कभी कभार सुन लिया करतें हैं। वैसे पसंद नापसंद का भी कोई कारण होता है क्या?

” बिल्कुल होता है, मैं एक बार शादी होकर आ जाऊँ इस घर में, फिर तुम्हें कभी इस गाने को सुनने नही दूंगी।”

” जी ठीक है, तो फिर आप कौन से गाने सुनने देंगी हमें? अच्छा हाँ याद आया तुम्हारा फ़ेवरेट ….वो क्या है वो गाना…मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को?”

  हँसते हुए निरमा ने दोनों हाथों से उस पर हमला कर दिया था और प्रताप ने उसे आगे बढ़ कर अपनी बाहों में समेट लिया था….
    कितनी मीठी यादें थीं , लेकिन कैसी कसक भरी….
कुछ सवालों के कोई जवाब क्यों नही होते? जाने वाले वापस क्यों नही लौट आते?
  
   अपने खयालों में जाने कब से वो गुम थी, और जाने कब से प्रेम बाहर से वापस आकर छत के दरवाज़े पर हाथ बांधे खड़ा उसे देख रहा था…..

  कुछ देर बाद वो धीमे कदमों से आकर उसी बेंच के एक किनारे बैठ गया…….

   सूरज डूबता डूबता डूब गया, और चांद अपनी रोशनी दोनों पर लूटाता आसमान पर मुस्कुराता रहा।
   दोनो उस पूरे चांद की रात में एक दूसरे की तकलीफ और खामोशी को समझते चुप चाप बैठे रहे….

*******

     रात दो बजे की फ्लाइट थी, सारी तैय्यारियाँ कर सबसे एक बार मिल कर राजा और बांसुरी निकल पडे अपने सपनों की दुनिया में रंग भरने…..
    
   
   सुबह दस साढ़े दस तक दोनो अपनी मनचाही  जगह पहुंच चुके थे……

” ये मेरा फ़ेवरेट डेस्टिनेशन है बांसुरी! कॉलेज टाईम पर हर सेमेस्टर ब्रेक में हम सब दोस्त या तो गोआ जाते थे या बाली”
   अति उत्साह में राजा कह गया और बांसुरी उसे घूरती देखती रही__

” अच्छा!!! अकेले ही आते थे या?”

  ” अकेले कहाँ? बताया ना दोस्तों के साथ..”

” जी मेरा पूछने का मतलब है सिर्फ दोस्त ही आते थे या सहेलियाँ भी?”

राजा ने अपनी नज़र समंदर से हटा कर बांसुरी की ओर फेरी और उसे खुद को घूरता पा कर उसे अपने सीने से लगा लिया__

” अरे पगली! सहेलियाँ कहाँ थी मेरी।”

” मुझे क्या पता? रही भी होंगी तो मुझे कौन सा बता दोगे?”

” हम्म बात तो सही हैं तुम्हारी, चलो इस ट्रिप में तुम्हें एक एक कर अपनी सहेलियों के किस्से ही सुना दूंगा।”

दोनो आपस में नोक झोंक करते अपने शानदार रिसोर्ट में पहुंच गये।

    उनके कमरे का दरवाज़ा खोल सामान अन्दर रख वेटर चला गया।
     कमरे में घुसते ही बैठक थी, जिसमें चारों ओर ताजा फूलों की सजावट थी, एक कोने की दीवार पर  छोटा सा सेलर सजा था, और एक कांच के बड़े से स्लाइडिंग डोर के पार बेडरूम था।
     अपने सुंदर से कमरे की सजावट पे मुग्ध होती बांसुरी खुशी से चहकती राजा से लिपट गयी__

” वॉव सो ब्युटिफुल !!! अमेजिंग ”

  ” खुश हो ना?

” बहुत बहुत खुश!! पता है राजा सॉरी साहेब मैं पहली बार किसी हनीमून सुईट में आयी हूँ, मुझे तो ये कमरा देख कर ही मज़ा आ गया।”

” ग्रेट! मैं तो हर छै महीने में हनीमून सुईट में आता ही रहता हूँ।” राजा अपनी बात कह ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा, उसे हँसते देख बांसुरी को अपनी बेवकूफी समझ में आ गयी, अपने माथे पर हल्की सी चपत लगा कर वो अन्दर चली गयी, एक एक चीज़ उत्साह से खोलती बंद करती वो चहकती रही__

” आओ तुम्हें एक और चीज़ दिखाता हूँ।”

बांसुरी ने इशारे से क्या पूछा, राजा उसके पास चला आया, उसकी आंखें बंद किये वो उसे बेडरूम में ले गया….
    पास रखे रिमोट को उठाने के बाद उसने सामने पॉइंट किया और बांसुरी की आंखें खोल दी।
  
   बेडरूम की एक पूरी दीवार पर लगा रेशमी पर्दा ऊपर सरकता चला गया….सामने कांच की पारदर्शी दीवार के पार उँची उँची लहरे भरता समंदर ऐसा पास दिख रहा था कि जैसे हाथ बढाने से हाथ में आ जायेगा….
   बांसुरी भाग कर उस कांच के पास पहुंच गयी, हाथों से लहरों को छूने की कोशिश करती वो मुस्कुराती रही__

  ” ये ग्लास ऐसे ही डिज़ाइन किया है कि पचास फीट  दूर की लहरें भी ऐसे दिखें कि लगे हाथ बढ़ा कर छू लो।”  राजा की बात सुन बांसुरी मुस्कुरा कर बाहर देखती रह गयी…

  “चारों तरफ फैला साफ़ नीला साफ़ समन्दर जैसे आगे बढ कर गले लगने को चला आ रहा है , है ना साहेब!”

” जी हुकुम! अब अगर समंदर से मन भर गया हो तो ज़रा अपने साहेब के गले भी लग जाइये।”

   पीछे से आकर राजा ने बांसुरी को अपनी बाहों में जकड़ लिया….
   डोर बेल की आवाज़ सुन बिल्कुल ही अनमने मन से वो बाहर दरवाज़ा खोलने चला गया__

  ” सर ये आपके बाथरूम में टॉवेल रखनी थी।”

वेटर को भीतर आने के लिये रस्ता देकर राजा एक किनारे हट गया…

  ” सर और किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बोलियेगा।”

राजा ने सर हाँ में हिला कर दरवाज़ा खोल दिया, वेटर जाने को ही था की बांसुरी चहक उठी__

  ” यहाँ घूमने के लिये क्या क्या है?”

  ” मैडम एक से बढ़कर एक टूरिस्ट स्पॉट हैं, यहाँ उबुद का शानदार सजीला मार्केट है घूमने फिरने के लिये…दक्षिण बाली में कूटा भी अच्छी जगह है..
    अन्गुग और बतर पर्वत हैं, मैडम यहाँ बाली टूरिज्म के दौरान दर्शनीय मंदिर, आकर्षित झरने और रिट्रीट्स के अलावा बाली का सनराइज और सनसेट पॉइंट का दृश्य देखने लायक होता हैं। बाली द्वीप की सुन्दरता ऐसी है कि  पर्यटकों को बार बार यहाँ आने के लिए मजबूर करती हैं..”

” जी हाँ वो तो पता है।” बांसुरी ने पलट कर राजा को देखा, राजा ने उसे आंखों से वेटर को भगाने का इशारा किया और पास रखी बोतल उठा कर पानी पीने लगा, पर उसके इशारे समझने के बाद भी लगा वेटर जान बूझ कर अपने सारे टूरिस्ट ज्ञान का परिचय आज देकर ही रहेगा।

” मैडम बाली की यात्रा में समुद्री तटों  पर सर्फिंग का आनंद लेने के लिए आपको उलुवातु से अच्छी जगह नही मिलेगी…बाली के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल पुरा तनह लोट मंदिर पर्यटकों के बीच आस्था का सबसे बड़ा और सुंदर मन्दिर बना हुआ हैं। पुरा तनह लोट मंदिर बाली के छह पूजनीय कार्डिनल मंदिरों में से एक है मैडम…”

” ठीक है ! हम समझ गये, अगर और कुछ जानना हुआ तो तुम्हें बुला लेंगे…”

  “ओके सर !”

  बड़ी  मुश्किल से वेटर से पीछा छुड़ाने के बाद राजा ने वहाँ रखे टैग को दरवाज़े पर लटका दिया__ “डू नॉट डिस्टर्ब “
   और बांसुरी को गोद में उठाये अन्दर चला गया।

  कब दिन ढला, कब शाम हुई कब रात बीत गयी दोनो को पता भी ना चला।
   
    दो दिन पलक झपकते बीत गये…. ढ़ेर सारी बातें थी और था एक दूसरे पर लुटाने के लिये ढ़ेर सारा प्यार!
   लेकिन इतने सारे प्यार के बीच भी कभी रह रह कर बांसुरी खुद में उस अघोरी की बात सोच सिहर उठती…
   उसने आखिर क्यों ऐसा कहा?  क्या वो इतनी उद्दंड कभी हो सकती है , इतनी उत्शृंखल ….
   नही कभी नही!!! इतना प्यार करने वाला पति है अगर कभी वो किसी बात पर बिगड़ भी गया तो वो अपने प्यार से क्या बिगड़ी संवार नही पायेगी? ज़रूर संवार लेगी, किसी भी राह चलते ने कुछ भी  कह दिया तो क्या उसे सच मान लिया जाना चाहिये?

” क्या सोचती बैठी हो हुकुम?”

   बांसुरी खिड़की खोले बाहर समंदर की उठती गिरती लहरों को देखती बैठी थी कि राजा नहा कर बाहर आया और उसे खुद में खोये देख सवाल कर लिया __

” साहेब! एक बात कहूँ।”

” कहिये साहिबा।”

  ” हम दो दिन से इसी रूम में बंद हैं , बाहर कब जायेंगे घूमने?”

” क्या घूमना है आपको ?”

” अरे इतनी सारी जगहें हैं उस वेटर ने नही बताईं थी उस दिन! और आखिर हनीमून है हमारा , घूमने फिरने ही तो आये हैं, वापस लौट कर निरमा को क्या बताऊँगी कि क्या देख कर आयीं हूँ।”

  ” ओह्ह बडी सीरियस समस्या है, अब सहेली को बताने के लिये घूमना ही पड़ेगा है ना?”

” और क्या? वैसे मुझे शॉपिंग भी करनी है। ”

  “और वैसे ये भी बता दूं कि अब हमारी छुट्टियाँ खत्म भी होने जा रहीं हैं ….

  ” हाँ और क्या?  सुनो और कुछ नही तो कम से कम वो मन्दिर ही घुमा दो”

  ” ओके! आज शाम में पक्का निकलेंगे…तुम शॉपिंग भी कर लेना और मन्दिर दर्शन भी।”

   पर ना तो वो शाम आयी और ना दोनो का ही कहीं निकलना हो पाया…..

*******

  पिछ्ले कुछ दिनों से शादी ब्याह की जो रौनक थी उसमें सभी बड़े उत्साहित थे, क्या घर के क्या बाहर के।
   इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच निरमा भी जैसे कुछ समय के लिये सब भूल बैठी थी, लेकिन ब्याह का हर्षोल्लास बीतते ही उसका भी जीवन वापस उसी ढर्रे पर आ गया था।
   लेकिन राजा और बांसुरी के घूमने चले जाने से प्रेम खाली ही था।
  राजा की सिक्योरिटी की वहीं व्यवस्था कर दी गयी थी इसीसे प्रेम साथ नही गया था, अब राजा के ना होने पर उसका महल जाने का भी कोई विशेष कारण ना था, इसलिये वो घर पर ही था।

   सुबह कुछ जल्दी ही नींद खुल गयी ,बाहर बालकनी में निकला वो ताज़ी हवा खा रहा था कि उसकी नज़र नीचे बगीचे में पौधों के पास कुछ करती निरमा में चली गयी……
   अधिकतर पौधे प्रताप के लगाये हुए थे, और वो बड़े जतन से एक एक पौधे की साज संभाल कर रही थी….
   उसका घर उसका बगीचा, प्रताप के लगाये पौधे और सींचती निरमा…
   यही तो उसके जीवन की वास्तविकता बन गयी थी।
लेकिन अब एक बदलाव आ गया था….पहली बार उसने निरमा को प्रताप की दोस्त की तौर पर ही देखा था, लेकिन जाने कैसे इतने दिनों में ऐसा क्या हो गया अब उसे उस लड़की में अपनी पत्नि ही नज़र आने लगी थी….
   …..वो उसका दर्द समझता था इसी लिये कभी आगे बढ़ कर उस पर अपना कोई हक ना ही दिखाया और ना कभी भविष्य में दिखा पायेगा लेकिन अब एक सत्य ये भी था कि सुबह उठने पर उसे निरमा नज़र ना आये तो वो बेचैन हो उठता था।
    वो तो शायद जानती भी नही थी कि वो उसे अक्सर ऐसे ही खुद में खोयी देखता खो जाया करता था।
   
    पौधों की मिट्टी ठीक करती और आसपास उग आयी घास-फूस को छाँट ही रही थी कि उसने माथे का पसीना पोंछने हाथ ऊपर किया और अनायास ही उसकी नजरें ऊपर बालकनी में खड़े प्रेम पर पड़ गईं, वो हाथ झाड़ती उठ खड़ी हुई , लेकिन ऐसे झटके से उठने पर उसके पेट पर की कोई नस खींची और वो पेट पकड़े दर्द से कराह उठी…

प्रेम उसे देख तुरंत नीचे भागता चला आया , तब तक वो वहीं रखी कुर्सी पर बैठ चुकी थी।
   वो भागता चला तो आया लेकिन क्या बोले कैसे बोले यही सब सोच रहा था कि निरमा खुद ही खड़ी हो गयी….
  ” मैं ठीक हूँ! वो झटका लगने से शायद कोई नस खिंच गयी होगी।”

हाँ में सर हिलाता वो एक किनारे हो गया, निरमा के अन्दर जाते ही वो भी उसके पीछे चला आया__

” आपके लिये चाय बना दूं?”

  ” नही आप रहने दीजिये , परेशान ना हों मैं खुद बना लूंगा, आप लेंगी चाय?”

  उससे पूछता वो रसोई की ओर मुड़ गया, चाय छोड़ चुकी निरमा ने वापस प्रेम की हाथ की चाय से ही वापस चाय पीना शुरु किया था, उसके हाथ की चाय का लोभ वो भी नही छोड़ पायी, धीरे से सर हाँ में हिला कर वो उसे रसोई में जाता देखती रही।

   प्रेम को रसोई में चाय चढाते हुए पकौडों वाली बात याद आ गयी और उसके चेहरे पर मुस्कान चली आयी, उसके जी मे आया एक बार रसोई से झांक कर निरमा से पूछ ले कि चाय के साथ पकौड़े भी बना दूं क्या? लेकिन फिर वो उसके ऐसे मज़ाक करने पर क्या सोचेगी सोचता वो  उबलती चाय को देखता रह गया।
   इधर बाहर बैठी निरमा के मन में भी एकबारगी आया कि आवाज़ दे कर कह दे कि उस दिन जैसे पकौड़े भी बना लाओ ना! लेकिन फिर वही संकोच कि वो जाने क्या सोचेगा सोच कर वो भी बैठी खिड़की से बाहर हवा में झूलते बड़े बड़े डहलिया के फूलों को देखती रही….

चाय के साथ बिस्किट लिये प्रेम जब तक में बाहर  आया, उतनी देर में अम्मा भी चली आयीं….

” अरे बाबू चाय बनानी पड़ गयी, काहे बहुरानी की तबीयत ठीक नही का?”

” नही अम्मा ऐसा कुछ नही, मैं ठीक हूँ।”

  ” हमें का एकदम ही बुढबक समझ लिये हो, तुम्हरे चेहरे से दिख रहा , कैसी कुम्हलाती जा रही हो…दूसरा महीना चल रहा ना ?”

  अम्मा की बात सुन प्रेम निरमा की ओर देखने लगा, वो खुद आश्चर्यचकित थी कि इन्हें कैसे पता चल गया, फिर ध्यान आया शायद उस दिन की बांसुरी की बात सुन ली होगी इन्होने।

  ” बाल हमरे धूप में ना पके हैं हमने भी तो छै छै बच्चे जने हैं, गांव देहात में जब तक रहे आस पास की हर मेहरिया हमरे लाने ही जचकी करवाने आती रही, अरी हम तो नब्ज़ पकड़ के जान लेते हैं कि कौन सा महीना चल रहा। ”

   निरमा उनकी बातें सुनती बैठी थी, प्रेम उठ के जाने लगा तो अम्मा ने उसे भी लपेटे में ले लिया__

” काहे बाबू! इतनी का जल्दी मची रही तुम्हें, बहुरिया को ठीक से घर द्वार देख तो लेने देते …अब आजकल तो ब्याह के चार पांच साल बाद लोग बच्चों के लिये सोचना शुरु करते हैं, और एक तुम दोनो….
  पर चलो अच्छा ही हुआ… ये हो जाये फिर दो साल होते होते एक और बेटा बेटी जो भी हो कर लेना, समय रहते परिवार पूरा हो जाये वही अच्छा है।”

  अम्मा की बातें समाप्त ना होनी थी……….., निरमा अपनी जगह से उठ कर ऊपर जाने को हुई कि वापस उसके पेट में तेज़ दर्द सा उठा और वो वहीं सीढियों पर ही थम कर बैठ गयी__

” क्या हुआ?”

” पता नही , हल्का दर्द सा हो रहा पेट में, कुछ देर आराम करूंगी तो ठीक हो जाऊंगी।”

   वो धीरे से उठने की कोशिश कर रही थी कि प्रेम ने आगे बढ़ कर उसे धीरे से  गोद में उठा लिया, वो जब तक कुछ समझ पाती, वो अपने लम्बे लम्बे डग भरता उसे उसके कमरे में पहुंचा कर उसके बिस्तर पर बिल्कुल संभाल कर ऐसे रख गया जैसे किसी फूल को रख दिया हो, जाते जाते उसकी तरफ देखे बिना ही उसे तैय्यार होने को बोल गया__

  ” मैं अपोइंटमेंट ले लेता हूँ डॉक्टर से, आप आराम कर लीजिए , उसके बाद तैय्यार हो जाइयेगा।”

  वो हाँ ना कुछ कहती, उसके पहले ही वो दरवाज़े को हल्के से बाहर की ओर खिंच बाहर निकल गया।

*******

   ” मैं कुछ नही जानती , आज तो मैं बाहर घूमने जाऊंगी ही ।”

  ” तो जाओ ना किसने मना किया है?”

  ” अच्छा जी मैं हनीमून पर पतिदेव के साथ आयी हुँ या अकेली ? जो अकेली घूमने चली जाऊँ ”

” भई जो मनाने आयें हैं वो तो अच्छे से मन ही रहा है फिर क्या दिक्कत? वैसे किसी ने सही कहा है बिवियों का दिमाग पढ़ना बहुत मुश्किल है।”

  ” अब प्लीज़ राजा साहेब आप बातें बंद किजीये और जल्दी से तैय्यार हो जाइये, मुझे धूप ढलने के पहले सागर किनारे जाना है, वहाँ तुम्हारा हाथ पकड़ रेत में दूर तक चलते हुए जाना है, बाहों में बाहें डाले गाने गाना है …और

  ” और क्या रानी साहिबा?”

” और ये कि मैंने चार दिन के लिये सोलह जोड़ी कपड़े रख लिये थे सोचा था सुबह दोपहर शाम हर वक्त कपड़े बदल बदल कर घुमुँगी, यहाँ तो सारे कपड़े पैक पड़े रो रहें हैं अपनी किस्मत को।”

  ” तो ये कहो ना कि रैम्प वॉक करनी थी तुम्हें, मेरे सामने ही कर लो।”

  बांसुरी ने धक्के देकर राजा को तैय्यार होने भेजा और फटाफट अपना पर्स और पानी की बोतल वगैरह ज़रूरी सामान रखने लगी।

  कुछ देर बाद दोनो लोग रिसोर्ट के प्राईवेट बीच पर थे…..
     एक जगह सारा सामान रख , एक दूसरे का हाथ थामे दोनो दूर तक चलते चले गये।
     
    साफ़ सुथरी चांदी सी रेत सूरज की रोशनी में चमक रही थी, एक तरफ अपनी सैंडल रख बांसुरी दोनो पैर सामने फैलाये बैठी कुछ गुनगुनाती रही और उसकी गोद में सर रखे राजा लेटे हुए सामने सूरज को ढलते देखता रहा___

  ” क्या गुनगुना रही हो? ज़रा ज़ोर से गुनगुनाओ, मैं भी सुनूँ ज़रा।”

  हाँ में सर हिलाती बांसुरी गाने लगी___


       ओ साथी रे दिन डूबे ना…
       आ चल दिन को रोकें
        धूप के पीछें दौड़ें,
        छाँव छुए ना ओ साथी रे…..
 
  कभी-कभी यूँ करना, मैं डांटूं और तुम डरना
  उबल पड़े इन आँखों से मीठे पानी का झरना
  तेरे दोहरे बदन में, सिल जाऊँगी रे ….
  जब करवट लेगा, छिल जाऊँगी रे
  संग ले जाऊँगा……
  तेरी मेरी अंगनी-मंगनी,
  अंग संग लागी संगनी
  संग ले जाऊँ, ओ पीहू रे ओ साथी रे……..

क्रमशः

aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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