जीवनसाथी -58

जीवन साथी –58


   चार दिन पलक झपकते बीत गये….दोनो की वापसी का दिन आ गया … 
   मन में उत्साह था उमंगे थी, नये जीवन नये रिश्ते की भावभीनी शुरुवात हो चुकी थी, लेकिन बांसुरी के मन में कहीं ना कहीं एक टीस रह गयी थी कि काश कुछ नही तो एक बार मन्दिर के दर्शन तो कर ही लेना था।
    सुबह सारा सामान वापस रखते हुए उसका मन बार बार राजा से ये कहने का हो रहा था कि एक बार एयरपोर्ट जाते वक्त ही दर्शन कर लेते हैं पर फिर ये सोच कर कि कहीं राजा को उसका ऐसे मन्दिर के पीछे पड़ जाना खराब ना लगे वो चुप रह गयी…..
    उसे भले ही राजा की परेशानी पता नही थी लेकिन आखिर इतने दिनों के साथ में उसे ये तो समझ आ ही गया था कि वो अन्दर ही अन्दर किसी बात से परेशान है और अपने आप से लड़ रहा है……
       , शादी से पहले वो जिस राजा को जानती थी उससे शायद वो बेझिझक सब कुछ पूछ भी लेती लेकिन अब शादी के बाद जो राजा उसके सामने था उसके कांधों पर की जिम्मेदारियां भी वो देख चुकी थी, ऐसे में बार बार उसे किसी बात के लिये कुरेदने का उसका जी नही किया।
  
        बाकी और जो हो लेकिन इन चार दिनों में वो जैसे भूल ही बैठा था कि वो कहीं का राजा था, उसके ऊपर एक पूरी रियासत की जिम्मेदारी थी…
   बात बात पर उसे छेड़ता हँसता खिल्खिलाता ये जैसे बिल्कुल पहले वाला राजा बन बैठा था।
   कभी टीवी चैनल पर अपना पसंदीदा कार्यक्रम देखने के लिये रिमोट की छीना-झपटी करता, कभी नींद से जगा कर बांसुरी को अपने कमरे के बाहर की रेत पर लेटा कर ऊपर छाए तारे दिखाता, और कभी कागज़ की पतंग ले समंदर किनारे उड़ाता राजा अपने हर नये रूप से उसे चमत्कृत करता उस पर पूरी तरह छाता जा रहा था।

      ” रख चुकी सारा सामान? कुछ भूली तो नही ना?”

सर हिला कर बांसुरी ने ना कह दिया__

  ” किसी बात पर नाराज़ हो क्या?”

  ” नही तो! तुमसे कैसे नाराज़ हो सकतीं हूँ? अपनी जान से भी कोई नाराज़ होता है भला?”

  बांसुरी को मुस्कुराता देख वो भी मुस्कुरा उठा__

  ” मन्दिर जाना चाहती हो ना? ”

बांसुरी ने चौंक कर राजा की ओर देखा__

  ” एयरपोर्ट जाते समय तुम्हारे मन्दिर से दर्शन करते चलेंगे, अब खुश!”

  बांसुरी भाग कर उसके गले से लग गयी__

  ” कैसे सब जान लेते हो?”

  ” तुम्हारी आंखें हर बात बोल जातीं हैं, तुम कितना भी छिपाना चाहो। अच्छा सुनो अगर मन्दिर जाना है तो तुम्हारे पास सिर्फ आधा घन्टा है, फटाफट तैय्यार हो जाओ,क्योंकि अगर देर करेंगे तो हमारी फ्लाइट छूट जायेगी।”

” तो छोड़ देतें हैं ना फ्लाइट! कुछ दिन और रुक जातें हैं यहीं।”

  ” तो ये बात है, हमारी हुकुम का मन नही भरा ना !”

  ना में सर हिलाती बांसुरी शरारती मुसकान देती सामान समेटने में लग गयी।

  वक्त से कुछ अधिक पहले ही दोनो निकल गये, मन्दिर पहुंचने पर दर्शनार्थियों की लम्बी कतार उनका इन्तजार कर रही थी, बांसुरी ने बेबसी से राजा की ओर देखा, उसे आश्वस्त कर वो उसके साथ ही बैठा रहा…..
   समय बीतता गया लेकिन उनका नम्बर आते में पट बंद हो गये।
    जिसका डर था वही हो गया……
बांसुरी के मन में पहले ही बाबा की बात घूम रही थी अब उस पर ऐसे दर्शन ना हो पाना उसे कहीं गहरे तक डुबो गया।
    समय कम था,रुकना सम्भव ना था। मन पर बोझ लिये वो राजा के साथ एयरपोर्ट निकल गयी।

********

 
   प्रेम को डॉक्टर की अपोइंटमेंट मिलते ही वो निरमा को साथ लिये सुबह सुबह ही क्लिनिक की ओर निकल गया था।

    डॉक्टर के केबिन के बाहर अपना नम्बर आने की प्रतीक्षा में इधर से उधर चक्कर काटते प्रेम को देख निरमा को भी मन ही मन हंसी आ रही थी लेकिन उससे बैठने के लिये कहना व्यर्थ था, निरमा का नम्बर आते ही दोनों भीतर चले गये__

” जी कहिये क्या तकलीफ है?”

” मैम कभी कभी पेट में खिंचाव सा महसूस होता है, दूसरा महीना चल रहा है ..

डॉक्टर निरमा की बात सुन उसे जांच के लिये अन्दर ले गयी और प्रेम जो कल से ही इन्टरनेट पर पेट दर्द के कारण ढूँढ रहा था एक बार फिर मोबाइल निकाल कर अपना जवाब ढूँढने लगा…..

कुछ देर में ही डॉक्टर के साथ निरमा भी बाहर चली आयी__

  ” देखिए आप दोनो को स्पष्ट कर दूँ कि निरमा के गर्भ में बच्चा तो ठीक है लेकिन प्लैसेंटा सामने की ओर आ गया है, इसी के कारण इन्हें समय समय पर  पेट में खिंचाव या दर्द महसूस होता है।”

” मैडम डरने की कोई बात तो नही?”

” डरने की बात है , लेकिन बहुत अधिक नही…बस ये ज्यादा से ज्यादा आराम करें, कोई भी भारी काम ना करें दौड़ना भागना ज्यादा चलना फिरना, सीढ़ी चढ़ना आदी नही करना है इन्हें, और मैं कुछ दवाएं लिख देती हूँ, आप लेतीं रहें और और अपना ख्याल रखें , इसमें जो डेट लिखी है उस पर आकर दिखा दें।”

   डॉक्टर को दिखा कर लौटते में निरमा को कुछ सामान खरीदना था, लेकिन प्रेम ने उससे सारी लिस्ट लेकर उसे एक जगह बैठाया और सारा सामान खुद ले आया।
   घर पहुँचे कि निरमा सीढ़ियाँ चढ़ ऊपर चली गयी, नीचे हॉल और रसोई के साथ एक गेस्ट रुम था लेकिन उतना आराम दायक ना था….
    उसके ऊपर जाते ही प्रेम ने नीचे का कमरा देखा और अगले दिन सुबह से ही उस कमरे को निरमा के रहने लायक बनाने के लिये कमर कस ली।
  उस कमरे का सारा पुराना सामान हटा कर उस कमरे की पूरी सफाई करवा कर वहाँ नये सीरे से उसने बैड आलमारी ड्रेसिंग और सारी ज़रूरत की चीज़ों से कमरा भर दिया, कमरे में खिड़कियों के पर्दे से लेकर दीवारों का रंग भी उसने बदल दिया, गूगल में शायद कहीं पढ लिया था कि किस रंग को देखने से होने वाली माँ को सुकून मिलता है, उसी रंग की दीवारे उससे मेल खाते परदे , यहाँ तक की बिस्तर की चादरें तकिये सभी हल्के फूलों भरे रंग से संवार कर दो दिन बाद आखिर उसने चैन की सांस ली।

   दो दिन से निरमा ऊपर ही आराम कर रही थी, उसे प्रेम ने बिल्कुल नीचे नही उतरने दिया था, उसे जो चाहिये होता वो समय समय पर सुमित्रा से ऊपर भिजवा देता , उसने अम्मा को सब कुछ बता दिया था…
  पर उपर पड़े पड़े निरमा बोर होने लगी थी…दिन में आठ दस बार सीढ़ियाँ चढ़ने उतरने वाली अपने हर काम के लिये खुद भागने दौड़ने वाली लड़की को प्रेम ने जैसे जेलखाने में कैद कर दिया था….
   अम्मा और सुमित्रा को उसने पहले ही ताकीद कर रखी थी कि किसी काम के लिये निरमा नीचे ना उतरने पाये, प्रेम की इस हरकत पर भीतर ही भीतर घर की नौकरानी उसका मज़ाक भी बना गयी__

  ” देख रही अम्मा! साहब कैसन बौराये गये हैं, अरे लड़िका बच्चा क्या इन्हीं का पहली बार हो रहा, क्या इन्हीं की औरत का पहली बार पैर भारी हुई गा का?”

  सुमित्रा के मुहँफट पने से अम्मा परिचित थी, उसे धीरे बोलने का इशारा करती वो भी फुसफुसाने लगी__

” नयी नयी उमर है नया नया चोंचला है सब, जब एक दो बच्चे हो जायें उसके बाद देखना कितना साज संभाल होता है।”

   प्रेम उस समय कुछ सामान लेने बाहर गया हुआ था, प्यास से निरमा का गला सूख रहा था इसी से तेज़ आवाज़ देने की उसकी हिम्मत नही हुई और चुपके से सीढ़ियाँ उतर कर वो उसी वक्त रसोई के बाहर पहुंची थी कि उसके कानों में सुमित्रा और अम्मा की बात पड़ गयी……….
     वैसे तो वो ऐसी बातों में चुप रहना ही सहीं समझतीं थी। उसका हमेशा ही ये मानना था कि बहस बराबरी वालों से ही की जा सकती है…सुमित्रा जैसी कम अकल से किसी बात के लिये भिड़ना उसे मंज़ूर ना था लेकिन आज प्रेम का ऐसे मज़ाक उड़ता देख जाने क्यों उसके तन बदन में आग लग गयी__

” क्या बोल रही हो सुमित्रा, साहब बौरा गयें हैं?
     कुछ भी कहने से पहले इतना ज़रूर ध्यान रखना कि यही वो आदमी है जिनके कारण तुम्हारे घर में चूल्हा जलता है! तुम क्या सोचती हो, आज तक मेरे आने से पहले तुम्हारा जो मौजी स्वभाव था उस पर तुम्हारे साहब का ध्यान नही गया, ऐसा कुछ नही है…
        जब जब उनकी जेब से रुपये पार किये है ना तुमने हर बार उन्हें मालूम चल गया है…
     मैं जब नयी नयी आयी तभी उन्होने मुझे मेरे गहने रुपये सब कुछ आलमारी में सहेजने और ताला लगाकर रखने को कहा , सब कुछ जानते हुए भी लेकिन मेरे सामने तुम्हारा नाम नही लिया , पर मैं भी इतनी अंधी तो हूँ नही।
  सुमित्रा तुमसे कोई बैर नही है मेरा लेकिन स्वभाव देख मैं समझ गयी कि इन्होने क्यों मुझे एहतियात बरतने को कहा।
      एक बार सोच के देखो अरे उस इन्सान के जीवन में और है ही क्या ?
   अपने माता पिता को खो ही चुके हैं, एक छोटा भाई था वो भी नही रहा, अब जो बचा है उनके जीवन में अगर उसे संभाल कर रखना चाहतें हैं तो आप लोग मिल कर उनका ही मज़ाक बनाने लगे, और अम्मा आप?
   आप को सिर्फ ऊपर से अम्मा कहते बस नही दिल से मानतें भी हैं और आप भी लग गईं उनकी बुराई करने में।
   आप दोनों एक बात ध्यान से सुन लीजिए, मैं उनकी बुराई किसी कीमत पर किसी से और कभी नही सुन सकती।
  
   जितना काम तुम करती हो सुमित्रा उस परिश्रम का तीन गुना तुम्हें पैसे देते हैं …तो क्या समझती हो तुम की उनके पास अक्ल नही है इसलिये देते हैं, अगर ऐसा सोचती हो तो जान लो , वो आदमी शायद पैदा ही हुआ है दुनिया भर के तकलीफमंदों की मदद करने।
उन्हें हर बात समझ आती है लेकिन उनकी भलमनसाहत है कि वो तुम में से किसी से कभी कुछ कहते नही।
    उनके जैसे लोग अनमोल होतें हैं, भगवान ने उन्हें बनाया और फिर वो सांचा ही तोड़ दिया, अरे शुक्र मनाइये की आप लोगों को उस आदमी की छत्रछाया मिल रही है।

” माफ कर दो बहुरिया! सच गलती हो गयी हमसे… मज़ाक की बात कह गये बस, लेकिन दिल से हम भी बाबू को अपना बेटा ही मानतें हैं ना।”

” बेटा मानती हैं तो आइंदा उनके लिये कभी कोई मज़ाक की बात या अपशब्द नही कहेंगी अब से।”

” कभी नही कहेंगी हम, चाहे सौगन्ध दिला लो हमें।”

” और सुमित्रा तुम?”

” दीदी पांव परते हैं आपके…भैय्या जी के लिये आज के बाद कभी जो बुरा कहा तो जीभ गल के गिर जायेगी हमारी।”

  ” ध्यान रखना , अब आगे से कभी मेरे कान में इनके खिलाफ कोई बात गयी तो मैं तुम्हें काम से निकालने से पहले एक पल को भी नही सोचूंगी।”

  प्रेम बहुत देर से दरवाज़े के बाहर खड़ा सब कुछ सुन रहा था, अचानक अन्दर जाने का उसका मन नही किया, जाने क्यों उसकी आँख भर आयी और वो वापस बाहर निकल गया, लगभग पांच दस मिनट में वापस आकर उसने सारा सामान टेबल पर रखा और बिना किसी से कुछ कहे ऊपर चला गया।
    तब तक निरमा भी ऊपर अपने कमरे में जा चुकी थी…
   अपने कमरे में बैठे-बैठे कुछ समय बीत जाने पर ना जाने क्या सोच कर वो निरमा के कमरे तक गया लेकिन फिर दरवाज़े पर ही थम कर खड़ा रह गया… …
  कुछ देर बाद कमरे का दरवाज़ा खटका कर उसने अन्दर झांका तो देखा निरमा अपने पलंग पर  अधलेटी सी कोई किताब पढ़ती सो गयी थी, वो धीरे से भीतर चला आया….
   जाने क्यों आज उसके कमरे में ऐसे अन्दर चले आने पर भी उसे संकोच ना हुआ जैसा हमेशा हुआ करता था।
   वो उसके एकदम पास आ कर हाथ बांधे खड़ा उसे देखता रहा।
   ऐसी बित्ते भर की लड़की कैसी तेज़ थी दिमाग से, आज तक वो अम्मा और सुमित्रा की हर हरकत जानते बूझते भी कुछ नही कह पाया और इसने इतनी आसानी से दोनो को सबक सीखा दिया….कितनी सारी बातें कहीं और सबसे ज्यादा तो उसी के बारे में कहती रही…
   क्या सच में वो उसके लिये इतना सोचती है?
और अगर इतना सोचती है तो क्यों उसका प्यार उसे नज़र नही आ रहा?
या शायद नज़र आने पर भी वो नही देखना चाहती?
  खैर वो प्रताप से प्यार करती थी, उसके लिये जितना कठिन प्रताप को भूलना है उतना ही कठिन प्रताप की जगह किसी और को देना भी तो है।

  वो उसे देखता सोच ही रहा था कि निरमा ने आंखें खोल दी, वो ऐसे प्रेम को सामने देख हड़बड़ा कर उठ बैठी, अपना दुपट्टा ढूँढती वो उससे नज़रे नही मिला पा रही थी, प्रेम ने कुर्सी पर पड़ा दुपट्टा उसकी ओर बढ़ा दिया__

” मैं बस ये पूछने आया था कि किसी चीज़ की ज़रूरत तो नही?”

  ना में सर हिला कर वो पलंग के एक ओर बैठ गयी__

” आप बैठिए ना खड़े क्यों है?”

” मैं आपको नीचे लेकर जाने आया हूँ।”

दो दिन से वो जिस काम में लगा था उस बारे में कोई जानकारी निरमा को नही थी।
  आज भी जब उसकी अनुपस्थिति में वो नीचे भी उतरी तब भी अम्मा और सुमित्रा को डांट डपट के वो ऊपर चली आयी थी, उसने इधर उधर देखने की आवश्यकता ही नही समझी थी।

” नीचे किस लिये?”

” आईये तो सही।”

वो उसके साथ साथ नीचे चली आयी…हॉल के दुसरी ओर बने गेस्ट रुम का दरवाज़ा प्रेम ने खोल दिया__
उस छोटे से कमरे को बहुत सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रेम ने संवार दिया था, एक ओर लगा साफ़सुथरा बैड तो उसके दुसरी ओर आलमारी और एक बड़ी सी खिड़की थी, उसी खिड़की से लगी छोटी सी बाल्कनी थी जिसे खोल कर सामने बगीचे का खूबसूरत नज़ारा देखा जा सकता था।
   वो उस कमरे को देख खुशी से चहक उठी__

  ” पर ये सब क्यों?”

” क्योंकि डॉक्टर ने आपको सीढिय़ां चढ़ने उतरने को मना जो किया है, यहाँ आपकी ज़रूरत का हर सामान मौजूद है, रसोई भी पास है और सबसे अच्छी बात बगीचा इस कमरे में बैठे बैठे भी देख सकती है, और नीचे ही रहने से जब चाहे वहाँ  जा भी सकती हैं।”

  निरमा की आंख भर आयी, इतना प्यार इतनी देखभाल !!
  लेकिन उन आँसूओं को उसने छलकने नही दिया, मुस्कुरा कर वो कमरे में भीतर हर तरफ घूम घूम कर हर चीज़ देखने लगी।
   अम्मा दोनो के लिये नीम्बू पानी बना कर वहीं ले आयी….

   उस दिन, रात तक में धीरे धीरे निरमा का सारा सामान प्रेम नीचे ले आया और निरमा पूरी तरीके से नीचे के कमरे में ही शिफ्ट हो गयी।
   खाने के बाद प्रेम सारे दरवाजों को बंद कर ऊपर सोने चला गया…..
     लेकिन नीचे अपने कमरे में लेटी निरमा को कभी हवा के कारण बाहर हिलते पत्ते सोने नही दे रहे थे  तो कभी किसी दरवाज़े खिड़की की आहट से वो चौंक चौंक के  उठ बैठती ऐसे ही पूरी रात जागते जागते ही काट गयी थी वो…

    अगले दिन प्रेम को युवराज भैय्या ने कुछ देर को महल बुलाया था ,उसके जाते ही नाश्ता करने के बाद निरमा अपनी रात की नींद पूरी करने चली गयी थी।
  उसी दिन रात में बांसुरी और राजा वापस आने वाले थे।

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फ्लाईट मे एक दूसरे का हाथ थामे बैठे दोनो अपनी बातों में खोये हुए थे …..
   दोनो के बीच इतनी बातें थीं कि भर भर बातें कर के भी लगता कुछ ना कुछ छूट ही जाता था…
  जब राजा साथ ना होता तब बांसुरी के दिमाग में कई बार आता की उसके फ़ोन पर वो तस्वीरें क्यों भेजता है ये पूछ ले, लेकिन सामने और साथ होते हुए वो हर बार ये बात कहनी भूल ही जाती थी….

” बांसुरी हमारे जीवन की शुरुवात है ये, हमारे साथ की शुरुवात है ऐसे में मैं अपने जीवन से जुड़ी एक बहुत ज़रूरी बात तुम से कहना चाहता हूँ …

  ” हाँ कहो!”

   ” मेरे जीवन में मेरी माँ मुझे बहुत छोटे में ही छोड़ गईं थी, मुझे पालने पोसने वाली मेरी छोटी माँ ही हैं…..
   आज मैं जो हूँ जैसा हूँ उन्हीं के कारण हूँ, तुम्हें हो सकता है कई बार ये लगे कि वो थोड़ी सख्त मिज़ाज़ हैं लेकिन यही उनका स्वभाव है बाहर से कठोर और अन्दर से नर्म और मीठी।
   आज तक मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण महिला वहीं थीं लेकिन आज जब तुम भी आ चुकी हो तो बस तुमसे इतना ही कहना चाहता हूँ कि कभी मुझसे उनके लिये कोई गलत शब्द ना कहना।
   जैसे आज तक मेरे लिये उनकी कही बातें पत्थर की लकीर रहीं हैं तुम्हारे लिये भी होनी चाहिये…
  भले ही एक बार तुम मेरी बात काट सकती हो लेकिन अगर उन्होने कुछ कह दिया तो वो तुम्हें और मुझे मानना ही है।
  बांसुरी बस इतना ही तुमसे चाहता हूँ मैं कि मेरे घर की शांति कभी तुम्हारे कारण भंग नही होनी चाहिये।
देखो जहां चार बरतन होतें हैं वहाँ आवाज़ होती ही है, लेकिन ये भी एक सत्य है कि अगर बरतन करीने से सजे हों अपनी हद में हों और आपस में ना टकरायें तो कभी टनकते भी नही हैं।
   कल तक मैं महल का राजकुमार था, बहुत से नियमों की धज्जियां मैने भी उडाईं हैं ……लेकिन अब राजा बनने के बाद मैं ही इन नियमों का पालनकर्ता बन गया हूँ पालक बन गया हूँ , अगर मैं ही नही माना तो कोई और क्या मानेगा।
   मैंने विराज विराट और पिंकी में कभी कोई भेद भाव नही किया, तीनों मुझसे छोटे मेरे प्यारे भाई बहन हैं और तुम से भी यही अपेक्षा रखूंगा कि तुम इन्हें खुद से छोटा मान कर इनकी छोटी बड़ी भूलों को माफ करती चलो।
   तुम समझ रही हो ना मैं क्या कह रहा हूँ।
मैं तुम्हारे हर निर्णय में सदा साथ रहूँगा बस मेरी इतनी सी बात को कभी मत भूलना।”

  ” कुछ पूछूँ?”

  ” बेशक ! इतनी डरी सी क्यों हो? कुछ ज्यादा नसीहत दे दी क्या मैंने?”

” नही, बिल्कुल भी नही! मैं बस ये जानना चाहती थी कि मेरी कोई बात बुरी लगी क्या? असल में मैने उस दिन माँ साहेब की नाम वाली बात काट दी थी ना।”

” अरे नही बिल्कुल नही! मैं खुद ऐसे रिवाजों को नही मानता जिनका कोई लॉजिक ना हो, उस समय तुम भी नई थी घर पर लेकिन अब तो सब कुछ जान गयी हो। ”

  जब हम सफर प्यारा हो तो लम्बे से लम्बा सफर भी पलक झपकते बीत जाता है।
  दोनो देर रात गये  महल पहुंच गये। उन्हें सकुशल पहुंचा कर प्रेम वापस लौट गया।

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प्रेम दोनो को छोड़ कर जब तक लौटा काफी रात हो चुकी थी….
  
        उन्हें रात में एयरपोर्ट से  लेकर के आकर महल में छोड़ कर प्रेम जब वापस लौटा तब तक रात हो चुकी थी, अम्मा भी घर जा चुकी थी, निरमा नीचे  बेबी केयर पर कुछ देखती बैठी थी__

  ” आ गये दोनो वापस?”

  ” हम्म! महल छोड़ कर ही लौट रहा हूँ।”

  ” आपका खाना लगा दूं?”

  ” नही आप आराम किजीये , महल से हुकुम मुझे कभी ऐसे लौटने देते हैं क्या? कुछ ना कुछ खिला ही देते हैं…हुकुम के साथ कुछ थोड़ा सा खा लिया मैंने, आपने खाना खाया?” ।

    पिछ्ले चार दिन से प्रेम और निरमा तीनों वक्त का खाना नाश्ता साथ ही खा रहे थे, उसी लय में आज भी निरमा बिना खाये ही बैठी थी, उसे नही लगा था कि वो खा के आ जायेगा__

” नही खाया लेकिन अब भूख भी नही है।”

  ” ऐसे कैसे भूख नही है? डॉक्टर ने कहा था ना समय पर सोना खाना पीना करना है आपको।”

   ” सुनिये प्रेम जी! आपसे कुछ कहना चाहती थी।”

  पहली बार निरमा के मुहँ से अपना नाम सुन वो मुस्कुराने लगा__

” कहिये!”

  ” मुझे कल अकेले नीचे सोने में डर लग रहा था , तो अगर आपको गलत ना लगे तो मैं सिर्फ सोने बस के लिये ऊपर अपने कमरे में चली जाया करुँ क्या?”

” ऊपर भी तो अकेले ही सोती हैं वहाँ डर नही लगता?”

  ” आप तो रहने हैं ना पास में, मेरा मतलब पास वाले कमरे में।”

  ” तो ठीक है , मैं हाथ मुहँ धो कर नीचे ही आ जाता हूँ, मैं भी नीचे ही सो जाऊंगा, यहाँ इस सोफे पर। ठीक है?”

हाँ में सर हिलाती वो मुस्कुरा कर रसोई में अपने और प्रेम के लिये दूध लेने चली गयी।

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     महल वापसी के अगले दिन से ही राजा अपने कामों में लग गया….
    किसी गणतंत्र में राजशाही चलाना आसान नही होता वह भी तब जब आप सरकार में ना हो, आये दिन रियासत की जनता अपनी अलग अलग तरह की समस्याएं लेकर दीवानखाने का दरवाज़ा खटका जाती, कभी लगान माफी, तो कभी महंगाई की मार! जनता के पास भी ढेरों सवाल थे और सरकार के पास हर बात के जवाब लेकिन दोनों के बीच पिसता राजा हर समस्या और समाधान के बीच की धुरी बनकर पिसता जा रहा था।
      जन समस्याओं के अलावा उसके खुद के कारोबार भी फैले थे, उन्हें भले ही युवराज भैय्या संभाल रहे थे लेकिन अब हर बड़ी समस्या के लिये उसे ही आगे आना पड़ता था।
   जो भी जैसा भी था चल रहा था, समर को युवराज भैय्या ने उसके साथ ही कर दिया था।विराज के रंग भी कुछ बदले से थे, कभी रात रात भर जिस किसी भी बार में पीकर पड़े रहने वाला विराज अब ज्यादा से ज्यादा समय राजा के आगे पीछे घूमने लगा था।
   हमेशा किसी ना किसी काम में वो भी उसके साथ लगा रहता, उसे देख राजा को अब वापस उस पर भरोसा होने लगा था… लेकिन ये भरोसा कब तक नही टूटेगा इसका पता किसी की ना था।
    दिन बीतते जा रहे थे, राजा के पास सांस लेने की फुरसत भी ना थी और बांसुरी का वक्त काटे से कट नही रहा था।
      हर वक्त ससुराल में जैसे राज माता उसके लिये कोई ना कोई नया चैलेंज लिये बैठी होती थी……
  अपनी बोली और कामों से भी उसे छलनी करने का कोई बहाना वो नही छोड़ती….
  एक शाम जब महल की सारी महिला सद्स्य बगीचे की सैर करने के बाद वहीं बैठी चाय पीती इधर उधर की बातों में लगी थीं कि कहीं से घूम फिर कर विराज भी वहीं चला आया, आते ही रेखा के पास वो भी एक कुर्सी खींच बैठ गया__

” विराज सा यहाँ कहाँ जनानियों के बीच चले आये आप? आज कोई काम ना है क्या आपके पास?”

  ” रूपा भाभी सा! हमें तो पूरा हक है यहाँ बैठने का… यहाँ कौन हमारी बहु है जो हमसे पर्दा करेगी, माँ साहेब के अलावा आप तीनों तो हमारी भाभी साहेब हुईं, और ये तो हमारी पर्सनल हुकुम हैं।”

   रेखा को एक तरफ से बाहों में समेट कर विराज ने कहा और वहाँ रखी चाय उठा ली, उसकी बात पर सभी मुस्कुरा उठे__

” हाँ बात तो सही हैं इनकी, कुंवर सा बड़े ही तो हैं इनसे तो इस लिहाज़ से बांसुरी भी इनकी भाभी साहेब ही हुई ना।”

  सब हंसी मज़ाक करते चाय पी रहे थे और बांसुरी अपने फ़ोन में आयी अपनी तस्वीरों को देखती मुस्कुरा रही थी…..

    वैसे तो सारा दिन ऐसे दिखाएँगे जैसे वक्त ही नही है और अभी जाने कहाँ बैठे छिप छिप कर तस्वीरे खींच कर और भेज रहे हैं …….

  ” क्या हुआ बांसुरी? आप कहाँ खोयीं हैं अपने फ़ोन में?”

  ” कुछ नही भाभी साहेब, बस ऐसे ही।” वो बगीचे के चारों ओर इधर उधर देखती कुछ देर राजा को ढूंढने की कोशिश कर वापस सब के साथ बातों में लग गयी। विराज और रेखा अपनी दुनिया में मगन थे, दोनो को साथ साथ खुश देख उसे भी राजा के साथ गुज़ारे हसीन लम्हें याद आ रहे थे…
   समय कब कैसे बदल जाता है मालूम भी नही चलता, बीतते बीतते उनकी शादी को लगभग चार साढ़े चार महीने बीत चुके थे…..
  इस सारी अवधि में उनकी छुट्टियों के साथ ही सारे रस भरे दिन भी चूक गये थे…
  राजा चाह कर भी समय पर आ नही पाता था, उसके पिता एक अच्छे राजा होने के बाद भी कुछ अपनी तबीयत और कुछ रानी साहेब की हर मामले में दखलंदाजी के कारण बहुत से कार्यो को आधा अधूरा ही छोड़ बैठे थे।
   उनकी रियासत की कई ज़मीनों की लीज़ पर तो कहीं किसी और बात पर कई केस लगे हुए थे, कभी किसी काम से तो कभी किसी काम से उसका लगभग रोज़ ही शहर का दौरा हो जाता….
     काम शाम सात आठ तक निपट भी जाये तो उसे वापसी में ही डेढ़ दो घण्टे लग जाते, आने के बाद ऑफिस झांक कर ही लौट पाता…..
   लेकिन उसे कितनी भी रात हो जाये वो जागती बैठी उसका इन्तजार करती रहती।
    आज बहुत दिनों बाद राजा ने उसे तस्वीरें भेजी थी, वो तो सोच रही थी ,वो अभी कहीं से निकल कर बाहर आ जायेगा लेकिन ना उसे आना था ना आया।

   अन्धेरा ढलते देख राज माता ने सबको शाम की आरती के लिये तैय्यार होकर आने को कहा और अपने कमरे की ओर निकल ही रहीं थीं कि , उसी वक्त बांसुरी से मिलने निरमा चली आयी, उसे नज़रअन्दाज़ कर वो जाने वालीं थीं लेकिन फिर उसकी अवस्था देख वो भी रुक गईं।
   रूपा भाभी जया भाभी सभी निरमा को देख प्रसन्न हो गईं, अब उसका पेट भी नज़र आने लगा था। इशारे से ही रूपा भाभी ने उससे पूछा और निरमा के हाँ कहते ही सभी उसे बधाइयाँ देने लगी….
   निरमा ने आगे बढ़ कर राजमाता के पैर छुए और उसे आशीर्वाद देकर एक ओर बैठने का इशारा कर वो जाते जाते बांसुरी पर एक और बिजली गिरा गईं__

” बहुत प्रसन्नता हुई निरमा आपकी खुशखबरी सुन कर!  हम तो अपनी दोनो बहुओं से भी सुनना चाहते थे….रेखा ने तो हमारी इच्छा का मान भी रख लिया लेकिन आपकी सहेली जाने क्यों हमारी बात ही नही सुनती। ”

  रेखा के बारे में बांसुरी को कोई जानकारी नही थी, वो आश्चर्य से रेखा की ओर देखने लगी, इशारे से उससे पूछने पर उसके साथ साथ रूपा भाभी ने भी हाँ में सिर हिला दिया। मतलब एक उसे छोड़ महल में हर किसी को रेखा के बारे में पता था__

  ” कौन सा महीना चल रहा रेखा आपका?”

  ” अभी तो बस शुरुवात ही है, डेढ़ महीना ही पुरा हुआ है ….. . रेखा अपनी बात कहती शरमा गयी, उन सब की बातों के बीच विराज उठ कर कब निकल गया किसी ने ध्यान ना दिया…
    निरमा के आने से और रेखा की खुशखबरी पता चलते ही वहाँ बातों का विषय ही बदल गया…..
  दुनिया भर की औरतों का सर्वप्रिय विषय बच्चा और बच्चे की सेहत कुशलता की बातों का दौर चल पड़ा …
   जया और रूपा अपने अनुभव बताने लगीं, निरमा भी अपने स्वास्थ्य और बाकी बातों को बताने में व्यस्त थी, लेकिन बांसुरी अन्दर ही अन्दर उतनी खुश नही हो पा रही थी…..
    वो इस बारे में किसी से यहां तक की राजा से भी खुल कर कह नही पा रही थी लेकिन वो जब से महल में आयी थी तबसे ही उसके स्वास्थ्य में कुछ ना कुछ समस्या बनी हुई थी।
    वो भी जल्द ही माँ बनना चाहती थी लेकिन चार महीने गुज़र जाने पर भी उसमें ऐसा कोई लक्षण नज़र नही आ रहा था…… सब की बातों से इतर वो खुद में खोयी यही सोचती बैठी थी कि आज राजा कितनी भी रात गये वापस आये वो उससे मोबाइल पर भेजने वाली तस्वीरों की बात तो कर के ही रहेगी और साथ ही अपनी तबीयत के बारे में भी एक बार तो ज़रूर कहेगी।

    माँ साहेब के वहाँ  से जाते ही कुछ देर बातें कर आरती के लिये एक एक कर सभी कपड़े बदलने चली गईं, निरमा अगले दिन बांसुरी को खाने पर आने का न्योता देने आयी थी, वो भी उसे अगले दिन अपने घर आने बोल निकल गयी।
     बांसुरी अपने कमरे में  कुछ देर तक सोचती बैठी रही फिर वो भी उठ कर आरती के लिये निकल गयी।

  देर  रात वो कमरे में बैठी कुछ लिख रही थी कि राजा भी वापस आ गया…..
   उसके हाथ मुँह धोते में ही मेनका हर दिन की तरह उन दोनो के लिये दूध का गिलास लिये चली आयी__

” ये सोने का गिलास हुकुम का और ये चांदी वाला आपका है रानी साहेब।”

  ” रोज़ रोज़ याद दिलाती हो मेनका….मुझे एक बार जब पहली बार तुमने कहा था तब से मैं कभी नही भूली। बिना भूले हुकुम का गिलास उन्हें ही देती हूँ और अपना मैं ही लेती हूँ।” मुस्कुरा कर बांसुरी ने उसे बाहर भेजा और अपना गिलास हाथ में थामे देखती कुछ सोचती बैठी रही…..

क्रमशः

aparna….


   
 
   
   
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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