जीवनसाथी -59

जीवन साथी 59



       वक्त किसी के लिये नही रूकता, उसे अपनी गति से चलना होता है और वो अपनी गति से ही चलता है , अगर आपकी ज़रूरत है तो आप भागिये वर्ना वो आपको पीछे छोड़ जायेगा।

      रतन के लैपटॉप में कुछ समस्या आने से उसने बनने दिया हुआ था….
   फ़ोन पर भी इंटरनेट पैक खत्म था…जिसे अगले किसी इम्तिहान की व्यस्तता के कारण उसने रीचार्ज नही करवाया था।
    रतन और पिंकी का इंटरव्यू हो चुका था, परिणाम आने का समय भी आ चुका था।
  शाम चाय बनाने की पारी रतन की थी, जिसमें भरपूर आलस करते हुए आखिर वो अपनी किताबें किनारे रख चाय बनाने रसोई में घुसा ही था कि दरवाज़े पर कोई बेल पर बेल बजाने लगा।
  बेल ऐसे बजाई जा रही थी कि लगता था अगर जा कर दरवाज़ा नही खोल दिया गया तो सामने वाला बेल की जगह दरवाज़ा ही ना उखाड़ फेंकें।
पिंकी एक शार्ट ब्रेक लिये कमरे में उनींदी सी पड़ी थी, जब से इंटरव्यू निपटा था वो आराम फरमाना चाहती थी लेकिन रिजल्ट आये बिना रतन को चैन  नही था उसने अभी भी पढ़ाई की वही दिनचर्या बना रखी थी।

  पिंकी जाग ना जाये इस डर से भागता हुआ रतन दरवाज़े पर पहुंचा और एक झटके में दरवाज़ा खोल गया__

  ” क्यों बे ससुर किसके खेत में साले चरस बो रहे थे जो सदी बिता दी दरवाज़ा खोलने में।”

  ” सालों तमीज़ से बात करना तो सीख लो , कुछ सीखा ही नही तुम लोगों ने, तनिक धीमे बोल लो अन्दर तुम्हारी भाभी सो रही है।”
  
  रतन के दो तीन साथ पढ़े के दोस्त थे, इन्हें भी रतन के विवाह का पता था लेकिन आज खबर ऐसी थी कि सब अपनी तमीज़ खूँटी पर टाँग कर भूल आये थे।

  ” मिठाई खाओ खिलाओ बे सूर्यवंशी , पास कर लिये हो तुम सिविल सर्विस”

   उनमें से एक ने अपनी बात पूरी कि और पूरा का पूरा एक लड्डू रतन के मुहँ में ठूंस दिया….
    हड़बड़ाया सा बौराया रतन कभी उन्हें कभी उनके हाथ में मिठाई के डब्बे को देखता खड़ा था, उसने चट फट अपने मोबाइल को रीचार्ज किया और रिजल्ट खोलने लगा, उतने में किसी दूसरे ने अपने बैग से लैपटॉप निकाल कर कानेक्ट किया और रिजल्ट खोल सामने रख दिया__

  ” साले सांतवी रैंक पर हो वो भी जनरल कैटेगरी से।”

  खुशी से रतन का मुहँ खुला का खुला रहा गया, अपना सर थामे वो वहीं बैठा रहा गया__

  ” अबे जरा खिसको, देखने दो हमें भी” …..लिस्ट में अपना रोल नम्बर  नाम पिता का नाम जन्मतिथि सब चार चार बार देखने पर भी संतुष्टी ना थी, रतन ने तुरंत पिंकी का नाम लिस्ट में खंगालना शुरु किया।

  सारी लिस्ट ऊपर से नीचे,नीचे से ऊपर देख ली लेकिन भुवनमोहिनी सिंह नाम उसे नही मिला।
इतनी देर में बाहर चल रही ऊठापटक सुनती पिंकी भी बाहर झांक चुकी थी, वो अन्दर से सबके लिये चाय लिये बाहर चली आयी।
    उसके आते ही सारे बंदरों की टोली व्यवस्थित बैठ गयी, उसने आते ही ट्रे सामने रखी और खुद रतन के पास बैठ गयी, उसने लिस्ट में रतन का नाम देखने के बाद अपना नाम ढूँढना शुरु किया लेकिन जब उसे अपना नाम उस लिस्ट में नही दिखा तो रुआन्सी हो रतन की ओर मुड़ गयी__

” यही फाइनल लिस्ट है या और कोई भी आनी है अभी रतन”

  ” भाभी जी फायनल तो यही है अब कोई लिस्ट ना आने की ।”

  ” मतलब हमारा सेलेक्शन नही हुआ?”

  रतन से पिंकी को कोई जवाब देते नही बना, क्या बोलूं कैसे समझाऊँ सोच रहा था कि फटाफट अपनी अपनी चाय गटक उसके दोस्त एक एक कर निकल गये,उनमें से किसी ने इसी लिस्ट में स्थान बना लिया था तो किसी ने पी सी एस में, कोई पहले ही डी आर डी ओ में था , बस रह गयी थी तो पिंकी, जो आंसू बहाती वहाँ से उठ भीतर चली गयी।
   रतन की कुछ देर पहले की सारी खुशी जैसे काफूर हो गयी।
  पिंकी ने अन्दर जा कर कमरा अन्दर से बंद किया और रोते रोते पलंग पर जा गिरी। रतन ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन आज राजकुमारी का मिजाज बिगड़ा हुआ सा था ……  रतन ने बहुत कोशिश की और रतन को जब कुछ समझ नही आया तो उसने राजा भैय्या को फ़ोन लगा लिया__

  ” जी कहिये रतन सा? क्या हाल हैं आपके?”

” भाई साहब रिजल्ट आ गया हमारा….हम सेलेक्ट हो गयें हैं।

  ” बहुत बहुत बधाइयाँ, मैं पहले ही जानता था आप सेलेक्ट हो कर रहेंगे। पिंकी का क्या हुआ?”

” भाई साहेब पिंकी सेलेक्ट नही हो पायी।”
दोनो ही तरफ गहरी शांति छा गयी। राजा को शायद आभास था, वो अपनी बहन के स्वभाव उसकी प्रतिभा से परिचित था, खैर यहाँ तक पहुंचना भी कम बड़ी बात ना थी पर इतनी मेहनत के बाद अखिर पिंकी रह गयी थी, चूक गयी थी, उसका एक पूरा साल खराब हो चुका था….
     अब अगर वो वापस इम्तिहान में बैठती है तो ये उसका आखिरी मौका होगा….
   वो खुद में सोचता बैठा रह गया, अभी सहारा देने के लिये वो अपनी बहन के पास था भी नही, पर अब किसी तरीके से तो उस तक पहुंचना ही पड़ेगा, भले ही काम के बहाने जाये…..

  “कुछ देखता हूँ रतन, बनता है तो मैं वहीं आने की कोशिश करता हूँ।”

” जी भैय्या जी, प्रणाम ”

  ” खुश रहिये”

  राजा के फ़ोन रखते ही सामने बैठे समर ने फाइल्स पे झुका चेहरा ऊपर किया __

” कोई परेशानी हुकुम?”

  ” समर!! पिंकी सेलेक्ट नही हो पायी, रतन का हो गया है।”

  पहले खट्टी फिर उस पर मीठी बात का क्या कैसे प्रतिउत्तर दिया जा सकता था लेकिन समर भी समर था__

  ” ये तो अच्छी बात है हुकुम! आज तक दो विद्यार्थी साथ पढ़ा करते थे, अब अगर विद्यार्थी को स्वयं कलेक्टर साहब का साथ मिलेगा तब तो उनका सिलेक्शन पक्का ही समझिये।”

राजा मुस्कुराने लगा__” हर समस्या का समाधान है तुम्हारे पास समर! तुम हनुमान हो हमारे लिये..हर मौके बेमौके संजीवनी ढूँढ ही लाते हो।

  समर भी मुस्कुरा उठा, तभी युवराज भैय्या भी वहाँ चले आये__

  ” समर सच्चे अर्थों में पार्थसारथी है राजा, एक दिन समझ जाओगे।”

  ” समर अगर पार्थसारथी है तो पार्थ कौन?”

  ‘जाहिर है पार्थ तो आप ही हुए हुकुम।”

युवराज मुस्कुरा कर अपने काम की फाइल्स उठा कर दूसरी ओर चला गया …..राजा विचारों में डूबा बैठा रह गया__

” हुकुम किसी बात पर परेशान लग रहे आप?”

  ” समर! परेशानी के तो बहुत से कारण हैं क्या क्या बताऊँ?
   पर अब एक बात और लग रही कि क्या राजमहल से जुड़ी सारी बातें मुझे बांसुरी को बता देनी चाहिये थी? मॉम से जुड़ी, ठाकुर साहब और विराज से जुड़ी बातें। अब तक मैंने उसे कुछ भी नही बताया है”

” आपने नही बताया इसके पीछे आपका कोई कारण तो रहा होगा हुकुम! वैसे भी मेरा ये मानना है कि किसी भी परेशानी को पुरूषों के द्वारा अलग नजरिये से देखा जाता है और महिलाओं द्वारा अलग नजरिये से।
  राज माता की जिस बात को आप दोनो भाइयों ने घर की सुख शांति के लिये  मन में दफना लिया वैसे रानी साहेब दफना ले ज़रूरी तो नही?”

  ” समर बात ये नही थी, असल में मैं बांसुरी के जीवन के साथ कोई खिलवाड़ नही चाहता। अगर उसे सब सच बता जाता तो क्या वो मॉम के साथ सामान्य व्यवहार कर पायेगी?
    नही कभी नही…और जैसा उसका स्वभाव है कहीं नाराज़गी में कुछ कह गयी और लोगों को थोड़ा भी आभास हो गया तो लोग उसकी जान के भी दुशमन बन जायेंगे….. अभी कम से कम बिना मन के ही सही वो मॉम की हर बात पर अगर उन्हीं का साथ देगी तो वो तो सुरक्षित बच जायेगी।
     रही बात मॉम की तो उनके मन को तो मैं जीत कर रहूँगा, आज नही तो कल लेकिन उन्हें भी सच्चे मन से मुझे अपनाना ही होगा , बस उसी समय का इन्तजार है कि तब तक बांसुरी पर कोई आंच ना आये।”

   ” आप सदा से अलग ही लेवल पर सोचतें आयें हैं हुकुम! इसिलिए हम और युवराज भैय्या इतनी शिद्दत से आपके राजतिलक के लिये लगे हुए थे।”

  समर और राजा बातों में लगे थे, उस बड़े से ऑफिस के एक किनारे युवराज अपने किसी काम में डूबा था की विराज कमरे में चला आया__

” क्या हम अन्दर आ सकतें हैं?” विराज जो दरवाज़ा पार कर अन्दर आ चुका था ने जैसे सवाल किया समर ने उसका वैसा ही जवाब दे दिया__

” आप तो अन्दर आ ही चुके हैं विराज सा,आईये।”

विराज की कारगुजरियों पर समर का हमेशा ही दिमाग घुमा हुआ होता था, क्योंकि जहां तहाँ से उसे बरामद कर के वापस महल तक लाने का काम अधिकतर समय उसे ही करना पड़ता था।
    पीने खाने की उसकी आदत बुरी तो थी लेकिन नाकाबिले बर्दाश्त ना थी, पर जब पिछली दफ़ा किसी बार में किसी लड़की के साथ अभद्र्ता करने के बाद विराज को पुलिस थाने से समर को वापस लाना पड़ा था उस वक्त विराज की गंदी ज़बान से उस लड़की के लिये निकलती अभद्र अश्लील टिप्पणियों ने समर के मन में विराज के लिये बचा खुचा सम्मान भी समाप्त कर दिया था।
    

         मामला कुछ ऐसा था कि अपनी शादी से कुछ पहले विराज अपने चंद दोस्तों के साथ जिस होटल के लाउंज में बैठा एक पर एक महंगी शराब का स्वाद चख रहा था, वहीं उसकी टेबल से लगी टेबल पर एक अन्ग्रेज लड़की अपने कुछ दोस्तों के साथ गप्पे मारती खाने पीने में व्यस्त थी….
     इधर उधर नज़र मारते में जब विराज की नज़र उस लड़की से टकराई तो अपनी पश्चिमी सभ्यता का पालन करती लड़की मुस्कुरा उठी।
  उसे हिन्दुस्तानी लड़कों का हंसी तो फंसी वाला फॉर्मूला पता ना था, उसकी मुस्कान देख विराज के दिमाग में कुछ और ही खिचड़ी पकने लगी…..उसे लगा एक तो अन्ग्रेजन उस पर भर के पी बैठी है तो उसके एक रात्रिविश्राम के प्रोपोज़ल को स्वीकार कर ही बैठेगी, उसने टप से उठ कर अपना अभद्र प्रस्ताव उसके सम्मुख रख दिया।
      गोरे चिट्टे लम्बे चौड़े हीरो जैसे कहीं के सभ्य सुसंकृत  राजकुमार से दिखते लड़के के मुहँ से शानदार अन्ग्रेजी में सुनी इतनी वाहियात बात पर पहले तो उस लड़की को कूछ ना सूझा फिर दुबारा उसका जवाब जानने के लिये जैसे ही विराज ने झुक कर उसके सामने अपना चेहरा किया रेवन ने उसे कस कर एक थप्पड़ रसीद कर दिया …
     सरे आम दोस्तों और होटल स्टाफ़ के सामने पड़ा थप्पड़ विराज के चेहरे पर नही उसके अस्तित्व उसके व्यक्तित्व पर था, इसी से उसने इसे अपनी इज़्ज़त की बात बना ली और उस लड़की का हाथ पकड़ लिया…
  होटल का सारा स्टाफ़ और वहाँ उपस्थित अधिकतर लोग विराज से परिचित थे, उसके दोस्त भी कुछ झूठी दोस्ती तो कुछ विराज के पद गरिमा के डर से उसे समर्थन देते उसके पक्ष में कहते रहे, लेकिन लड़की भी अपने में शेरनी थी, उसने विराज की कलाई ज़ोर से मरोड़ी और अपने दूसरे हाथ से तुरंत पुलिस को फ़ोन लगा लिया था……
    विराज की हर वो कोशिश जो बदतमिज़ी की रेखा पार कर रही थी का मुहँ तोड़ जवाब उस अन्ग्रेजन से पा कर भी विराज घायल शेर सा उस पर टूट पड़ने को बेकरार था, आखिर पुलिस के आने पर मामला थाने पहुंचा और युवराज के साथ समर के वहाँ आने से ही सुल्टा।
    युवराज जहां पुलिस से बातचीत कर मामला सुलझाने की कोशिश में था वहीं समर उस लड़की से सुलह समझौते में लगा था।
   समर को भी कोई बिगड़ा रईसजादा समझी बैठी रेवन ने उसकी तरफ देखना भी गंवारा ना समझा तब उसके साथी किसी लड़के ने सारी बात समर को बतायी……
    रेवन पेरिस से भारत अपनी किसी थीसिस के लिये आयी थी जो उसे भारतीय छोटे शहरों के सामान्य जनजीवन पर बनाना था, अमूमन अंग्रजों की तरह वो भी पहले हरिद्वार फिर बनारस के घाटों में ही भारतीय संस्कृति की झलक ढूँढती फिर रही थी कि भोपाल के एन एस यू डी की कॉलेज ट्रिप उससे अस्सी घाट पर टकरा गयी और वहाँ मिले उन युवा लड़के लड़कियों की टोली के साथ वो उन्हीं के साथ उनके जीवन पर जानने लिखने और उनके साथ कुछ समय गुजारने भोपाल चली आयी थी।
   अन्ग्रेज लड़कियाँ वैसे भी थोड़ी निर्भीक होतीं हैं उस पर रेवन के पिता सैन्य अधिकारी थे इसी से गलत को गलत कहना उसने बचपन से सीख रखा था।
    उस लड़के से रेवन का परिचय सुनने के बाद समर हाथ जोड़ कर उसके सामने खड़ा हो गया था, वो किसी भी कीमत पर विराज की रिहाई को तैय्यार ना थी, और पुलिस अधिकारी का यही कहना था कि अगर लड़की रिपोर्ट वापस नही लेगी तो विराज को बाहर नही निकाला जा सकेगा।
    आखिर रेवन के से ही शन्दों मे उसे उलझा कर ही समर उसे मना पाया था।
   सेलिना गोमेज़ जैसी भोली सी शक्ल वाली रेवन का सारा गुस्सा उस वक्त समर पर ही फूटा था….पर आखिरकार उसे समझा बुझा कर उसे उसके साथियों के साथ उसके ठिकाने छोड़ कर लौटते में रास्ते भर विराज की बदनियती रेवन को गालियाँ दे देकर कटी और ये ज़हर समर हज़म नही कर पा रहा था।

  हालांकि इस काण्ड के बाद केस को रफ़ा दफ़ा करने के चक्कर में समर और रेवन की दो चार मुलाकातें बहुत सुखद रहीं थी ,बावजूद उस रात के बाद से समर जब भी विराज को देखता अपना रास्ता बदल लिया करता था, आज भी वही हुआ, विराज को देखते ही समर ने अपनी फाइल्स बंद की और वहाँ से हट गया।

  ” आज कल कुछ ज्यादा ही काम नही कर रहे आप हुकुम?”

  ” विराज तुम्हारे लिये मैं हमेशा से ही तुम्हारा भाई पहले हूँ हुकुम बाद में। अपने घर परिवार का राजा थोड़े ही हूँ मैं, मुझे तुम पहले वाले नाम से ही बुलाओ।”

  ” अच्छी बात है, जैसी आपकी आज्ञा….हम तो बस ये कहना चाहते थे कि नयी नयी शादी है आपकी भी, कुछ वक्त तो अपनी दुल्हन को भी दीजिये……
   नयी उमर है उनकी, उनके भी अरमान होंगे, उमंगे होंगी, बहुत बार साथी की ज़रूरत महसूस होती होगी और आप यहाँ मगज मारने मे लगे रहते हैं।

” सही कह रहे हो लेकिन क्या करुँ, सोचता हूँ थोड़ा काम संभले तो उसे साथ लेकर फिर छुट्टियों पर निकल जाऊँ।”

  ” बिल्कुल जाइये कुमार जाना भी चाहिये, क्योंकि हमें लग रहा है बांसुरी भाभी आपको मिस कर रहीं हैं।”

  ” क्यों? तुमसे कुछ कहा उन्होने?”

  ” नही , हमसे कहाँ  अधिक बातचीत होती है उनकी, वो तो आजकल अधिकतर समय महल की लाइब्रेरी में बिताती हैं”

  ” हाँ पढ़ने की शौकीन जो हैं।”

  ” हाँ तभी तो! विराट भाई पहले पहले उनके कमरे में किताबें पहुंचा जाते थे लेकिन अब तो भाभी सा विराट के साथ लाइब्रेरी ही चली जातीं हैं, वो भी क्या करें? कहाँ समय बिताएं?  किताबों से बढ कर साथी और कौन है? ,तभी तो पूरी पूरी दोपहर दोनो वहीं बिता आतें हैं….

  राजा विराज की बात सुन फाइलों से नज़र उठा कर उसे देखने लगा, एकाएक उसे विराज की बात का कोई जवाब नही सूझा, समर और युवराज भैय्या अपने अपने कमरों मे जा चुके थे, उसने घड़ी देखी रात के दस बज चुके थे।
   व्यस्तता के कारण आजकल वो रात्रिभोज में भी सबके साथ सम्मिलित नही हो पाता था, उसके युवराज भैया और समर के लिये थाली अक्सर यहीं पहुंचा दी जाती थी।

   समय देखने के बाद अपनी फाइल समेटे वो वापस जाने के लिये उठ गया, उसके पीछे ही विराज भी निकल गया।

     ******

   निरमा अब नीचे ही सोया करती थी, वो कमरे के अन्दर और कमरे से ठीक बाहर प्रेम, बीच का दरवाज़ा ऊढका हुआ होता।
     अब धीरे धीरे वजन बढने के साथ ही छोटी छोटी चीज़ों में उसकी तकलीफ भी बढने लगी थी….कभी अधिक देर बैठ जाये तो कमर दर्द करने लगती कभी पैरों में सूजन आ जाती लेकिन चेहरा उसका बिल्कुल खिले गुलाब सा चमक उठा था।
    
    बांसुरी का महल से बिना किसी कारण निकलना कम ही होता था उस पर बांसुरी अगर अपने मन से निरमा से मिलने निकले तब भी राजा माता की सहमती लेना ज़रूरी था…..
  पहले पहल जब भी बांसुरी खुद निरमा के घर जाने को पूछा करती एक आध बार कुछ देर के लिये सहमती देने के बाद आखिर राजमाता ने उसे टोक ही दिया था__

  ” इस तरह महल की रानी साहेब का महल के कर्मचारियों  के घर रोज़ रोज़ जाना शोभा नही देता… अब अगर हम कुछ कहेंगे तो ये हो जायेगा कि सासु सा हर बात पर पर टोकती फिरती है, पर इतना ज्ञान तो आपको स्वयं होना चाहिये रानी अपूर्वा!”

  ” जी माँ साहेब हुकुम! आगे से ध्यान रखूंगी।” कह बांसुरी चुप चाप कमरे में लौट गयी थी और उसके बाद उसका निरमा के घर जाना आना कम होता चला गया था।
    लगभग दो हफ्ते से ज्यादा बीत गये थे इसिलिए निरमा उसे बुलाने चली आयी थी, शाम को राज माता के सामने ही बांसुरी को अगले दिन का न्योता देकर लौट गयी थी, खाने का नही दोनो सखियों को जी भर के बातें करने का समय चुराना था लोगों से।
    अगले दिन समय की पाबंद बांसुरी कुछ देर से ही निरमा के घर पहुंच पायी थी…
   प्रेम सुबह ही नाश्ते के बाद निकल गया था , अम्मा से बांसुरी की पसंद की चीज़ें बनवा कर उसने उन्हें भी छुट्टी दे दी थी…
   बांसुरी आयी तो दोनो सखियाँ नीचे ही निरमा के नये कमरे में बैठ गईं__

  ” तो आज कल यहाँ डेरा डाल रखा है तूने।”

  ” हाँ, जबसे डॉक्टर ने चलने फिरने की मनाही की है ये मुझे पलंग से उतरने ही नही देते ! सब कुछ देख ना नीचे ही ला रख छोड़ा है कि किसी काम के लिये मुझे ऊपर ना जाना पड़े, ऊपर मन्दिर में रखे लड्डू गोपाल को रोज़ स्नान ध्यान करवाती थी, उनके लिये मैने शिकायत की तो मेरे लड्डू गोपाल को भी नीचे ले आये , और तुझे एक बात बताऊँ हँस हँस के पागल हो जायेगी।”

” हाँ बता ना!”

  ” तुझे तो पता है मैं कान्हा जी को नहला कर भोग लगा कर ही खाती हूँ तो मुझे परेशानी ना हो ये सोच कर ये आजकल क्या करते हैं पता है?”

” क्या?”

  ” मेरे नहा के निकलते में एक छोटी ग्लास में गर्म पानी, एक में दूध एक में फल और मिठाई मेरे आते तक सजा कर चले जाते हैं, जिससे मुझे ज्यादा उठना बैठना ना करना पड़े, मैने पहले दिन देखा तो इनसे पूछा कि ग्लास मे गरम पानी क्यों तो भोली सी शक्ल बना कर कहने लगे, ठंड बहुत है ना तो जब हम गर्म पानी से नहा रहे तो कान्हा जी को भी तो गर्म पानी से ही नहलाना पड़ेगा ना?  सच कहुँ तो मैंने तो ऐसे कभी सोचा ही नही था, मैं कान्हा जी की सेवा बिल्कुल ऐसे करती थी जैसे वो मेरे ही बालक हों उन्हें खिलाए बिना खाना नही, सोने से पहले भी उन्हें रेशमी पलने में झुलाना इतने सब के बाद भी ये गर्म पानी वाला लॉजिक कभी दिमाग में ही नही आया, और तुझे पता है प्रताप हमेशा मेरी इस आदत पर मेरा खूब मज़ाक उड़ाया करता था।”

  आज बहुत दिनों बाद निरमा की ज़बान पर प्रताप का नाम आया था और जाने अनजाने ही वो खुद प्रेम को प्रताप से ऊपर का स्थान दे बैठी थी….
   ऐसे प्रताप का नाम लेते ही वो अनमनी सी हो गयी__

” चल चाय बना लाती हूँ तेरे लिये, तुझसे तेरे महल की फाईव स्टार चाय पी नही जाती ना।”

  दोनो सहेलियाँ साथ ही रसोई में खड़ी बातें करती चाय भी बनाती जा रहीं थीं__

  ” क्या हुआ बांसुरी? तू कुछ परेशान लग रही? राजा साहेब से कुछ फसाद तो नही हुआ?”

” नही नही! उनसे कोई फसाद नही हुआ , आज कल बातें ही कम हो पातीं है फसाद का समय कैसे मिले? मैं भी समझतीं हूँ वो अकेले मेरे ही तो नही हैं ना, उन पर इस पूरी रियासत का हक है आखिर कैसे बांधे रखूं। शादी से पहले ही उन्होंने ये सारी बातें स्पष्ट कर दीं थीं, सब अच्छा चल रहा है निरमा लेकिन आज कल जाने क्यों सारा वक्त सर भारी भारी सा लगता है, कुछ करने का जी नही करता, सारा सारा दिन सुस्ती सी पसरी रहती है मुझमें।”

  ” हम्म रानी बन गयी है अब तो,  आलसी होती जा रही और क्या?”

” यही मुझे भी लगा था इसिलिए पांच बजे से उठ कर जॉगिन्ग करने चली जातीं हूँ, वापस आ कर आधा घन्टा पॉवर योगा भी करती हूँ ….


“अरे रे इतनी मेहनत ना कर , ये भी तो हो सकता है कि कुछ गुड न्यूज़ हो तेरी!”

  ” ना ! गुड न्यूज़ होगी और मुझे ही पता नही चलेगा? मैं तो खुद अपने खाली पन से बोर हो गईं हूँ, मैं खुद बेबी चाहतीं हूँ लेकिन ऐसा कुछ नही है।”

  ” तो चल एक बार डॉक्टर को दिखा ले, मैं अगले हफ्ते रूटीन चेक’प के लिये जाऊंगी तब मेरे साथ चलना ।”

  ” तेरे साथ जाने के लिये भी तो पर्मिशन लेनी ही पड़ेगी ना? मैं असल में इनसे कुछ कहना नही चाहती, आजकल वैसे भी बड़े परेशान रहतें हैं उस पर मैं भी अपना रोना लेकर बैठ जाऊं कि मुझे तबीयत सही नही लग रही अच्छा नही लगता ना!”

  ” कोई नही, किसी बहाने से निकल चलना!”

  ” ठीक है, कोशिश करूंगी।”

  दोनो सखियाँ बातों में लगी रहीं, खा पीकर दोपहर बांसुरी वापस चली आयी…..
   अपने कमरे में पहुंचते ही उसे उसकी पलंग पर रखी एक किताब दिखी।
    किताब देखते ही उसके चेहरे पर चमक आ गयी, बहुत समय से इसे पढ़ना चाहती ही थी, उसने बिना देर किये कपड़े बदले और किताब लिये अपनी बालकनी में जा बैठी।
     किताब में डूबी बांसुरी इस बात से बेखबर थी कि उसे किताब पहुंचाने वाला दूर बैठा उसके चेहरे पर के बदलते रंगों के साथ खुद भी उन्हीं एहसासों में डूब उतरा रहा था।

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      राजा कमरे में पहुंचा तब तक बांसुरी किसी किताब को पकड़े पकड़े सो चुकी थी, ऐसे तो वो रोज़ उसका रास्ता देखती जागती रहती थी, पर आज सुबह और दिनों से कहीं जल्दी जाग गयी थी, फिर दोपहर भी निरमा के घर से आने के बाद उसने आराम नही किया था इसी से थकान के कारण शायद उसकी आँख लग गयी थी।
      आंखों पर किताब उल्टी रखी थी, किताब का कवर पेज नज़र आ रहा था, किताब थी डायना गैंबलडन की “आउटलैंडर”।
राजा ने किताब देखी और उसे बंद कर एक ओर रख दिया, साईड टेबल पर बांसुरी का मोबाइल पड़ा था जिसकी स्क्रीन अब भी ऑन थी, शायद पढ़ते पढ़ते वो अपना मोबाइल भी साथ ही देख रही थी, उसने मुस्कुरा कर मोबाइल बंद करने के लिये उठाया तो उसकी नज़र स्क्रीन पर मुस्कुराती बांसुरी की तस्वीर पर चली गयी।
   वो खुद उस तस्वीर को देख मुस्कुराने लगा__

” तो हमारी हुकुम हमसे ज्यादा खुद से प्यार करती हैं, तभी तो हमें देखने की जगह खुद की तस्वीर देख रही हैं।” बांसुरी के बगल में लेटे हुए राजा उसकी तस्वीरे स्क्रोल करता चला गया, किसी तस्वीर में अपना आधा घूंघट सरका कर मुस्कुराती बांसुरी तो किसी में चाय के कप के धुयें के पीछे छिप सी जाती बांसुरी।
     बांसुरी के चेहरे के हर उस एंगल को जिस से वो सबसे ज्यादा मोहक लग सकती थी उतारने वाले ने उतार लिया था…..
…..पर इतनी सारी तस्वीरें ले कौन रहा था।

  ये सारी तस्वीरें गैलरी में थी, उसका मतलब या तो बांसुरी ने मेनका से कह कर खिंचवाई थी या किसी ने अपने फ़ोन से खींच कर उसे भेजी थी।
   पर बिना कुछ जाने वो कैसे बांसुरी के फ़ोन से छेड़खानी कर सकता था, अभी सोच ही रहा था कि कसमसाती हुई वो उसकी बाहों में चली आयी……

  ” आ गये राजा साहेब?”

  ” जी हुकुम आ गया, पर आप तो लगता है नाराज़ हैं , इतनी जल्दी सो गईं, मैं तो आज किसी और ही तैय्यारी से आया था।”

  बांसुरी ने अलसाई सी आंखें खोल उसे एक नज़र देखा और उठ बैठी, वो सामने रखे टेबल से उसका दूध का ग्लास उठा लायी__

  ” और आपका ग्लास ?”

  ” मैं नही पिउन्गी राजा साहेब, मुझे जाने क्यों दूध पसंद नही आ रहा।”

  ” ऐसे कैसे? गायें भैंसे सब यूं ही थोड़े ना पाल रखी हैं।”

  ” अच्छा जी! तो ये सब मेरे लिये पाल रखी हैं आपने।”

” दूध बहुत ज़रूरी है हुकुम! आप तो खाने लायक चीज़ें खातीं भी नही, सिर्फ अपने घास फून्स में उलझी  रहती हैं, चलो फटाफट उठाओ ग्लास और पी जाओ।”

  बिल्कुल बिना मन के बांसुरी ने दूध पिया और वापस राजा के पास चली आयी__

  ” बांसुरी! आज रतन और पिंकी का रिजल्ट आ गया।”

  ” क्या हुआ?” चौंक कर बांसुरी उठ बैठी

” रतन सेलेक्ट हो गया लेकिन पिंकी चूक गयी।”

  ” ओह्ह! ये तो गलत हो गया, जैसा पिंकी का स्वभाव है उसके लिये किसी चीज़ में चूक जाना या हार जाना बहुत बड़ी ठेस है।”

  ” हम्म, वही सोच रहा हूँ कल किसी काम के बहाने से निकल जाता हूँ, उससे एक बार मिल कर समझा बुझा कर लौटूँगा । ठीक है ना?”

  हाँ में सर हिला कर बांसुरी वापस राजा के कंधे पर सर रखे लेट गयी__

  ” तुम चलोगी साथ में?”

  ” साथ ले चलोगे तो क्यों नही चलूंगी लेकिन यहाँ से काम का बहाना कर के निकलना है ना तो फिर मुझे कैसे साथ ले चलोगे।”

  ” हम्म! मैं कल रात ही वापस आने की कोशिश करूंगा।”

  ” ऐसे हड़बड़ाने की कोई ज़रूरत नही, दो दिन अपनी बहन के पास रुक जाओगे तो यहाँ कोई अनर्थ ना हो जायेगा।
  तफसील से उसके साथ समय बिता कर आना।”

राजा आश्चर्य से बांसुरी को देखता सोच में पड़ गया, हर वक्त उसके आगे पीछे घूमने वाली लड़की जो चाहती थी कि वो हर वक्त उसकी नजरों के सामने रहे, जिसे महल में अकेले रहने से घबराहट होती थी कैसे उसे इतने आराम से पिंकी के पास भेजने को तैय्यार थी, और खुद अकेले यहाँ रुकने को भी।

   ” तुम चाहो तो मायके चली जाओ?”

  ” बेमौके, बिना बुलाये क्यों मायके चली जाऊं?”

  बांसुरी की बात सुन राजा वापस छत की ओर देखने लगा।
  

    विराज ने जो बीज डाला था उसे खाद मिट्टी पानी मिलने की शुरुवात हो चुकी थी।

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     बांसुरी की तबीयत जैसी भी रहे लेकिन शादी के बाद जब से वो महल में थी, नियम से सुबह की पूजा आरती के समय पर मन्दिर जाती ही थी, मन्दिर से आरती होते ही दादी साहेब के कमरे में उन्हें धोक देकर  फिर वो वापस चली आती थी…..
   उसे रोज़ सुबह कुछ देर दादी साहेब के साथ बिताना अच्छा लगता था शायद दादी की बातें उसे अपनी ताई सी लगा करती थीं।
  रोज़ की तरह बांसुरी नहा धोकर तैय्यार हुई आरती के लिये निकलने को ही थी कि राजा ने टोक दिया__

” आओ बांसुरी! साथ ही चाय पी लेते हैं।”

  बांसुरी उसे घूरती खड़ी रह गयी….

“अब जब मैं पूजा पाठ के किये तैय्यार खड़ी हूँ तब आपको चाय सूझ रही, मैं बना कर चली जाती हूँ … तुम्हारे पीते तक में वापस आ जाऊंगी, फिर दुसरी साथ में पी लेंगें”

” जाना ज़रूरी है क्या?”

  ” आप ही के महल के नियम है राजा साहेब, कैसे ना मानूं, कहो तो!”

  ” अरे एक आध दिन से क्या हो जायेगा?”

  ” जब राजा खुद कहे एक आध दिन नियम तोड़ने से क्या हो जायेगा इसका मतलब समझ जाओ क्या भविष्य है राजा और रियासत का?”

  हँसती खिल्खिलाती बांसुरी राजा को चाय थमा कर बाहर निकल गयी, बाहर मेनका उसका रास्ता ही देख रही थी।

       चाय लिये राजा अपनी बालकनी में चला आया, सामने ही बगीचा और मन्दिर नज़र आ रहा था, पण्डित जी पूजा पाठ की तैय्यारी कर रहे थे….
… रूपा भाभी जया भाभी के साथ साथ महल की बाकी औरतें भी वहाँ जमा थी, तभी तेज़ कदमों से चलती बांसुरी भी पहुंच गयी……
   पीली सुनहरी पोशाक में कितनी प्यारी लग रही थी, कितनी आसानी से और कितनी जल्दी उसकी प्यारी सी पंडिताईंन ने उसके राजपुताने को स्वीकार कर लिया था जैसे बनी ही इसी लिये हो….
   अब तो उसे उसी के महल के नियम बताने लगी थी।

मुस्कुरा कर अपनी चाय पीता वो उसे ही देख रहा था कि उसका ध्यान बांसुरी के पास खड़े विराट पर चला गया…..
   ये कब से सुबह की आरती में आने लगा? क्या पहले भी आया करता था? हाँ आया ही करता रहा होगा, विराट वैसे भी शांति प्रिय पूजा पाठ वाला लड़का ही तो था।
   विराज और विराट में से हमेशा ही उसका लगाव विराट की ओर ही अधिक था, वो हमेशा ही अपने कम बोलने की आदत और किसी से ना उलझने की आदत के कारण विराज से हार जाया करता था।
   राजा को वो बचपन का समय याद कर हंसी आने लगी ….सगे भाई होने पर भी दोनो सदा आपस में उलझे रहते थे और युवराज भैय्या ही दोनो का निपटारा किया करते थे…..

    विराट का हमेशा पढ़ाई में डूबे रहना और उसका शांत स्वभाव ही था जिसके कारण युवराज भैय्या के साथ साथ बाकी सारे लड़के भी उसे पण्डित बोल कर चिढ़ाया करते थे।
      पंडित बुलाया करते थे ये बात ध्यान में आते ही जाने क्यों राजा का मन कसैला सा हो गया, वो अपनी चाय वहीं छोड़ भीतर चला गया, लेकिन फिर जाने क्या सोच कर वापस आया वहीं बैठ कर आरती होते देखता रहा।

  आरती होने के बाद एक एक कर सब मन्दिर में प्रणाम कर पंडित जी से प्रसाद ले निकलने लगे, बांसुरी ने भी प्रणाम किया और दादी साहेब के कमरे की ओर मुड़ चली, मेनका को उसने किसी काम से वापस भेज दिया,वो कुछ कदम आगे बढ़ी ही थी कि विराट भी कुछ भागता सा उसके पीछे कदम बढ़ाता चला गया….
    दोनो साथ साथ बातें करते दादी साहेब के कमरे की ओर बढ़ चले…..

क्रमश:

aparna…..





  
    
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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