जीवनसाथी-60

जीवन साथी –60


      
   जहां हद से ज्यादा प्यार होता है वहाँ हर बात बेहद होने लगती है।
   प्यार करने वाले अक्सर ये सोच बैठते हैं कि उनके इशारे भी समझ लिये जायेंगे और यहीं से शुरु होता है नाउम्मीदी और बेकसी का सिलसिला।
  सामने वाला समझ जाये तो खैर और ना समझे तो जन्म जन्म का बैर!!!

     राजा समझदार था, मुह्ब्बती था, जज़्बाती था पर मर्द था……
   आज तक अपने अलावा अपनी बीवी को किसी और के साथ हँसते देख संसार का कौन आदमी होगा जो बर्दाश्त कर पाया हो?
    था तो राजा भी हाड़ मांस का ही पुतला, उस पर कार्य की अधिकता ने उसे अपने ज़रूरी कार्यों से इतर कुछ भी सोचने का अवकाश देना ही बंद कर दिया था।
    जिस ढंग से विराज को किनारे कर उसे गद्दी पर बैठाया गया था, घर में ही विरोधी पैदा हो गये थे, उस पर सरकार और रियासत के बीच मानो आग लगी थी और इस सारी आग में अकेला झुलस रहा था राजा , राजा अजातशत्रु सिंह!!
     उसकी पीड़ा से बेखबर हो बांसुरी ऐसा तो ना था लेकिन सारी बातें भी उसे मालूम ना थी…..
    कभी कभी समय ऐसी चालें चल जाता है कि इन्सान हाथ पैर होते हुए भी निरुपाय सा बैठा रह जाता है, बाद में रह जाता है एक काश!!!
  
   काश उसने मुझे समझ लिया होता? काश उसने अपने मन की बात कह दी होती? काश!!
  
खैर, परिस्थितियों के आगे इन्सान पर्वश हो ही जाता है…..

     दादी साहेब के कमरे से बांसुरी वापस आयी तब तक राजा तैय्यार होकर निकल चुका था।
  उसके लिये कोई पर्ची या कोई सन्देश नही छोड़ा था जिससे वो जान सके कि वो अचानक चला कहाँ गया?
बांसुरी ने तुरंत उसे फ़ोन लगा लिया__

  ” कहाँ निकल गये राजा साहेब?”

  ” कल बताया तो था, तुमने सुना नही क्या?”

” क्या बताया था?”

  ” अरे बताया नही था, कि पिंकी का चयन नही हो पाया है, उससे मिलने जाऊंगा।”

  ” अच्छा हाँ! तो निकल भी गये?”

  ” हाँ और क्या? फ्लाइट मेरे लिये रुकेगी थोड़े ही ?

  ” मुझसे मिल कर जाना था ना! , दो घड़ी ही रुक जाते, मैं आ तो गयी थी।”

” मुझे क्या मालूम था कि तुम्हें कितना वक्त लगेगा?”

  ” कब तक लौटोगे?”

  ” अभी कुछ कह नही सकता, हो सकता है दो दिन लगें, हो सकता है दो हफ्ते लग जायें।”

” हम्म ठीक है, कोशिश करना जल्दी आने की….”

  “तुम भी अपना ख्याल रखना बांसुरी, मैं नही हूँ वहाँ तुम्हारे पास! तुम्हारे प्रेम भैय्या भी यहाँ मेरे साथ आ गये हैं….”

    बांसुरी ने मुस्कुरा कर फ़ोन रख दिया ..
नाश्ते पर पहुंचने का समय हो गया था, बांसुरी तैय्यार होकर बाहर निकल गयी।


   राजा राजकुमार से राजा बन चुका था लेकिन खाने की मेज़ पर आज भी उसके पिता के आने पर ही सबके उनके सम्मान में खड़े होने की रीत अब भी चल रही थी, उसने हाथ जोड़ बडी विनम्रता से खाने की मेज़ पर की प्रधान कुर्सी को आज भी अपने पिता के लिये ही रहने दिया था और वो अब भी दादी सा के पास वाली अपनी कुर्सी पर ही बैठा करता था।
    राज माता के साथ महाराज के आते ही सभी अपनी जगह खड़े होकर उन्हें सम्मान देने के बाद उनके बैठते ही बैठ गये।
    महाराज की खुद तबीयत नासाज़ थी इसी से दो चार उल्टे सीधे कौर डाल कर वो निकल गये लेकिन राज माता बैठी रहीं, आज महल के पुराने डॉक्टर साहब का महल में आगमन था, हर छै महीने में एक बार डॉक्टर साहब आकर सभी महल वासीयों का रूटीन चेक’प कर जाया करते थे…. आज भी उनके आने का समय दस बजे का निर्धारित हुआ था इसी बारे में राजमाता ने सबको जानकारी दे दी थी__

” बांसुरी आप भी एक बार डॉक्टर साहब से मिल ही लीजियेगा, आप भी कुछ दिनों से तबीयत सही ना होने की शिकायत कर रहीं हैं ना?”

  रूपा भाभी की बात पर राज माता ने बांसुरी की ओर देखा__

  ” कुछ तकलीफ है क्या आपको रानी अपूर्वा?”

  ” नही माँ साहेब हुकुम, ऐसा तो कुछ खास नही ….

  ” कोई बात नही , आपकी छोटी सी तकलीफ भी कुमार के लिये बड़ी तकलीफ साबित हो सकती है, रूटीन चेक’प तो सभी का होगा ही ,आप डॉक्टर साहब से भले से तसल्ली कर लीजियेगा, वैसे कुछ कमज़ोर तो लग रहीं हैं।”

  हाँ मे सर हिला कर वो नीचे सर किये बैठी खाती रही….

डॉक्टर के आने पर पारी पारी से सब अपनी जांच करवाते रहे, बांसुरी को भी डॉक्टर ने सिर्फ बीपी ज़रा लो है कह कर कुछ मल्टीविटामिन्स और कल्शियम सप्लीमेंट लिखे और ज्यादा कोई घबराने वाली बात नही है कह दिया……
   उसकी जो समस्या थी वो इतने लोगों की भीड़ में खास कर माँ साहेब के सामने ना कह पायी और ना कुछ बता पायी।
  दी गयी दवाओं को साथ लिये वो कमरे में चली आयी…..
   कमरे में उसके आने पर उसे ऐसे लगा जैसे कमरे में दरवाज़े के पीछे अन्दर कोई छिपा है, जैसे ही उसने दरवाज़े के पीछे झाँका विराट उसे ज़ोर से डरा कर मुस्कुराता हुआ बाहर चला आया…..

” डर तो नही गईं आप?”

  ” हाँ एक पल को डर तो गयी थी, जाने क्यों मुझे लगा राजा साहेब वापस आ गये मुझे सरप्राइज़ करने।”

  विराट ने मुस्कुरा कर हाथ मे थाम रखी किताब बांसुरी के हाथों पर रख दी, किताब देखते ही बांसुरी की आंखें खुशी से चौड़ी हो गईं__

  ” ओथेलो!!! कब से सोच रही थी, पर पढ ही नही पा रही थी….थैंक यू सो मच! आप एक एक कर सारी मेरी पसंद की किताबें मुझे लाते जा रहें हैं।”

  ” इसमें धन्यवाद वाली क्या बात है? पहली बार तो महल में कोई हमें हमारे जैसी पसंद वाला मिला है। आपको पता है, किसी किताब को पढ़ने में जितना रस मिलता है ना उतना ही रस उस किताब के बारे में बात करने पर भी मिलता है।
  हमारे पूरे परिवार में हमारे अलावा साहित्य का और कोई रसिक नही है, क्या करें?”

  ” बात तो आप सच कह रहे हैं। कॉलेज के बाद से ही पढ़ना बिल्कुल छूट गया, नौकरी में समय ही नही मिलता था, लेकिन अब अच्छा है, समय ही समय है मेरे पास और आपके पास हैं ढ़ेर सारी किताबें….

” हमारे पास और भी कुछ है आपके लिये।”

  ” क्या ?”

  विराट ने अपना मोबाइल खोला और स्क्रीन बांसुरी के सामने रख दी……

  “ये तस्वीरें …ये तो मेरी हैं, आपने कब ली? और ये तस्वीरे तो…क्या आप ही मुझे भेज रहे थे।”

  ” जी , माफी चाहता हूँ आपसे बिना पुछे खींच ली थी…..असल में मुझे फोटोग्राफी का भी बहुत शौक है , पिछली दफ़ा जब आप आयीं थीं उस वक्त एक सुबह मैं बगीचे के तालाब की तस्वीरें लेने लेने की तैय्यारी किये बैठा था , वहाँ कमल की तस्वीर लेते हुए आप सामने आ गयी, और जब मॉडल खुद कैमेरा के आगे आ जाये तो कैमेरा का क्या कसूर?”

  ” पर आप थे कहाँ? मुझे तो वहाँ नही नज़र आये आप?”

  ” मेरा कैमेरा प्रोफेशनल है  सा…मेरी बाल्कनी से ही ज़ूम कर लिया था। उसके बाद तो आपके विवाह पर भी आपकी और भाई सा की कई तस्वीरें ली हैं मैने उसके बाद भी आपकी तस्वीरें, जो आपको भेजा भी है।”

  ” लेकिन आपने कभी ये बताया क्यों नही कि ये आपका नम्बर है? मैं तो अब तक सोचा करती थी कि मेरी इतनी सारी तस्वीरें हमारे साहेब ही ले रहें हैं और हमें भेज रहें हैं।”

  बांसुरी की बात सुनते ही विराट का चेहरा गुलाबी हो गया लेकिन उसने अपने भाव बांसुरी के सामने आने नही दिये…..
   दोनो अभी बातों में उलझे थे कि राजा का फ़ोन आ गया__

  ” पहुंच गये?”

  ” हाँ पहुंच गया! बस अभी पिंकी के घर के रास्ते पर हूँ ।
     बांसुरी!!!”

  ” हाँ बोलो?”

  ” नाश्ता किया तुमने! ”

” इतनी चिंता क्यों करतें हैं आप हुकुम? मैं अपने ही ससुराल में हूँ, अपने ही घर पर हूँ ना, फिर? “

  ” सही कह रही हो! मैं ही कुछ ज्यादा सोच लेता हूँ। क्या कर रही थी अभी? मुझे याद कर रही थी ना?”

  ” जी नही ! अभी तो विराट सा कमरे में आयें हुएं हैं, बहुत समय से एक किताब पढ़नी थी, वही लेकर आयें हैं…”

  ” ओह्ह अच्छा ! विराट वहीं है? चलो फिर मैं अभी रखता हूँ!”

    विराट के सामने कहीं राजा से बात करते हुए पिंकी का नाम ना निकल जाये ऐसा सोच कर बांसुरी भी फ़ोन जल्दी ही रखना चाह रही थी, उसने राजा के कहते ही फ़ोन रख दिया, और राजा एक बार फिर अनमना सा हो उठा।

**********


   अदिती की माँ की तबीयत सुधरने लगी थी, लेकिन अब भी कुछ कमज़ोरी बाकी ही थी….
   भास्कर ने अपने घर वालों को वहीं बुला लिया था, सबका मिलना होने के बाद विवाह की एक तिथी तय करने की सब सोच रहे थे लेकिन अदिती की माँ की ज़िद थी कि जितनी जल्दी हो सके विवाह निबटा दिया जाना चाहिये।
    वो तो पण्डित बुला कर मुहूर्त दिखवाने तक भी रुकने को तैय्यार ना थी, भास्कर अदिती की छुट्टियाँ भी समाप्त होने को थीं इसीसे सबसे निकटतम मुहूर्त में ही मन्दिर में दोनो परिवारों और कुछ आत्मीय स्वजनों की उपास्थिती में दोनो का विवाह संपन्न हो गया……
   
  कहतें हैं ना बुरे वक्त में भी ईश्वर पर भरोसा ना छोड़ें क्योंकि उनके ऐसा करने के पीछे भी कोई ना कोई कारण ज़रूर होता है….हर बुरा वक्त भी जाने अनजाने कुछ अच्छा देकर ही जाता है।
  अदिती की माँ की बिगड़ी तबीयत ने जहां अदिती और भास्कर के मन में एक दूसरे के लिये प्यार और एक दूजे की ज़रूरत महसूस करवा दी वहीं अदिती के पिता को भी जीवन की सांझ में अपने जीवनसाथी के साथ की महत्ता बता दी….

    शादी निपटते ही भास्कर अदिती को साथ लिये अपने घर वालों के साथ अपने घर निकल गया, बची हुई छुट्टियाँ दोनों ही कुछ समय परिवार के साथ बिताना चाहते थे।

    कुछ रिश्ते ज़रा खट्टे मीठे से होतें हैं जैसा कि अदिती और भास्कर का रिश्ता।
  भास्कर नेकदील था, दिमागदार था लेकिन ज़रा हिसाबी था, वहीं अदिती सुंदर थी शिक्षित थी लेकिन जैसे को तैसा थी….. बुरा दोनो में से कोई ना था, दोनो ही एक दूजे के लिये बने थे।

   भास्कर की सारी अच्छी आदतों पर भारी थी उसकी सिगरेट की लत, जो अदिती का दिल दुखा जाती थी__

  ” ये कुछ ज्यादा नही हो जाता भास्कर! माना की कोई बुरी आदत है तो उसे कम तो किया जा सकता है ना?”


” बेबी मैंने कभी तुम्हारे पीने की आदत पे कुछ कहा क्या?”।।

” ओह्ह मिस्टर ! मैं कोई बेवड़ी टाईप्स नही हूँ, सिर्फ पार्टीज़ में लेती हूँ ओके वो भी लिमिट में, ऐंड वन मोर थिंग ड्रिंक्स आपकी हेल्थ के साथ इशू क्रियेट नही करती जबकि सिगरेट लंग्स को फूँक जाती हैं।”

” लेकिन बेबी जितनी महँगी पीती हो ना वो मेरी जेब जला जाती है।”

” अच्छा तो अब जेब जलना और लंग्स का जलना एक ही हो गया तुम्हारे लिये।”

” अरे यार ! समझ गया बाबा , कर दूंगा कम, अब जाओ यार , और दिमाग मत खराब करो।”

  ” कहाँ जाऊँ? तुम्हारे ही घर पे हूँ, यहाँ तो मेरी कोई फ्रेंड भी नही, बता दो कि आखिर जाऊँ कहाँ?”

  ” भाड़ में जाओ! ” कभी कभी बात इतनी कड़वी होती नही जितनी वाद विवाद से बढ़ जाती है, ऐसा ही कुछ इन दोनो के साथ हुआ…..
   प्यार मुहब्बत से शुरु हुई टोकाटाकी विवाद पर जा कर थमी, आंखों में अपमान के आंसू लिये अदिती अपने कमरे में चली गयी, अपने अपमान से अधिक अभी भी उसके दिमाग में भास्कर की आदत को सुधारने का तरीका चक्कर काट रहा था।

  भास्कर भी ज़रा गर्म मिज़ाज़ था, पर उसका गुस्सा जितना तेज़ उबाल मारता था वैसी ही तेज़ी से बैठ भी जाता था….कुछ देर में ही अदरक वाली अदिती की स्पेशल चाय की तालाब लगी और अदिती याद आ गयी, अपनी आवाज़ में जितना शहद घोल सकता था घोल कर उसने आवाज़ लगायी__

  ” अदितीsssss डार्लिंग कहाँ हो? ज़रा एक कप चाय मिलेगी?”

  अदिती ने वहीं कमरे से लेटे लेटे जवाब दिया__

” भाड़ में हूँ, तुम्हीं ने भेज था ना!वापसी में समय लगेगा, खुद चाय बना लो।”

  भास्कर के पेट में हँस हँस के बल पड़ गये, वो अपने साथ साथ अदिती और अपने माता पिता के लिये भी चाय बना लाया…..

” इसे कहतें हैं जैसे को तैसा ! हमारे समय में तो हमें पति को परमेश्वर मान कर पूजना ही सिखाया गया था, पति चाहे जो मनमर्ज़ी बोल जाये ,कर जाये पर मजाल जो हमने चूं भी की। पर ये आजकल की लड़कियाँ अगर घर सम्भालना जानती हैं तो आड़े टेढ़े पति को सीधा करना भी जानती हैं।”
  माँ की बात पर हँसते हुए अदिती और अपनी चाय लिये भास्कर कमरे में चला गया।
  
   ” जा रहा हूँ मैडम को वापस ले आऊँ, मैने ही भेज था ना, अब मेरे जाये बिना ज़िद्दी आयेगी थोड़े ही।”


*******

विराट के जाते ही बांसुरी ने कमरा बंद किया और पढ़ने ही जा रही थी कि मेनका चली आयी__

” हुकुम! आपसे मिलने आपकी सहेली निरमा दीदी आयी हैं, दीवानखाने में बैठीं हैं।”

  ” तो उसे यहीं क्यों ना ले आयी?”

” वहाँ माँ साहेब ने उन्हें अपने साथ बैठा लिया।”

” अच्छा चलो मैं आती हूँ।”

  बांसुरी दीवानखाने में पहुंची तब तक निरमा के सामने माँ साहेब ने तरह तरह के व्यंजन परोसवा दिये थे….उसका कौन सा महीना चल रहा है, उसका स्वास्थ्य कैसा है ? से लेकर जच्चा बच्चा वाले सारे सवाल उससे पूछ लिये, निरमा कुछ लजा के तो कुछ शरमा के सारे जवाब देती बैठी रही….

  बांसुरी के आते ही मेनका वहाँ से चाय लेने चली गयी।
   निरमा जो कहने आयी थी उसे माँ साहेब के सामने कहना मुश्किल था फिर भी उसने हिम्मत कर के अपनी बात माँ साहेब के सामने रख ही दी__

” रानी माँ अगर आप आज्ञा दे तो आज मैं बांसुरी को अपने साथ लेकर जा सकतीं हूँ क्या? असल में आज ही मेरा डॉक्टर से मिलने का समय तय था, अब ये तो काम से कहीं बाहर चले गये हैं हुकुम के साथ, और अगर आज मैं नही गयी तो फिर ये पूरा महीना मुश्किल हो जायेगी।
   पहले मैने सोचा था कि अकेले ही चली जाऊं लेकिन दूर बहुत है ना इसी से…

निरमा की बात पर रानी माँ से एकाएक कुछ कहते ही ना बना और आखिर उन्होंने बांसुरी को जाने की अनुमति दे ही दी।

  महल के ही ड्राईवर के साथ ही दोनो सखियाँ निकल गईं…..बांसुरी की समझ के परे था कि अचानक निरमा उसे अपने साथ क्यों लेकर जा रही, जबकि चार दिन पहले ही वो और निरमा शहर के अस्पताल गये  थे।

    अस्पताल में अन्दर जाते ही निरमा शुरु हो गयी__

” उस दिन जब तू मेरे साथ आयी थी और डॉक्टर ने तेरे कुछ टेस्ट करवाये थे ना, उनकी रिपोर्ट आ गयी है, इसी कारण डॉक्टर तुझसे मिलना चाहती थी, और इस वक्त तुझे वहाँ से निकालने का यही उपाय सूझा।”

   अपनी तबीयत से परेशान बांसुरी चार पांच दिन पहले ही निरमा के साथ अस्पताल आकर डॉक्टर को दिखा चुकी थी, उसी समय उसकी समस्या सुन डॉक्टर ने उसे कुछ जांचें करवाने को कह वापस भेज दिया था, आज रिपोर्ट आने पर उसने बांसुरी को बुलवा भेजा था__

   डॉक्टर के केबिन के बाहर इन्तजार करती दोनो सखियाँ परेशान थी कि आखिर क्या बात है कि उनका नम्बर आ गया__

बांसुरी की रिपोर्ट्स हाथ में पकड़ी बैठी डॉक्टर ने उसे सामने बैठाया और सवाल जवाब शुरु कर दिया__

  ” बांसुरी जी कब से आप यह दवाएं ले रहीं हैं?”

  ” जी मैं कोई  दवा नही ले रहीं हूँ ।”

  डॉक्टर वापस उसकी रिपोर्ट देखने के बाद उसे देखने लगी__

  ” देखिए आपने जो लक्षण अपने बताये थे उसके आधार पर ही मैंने आपकी कुछ जांचे करवाई थी, उसी आधार पर आपसे कह रहीं हूँ, आप जिन गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल कर रहीं हैं उनकी हाई ड़ोज ही आपकी तबीयत के बिगड़ने का कारण है।”

  बांसुरी आश्चर्य से कभी डॉक्टर तो कभी निरमा को देखने लगी__

  ” लेकिन डॉक्टर साहब मैं तो वाकई कोई दवा नही खा रही, और मैं पिल्स क्यों लूंगी मुझे तो बेबी चाहिये?”

  डॉक्टर ने उसकी रिपोर्ट आगे बढ़ कर उसके हाथ में रख दी__

  ” आपके ब्लड में ये ट्रेसेस मिलें हैं , और आपको ये भी बता दूं कि सामान्य गर्भनिरोधक की लगभग दो गुनी मात्रा आप ले रहीं हैं।
   रोज़ ली जाने वाली एक सामान्य मात्रा में होर्मोंस का जो ड़ोज होता है, उससे शरीर में इतने बदलाव नही आते लेकिन आप दोगुनी मात्रा में ले रही इसी से आपको इतनी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, एक और बात अगर आप इतनी हाई ड़ोज पिल्स लेती रहीं तो आपके गर्भाशय पर इसका बुरा बहुत बुरा असर पड़ सकता है। अभी आपको ये कुछ दवाएं दे रहीं हूँ लेकिन मेरी माने तो आप तुरंत अपनी दवाएं या जो भी आप ले रहीं हैं उसे बंद कर दीजिये।”

  डॉक्टर से दवाएं ले कर दोनो सहेलियाँ बाहर निकल गईं …..

   दोनो के ही समझ से बाहर था कि क्या किया जाये, क्योंकि सामने से होकर तो बांसुरी कोई दवा नही ले रही थी, अगर उसके खाने में कुछ मिलाया जा रहा था तो वही खाना तो घर भर में सभी खाया करते थे, फिर आखिर ऐसा क्या था जिसमें उसे दवा मिला कर दी जा रही थी……………… दूध!!
  दूध पर जाकर बांसुरी का ध्यान अटक गया, हाँ हो ना हो ये दूध ही सारे फसाद की जड़ है, लेकिन राजा से ऐसे कहने पर वो मानेगा?
  
    नही मानेगा बल्कि और नाराज़ ना हो जाये, क्योंकि उसने पहले ही घर परिवार की शांति के लिये उससे कह रखा है कि वो माँ साहेब या और किसी के खिलाफ ना जाये बल्कि वो जो कहें चुपचाप मान ले।
वो इस बात का पूरा ध्यान भी रख रही लेकिन अगर महल में उसकी तबीयत के साथ ही खिलवाड़ किया जायेगा तो वो कैसे चुप बैठेगी?
    लेकिन राजा से बात करने के लिये उसे पक्का सबूत चाहिये था, और इसके लिये ज़रूरी था कि उसके लिये लाये जाने वाले दूध का परीक्षण करवाकर पता लगाया जाये कि दूध में कुछ मिलाया जा रहा है या नही?
  
      हालांकि ये उसका विचार था, हो सकता है दूध की जगह किसी और में कुछ मिलाया जा रहा हो, पर अब जो भी हो उसे किसी तरीके से दूध की जांच करवानी ही होगी।
    उसने इस बारे में निरमा से सारी बातें कही और दोनो सोच में पड़ गयी ….. सामने अस्पताल की लैब थी , निरमा वहाँ चली गयी, वहाँ सारी बात चीत करने के बाद निरमा वापस लौट आयी, उसके हाथ में एक सोल्युशन था उसने उसे बांसुरी के हाथ में रखा और उसे कैसे प्रयोग में लाना है बता दिया__
    रात में उस सोल्युशन को दूध में मिलाकर रखना था जिससे सुबह तक में दूध खराब ना हो जाये और उसके बाद सुबह वो दूध किसी तरह निरमा इस लड़के को दे देगी, लड़का सैंपल लेने खुद निरमा के घर तक आने वाला था।
   सारी बातें उससे तय कर दोनो सहेलियां वापस निकल गयी।
   उसी रात बांसुरी ने थोड़ा दूध लैब से मिली छोटी बोतल में सोल्युशन के साथ भर दिया, और अगली सुबह निरमा आरती के समय पर जब बांसुरी को मिली तो उसे दे दिया।
   आरती के बाद बिना एक पल की देर किये निरमा अपने घर वापस निकल गयी, उसके गेट पर ही वो अस्पताल वाला लड़का उसका इन्तजार कर रहा था, उसे दूध के नमूने के साथ रुपये पकड़ा कर निरमा ने चलता किया और सबकी नज़र बचा कर भीतर चली गयी।

  *******


  पिंकी की नाराज़गी कह लो या दुख,वो उबर ही नही पा रही थी, उसे सबसे ज्यादा गुस्सा रतन पर ही आ रहा था,और इसी लिये उसका रतन से अबोला चल रहा था….
   रतन पिछली शाम से पिंकी को मना मना कर परेशान हो चुका था ,वो हर वो काम कर रहा था जिससे पिंकी खुश हो जाये लेकिन पिंकी की नाराज़गी बढ़ती ही जा रही थी…..
   कुछ राजकुमारी होने का घमंड  कुछ वैभवशाली इतिहास का गरूर उसने कभी किसी से हारना सीखा ही नही था, अब एकदम से ऐसा होते ही उसकी निराशा स्वाभाविक थी।

   रतन पिंकी के लिये रसोई में कुछ बना रहा था, वो अपने कमरे में खिड़की से बाहर लगे गुलमोहर देखती बैठी थी कि दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।
  पिंकी का वापस उसके दोस्तों को देख दिमाग ना खराब हो जाये सोच कर दौड़ते भागते रतन ने दरवाज़ा खोला तो सामने राजा भैय्या और प्रेम भैय्या खड़े थे।
   उन्हें प्रणाम कर वो एक ओर हो गया, रतन से सारी बातें सुनने के बाद राजा अंदर पिंकी के कमरे में चला गया।
   अपने भाई को देखते ही उसके सीने से लगी वो सिसक उठी….
    जब मन भर रो धो कर उसने फुरसत पा ली तब उसे ध्यान आया कि उसका भाई यहाँ उसके पास पहुंचा कैसे__

  ” आप अपना सब काम धाम छोड़ छाड़ कर यहाँ आ गये हमारे पास!”

  ” तुझसे ज़रूरी और क्या है मेरे लिये छुटकी? अच्छा एक बात बता, इतना दुख किस बात का पाल लिया हमारी राजकुमारी ने?”

  ” वाह जैसे आपको पता ही नही, हमारा चयन कहाँ हुआ भैय्या?”

  ” और रतन सा का?”

  ” हाँ उनका तो हो गया!”

  ” फिर? मेरी लाड़ो रानी तुम दो जने तैय्यारी कर रहे थे उनमें से एक का हो गया मतलब पचास फीसदी सफलता तो मिल ही गयी ना! और तुम अपने पति की सफलता से ज़रा भी खुश नही हो? ये तो कोई बात नही होती प्रिंसेस….एक बात सोचो, अगर इसी का उलट हुआ होता यानी तुम चयनित होती और रतन सा रह जाते तब भी तुम इतना ही रोना धोना करती या खुशी मनाती।
  तुम्हारे दुखी हो जाने से वो भी अपनी खुशियाँ भुलाएँ बैठे हैं, अरे ये तो सोचो की अब वो सिर्फ तुम्हारे पति नही इस देश की सिविल सर्विसेस के भावी अधिकारी भी हैं, और तुम अपने मातम में उन्हें सिरे से भुलाए बैठी हो, जो सरासर गलत है ।
  मुझे मेरी छुटकी से ऐसे स्वार्थी बर्ताव की बिल्कुल उम्मीद ना थी। “
   राजा की बातें एक एक कर पिंकी की समझ में आती गयी और एक बार फिर पश्चाताप के आंसू उसकी आँख में झिलमिलाने लगे।

    पिंकी के सामान्य होते हो पिंकी और रतन को साथ लिये राजा और प्रेम बाहर चले गये…. तरह तरह के उपहारों से उन्हें लाद कर बाहर खा पीकर उन्हे उनके घर पर उतार कर वो दोनो एयरपोर्ट के लिये वापस निकल गये।


  *****

   दो चार दिन बीत चुके थे, राजा और प्रेम वापस आ चुके थे लेकिन लैब से अब तक टेस्ट रिपोर्ट नही आयी थी, हालांकि लैब वाले ने निरमा का नम्बर ले रखा था, पर फिर भी गेट पर हुआ कोई भी खटका निरमा को आशंकित कर जाता था।

   ऐसे ही एक रात खाना पीना निपटने के बाद बगीचे में धीमे कदमों से टहलती निरमा ने देख लिया कि आज भी कोई नही आया है और अब आने की कोई सम्भावना भी नही है तब धीमे से वो भीतर चली आयी।
    उसने प्रेम से भी अभी तक बांसुरी की टेस्ट रिपोर्ट के बारे में कोई बात नही कही थी।
    अम्मा के घर के लिये निकलते ही प्रेम गेट पर ताल लगा आता था, फिर चाहे अम्मा रात के नौ बजे वापस लौटें या आठ ।
    निरमा को अन्दर आते प्रेम ने नही देखा, वो जैसी दिशा में सोफे पर अधलेटा मोबाइल देख रहा था उससे उसकी पीठ ही निरमा की ओर थी।
    वो इंटरनेट पर कोई विडियो देख रहा था जिसमें माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे के अन्दर हिलने डुलने को बाहर कैसे हाथ के स्पर्श से मालूम किया जा सकता है दिखा रहा था।
    प्रेम विडियो में खोया हुआ स्क्रीन पर ही बच्चे को छूने की कोशिश कर रहा था……
    निरमा बहुत देर से सोफे के ठीक पीछे खड़ी उसे ऐसा करते देख रही थी, धीरे से वो चल कर सामने चली आयी, उसे अपने सामने देख वो अचकचा कर बैठ गया, वो भी मुस्कुराती हुई उसके सामने बैठ गयी।
       थोड़ी देर खुद में ध्यान लगाने के बाद निरमा ने आगे बढ़ कर प्रेम का हाथ मांगा और उसकी हथेली को अपने पेट की बायीं ओर रख कर हल्का सा दबाव डाला, दबाव डालते ही अन्दर से बच्चे ने उस दबाव पर प्रतिक्रिया दी और अपने पैर से हल्की सी मार लगायी__

” अरे ये तो मारता भी है?” प्रेम खुशी से उछल पड़ा, हाँ में सर हिलाती निरमा मुस्कुराती बैठी रही, और प्रेम कभी धीरे से दाईं ओर कभी बाईं ओर बच्चे की गति छूकर देखता महसूस करता उसकी  गतिविधियों की आनंद उदधि में डूबता उतराता रहा, एक पिता के चेहरे का उल्लास भावी माँ के चेहरे को खुशी के नये रंगों से सराबोर कर गया।


क्रमशः


  

  aparna…





  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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