जीवनसाथी-61

जीवन साथी — 61

   

     राजा ज़रूर इस बात को महसूस कर रहा था कि वो बांसुरी को पहले की तरह वक्त नही दे पा रहा लेकिन , बांसुरी राजा के प्रेम में मगन थी….
    
      औरतें स्वभाव से ऐसी ही होती हैं शायद, उन्हें पति के साथ साथ पति के घर की ईंटों दीवारों से भी उतना ही मोह हो जाता है, उसकी कमीज़ों किताबों में भी वो अपना प्रेम ढूंढ़ लेती है।
    राजा के कपडों ज़ुराबों को सहेजने में, महल के रीति रिवाज निभाने में दादी साहेब की देखभाल में बांसुरी ऐसे व्यस्त थी जैसे सदियों से ये सारे काम वही करती आयी थी।
   दादी साहेब को सुबह शाम उनकी व्हील चेयर पर बैठा कर उनके बागीचे तालाब सभी घुमाती उनके आज़ादी के पहले की किस्से सुनती बांसुरी अपने इन सारे कर्तव्यों को दिल से निभा रही थी, इसलिये निभा रही थी क्योंकि वो राजा से डूब कर प्यार करती थी, वो प्यार जिसमें इन्सान सिर्फ खुद को खोना जानता है, दूसरे से कोई अपेक्षा उसे फिर नही रह जाती।
  सब सारा कुछ वही करना चाहती थी अपने प्रेमी प्रियतम अपने पति के लिये।
इधर कुछ दिनों से वो दादी साहेब और विराट के साथ मिल कर कुछ अलग ही व्यवस्थाओं में लगी थी।
   होली के पन्द्रह दिन बाद राजा का जन्मदिन था….. राजा बहुत समय से अपनी रियासत में गांव की महिलाओं की प्रसूती के लिये एक छोटी और सर्वसुविधा युक्त पी एच सी ( प्राईमरी हेल्थकेयर सेंटर) खोलना चाह रहा था।
   सरकारी दस्तावेज़ों में तो उसके पिता के समय से जमीन आबंटन किया जा चुका था , ठेकेदार का टेंडर पास हो चुका था लेकिन सरकारी काम अपनी लचर प्रक्रिया से ही चल रहा था, उसी काम को राजा के जन्मदिवस से पहले पूर्ण कराने का जिम्मा बांसुरी ने अपने सर ले रखा था।
  समर से सारी जानकारी लेने के बाद विराट और बांसुरी दो एक बार उस ठेकेदार के चक्कर भी लगा आये थे।
   उन लोगों के बार बार पीछे लगने से काम शुरु हो चुका था, अस्पताल अधिक बड़ा ना होने से काम त्वरित गति से पूरा होने लगा था, लेकिन अस्पताल को सर्व सुविधा युक्त बनाने के लिये समय समय पर सामानों की खरीदारी के लिये बांसुरी को शहर जाना ही पड़ता था, और उस वक्त उसके साथ विराट ही जा पाता था, हालांकि कई बार मेनका साथ होती, लेकिन कई बार नही भी होती।
   पर लगातार पीछे लगने से काम लगभग समाप्ति पर था, पिछली शाम भी बांसुरी और विराट उसी काम के सिलसिले में बाहर गये हुए थे कि शाम में बिना किसी पूर्वसूचना के राजा शाम की चाय के वक्त महल के भीतरी हिस्से में चला आया।
   भीतरी बगीचे में ही अक्सर महल की औरतें साथ साथ चुहल करती बातें करती चाय पिया करती थी, ये परम्परा सालों से चली आ रही थी, वहाँ पुरूषों का आना वैसे वर्जित था, लेकिन रेखा के अलावा सभी राजा से बड़ी थीं इसीसे राजा मुहँ उठाये वहाँ चला आया।
   सब हंसी ठिठोली करती अपनी अपनी ओढनी संभालती चाय पी रहीं थी, पर राजा को बांसुरी कहीं नज़र नही आयी, उसे लगा शायद कमरे में अकेली बैठी ज़रूर कुछ पढ़ रही होगी, वो जाने को था कि रूपा ने उसकी तरफ चाय बढा दी__

  ” चाय तो ले लीजो कुंवर सा!”

  ” भाभी सा कमरे में ही भिजवा दीजिये, उन्हीं के साथ पी लूंगा, आज बड़े दिनों बाद मौका लगा है।”

  ” किसके साथ पी लेंगे। आपकी वो कमरे में हो तब तो पियेंगे ना।”

रूपा की बात राजा को अचानक समझ ना आयी

” मतलब? कहना क्या चाहती हैं? आप थोड़ा खुल कर बताएंगी।”

  ” अरे हम कह रहे कि आपकी रानी सा कहीं बाहर गईं हैं….क्यों आपसे पूछ के नही गईं क्या?”

  राजा ने दिमाग पर ज़ोर देने की कोशिश कि, सुबह बांसुरी कुछ बता तो रही थी, लेकिन किसानों की समस्याओं की फाइल खोले बैठा था, उसने ध्यान से शायद बांसुरी को सुना ही नही था।
  उसे खुद पर ग्लानि सी होने लगी, एक लड़की अपना घर परिवार छोड़ उसके साथ चली आयी और अब वो अपने झंझट झमेलों में उसे ही समय नही दे पा रहा था……

     समय वाकई अपनी चालें खुद चलता है, शादी से पहले वक्त था तो दोनो साथ ना थे, अब साथ हैं तो समय धोखा दिये जा रहा है।
 
   अपने ढ़ेर सारे काम का भी क्या करे वो, हमेशा जिम्मेदारियों से भागने वाला राजकुमार तो नही बना रह सकता ना, एक ना एक दिन तो उसे उसकी पद गरिमा निभानी ही थी।
   इससे अच्छा तो वो एक साधारण मनुष्य होता, सुबह नौ से शाम पांच के ऑफिस के बाद का तो सारा समय अपनी पत्नि और परिवार को दे पाता।
   राजा सोचता बैठा चाय पी रहा था कि बांसुरी और विराट चले आये…… राजा के जन्मदिन तक उसे कुछ बताना नही था इसिलिए उसे देखते ही विराट ने उसे बस एक औपचारिक प्रणाम किया और हाथ में पकड़े सामान के साथ वहाँ से चला गया, बांसुरी आकर वहीं बैठ गयी। राजा को देख खुशी से अधिक अचरज था उसे, और उसके पारदर्शी चेहरे पर आये भाव राजा से छिपे ना रह सके।
  
    भाभियों , फुफू साहेब आदि औरतों के सामने वैसे भी राजा बांसुरी से अधिक बातें नही करता था, अपनी चाय खत्म कर वो वहाँ से चला गया।
   उसके जाते ही बांसुरी ने चैन की सांस ली, उसे सबसे अधिक डर खुद का ही था कि कहीं गलती से राजा से वो सब कह ना बैठे, वैसे भी वो उससे कुछ छिपा नही पाती थी।
    राजा के जाने के बाद एक एक कर सभी वहाँ से उठते चले गये…..रूपा बहुत समय से बांसुरी को उसकी तस्वीरें देना चाहती थी, लेकिन वो भी शादी ब्याह मेहमानों के बाद अपने बच्चे और बाकी कामों में ऐसी व्यस्त थी कि उसे समय ही ना मिला।
   जब बांसुरी पहली बार महल आयी थी तब उसकी कुछ तस्वीरें विराज ने खिंच कर उन्हें एक शाम बांसुरी के कमरे की मेज़ पर छोड़ रखा था जिन्हें उस वक्त रूपा भाभी ने अपने स्वभाव वश उठा कर रख लिया था कि अखिर विराज सा ने ऐसा क्या इस लिफाफे में रख छोड़ा है। बाद में अपने कमरे में जाकर देखने पर उन्हें उसमें बांसुरी की कुछ तस्वीरें ही मिली थीं, जिनके कारण एक आध बार उन्होने विराज के सामने मज़ाक भी किया था…..उस वक्त उन्हें कुंवर सा और बांसुरी के बारे में पता भी ना था, लेकिन घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदला की विराज शायद कभी अपने मन की बात बांसुरी से कह ही नही पाया और राजा ने अपनी और बांसुरी की बात घरवालों के सामने रख दी।
   फिर तो दोनों की शादी ही हो गयी, अब ऐसे में रूपा को इन तस्वीरों का क्या करना है ये समझ ही नही आया और आज आखिर उन्होने वो तस्वीरें बांसुरी के हाथ रख दी।
   उन्होने सिर्फ तस्वीरें देखी थी, उनमें पीछे लिखा v उनकी नजरों से छिपा रह गया था वर्ना  वो उन्हें बांसुरी को देतीं भी नही शायद।
    बांसुरी उस लिफाफे के बारे में कुछ नही जानती थी ये रूपा भाभी को पता था, और अब बांसुरी को सच्चाई बताने का भी कोई औचित्य ना था, यही सोच कर बिना किसी लाग लपेट के ” ये आपका कुछ सामान हमारे पास रह गया था,”कह कर रूपा ने बांसुरी को लिफ़ाफ़ा थमा दिया।
   लिफ़ाफ़ा हाथ में लिये तेज़ कदमों से बांसुरी भी कमरे में चली आयी, लेकिन उसके आने के कुछ पहले ही राजा काम से बाहर निकल चुका था।
      
        समय बीतते देर नही लगती….. राजा और प्रेम को पिंकी से मिल कर लौटे लगभग हफ्ते से ज्यादा बीत चुका था, चार दिन बाद होली थी…नियमों के अनुसार ब्याह के बाद बांसुरी और रेखा को पहली होली के लिये मायके जाना था।
   रेखा के मायके से  ठाकुर साहब ने खुद आकर महल भर को अपने यहाँ आने का न्योता दिया था, वो तो चाहते थे कि सभी उनके साथ ही चले जाये….वो भी अपनी शाही मेहमान नवाज़ी से सबको चकित कर देना चाहते थे, लेकिन ऐसे बेटे के ससुराल कैसे जाया जा सकता था यही सोच कर पहले बस रेखा को ही रानी माँ ने ठाकुर साहब के साथ भेज दिया और खुद होली के दो दिन पहले रूपा बच्चों और विराज को साथ लिये वहाँ जाने की सोची।
    बुआ जी ने भी बहुत समय से अपने ससुराल का चक्कर नही लगाया था , उन्होने भी पति बेटों और बहुओं के साथ ससुराल का एक फेरा लगा आने की सोची। वैसे उनके जाने का मुख्य कारण उनके ससुराल में चल रहा सम्पत्ति विवाद भी था, जिसके कारण अपनी हिस्सेदारी उन्हें भी दिखानी थी, वही पास में उनकी बहु जया का मायका भी था, मौके का फायदा उठाने जया भी जय के साथ अपने मायके निकल ली।

   बांसुरी का भी बहुत मन था कि किसी तरह वो और राजा भी  उसके मायके निकल जाये, लेकिन दादी साहेब के साथ साथ राजा के पिता की नर्म गर्म तबीयत के कारण राजा ने कहीं जाने से इन्कार कर दिया।
    बाकी सभी की इच्छा देखते हुए उसने खुद ने आगे बढ कर सभी को त्योहार मनाने जाने के लिये भेज दिया और खुद सभी बुजुर्गों की तीमारदारी के लिये रुक गया।
     रिवाज था इसी लिये बांसुरी के घर वालों का भी कई बार फोन आ चुका था, रानी माँ की सहमती मिलते ही बांसुरी भी पूरे जोर शोर से तैय्यारियों में लग गयी थी।
   अगले दिन सुबह ही उसकी ताई के बेटे का आना तय था, उनके साथ ही शाम की फ्लाईट से वो अपने घर निकलने वाली थी।
  मेनका तह लगे कपडों को बांसुरी को देती जा रही थी और बांसुरी उन्हें अपने बैग में सजाती जा रही थी, कि राजा कमरे में चला आया, बांसुरी का ध्यान उस ओर नही था, मेनका ने उसे देखते ही झुक कर प्रणाम किया राजा ने इशारे से उसे बाहर भेज दिया और खुद मेनका की जगह कपड़े बांसुरी को पकड़ाने लगा।
     बांसुरी अपने में मगन कपड़े रख रही थी कि तभी उसका ध्यान गया कि जो साड़ी वो सबसे ज्यादा दिल से उठा कर लायी थी वही मेनका उसे पकड़ा नही रही, आखिर परेशान होकर उसने मेनका को आवाज़ लगा ही ली__

  ” मेनका वो साड़ी दीजिये ना हरी और गुलाबी कॉम्बिनेशन वाली।”

  राजा ने इधर उधर देखा और बांसुरी का गुलाबी दुपट्टा उठा कर आगे बढ़ा दिया, बांसुरी की पीठ थी इसी से उसे वो नज़र नही आया, पर उसके हाथ का दुपट्टा देख वो आश्चर्य में पड़ गयी__

  ” अरे ये तो दुपट्टा है , वो मुझे वो साड़ी चाहिये जिसमें गिटार बने हैं।”

  राजा के चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी, गिटार वाली साड़ी हाथ में लेते ही उसके दिल में जल तरंग बज उठे, इस गिटार का भी कितना अहम किरदार था उसकी प्रेम कहानी में।
   वो साड़ी हाथ में लिये उस पर अपना हाथ फेर रहा था कि मेनका पर पर खिझती बांसुरी पीछे मुड़ गयी__

” आप रहने ही दीजिये,मैं खुद ले लूंगी।” बांसुरी ऐसा बोलती पलटी की सामने राजा को देख उसकी आंखें खुशी से चमक उठी। पर अगले ही पल उसे याद आ गया कि वो दो दिन से उसे अपने साथ चलने के लिये मना मना कर थक चुकी थी और राजा ने होली पर उसके साथ उसके मायके जाने की हर संभावना नकार दी थी__

  ” क्या हुआ? पहले तो अचानक खुश हो गईं अब एकदम दप्प से बुझ गईं।”

  ” हाँ तो बुझू नही तो क्या करुँ? राजा साहेब तो अपनी बीवी के साथ जा नही सकते ना, नाक कटती है ससुराल जाने में।”

  ” कैसा बोल रही हो बांसुरी! तुम भी तो जानती हो कितना काम है यहाँ , फिर डैड की तबीयत भी सही नही है और दादी साहेब भी बिस्तर पर पड़ी हैं….अगर सब सही होता तो मैं क्यों अपने ससुराल नही जाता , बताओ ?”

   बांसुरी मुस्करा कर थोड़ी निराश हो वापस कपड़े रखने लगी, राजा ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया__

  ” बांसुरी! एक बात बताओ, क्या कभी कुछ समय के लिये मुझसे दूर रहना पड़ा तो रह पाओगी?”

  ” पागल हैं क्या? अब इस जनम तो पीपल वाली भूतनी की तरह चिपकी रहूंगी आपसे, और अगले जनम की भी प्रि बूकिंग कर ली है मैंने।”

  ” वो कैसे? ”

  ” तीज और करवाचौथ कर के …..सावन में तीज व्रत करूंगी और दीवाली के पहले करवाचौथ , उसके बाद हर जनम में मुझे सिर्फ और सिर्फ आप मिलेंगे राजा साहेब।”

   ” इतना प्यार करती हो मुझसे?”

  ” खुद से भी ज्यादा करती हूँ, इतना की शायद शब्दों में बताना मुश्किल होगा ……अच्छा सुनो! तुम्हें कुछ बताना चाहती थी, बहुत समय से सोच रही थी लेकिन कभी समय ही नही मिला कि कुछ बता पाऊँ, कल फिर मैं चली भी जाऊंगी।”

  ” क्यों जा रही हो, मत जाओ ना! यहाँ महल में भी कौन है, हम दोनो ही तो रह जायेंगे, साथ साथ रंग खेलेंगे ….पहले एक दूजे को रंग लगायेंगे फिर साथ साथ छुड़ाएंगे ।”

  ” अच्छा जी?”

  ” और क्या ? सच कह रहा हूँ।”

  ” रंग लगाने छुड़ाने में फिर आपका दूसरा ही मूड बन जायेगा कुछ और कार्यक्रम शुरु हो जायेगा?

  ” हाँ तो हक है मेरा। लाइसेंस मिल चुका है तुमसे इश्क़ फरमाने का….”

   ” देखो फिर शुरु हो गये, बातों में रोमांस ढूँढना तो आप लोगों को आता ही नही ना, प्यार मतलब बस वही, हम लड़कियाँ चाहती हैं प्यार से अपने प्रेमी का हाथ थाम कर दुनिया जहान की बातें उसे सुनायें और आप लोग, हाथ थामा नही कि आपकी उंगलियाँ सरकने लगती हैं।”

बांसुरी की बात पर राजा ज़ोर से हँस पड़ा __

” हाँ हुकुम! हम लड़के ना प्रैक्टिकल पर बिलीव करतें हैं और तुम लड़कियाँ सिर्फ थ्योरी पर थ्योरी बताती रहती हो।

  ” अच्छा?”

  ” और क्या ? अब देखो तुम लोगो का सपना भी क्या होता है अपने प्रेमी/ पति का हाथ थाम के बैठ बातें करना वो भी कैसी बातें….. सारे जहान की पंचायत, पड़ोसन की खबर दादी की बुआ की भाभी की, हर किसी की पंचायत गानी है…..खूबसूरत हवा बह रही है पति रोमांटिक हो रहा है और बीवी कहानियां कह रही है। ये भी कोई बात है भला।उस पर तुक्का ये कि हम से रोमांटिक कोई नही, तुम बिवियाँ पड़ोसन सी साड़ी और जेवर दिलवा दो में भी रोमांस ढूँढ लेती हो।”

   बांसुरी ने हँसते हुए उसे धक्का दिया और एक ओर हो गयी__

  ” अच्छा तो फिर आओ ज़रा!! मैं भी बता दूं रोमांस क्या होता है?

  ” ओह्ह प्लीज़! आई एम वेटिंग।”

राजा ने अपने ऊपर उसे खिंचा ही था कि दरवाज़े पर किसी ने थाप  दे दी और राजा पलंग पर सीधा बैठ गया__” सब मेरे रोमांस के ही दुशमन हैं।” बांसुरी मुस्कुराती हुई उठ कर एक किनारे हो गयी

” आ जाइये अन्दर!’

  राजा के बुलाते ही समर अन्दर चला आया, उसे देख बांसुरी अपना ताम झाम समेटे कमरे के अन्दर वाले भाग में चली गयी__

  ” हुकुम! ऐसे हम नही आते लेकिन एक बुरी खबर है, आपको अभी चलना होगा।”

  ” क्या हुआ समर? पूरी बात बताइये।”

  ” हुकुम रियासत की पूर्वी तरफ जो गांव पड़ता है रानीपुर, वहाँ गांव के लोगो के लिये अनाज भण्डारण के लिये आपने जो परिसर तैय्यार करवाया था, उसी में लगभग पूरे गांव का अनाज पड़ा था, आज मुहँ अन्धेरे किसी ने वहाँ आग लगवा दी ।
    गांव से कुछ बाहर होने के कारण आग का पता देर से चला, त्योहार के कारण लोगो का उधर जाना भी नही हो पा रहा था, जब तक पता चला सारा धान जल कर स्वाहा हो चुका था।
  गांव में त्राहि मच गयी है हुकुम, आपको तुरंत चलना होगा, कुछ तो उनके नुक्सान की भरपायी भी हमें करनी पड़ेगी।

” कुछ क्यों समर? लोगों से लिखवाते जाओ किसकी कितनी बोरी अनाज वहाँ था, शाही खज़ाना सबके नुकसान की भरपायी करेगा।”

  ” आपकी बात तो सही है हुकुम, लेकिन ऐसे में आग लगाने वालों के और मज़े हो जायेंगे, उन्हें उनके किये की सज़ा भी तो आप ही मुकर्रर करेंगे।”

  ” तुम्हें क्या लगता है, किसका काम हो सकता है ये?”
   
  “रानिपुर गांव काफी बड़ा गांव है हुकुम उससे शहर लगभग लगा हुआ सा है…. आपको याद है वो बिल्ड़र मलय सिंह जो आपसे वहाँ मॉल और बाकी रिहायशी बिल्डिंग्स की पर्मिशन के लिये आया था।”

  ” याद है।”

  ” सब कुछ उसी का किया धरा लग रहा है हुकुम। आपने उसे गांव की ज़मीन देने से जब से मना किया है, तब से आप देख ही रहें हैं वो किसी ना किसी तरीके से आपको परेशान करने में लगा हुआ है।”

  “हम्म , चलो फिलहाल चलते हैं गांव वालों के पास, बाद में देखेंग उस मलय को भी।” 

   राजा बांसुरी को कह कर समर के साथ निकल गया, वो वापस कुछ गाती गुनगुनाती अपनी तैय्यारियों में लग गयी, उसी वक्त निरमा का फ़ोन आ गया….

  “हाँ बोलो होने वाली मम्मा?”

  ” क्या बात है बड़ी चहक रही हैं आज रानी साहिबा?”

  ” कल मायके जो जा रहीं हूँ, शादी के बाद से मौका ही कहाँ मिला?”

  ” अरे हाँ!! अच्छा है घर पर सभी को मेरा भी प्रणाम देना, वैसे तुझे कुछ बताना था।”

  ” हाँ बोल ना!”

  ” उस सैंपल का परिणाम आ गया है, तेरे दूध में ही दवा मिलाई गयी है।”

   कुछ समय पहले तक का बांसुरी का खिला चेहरा बुझ गया, उसे आभास तो था फिर भी मन ही मन वो यही मना रही थी कि ऐसा कुछ ना निकले, लेकिन अब इस परिणाम के बाद रत्ती भर भी शक की गुंजाइश ना थी।
   दूध उसके पास रसोई से लाने वाली थी मेनका, उसिसे ज़रा सख्ती से  बात कर वो नाम उगलवाया जा सकता था कि आखिर महल में कौन है जो उसके दूध में मिलावट कर रहा है।
   रूपा भाभी भले ही बातों में कभी कड़वी हो जाती थीं लेकिन मन की साफ़ ही लगतीं थीं, उन्हें बस एक हल्की सी जलन जो एक ही घर की बहुओं में सहजता से पनप जाती है वही थी उससे,  लेकिन ये भी एक सत्य था कि उसकी हर ज़रूरत के समय और हर मुश्किल में वही ढाल बनी खड़ी भी रहतीं थी।
  जया भाभी तो रूप और गुण दोनों में इतनी मीठी थी कि उन पर शंका मतलब खुद पर शक करने जैसा था।
  फुफू साहेब या समर की माँ का आखिर बांसुरी ने कभी कुछ बिगाड़ा ही ना था जो वो लोग ऐसा करें फिर?? क्या रानी माँ?
   इस विचार से ही वो कांप गयी, अगर रानी माँ ही यह कर रहीं तो वो कैसे और कब राजा से इस बारे में बात करेगी?
   क्या इस बारे में राजा से बात करना सही रहेगा? सिर्फ यही एक चीज़ तो राजा ने उससे मांगी थी, और आज तक उसने उससे और मांगा भी क्या था? और उसी बात को वो काट दे?
   लेकिन अपने जीवन के साथ खिलवाड़ करने वाले को वो छोड़ भी तो नही सकती थी….
   लेकिन रानी माँ आखिर ऐसा करेंगी क्यों? वो राजा से तो बहुत प्रेम दिखाती हैं……
    हाँ दिखाती हैं! लेकिन प्रेम दिखाना और करना दोनो अलग बातें होतीं हैं। आखिर काकी साहेब या दादी सा का जैसा निस्वार्थ प्रेम राजा के प्रति है वैसा रानी माँ का क्यों नज़र नही आता?
  रानी माँ के प्यार में दिखावट की मिलावट उसे क्यों महसूस होती है?
  
      विराज को गद्दी पर बैठाने की लालसा ? राजा पर होने वाले हमले? और अब उसे बंध्या बनाये रखने की कोशिश? क्या ये सारे तार एक ही सिरे से जुड़ें हैं?
   और राजा साहेब इन सब के बारे में कुछ नही जानते?
   या हुकुम सब कुछ जानतें हैं? और इसिलिए शायद आजकल उससे घड़ी घड़ी दूर होने की बात……

   इससे आगे का कुछ भी वो सोच नही पायी……
नही राजा इतना प्यार भी मत करो मुझसे कि मेरे जीवन की सुरक्षा के लिये मुझे खुद से ही दूर कर दो। तुम्हारे बिना भी आखिर मेरा जीवन मृत्यू समान ही होगा इससे तो सुखद यही होगा कि तुम्हारे सामने रहते हुए ही मर जाऊं।”

  अपनी उधेड़बुन में खोयी थी कि उसकी माँ का फोन आ गया, माँ से बात कर उसे कुछ राहत सी मिली।
उसे भी लगा कि चार दिन के लिये ही सही मायके जाकर उसे कम से कम सोचने का मौका तो मिल जायेगा, फिर वापस आकर देखेगी कि राजा को दूध वाली बात कैसे बतायी जाये?

*********

   
  रात गहरी हो चुकी थी, लगभग बारह साढ़े बारह का वक्त था…..निरमा गहरी नींद सो रही थी कि अचानक उसकी नींद खुल गयी।
     कुछ देर लेटे लेटे सोने की कोशिश करने पर भी उसे नींद नही आयी तो वो धीरे से उठ कर कमरे से बाहर चली आयी….
   बाहर हॉल में काउच पर लेटे लेटे टीवी देखते जाने कब प्रेम गहरी नींद सो चुका था। उसने रिमोट उठा कर टीवी बंद किया और रसोई में चली गयी।
   रसोई में वो बहुत हल्के हाथों से ही उठापटक कर रही थी लेकिन प्रेम चौंक कर उठ बैठा, घबरा कर वो तुरंत रसोई में पहुंच गया__

  ” कुछ चाहिये था आपको?”

निरमा ने उसे देखा और बेचारी शरमा कर रह गयी, वो उसे क्या बताती कि उसे क्या चाहिये था…..
  असल में उसे बहुत ज़ोर से भूख लग रही थी और अन्दर से उसे चावल के आटे की पूरियाँ खाने का मन कर रहा था, हालांकि ना उसका बनाने का मन था और ना हिम्मत! फिर भी भूख नही सम्भल रही थी इसिलिए वो कुछ मिलता जुलता मिल जाये तो उसे ही खाकर भूख मिटा ली जायेगी यही सोच कर रसोई में चली आयी थी।

  ” जी मैं देख लूंगी आप जाइये आराम किजीये।”

  ” आराम आप किजीये निरमा, मुझे बताइये क्या खाने का दिल कर रहा है?”  
  आश्चर्य से निरमा की आंखें फैल गईं ये कैसे समझ गये कि उसे भूख ही लगी है, उसे ऐसे खुद को देख प्रेम झेंप गया__

  ” असल में मेरे कुछ दोस्त हैं जो अभी अभी में पापा बने हैं, आजकल उन लोगों से अक्सर बात चीत हो जाया करती है, सब आश्चर्य भी करतें हैं, फोन कॉल से भागने वाला लड़का कैसे खुद उन्हें फ़ोन लगा कर पूछता रहता है, लेकिन क्या करुँ? डर लगता है घर पर सिर्फ हमी दोनो रहतें हैं ना, कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाये।”

  ” निश्चिंत रहें कहीं कुछ गड़बड़ नही होगी, अच्छा सुनिये!”

  ” हाँ बोलिये।”

  ” मुझे चौसेला खाने का बहुत मन कर रहा है वो भी सूरन की सब्जी के साथ।”

  प्रेम ने ये नाम पहली बार सुना था__

” ये क्या होता है?”

  ” अरे चौसेला नही पता आपको? चावल के आटे की पूरियाँ!”

  एक ठंडी सी आह भर कर प्रेम ने डायनींग की कुर्सी रसोई में खिंची और निरमा को एक ओर बैठा दिया, बाथरूम में जाकर उसने गीजर चलाया और वापस रसोई में आकर चावल का आटा ढूंढने लग गया।
   उसके बाद तो कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गयी।
निरमा एक एक कर बताती गयी और प्रेम बनाता गया।

  प्रेम इन्सान को वाकई बदल देता है, अपने अभिभावकों को खोने के बाद प्रेम का रिश्तों नातों से मोहभंग हो चुका था, जो एक महीन सा धागा बचा रह गया था वो भी प्रताप के साथ चला गया, लेकिन कहतें हैं ना अगर इन्सान के सामने खड़ी चुनौतियां उसे मरने की सौ सौ वजहें भी देने लगे तब भी ज़िंदगी उसे जीने की सिर्फ एक सबसे मज़बूत वजह दे ही जाती है।

  निरमा के लिये कुछ भी करते हुए प्रेम सबसे अधिक प्रसन्न रहता था, उसे निरमा के लिये कुछ भी करना उसकी अपनी ज़िंदगी की तरफ एक कदम आगे बढ़ने सा लगने लगा था।

   सूरन की सब्जी , हरे धनिये की चटनी के साथ प्लेट पर गरमा गरम पूरियाँ सजाते प्रेम को देख निरमा को पल भर को लगा आगे बढ कर उस आदमी के सीने से लग जाये जो उसके लिये ऐसे प्राण दिये बैठा है।
  अपनी ही सोच से लजा कर वो वापस उसे देखने लगी कि प्रेम ने थाली उसकी ओर बढ़ा दी….
   निरमा थाली लिये बाहर हॉल में चली आयी, वो काउच पर बैठने ही जा रही थी कि प्रेम ने उसकी कमर से सटा कर तकिया लगा दिया और उसके बैठते ही बाथरूम से टब में गरम पानी भर लाया।
  पानी देख वो उसे देखने लगी__

  ” कल संजय बोल रहा था, कि उसकी पत्नि के पैरों में सूजन चली आती थी, आपके भी है इसलिये ये गरम पानी ले आया हूँ।
  कहते हैं गर्म पानी की सिन्काई से राहत मिलती है।”

  निरमा मुस्कुराती हुई उसे देखते हुए पानी में पैर डुबोने जा रही थी कि उसका ध्यान गया, वो नीच झुक कर सलवार समेटने में असमर्थ थी, उसने प्रेम को देखा प्रेम ने उसे देखा और झट वो नीचे बैठ निरमा के सलवार को ऊपर दो तीन तह में समेट गया, उसने बडे हल्के से उसके दोनो पैर टब के पानी में रख दिये।

  ” पैरों में सूजन बहुत कॉमन है, इससे हमें कोई दर्द या तकलीफ नही होती, ये सिर्फ बेबी के वजन के कारण आ जातीं हैं, आप इतना टेंशन ना लें ।”

  वो मुस्कुरा कर उससे कह तो गयी लेकिन पैरों की सिन्काई के साथ साथ गर्मा गर्म मनपसंद खाना खाते हुए उसे अच्छा भी बहुत लग रहा था।
  उसने अपना पसंदीदा  चैनल लगा रखा था, और टीवी पर अपनी सौ बार की देखी फिल्म मास्क देख देख कर हँसने लगी, उसे ऐसे हँसते खिल्खिलाते देख प्रेम भी हँसता बैठा रहा।

   खा पीकर प्लेट किनारे किये वो टीवी देखती रही…. धीरे धीरे उसे नींद आने लगी लेकिन प्रेम के बार बार कहने पर भी वो अन्दर ना जाकर वहीं बैठी रही, नींद में इधर उधर लुढकती गरदन को सम्भालने उचक कर प्रेम उसी काउच पर उसी के बाजू चला आया।
  अबकी बार जब निरमा का नींद में लुढ़कता चेहरा नीचे झुका तो प्रेम का कंधा था, कन्धे का सहारा मिलते ही उसने गरदन टिकाई और गहरी नींद में सो गयी।
     ठंड बढने पर प्रेम ने वहीं पड़ा अपना दोहड़ निरमा के चारों ओर से लपेट कर खुद पर भी डाल लिया, नींद में कसमसा कर निरमा ने प्रेम का हाथ पकड़ा और कुछ बड़बड़ करती गहरी नींद में सो गयी।
    उसे सोते देख प्रेम मुस्कुरा कर उसकी लगायी फिल्म मास्क देखता बैठा रहा।

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   अगले दिन सुबह ही बांसुरी के भाई उसे लेने पहुंच गये.. महल के अधिकतर सदस्य इस वक्त महल में नही थे इसी से दादी साहेब और अपने पिता से मिलवाने के बाद राजा उन्हें और बांसुरी को साथ लिये रियासत घुमाने निकल गया।
    घूमते फिरते गांव की बस्तियों से निकलते समय बांसुरी ने एक बार फिर लोगों का राजा के प्रति वही प्यार वही पागलपन देखा जो तब देखा था जब वो पहली बार महल आयी थी।
   अपने प्यारे राजा और रानी की एक झलक पाने को गांव का गांव उमड़ा पड़ा था, जबकि राजा ने कोई पूर्व सूचना नही भेजी थी, फिर भी रास्ते में जो उन्हें देखता जा रहा था, आगे उनके आने का सन्देश भेजता जा रहा था।
    एक जगह कुछ औरतें आरती का थाल सजाये उनकी बाट जोह रहीं थी, राजा हमेशा की तरह अपनी खुली जिप्सी में सभी का अभिवादन करता चल रहा था, लेकिन उस महिला समूह के पास जाकर उसने गाड़ी रुकवा दी, वहीं से नीचे झुकने की जगह प्रेम के बार बार मना करने पर भी राजा नीचे उतर गया।
   औरतों में से एक सामने चली आयीं , आरती उतारने के बाद माथे पर तिलक लगाने के बाद उसने थाली से एक पिड़िया उठा कर बड़े संकोच से राजा की तरफ बढ़ाई जिसे राजा ने तुरंत अपने मुहँ में ले लिया। उसके बाद तो वहाँ मौजूद हर औरत को जैसे राजा साहेब में अपना बेटा दिखने लगा,सभी में उसे कुछ ना कुछ खिलाने की होड़ सी लग गयी, कोई उसके मुहँ में कुछ फल डालती तो कोई कुछ मिठाई, उन्हीं के बीच एक वृद्धा अपने कांपते हाथों से गुड़ की ड़ली उठाये राजा की ओर बढ़ी ही थी कि उसके हाथो के कम्पन से ड़ली ज़मीन में गिर पड़ी जिसे उठा कर अपने आंचल से पोछ उसने राजा की तरफ कर दिया, वहाँ खड़े लोग उस वृद्धा को डांटना फ़टकारना शुरु करते कि उसके पहले ही राजा ने वो ड़ली भी खा ली।
   सब आश्चर्य से अपने राजा साहेब के बड़प्पन की बलाएँ लेते उनकी जय जयकार करते रहे….सबसे मिलते मिलाते खाते पीते शाम हो गयी, और बांसुरी और उसके भाई को एयरपोर्ट छोड़ कर राजा वापस आ गया।
    बांसुरी के बार बार कहने पर भी अगले दिन के किसी विशेष कार्य् के  कारण राजा बांसुरी के साथ नही जा पाया।


  मायके पहुंच कर बांसुरी खुश थी, लेकिन राजा की याद रह रह के आ ही जाती थी….
    होली की शाम ताई बुआ वीणा दी सभी बांसुरी से मिलने वहीं चले आये थे…. वीणा अपने गोलु की धागे की नाप तैय्यार कर रही थी कि बांसुरी की माँ भी हाथ भर धागा लपेटती चली आयी, आते ही उन्होने पहले वीणा फिर बांसुरी की नाप का धागा काटा और होली की थाली में बताशे नारियल गुलाल के साथ सजाये सबको लिये होलिका दहन के लिये चल पड़ी__

  ” हर साल हमे नाप नाप कर छोटी कर डालो !”

वीणा की मज़ाक भरी चुहल सुन ताई गंभीर हो गयी__

” अरी छोरी ये तुम्हारी हारी बीमारी परेशानी दुख दर्द को तुम्हारी अम्मा नाप नाप कर होलिका में जला आती है समझी, जिससे सब दुख दर्द दूर रहे बच्चों से, अब हमारे लाने तो हमाई बहुरिया हैं सब देखने को, अपने पति बच्चों ससुर सब को नाप आती हैं।”

  ” और आपको ताई? आपका धागा कौन नापेगा?” बांसुरी के सवाल पर सभी औरतें कुछ पल को शांत हो गईं__

  ” छोरी हम औरतों को भगवान ने इतना मजबूत बना कर इस चूल्हे चौके में जोता है कि हमें इन सब टोटकों की ज़रूरत ही कहाँ रह जाती है। अब आज तू मायके में है सो तेरी माँ ने नाप जोख निकाल ली, सासरे में कौन तेरा धागा डालेगा अग्नि में? वहाँ तो तू ही अपने पति को अपने बाल गोपालों को नापती फिरेगी ।
    सुन छोरी हम औरतें भले ही ज़रूरत पड़ने पर अपने पति की  माँ भी बन जाती हैं और उसकी हर तकलीफ धागे से काट कर जला आती हैं,  लेकिन हमारा आदमी हर मौके पर हमारा पति ही बना रहता है कभी हमारा पिता नही बन पाता, इस बात को गांठ बान्ध ले, सदा सुखी रहेगी।”
 
   बांसुरी के सामने सबकी मदद करता हँसता मुस्कुराता राजा आ गया….कैसे वो ताई की बात पर हामी भर दे जब उसके साथ हर कदम पर वो उसकी परछाई बना खड़ा रहा है।

   होलिका की तेज़ तेज़ उठती लपटों में उसने मन ही मन राजा के नाम का धागा भी उसकी सारी अलाओं बलाओं के साथ परिक्रमा कर डाल दिया, एक दूसरे को गुलाल का टिका कर मुहँ मीठा करा कर सभी घर वापस आ गये।

  अगले दिन सुबह खिड़की से आती रोशनी चेहरे पर पड़ते ही उसकी नींद खुली और मुस्कुरा कर वो उठ बैठी….काश उसके साथ राजा भी आया होता तो आज उसकी होली की बात ही अलग होती।
   पहली होली वो भी उनके बिना ! वो सोच रही थी कि दरवाज़े पर बेल बजी….उसने झांक कर देखा, माँ रसोई में चाय चढ़ा रही थी, पापा शायद वॉक पर गये थे, वीणा अपने कमरे में गोलु के साथ सो रही थी, इतनी सुबह सुबह न्यूज़ पेपर वाले के अलावा कौन हो सकता है सोचती वो नाईट सूट में ही सीढ़ियाँ उतर दरवाज़े तक चली आयी, खुले बालों को एक तरफ किये उसने दरवाज़ा खोला और ठिठक कर खड़ी रह गयी…….
      सामने हाथ बांधे मुस्कुराता राजा खड़ा था।

क्रमशः

aparna….
  
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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