जीवनसाथी -62

जीवन साथी– 62


  
पहली होली वो भी उनके बिना ! वो सोच रही थी कि दरवाज़े पर बेल बजी….उसने झांक कर देखा, माँ रसोई में चाय चढ़ा रही थी, पापा शायद वॉक पर गये थे, वीणा अपने कमरे में गोलु के साथ सो रही थी, इतनी सुबह सुबह न्यूज़ पेपर वाले के अलावा कौन हो सकता है सोचती वो नाईट सूट में ही सीढ़ियाँ उतर दरवाज़े तक चली आयी, खुले बालों को एक तरफ किये उसने दरवाज़ा खोला और ठिठक कर खड़ी रह गयी…….
      सामने हाथ बांधे मुस्कुराता राजा खड़ा था।

  राजा को यूँ सामने देख उसकी आंखें खुली की खुली रह गयी, कुछ देर उसे भौचक देखती ही रह गयी__

  ” कौन है बंसी ?” अन्दर से माँ के सवाल पर बड़ी मुश्किल से खुद को संभालती वो कह पायी__

  ” साहेब हैं माँ!”   बांसुरी की हालत पर मुस्कुराता राजा उसे देखता खड़ा रहा__

  ” मैं अन्दर आ जाऊँ? या यही खड़े रखना है?”

  उसे बाहों में भरने जैसे ही वो आगे बढ़ा, वो छिटक के एक किनारे हो गयी, उसके लिये अन्दर जाने का रास्ता देकर उसने गले लगने से मना किया और धीरे से फुसफुसा उठी__

  ” माँ रसोई में हैं, देख लेंगी।” उसकी फुसफुसाहट पर “तो क्या हुआ “वाले भाव देकर राजा सोफे पर बैठने जा रहा था कि बांसुरी की माँ बाहर चली आयीं__
     वो पूजा कमरे से आरती की थाली सजाये लाईं थी, राजा की आरती उतार कर उसकी नज़र उतार उन्होने आरती एक ओर रखी और साथ ही लाया पानी का ग्लास और मिठाई उनके सामने रख दी__

  ” कैसे हैं कुंवर जी आप?”

  राजा उनके पैर छूने आगे बढ़ा ही था कि उन्होने उसे रोक दिया__

  ” हमारे तरफ बेटी और दामाद से पैर नही छुवाते, बल्कि उल्टा उनके पैर छूये जाते हैं। लेकिन आपने पहले ही हम लोगों को मना कर रखा है।”

  वो मुस्कुराती हुई अन्दर चाय लेने चली गईं…..राजा बांसुरी को देखने लगा, बांसुरी ने इशारे से पूछा क्या हुआ, इशारे में ही राजा ने भी उससे इतना दूर बैठने का कारण पूछा तो फिर वो मुस्कुरा उठी फिर फुसफुसाते हुए ” माँ देख लेगी ” कह कर खिलखिला उठी……

    एक एक कर फिर तो लोग आते चले गये….बांसुरी की माँ ने ताई बुआ सभी को राजा के आने के बारे में बता दिया, और सभी लोग वहाँ जुट गये….
   ताई और बुआ जी के बेटे बहुयें बाल बच्चे सब से घिरा बैठा राजा बस बांसुरी की ही झलक नही पा रहा था, सभी उससे तरह तरह के सवाल किये जा रहे थे, सबसे ज्यादा तो घर के बच्चे उससे प्रभावित लग रहे थे, कोई उसके हाथ की अँगूठीयों में खोया था तो कोई उसके हाथ में बंधी रुद्राक्ष की माला में.
    किसी को उसकी मुस्कान मोह रही थी तो किसी को उसकी आंखें।
  सभी बच्चों ने पहली बार राजा को इतना पास से देखा था__

  ” आप सच्ची के राजा हो?”

राजा ने आँखे झपक के उसे हाँ कहा

  ” तो फिर आपकी तलवार कहाँ है?”

  ” वो हमारे महल में हैं।”

  ” आप झूठ बोल रहे हों ना? राजा बिना तलवार के थोड़े ना घूमता है?”

  राजा उसकी बात सुन हँसने लगा तभी एक दूसरा शैतान कूकने लगा__

  ” अच्छा अगर आप सच्ची के राजा हो तो आपके सैनिक कहाँ हैं?”

  ” मेरे सैनिक भी महल में हैं?”

  ” और मंत्री?”

  ” वो भी महल में!”

  ” तो फिर रानी कहाँ हैं?”

  राजा मुस्कुरा कर बांसुरी को ढूंढने लगा, तभी रसोई से डेनिम कैप्री और मरून टी शर्ट में हाथ भर चूड़ा खनकाती बांसुरी ट्रे में चाय लिये बाहर आयी, उसे दिखाते हुए राजा ने सभी बच्चों का ध्यान उसकी तरफ कर दिया__

  ” ये रहीं रानी साहिबा, हमारी हुकुम!”   सारे बच्चे आश्चर्य से बांसुरी को देखने लगे, उसका अजीबोगरीब हुलिया देख उन सभी को हंसी आ गयी, और उन्हें हँसते देख राजा भी ज़ोर से हँसने लगा।।

    होली के लिये बाहर बगीचे में ही सारी व्यवस्था थी, एक तरफ बड़े बड़े हौद में रंग घुला था, दुसरी तरफ करीने से सजी टेबल पर गुलाल की थालियां लगी थीं।
एक तरफ आधुनिकता में रंगी होली के लिये रंगीन पानी के फव्वारों के साथ संगीत की तान छिड़ी थी तो दुसरी तरफ पारंपरिक गुजिया ठंडाई और जलेबी पकौडों की प्लेट सजी थी।

     लोगों की भीड़ में सब एक दूजे को रंगते एक दूजे से मिलते जुलते हालचाल पूछते आगे बढ़ते जा रहे थे। बांसुरी की ताई के तीनों लड़के राजा को अपने साथ अपनी मित्र मंडली के पास ले चले थे, वीना के पतिदेव भी उनके साथ जुगलबंदी कर रहे थे। सभी लोगों से उसे मिलाते जुलाते वो लोग पूरी तरफ होली के रंगों में डूबे बैठे थे।
    एक किनारे कॉलोनी के शर्मा जी बड़ा सा सिल बट्टा सजाये ताजी भांग पीसते बैठे थे ….. हवा में पलाश की महक के साथ मादक कच्ची भांग की महक मिल कर पूरे माहौल को अबीरी किये थी….राजा मुस्कुराता सबसे मिल तो रहा था लेकिन उसका पूरा ध्यान बांसुरी पर था जो उसे कहीं नज़र नही आ रही थी…
     सब होली के रंगों में सराबोर थे कि बांसुरी के भैय्या का बेटा भागता हुआ राजा के पास आया और उसे एक पर्ची पकड़ा गया, राजा ने पर्ची खोल के देखी….लिखा था__

  ” भैय्या लोगों के साथ होली खेलने आये हैं क्या साहेब? मुझे रंग नही लगाएंगे ?”

  राजा तुरंत अपने आस पास नज़र दौड़ाने लगा लेकिन उसे बांसुरी कहीं नज़र नही आयी , उसने नीचे देखा छोटा सा बन्टी उसकी तरफ कागज़ और पेन्सिल बढ़ाए खड़ा था…..
    राजा ने मुस्कुरा कर कागज़ लिया और ” पहले आप मुझे  नज़र आयें,  फिर मेरी पकड़ में आयेँ तब तो आपको  रंग लगा पाऊंगा हुकुम।” लिख कर पर्ची को बंद कर बन्टी के हाथ में वापस रख दिया।

    कुछ देर में ही बन्टी वापस एक पर्ची ले आया__
” नज़र आ जाऊंगी लेकिन मेरी एक शर्त है, मुझे रंगते हुए साहेब के हाथ नही रंगने चाहिये।”

  राजा ने पर्ची पढ़ी और फिर मुस्कुराने लगा__” नज़र तो आईये हुकुम, आपको बिना हाथ लगाये रंग दूंगा।”

   बन्टी जिस तेज़ी से पर्ची लेकर भागा था वैसी ही तेज़ी से वापस आ गया__

  ” आपके सामने ही हूँ साहेब!! आप देख ही नही रहे तो मैं क्या करुँ?”

  राजा ने झटके से सिर उठाया और चारों तरफ देखने लगा, एक तरफ पांच छै लड़कियों का समूह खड़ा एक दूसरे को रंग रहा था, सभी ने एक सी सफेद कुर्तियां डाल रखी थीं और नीली जीन्स पहन रखी थी, सभी के बाल एक से बने थे और सभी के चेहरे गहरे लाल गुलाबी गुलाल से रंगे हुए थे….
   राजा धीरे से बन्टी को गोद में उठाये उन लड़कियों तक पहुंच गया, वो समझ गया था कि बांसुरी ने चुन चुन कर कॉलोनी की उसके जैसी लम्बाई चौड़ाई वाली लड़कियों को अपने पास जमा कर रखा था…..
    
   ” ढूँढ ही लिया आखिर तुम्हें? आखिर कब तक बचतीं मुझसे?” कहता राजा उनमें से एक की तरफ उसे गले से लगाने बढ़ ही रहा था कि बांसुरी ने अपना हाथ उसे रोकने को आगे किया, और पीछे से आता बांसुरी का हाथ राजा ने थाम लिया __

  ” ये तो चीटिँग है राजा साहेब! आपको शर्त याद नही? बिना अपने हाथ रंगे मुझे रंगना होगा।”

  राजा ने मुस्कुराते हुए अपने गालों से बांसुरी के गालों पर अपने चेहरे पे पुता रंग लगा दिया, नाक से नाक पर लगाने के बाद वो आगे बढ़ता की बांसुरी की भाभियों ने आकर उसे घेर लिया__

  ” ये तो गलत बात है कुंवर जी, बस अपनी ही बीवी में मगन है आप, हम भाभियों को तो पूछा भी नही जा रहा?”

  ” आप जाने कहाँ छिपी बैठी थीं बस वही तो पूछ रहा था बांसुरी से ….”

  “झूठे , जैसे हम नही जानते आप करने क्या जा रहे थे, खैर वो सब छोड़िये ….मन भर होली खेल लीजिए अपनी हुकुम के साथ,  फिर आज खाना हमारे घर ही है आपका, तो ज़रा जल्दी जल्दी आ जाइयेगा, वर्ना ऐसा ना हो कि घर वाले रास्ता तकते रह गये और ये राधा मोहन यहाँ होली ही मनाते घर वालों को भूल  गये।”

  ” जी बिल्कुल आ जाऊंगा, अब यहाँ तो मैं इनका गुलाम हूँ, जहां ये ले जायें जाना ही है।”

     उसके बाद तो होली के गानों पर ऐसी धूम मची कि क्या बच्चे क्या बूढ़े सभी थिरकते एक दूसरे को रन्गते होली की फुहारों में भीगते रहे।

   होली खेल खाल कर घर पहुंचने पर राजा को अपने कमरे के बाथरूम में भेज बांसुरी अपनी माँ के कमरे वाले बाथरूम में नहाने चली गयी।
  उसके नहा के आते में घर के बाकी सदस्य ताई के घर जाने के लिये तैय्यार बैठे थे, उन सभी को  देख वो भी तैय्यार होने लगी__

  ” जल्दी करें राजा साहेब! नीचे सब तैय्यार हो चुके हैं!”

  ” कहां के लिये?”

  ” ताई जी के घर पर आज सबका खाना है , आपको भाभी ने बताया तो था।”

   ” मैं कहीं नही जाने वाला, तुम जाओ और कुछ अच्छा सा बहाना बना दो, मुझे अभी बस तुम्हारे साथ रहना है।”

  ” ऐसे कैसे बहाना बना दूं, मतलब झूठ बोलूं ? ”

   ” हाँ मेरी सत्या, जाओ जाकर झूठ बोलो।”

   ” क्या साहेब ? मुझे तो बहुत ज़ोर की भूख लग रही है। यहां रुके तो खायेंगे क्या?”

  ” सुबह इतने पकौड़े और जलेबी ठूंसने के बाद भी तुम्हें भूख लग रही हैं? मैं तो फिलहाल सिर्फ तुम्हें खाने के मूड में हूँ,,अब तुम नीचे जाकर बहाना बनाओ और सबको भगा कर आ जाओ।”
   अपनी बात पूरी कर राजा बाथरूम से बाहर आ गया, बनावटी गुस्सा दिखाती बांसुरी नीचे चली गयी….
   राजा तैय्यार होकर उसका इन्तजार कर कर के जब थक गया तब ऊपर से झांक कर खुद ही नीचे चला आया ……
   उसने देखा बांसुरी रसोई में कुछ कर रही थी, पीछे से जाकर वो उसे पकड़ने ही वाला था कि बांसुरी ने हाथ भर हल्दी उसके चेहरे पर मल दी, और वहाँ से भाग खड़ी हुई, उसके पीछे भागता भागता राजा बाहर पहुंचा तो सामने से उन दोनो का खाना लेकर आती भाभी से टकराते तकराते बचा, भाभी ने आश्चर्य से राजा को ऊपर से नीचे तक देखा और खाना टेबल पर रखती शिकायत करने लगीं__

  ” बांसुरी तो कह रही थी कि बाथरूम में आपका पैर स्लिप हुआ और मोच आ गयी, इसिलिए आप दोनो खाने पर नही जा पायेंगे, पर यहाँ तो ऐसा कुछ नज़र नही आ रहा।”

  ” अच्छा !! बांसुरी ने ऐसा कहा क्या?”

  ” क्यों ? आपने कोई और कहानी बनाई थी क्या?”

  राजा ज़ोर से खिलखिला उठा__

  ” क्या भाभी सा? कभी तो आपकी भी नयी नयी शादी हुई रही होगी, फिर भी आप हम नये नवेले जोड़े को वक्त नही दे रहीं! दिस इस नॉट फेयर!”

  ” आपकी रानी साहेब को कौन सा हम उठा लायें हैं आपके साथ ही तो रहती हैं आपके महल में, फिर ? हमें भी तो आपका कीमती समय चाहिये!”

  भाभी भी नहले पर दहला मार हँसने लगी___” ठीक है ठीक है, कुंवर सा आप लोग अपना क्वालिटी टाईम बिताइये हम चले अपने घर, किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो फ़ोन कर दिजियेगा, भिजवा देंगे।”

  राजा के पीछे से तब तक बांसुरी भी बाहर चली आयी, भाभी के सामने इधर उधर करती बांसुरी ने उनके साथ आये बन्टी को गोद में उठा लिया, जिसे बड़ी नज़ाकत से भाभी ने वापस ले लिया, और मुस्कुराती हुई बाहर निकल गयी।
       उनके जाते ही राजा गुनगुनाते हुए टीवी के सामने पसर गया__” यार बांसुरी अपनी वाली स्ट्रांग सी कॉफ़ी पिला दो, आज बड़े दिनो बाद मौका मिला है, बॉम्बे वाली यादें ताजा करने का”

   बांसुरी दो बड़ी बड़ी सी कप में कॉफ़ी के साथ कूकीज़ भी साथ ले आयी, दोनो अपनी पुरानी यादें ताजा करते साथ साथ कॉफ़ी पीते बैठे रहे।
     बांसुरी राजा को अपना शहर दिखाना चाहती थी, अपने बचपन की घूमी गलियाँ,अपना स्कूल कॉलेज दिखाने के लिये वो उसे साथ ले शहर नापने निकल गयी……

  **********


    होली की सुबह नहा कर पूजा पाठ करने के बाद निरमा ने कान्हा जी को गुलाल लगाया , और नाश्ते की तैय्यारी के लिये रसोई में चली गयी…..
     प्रेम ऊपर छत पर खड़ा आस पास होली खेलते लोगों को देख रहा था…..
    बगीचे के झूले पर निरमा को देख वो भी नीचे उतर आया , अम्मा के साथ निरमा रसोई में कुछ बनाने में लगी थी….वो उसे कहना चाहता था कि जब डॉक्टर ने आराम करने कहा है तो क्यों वो इतना काम कर रही है लेकिन उसके और निरमा के बीच अभी भी एक संकोच सा था जिसके कारण उसे सीधे कुछ बोलना प्रेम को सरल नही लगता था__

  ” क्या हुआ अम्मा? आपकी तबीयत सही नही है क्या?”

  ” हमार तबीयत को क्या हुआ बाबू, हम तो भले चंगे हैं।”

  ” फिर इनकी रसोई में क्या ज़रूरत अम्मा? इन्हें डॉक्टर ने आराम करने कहा है।”

  ” ज़रा सा नाश्ता बना लेने से मैं पिघल नही जाऊंगी, मैं ठीक हूँ, आप फ्रेश होकर आ जाइये, नाश्ता तैय्यार है।”

  ” मैं फ्रेश ही हूँ।”

   प्रेम को वहीं खड़ा देख निरमा प्लेट में जलेबियाँ और समोसे सजाये बाहर चली आयी__


  ” हम बहुरिया को बताये रहे कि बाबू को जलेबी बहुते पसंद है, तो आज सुबेरे से लगीं हैं जलेबी बनाने में…”

निरमा ने सोचा नहीं था कि अम्मा जलेबी वाली बात ऐसे झट से बोल पड़ेंगी,  वो प्रेम के सामने कट के रह गयी,  लेकिन फिर दिमाग को झटका दिए वो प्लेट सम्भाले बाहर चली आयी।

  ” काहे अपनी बहुरिया को रंग नहीं लगायेंगे भैय्या जी?”

सुमित्रा के सवाल का जवाब रंग गुलाल की थाली प्रेम के सामने रखते हुए दिया अम्मा ने __

  ” बहुरिया पेट से जो है ,ऐसे में रंग गुलाल का परहेज करना पड़ता है सुमित्रा,  कहते हैं ऐसे में रंग लगाने से बच्चा काला पैदा होता है पर हमें लगता है ऐसा शायद इसलिए कहते होंगे कि इन रंगों में जाने दुनिया जहान का क्या क्या मिला हो ? इससे होने वाली माँ और बच्चा दोनों को तकलीफ हो सकती है ना? इसीलिए बाबु ये सिर्फ मांग में और दुल्हन की चूड़ियों में गुलाल लगा दो ।”

   प्रेम  ने एक नजर निरमा को देखा,  निरमा नीचे सर किए जाने क्या सोचती खड़ी थी,  उसने अम्मा के हाथ से गुलाल की थाली लेकर एक ओर रख दी और प्लेट उठाए खाने में मगन हो गया
   सामने टीवी पर होली स्पेशल गीत माला चल रही थी,  उन्हें देखते प्रेम जलेबी खाने में मगन था …..

    मेरी हर मनमानी बस तुम तक
    बातें बचकानी बस तुम तक
     मेरी नज़र दीवानी बस तुम तक
   मेरे सुख-दु:ख आते जाते सारे तुम तक,
    तुम तक, तुम तक………

  प्रेम मन में जाने क्या सोचता बैठा था लेकिन नजर उसकी टीवी पर ही थी , पीछे से पड़ने वाली रोशनी के कारण निरमा टीवी की स्क्रीन पर दिखाई दे रही थी , वो एक फ्लॉवर वास तैय्यार करने के लिए पेपर मेसी कर रही थी और बार बार उसकी सामने की बालों की लट माथे पर झूल कर आंखों के सामने आ आ कर उसकी परेशानी बढ़ा रही थी , जिन्हें हाथ गंदे होने से वो हटा भी नहीं पा रही थी , उसकी झुंझलाहट को देखते बैठा प्रेम उठा और धीरे से भीतर चला गया,  निरमा की ड्रेसिंग से पिन उठाए वो उस तक चला आया और आते ही उसके सामने जाकर उसने पिन निरमा के आगे कर दी , पिन देख निरमा ने अपने मिट्टी से साने हाथ उसकी ओर बढ़ा दिए और धीरे से अपना चेहरा आगे कर दिया जिससे प्रेम पिन उसके बालों में फंसा सके….
     प्रेम ने उसे देखा और मुस्करा कर उसकी लट को माथे से पीछे सरका कर पिन लगा दिया ।
      उस वक़्त उसका दिल जैसे धड़क रहा था ये वो ही जानता था , आज तक इतने दिनों में जिसके शैम्पू की खुशबू उसे इतनी भाने लगी थी कि उस खुशबू से कई बार वो सुबह नींद से जाग जाया करता था , कभी मार्केट में कोई लड़की उसके करीब से निकलती जिसके बालों से वैसी ही खुशबु आया करती वो पागलों की तरह इधर उधर निरमा को ढूँढने लगता ये जानते हुए भी कि निरमा तो घर बैठी है …
    आज उसी खुशबू को अपनी उंगलियों में महसूस करना उसे अंदर से भिगो गया …..
     वो अपने में मगन था कि किसी ने उसे धीरे से आवाज दी , उसने पलट कर देखा तो सामने निरमा गुलाल की प्लेट लिए खड़ी थी,  उसके मुड़ते ही निरमा ने थोड़ा सा गुलाल उसके माथे पर तिलक सा लगाने के बाद थोड़ा गुलाल अपने हाथों में लिया और प्रेम के पैरों में लगा कर उसके पैर छू लिए,  प्रेम एकदम से इस बात के लिए तैय्यार नहीं था,  वो सकपका कर एक कदम पीछे हटने को हुआ लेकिन फिर चुप सा वहीं खड़ा रह गया , उसने निरमा को उठाया और प्लेट से अबीर लेकर उसके माथे पर तिलक लगा कर मांग में भर दिया,  ढेर सा गुलाल निरमा की  नाक पर गिर गया जिसे वो पोछने को कहने जा रहा था कि रसोई से निकलती अम्मा ने उसे टोक दिया __


” तुम्हारा प्यार गिरा है बहुरिया की नाक पर,  मत पोंछना। बहुत किस्मत की बात है बहुरिया जो ऐसा प्यार करने वाला पति मिला है, अब चाय भी पी लो,  नाश्ता तो निपट गया ना?”

  दोनों साथ साथ वहीं बैठ गए,  निरमा ने चाय प्रेम की तरफ़ बढ़ा दी और खुद चाय लेने से इंकार कर दिया…


  ” आप चाय काहे नहीं लेंगी दीदी?” सुमित्रा गुनगुना कर पूछते हुए टेबल पर का फैला सामान समेटती अंदर ले जाने लगी….

  “ऊ सिर्फ अपन आदमी के हाथ की चाय पीती हैं। ”

अम्मा की बात पर हंसती हुई निरमा ने चाय का कप उठा लिया __” ऐसी कोई बात नहीं अम्मा , मैं चाय कम ही पीती हूं। ”

   ” हम जानती हैं बहु आपको भी और आपकी चाय को भी ।”

   मुस्कराती अम्मा सामान समेटे अंदर चली गयी , निरमा की बतायी रसोई बनाने में लग गयी इधर निरमा अपने हाथों में ऊन उलझाए बैठी उसे सुलझाने की कोशिश में थी कि प्रेम ने भी दुसरी तरफ़ से उन उलझे धागों को पकड़ा और उसके साथ मिल कर सुलझाने में लग गया…….
      यही तो वास्तव मे दोनो कर रहे थे , अपने अपने जीवन के उलझे सुलझे तारों को सुलझाने की कोशिश , जिसमें अब दोनों को ही आनंद आने लगा था …..
   कभी किसी  मजबूरी में बोई बेल में अब फूल  महकने लगे थे, फल लदने लगे थे……
     दो अनजान परिंदों के तिनके तिनके जोड़ने से अब घोंसला सजने लगा था….
   प्रेम और निरमा की बगिया लहराने लगी थी।

  *********

    होली का पूरा दिन प्यार भरी रूमानियत के साथ बीत चुका था , राजा को रात में ही वापस लौटना था,  उसने बांसुरी से कहा भी की वो रुकना चाहे तो दो एक दिन रुक जाए लेकिन वो भी साथ ही जाने की रट लगाए रही।
    माँ वीणा दी पापा ताई बुआ किसी के समझाने पर भी वो राजा को वहाँ से अकेले जाने देने को राजी ना हुई,  और राजा के साथ ही उसने अपना सामान भी बाँध लिया,  उसे जल्दी जल्दी सामान बाँधते देख ताई ने मुस्करा कर आंखे पोंछ ली __” बिटिया सयानी हो गयी प्रमिला तेरी। ”

    सबसे विदा ले दोनों निकल गए,  फ्लाईट में बैठे ही थे कि समर का फोन आ गया __

  ” हुकुम आप चल चुके हैं ना ?”

  ” हाँ! कहो समर ?”

  ” जी एक समस्या थी,  वहीं बतानी थी आपको!”

  ” हाँ बोलो,  अभी फोन बंद करने में वक़्त है,  तुम जल्दी से बता दो क्या बात है?”

  ” हुकुम! विजयराघवगढ़ की सीमा से लगे गांव कोसा जो आपकी रियासत का हिस्सा है कि बात है,  आपको एक बार पहले भी बताया था मैंने….
    कोसा गांव के लोग आज शाम आप से  मिलने आए थे,  वो गाँव की प्राथमिक शाला की शिक्षिका के खिलाफ आवेदन देने आए थे। ”

  ” प्राथमिक शाला की शिक्षिका माने अहल्या रघुवंशी के खिलाफ?”

  ” जी हुकुम! “

  ” उनका केस आपको याद तो होगा ही?”

  ” समर उस समय मैं रियासत पर ध्यान ही कहां देता था,  शायद आज से दस साल पहले की बात होगी ना ?”

” जी हुकुम उस समय आपके पिता महाराज राज गद्दी पर थे…
    हुआ ये था कि अहल्या मैडम शहर से आयी थीं और यहाँ गांव के बच्चों को जब उन्होंने शहर से दूरी के कारण पढ़ाई छोड़ घर बैठते देखा तो अपने पति के साथ वो गाँव में पाठशाला खुलवाने के प्रयासों में लग गयी,  उस समय के नेता जी का खुद का बड़ा प्राइवेट स्कूल-कालेज सब था,  वो इन्हीं कारणों से गांव में पाठशाला खुलने के खिलाफ थे,  क्योंकि गांव के चंद रईस लोग नेता जी के स्कूल में बच्चों को पढ़ने भेजा करते ही थे….
    लेकिन जब अहल्या मैडम और उनके पति की भाग दौड़ से स्कूल को रजामंदी मिल गई तब नेता जी चिढ़ बैठे और उन्होंने स्कूल ना खुले इसके लिए बहुत प्रयास किए,  तरह-तरह के प्रलोभन से भी जब कोई लाभ नहीं हुआ तब वो उन दोनों लोगों को डराने धमकाने लगे…और अखिरकार अपना आखिरी हथियार उन दोनों के खिलाफ ईस्तेमाल कर ही लिया।
   पहले अहल्या के साथ जबरदस्ती की फिर उसके सामने ही उसके पति को मौत के घाट उतार दिया….. उन लोगों ने सोचा अब वो चुप बैठ जाएंगी,  लेकिन चुप बैठने की बजाय जब वो पुलिस के पास मदद के लिए पहुंच गई तब पुलिस प्रशासन सब को अपनी तरफ़ मिला कर उल्टा उसे ही उसके पति की हत्या के जुर्म में फंसाने की कोशिश की जिसके बाद वो बड़ी मुश्किल से अपने कुछ हितैषियों के साथ महल पहुंची लेकिन आपके पिता के समक्ष अहल्या के पहुंचने के पहले नेता जी की रिपोर्ट पहुंच गई और सबूतों के अभाव में आपके पिता महाराज भी कुछ नहीं कर पाए और अहल्या को पुलिस पकड़ कर ले गई।
     कोर्ट कचहरी के चक्करों के बाद ठोस सबूत ना मिलने पर भी उसे दस साल की जेल की सजा काटनी ही पडी।
    अब वो अपनी सजा पूरी कर बाहर आ चुकी हैं,  और पिछले एक महीने से पूरी सक्रियता से अपनी पाठशाला के काम से जुड़ गयी है,  और अब जैसे ही नेता जी के बेटों को पता चला वो वापस उनके पीछे पड़ गये हैं। 
     हुकुम नेता जी और उनका परिवार अब इनकी जान का दुश्मन बन चुका है,  उन लोगों ने गांव के कुछ लोगों को इकट्ठा किया और आपसे ये निवेदन करने आए थे कि उस महिला को गांव से बाहर किया जाये। ”

  ” तो ये बात है ! वैसे समर मैं रात में पहुंच जाऊँगा,  तुम महल में इंतजार करना मेरा ।
    मैं कल सुबह ही इस केस का निपटारा करना चाहता हूं।  अच्छा एक बात बताओ,  हमारे महल के मेहमानों वाले हिस्से मे कितने कमरे खाली हैं?”

   राजा की बात सुनकर समर दुसरी तरफ़ मुस्करा उठा

  ” महमानों वाले महल में लगभग चालीस कमरे है हुकुम जिनमे से कुछ को कुछ प्राचीन धरोहरों को सहेजने के कारण बंद रखा गया है, कुछ वैसे ही बंद है लेकिन तब भी बाईस कमरें रहने लायक दुरुस्त खाली पड़े हैं। ”

  ” ठीक है अब बाकी बातेँ मैं वहां आ जाऊँ,  फिर करते हैं। ”

  फ्लाइट के उड़ने की घोषणा के साथ ही राजा ने फोन बंद कर एक और रखा और इतनी देर से उसे देखती बैठी बांसुरी को अहल्या रघुवंशी की कहानी सुनाने लगा।

    रात में उन लोगों को लेने एयरपोर्ट पर प्रेम के साथ समर भी था , जो अपने साथ अहल्या रघुवंशी की सारी जन्मपत्री साथ लिए आया था,  भोपाल से विजय  राघव गढ़ की पूरी यात्रा दोनों ने सारी फाइल्स और काग़ज़ पत्र देखते हुए काटी और महल पहुंचने तक में राजा अपना निर्णय ले चुका था।

  *****

   अगले दिन सुबह जन दर्शन कार्यक्रम के बाद नेता जी स्वयं अपने पुत्रों, भाईयों अपने ओहदेदार करीबियों के अलावा गांव के गणमान्य लोगों के साथ राजा से मिलने पहुंचे हुए थे,  वहीं दुसरी तरफ़ सादी खादी की साड़ी में अपनी वकील सखी के साथ अहल्या भी पहुंची थी ।

    राजा से मिलने के पहले ही एक से एक महंगे तोहफे राजा की सेवा में वो प्रस्तुत कर चुके थे,  जिनका सारा हिसाब किताब समर के पास उन लोगों ने लिखा भी दिया था,  हालांकि उनके बार बार इसरार करने पर की ये सारी बाते राजा के कानो में डाल दी जाएं, समर उन्हें आश्वासन देने के बाद भी राजा के सामने चुप लगाए खड़ा था।

   दोनों पक्ष की दलीलें शुरू हुई,  अहल्या पर आरोप प्रत्यारोप का दौर चला,  उसे चरित्रहीन कुलटा साबित करने में उन्होंने कोई कसर ना रहने दी…..
    नेता जी की तरफ़ से किए दोषारोपण इतने कटु थे कि वहां बैठे सभी लोगों का खून खौल उठा,  वहाँ प्रस्तुत अधिकतर लोगों की सम्वेदना नेता जी की तरफ़ थी, लोगों में ऐसा रोष था कि अहल्या को तुरंत निर्वासित करने की पुकार मचने लगी,  लेकिन सभी को शांत करवाने के बाद राजा ने अहल्या से अपना पक्ष रखने की बात कही l
    अहल्या ने सिलसिलेवार अपनी बात रखनी शुरू की,  वो सारी जानकारी जो समर ने उसके बारे में इधर उधर से जुटाई थी से मिलती सी ही थी।
    पूरे धैर्य और संयम से दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद राजा ने कुछ समय मांगा और समर और युवराज भैया के साथ भीतर विचार विमर्श को चला गया।

     लगभग दो घंटे में वो सारे कागज़ात की जांच कर चुका था, समर और युवराज भैया से विमर्श करने के बाद जब वो अपना फैसला देने जा रहा था तभी समर ने उसे एक और बात बता दी __

  ” हुकुम! एक बात और कहनी है,  ये कुछ तोहफे भी माननीय नेता जी की ओर से आए हैं,  कृपया इन पर भी एक नजर कर लीजिए। ”

  ” उन पर तो पहले ही नजर जा चुकी है समर! अब तो मेरी नज़रों की हद नेता जी पर जाकर ही ठहरेगी।”

  ” जी हुकुम!”

  मुस्कुरा कर राजा के पीछे सारे जरूरी कागज़ात लिए समर भी दीवानखाने में चला आया।

  ” कुमार देखना,  कहीं ज्यादा नाराजगी में खूब कड़ी सजा ना दे देना। ” युवराज भैया की बात पर राजा ने पलट कर अपने बड़े भाई का आशीर्वाद लिया और अपने निर्णय को सभी को सुनाने आगे बढ़ गया।…..

क्रमशः


   
aparna….

   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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