जीवनसाथी-63

जीवन साथी-63



   ”  हुकुम! एक बात और कहनी है,  ये कुछ तोहफे भी माननीय नेता जी की ओर से आए हैं,  कृपया इन पर भी एक नजर कर लीजिए। ”

  ” उन पर तो पहले ही नजर जा चुकी है समर! अब तो मेरी नज़रों की हद नेता जी पर जाकर ही ठहरेगी।”

  ” जी हुकुम!”

  मुस्कुरा कर राजा के पीछे सारे जरूरी कागज़ात लिए समर भी दीवानखाने में चला आया।

  ” कुमार देखना,  कहीं ज्यादा नाराजगी में खूब कड़ी सजा ना दे देना। ” युवराज भैया की बात पर राजा ने पलट कर अपने बड़े भाई का आशीर्वाद लिया और अपने निर्णय को सभी को सुनाने आगे बढ़ गया।…..

   राजा के दीवान खाने में वापस आते ही एक बार फिर दोनों पक्ष अपनी जगह पर खड़े हो गये,  नेता जी पूरी तरह आश्वस्त थे,  आश्वस्त होना बनता भी था क्योंकि अब राजशाही रह नहीं गयी थी,  कहीं ना कहीं राज परिवार भी सरकारी फरमानो को मानने को कटिबद्ध थे,  राजा भले ही रियासत का राजा था लेकिन सरकारी कानून और सरकार के खिलाफ नहीं जा सकता था।
    उसने वहाँ पहुँचते ही सभी को एक नजर देखकर हाथ उठा कर अभिवादन किया और अपनी राजगद्दी पर बैठ गया,  उसके बैठते ही समर ने उसके सामने उसके लिखे कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं का पन्ना सामने रख दिया,  उस पर एक नजर डाल राजा ने बोलना शुरू किया __

  ” जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि नेता जी का शिक्षा से बहुत अधिक स्नेह हैं,  इनका सपना है गाँव का हर बच्चा बच्चा पढ़ने जाए और पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा हो …..गांव में सुविधाओं के अभाव के कारण इन्होंने स्कूल-कालेज सब खोले लेकिन शहर में।
    ये नेता जी का बड़प्पन ही है कि वो गाँव के बच्चों को भी समय समय पर पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैँ।
    इन्होंने बच्चों की शिक्षा के लिए जो और जितना किया है वो कोई और साधारण व्यक्ति कभी नहीं कर सकता,  इनकी भलमनसाहत है कि आज तक इतना सब करने पर भी इन्हें इस बात का कोई घमण्ड नहीं है ।”

   राजा की बाते सुनकर वहाँ बैठे सभी के चेहरे खिल उठे एक मात्र अहल्या ही चुप सी बैठी रही।


  ” नेता जी का जीवन एक प्रेरणा है युवाओं के लिए,  नेता जी के आज तक के किए कार्य देखते हुए इन्हें शिक्षा मंत्री बनाने के  लिए कई लोगों ने आग्रह किया लेकिन मुझे लगता है नेता जी हमारे राज्य के मुख्यमंत्री बनने चाहिए,  खैर वो तो बाद की बात है…जब भी ये परिचर्चा मेरे सामने हुई मैं जरूर इस बात को अपनी तरफ़ से रखूँगा।
     अभी इनका जो विवाद है फ़िलहाल उसका निपटारा आवश्यक है।
   मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है कि अहल्या मैडम और नेता जी के बीच वाद विवाद की स्थिति निर्मित होने के पीछे कुछ गलतफहमियां हैं,  क्योंकि ये दोनों ही लोग शिक्षा के प्रति समर्पित लोग हैँ।
    मैं समझता हूं ऐसे में कई बार कुछ छोटी गलतफहमियां बड़े विवादों को जन्म दे जाती है। ”

  राजा अभी अपनी बात कह रहा था कि नेता जी बीच में बोल पड़े __

  ” हुकुम बात चरित्र की है,  ये औरत अगर चरित्र वान होती तो हमे कोई शिकायत नहीं थी,  लेकिन इसके दूसरे पुरुषों से भी सम्बन्ध हैं जो हमारे समाज के लिए सही नहीं हैँ। ”

   नेता जी की बात पर समर सामने आ खड़ा हुआ….

   ” माफी चाहूंगा नेता जी लेकिन परस्त्रीगमन या जार कर्म  में भारतीय दंड संहिता भी धारा 497 के तहत स्त्रियों को अपराधी नहीं मानती……
   हम  और आप भारतीय संविधान से ऊपर तो हैँ नहीं।  इसलिए इस तरह चरित्र प्रमाण पत्र हम और आप नहीं दे सकते।  रही बात इनके स्वभाव की तो अब तक हुकुम को अहल्या रघुवंशी की जितनी रिपोर्ट मिली उसमे इनके चरित्र पर कोई दोष दिखाई नहीं दे रहा है,  हुकुम तो सबूतों पर टिके हैं….ये आप भी भले से जानते हैं। ”

   समर ने अपनी बात पूरी कर राजा की ओर देखा,  राजा ने उसकी बात समझ अपनी बात आगे कहनी जारी रखी ___

  ” नेता जी मेरा यह सोचना था कि बीती बातों को भुला कर अगर आप दोनों शिक्षा के क्षेत्र मे एक साथ आगे बढ़े तो हमारा गाँव हमारा शहर आप दोनों की मंशा से आप के कार्य से जगमगा उठेगा। मैं जानता हूं आज तक आप अपने सारे कार्य खुद पूरी संतुष्टि के साथ और आत्मनिर्भरता से करते आए है,  इसीलिए शायद आपको किसी और का हस्तक्षेप रुचता नहीं है लेकिन ये भी एक सत्य है कि अगर दो मज़बूत खंबे एक साथ किसी छत को सहारा दे तो घर की मजबूती और बढ़ जाती है। ”

   नेता जी के साथ साथ उनके बेटो के भी सर के ऊपर से जा रही थी वो बात जो राजा कह रहा था।
  अभी तक उनकी प्रशंसा के राग आलापता राजा आखिर चाहता क्या था?

  बदहवास से नेता जी अपने आसन पर खड़े हो गए __

” हुकुम आप कहना क्या चाहते हैं? हमारी समझ में नहीं आ रहा?”

  ” नेता जी मैं बहुत साधारण सी बात कहना चाहता हूं,  और वो ये है कि आप अहल्या मैडम के साथ मिल कर शिक्षा के भार को स्वीकार करें,  आप ने आज तक जितना कुछ शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए किया है अब उसका फल मिलने का समय है , अब आप सेवानिवृत्त होकर सब गाँव की शिक्षा का प्रभार अहल्या रघुवंशी जी को सौंप दे और या फिर उनका सहयोग करते हुए उनकी इच्छा को पूरा करने में सहयोग दें। “

  ” हुकुम ये सरासर नाइंसाफी है,  हम इतनी देर से आपसे कह रहे हैं कि हम इस नीच और कुलटा औरत का मुहँ नहीं देखना चाहते,  आप बस इतना कीजिए कि इसी वक़्त इसे गाँव से बाहर कीजिए। ”

   इतनी देर से रखा धैर्य का प्याला सहसा छलक उठा,  राजा वैसे तो हर वक़्त अपने मन पे गुस्से पे नियंत्रण किया होता था लेकिन जब बात किसी औरत के सम्मान की हो तब उसका भी धैर्य चूक जाया करता था। नेता जी की बात सुन उसका भी पारा उबलने लगा, गुस्से की थरथराहट को भी संयम की चादर से ओढ़ ढंककर वो एक बार फिर अपनी नर्म मुलायम आवाज में उनसे अपनी बात कहने लगा __

  ” देखिये नेता जी , वैसे मैं अच्छों के लिए  अच्छा हूं तो बुरे के लिए बहुत बुरा भी हूं।
  यहाँ हुकुम आप नहीं मैं हूं,  यहाँ इस रियासत में मेरा हुकुम चलता है इसलिए आज भी मुझसे उम्र में बड़े होने पर भी आप मुझे हुकुम बुला रहे लेकिन आपकी ये बात अच्छी नहीं लगी कि आप मुझे सिर्फ ऊपरी तौर पर हुकुम बुला रहे , लेकिन कर तो आप अपने ही मन की है?
    अब तक मैंने पूरे धैर्य और संयम से काम लिया लेकिन आपको शायद मेरी बात पसंद नहीं आयी। ”

  राजा की बात पूरी भी ना हो पायी थी कि नेता जी का बेटा बीच में ही कूद पड़ा।

  ” आप राजा हैं इसलिए आपका हुकुम सर आंखों पर लेकिन न्याय और विधि भी कोई चीज है कि नहीं?”

  राजा ने एक नजर उसे देखा और नजर नेता जी की तरफ़ फ़ेर ली __

  ” न्याय और विधि तो दस बरस पहले भी था लेकिन उसका कितना पालन हुआ इसकी सारी खबर सबूतों के साथ मेरे पास है,  रही बात आज के सन्दर्भ में मैं न्याय का कितना पालन करता हूं,  या करना जानता हूँ तो आपको बता दूँ कि मेरे साथ भारतीय दंड संहिता और विधान की चलती फिरती किताब घूमती रहती है और वो है ये समर!
    बाते तो बहुत सी हैं नेता ज़ी ! मैं गड़े मुर्दे उखाड़ना नहीं चाहता था,  मैं चाह रहा था कि मामला प्रेम स्नेह से सुलझ जाए लेकिन आप ऐसा नहीं चाहते दिख रहे तो फिर आपकी ही मर्जी सही लेकिन इस सब में आपका कोई नुकसान हुआ तो जिम्मेदार मैं नहीं माना जाऊँगा। ”

  ” आप कहना क्या चाहते हैं ?”

  राजा ने समर की ओर देखा, वो हाथों में कुछ काग़ज़ थामे सामने चला आया __

  ” नेता जी आज से दस साल पहले आप ने और आपके गुर्गों ने अहल्या रघुवंशी के साथ जबरदस्ती की और उनकी आंखों के सामने उनके पति की हत्या कर दी जिसके झूठे इल्ज़ाम में आप उन्हें कारावास भी करवा चुके हैं…..
   समर की बात पूरी भी ना हो पायी थी कि नेता जी बीच में ही बोल पड़े…..

  ” झूठ है सब,  कोरी बकवास है,  आपके पास क्या सबूत है इस बात का?”

  ” सबूतों को ही तो गायब करवा दिया गया था नेता जी वर्ना एक बेगुनाह क्यों सजा पाती? लेकिन हमारे पास तथ्य हैं जिन पर हुकुम को भरोसा है औऱ इसीलिए उन्होंने आप की गलती होने के बावजूद उसे नज़र अंदाज़ करते हुए आपको मौका देना चाहा…..

   ” अरे! फिर वहीं बात! कानून तो सबूत मांगता है,  आपके तथ्य कुछ भी हो अगर आप अपना वाद साबित नहीं कर पाए तो आप बेगुनाह हैं,  जैसे हम! और एक बात स्पष्ट कर दूँ हुकुम! अगर आज आप इस औरत के पक्ष में अपना फैसला दे भी दे तो कल को इस बात की क्या गारन्टी की ये स्कूल से आते जाते किसी ट्रक के नीचे ना आ जाए ? या राह चलते लफंगों की गोलियों या चाकू का शिकार ना हो जाए?तब ऐसे में आपके इन्साफ का क्या होगा? हम तो यही चाहते हैं कि औरत की जान बची रहे लेकिन ऐसा लग रहा इसे अपनी जान की कोई फ़िक्र ही नहीं , तो अब हम क्या करें। “

  अब की बार जवाब राजा ने दिया __

  ” आप सामने से धमकी दे रहे हैं नेता जी?”

  नेता जी मुस्करा उठे __

” हुकुम आपको धमकी देने की औकात कहाँ है हमारी ?  हम तो बस सचेत कर रहें हैँ!”

  
  ” जी नेता जी लेकिन अगर हुकुम अपनी पर आए तो क्या होगा जानते हैं आप? देखिये वाद तथ्य सबूत कानून सब अपनी जगह हैं,  बात तो सत्य है आपकी कल को रास्ते चलते ट्रक के नीचे अहल्या जी बिल्कुल वैसे ही आ सकती हैँ जैसे अभी इसी वक़्त गैर इरादतन आपकी हत्या हो जाए और करने वाले को सदोष मानव वध के ज़ुर्म में हत्या का दोषी ना पाकर महज कुछ मुचलके पर छोड़ दिया जाए।
    धारा 304 को मुझसे ज्यादा तो आप ही जानते होंगे,  समय समय पर इस धारा ने जाने कितने व्हाइट कॉलर्स को कानून के चंगुल से रिहा करवाया होगा।
    कानून संविधान हमारी आपकी सुरक्षा के लिए बना है,  हुकुम इस बात को जानते है और मानते भी है लेकिन इस सब से ऊपर वो एक बात को बहुत दिल दे मानते हैं और वो है दया और प्रेम का कानून।
   वो हर एक मनुष्य को उसकी बड़ी से बड़ी गलती पर भी माफ करना जानते हैं और उतनी ही उदारता से सामने वाले को माफ कर दूजा मौका भी देते हैं लेकिन जब चेदी राज शिशुपाल को भाई होते हुए भी सौ से ऊपर की एक सौ एकवी गलती पर स्वयं भगवान माफ नहीं कर पाए तो हुकुम तो इंसान हैं उनकी अपनी परिधि है,  उस परिधि से आगे जब कोई उनकी बातों को नकारता चला जाता है तब फिर हुकुम नहीं उनकी टाइटेनियम गोल्ड सुपर ईगल यानी इनकी रॉयल गन बोलती है।
    वो भी बिल्कुल गैर इरादतन!”

  समर की बात पर नेता जी तमक उठे


” आप तो खुलेआम धमकी दे रहें हैँ !, ये क्या है हुकुम?”

  राजा ने अपने चिर परिचित सौम्य अंदाज में ही अपनी बात रखी __

  ” जी धमकी की शुरुआत तो आपने ही की थी,  और जहाँ तक समर की बात है वो मुझसे अधिक मुझे जानने लगा है , उसे शायद लगा हो कि बातेँ मेरी हद से आगे निकली तो कहीं मैं गन ना निकाल लूँ।  लेकिन आप विश्वास रखिए ऐसा कुछ नहीं होगा,  आपके चारों तरफ़ फैली मेरी सिक्योरिटी मुझे गन निकालने की नौबत ही ना आने देगी। ”

  नेता जी के साथ साथ उनके संगी साथियों का भी गला सूखने लगा….
    उन लोगों ने आसपास नजर दौड़ाई और खुद को राजा की सिक्योरिटी से घिरा पाया।
  राजा के पिता उसके दादा आदि राजकाज में श्रेष्ठ होने के साथ ही उस समय सत्ता में उपस्थित सरकार से भी बना कर रखने वालों में से थे, था तो राजा भी उन्हें में से एक लेकिन इसकी न्याय के प्रति कटिबद्धता उसे बाकियों से अलग करती थी।
    जब से राजा गद्दी पर बैठा था उसके अपने नियम कानून बन गए थे,  उसकी रियासत में चोरों उठाईगिरो के लिए कोई  स्थान ना था,  अगर कोई चोरी की शिकायत लेकर आता तो वो उस चोर को किसी ना किसी आजीविका का साधन मुहैय्या करा देता जिससे उसे आगे चोरी करने की आवश्यकता ही ना रहे,  उसके राजपाट में यही हाल हर तरफ़ था लेकिन बार बार मौका देने पर भी ना सुधरने वालों के लिए उसके अपने नियम थे ।
 
  उन नियमों की बानगी एक आध बार नेता जी देख चुके थे इसी से वो इतनी देर में पहली बार थोड़ा घबरा गए।
      नयी उम्र और नए ज़माने के इस सनकी राजा का क्या भरोसा, कहीं सच मे वहीं अपनी जगह बैठे बैठे ही उसे गोली मार दी तो! वैसे भी उसके अचूक निशाने के किस्से रियासत में लोगों के बीच प्रसिद्ध थे।
   
   उन्हें लगा कहीं सच में राजा साहब के आदमियों ने उन्हें और उनके कुनबे को वहीं मार कर महल के बगीचे में दफन भी कर दिया तो यहाँ उपस्थित किसी के हलक से ये बात नहीं निकलने वाली की राजा ने ऐसा किया है और सिर्फ एक सड़े से स्कूल की जिद के कारण उनके पूरे वंश का नाश उन्हें हानि का सौदा लगने लगा।
   अपनी जिद को खुद में समेटने की कोशिश करते नेता जी ने राजा के सामने हाथ जोड़ ही दिए।


  ” आप चाहते क्या हैं सरकार?”

  ” नेता जी मैं बिल्कुल सीधी सी बात कह रहा हूं,  यही मेरा निर्णय है और यहीं मेरी इच्छा,  इसे मानना नहीं मानना आप दोनों पक्षों पर निर्भर करता है।
    अहल्या रघुवंशी जी जो स्कूल गाँव में चलाना चाहती हैं वो उसी प्रकार चलता रहेगा,  उसके कार्यकलाप में कोई बाधा ना आए इसके लिए आप अपने स्कूल प्रबंधन की तरफ़ से कुछ अच्छे शिक्षको के साथ ही पाठशाला के लिए आवश्यक पाठ्य सामग्री पुस्तकें कुर्सियाँ टेबल पीने के पानी के लिए फिल्टर,  सुरक्षा के लिए मुख्य गेट तथा सभी दरवाजों के ताले स्टाफ रूम के लिए आलमारी आदि का प्रबंध करेंगे और समय समय पर स्कूल की व्यवस्था देखना भी आपका काम होगा।
   आज से आपको उस स्कूल का ट्रस्टी भी बनाया जाता है,  उस पाठ शाला का हर फण्ड आप अहल्या जी मिल कर तय करेंगे और एक बार युवराज भैया से सलाह कर आप उस फण्ड का सदुपयोग कर पाएंगे।
   आज से महल से एक निश्चित राशि जो पाठशाला के सुचारू रूप से चलने के लिए आवश्यक है अहल्या मैडम और आपके संयुक्त खाते में डाली जाएगी जिसका उपयोग आप लोग युवराज भैया से विमर्श के बाद ही कर पाएंगे।
   इस सब के साथ एक और बात अगर अहल्या मैडम की किन्ही संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है तब उस स्थिति में नेता जी आप और आपके परिवार को जिम्मेदार मानते हुए मैं स्वयं राजा अजातशत्रु सिंह आपके खिलाफ कोर्ट में खड़ा हो जाऊँगा। ”

  ” पर हुकुम ये तो ज्यादती है! अगर किसी और ने हमसे बदला लेने इन्हें मार दिया तो हम बेकार में फंस जाएंगे ना!”

  ” बस उसी बेकार में  ना फंसने के लिए आज से आप इन्हें अपनी बहन मान कर इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद पर लीजिए जिससे कोई आपसे बदला लेने को भी इनका कुछ ना बिगाड़ सके। वैसे इनकी सुरक्षा के लिए ही आज से इनके रहने का प्रबंध महल के कर्मचारी आवास में किया जाता है, जहां इन्हें किसी प्रकार की असुविधा ना होगी.  .
   देखिए नेता जी जीवन सरल है हम  बिना वज़ह उसे कठिन बनाते हैं,  आपका शहर में अच्छा खासा स्कूल चल ही रहा था , काश आप ने इन्हें भी शांति से अपना काम करने दिया होता तो आज मामला यहाँ तक नहीं पहुंचता।  पर चलिए वो बात पुरानी हुई अब आप भी उस बात को उस विवाद की भुला कर एक नयी शुरुआत कीजिए और अहल्या जी का जो स्थान है वो उन्हें वापस कीजिए, मेरी बस इतनी ही आपसे प्रार्थना है। इतनी प्रार्थना ही करने की क्षमता है उसके बाद मेरे अन्दर का राजा जो सिर्फ हुक्म देना जानता है जाग जाता है,  अब आप सोच लीजिए आप क्या करना चाहते हैं। ”

  ” हुकुम और कोई रास्ता छोड़ा ही कहां आपने! अब तो वहीं करेंगे जो आप आज्ञा दे। ”

  इतनी देर में पहली बार अहल्या की आंखे चमक उठी,  उसे कहने को शब्द नहीं मिल रहे थे,  उसने आगे बढ़ कर राजा के सामने हाथ जोड़ दिए…..

  इतनी देर में पहली बार उसके मुहँ से शब्द निकले….

   “किन शब्दों में आपका आभार व्यक्त करूं राजा साहेब? मेरे साथ हुई इतनी ज़्यादती के बावजूद मुझे भगवान पर भरोसा था, मुझे इस बात पर विश्वास था कि अहल्या के साथ हुए अन्याय को तारने किसी ना किसी रूप मे सदा से राम आते रहे हैं और आते रहेंगे….
    आप मेरे राम बन कर आए और मेरे पाषाणवत जीवन को उबार गए..आप जैसों के कारण ही आज भी लोगों में न्याय के प्रति आस्था जिवित है।
   आपके सारे आदेश मेरे सर माथे लेकिन मैं बस ये कहना चाहती हूं कि नेता जी और कुछ दें या ना दें, बस इतना भरोसा दे दें कि मेरी पाठशाला और मेरे बच्चे सुरक्षित है बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए। ”

  ” राजा साहब की गोली खिला कर ही मानेंगी क्या बहन जी,  मैं अपने सारे अपराधों के लिए माफी मांगता हूं, आज से हुकुम के आदेशानुसार आप मेरी बहन होती हैं औऱ मैं आपकी रक्षा का वचन देता हूँ..”

   नेता ज़ी ने राजा के सामने हाथ जोड़ दिए….राजा ने वहीं बैठे बैठे उनकी तरफ़ हाथ जोड़े और एक नजर ऊपर दीवान खाने की परछी में बैठी उसकी सारी कार्यवाही सुनती बाँसुरी पर डाली, बांसुरी भी उस वक़्त उसे ही देख रही थी,  राजा के देखते ही उसने झट ऊपर से ही अपने दोनों हाथों से उसकी नजर उतार ली, उसकी इस हरकत पर भरी सभा में राजा शरमा कर मुस्करा उठा, उन दोनों की आँख मिचौली देखता समर भी मुस्करा कर सारे काग़ज़ समेटे दुसरी ओर चला गया…
    सभा की समाप्ति के साथ ही राजा के वहाँ से उठते ही एक एक कर सभी लोग उठते चले गए…. अहल्या के वहां रहने के समर द्वारा तैयार कागज़ों पर हस्ताक्षर करने के बाद बाकी के जरूरी कागज़ात देखता राजा समर के साथ कुछ बातचीत में व्यस्त था कि सहायिका के साथ चाय और कुछ स्नैक्स लिए बाँसुरी भी वहीं कार्यालय चली आयी….
     राजा और समर को चाय देकर वो अपनी चाय लेकर बैठी ही थी कि बाहर से एक नौकर समर साहब से कोई महिला मिलने आयी हैं जानकारी दे कर खड़ा हो गया…..
    समर से महल में कौन मिलने आ सकती है? समर खुद यही सोच रहा था कि रेवन वहाँ चली आई,  उसे वहाँ देख समर उससे कुछ पूछता की वो आगे बढ़ उसके गले से लग गयी , उसके होंठो पर अपनी मुहर लगा कर वो उससे अलग हुई तब उसका ध्यान वहीं बैठे राजा और बाँसुरी पर चला गया और वो एकदम से अपनी इस हरकत की कैफ़ियत दे उठी __

  ” मैं वापस जा रही हूँ समर! कल सुबह की फ्लाइट है, इसलिए अभी तुमसे मिलने चली आयी, मैंने सोचा आखिरी बार तुमसे मिल तो लूँ…”

  समर को खुद समझ नहीं आ रहा था कि राजा के सामने वो रेवन से क्या बोले,  वो कुछ कहता इसके पहले ही बाँसुरी बोल पड़ी….

   ” आप तो बहुत अच्छी हिन्दी बोलती हैँ, आपकी हिन्दी सुनकर लगता ही नहीं कि आप हिन्दुस्तान से नहीं हैं….”

   “थैंक यू! बाय द वे मुझे हिन्दी समर ने ही सिखाई है और आपके ये सारे कस्टम्स रिचुअल्स ,आपका ये रॉयल राजपूताना ये सब कुछ इसी ने बताया है…”

   बाँसुरी ने समर की ओर देखा वो बेचारा झेपता इधर-उधर बिना जरूरत के काम देखने लगा।

  ” सो मिस्टर रॉयल राजपूत आप की दोस्त आयीं हैं और आप उन्हे अकेला छोड़ इधर-उधर क्या टाईम पास कर रहें हैं। जाइए उन्हें क्वालिटी टाईम दीजिए…

    बाँसुरी की बात का जवाब समर की जगह रेवन ने दिया …..

  ” नो , नो नीड actually! हमने काफी सारा क्वालिटी टाईम स्पेंड किया है ,साथ में…. मैं तो बस मिलने आयी थी,  अब जाना भी है वापस!”

” ओह अच्छा! काफी सारा टाईम स्पेंड किया है? ” शरारती आंखों से समर को देख बांसुरी ने कहा और उसके अगले ही पल राजा ने रेवन को सहभोज के लिए आमंत्रित कर लिया..

  ” लेकिन जाने से पहले आज आप हमारी मेहमान हैं,  आज का हमारा आतिथ्य स्वीकार करें…..

   राजा की कहीं इस बात को काटने का सवाल ही ना था……
    फिर तो बाँसुरी उस विदेशीनि के स्वागत की तैयारियों में लग गयी,  महल के पीछे के जंगल से लगे बाग में बोनफायर के साथ ही लाईव तंदूर लगाया गया, एक तरफ़ गद्दीया और तोषक लगे दुसरी तरफ़ खाने पीने की व्यवस्था के साथ ही राजा बाँसुरी समर रेवन रूपा भाभी युवराज भैया जय जया और रेखा  के साथ ही विराट भी इस शानदार पार्टी का हिस्सा हो गया…..
     विराज अपनी आदत के मुताबिक बाहर कहीं घूम रहा था, उसकी अनुपस्थिति से किसी को कोई आश्चर्य भी नहीं था…
   
राजा ने प्रेम को भेज निरमा को भी वहीं बुलवा लिया,  सभी बैठे खाते पीते बातों में लगे थे….

   ” हिज मेजेस्टी आपके बारे में बहुत कुछ सुना है एंड बांसुरी आपके बारे में भी,  आपकी लव स्टोरी जानना चाहूंगी, अगर आप बताना चाहें तो….”

  ” हम तो बता देंगे पहले आप तो बताइए आप का मिलना कैसे हुआ?” बाँसुरी की बात पर रेवन बिना किसी झिझक के अपनी और समर की मुलाकात का सारा किस्सा कह गयी,  पहली मुलाकात के बाद कैसे इत्तेफाक से दोनों और भी एक दो बार कहीं टकराये और फिर तो सिलसिला चल निकला….
   हालांकि इस सारी बातचीत में रेवन ने एक बार भी विराज का नाम नहीं लिया….
    सभी अपनी-अपनी कहानियां सुनाने में व्यस्त थे,  हँसी मज़ाक़ चुहलबाजी के बीच खाना निपटा कर युवराज वहाँ से निकल गया लेकिन जया के साथ रूपा दुसरों को छेड़ती वहीं बैठी रही… सारे लोग राजा के पीछे पड़ गये __

” कुंवर सा हम तो बस ये जानना चाहते हैं कि आपको कब क्लिक किया कि आप बाँसुरी से शादी करना चाहते हैं और उन्हीं से प्यार करते हैं?”

  जया भाभी की बात सुन राजा के साथ बाँसुरी भी शरमा गयी,  सभी के बार बार पूछने पर राजा ने बांसुरी को देखा और कहने लगा __

  ” सच कहूँ तो इन्हें पहली नजर देखते ही मुझे ऐसा लगा जैसे मैं इन्हें बरसों से जानता हूं,  जब हम एक ही कूपे की एक ही बर्थ में थे…
    इनकी तो आदत है नींद का समय हुआ कि इन्हें जगाना मुश्किल है,ट्रेन भी जब हिचकोले खाती आगे बढ़ रही थी बाँसुरी एक कोने मे अपना सर टिकाये आंखे बंद किए बैठी और मुश्किल से 5 मिनट में इन्हें नींद आ गयी,  ये मेरे सामने बैठी सोती रही और मैं रात भर इस मासूम चेहरे को देखता रहा….

  बांसुरी ने आश्चर्य से राजा की तरफ़ देखा __” कभी मुझे कहा नहीं साहेब….”

  ” आज कह रहा हूँ! उस रात के बाद सुबह जब तुम्हारी नींद खुलने वाली थी मैं जानबूझकर वहाँ से चला गया,  मुझे लगा अब तुमसे कभी नहीं मिल पाऊँगा, लेकिन जब तुम्हारे फ्लैट पर पहुंचा तो एक बार फिर तुम्हें देख कर सुखद आश्चर्य में डूब गया…. अब इसके आगे की कहानी मैं नहीं बताने वाला,  इतना जानना आप लोगों के लिए बहुत है…”

  राजा अपनी ही बात पर हंस पड़ा ,उसे हंसते देख सभी मुस्कराने लगे,  रूपा भाभी की नजर अब निरमा पर थी….

  ” निरमा तुम भी तो कुछ सुनाओ,  है तो तुम्हारी भी पसंद की शादी,  ऐसे अपनी मर्जी से की शादी का भी अलग ही मज़ा है,  है ना?;

  रुपा की बात पे जया ने भी मुहर लगा दी…

  ” तुम्हें आखिर क्या पसंद आया प्रेम बाबु में?”

   निरमा ने एक नजर प्रेम पर डाली और मुस्करा उठी, 

  ” इनमें नापसंद करने जैसा कुछ है ही कहां, हर चीज़ हर बात ऐसी है कि इनसे जुड़ने वाला इंसान इनसे प्यार कर ही बैठे गा…”

  ” ओहो तो ये बात है, निरमा ने तो बता दिया अब आप भी अपने दिल का राज खोल ही दीजिये प्रेम बाबु?”

  प्रेम मुस्करा कर उठा और एक तरफ को आगे बढ़ सामने जलते अलाव की आग को ठीक करने लगा….

   ” प्रेम का सिर्फ नाम ही प्रेम है, बाकी प्रेम प्यार से इनका कोई लेना देना नहीं है….” अपनी कड़वी बात दुसरों को चुभा कर उसी समय कहीं से घूम फिर कर आया विराज वहीं बैठ गया…..

   ” नहीं ऐसा तो बिल्कुल नहीं है! प्रेम तो बहुत है इनके अंदर बस इन्हें दिखाना नहीं आता…

  निरमा के जवाब पर विराज ने वापस चौका लगा दिया __

  ” प्यार दिखाना नहीं आता लेकिन करना खूब आता है..” अपनी बात पर निर्लज्जता से हंसता बैठा विराज समर की ओर देखने लगा,  उसके आने के साथ ही एक एक कर रात के गहराने का बहाना सा कर सभी उठते चले गए…
     वापसी में फ्लाइट पकड़ने में होने वाली देर को देखते हुए रेवन भी उठ गयी,  उसके पीछे समर भी उसे एयरपोर्ट तक छोड़ने के नाम पर निकल ही रहा था कि विराज भी पीछे हो लिया….

   ” उस रात जब हमनें वहीं बात कही तो हमें थप्पड लगा दिया…. समर में क्या हीरे मोती जड़े हैं जो उसके साथ…..

    विराज की यह बात सुनने वाले वहाँ समर और रेवन के अलावा राजा भी है इस बात पर उसका ध्यान ही नहीं गया,  उसकी घटिया बात पूरी होने से पहले ही राजा का जोरदार थप्पड उसके चेहरे पर था….

  ” ये गलत है हुकुम!
       उस वक़्त पुलिस स्टेशन में पड़े आपके थप्पड के बदले आपने हमें लाख रुपये ना दिए होते तो जाने हम गुस्से में क्या क्या कर जाते.. लेकिन आज हम नहीं रुकने वाले…

  महल के बाकी लोग जा चुके थे,  वहाँ उस वक़्त राजा समर रेवन बाँसुरी और विराज के अलावा कोई ना था…

   राजा ने आसपास नजर दौड़ाई और फिर एक के बाद एक लगातार पांच थप्पड विराज को रसीद करने के बाद वो समर की ओर मुड़ गया….

   ” समर विराज को इसी वक़्त पांच लाख रुपये निकाल कर दे दो…”

  ” जी हुकुम!” विराज पर एक जलती निगाह डाल कर समर दीवान खाने की ओर बढ़ गया ….
    गुस्से की आग में जलता विराज भी अपने महल की ओर निकल गया…..
   राजा ने मुड़ कर बांसुरी कि ओर देखा, वो अपनी जगह खड़ी उसे ही देख रही थी, राजा ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ा दिया, उसका हाथ थामे वो उसके कंधे से लग कर चलने लगी….

   ” जैसे आप निराले हैं वैसे ही आपका न्याय भी निराला है साहेब..”

  ” और बिल्कुल हमारी तरह हमारी हुकुम भी निराली हैँ….

    दोनों मुस्कराते अपने कमरे की तरफ़ बढ़ चले, उनके नजरों से ओझल होते ही समर अपनी कार की तरफ बढ़ गया, गाड़ी में बैठी रेवन उसका इंतजार कर रही थी…
      गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ाते ही समर ने एक नजर रेवन पर डाली, वो अपलक उसे ही देख रही थी….

   ” thank you समर for everything….मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाऊँगी….”
   वो आगे बढ़ एक बार फिर उसके गले से लग गयी..

कुछ देर में समर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी…. गाड़ी में कोई पुराना गाना चलता रहा और दोनों एक दूसरे का हाथ थामे सुनते रहे…..

   ” भीगी सी वो रात, जो गुज़री तेरे साथ
      दिल ढूंढे वो समा….
      दिल है पागल…
      तू नहीं मेरे पास, नहीं मिटती मेरी प्यास..
      ये बरखा ये बूंदे…
      जब चलती है हवा
      कहता है दिल मेरा.
      तुमसे प्यार है, तेरी याद है……..

……….

क्रमशः

 
  aparna…

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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