जीवनसाथी-64

जीवन साथी-64


      वक़्त का पहिया अपनी गति से घुमता है, ना किसी के लिए थमता है ना किसी खास के लिए बढ़ता है, उसकी अपनी गति है, जिससे उसे चलना ही है..
    रतन के ट्रेनिंग में जाने की तारिख आ चुकी थी,  वो अपनी पैकिंग में व्यस्त था….

  ” रतन! सुनो एक बात पूंछे?”

  ” पूछो प्रिंसेस..”

  ” तुम्हारा जाना क्या बहुत जरूरी है?”

  हाथ का समान पलंग पर छोड़ वो उसे देखने लगा..

   ” हाँ! और नहीं तो क्या? मेरा जन्मों का सपना पूरा होने जा रहा है प्रिंसेस! LBSNAA में ट्रेनिंग करना जाने कितनों की आंखों का सपना होगा, मेरा पूरा होने जा रहा, क्या तुम खुश नहीं हो?”

  ” खुश तो हैं लेकिन समझ नहीं आ रहा तुम्हारे बिना यहाँ करेंगे क्या?”

  ” पढ़ाई करना बाबु! और क्या, ये जो समय मिल रहा इसे बिल्कुल गंवाना मत..

  ” अकेले कुछ नहीं कर पाएंगे रतन..तुम साथ होते तो अलग बात थी..”

” अब तक साथ ही तो था लेकिन मेरा साथ उत्साहवर्धन की जगह तुम्हें कमजोर करता है..

  ” ऐसा नहीं है रतन,  अकेले रहना बहुत मुश्किल है हमारे लिए…तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे?”

  ” बाबु सिर्फ पंद्रह हफ्तों की बात है, उसके बाद जहाँ मैं वहां मेरी प्रिंसेस..

  ” और इन पंद्रह हफ्तों में हम क्या करें? मायके भी नहीं जा सकते,.बोलो ना रतन?”

  ” अरे  मैं  क्या कहुँ पिंकी। तुम कहो तो नहीं जाता ट्रेनिंग में ,…..भाड़ में गयी ट्रेनिंग औऱ भाड़ में गई मेरी सीट। ऐसा करते हैं एक बार फिर दोनों मिल कर तैयारी करते हैं, जब इस बार दोनो साथ साथ सेलेक्ट होंगे तभी जाऊंगा मैं भी ……..

  ” अब ये हमारा मतलब थोड़े ही था, रतन तुम समझते ही नही कि हम कहना क्या चाहते हैं।

”  तो सही शब्दो में समझा दो ना, अब तुम्हारी इस ज़िद पर इतना ही कर सकता हूँ कि तुम्हारे प्यारे राजा भैया को यहाँ बुला लूँ, वहीं तुम्हें हैंडल कर पाते हैं।।”

  ” तुम्हें पता है ,की उनका नाम बस लेते ही हम मुस्कुरा उठेंगे इसीलिए उनका नाम लेते हो है ना?

   ” मेरे लिए तो किसी संजीवनी से कम नही है ये नाम राजा भैया!”

   पिंकी ने प्यार से रतन की तरफ देखा और उठ कर अलमारी से कपड़े निकाल निकाल कर खुद रतन के बैग में रखने लगी, वो भी चुपचाप बैठा राजा भैया के नाम की महिमा पर मुस्कुराता रहा…..
    किसी का फ़ोन आने पर रतन उठ कर वहाँ से बाहर चला गया और पिंकी आलमारी से कपड़े निकालती रही, एक तरफ का रैक खाली होते ही उसे एक डिब्बा सा नज़र आया, उसने उठा कर देखा एक गिफ्ट पैक था,  शंकित नज़रों से उसमें बंधे रेशमी रिबन को खोलते ही एक छोटा सा  गुलाबी टैग उसे नज़र आया जिस पर लिखा था….
   ” with luv  ….  प्रिंसेस।”

   पिंकी ने धीरे से डब्बा खोला , अंदर सोने के कर्णफूल झिलमिला रहे थे। वो आश्चर्य और खुशी से अभी उस डिब्बे को देख रही थी कि रतन ने उसे पीछे से अपनी बाहों में भर लिया, पिंकी पीछे मुड़ उसके गले से लग गयी….

  ‘ थैंक यू रतन ! थैंक यू सो मच! लेकिन ऐसे बेमौसम गिफ्ट क्यों? अभी ना तो हमारा जन्मदिन है ना हमारी एनिवर्सरी है ,न दीवाली न और कुछ ! फिर ?”

  ” तुम्हारे साथ मेरा हर दिन सेलिब्रेशन ही तो है प्रिंसेस! एक राजकुमारी होकर भी तुमने मुझ जैसे अति साधारण इंसान से न सिर्फ ब्याह किया उसे निभा भी रही हो, मैं जानता हूँ तुम्हारे पास हीरों जवाहरातों की कोई कमी नही, भले ही हमारी शादी कैसी भी परिस्थितियों में हुई हो तुम्हारे भाई ने गहने जेवरों में कोई कमी नही रहने दी फिर भी मैं तुम्हारा पति हूँ, मेरा भी तो तुम्हें कुछ देने का हक बनता है, मैं मेरी औकात भी जानता हूँ और इसीलिए जो गिफ्ट मेरे बजट का था मैं वही लेकर आया जिससे तुम्हें…..

पिंकी ने रतन के होंठों पर हाथ रख उसे चुप करवा दिया…..

  “आज के बाद खुद को साधारण इंसान और हमे राजकुमारी कहा और ये सारी औकात की बात की न तो हमेशा के लिए तुम्हें छोड़ जाएंगे। एक पत्नी का स्थान उसकी औकात उसके पति से ही होती है। हम राजकुमारी भुवनमोहिनी सिंह  थी लेकिन शादी से पहले , अब हम रत्नप्रकाश सूर्यवंशी की धर्मपत्नी श्रीमती भुवनमोहिनी रत्नप्रकाश सूर्यवंशी हैं, और बात बात पर हमारे पति की औकात दिखाने वाले तुम होते कौन हो?
    , वो यहाँ के भावी जिलाधीश हैं और जहाँ तक हमे पता है किसी भी जिले का सबसे बड़ा पद जिलाधीश ही होता है या आपके शिशु मंदिर में कुछ और पढ़ाया गया था सूर्यवंशी जी?”

  ” जी पढ़ाया तो यही गया था , और वैसे स्कूल कॉलेज से इतर भी बहुत सारा ज्ञान कमाया है आपके पति ने , आप चाहें तो मेरा ज्ञान आज़मा सकतीं हैं।”

    रतन ने आगे बढ़ कर पिंकी को गले से लगा लिया, प्यार में डूबे दोनों पंछी फिर अगले दिन से  संभावित बिछोह भूल कर रह गए।


   ******


  होली बीत चुकी थी फिर भी शाम होते ही गुलाबी सी ठंडक मौसम को खुशगवार बना जाती थी।
   प्रेगनेंसी में वैसे ही गर्मी कुछ अधिक लगती है उस पर निरमा की बात बात पर नहाने की आदत थी, शाम से वो मखाने भून भान कर चने के लड्डू बनाने में लगी थी, एक दिन उस ने अम्मा से सुन लिया था की प्रेम को चने के लड्डू बहुत पसंद हैं, आज शाम उसे सेहत भी ठीक लग रही थी इसलिए घी का कड़ाह चढ़ाये वो बेसन भूनने में लगी थी।
   लगभग एक घंटे की कड़ी मेहनत और आँच सह कर उसने लड्डू तो बांध लिए लेकिन खुद हद तक थक गई,नहाने की ज़रूरत महसूस करती अपने कमरे के बाथरूम में घुसी ही थी कि ध्यान आया यहाँ का नलका बहने लगा था इसलिए इसे ऊपर छत पर की टोंटी से अलग करने की वजह से इस बाथरूम में पानी नही आ रहा था,अगले दिन सुबह ही प्लम्बर के आने की आस थी।
    वो अपने कपड़े समेटे धीमे कदमों से ऊपर प्रेम के कमरे के बाथरूम में चली आयी।
    सुबह से प्रेम घर पर नही था, सुमित्रा भी सुबह की जगह आज शाम ही काम कर के निकली थी, ऊपर के कमरों में पोंछा करने के बाद उसने प्रेम के बाथरूम में ही सारा पानी बहाया और उसे वाइप करना भूल गयी।
       नहा के निकलती निरमा पानी में फिसल कर गिरी और उसकी चीख से उसी समय इत्तेफाक से घर का दरवाजा खोल कर घुसते प्रेम का ध्यान ऊपर गया और वो भागता सा ऊपर के कमरे में पहुंच गया।
     एक तो बढ़ा वजन दूसरा गिरने से लगी चोट से निरमा एका एक उठ नही पायी थी, प्रेम को वहाँ देखते ही उसकी जान में जान आ गयी।
   लेकिन उसकी एक न सुनते हुए प्रेम उसे तुरंत साथ लेकर अस्पताल की ओर भागा। सांतवे महीने में ऐसे फिसल कर गिरना निरमा और बच्चे दोनो की ही सेहत के लिए सही नही था।
   वहाँ आनन फानन डॉक्टर निरमा को अंदर जांच के लिए ले गयी। डॉक्टर के केबिन में लेटी निरमा को पर्दे की हल्की ओट से दरवाज़े के बाहर घबराहट में चहलकदमी करता प्रेम दिख रहा था….. उसकी घबराहट देख वो पीड़ा में भी मुस्कुरा उठी ..

   “इस इंसान को भगवान जाने किस मिट्टी से बना गए थे, क्या मर्द ऐसे भी होतें हैं?, आज तक अपने आस पास उसने औरतों को चीख चीख कर आदमियों के शक्की और बुरे स्वभाव का रोना रोते ही देखा था। उसके खुद के प्रोफेशन में वो आये दिन औरतों पर होने वाले अत्याचारों को महिमामंडित करती आई थी। लेकिन अब  ये एक अकेला इंसान उन हज़ारों लोगों पर भारी पड़ गया था। कैसा हृदय था इसका? , किसी दूसरे के बच्चे के लिए इतनी तड़पन?  क्या प्रताप खुद अगर होता तो वो भी ऐसा ही होता ? क्या वो भी उसकी इतनी ही देखभाल कर पाता ? क्या पता? शायद नही। क्योंकि प्रेम प्रेम है उनका किसी से कोई मुकाबला नही।
         “आप इतने अच्छे क्यों हैं प्रेम” खुद में खोई वो मुस्कुरा रही थी और डॉक्टर अपनी जांच में लगी थी।
  
     अस्पताल में डॉक्टर ने सारी जांच करने के बाद सोनोग्राफी करते समय प्रेम को भी भीतर ही बुला लिया …….

  ” बहुत लापरवाही है ये निरमा, तुम्हें पहले भी कहा था की पूरा आराम करना है और तुम कुछ न कुछ काम करती ही रहती हो, वो तो अच्छा हुआ बच्चे के पापा वहाँ उसकी सेफ्टी के लिए मौजूद थे वरना सोचो क्या होता?”

   ” आई एम सॉरी डॉक्टर!”

  निरमा की बात सुन डॉक्टर मुस्कुरा उठी

  ” मुझे नही इन्हें सॉरी कहो, बेबी तो इन्हीं का है ना, सो तुम्हारी ज़िम्मेदारी उनकी तरफ है मेरी तरफ नही। क्यों ठीक कहा ना मैंने मिस्टर प्रेम?”

  निरमा और डॉक्टर की बातों से बेखबर प्रेम की नज़र पूरी तरह से स्कैन स्क्रीन पर थी, उसे स्क्रीन पर उसका बेबी हिलता डुलता दिख रहा था, बच्चा कभी जम्भाई लेता , कभी आंखे मिचमिचाते हँसता, इसकी हरकतों को डिजिटल स्क्रीन पर देखता प्रेम पूरी तरह से खो गया था। डॉक्टर उसे देख मुस्कुरा उठी।

   ” हाँ जी ध्यान से देख लीजिए, आप के जैसा दिख रहा या अपनी माँ जैसा ” डॉक्टर की बात सुन प्रेम ने एक नज़र डॉक्टर को देखा और जाने किस धुन में अपनी मन की बात कह गया….

  ” अपनी माँ जैसा ही लग रहा ,बिल्कुल खुरापाती! ”

  कभी कुछ न कहने वाले प्रेम के मुहँ से खुद के लिए ऐसा सुन निरमा चौक कर  उसे देखने लगी…..  लेकिन प्रेम को कुछ बहुत रोचक सा मिल गया था ,उसकी नज़र स्क्रीन पर से हटने को तैयार न थी। स्कैन निपटने के बाद डॉक्टर ने कुछ ज़रूरी हिदायतों के साथ निरमा को उसकी लापरवाही के लिए एक बार फिर डांट लगाई और दोनों को वापस भेज दिया।
      एक बड़ी अनहोनी होते होते रह गयी थी, फिसलने के बाद निरमा भी कुछ पल को बहुत घबरा गई थी, लेकिन भगवान ने बचा लिया, यही सोचती उसने प्रेम से किसी मंदिर में दर्शन कर घर जाने की अपनी मंशा बताई और प्रेम की घूरती आंखों को नज़रअंदाज़ करती गाड़ी में जा बैठी।
   आज पहली बार प्रेम उससे नाराज़ लग रहा था, उसने गाड़ी आगे बढ़ते ही बहुत धीमी से अपनी बात रखते हुए सॉरी कहा जिसे अनसुना करता वो गाड़ी चलाता रहा, वो समझ गयी थी कि प्रताप को खोने के बाद बच्चे को वो किसी कीमत पर नही खोना चाहता था , एक बार फिर हिम्मत जुटा कर उसने प्रेम से सॉरी बोल ही दिया लेकिन इस बार हमेशा से खामोश रहने वाला प्रेम भड़क उठा …….

  ” क्या करूँ तुम्हारे सॉरी का? सोचो अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो मैं क्या करता निरमा ? ”

   प्रेम की चिंता उसके जीवन के लिए थी, बच्चे के लिए नही । ये समझ आते ही निरमा की आंखें भीग गयी, हे भगवान ! ये कैसी किस्मत लिखी है उसकी , आज ज़ोर ज़ोर से चिल्लाकर उसका मन कह रहा कि भगवान से कहे कि” मुझे हर जन्म में प्रेम ही पति प्रेमी दोस्त के रूप में देना”।
    अपने मन में घुमड़ती भावनाओं को संभाल न पाने के कारण उसके मन की भावनाएं आंखों के रास्ते उमड़ पड़ी। वो अपने आंसू जितना ही दबाना चाहती उतनी ज़ोर से बहे जा रहे थे, यहाँ तक की इतना दबाने पर भी उसकी रुलाई फूट पड़ी।
   प्रेम ने उसे रोते देख गाड़ी एक किनारे लगा कर खड़ी कर दी और तुरंत उतर कर उसकी तरफ चला आया। ऐसे किसी औरत को रोते उसने पहली बार देखा था, उसकी समझ से बाहर था कि वो उसे सांत्वना के दो बोल कैसे बोले।
    हालांकि निरमा के ऐसे गिरने से वो खुद एकबारगी उसके लिए बहुत घबरा गया था और अभी उसका जी चाह रहा था कि आगे बढ़ निरमा को गले से लगा ले लेकिन वो क्या सोचेगी, सोचता वो हाथ बांधे खड़ा रहा।
    जब वो उतर कर उसकी तरफ आया तब निरमा को लगा कि शायद वो उसे अपनी बाहों में भरने आ रहा पर हाय रे संकोच! एक दो मीठे बोल बोल कर वो हाथ बांधे खड़ा हो गया, वो तो खुद औरत थी ,कैसे आगे बढ़ती , चुपचाप आँसू बहाती बैठी रही। मन भर रो लेने के बाद चेहरा पोंछ उसकी तरफ देख ” मैं ठीक हूँ चलिए” कहते ही वो उसे भर नज़र देख अपनी साइड चला गया और गाड़ी एक बार फिर हवा से बातें करनी लगी।

  घर पहुंचने पर उसे उसके कमरे में पहुंचा कर वो उसके लिए दूध लेने रसोई में चला गया, निरमा को अस्पताल ले जाते समय उसने राजा को फ़ोन कर दिया था इसीसे बाँसुरी को भी पता था।
   निरमा अपने कमरे में फ्रेश होकर बैठी ही थी कि बाँसुरी का फोन आ गया….

” मरने के लिए और कोई जगह नही मिली तुझे बाथरूम के अलावा ?” बाँसुरी की गुस्से से भरी बात सुन कर भी निरमा ठंडी ही बनी रही

  ” नाराज़ न हो लाड़ो! नहाने गयी थी कि पैर फिसल गया।’

  ” तू और तेरा नहाना , दिन में चार बार कौन नहाता है भला ? सोच अगर बच्चे को या तुझे कुछ हो जाता तो प्रेम भैया का क्या होता? बेचारे इतना संभाल संभाल कर रखते हैं तुझे और एक तू है कि खुद का ख्याल भी नही रखती।”

  उनकी बात हो रही थी कि रसोई से थाली हाथ में थामे प्रेम चला आया , आते ही निरमा के सामने उसने थाली रखी और उसे घूरने लगा…

” ये क्या है?”

”  लड्डू हैं।”

” वो तो मुझे भी दिख रहा, लेकिन बनाये किसने?”

” मैंने!”

” क्यों?” प्रेम के इस क्यों का जवाब निरमा के पास नही था, वो क्या कहती कि तुम्हें पसंद है इसलिए बनाये या तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए बनाया करती थी इसीलिए बनाये।
    वो चुप सर झुकाये बैठी रही।

” डॉक्टर ने मना किया है ना ,फिर क्या ज़रूरत है इतना स्ट्रेस लेने की। लड्डू तो बाद में भी बनाये जा सकते हैं , अभी इतनी क्या ज़रूरत पड़ गयी थी?, अगर आपको खाने का बहुत मन था तो मैं बाहर से खरीद कर ले आता..एक बार बताना तो था कि लड्डू खाने हैं।”
   बिना निरमा की बात सुने ही फिर वो दूध का गिलास रख चला गया….निरमा भी समझ गयी थी कि उसकी लापरवाही प्रेम को बर्दाश्त नही हो रही थी।
    फ़ोन पर दूसरी तरफ बाँसुरी भी सब सुन रही थी,

  ” अच्छा हुआ ,सही डांट पड़ रही है तुझे ! तू है भी इसी लायक़। जब डॉक्टर ने आराम करने कहा है तो तुझे ज़रूरत क्या है ओलंपिक में भागने की। ”

” बड़ी आयी मुझे सीख देने वाली , पहले ये बता कि तूने दूध वाली बात राजा भैया को बताई या नही? ”

  निरमा के सवाल पर बाँसुरी कुछ देर को चुप रह गयी

  ” सच कहूँ तो उन्हें बताने की हिम्मत ही नही हुई। मैं जानती हूँ जैसे ही उन्हें पता चलेगा वो तुरंत मेनका का गला पकड़ कर उससे दूध में दवा मिलवाने वाले का नाम उगलवा लेंगे।”

  ” हाँ तो होना भी यही चाहिए।”

  ” नही निरमा ! तू समझ नही रही, अगर कहीं माँ साहेब का नाम आ गया तो साहेब बर्दाश्त नही कर पाएंगे। ”

  ” तू पागल हो गयी है क्या बाँसुरी? इतनी बड़ी बात कौन छुपाता है भला? तेरी जान पर बनी है और तुझे त्याग सूझ रहा, हद है।”

” निरमा मेरी बात को समझ , साहेब बचपन में ही अपनी माँ को खो चुके हैं , अब अगर छोटी माँ को खोना पड़ा तो उनके लिए ये बहुत बड़ा धक्का होगा। मेरा क्या है, मुझे तो जितने दिन का उनका साथ मिल जाये मेरे लिए बहुत है। मैं तो वैसे भी चाहती ही हूँ कि उनकी बाहों में मरूं।”

  ” वाह वाह ! मतलब जो आदमी अपनी सौतेली माँ की सच्चाई सहन नही कर पायेगा, वो अपनी बीवी की गिरती सेहत सह जाएगा है ना। तुझसे जैसे उन्हें कुछ लेना देना ही नही है, ऐसी बात बोल रही है बाँसुरी!
  

” मैं बस ये जानती हूँ की मैं बिना वजह मेरे साहेब का दिल नही दुखा सकती।”

  ” दिल दुखाने नही उन्हें सच्चाई बताने कह रही।”

  बाँसुरी से बातों में डूबी निरमा को ध्यान नही था की बहुत देर से प्रेम के साथ खड़ा राजा उसकी बात सुन रहा है।
    असल में निरमा के गिरने और अस्पताल जाने की बात सुनने के बाद से ही राजा प्रेम से मिलना चाहता था। घर वापस आने के बाद जब प्रेम ने फोन कर आज आने की असमर्थता जताई तो राजा खुद निरमा को देखने और प्रेम से मिलने चला आया था।
   प्रेम उसे लेकर निरमा के कमरे की तरफ जा ही रहा था कि दूध वाली बात शुरू हुई और दोनों दोस्त वहीं खड़े रह गए।

   आखिर राजा वापस मुड़ गया, लेकिन उसे रोकने के लिए उसे मनाते प्रेम की आवाज़ निरमा के कानों में पड़ गयी और उन दोनों को पीछे खड़े देख वो हड़बड़ा गयी, उसे शांति से बात करने का इशारा कर राजा प्रेम के साथ बाहर निकल गया।
    बाँसुरी से कुछ बहाना कर फ़ोन रख निरमा भी बाहर चली आयी।
    तीनों आमने सामने बैठे रहे, पर किसी की किसी से फिर कुछ कहने की हिम्मत नही हुई।
  
   आखिर हिम्मत कर प्रेम ने ही निरमा से सारी बात पूछी और निरमा ने शुरू से अंत तक की सारी बात उसे कह सुनाई।
   बाँसुरी की गिरती सेहत को भी महल के डॉक्टर द्वारा न पकड़ पाने के बाद बाँसुरी का उसके साथ शहर जाकर अपना चेकअप करवाना और उसकी खराब सेहत के पीछे जिम्मेदार गर्भनिरोधक गोलियों वाले दूध का नमूना जांच करवाने से लेकर उस नमूने में मिले ट्रेसेस सब कुछ।
    सारी बात सुन कर प्रेम का भी दिमाग घूम गया

कुछ देर शांत बैठे रहने के बाद राजा उठ कर जाने लगा ,जाते हुए उसने पलट कर निरमा से बस इतना ही कहा….

   ” वो नही चाहती कि इस बारे में मुझे कुछ भी पता चले तो प्लीज़ उसे इस बारे में पता मत चलने देना, तुम दोनों पर भरोसा है मुझे।”

   हाँ में सर हिला कर निरमा दरवाज़े पर खड़ी रह गयी।
    भारी कदमों से राजा महल की ओर चल पड़ा।

उसे जिस बात का डर था आखिर वही बात हो गयी थी। आज तक उस पर तो हमले होते ही आये थे लेकिन अब हमलों का टार्गेट बाँसुरी बनने लगी थी।
  उसके दुश्मन अच्छे से समझ गए थे कि उसे तोड़ना है तो उसकी सबसे प्यारी चीज़ ही उससे छीन ली जाए।
   महल में कई सालों पहले एक अलिखित नियम तय किया गया था कि अगर किसी राजा की गद्दी में रहते हुए असमय अकाल और असन्दिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है तो महल का सारा कारोबार उस वक्त पीठासीन सरकार के हवाले हो जाएगा और एक बंधी बंधाई निश्चित राशि जो पेंशन के रूप में मिलेगी और राजपूत सरनेम के अलावा उनका महल पर कोई अधिकार नही रह जाएगा।
   शायद महल में बढ़ते आपसी षड्यंत्रों के कारण ही ऐसा नियम बनाया गया होगा जिससे गद्दी पर बैठने वाला कम से कम अपनों के हाथों न मारा जाए।
   इसीलिए तो समर और युवराज भैया को उसकी ताजपोशी की इतनी जल्दी पड़ी थी।
   उसे गद्दी पर बैठा कर उसका जीवन तो उन लोगों ने काफी हद तक सुरक्षित कर दिया लेकिन बाँसुरी का क्या?
   अगर इसी तरह उसे दवा दी जाती रही तो उसका कोमल शरीर कब तक सहन कर पायेगा।
    कायदे से उसकी और बाँसुरी की संतान ही उसकी उत्तराधिकारी बनेगी और इसीलिए ऐसी दवा बाँसुरी को दी जा रही है जिससे वो माँ ही ना बन पाए।
   ये तो एक तीर से दो शिकार हो गए।
लोगों को आखिर क्यों सत्ता का इतना मोह होता है?
उसका बस चलता तो वो एक पल में ये राजपाट छोड़ बाँसुरी को साथ ले कहीं दूर निकल जाता लेकिन हाय री किस्मत! वो पैदा भी हुआ तो राजघराने में, जहाँ वो अपने मन से जी भी नही सकता।
    उसका जीवन तो उसकी जनता का था, और बाँसुरी का क्या? सिर्फ उससे प्रेम करने के बदले वो बाँसुरी को ऐसे तिल तिल मरते क्या देख सकता है?
   बाँसुरी की सुरक्षा के लिए उसे कोई कदम तो उठाना ही पड़ेगा , चाहे वो कदम कितना भी कठोर क्यों न हो?
  
       अपनी सोच में गुम वो अपने कमरे में पहुंचा तो बाँसुरी विराट से राजा के जन्मदिन की तैयारियों के बारे में बात कर रही थी, राजा को देखते ही उसने कुछ इधर उधर की एक आध बात बोल फ़ोन रख दिया।
     वो उसे ध्यान से देखता उसके सामने बैठ गया

” ऐसे क्या देख रहे हो?”

  ” ऐसा लग रहा ,बहुत दिनों बाद तुम्हें देख रहा हूँ।”

   ” क्या बात है? आज राजा साहब बड़े रोमांटिक मूड में हैं।”
   उसकी बात पर राजा हल्के से मुस्कुरा उठा

  ” मैं तो बचपन से ही रोमैंटिक हूँ, तुम्हें अभी पता चला।”

  ” हम्म बचपन में तुमसे मिली नही ना? ” अपनी बात कहते कहते वो दूध की ट्रे उठा लायी, राजा आगे बढ़ कर बाँसुरी वाली ग्लास उठाने लगा…

  ” अरे वो नही, ये सोने की ग्लास तुम्हारी है, ये वाली तो मेरी है।”

  ” तो क्या हुआ? अगर आज ग्लास बदल भी गयी तो ? दूध तो दूध ही है।”

  ” नही साहेब ! आप अपने ग्लास का ही पीजिये।”

  राजा ने सोने वाला ग्लास उठाया और बाँसुरी के मुँह से लगा दिया  , बाँसुरी ने हड़बड़ा कर ग्लास नीचे रख दिया

  ” पी लो ना , वैसे भी आज मैं दूध नही पियूँगा , आज ऑफिस में ज़रा सी ले ली थी ।”

  ” ओह्ह तो इसलिए इतने बहाने बनाये जा रहें हैं।” बाँसुरी ने दूध की ट्रे उठा कर दूसरी ओर रख दी

  ” कुछ परेशान हो क्या? चेहरे से बहुत थके से लग रहे हो?”

  ” हाँ ये राजकाज का काम है ही ऐसा ,  सरदर्द हो जाता है ।”

   बाँसुरी तेल उठा लायी और राजा के पीछे खड़ी हो धीमे धीमे हाथों उसके बालों में मसाज देने लगी

  ” अच्छा सुनो! कल कुछ ज़रूरी काम से मुझे शहर जाना है ।”

  बाँसुरी की बात पर राजा  हम्म बस बोल कर चुप रह गया, वो खुद भी नही चाहती थी कि राजा ज्यादा पूछताछ करे…. उसके जन्मदिन की तैयारियां ही इतनी थी कि दिमाग में सारा समय कोई नई योजना चलती रहती थी।
   जन्मदिन को पांच दिन शेष रह गए थे, अस्पताल का काम निपट चुका था, अस्पताल राजा के दादा राजा वीर विक्रम सिंह बुंदेला के नाम पर बनवाया गया था , उनकी प्रतिमा भी अस्पताल परिसर में लग चुकी थी, इस सारी तैयारी में बाँसुरी विराट के साथ लगी हुई थी, बीच बीच में दादी साहेब ,युवराज भैया और समर से भी विचार विमर्श होता रहता था लेकिन सभी को स्पष्ट रूप से उसने कह रखा था कि जन्मदिन के पहले राजा को किसी बात की भनक तक न होने पाए।

******

   अगले दिन सुबह राजा को किसी केस की सुनवाई के लिए दीवानखाने समय पर पहुंचना था, राजा होते हुए भी वो राजसी दिखावे से कोसों दूर था। अगर सुनवाई के लिए समर से उसे 10 बजे पहुंचने का समय बताया तो वो समय का पाबन्द ठीक 10 बजे अपने कार्यालय पहुंच जाया करता।
    उसकी आदत से परिचित उसके सारे मातहत भी उसी के हिसाबों में ढल चुके थे।
   आज का केस किसी दलित से संबंधित था इसी से समर से सारी जानकारी लेने वो थोड़ा पहले ही निकल गया। उसके निकलते ही बाँसुरी भी तैयार होकर विराट के साथ शहर के लिए निकल पड़ी ।

     चकाचक चमकते मॉल में वो अपनी पसंद की ब्रांड में राजा के लिए शर्ट ढूंढती घूम रही थी।
     राजा के प्यार में डूबी आंखों को उसके व्यक्तित्व से मेल खाता कुछ पसंद ही नही आ रहा था।
  उसे इतना समय लगता देख विराट ” भाभी साहेब आप कपड़े आराम से देखिए , हम आतें हैं। अगर आपकी शॉपिंग पूरी हो गयी तो आप हमें कॉल कर लीजियेगा।”
    इतना कह निकल कर दूसरी शॉप में घुस गया।

   बाँसुरी एक जगह से दूसरी घूम रही थी कि आखिर एक शर्ट पर उसकी नज़र अटक के रह गयी, वो उस हैंगर तक पहुंची और हाथ बढ़ा कर उसे उठाने ही जा रही थी कि एक अनजान हाथ तब तक में उस शर्ट तक  पहुंच चुका था।
   लगभग कुछ सेकण्ड्स आगे पीछे बाँसुरी और उसने एक साथ उस कमीज को थाम लिया।
    बाँसुरी ने देखा एक लगभग उसी की उम्र की लड़की वेस्टर्न ऑउटफिट में खुले बालों को लहराती उसे ही घूर रही थी।
 
   ” सॉरी लेकिन मेरी नज़र इस पर पहले पड़ी ।”

  बाँसुरी की बात पर मुस्कुरा कर उस लड़की ने अपनी बात रख दी,

  ” पर हाथ तो मेरा ही पहले पड़ा ना, नज़रों से कपड़े उठाये तो नही जा सकते।”

  ” हाँ आप सही कह रही लेकिन ये पहला पीस है जो मुझे पसंद आया है, यहाँ बहुत देर से घूम रहीं हूँ, कुछ पसंद ही नही आ रहा।”

  ” इसमें मेरी क्या गलती? अगर आपको भी वही शर्ट पसंद आ गयी जो मुझे?दो लोगों की पसंद एक भी तो हो सकती है?”

   ” जी गलती तो किसी की नही , ठीक है ऐसा करते हैं इसका दूसरा पीस आप रख लीजिए।”
   बाँसुरी अपने शब्दों में पर्याप्त विनम्र थी लेकिन सामने वाली को जैसे कोई फर्क ही नही पड़ रहा था।

   ” मुझे दूसरे पीस को लेने की आदत नही, आप ही दूसरा पीस क्यों नही ले लेती?”

   ” फाइन ! मैं ही ले लेती हूँ।”
   बाँसुरी ने स्टोर हेल्पर की ओर देखा

  ”  सॉरी मैम ये लास्ट पीस ही बचा है , वैसे एक साइज़ छोटे में शायद मिल जाये ।”

  बाँसुरी ने शर्ट को फैला कर देखा ,फिर अपने हाथों को और वापस स्टोर कीपर को देख ना में सर हिला दिया…

” साइज़ तो यही है साहेब का ! छोटा उन्हें आएगा नही, छै फ़ीट से कुछ ज़रा सा लंबे ही हैं।”

  बाँसुरी वापस उस अजनबी लड़की की ओर मुड़ गयी।

   ” देखिए मेरे हसबैंड का जन्मदिन है!  उस दिन उनके पहनने के लिए ये ले रही हूँ। बड़ी मुश्किल से कुछ मन का मिला है प्लीज़ इसे मैं रख लूँ?”

  ” आई एम सॉरी मैम! लेकिन मेरे भी बॉयफ्रेंड का ही बर्थ डे है , और मुझे भी इतनी देर से कुछ पसंद नही आ रहा था, और यही पीस मुझे भी पसंद आया है , और मैं अपनी पसंद के साथ कोई समझौता नही कर सकती।”

   बाँसुरी चाहती तो अपना रॉयल परिचय देकर राजा के नाम पर पूरी दुकान खरीद सकती थी , लेकिन सिर्फ इस नाचीज़ सी शर्ट के लिए वो अपने और राजा के सिद्धांतों का गला नही घोंट सकती थी।
    बड़ी मुश्किल से उसे ये शर्ट नज़र आई थी, इसके कुछ ज्यादा ही पसंद आने का एक और कारण था कि इसी रंग की साड़ी उस दिन उसे पहननी थी।
     पर वो सामने खड़ी उस अजनबी जिद्दी लड़की को क्या और कैसे समझाए वो इसी उधेड़बुन में थी कि वो लड़की अपने बाकी सामान के साथ उस शर्ट को लिए बिलिंग काउंटर की ओर निकल गयी, वापस उसे एक बार और मनाने बाँसुरी भी उसके पीछे हो ली….

  ” देखिए , एक बार मेरी बात ध्यान से सुनिए प्लीज़।”

  बाँसुरी की बात आधे में काट वो अपनी बात कहने लगी,

   ” आप शायद मुझे जानती नही इसलिए मुझसे इतनी ज़िद कर रहीं। मुझे किसी भी बात को बारबार कहने की आदत नही। ”

    अपने ब्लैक ब्लेज़र को एक तरफ करती, अपनी हाई हील्स खटकाती वो वहाँ से काउंटर की ओर बढ़ गयी, ठगी सी खड़ी बाँसुरी वापस कपड़ों के हैंगर की ओर चल पड़ी , मन मे तो उसके भी यही चल रहा था कि जानती तो वो भी उसे नही थी, वरना क्या रियासत की महारानी को कोई अदना सी लड़की ऐसे जवाब दे सकती थी भला?
    
     उसके कपडों के रैक पर पहुंचने तक में हेल्पर ने उसी रंग से मिलती जुलती कई शर्ट्स निकाल के उसके सामने रख दी, उनमें से दो उसने पसन्द कर के खरीद भी ली लेकिन उस शर्ट में जाने क्यों उसका मन अटका ही रह गया।

  राजा के लिए खरीदे बाकी सारे गिफ्ट्स लिए वो विराट के साथ महल वापस आ गयी लेकिन रास्ते भर जाने क्यों वो अजनबी अनजान लड़की उसके दिलो दिमाग पर छाई रही।
    एक बार देख कर सहज ही भूल जाने वाली शक्ल भी नही थी उसकी।

   इधर राजा के उस महल से दूर एक आलीशान बंगले के गेट से गुजरती एक काली बड़ी सी गाड़ी बंगले के पोर्च पर जा रुकी। 
    ड्राइवर के बाजू में बैठा वर्दीधारी उतरा और पीछे की तरफ का दरवाजा खोल चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया, गाड़ी में से बस एक शॉपिंग बैग हाथ में थामे वो उतर कर अपनी सैंडल बजाती चट फट घर की ऊंची सीढियां चढ़ गई, उसके पीछे से उसका हेल्पर बाकी सारे शॉपिंग बैग उठाये उसके पीछे भागता चला गया।

    अपने कमरे की लंबी चौड़ी बालकनी में खड़ी वो दूर आसमान को ताकती जैसे कुछ ढूंढने की कोशिश कर रही थी, तभी उसे अपने कमरे में पड़ा वो पैकेट याद आ गया।
   वापस कमरे में जाकर उसने उस शर्ट को बैग से बाहर निकाला , कुछ देर उस शर्ट को ध्यान से देखते रहने के बाद वो उसे लिए बाहर गैलरी के खुले स्पेस में चली आयी ।
   कमीज़ को ज़मीन में पटकने के बाद उसने अपनी जेब से लाइटर निकाला और उस कमीज को आग के हवाले कर दिया।
   धू धू कर जलती इक्कीस हज़ार की वो शर्ट कुछ ही पलों में राख के ढेर में बदल गयी।
     उन आग की लपटों को घूरती बैठी वो जैसे खुद ही से बातें कर रही थी …..

  ” तुम्हें कभी माफ नही करूँगी राजकुमार अजातशत्रु सिंह! एक एक कर तुम्हारी हर खुशी तुम से छीन लुंगी, जैसे आज तुम्हारी बीवी से ये सड़ी सी शर्ट छीन ली। वैसे ही एक दिन तुमसे तुम्हारी बीवी भी छीन लुंगी।
और तुम बस खड़े देखते रह जाओगे, जैसे कभी मैं खड़ी देखती रह गयी थी और तुम मुट्ठी से फिसलती रेत की तरह सरकते चले गए थे……


क्रमशः

aparna….

    


 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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