जीवनसाथी-65

जीवन साथी–65

 


          राजा से पहले भी जितने महाराज हुए थे सभी रियासत में प्रसिद्ध थे लेकिन राजा का राजपाठ अलग था, वो हर चीज़ से हर बात से जुड़ा था।
  ऐसा नही था कि वो करने वाला अकेला था लेकिन फिर भी अपने हर काम को खुद करना ही उसे भाता था, बांसुरी भी उसकी परेशानी और व्यस्तता समझती थी।
     कामकाज की अधिकता के कारण खाने पीने का भी समय निकालना उसके लिए मुश्किल होने लगा था, कभी कभी सुबह से निकला राजा शाम ढले ही लौट पाता,… और खाने पर उसकी राह देखती बाँसुरी भी भूखी बैठी रह जाती।
    मेनका भागती सी अंदर आयी ….

” रानी साहेब ! हुकुम आ रहें हैं।”

   बांसुरी के चेहरे पर रौनक चली आयी, मेनका के पूछने पर उसने खाना यहीं कमरे में लगाने कहा और अपनी किताबें समेटने लगी

   ” तो जब मैं नही होता हूं, तब मेरी हुकुम पढ़ाई किया करतीं हैं।”

  ” अरे कुछ काम का नही बस इधर उधर की कहानियाँ पढ़ती रहती हूँ।”
       
” तो काम का कुछ पढ़ लिया करो, मैंने तो शादी से पहले ही सिलेबस भेजा था तुम्हें।”

  ” अब वैसी पढ़ाई लिखाई नही होनी मुझसे, चलो आओ खाना खा लो।”

  ” मेरा तो ठीक है बाँसुरी मैं काम में रहता हूँ इसलिए नही खा पाता पर तुम क्यों भूखी बैठी रहती हो, अब कहोगी संस्कारों की बात है।”

  बाँसुरी खाना उसके सामने रखते हुए मुस्कुराने लगी

  ” संस्कारों की बात नही है साहेब! बात ये है कि मैं जानती हूँ तुम जब काम में रहते हो खाना पीना सब भूल जाते हो लेकिन फिर जैसे ही याद आता है कि घर पर बाँसुरी भी भूखी बैठी है काम निपटा कर मेरे पास भाग कर आने की कोशिश करते हो कि हम साथ साथ खा तो सकें।
     बीच में ठीक व्यवस्था हो गयी थी, ऑफिस ही तुम्हारा और समर भैया का खाना भिजवा दिया करती थी कम से कम समय से खा तो लेते थे उसके लिए भी मना कर दिया ? क्यों भला? “

   ” जिससे मैं तुम्हारे साथ बैठ कर दो निवाले चैन से खा तो सकूँ। अगर मेरे खाने को लेकर तुम चिंतित रहती हो तो क्या तुम्हारे खाने पीने के लिए मैं परेशान नही हो सकता…. अच्छा कल दोपहर तैयार रहना हमें बाहर जाना है!”

  ” कहाँ?”

  ” यूनिवर्सिटी का स्पोर्ट्स इवेंट खत्म हुआ है, कल उनका पुरस्कार वितरण है जिसके लिए मुख्य अतिथि हैं हम दोनों। “

  ” झूठे!!, मुख्य अतिथि तो बस आप होंगे, बुलाया बस आपको होगा, मुझे तो आप यूँ ही ले जा रहे। है ना?

” मैं और तुम कुछ अलग हैं क्या? अच्छा सुनो अब निकलता हूँ, समर बाहर रास्ता देख रहा होगा।”

   बाँसुरी से विदा ले वो बाहर चला गया, और बाँसुरी वापस अपनी कहानी में डूब गई।

********

     प्रेम पहले भी कम ही बोलता था पर अब निरमा की लापरवाही ने उसे और गुमसुम कर दिया था, वो भले ही निरमा से कुछ कहता नही था लेकिन उसकी सारी नज़र निरमा पर ही होती थी।
    निरमा के बार बार मना करने पर भी उसने अम्मा को रात निरमा के पास रुकने और उसके कमरे में सोने के लिए मना लिया था, निरमा को रात में सोने से पहले पढ़ने की आदत थी।
     वो रोज़ अपनी आदत के मुताबिक कोई न कोई किताब रात में लेटे लेटे पढ़ा करती, पढ़ते पढ़ते ही उसे पता भी ना चलता कि वो कब सो जाया करती, लेकिन उसकी इस आदत के कारण साथ सोई अम्मा की नींद में खलल पड़ता, उन्हें रोशनी के कारण नींद नही आती, इसके साथ ही निरमा को रात में वाशरूम भी जाना आना पड़ता इस सारी खटर पटर के कारण अम्मा की नींद सही से नही हो पाती और दिन भर इधर उधर बैठी वो ऊंघती फिरती , दोपहर भी खाना निपटने के बाद वो लंबी सी झपकी ले लिया करती जिससे ये होने लगा कि वो निरमा की क्या मदद करती निरमा को ही उनके लिए दोपहर में अपना कमरा खाली कर बाहर हॉल में बैठना लेटना पड़ता।
     एक दोपहर  खाने के बाद प्रेम को महल वापस नही लौटना था, वो हॉल में बैठा टीवी देख रहा था कि रसोई समेट निरमा वहीं आ बैठी, वो सोफे पर लेटा हुआ था उसे देख सीधे बैठ गया__

  ” क्या हुआ ? आप कमरे में आराम क्यों नही कर रहीं?”

  ” वहाँ अम्मा सो रहीं हैं।”

   ” तो क्या हुआ? मैंने तो उन्हें आपकी ही सुविधा के लिए घर पर रुकने कहा है, आप उनके साथ भी तो सो सकती हैं।”

   निरमा को बातें घुमा फिरा कर बोलने की आदत ना थी__

    ” उनके खर्राटों के कारण मुझे नींद नही आती।”

  प्रेम को निरमा की बात सुन हंसी आ गयी…

  ” अरे लेकिन उन्हें घर पर रोका तो आपके लिए ही है ना! आपको कभी कुछ चाहिए या किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो हर वक्त एक व्यक्ति को आपके पास होना चाहिए ना।”

  ” मेरी ज़रूरत के वक्त तो वो अक्सर सो जाती हैं और फिर बुज़ुर्ग भी हैं उनसे कुछ काम कहते अच्छा भी नही लगता, और एक बात कहूँ?

” कहिये!”

  ” मेरी पढ़ने की आदत के कारण वो शायद रात में ठीक से सो नही पाती, दिन भर उबासी लेती फिरती हैं, मुझे ऐसे खुद के कारण किसी को परेशान करना पसंद नही है, आप उन्हें रात में और दोपहर में घर जाने दीजिए न, वो भी अपने घर में ही चैन से सो पाएंगी, और चैन से सोएंगी तो मेरी भी सही देखभाल कर पाएंगी, ठीक कहा ना?”

  ” बात तो ठीक है लेकिन आप रात में कमरे में अकेली सोती हैं तो मुझे खटका लगा रहता है , कहीं आपको किसी चीज़ की ज़रूरत हुई तो कोई तो पास होना चाहिए, आप कहें तो सुमित्रा से बात करूं?”

  ” नही बिल्कुल नही, सुमित्रा के साथ तो मैं बिल्कुल कम्फर्टेबल नही हूँ।”

  ” तो फिर? किसके साथ कॉम्फर्टेबल हैं?”

  ” आपके साथ! “

  निरमा बिना गोल मोल घुमाए अपने मन की बात कह गयी….

  ” अगर आपको मेरी पढ़ने की आदत से दिक्कत ना हो तो आप ही मेरे कमरे में सो जाइये ना!”

     प्रेम निरमा की तरफ देखने लगा, उसे पता था कमरा छोटा है , वहाँ दूसरा बेड क्या कोई सोफा या काउच भी रखने की जगह नही है, उस कमरे में रात रुकने के लिए उसे नीचे अपना बिछोना डालना होगा।

   ” ठीक है ! अम्मा से कह देता हूँ, आज से वो रात का खाना तैयार कर अपने घर चली जाया करें, मैं ही आपके साथ सो जाऊंगा, आई एम सॉरी मेरा मतलब है मैं  ही आपके कमरे में रुक जाऊंगा।”

   अब इसमें सॉरी की बात कहां से आई, पति हो आखिर ! इतना तो हक है अपनी पत्नी के ऊपर, मन ही मन सोचती मुस्कुराती निरमा बस हाँ में सर हिला गयी।

   शाम अम्मा सोकर उठी तब तक निरमा टहलने के लिए बाहर जा चुकी थी, आज प्रेम घर पर था इसी से वो भी निरमा के साथ उसकी पानी की बोतल थामे चला गया__

  ” रोज़ ही इतना टहलती हैं आप?”

   ” हाँ ! कहतें हैं माँ जितना ज्यादा टहलती है उसके बेबी को उतनी ही फ्रेश ऑक्सीजन मिलती है, इसलिए नियम से पैंतालीस मिनट टहलने के बाद 15 मिनट योग भी करती हूँ।”

  प्रेम के चेहरे की चमक देखते ही बन रही थी, उसके लिए निरमा के साथ ऐसे टहलना बहुत खूबसूरत अनुभव था, वो हमेशा से मानता आया था कि एक बच्चे के जन्म से लेकर उसके बड़े होते तक उसके पालन पोषण में माँ का विशेष हाथ होता है लेकिन अब निरमा के साथ इन्हीं बातों को करीब से अनुभव करना उसे बहुत भा रहा था।
   निरमा का सुबह बाल गोपाल को नहला कर भोग अपने हाथ से बना कर खिलाना हो या रात को खाने के बाद टहलते समय धीमी धीमी आवाज़ में अपने होने वाले बच्चे को लोरी सुनाना सब कुछ प्रेम के लिए एकदम नया था , अद्भुत था और था अविस्मरणीय!
     माँ को खोने के बाद किसी भी औरत के आंचल की भीनी छांव से वो अब तक वंचित रहा था।निरमा से शादी जिन हालातों में हुई स्नेह की स्निग्ध सरिता बहने का अवसर दोनो को ही कहाँ मिला था? लेकिन अब अपने हर मोहक हाव भाव से उसे मोहती निरमा कब उसकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गयी वो भी समझ नही पाया  ,….
     उसे निरमा के साथ कि आदत तो होने ही लगी थी लेकिन उसका जीवन निरमा पर इतना ज्यादा निर्भर हो गया है इस बात का एहसास उसे निरमा के गिरने से हुआ, निरमा को ऐसे बाथरूम में अवश पड़े देख उसकी आंखें  भर आयी थी, अस्पताल पहुंचने तक उसका दिल जितनी जोरों से धड़क रहा था ये वही जानता था।
   डॉक्टर ने जब सब ठीक है का आश्वासन उसे दिया तब कहीं जाकर उसकी जान में जान आयी थी, उस पल तो उसे लगा डॉक्टर को ही सीने से लगा ले लेकिन अपनी खुशी ज़ब्त करता वो उसकी लापरवाही पर उस पर ही भड़क उठा था, हालांकि एक बार फिर उसे रोते देख वो उसे अपने गले से लगाने ही गाड़ी से नीचे उतर आया लेकिन फिर जाने किस संकोच में गड़ा वो चुपचाप वापस लौट गया था।
   क्या सच में एक औरत में इतनी ताकत होती है कि बिना कोई यौवन का बाण चलाये बिना चेहरे पर अनावश्यक प्रलेप लगाए भी उसके मन की सम्राज्ञी बन बैठी।
    औरों का तो पता नही पर हाँ निरमा में इतनी ताकत ज़रूर थी, भगवान से सदा रहने वाली उसकी शिकायत अब दूर होने लगी थी।
   
   ” क्या सोचतें खड़े हैं? घर आ गया, अंदर आ जाइये मैं चलकर चाय चढ़ाती हुँ।”

  ” बहुरिया हम चाय बना लाये, आओ यहीं बगीचे में ही बैठ जाओ, अच्छी हवा चल रही है।”

   अम्मा चाय की ट्रे थामे बाहर बगीचे में चली आयीं, प्रेम भी अंदर आकर कुर्सी खींच बैठ गया, निरमा ने एक कप उसकी ओर बढाई और दूसरी खुद थाम ली, अम्मा खाना बनाने अंदर जा ही रहीं थीं कि प्रेम ने उन्हें भी कह दिया कि अभी उनके रुकने की खास आवश्यकता नही दिख रही इसलिए वो चाहे तो अपने घर जा सकती हैं।
     रात खाना पीना निपटा कर अम्मा चली गईं, प्रेम बाहर बैठा टीवी देख रहा था, कुछ देर उसके साथ टीवी देखने के बाद निरमा अंदर कमरे में चली गयी, सुबह जोश जोश में प्रेम निरमा की बात मान तो गया था लेकिन अब उसके कमरे में जाने में उसे संकोच सा लग रहा था।
    बहुत देर तक बैठे रहने के बाद आखिर वो एक तकिया और चादर लिए उठा और कमरे में धीरे से झांकता अंदर दाखिल हो गया, पलंग पर टिक कर बैठी निरमा कुछ पढ़ रही थी, उसने प्रेम को देखा, प्रेम ने पलंग के एक ओर नीचे अपनी चादर डाली और लेटने ही जा रहा था कि निरमा ने टोक दिया__

  ” अरे आप वहाँ कहाँ लेटने जा रहे? ज़मीन पर सोएंगे क्या?”

  ” फिर? “

  ” फिर क्या ! यहाँ ऊपर ही आ जाइये, पलंग बहुत बड़ा है।”

   निरमा छिप कर अपनी मुस्कान छिपा गयी

   ” आपको परेशानी होगी।”

  ” ना मुझे कोई परेशानी नही होगी, आप भी डरिये मत, मैं काटती नही हुँ।”
  इस बार वो खिलखला उठी, प्रेम भी मुस्कुरा कर पलंग के एक ओर अपना तकिया रखे लेट गया।
   कुछ देर में ही उसकी साँसों की गहरी आवाज़ सुन निरमा समझ गयी कि वो सो चुका है, कुछ देर पढ़ते रहने के बाद वो भी देर रात नींद में लुढ़क गयी।

     ********


     वखारिया मेंशन में धुँए के फैलते ही फायर अलार्म बजने लगा, घर के सारे नौकर भागते दौड़ते कहाँ आग लगी है ढूंढने में लगे थे, कुछ नीचे के हॉल में पीछे की तरफ बने मालिक के बड़े से बैडरूम की ओर भागे कुछ रसोई की ओर और कुछ बेबी यानी मालिक की बेटी के कमरे की ओर।
      आग भले ही बालकनी में लगाई गई थी लेकिन धुंआ हवा के साथ कमरे के अंदर  बहता चला आया था और उसी धुँए के कारण ये शोर शराबा था।
    इस शोर शराबे से टक्कर लेता कोलाहल केसर के दिल दिमाग पर भी चल रहा था।
  
   केसर वखारिया शहर के सबसे रईस बिल्डर  कॉलोनाइजर सुदामा वखारिया की इकलौती बेटी थी।
  शहर में कहने को हज़ारों अच्छे स्कूल होने के बावजूद सुदामा वखारिया ने अपनी इकलौती बेटी को राजकुमारों के लिए बने शाही स्कूल में ही पढ़ाया लिखाया।
   रईसों को वैसे भी दिखावे की आदत होती है , शहर का सबसे महंगा स्कूल राज परिवार का स्कूल था जो कभी अंग्रेजों के समय में राजशाही की बच्चियों की पढ़ाई की सुविधा के लिए खोला गया था बाद में अपनी तगड़ी फीस और राजसी लोकाचार के लिए प्रसिद्ध शहर के रईसों के दिखावे का जरिया बन गया था।
   दसवीं तक दून के बोर्डिंग में पढ़ी केसर को जब ग्यारहवीं में अपने ही शहर के स्कूल में डाल दिया गया तो पहले पहल तो उसका स्कूल जाने का जी ही नही किया लेकिन फिर धीरे धीरे उसे स्कूल और अपना शहर दोनो भा गए।
    कारण था राजा!
      राजा उसका सहपाठी था, पहली नज़र में ही वो भोली आंखों वाला ऊँचा पूरा राजकुमार उसे भा गया था।
  हालांकि जब तक स्कूल में रहे उसकी कभी राजा से बात करने की हिम्मत नही हुई।
     फिर वो कॉलेज की पढ़ाई के लिए बनारस चला गया, बनारस के बारे में पता चलते ही वो भी घर पर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पढ़ने की दुहाई देती वहाँ भी पहुंच गई, लेकिन सारी दुनिया के सामने शेरनी बनी फिरती केसर की ज़बान को राजा के सामने जैसे लकवा मार जाता।
   वो सुंदर थी बुद्धिमान थी , हर तरह से परिपूर्ण परफेक्ट लेकिन जाने क्यों कभी राजा ने उसे नोटिस ही नही किया या शायद बचपन से अपनी परेशानियों में गुम राजा को और किसी और  विषय में सोचने का अवकाश ही नही मिला।
   राजा के विदेश जाते ही वो अपने पिता के खानदानी बिज़नेस में रम गयी। उसके हृदय की दुर्बलता का परिचय उसकी दाई माँ के ज़रिए उसके पिता को हो चुका था।
   बिटिया की शाही पसंद पर उन्हें भी गर्व था। वैसे भी जैसे उनके काले धंधे थे अगर भविष्य में रियासत के राजा के साथ उनके संबंध जुड़ सके तो उनका भविष्य सार्थक सुखद हो सकता था।
     राजा उस वक्त पढ़ने बाहर चला गया, पढ़ लिख कर लौटा राजा अब और भी चमक गया था।
   उस वक्त उसके पिता हुकुम गद्दी पर थे बावजूद महल के बहुत से काम राजा देखने लगा था। और उसी वक्त मतलब आज से कुछ तीन साढ़े तीन साल पहले ये हादसा हो गया।

     सुदामा वखारिया जिस तेजी से अपने पैर शहर में पसारता जा रहा था इसमें कोई दो राय नही रह गयी थी कि जल्दी ही शहर की हर कॉलोनी का विधाता वही होने वाला था, शहर के बड़े दुमंजिले मकान हो, कॉलोनीज़ हों मॉल हों या इमारतें अधिकतर जगह बनाने वाले में उसी का नाम चस्पा हो रहा था।
   ऐसे ही उसके नए बनाये मॉल का ओपनिंग फंक्शन था जहाँ नई प्रदर्शित फ़िल्म को भी प्रर्दशन के लिए लगा रखा गया था।
    फ़िल्म आधी भी नही हुई थी कि पावर सर्किट ग्रिड में स्पार्किंग होने से पूरा हॉल धू धू कर जल उठा, सिक्योरिटी जाने कहाँ तफरीह कर रही थी, दरवाज़े बाहर से बंद थे, लोगों में भगदड़ मच गई और इस अफरा तफ़री में दम घुटने से कई लोगों की जाने चली गईं।
      पूरी तरह से पावर सर्किट की जांच किये बिना ही उद्धाटन करने की हड़बड़ी में ऐसा निर्णय लिया गया था। इसके पीछे कार्य करने वाले इंजीनियर ने सारा ठीकरा वखारिया के सर पर फोड़ा, उसका लालच और उसकी हड़बड़ी ही इस दुर्घटना का असल कारण बनी थी।
   खैर सबूतों के अभाव में वखारिया पर कोई कार्यवाही नही हुई।
    उसका अगला प्रोजेक्ट एक एन जी ओ की सहायतार्थ बने वृद्धाश्रम के निर्माण कार्य का था। पैसे बचाने और काम जल्दी निपटाने के चक्कर में एक बार फिर उसने गोलमाल किया और इस बार वृद्धाश्रम की मुख्य दीवार ही भरभरा कर पांच छह बुज़ुर्गों की जान ले गयी।
     एक बार फिर सबूतों के अभाव का लाभ उसे मिला और वो वापस अपनी मक्कारी में लग गया।
  लेकिन पाप का भी घड़ा एक ना एक दिन भरता ही है।
    एक के बाद एक होती वखारिया कि लापरवाहियों और लालच का खामियाजा भुगतते लोगों ने रियासत के महाराज से पहले उनके सुपुत्र राजा तक अर्जी पहुंचा दी।
        सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ने का रास्ता दिखा राजा खुद एक किनारे हो गया और जनता को महाराज के पास भेज खुद वखारिया की जन्मकुंडली निकालने मे लग गया।
     आखिर सरकार के फैसले से निराश जनता अपने महाराज के पास आस भरी उम्मीद से जा पहुंची , पर जनता के पहले पहुंच चुके थे सुदामा वखारिया !
      महाराज सत्ता की महत्ता जानते थे , उनके ख़ज़ाने को हीरे मोतियों से तोल कर वखारिया ने राजा के साथ अपनी बेटी का विवाह प्रस्ताव भी उनके सामने रख दिया।
    वखारिया राजा महाराजा न सही किसी दृष्टि से राजे रजवाड़ों से कम भी नही था। उसकी बेटी से होने वाले विवाह के बाद एक तरह से वखारिया की तरफ से जीवन भर की सुनहरी पेंशन मिलनी थी, राजा के पिता इस मामले में हॄदय से दुर्बल थे , उन्हें बिना परिश्रम के मिली लक्ष्मी से बैर न था।
   अगले दिन सभा में जब जन समूह के सामने महाराज को दोनों पक्षों की बात सुन फैसला सुनाना था तब उनकी सोच के विपरीत वहाँ बैठा राजा बीच में कूद पड़ा।
     हालांकि इसके पहले उन्होंने ही हर वाद पर राजा और युवराज से परिचर्चा ज़रूर की थी, उसी अभ्यास से आज बिना सलाह मांगे भी राजा बोल उठा।
    उसका फैसला पूरी तरह निष्पक्ष था, उसने महाराज की तरफ से वखारिया को उसकी हर गलती का खामियाजा जनता को भरने का फरमान सुना दिया…..
      उसकी आवाज़ की बुलंदी और भुगतान की रकम सुन वखारिया की तबियत बिगड़ गयी, उसने अपनी आखिरी चाल भी चली, केसर को राजा के सामने कर दिया लेकिन सत्य की राह पर खड़े राजा ने केसर को अनदेखा कर अपना फरमान सुनाया और बाहर निकल गया।
      रियासत में रहते हुए महल और महाराज से बैर पालने की हिम्मत वखारिया में नही थी, भुगतान राशि भरने में उसे अपनी सात पुश्ते याद आ गईं और ऐसी तबियत बिगड़ी की उसके सारे काले कारनामें उस पर भारी पड़ गए। पैरालिसिस स्ट्रोक के बाद अब वो एक व्हील चेयर का मोहताज हो गया और ये सब अपनी आंखों से देखती केसर की रूह तक अपमान की आग से जल उठी।
       उसका सौंदर्य उसका यौवन उसकी बुद्धि सब उसी पल मिट्टी हो गयी जब भरी सभा में केसर और राजा के विवाह प्रस्ताव पर राजा ने उसके पिता के सामने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए __

   ” अभी सिर्फ 24 का हुँ, अभी तो ढेर सारा काम बाकी है , अभी से विवाह बंधन में बंधने को तैयार नही हुँ। इस बारे में आपसे हाथ जोड़ कर क्षमा मांगता हूँ। आप अपनी बेटी का विवाह कहीं और कर दें।”

    राजा ने यह बात पूरी विनम्रता से कही थी लेकिन केसर के लिए सहन करने योग्य ना थी। राजा ने एक बार भी आँख उठा कर उसे देखा नही था, क्या वो इतनी निकृष्ट थी कि उस घमण्डी राजकुमार ने उसकी तरफ देखना भी ज़रूरी नही समझा।
    अपनी मीठी शहद सी बोली में उसके पिता की सज़ा मुकर्रर कर वो बिना उसकी तरफ देखे ही चला गया और साथ ले गया उसका हृदय हमेशा हमेशा के लिए।
          प्यार शायद ऐसा ही होता है अगर प्रेमी मिल जाये तो मोहक और अमृत लेकिन अगर प्यार को सामने वाला दुत्कार जाए तब तो वो अपने गहरे रंगों के साथ जीवन में ऐसी गहरी छाप छोड़ जाता है कि उससे फिर उबरने का कोई रास्ता शेष नही रह जाता।

    इस पूरी घटना को घटे तीन वर्ष गुज़र गए। केसर और उसके पिता का जीवन धीरे धीरे पटरी पर आने लगा …..
      अपने पिता की सेवा करने के साथ साथ केसर ने उनके बिज़नेस को भी संभाल लिया , कहाँ कौन सी डील फाइनल करनी है , किससे कितना बकाया वसूलना है किसी चीज़ में वो पीछे नही थी।
    अपने अपमान की आग को भुलाने उसने खुद को काम में बुरी तरह से झोंक दिया।
     पूरा दिन कड़ी मेहनत में इसलिए गुज़ारती कि रात थकी ऑंखे सुकून से सो सकें लेकिन नींद आंखों से कोसो दूर खड़ी जैसे उसका मजाक उड़ाती।
  आखिर उसकी गलती क्या थी? आखिर उसमें ऐसी क्या कमी थी कि उस जैसी लड़की की तरफ राजा ने देखना तक गवारा नही समझा था।
     जहाँ एक तरफ बड़े से बड़ा व्यापारी बिज़नेस मैन उसे पाने को लालायित था वो सनकी राजकुमार उससे पल्ला झाड़ गया था।
    एक वर्ष तक अपमान की आग में जलने के बाद उसने राजा को पाने की कसम ले ली थी।
  उसके जीवन का मकसद राजा को पाना ही रह गया था, क्योंकि वो कितना भी उसे भूलने की कोशिश कर ले वो नाकाम ही हुई जा रही थी।
     और आखिर उसका प्रयास रंग लाने लगा था…… महल के भीतर तक उसकी पहुंच होने लगी, राजा के पल पल की खबरें उस तक पहुंचाने वाले को शायद उसके मंसूबों का पता तक नही था।
     लेकिन अभी केसर राजा तक पहुंच पाती की, अपने किसी काम से बाहर निकला राजा इत्तेफाक से मुम्बई पहुंच गया और बाँसुरी से मिलने के बाद उसी में उसने अपनी जीवन संगिनी को पा लिया।
  
   महल में मची शादी की धूम की गूंज उस तक भी चली आयी थी और एक बार फिर बेबस सी वो अपने कमरे में बैठी उसके नाम की गलियों में अकेली भटकती रह गयी थी।
  

    ऐसा नही था कि उसे अच्छे लड़कों का कोई अभाव था, राजा के विवाह के बाद उसके मन में आया भी कि क्यों वो एक ऐसे लड़के के पीछे अपना जीवन व्यर्थ कर रही है जिसे असल में उससे लेना देना ही नही लेकिन राजा का यही निर्लिप्त भाव कि उसे केसर से कोई लेना देना नही उसे सालता रहता था।
       केसर को कहीं न कहीं खुद के रूप गुण रुतबे का घमंड था और राजा की निर्लिप्तता उसे तमाचा मार गयी थी, वो अब उसका बचपन का प्यार नही बल्कि उसकी जवानी की ज़िद बन बैठा था।
     अगर कभी एक बार भी राजा ने केसर से प्यार से बात कर ली होती या शायद उसे भर नज़र देख भर लिया होता तो उसके नाम की माला जपती वो अपनी पूरी जिंदगी उसके नाम के सहारे गुज़ार देती लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ।
     राजा के नाम की ज़िद बढ़ते बढ़ते जुनून बन गयी थी।
   देखा जाए तो इस सब में राजा की कोई गलती नही थी लेकिन अपने मन के मनकों में उलझी केसर कब प्यार को पागलपन का रूप दे बैठी वो खुद नही जान पायी।

    इन तीन सालों में उसने अपने पिता के बिजनेस को जितनी ऊँचाइयों पर पहुंचाया उतना ही उसका राजा के प्रति प्यार गहरा होता चला गया।
    राजा की शादी के बाद ये गहराई और गहरी और काली होती चली गयी।

   बाँसुरी को बिना कभी देखे ही केसर ने उसके लिए मन में बैर पाल लिया।
    आखिर कैसे कोई साधारण सी लड़की एक असाधारण से राजकुमार को पा गयी।
     
    रात अपने कमरे की बालकनी पर खड़ी केसर अक्सर ये सोच कर बेचैन हो उठती कि राजा की बाहें जिनमें अभी उसे होना चाहिए था बाँसुरी होगी।
    वो सोचा करती पति के रूप में कैसा होगा राजा? अपनी प्रेयसी से अपनी पत्नि से कैसे प्यार जताता होगा, रूठता होगा या अक्सर मनाता होगा।
   सोचते सोचते उसके चेहरे पर कभी मुस्कान चली आती कभी तनाव , लेकिन फिर भी उसके दिमाग से एक पल को भी राजा हट नही पाता था।
      आखिर ऐसा क्या था उस सनकी सिरफिरे राजा में जो वो ऐसी पागल हुई जा रही थी, और आखिर क्यों हुई जा रही थी?
   उस दिन भी जब उसे खबर मिली की बाँसुरी शहर आ रही है ,वो बेमकसद सिर्फ उसे देखने ही अपनी बहुत ज़रूरी मीटिंग छोड़ कर वहाँ पहुंच गई थी और इतनी देर से उस पर नज़र रखे आखिर उसके अंदर के औरत की जलन बाहर निकल ही आयी।

     ऐसा क्या था इस सादी फीकी सी लड़की में, ठीक है चेहरे मोहरे से सुंदर है पर क्या सिर्फ इसलिये राजा ने इससे शादी कर ली?

     बाँसुरी को अपने दोनों हाथों को फैला कर शॉप कीपर से राजा के कंधो का साइज बताते देखती केसर की आंखों से आग निकल रही थी, वक़्त अगर उस पर मेहरबान हुआ होता तो उन कंधो की नाप उसकी बाहें होतीं।

    उसके सामने बाँसुरी अपने पति के लिए कपड़े खरीद रही थी, उसी राजा के लिए कपड़े खरीद रही थी, जो उसका पति हो सकता था……
     जाने क्यों उसके अंदर की आग से वो ऐसी झुलसी की बाँसुरी के पीछे पड़ कर आखिर उससे वो शर्ट उसने छीन ही ली।
     उस पल जब वो बाँसुरी के सामने खड़ी उससे बात कर रही थी कुछ पलों के लिए वो भी उसकी गहरी आंखों में खो सी गयी, इस चेहरे को वो कितने प्यार से अपने हाथों में लेता होगा।
     इन आँखों में जाने कितनी बार डूब जाता होगा। यही वो होंठ हैं जिन्हें छूने….
     इसके आगे उससे सोचा ही नही गया, शर्ट थामे वो बिलिंग के लिए सीधे आगे निकल गयी, बाँसुरी की लगाई आवाज़ अनसुनी करती उसे अनदेखा करती।

   लेकिन क्या मिला था ऐसा करके भी? घर पहुंच कर उससे उस शर्ट को छीन कर भी सीने में जलती आग में कोई ठंडक नही मिली थी, और आखिर अपने सीने में दहकती आग की जलन कम करने उसने उस शर्ट को ही आग के हवाले कर दिया था।

     नौकरों की फ़ौज जब तक उसके कमरे में पहुंची आग बुझ चुकी थी, किसी को उससे कुछ पूछने की इजाज़त थी नही, सभी उसे सुरक्षित देख ठिठक गए।
    कुछ समय में उसकी मुँह लगी नौकरानी उसके कमरे को साफ सुथरा कर उसके लिए चाय बना लायी और चाय के साथ साथ लायी एक कार्ड ।
    निर्विकार भाव से कार्ड को बिना देखे ही केसर ने चाय ली और पीने लगी__

  ” यूनिवर्सिटी का कार्यक्रम है बेबी साहब! आपको भी बुलाया है ।”

  ” तो क्या करूँ? उनका काम है बुलाना, पर जाना नही जाना तो मुझे डिसाइड करना है ।”

   ” अच्छी बात है ! आपकी मर्जी! वैसे ये कार्ड महल भी भेजा गया है, राजा साहेब भी आने वाले हैं ऐसा सुना है हमने।”

    केसर चौंक कर रंभा को देखने लगी__

  ” तुझसे किसने कहा?”

   ” और कौन ? जिज्जी ने ही कहा…. उनकी दवा की पुड़िया जो खत्म हो गयी थी, वही पहुंचाने गए तभी बात छिड़ी और जिज्जी ने बता दिया।”

  ” और क्या बताया तेरी जिज्जी ने?”

   रंभा मुस्कुराती वहीं पलंग के पास जमीन पर बैठी  महल के पल पल की खबर उसे सुनाने लगी।
    ये उसका रोज़ का काम था, पूरे दिन भर में थक कर आई केसर के लिए महल की खबरें राजा के किस्से ही जीने का बहाना बनते जा रहे थे।

*****

    केसर वखारिया विशिष्ट अतिथि थी, उसके वहाँ पहुंचते ही आयोजक कुलपति शिक्षकों के साथ साथ स्टूडेंट्स यूनियन लीडर लड़के लड़कियों ने भी उसे हाथों हाथ लिया, उसे घेर घार कर पूरे सम्मान और स्नेह के साथ उसके स्थान तक उसे पहुंचा दिया गया।
      आज बहुत दिनों बाद वो राजा से मिलने वाली थी, जाने वो उसे पहचान भी पायेगा या नही।
   नही ही पहचानेगा। उसने आज तक कभी उसे ध्यान से देखा ही कहाँ था?  ध्यान से भी क्या उसने शायद कभी उसे देखा ही नही था।
   अपनी आंखों पर धूप का चश्मा चढ़ाये बैठी वो उसी की सोच में गुम थी कि यूनिवर्सिटी परिसर में एक के पीछे एक करती ग्यारह गाड़ियां आ रुकी।
      सिक्योरिटी ने राजा की गाड़ी को चारों तरफ से घेर कर उसे नीचे उतारा, सामने ड्राइवर की सीट के बगल वाली सीट से उतरा  राजा पीछे मुड़ा और गाड़ी की पिछली सीट का डोर खोल दिया।
       
    इतना बड़ा आदमी और इतना संतुलित व्यवहार , संसार का ये एक अकेला राजा होगा जो अपनी पत्नि के लिये गाड़ी का दरवाजा खोलता होगा, सोचती केसर की नज़रे उस पर से हट ही नही पा रहीं थीं।

    अब भी तो बिल्कुल वैसा ही नज़र आ रहा था जैसे आज से तीन साल पहले दिखता था।
   वही गहरी आंखें और वैसी ही मीठी मुस्कान! …
  बाँसुरी का हाथ थामे उसे खुद की तरफ बढ़ते देख ना चाहते हुए भी वो अपनी जगह पर खड़ी हो गयी। यहाँ आने से पहले आईना देख देख कर किया सारा अभ्यास कि उसे राजा से क्या बोलना है कैसे बोलना है सब भूल गयी। 
   उसने खुद को सौ बार समझाया था कि उसके सम्मान में वो कतई खड़ी नही होगी लेकिन कुछ एक व्यक्तित्व ऐसे होतें हैं जिनका सम्मान करना नही पड़ता स्वयं हो जाता है।
    राजा भी तो ऐसा ही था, एक बार जो उससे मिल ले क्या फिर अपनी अंतिम सांस तक भी उसे भूल सकता था।

   राजा तेज़ कदमो से उसके पास चला आया , सभी आयोजकों के अलावा सामने और आस पास फैली जनता के सामने हाथ जोड़ने के बाद उसने अपने आस पास नज़र डाली और उसे देख मुस्कुरा कर उसके पास लगी जिस कुर्सी पर आयोजकों ने उसे बैठने को कहा वहीं बैठ गया।

    बिना किसी आडम्बर बिना किसी दिखावे के वहाँ बैठा वो कुलपति से किसी चर्चा में लीन था, साथ बैठी बाँसुरी भी उस परिचर्चा का हिस्सा बनी हुई थी, राजा के बाद बाँसुरी ने भी उसे नमस्ते किया था लेकिन शायद वो भी उसे पहचान नही पायी थी। केसर ऐसा सोच रही थी कि बाँसुरी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी__

   ” आपसे शायद मैं मिल चुकी हूँ।”

   ” जी ! कल मॉल में …..

   केसर की बात आधे में ही काट बाँसुरी ने कुछ और ही बात छेड़ दी, वो राजा से उसके लिए खरीदे तोहफों को अभी छिपा कर ही रखना चाहती थी।
     बाँसुरी की बातें सुनती केसर की आंखें शेड्स के अंदर से राजा पर ही टिकी थी, और राजा उन आँखों से बेखबर कुलपति से होनहार गरीब विद्यर्थियों की निशुल्क शिक्षा के लिए दिए जाने वाले चेक पर अपने हस्ताक्षर कर रहा था……


क्रमशः

aparna ….


   

aparna..
      



   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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