जीवनसाथी -66

जीवनसाथी –66



       

         बाँसुरी की बातें सुनती केसर की आंखें शेड्स के अंदर से राजा पर ही टिकी थी, और राजा उन आँखों से बेखबर कुलपति से होनहार गरीब विद्यर्थियों की निशुल्क शिक्षा के लिए दिए जाने वाले चेक पर अपने हस्ताक्षर कर रहा था……

     पत्नि कितनी भी सीधी और भोली क्यों न हो, अपने पति पर अपने पीठ पीछे से पड़ती नज़र भी पकड़ सकती है फिर यहाँ तो केसर सामने बैठी ही राजा को घूर रही थी। शायद उसने सोचा हो उसकी आंखें शेड्स के पीछे से नज़र नही आ रही लेकिन बाँसुरी उन आंखों को पकड़ चुकी थी।
      अपना काम निपटा कर राजा वहाँ से निकलने के लिए उठ खड़ा हुआ लेकिन तभी विद्यार्थियों का एक बड़ा झुंड एक बड़े से केक के साथ स्टेज पर चला आया।
     स्पोर्ट्स इवेंट के सफल समापन पर विद्यार्थियों के साथ साथ बाकी लोग भी खुश थे और राजा की वहाँ उपस्थिती ने उनकी खुशी को चौगुना कर दिया था। उसी खुशी की अभिव्यक्ति थी ये सजीला केक।
    केक काटने के लिए चाकू राजा के हाथ में थमा दिया गया, वो अभी अपने बाजू में खड़ी बाँसुरी का हाथ थामने आगे हाथ बढ़ा रहा था कि बाँसुरी को हल्के हाथों से किनारे करती केसर राजा के बाजू में चली आयी।
     अखबार वालों के कैमरों के चमकते फ्लैश के सामने उसने झट राजा के साथ उस चाकू को थाम लिया और केक काटने जा ही रही थी कि अपनी दूसरी बाजू में पीछे खड़ी बाँसुरी को आगे खींच राजा ने चाकू उसके हाथों में दे दिया।
    पलक झपकते में ही सब हो गया और कैमरे की तस्वीरों में राजा साहेब के बाजू में खड़ी रानी साहेब और मशहूर युवा व्यवसायी केसर ने खेल महोत्सव का केक काट कर किया समापन अगले दिन की हेडलाइंस बनने को तैयार हो गयी।
      केसर इतने में ही हार मान जाती तो बात ही क्या थी?
     कटे हुए केक का टुकड़ा उठा कर उसने हाथ राजा की ओर बढ़ाते बढ़ाते बाँसुरी की ओर मोड़ दिया__

  “आप ही अपने साहब को हमारी तरफ से खिला दीजिये, हम जैसों के हाथ से तो वो खाएंगे भी नही।”

   बाँसुरी को केसर ने बातों में ऐसे उलझा दिया कि अब ना उससे केक लेकर राजा को खिलाते बन रहा था और न ये कहते बन रहा था कि केसर खुद खिला दे।
   आसपास खड़े बच्चों में इतना उत्साह था कि उनमें से  एक ने छोटा सा टुकड़ा राजा की ओर बढ़ा दिया, वैसे तो राजा ही क्या महल का कोई भी सदस्य बाहर का कुछ भी बिना जांच के नही खाया करता था लेकिन उस वक्त बच्चों के चेहरे की प्रसन्नता देख राजा ने मुहँ खोल ही दिया।
    केसर ने बाँसुरी की ओर बढ़ाया हाथ राजा की तरफ मोड़ते हुए आंखों ही आंखों में बाँसुरी से इजाज़त मांगी और ना चाहते हुए भी बांसुरी को हाँ में गर्दन हिलाना ही पड़ गया।
        टुकड़ा बड़ा था, राजा ने ज़रा सा ही खाया , बचे टुकड़े को समेटे केसर पीछे की ओर मुड़ गयी…..
    भीड़ भाड़ में एक ओर पीठ कर उसने राजा का जूठा केक अपने मुहँ में रख लिया…. कोशिश उसकी यही थी कि उसकी ये हरक़त किसी की नज़रों में न आये लेकिन देखने वाली सब कुछ देख चुकी थी।
     इसके बाद बाँसुरी का फिर वहाँ मन नही लगा….
आखिर ये लड़की कौन थी? कैसा अजब इत्तेफाक था कि पिछले दिन मॉल में मिलने के बाद आज फिर यहाँ ऐसे मुलाकात हो गयी।
     राजा ने वहाँ उपस्थित कुलपति शिक्षकों आयोजकों के साथ ही जीतने वाले बच्चों को भी अगले दिन रात्रिभोज के लिए महल में आमंत्रित कर लिया, इसके साथ ही वहाँ आये हुए अन्य अतिथियों के साथ साथ उसने केसर को भी न्योता दे ही दिया, पर जाने क्यों केसर को बुलाया जाना बाँसुरी को पसंद नही आया।

    सबसे विदा लेकर वो बाँसुरी को साथ लिए वापसी के लिए निकल पड़ा और पीछे छोड़ गया केसर के हृदय में खिलता बसंत।

  *******


     शादी के बाद की छुट्टियां बीत गई अदिति और भास्कर मुंबई वापस चले आए अपने सपनों का आशियाना सजाने।।
     सब सुंदर था सब अच्छा था लेकिन हर किसी की आदत एक ही हो यह जरूरी तो नहीं है अदिति हर काम में अच्छी थी बस पैसे कमाने की ललक थोड़ी सी ज्यादा थी उसमें। और इसी लालच के कारण उसकी अधिकतर बातें रुपयों से शुरू होकर रुपयों पर खत्म हो जाती थी । बहुत बार बोलने से पहले वह सोच भी नहीं पाती थी कि उसका कहा सामने वाले को बुरा या भला भी लग सकता है?
    दोनों नौकरी पेशा थे घर के काम को भी दोनों ने कुछ हद तक बांट रखा था। खाना बनाने के लिए कुक थी , बाकी कामों के लिए नौकरानी थी । इसलिए घर पर बहुत ज्यादा तनाव नहीं होता था।  असली दिक्कत होती थी रविवार के दिन।
    भास्कर को चाय पीने की बुरी आदत थी कुछ भी लिखते या पढ़ते समय उसे बार-बार चाय लगती थी। मेड एक बार आने के बाद सारा काम करके दोपहर तक चली जाती थी जब तक मेड रहती दो-तीन बार चाय बना जाती, लेकिन उसके बाद बार-बार अदिति को भागना पड़ता, जिससे उसे बहुत झुँझलाहट होती आखिर अपनी परेशानी से बचने के लिए अदिति ने एक रास्ता निकाल लिया__

   ” सुनो सुबह की एक बार की चाय और शाम कि एक बार की चाय बस यह दो चाय तुम्हें फ्री मिलेंगी उसके बीच में जब भी तुम्हें चाय पीनी हो सौ रुपए  निकालकर मेरी टेबल पर रख देना तभी चाय बनेगी।”

  ” अच्छा मतलब अब पति की चाय भी गिनी जाएगी।”

” बिल्कुल ! चाय क्या सिगरेट भी गिनी जाएगी, जिस दराज़ में छिपा कर रखी थी तुमने वहाँ से निकाल कर मैंने अपने पर्स में डाल ली है, अब हर बार यानी सुबह और शाम चाय के बाद एक एक सिगरेट बस मिलेगी।”

  ” हद है यार! ये तो बदतमीज़ी है।”

  ” हां! तो मैं हूं बदतमीज… मैंने कब कहा कि मैं तमीज़दार  हूं मैंने तो शादी से पहले ही सब बता दिया था मेरे बारे में।

   ” अच्छा देवी जी ! गलती हो गयी, अब एक कप चाय मिलेगी? दो सौ दे दूंगा!”

   अदिति मुस्कुरा कर चाय बनाने रसोई में चली गयी। चाय लेकर वापस लौटी तब तक में नोट जेब के हवाले हो चुका था__

  ” पैसे कहाँ हैं?”

  ” कौन से पैसे? कैसे पैसे?”

  ” अभी के अभी चाय सिंक में पलट दूंगी।”

  ” ओह्ह अच्छा वो! ऐसे कहो न, मुझे लगा था तुम मज़ाक कर रही हो। लो बाबा रख लो, वैसे भी क्या फर्क पड़ता है।”

   अदिति ने आगे बढ़ नोट ले लिया और चाय भास्कर को देकर अपना लैपटॉप खोल बैठ गयी।

  दो दिन बाद मंगलवार था, भास्कर के घर वैसे भी सभी वैजिटेरियन थे , वो ज़रूर कभी कभी खा लिया करता लेकिन मंगल का उसे विशेष परहेज़ था, ये बात उसने अदिति से भी कह रखी थी।
     उस मंगल सर भारी होने से अदिति ऑफिस नही गयी थी।
   शाम हुई तब अपने डॉग ब्रूनो को लिए वो टहलने बाहर निकल गयी।
   टहलते टहलते वो अपनी कॉलोनी के बने गेट से कुछ बाहर निकल आयी, सामने ग्रीन चिली दिख गया। शादी के बाद से ही ढंग से नॉनवेज नही खा पायी थी, उस छोटे से रेस्टोरेंट के बाहर चमकती चिकन चिली की तस्वीरें उसे ललचाने लगी, ब्रूनो को बाहर बांध वो भीतर चली गयी….
     चिकन चिली के साथ कोक के घूँट भरती आनंद के सागर में डूबती उतरती वो ये ही भूल बैठी की आज मंगलवार है और आज के दिन नॉनवेज नही खाने की भास्कर ने उसे हिदायत दे रखी है।
    खैर कुछ हिस्सा उसने अपने प्यारे ब्रूनो के लिए बचाया और बाहर निकलने लगी कि उसे ध्यान आया भास्कर भी ऑफिस से आता ही होगा, उसने उसके लिए चायनीज़ पैक करवाया और घर वापस चली आयी।
      भास्कर के ऑफिस से आकर फ्रेश होते में उसने चायनीज़ गरम कर उसके लिए परोसा ही था कि उसके घर से फ़ोन आ गया।
     
    अभी फोन पर बात कर ही रही थी कि भास्कर की भड़की सी आवाज़ अदिति के कानों में पड़ी__

  ” क्या है ये?”

  अदिति ने प्यार से जवाब दिया__” चायनीज़ है जानू”

  ” वो तो मुझे भी दिख गया लेकिन बिल में तो और कुछ दिख रहा?”

   भास्कर की बात सुनते ही अदिति की जीभ दांतों के बीच आ गयी, उफ्फ कितनी बड़ी गड़बड़ हो गयी, गलती से बिल भी पैकेट में डाल दिया जो घूमते फिरते भास्कर के हाथ आ गया__

  ” मम्मी जिंदा रही तो फिर फ़ोन करूँगी आज तो भास्कर मार ही डालेगा नही तो तलाक तो दे ही देगा।”

  फोन पटक वो जब तक बाहर भागती भास्कर अंदर चला आया, आते ही बिल उसने अदिति के सामने कर दिया, अदिति परेशान सी नीचे देखने लगी

  ” गलती हो गयी बेबी! सच्ची बहुत बड़ी गलती हो गयी। मेरे दिमाग से बिल्कुल उतर गया था कि आज मंगल है।”

  ” हद है यार, तुम्हारा पति इतना बड़ा पंडित और तुम एक मंगल को भी अपनी जबान के चटकारे को छोड़ नही पायीं ।”

  ” माफ कर दो ना शोना, कहा ना गलती हो गयी, कान पकड़ती हूँ।”

  ” वाह कान पकड़ने से सब रिवर्स हो जाएगा क्या?”

  ” फिर और क्या करूँ बोलो! गंगा जल पी लेती हूँ थोड़ा सा।”

” दस हज़ार !!”

  ” क्या ? क्या कहा?”

  ” एक बार में सुनाई नही पड़ा? दस हज़ार !”

  भास्कर का हर्जाना सुन अदिति की सांस में सांस आयी और हिम्मत भी बढ़ गयी

  ” कुछ ज्यादा नही है? पांच ठीक रहेगा।”

  ” ठीक है लेकिन तुरंत निकालो!”

  ” हद है , अपनी बीवी पर भी कोई रियायत नही। अब तो पांच भी ज्यादा लग रहा” अदिति मुस्कुराने लगी

  ” कोई फर्क नही पड़ेगा तुम्हारे मुस्कुराने से, अभी के अभी पांच हज़ार निकालो, मेरे चायनीज़ खाते में गर्मागर्म चाय बना कर लाओ और कल से मुझे तीन सिगरेट मिलेगी।”

  मुहँ बना कर अदिति रसोई में चली गयी तभी उसका फ़ोन वापस बज उठा, उसकी माँ का फ़ोन था।

  “रब दा शुकर है तूने फ़ोन उठा लिया आदि, मैने तो लगा जाने क्या फसाद खा बैठी तू?

  ” अरे मम्मी ! इत्ती टेंशन ना लिया करो, मैं ज़िंदा वी आ और चंगी वी। आज ज़रा चिकन खा बैठी मंगल था न इसीलिए भास्कर नाराज़ हो गया।
   पर बात पांच हज़ार पर सेटल हो गयी।”

  ” पांच हज़ार पर ? मतलब?

  ” मतलब पांच हज़ार का जुर्माना ठोक दिया तेरे जमाई ने मम्मी, और क्या?”

  ” है भगवान क्या जोड़ी है तुम दोनों की। ऐसे पति पत्नी तो आज तक न  सुने न देखे। बात बात पर एक दूजे पर जुर्माना ठोंकते हो, बाद में इन रुपयों का करते क्या हो?

  ” साथ में फ़िल्म चले जातें हैं या डिनर पर। एकाउंट तो जॉइंट ही है मम्मी।

  अदिति की खिलखिलाहट सुन उसकी माँ भी निश्चिंत हो गयी।

******

    सुबह सुबह निरमा के मामा मामी ढेर सारे सामान से लदे पहुंच गए। उन्हें देख निरमा खुशी से खिल उठी।
     इतने दिनों बाद मायके से कोई आया था। बातों बातों में मामी उसे पहले ही बता चुकी थी कि उसकी गोद भराई के लिए वो और मामा जी उसके पास आने वाले हैं।
      गोद भराई की कोई रस्म प्रेम के घर होती है या नही ये जानने के लिए जब निरमा ने प्रेम से पूछा तो उसने इस बारे में अनभिज्ञता ही जताई

  ” आपको जो जैसा अच्छा लगे कर लीजिए मामी जी। वैसे भी ये रस्म करना तो बच्चे और माँ के लिए अच्छा ही होगा।”

  “हाँ जमाई बाबू।  इस रस्म से माँ और बच्चे को सबका आशीर्वाद मिलता है। यहाँ आस पास निरमा की जो भी सखी सहेलियाँ होंगी सबको बुला लेंगे।

   अगले दिन सारी तैयारी के साथ निरमा की गोद भराई की रस्म हो गयी।
   हरी साड़ी में सजी निरमा दमक रही थी, एक एक कर सुहागनें फल मेवे चूड़ियां उसकी गोद में डालती जाती और उसके कान में कुछ न कुछ कहती खिलखिला कर एक ओर चली जातीं।
    महल से रानी माँ ने सिर्फ बाँसुरी को ही जाने की इजाज़त दी, जाना तो रूपा और जया भी चाहती थी क्योंकि उन दोनों का भी निरमा से स्नेह था लेकिन माँ साहेब के खिलाफ जाने की किसी की हिम्मत ना थी।

   बाँसुरी ने अपने लाये तोहफे निरमा की गोद में डालने के बाद उसके कान में कुछ कहा और हंसती हुई प्रेम के पास पहुंच गई

  ” प्रेम भैया आज कोई ना कोई तोहफा तो आपको भी देना ही होगा मेरी सहेली को”

   प्रेम को पहले से कुछ पता नही था, वरना वो भी बाजार से कुछ ले आता , वो आगे बढ़ा अपने जेब से कुछ कैश निकाला ही था कि फिर किसी की आवाज़ कानों में पड़ी __

  ” अरे अपनी ही बीवी को रुपये कौन देता है कुछ हीरा मोती पहनाओ ।”

  इतनी औरतों के बीच वैसे भी प्रेम सहज नही हो पा रहा था, उस पर सब की सब निरमा के साथ साथ उसे भी छेड़े जा रही थी। उसने जेब के रुपये वापस रख लिए और अपने गले की सोने की चेन उतार कर सामने बैठी निरमा के गले में डाल दी।
    उस एक पल दोनो की नज़रे मिली , कितने प्यार से निरमा उसे देख रही थी, और जब भी वो ऐसे उसे देखा करती उसे हर बार लगता कि आगे बढ़ निरमा को गले से लगा लूँ।
   कुछ पल दोनो एक दूसरे को देखते रह गए__

  ” बाबू बहुरिया को देखते हुए भूल ना जाना, कुछ आशीर्वाद भी देते जाओ।”

   प्रेम ने निरमा को चेन पहनाने के बाद उसके सर पर हाथ रखा __

” सदा खुश रहो ।”

  वो एक तरफ होकर फिर धीमे कदमों से बाहर निकल गया, उसे पता था खाना पीना निपटने में अभी वक्त लगना था, अगले दिन राजा ने कुलपति और विद्यार्थियों का भोज रखा हुआ था, इसी से तैयारियां देखने वो महल निकल गया।
    हंसी ठिठोली के बीच सारा काम अच्छे से निपट गया।
     शाम ढले प्रेम के लौटते तक में भीड़भाड़ वापस जा चुकी थी।
       मामी उसे और मामा जी को साथ बैठा कर खाना परोस रहीं थी __

  ” जमाई जी ! एक बात कहनी थी, हमारे यहाँ पहली जचकी मायके ही होती है, निरमा का मायका तो हम ही हैं तो अगर आप कहें तो हम लोग कल निरमा को भी अपने साथ ले जाना चाहतें हैं।”

    प्रेम के गले में कौर अटक गया, उसने तो जब से निरमा आयी ये कभी सोचा ही नही कि वो कहीं और भी जा सकती है, उसने सर उठा कर निरमा की ओर देखा वो भी उसे ही देख रही थी।

  ” जी जैसा आप लोगों को सहीं लगे।”

  मामी ने खुशी से एक और गुलाबजामुन उसकी प्लेट में डाल दिया जबकि ये बात सुनने के बाद उससे कुछ खाया ही नही गया।

      ” जमाई बाबू , मैं यहाँ निरमा के साथ लेट जाती हूं आप और निरमा के मामा ऊपर ही सो जायेगा।”

  मामी की बात पर हाँ कह वो चुपचाप बैठा मामा जी के साथ टीवी पर न्यूज़ देखता रहा।
   मामा जी टीवी पर चलती बहस के साथ कदमताल मिलाये खुद भी कभी किसी तो कभी किसी की तरफ से बोल रहे थे लेकिन उनकी जैसे कोई बात प्रेम को समझ नही आ रही थी, वो बस यही चाह रहा था कि किसी तरह निरमा रुक जाए, पर उससे बोले कैसे ये हिम्मत नही जुटा पा रहा था।

       रात मामा जी के सोने के बाद वो चुपके से कमरे से निकल बाहर छत पर चला आया, बाहर खुली हवा में उसे थोड़ी राहत सी लगी।
     एक बार फिर वो सोचने लगा कैसे रहेगा निरमा के बिना? अब तो उसकी ऐसी हालत थी कि अगर निरमा नीचे है तो वो भी ऊपर अकेले नही रह पाता, वो भी नीचे ही रहता। कोई न कोई बहाना बना कर उसके ही आस पास मंडराता रहता , उसे छुप छुप कर देखता रहता….
      जब वो बाहर धूप में खड़ी अपने बाल सुखाती या आईने में झांकती अपनी आंखों में काजल भरती , “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी ” भजन गाती या ‘दो नैना और एक कहानी थोड़ा सा बादल थोड़ा सा पानी ‘ लोरी गाती उसे निरमा की हर अदा से प्यार था …. हाँ प्यार ही तो हो गया था उसे अपनी पत्नि से ! निरमा से!
     उसी के आने से उसका घर घर बना था, और वो बन गया था आदमी। सलीके से रहना ,समय पर सोना खाना सब उसी ने सिखाया था। वरना पहले तो कई बार वो थकान से खाना भी भूल जाया करता था, पर मजाल निरमा के आने के बाद कभी भी वो भूखे पेट सोया हो?
       वो सोच रहा था कि उसे कुछ खटर पटर सुनाई दी , उसने पलट कर देखा, निरमा सामने खड़ी थी।

  ” आप इतनी रात गए, यहाँ क्या कर रहीं हैं?”

  ” आप भी तो जग रहें हैं, आप यहाँ क्या कर रहे?”

  ” मैं बस ज़रा हवा खाने चला आया था।

  ” और मैं आपका दूध लेकर चली आयी,  आज आपने लिया ही नही था, फिर पानी की बोतल भी बिना लिए ऊपर चले आये, तो वही सब रखने आयी थी, फिर आपको यहाँ देखा तो यहाँ चली आयी, लीजिये दूध पी लीजिये।”

   निरमा के हाथ से दूध लेकर वो वही बेंच पर बैठ चुपचाप पीने लगा

   ” कुछ परेशान है क्या आप ?”

   प्रेम ने निरमा की ओर देखा ” आपका जाना जरूरी है क्या ? ”

  निरमा के चेहरे पर मुस्कान चली आयी लेकिन उसने छिपा कर प्रेम को जवाब दिया

  ” मामी का बहुत मन है, कैसे मना करूँ? अच्छा भी तो नही लगेगा।”

  ” हम्म लेकिन वहाँ कुछ मेडिकल इमरजेंसी हो गयी तब मामा जी अकेले कैसे भागदौड़ करेंगे?”

  ” मामा जी के एक दोस्त और उनका बेटा डॉक्टर हैं, उनका अस्पताल भी घर के पास ही है। मामी ने उन्हीं से बात कर रखी है।”

  ” अच्छा! वैसे डिलीवरी में कितना वक्त है?

  ” एक डेढ़ महीने और हैं।”

” एक डेढ़ महीना ? मतलब आप इसके बाद आएंगी?

  ” नही उसके भी डेढ़ महीने बाद क्योंकि डिलीवरी के बाद सवा महीना घर से नही निकलते है ना!

” अच्छा ?”

  ” हम्म ! जाइये सो जाइये फिर सुबह सबको छोड़ने स्टेशन तो आप ही चलेंगे ना?”

  ” हाँ ! ” उदास सी हाँ बोल कर प्रेम उठ गया, उसके पीछे अपनी हंसी छिपाती निरमा भी सीढियां उतर अपने कमरे में चली गयी।

    अगले दिन की ही वापसी की ट्रेन थी, मामी तो पहले ही निरमा का रिज़र्वेशन भी करा आयी थी। सुबह से वो रसोई में घुसी यात्रा की तैयारियों में लगी थीं।
      मामा जी सुबह की गुनगुनी धूप में बैठे अखबार पढ़ रहे थे, प्रेम को भी उन्होंने अपने साथ ही बैठा रखा था, अब तक उनकी दो चाय हो चुकी थी, मामी जी रह रह कर उन्हें नहा लेने की ताकीद कर रहीं थी लेकिन उन्हें अखबार के चटकारे अपने जमाई के साथ बाँटने में अद्भुत आनंद मिल रहा था।
     प्रेम का पूरा ध्यान निरमा पर लगा था , उसने रात भर में ढेर सारी हिम्मत जुटा ली थी कि कैसे भी हो निरमा को जाने से रोक ही लेगा, ज़रूरत पड़ी तो उसका हाथ पकड़ कर उसके सामने हाथ जोड़ कर कहेगा कि रुक जाओ! मैं यहाँ अकेला क्या करूँगा।
   लेकिन सुबह से वो कहीं नजर ही नही आ रही थी, शायद कमरे में अपनी पैकिंग में लगी थी।
        उसे भी कितनी हड़बड़ी है जाने की ।

नाश्ते की टेबल पर मामी ने निरमा को भी बुला लिया था।
     प्रेम ने एक आध बार उसकी तरफ देखा भी लेकिन वो तो खाने में और मामी के हाथ की तारीफ करने मे लगी थी…..

     रेडियो पर कुछ पुरानी गज़ले चल रही थीं……

        तुम ही सोचो ज़रा , क्यूँ ना रोकें तुम्हें
         जान जाती है जब, उठ के जाते हो तुम
तुमको अपनी क़सम जानेजां, बात इतनी मेरी मान लो
         आज जाने की ज़िद ना करो
              यूँ ही पहलु में बैठे रहो……

   यूँ लग रहा था जैसे सब खुश हैं, खुद में मस्त हैं और उसका मजाक बना रहे हैं….
     सारा सामान बांध कर आखिर प्रस्थान की तैयारी हो गयी….
    उसने एक एक कर सारे बैग्स उठा कर गाड़ी की डिक्की में डाले, और खुद जाकर ड्राईविंग सीट पर बैठ गया,  नाराज़गी से उसने फिर निरमा की तरफ देखा भी नही… मामा जी आये और उनके पीछे मामी चली आयीं, दोनो आकर बैठ गए , वो अब तक रुका हुआ था__

  ” चलें जमाई बाबू! देर हो जाएगी वरना!”

  उसने चौन्क कर दरवाज़े की ओर देखा फिर मामी जी को ” निरमा आ जाये , उन्हीं का इंतज़ार कर रहा हूँ।”

  ” क्यों ? अरे आपकी पत्नि आपको छोड़ कर हमारे साथ जाने को राज़ी नही हुई, स्टेशन जाने को तैयार थी तो मैंने ही मना कर दिया, इतनी दूर बिना मतलब जाने आने में थकान हो जाएगी।”

  प्रेम की खुशी संभल नही रही थी, उसने दरवाज़े की तरफ देखा, बगीचे के बाहर गेट पर खड़ी निरमा मुस्कुरा रही थी, उसने उसे देखा और मुस्कुरा कर गाड़ी आगे बढ़ा दी।

  *****

      खेल समारोह समापन के बाद अगले दिन के लिये राजा ने सब को महल में आमंत्रित कर लिया था।
     शाम से ही महफ़िल सजने लगी थी, एक एक कर राजा के आमंत्रित अतिथि राजभवन की शोभा बढ़ाते चले जा रहे थे….
    राजा पलंग पर लेटा कुछ ज़रूरी कागज़ पढ़ रहा था… बाँसुरी सामने तैयार हो रही थी।
   दूध की बात पता चलते ही बिना बाँसुरी को मालूम चले ही राजा ने मेनका को काम से हटा दिया था, उससे खूब कड़ाई से पूछने पर भी वो कोई नाम उससे कबूलवा नही पाया था, समर तो और कड़ाई कर बैठता पर राजा के मन का ये डर की कहीं माँ साहेब का नाम सब के सामने आ गया तो क्या होगा कि वजह से ही उसने मेनका को कोई बहुत कड़ी सजा दिए बगैर ही उसकी हमेशा के लिए छुट्टी कर दी थी।
    मेनका मंडी के किसी गांव की रहने वाली थी जिसे माँ साहेब ही कभी साथ लेकर आयीं थी।
  उसे राजा की सिक्योरिटी के दो आदमी महल से छिपा कर चुपचाप उसके गांव छोड़ आये थे।
   ये बात और थी कि ना मेनका को उसकी गलती समझ आयी थी, और ना ही असली गुनाहगार पकड़ में आया था।

    मेनका के जाने के बाद एक दूसरी सहायिका बाँसुरी की सेवा में उपस्थित थी लेकिन मेनका के अचानक छुट्टी पर चले जाने से वो अचंभित थी।
   नई सहायिका को बाहर भेज वो खुद तैयार हो रही थी और राजा एक टक उसे ही देख रहा था….

   ” ऐसे क्या घूर रहे हो ? नज़र ना लगाओ मुझे।”

  राजा मुस्कुराने लगा __ ” तुम तक आने वाली हर नज़र को मेरा मुकाबला करना होगा पहले।
    इतना  आसान नही है मेरी हुकुम को नज़र लगाना। पहले मुझसे मुकाबिला करना होगा, जान ले लूँगा अगर किसी ने देख बस लिया तुम्हें।”

   बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा के पास चली आयी, उसके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके गालों पर उसने अपनी मुहर लगा दी__

  ” अरे ये क्या कर दिया? सारी लिपस्टिक मेरे गालों पर लगा दी।”

  राजा की बात पर बाँसुरी खिलखिला उठी__

  ” अभी तो जान लेने देने की बात हो रही थी, यहाँ एक ज़रा सी लिपस्टिक से ही मुहब्बत हवा हो गयी।”

  ” वो अलग बात है, और ये अलग।”

  “अलग कैसे हुई? वो तुम्हारे प्यार जताने का तरीका था, ये मेरे प्यार जताने का तरीका है। अगर वो गलत नही,  तो ये गलत कैसे?

  ” मैंने कब कहा कि गलत है लेकिन इन निशानों के साथ सबके सामने भी तो नही जा सकता?”

  ” आप हुकुम है, आप जो करेंगे वो मिसाल बनेगी।”

  ” तो अब लोगों को साबित करने के लिए की मैं अपनी हुकुम से कितना प्यार करता हूं, उसके दिए लिपस्टिक मार्क्स लेता घूमूं?”

  ” बेशक! अच्छा रुको निशान सही जगह दे देती हूँ”

  बाँसुरी को आगे बढ़ते देख राजा पीछे हटने लगा __

  ” शेरनी का मूड पार्टी में जाने का नही लग रहा आज?

  ” शेरनी का शिकार करने का मूड है आज”

  ” ओके डन! तो मैं समर को कॉल कर कह देता हूँ वो पार्टी संभाल लेगा! आ जाओ फिर! ”

  ” चुप करो! जल्दी से तैयार हो जाओ। मैं तैयार हो चुकी हूँ ।”

  ” मेरी तरफ क्यों आ रही थी फिर”

  ” फ़ोन लेने, मेरा फोन तुम्हारे पास जो था।”

  ” शैतान लड़की!”

  ” क्या करूँ ? तुम्हे देख शैतानी सूझने लगती है।”

   दोनो हंसते खिलखिलाते पार्टी की तरफ निकल गए।


   पार्टी अपने शबाब पर थी, और होती भी क्यों ना राजमहल की थी उस पर आने वाले मेहमान भी खास थे।
       ऑफ शोल्डर गोल्डन ब्लाउज़ पर गहरे नीले रंग की साड़ी में केसर खूब फब रही थी, अपनी खूबसूरती पर इठलाती वो माँ साहेब की ओर बढ़ गयी।
     अभी उन तक पहुंची ही थी कि राजा बाँसुरी के साथ चला आया।
  वो भी आते ही माँ साहेब का आशीर्वाद लेने उनकी ओर ही बढ़ चला, उसे आते देख केसर ने झुक कर माँ साहेब के पैर छुए और उनसे बात चीत में लग गयी।
     गहरे मैरून रंग की साड़ी में बाँसुरी के वहाँ आकर राजा के पास बैठते ही केसर का सारा तेज चूक गया।
  उसे राजा के साथ देखते ही वो बुझ गयी लेकिन इतनी आसानी से हार मान लेने वालों में से वो नही थी, आखिर तीन साल से उसने अपने अंदर की चिंगारी को हवा दे देकर जलाए रखा था, इस दो बित्ते की लड़की को तो वो तूफान में उड़ते तिनके सा राजा की ज़िंदगी से निकाल फेंकेगी।

    देशी विदेशी सूरा आसव जहाँ प्रचुरता से बह रहे थे वहीं  ठेठ राजपूती पकवानों की खुशबू भी फैल रही थी।
    केसर राजा से बात करने का बहाना ढूंढ रही थी कि उसे पहचान कर माँ साहेब ने उसके पिता का हाल चाल पूछ लिया__

  ” जी रानी सा! पापा ठीक ही हैं, असल में उस वक्त उन्हें जो झटका लगा उसके बाद वो वापस कभी उठ ही कहाँ पाए।
   मैं मानती हूँ वो गलत थे, और इसलिए हुकुम की सज़ा से ज्यादा उनका ज़मीर उन्हें  खा गया। बेचारे आज भी पछता रहे।”

   बात ऐसी आवाज़ में कही गयी थी कि दो कुर्सी के बाद बैठे राजा के कानों में बात पड़ जाए। भले ही राजा की पीठ थी उस ओर लेकिन उसे सुनाई दे ही गया जो केसर उसे सुनाना चाहती थी, अब राजा ने मुड़ कर देखा और थोड़ा ज़ोर देने पर उसे केसर वखारिया से जुड़ी तीन साल पुरानी हर बात याद आ गईं।
    उसे खुद को देखता देख केसर ने शरमा कर पलकें झुका ली।

    राजा वापस समर की ओर हो गया, उसने समर से पूछा __

   ” जी सही पहचाना आपने हुकुम, केसर वखारिया सुदामा वखारिया की ही बेटी है, वही सुदामा जो आपके फैसले के बाद ज़रा नाराज़ भी हो गए थे, इत्तेफाक से उसी वक्त उन्हें फालिज भी मार गया, ये उन्हीं की बेटी है जिनके विवाह प्रस्ताव को भी आपने फेर दिया था।”

    बाँसुरी को रूपा भाभी और जया भाभी ने अपने साथ रोक रखा था, राजा समर के साथ बातों में लगा था लेकिन बीच बीच में दोनों ही एक दूसरे को देख लेते थे, राजा ने उसे पहले ही इशारा कर रखा था कि खाना साथ ही खाएंगे।
समर उससे किसी केस से सम्बंधित  कुछ चर्चा कर रहा था कि केसर एक प्लेट सजाए उसकी तरफ चली आयी__
 

  ” क्या अब भी हमसे नाराज़ हैं राजा साहब?”

  “आपसे तो पहले भी कोई नाराज़गी नही थी।”

  केसर ने खाने की प्लेट उसकी ओर  बढ़ा दी, प्लेट देख वो मुस्कुरा उठा__

” आप महल की मेहमान है, पहले आप लीजिये।।”

  ” इसका मतलब हमारा छुआ भी नही खा सकते आप?”

    ” जी ऐसी कोई बात नही….” मुस्कुराते हुए राजा ने उसकी प्लेट से एक टुकड़ा सलाद उठाया और अपने मुहँ में डाल लिया।

    दूर खड़ी बाँसुरी को दोनो की कोई बात सुनाई नही दे रही थी लेकिन दोनों के मुस्कुराते चेहरों और राजा के उस लड़की की प्लेट से कुछ उठा कर खाना ज़रूर दिखाई दे रहा था__

  ” राजे महाराजों में ये सब फैशन होता है… लड़कियां इनके लिए कोई अजूबा बात नही। आप भी इन बातों की आदत डाल लीजिये । आखिर इन लोगों के कंधों पर कितनी ज़िम्मेदारियाँ भी तो होती हैं अगर अपनी ज़िम्मेदारी को कुछ देर के लिए भूल वो अपने जीवन में कुछ पल सुकून के बिताना चाहें,  सुख की सांस लेना चाहें तब ऐसे में उन्हें बेफिजूल बंधनों में बांधना क्या किसी भी समझदार रानी को शोभा देता है?
    राजे रजवाड़ों में ये मान अभिमान की बात है, इसे ज्यादा दिल पर मत लीजिये रानी अपूर्वा।”

   माँ साहेब की बात सुन बाँसुरी का रहा सहा धैर्य भी चूक गया __

  ” मान अभिमान की बात तो है ही माँ साहेब , एक स्त्री के सम्मान की बात, उसके अपने पति पर के अभिमान की बात।
    आश्चर्य है एक पुरुष और स्त्री के मध्य का सबसे प्रगाढ़ सम्बन्ध भी इन तुच्छ मान की बातों पर कैसे बलि चढ़ जाया करता है”

    बात हाथ से निकलते देख रूपा ने सहायकों को कह कर सबके लिए खाना मंगवा लिया, सभी खाने में लग गए लेकिन फिर बाँसुरी के गले से एक निवाला भी अंदर नही गया….

  क्रमशः

aparna….


   

   

 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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