जीवनसाथी-67

जीवन साथी — 67


  

     रूपा ने सबके लिए खाना मंगवा तो लिया था लेकिन बाँसुरी से कुछ खाया नही जा रहा था, उसकी नज़र राजा पर ही थी, आखिर उसने उससे कहा जो था साथ खाने के लिए। शादी के बाद से आज तक कोई दिन ऐसा नही गया था जब वो उससे पहले खा ले, उसकी दुविधा देख माँ साहेब फिर बोल उठी__

  ” आप खा लीजिये रानी अपूर्वा! कुमार को तो ढेरो मेहमानों से मिलना है , उनका मेहमानों के साथ इस वक्त रहना जरूरी भी है।”

   हाँ में सिर हिला कर वो कभी अपनी प्लेट तो कभी राजा को देख रही थी।
     इधर राजा का खुद पूरा ध्यान बाँसुरी पर था, लेकिन वो चाह कर भी लोगों के बीच से उठ कर उस तक जा नही पा रहा था।
    समर कुछ विशेष अतिथियों को साथ लिए राजा के पास चला आया और केसर को बड़ी अनिच्छा से राजा के पास से हटना पड़ा।

    ” बहुत कोमल मन की हैं आप रानी अपूर्वा! “

    रानी माँ की बात पर बाँसुरी मुस्कुरा कर रह गयी__

  ” माँ साहेब आपके लिए तो मैं सिर्फ आपकी बहु हूँ, आप बस नाम ही लिया कीजिये, आप क्यों मुझे रानी बुलाती हैं, बहुत औपचारिक लगता है।”

  ” आपको लगता होगा आदत जो नही है। हम यही तो समझा रहे कि आप ज़रा ज़रा सी बात दिल पर ले लेती हैं। हम राजपूत इतने कमज़ोर नही होते, बल्कि हमें तो हमारे इतिहास पर गर्व है, हमारे सिर्फ राजे महाराजों ने ही नही रानियों में भी जब ज़रूरत पड़ी तलवार लहराई है…..
    एक तरह से देखा जाए तो हमारे राजपूताने के मज़बूत कंधों ने ही मानव जाति को जिलाये रखा है, बाकी ब्राम्हण तो हमेशा से डरपोक प्रवित्ति के रहें हैं। बुरा मत मानियेगा लेकिन आपके पिता को ही देखिए कितना चुप से घबराए से थे यहाँ, उनके मुहँ से तो बोल तक फूटते….

   रानी माँ जाने और क्या कह जाती , बाँसुरी ने उन्हें आधे में ही टोक दिया__

   ” माफी चाहती हूँ माँ साहेब! लेकिन ये जाति पाती की बातें मैं नही मानती।
   मेरे लिए हर इंसान बराबर है.. अगर वो सच्चा है ईमानदार है और काबिल है तो फिर वो किसी भी जाति का हो।
  दूसरी बात आपने ऋषि परशुराम का नाम तो सुना ही होगा, मेरे पापा मुझे बचपन में उनकी कहानी सुनाया करते थे कि एक बार उन अकेले ब्राम्हण ने अकेले ही समस्त धरती को क्षत्रिय विहीन कर दिया था, क्षत्रियों की इसी बात पर नाराज़ हो कर की उन्हें घमंड हो गया था कि सारी धरती का बोझ उन्हीं के कांधों पर टिका है। हाँ पापा ज़रा कम बोलतें हैं सिर्फ ज़रूरत भर की बातें लेकिन ये उनकी कमी नही खूबी है क्योंकि बिना ज़रूरत के और बिना सोचे समझे तो कोई भी बोल लेता है ….

    माँ साहेब ना चाहते हुए भी मुस्कुरा उठी__

  ” आपकी यही बुद्धिमता है, जिससे हम प्रभावित हैं अपूर्वा।  तभी तो  आपका नाम भी हमने इतना सोच समझ कर रखा है, वैसे भी कुमार की पत्नि होना ही अपने आप में सबसे बड़ी खूबी है।”

   बाँसुरी की समझ से परे था कि आखिर क्यों हर बार उसके माँ साहेब की तरफ कदम बढ़ाने पर भी वो उसे पटखनी दे ही जाती थीं। खैर!!
   अब दूध वाले कांड के बाद से उसका उन पर रहा सहा विश्वास भी हिल गया था।

   ” आपमें भले ही और कोई खूबी ना हो पर हुकुम की पत्नि होना भी क्या कोई कम अचीवमेंट है? क्या हम आप रॉयल लेडीज़ को जॉइन कर सकतें हैं?” केसर वहीं चली आयी।

    रानी माँ जाने क्यों केसर को देख कर खिल जाती थीं, उन्होंने बड़े प्यार से हाथ पकड़  बाँसुरी की ठीक बगल की कुर्सी पर उसे बैठा दिया __

” सब किस्मतों की बात है, लेकिन हाँ कोई कुछ भी कहे हमें तो अपने राजपूत होने पर गर्व है, और हम जानतें हैं बाकी बैठी सभी दुल्हनों को भी होगा, अपूर्वा की बात वो ही जाने?”
 
   माँ साहेब हर बात को ऐसे घुमा जाती की बाँसुरी के लिए चुप रहना मुश्किल हो उठता था__

  ” अगर हर जन्म में साहेब की मिलने की शर्त यही हो तो मैं हर जन्म में राजपूत ही पैदा होना चाहूंगी।”

   बाँसुरी की मीठी सी बात पर रुपा चहक उठी__

   ” वाह वाह ! लव बर्ड्स!
     वैसे कुंवर सा भी भारी रोमैंटिक हैं और अब तो लगता है आप भी बिल्कुल उनके रंग में रंग चुकी हैं।”

  रूपा कहने को कह गयी लेकिन माँ साहेब की तरफ ध्यान जाते ही उसने दाँतों तले अपनी जीभ काट ली_
  ये क्या कह गयी, वो भी सासु सा के सामने!

    रूपा की बात पर सभी मुस्कुरा उठे बस एक केसर अंदर तक सुलग के रह गयी…. जाने माँ साहेब को केसर की पीड़ा समझ आ रही थी या अनजाने ही उनसे ऐसा हो रहा था लेकिन केसर उनकी दयादृष्टि की कुछ अधिक ही पात्र बनती जा रही थी__

  ” केसर ! कल कुमार का जन्मदिन है , सुबह हमने उनके नाम पर महल में पूजा रखी है और उसके बाद शाम को एक छोटा सा आयोजन है, आप भी आइए हमें और कुमार को अच्छा लगेगा।”

   केसर तो जैसे इसी मौके की ताक में बैठी थी, उसे महल और महलवासियों से नज़दीकियां बढ़ाने का वैसे भी मौका चाहिए ही था, इतने सालों से जिस सूखी सी  प्रेम बेल को वो अकेले सहेजती सींचती आयी थी अब उस पर फूल खिलने का समय आने लगा था।
   राजा को देखती बैठी केसर खुद में खोई यही सोच रही थी कि काश बनाने वाले ने कोई कमी तो इसमें बनाई होती , उसी कमी को देख नफरत कर ली जाती, क्या कोई इतना भी परफेक्ट हो सकता है?
   
     आयोजन समाप्ति की ओर था, मेहमान एक एक कर वापस लौटते जा रहे थे, जाने क्या सोच कर केसर ने अपने सहायक को गाड़ी के साथ पहले ही वापस भेज दिया था, माँ साहेब से अनुमति लेने के बाद बाँसुरी और बाकी लोगों से मिल कर वो बाहर निकल गयी…__

  ” आप जाएंगी कैसे केसर? आपकी गाड़ी तो आपने हमारे सामने ही वापस भेजी थी , किसी के फ़ोन के बाद।”

   ” रानी साहेब हुकुम ! आप इतना ध्यान रखती हैं अपने मेहमानों का। जी दरअसल पापा को क्लब जाना था , और हमारी एक गाड़ी गैराज में पड़ी थी, दूसरी मेरी गाड़ी घर पर थी लेकिन पापा को बड़ी गाड़ी में चढ़ने उतरने में दिक्कत आती है। मैं अभी जो गाड़ी लेकर आई थी वही उनके मुआफ़िक थी इसी से भेज दी। मेरा क्या है मैं तो टैक्सी लेकर चली जाऊंगी।”

  ” अरे ऐसे कैसे? यहाँ गाड़ियों की कोई कमी नही है, बल्कि कुमार खुद भी आपके साथ चले जायेंगे, अगर आपको ड्राइवर के साथ अकेले जाने में असुविधा हो तो।”

   केसर के मन में जलतरंग बज उठे, उसने बड़ी उम्मीद से राजा की तरफ देखा__

   ” रहने दीजिए रानी साहेब! मेरे जैसी को छोड़ने हुकुम का जाना सुहाता नही है।”

  ” मेरी जैसी से मतलब आपका? आपने इतनी कम उम्र में अपने पिता के सारे बिज़नेस को बखूबी संभाल रखा है, सारी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को निभा रहीं हैं, अपने पिता की देखभाल कर रहीं हैं और उसके बाद भी आपको घमंड छू तक नही गया। हमें आप पर गर्व है केसर। अब तो हम खुद कुमार को आज्ञा देते है कि आपको घर तक छोड़ कर ही आएं।

   माँ साहेब और केसर की जुगलबंदी देखती बाँसुरी ने बहुत लाचारगी से राजा की तरफ देखा, वो जानती थी उसके भोले भंडारी को किसी से ना कहना नही आता

  ” मॉम की कही बात मैंने कभी नही टाली, चलिए मैं खुद आपको छोड़ आता हूँ। आओ बाँसुरी, तुम भी साथ चलो।”

  बाँसुरी का ज़िक्र आते ही केसर के खयालों पर घड़ों पानी पड़ गया , उदास सी आवाज़ में उसने कहा

  ” नही हुकुम आप रहने दें। वैसे भी किसी राजा को शोभा नही देता की वो अपनी जनता को छोड़ने घर तक जाए।”

   उसकी बात का कोई जवाब दिए बिना वो आगे बढ़ गया, बाँसुरी भी माँ साहेब को प्रणाम कर राजा के पीछे निकल गयी। सारे रास्ते राजा के पीछे बैठी केसर उसे आंखों ही आंखों में पीती रही और वो साथ बैठी बाँसुरी से तो कभी उससे कुछ न कुछ पूछता बताता रहा।
      राजा बाँसुरी को घर के अंदर ले जाने से पोर्टिको में खड़ी गाड़ियों को देख केसर के झूठ का भेद खुल जाता इसी से महज अंदर बुलाने की औपचारिकता पूरी कर उन लोगों के मना करने पर वो उन लोगों से विदा ले अंदर चली आयी। आते ही वो भाग कर पहली मंज़िल की बालकनी पर पहुंची  और जब तक राजा की गाड़ी आंखों से ओझल नही हो गयी उसे देखती रही__


    कितनी शिद्दत से चाहती हूँ भूलना मैं तुझे
    उसी कोशिश में हर दफा तू याद आता है।
    तू है एक बेशकीमती सी आरज़ू दिल की
     हो के बेनूर क्यों ना दिल से उतर जाता है।।

   केसर की डायरी के पन्ने पलटती रंभा कुछ ज़ोर से ही शेर पढ़ बैठी, चौन्क कर पलटी केसर ने डायरी उसके हाथ से छीनी और गुस्से में एक तमाचा उसके गाल पर जड़ दिया।
    ये पहली बार नही हुआ था, शहज़ादी के इस सनकीपन से रंभा भी वाकिफ थी लेकिन वो भी लातों की भूत थी। केसर की गालियों और थप्पड़ों की वो आदि थी। चुपचाप केसर का नाइट सूट निकाल बिस्तर पर रखने के बाद उसका रोज़ का पैग बना कर टेबल पर छोड़ वो बाहर निकल गयी।
         नशे में डूबी केसर मोबाइल पर राजा की तस्वीरें देखती थोड़ी ही देर में नींद में डूब गई।

     राजा और बाँसुरी से विदा लेकर प्रेम वापसी को मुड़ा ही था कि निरमा का कॉल आ गया….

   ” कहाँ हैं आप? ज़रा जल्दी घर आ जाईये।”

   ” क्या हुआ? दर्द शुरू हो गए क्या?”

   प्रेम की बात सुन निरमा की हंसी खनक उठी

  ” दर्द नही शुरू हुए अभी लेकिन अस्पताल जाने का समय आ गया है ”

  ” जब दर्द नही शुरू हुए तो फिर कैसे पता?”

  ” अरे और भी लक्षण होतें हैं बाबा! अब आपको क्या बताऊँ, आप तुरंत आइए बस, और गूगल मत करने लगना, घर आओ फिर बताती हूँ क्या हुआ? “

  प्रेम ने परेशानी से राजा की तरफ देखा, उसकी फ़ोन पर की बातें दोनो ही सुन चुके थे

   ” किसी बात को लेकर परेशान हो प्रेम?”

   ” निरमा तुरंत बुला रही है, भोपाल पहुंचने में तो डेढ़ दो घंटे लग जाएंगे। शायद डिलीवरी का समय आ गया है।”

   उसे परेशान देख बाँसुरी मुस्कुरा उठी__

   ” चिंता मत कीजिये प्रेम भैया ! अब आपको उतना दूर नही जाना पड़ेगा।”

   राजा और प्रेम बाँसुरी की रहस्यमयी मुस्कान देख सोचने लगे कि आखिर उसके मन में चल क्या रहा है।
  वही स्वास्थ्य केंद्र जिसका अगले दिन राजा के जन्मदिन पर उद्घाटन होना था का ऐसा अकस्मात उद्घाटन हो जाएगा ये किसने सोचा था?
    प्रेम को घर भेज बाँसुरी और राजा भी कपड़े बदल अस्पताल निकलने तैयार होने लगे।
    बाँसुरी ने फटाफट विराट को फ़ोन कर सारी बात बता दी। वो दोनों पहले ही शहर से डॉक्टर्स और स्टाफ की व्यवस्था कर चुके थे, एक तरह से  स्वास्थ्य केंद्र खुल चुका था लेकिन राजा के जन्मदिवस पर ऑफिशियल श्री गणेश होना था, जिसकी भी सारी तैयारी बाँसुरी पहले ही कर चुकी थी।

   प्रेम भागता दौड़ता सा घर पहुंचा, बाहर निरमा को ना पाकर वो तुरंत उसके कमरे की ओर बढ़ गया।
    निरमा को बाथरूम से सामान्य रूप से निकलते देख वो भौचक्का खड़ा रह गया। आज तक उसने फिल्मों और टीवी सीरियल्स में प्रसूता महिलाओं को पेट पकड़ कर दर्द से कराहते ही देखा था पर यहाँ निरमा उसके सामने मुस्कुराती चली आ रही थी__

  ” क्या हुआ? नही जाना पड़ेगा क्या अस्पताल? ”

  ” जाना पड़ेगा बाबा! बैग रप्चर हो गया है, और कल सुबह तक डिलीवरी भी हो जाएगी, मैं आपका ही वेट कर रही थी, ज़रा ऊपर से वो बैग निकाल दीजिये, और किचन में थर्मस रखा है , उसमें गर्म पानी भर कर ला दीजिये, बस फिर निकलते हैं।”

  जाने प्रेम को निरमा की कितनी बात समझ में आई लेकिन हाँ में सर हिलाता वो तुरंत रसोई से पानी भर लाया और निरमा के बताए बैग को साथ ले लिया। निरमा के दिये कुछ सामान को रखने उसने बैग खोल कर देखा, बैग में तरह तरह के टॉवेल बेबी सोप, ऑयल वगैरह रखे थे। मन ही मन वो एक बार फिर अपनी बीवी पर फिदा हो उठा। अकेले ही कैसे इतना सब सोच समझ लेती है। उसका तो कभी इतना आगे तक दिमाग ही नही चलता। खैर!
   उसने देखा निरमा घर के गाउन में ही उसके साथ चलने को तैयार थी

  ” आप कपड़े नही बदलेंगी।”

  मुस्कुरा कर ना में सिर हिलाती वो आगे बढ़ गयी…

  ” अब हिम्मत नही बची है चेंज करने की, और कोई फर्क भी नही पड़ता। हॉस्पिटल ही तो जाना है मुझे।”

  हम्म कहता वो आगे निकल गया, निरमा को पीछे बहुत धीमे धीमे कदम बढ़ाते देख वो उस तक वापस चला आया। अब तक सामान्य दिखती निरमा के चेहरे का रंग अचानक बदलने लगा था, दर्द की ऐसी लहर सी उठी कि उसके लिए एक एक कदम चलना मुश्किल होने लगा…
    उसे ऐसे देख प्रेम ने धीरे से उसके कान के पास जाकर पूछा..

  ” गोद में उठा लूँ?”

  प्रेम की बातों पर कैसी भी तकलीफ हो वो मुस्कुरा ही उठती थी, ना में सिर हिला कर उसने प्रेम का हाथ थाम लिया।
    अपने दोनों हाथों के घेरे में निरमा को मजबूती से थामे प्रेम अपने साथ ले आगे बढ़ गया।

     राजा को बाजू की सीट पर बैठाई बाँसुरी ने उससे बहुत ज़िद कर आज खुद ड्रायविंग सीट पर कब्ज़ा जमाया हुआ था।
   बाँसुरी के कहने पर विराट पहले ही अस्पताल पहुंच वहाँ डॉक्टर नर्स और बाकी स्टाफ को चाक चौबंद कर उन्हीं सब का इंतज़ार कर रहा था।
    राजा को यह तो समझ आ गया था कि बाँसुरी ने उसके जन्मदिन के लिए कुछ सरप्राइज़ प्लान कर रखा है जो अस्पताल से सम्बंधित है लेकिन अब तक वो ये नही समझ पाया था कि बाँसुरी का पूरा प्लान आखिर था क्या?
    उसे समझ आ गया था कि वो चाहे कितना भी पूछ ले अब उसे उसके सारे जवाब वहीं मिलेंगे जहाँ बाँसुरी उसे लेकर जा रही थी।

    बाँसुरी और राजा के अस्पताल पहुंचने तक में प्रेम भी निरमा को साथ लिए पहुंच चुका था।
  अस्पताल पर नज़र पड़ते ही राजा चौन्क गया, ये तो वही अस्पताल था जिसे खोलने और सुचारू रूप से चलाने का सपना उसके दादा हुकुम का था, और उसके दादा की ख्वाहिश बचपन से रटा रटा कर उसकी दादी सा ने उसके मन में भी गांव वासियों की भलाई के लिए उस अस्पताल को चलाने का सपना सजा दिया था।
    वो बहुत समय से अपने इस सपने को पूरा करने की चाह मन में दबाए अपने ज़रूरी काम निपटाता चला जा रहा था।
   अस्पताल खोलना ऐसा भी आसान नही था, सरकारी लाइसेंस से लेकर परमिट तक हर बात के लिए भागना पड़ता जिसका उसके पास फिलहाल वक्त नही था।
      वो अस्पताल के बारे में बाँसुरी से कुछ पूछने ही जा रहा था कि उस वक्त उससे अधिक ज़रूरी काम में बाँसुरी व्यस्त हो गयी थी।
    प्रेम की सहायता से निरमा को अस्पताल की ओटी की तरफ लेकर जाती बाँसुरी को देख वो भी उसके पीछे हो लिया।
    निरमा को डॉक्टर के पास तक पहुंचा कर राजा और बाँसुरी बाहर चले आये।
     
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      निरमा के पेट में जब से उसके प्यार का बीज अंकुरित हुआ था, उसकी हमेशा से यही चाह रही थी कि उसकी संतान बेटा हो जो बिल्कुल अपने पिता यानी प्रताप की छवि हो , जिसे देख देख कर ही वो अपना सारा जीवन बिता जाएगी लेकिन इधर कुछ समय से उसके मन से प्रताप को परे सरका कर कब प्रेम उसके हृदय आसन पर आ विराजा वो खुद भी कहाँ जान पायी।
   जिस बच्चे के लिए दोनों जुड़े थे वो अब सच में उन्हें जोड़ गया था।

    निरमा को लगा था अस्पताल पहुंचते ही उसकी तकलीफ दूर होने लगेगी, लेकिन जिन लोगो को देखकर उसे शांति और सुकून मिलना चाहिए था उन्हें ही देखकर उसे और घबराहट हो रही थी।
   लेबर ओटी में इधर से उधर भागती नर्स और डॉक्टर उसे यमराज का रूप क्यों लग रहे थे? उस पर हर बीस तीस सेकंड के बाद ऐसा जानलेवा दर्द उठ रहा था कि वो कसमसा कर रह जा रही थी।
     उसे ओटी में लेटाने के बाद डॉक्टर ने प्रेम को तुरंत बाहर जाने कह दिया, प्रेम ने एक नज़र निरमा को देखा और बाहर जाने को मुड़ा ही था कि निरमा ने उसका हाथ पकड़ लिया… प्रेम का भी उसे छोड़ कर जाने का कहाँ मन था?
    डॉक्टर सारी तैयारियों में लगी इस तोता मैना की जोड़ी की आँख मिचौली भी समझ रही थी, नए नए पहली बार माता पिता बनने वाले युवक युवतियों का ऐसा हाल वो कई बार शहर के अपने अस्पताल में देख चुकी थी….

  ” कोई बात नही ! अगर आप भी अपनी पत्नि के साथ रुकना चाहे तो यहाँ रुक कर डिलीवरी देख सकते हैं।”
    डॉक्टर ने अपनी मुस्कुराहट छिपा कर कहा

  ” क्या सच में ? ” प्रेम आश्चर्य से डॉक्टर की ओर देखने लगा , वो खुद अंदर से घबराया हुआ था।

  ” हाँ ! आजकल तो विदेशों में फैशन है ये, माँ जब लेबर पेन में होती है तब पिता को भी वहाँ इसीलिए रखा जाता है कि वो एक औरत की माँ बनने की पीड़ा को समझ सके।”

   प्रेम के साथ अस्पताल का स्टाफ भी आश्चर्य में था , तभी नर्स निरमा के बदलने के लिए छोटा सा ओटी गाउन ले आयी , उस गाउन की लंबाई और अपनी भावी स्थिति को सोच निरमा घबरा गई…

  ” नही डॉक्टर इन्हें प्लीज़ बाहर जाने दीजिए , इनके सामने मुझे बहुत ऑड लगेगा , शर्म आएगी।”

   आखिरी बात कहते ही वो एक बार फिर दर्द से तड़प उठी।
      प्रेम ने निरमा के हाथ पर अपना हाथ रखा और उसे एक बार देख बाहर निकल गया।
    नर्स निरमा की सारी जांचे करने आगे चली आयी।

   *****

    निरमा को भीतर छोड़ बाँसुरी राजा का हाथ थामे बाहर ले आयी…
     रात के बारह बजने में कुछ ही सेकण्ड्स बचे थे।

  “अब कुछ बताओगी भी क्या चल रहा है ये सब?

अपने चारों ओर चमकते अस्पताल को देखता राजा आश्चर्य चकित था

  ” सब बताउंगी साहेब! ज़रा रुको तो।”

   अस्पताल के मुख्य द्वार के ठीक सामने अंदर की तरफ राजा को खड़े कर बाँसुरी एक ओर हो गयी, उसी वक्त उस हॉल की सारी रोशनियाँ किसी ने बुझा दी

  ” अरे बाँसुरी कहाँ हो यार?”

  राजा अंधेरे में आगे बढ़ता की अचानक उस पर ढेर सारे गुलाबों की बारिश होने लगी , वो जहाँ खड़ा था उतने हिस्से में रोशनी हुई और अपने चारों ओर से आने वाली आवाज़ों को सुनता वो चुप खड़ा रह गया। तभी हॉल रोशनी से जगमगा गया, राजा के चारों ओर युवराज भैया , रूपा भाभी, समर विराज रेखा विराट , माँ साहेब के साथ ही खुद महाराज को भी वहाँ देख राजा आश्चर्य मिश्रित खुशी में डूब गया।
     उसने अपने बायीं ओर देखा, बाँसुरी मुस्कुराती खड़ी थी, वो समझ गया हर किसी को इस वक्त यहाँ तक खींच कर लाने वाली वही थी।
      उसने आगे बढ़ अपने  पिता साहेब के पैर छुए , उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया।
    अस्पताल परिसर में सब उसे साथ लिए बाहर चले आये , बाहर उसके दादा साहेब की प्रतिमा का उसे अनावरण करना था जो अगले दिन होना था। वैसे तो रात के समय प्रतिमा अनावरण का काम नही किया जाता लेकिन सब एक साथ वहाँ मौजूद थे और इसलिए युवराज भैया के कहने पर ये कार्यक्रम भी कर लिया गया।
     राजा एक के बाद एक मिलते सरप्राइज़ से अचंभित था, उसे ये तो पता था कि उसके जन्मदिन के लिए बाँसुरी बहुत उत्साहित है लेकिन वो इतना सब कर गुज़रेगी उसने सोचा भी नही था।
      आरती का थाल लिए माँ साहेब ने राजा की आरती उतारी और साथ खड़ी सहायिका को पकड़ा दी…

   माँ साहेब ज़रा इनकी नज़र भी उतार दीजिये कहती कहती बाँसुरी अपने मन की बात मन में ही रखी रह गयी।
    अगली सुबह जन्मदिन के उपलक्ष्य में वैसे  भी जलसा होना था, इसी से मुहँ मीठा कर एक एक कर सभी वहां से चले गए, माँ साहेब ने उन दोनों को भी साथ चलने को कहा लेकिन राजा का उस वक्त बाँसुरी के साथ वहाँ रुकने का मन था, और दूसरी बात राजा और बांसुरी के जाते ही प्रेम बिल्कुल अकेला रह जाता।
     इन्हीं सब कारणों से तो राजा अलग था दुनिया से।
  वरना कौन अपने मातहत के लिए इतना करता है जितना वो किया करता ।
      
    सब के वहाँ से जाते ही राजा ने बाँसुरी को खींच कर अपने गले से लगा लिया, उन दोनों को छोड़ समर अंदर प्रेम के पास चला गया  __

  ” तो ये खिचड़ी पक रही थी तुम्हारी और विराट की.. वहीं मैं सोचूँ कि आखिर मेरी बाँसुरी मुझे छोड़ किसी और के साथ इतनी बातें क्यों कर रही है।”

  ” अच्छा तो साहेब ये सब भी नोटिस कर रहे थे। ”

   ” बिल्कुल ! बीवी हो आखिर, तुम साथ रहो या ना रहो पल की पल की खबर रहती है मुझे । जिस राह से गुज़र भी जाती हो उस राह को सूंघ कर पहचान लूंगा की मेरी हुकुम यहाँ से गुजरी हो।”

  “तुम्हारे अनुचर हैं भी तो इतने सारे , जब चाहे मुझ पर नज़र रख सकते हो। पर मैं क्या करूँ? कैसे नज़र रखूँ ? आजकल मेरे साहेब भी तो मेहमानों पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो रहें हैं।

   राजा ध्यान से बाँसुरी को देखने लगा

” किसकी बात कर रही हो?

  ” वाह ! जैसे समझ ही नही आया। आज पार्टी में दूसरों की प्लेट से बड़ा सलाद खाया जा रहा था।”

  केसर की बात याद आते ही राजा ज़ोर से हँस पड़ा, एक बार फिर उसने बाँसुरी को अपनी बाहों में भर लिया…

  ” हमारी हुकुम को जलन हो रही है । है ना?”

  ” मुझे क्यों किसी से जलन होने लगी, बीवी तो मैं ही हूँ।”

” बीवी क्या सब कुछ तुम ही हो। चिंता मत करो बिना तुम्हारी मर्ज़ी के कुछ किया है मैंने।”

“कहने भर की बात है, करते तो अपनी मर्ज़ी का ही हो।”

  ” अच्छा जी ! ज़रा बताइये क्या किया अपनी मर्ज़ी से ।”

” सबके खिलाफ जाकर एक साधारण सी लड़की से प्यार किया और उसे अपने साथ अपनी जादुई दुनिया में ले आये, उसकी हर परेशानी में हमेशा उसके साथ खड़े रहे, कभी उसके सामने अपने राजा होने का दम्भ नही भरा । कितने सादे कितने प्यारे हो तुम !
    तुम हो ही ऐसे की कोई भी तुमसे प्यार कर बैठेंगा। जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं साहेब! तुम्हें मेरी भी उम्र लग जाये।”

” बस बाबू! तुम्हारे बिना जी कर भी क्या करूँगा, दोनो साथ जिये और साथ ही मर जाये। अब चलो , अंदर चलते हैं प्रेम अकेला परेशान हो रहा होगा।”

    प्रेम को ओटी के बाहर इधर से उधर चक्कर काटते देख वो दोनों उसके करीब आ गए।
    एक वो दिन भी था जब ऐसे ही ओटी में एक जान जा रही थी और वो तीनों बाहर बैठे कुछ नही कर पाए थे।
   ईश्वर का न्याय था कि आज उसी तरह एक बार फिर तीनों साथ थे और अंदर एक नया जीवन सांस लेना शुरू करने वाला था।

  *****

      शाम का वक्त था , भास्कर लैपटॉप पर बैठा कुछ काम कर रहा था कि अदिति का फ़ोन बजने लगा। अदिति को ना आते देख भास्कर ने उसे आवाज़ लगाई…

  ” कहाँ है मेरी पंजाबी तड़का ! फोन बज रहा है तेरा।”

  अदिती जब तक वहाँ आती उसे फ़ोन पकड़ाने के चक्कर में फोन रिसीव हो गया, फ़ोन को एक झलक देख अदिती ने बुरा से मुहँ बनाया और फ़ोन लिए बाहर निकल गयी।

    कुछ दस मिनट में वो वापस आयी, भास्कर ने लैपटॉप से चेहरा हटा कर उसे देखा और इशारे से ही पूछा किसका फ़ोन था, कुछ नही का इशारा करती वो रसोई में चली गयी।
    कुछ देर में अपना काम खत्म कर भास्कर भी पानी लेने रसोई में चला आया, खाना बनाने के बाद अदिती हरी मिर्चे तल रही थी।

  ” ये क्या कर रही हो जानेमन?”

   तली हुई मिर्चों पर नमक निम्बू छिड़कती अदिती ने भास्कर को देखा

  ” अपना औज़ार पैना कर रहीं हूँ।” अपनी जीभ को आगे किये अदिती मुस्कुरा उठी

  ” और कितना तीखा करना है? पहले ही गज़ब तीखी हो। किसी बात का जवाब दिए बिना कहाँ रहती हो, वैसे अभी फोन पर कौन था जिसके लिए इतना उबली बैठी हो।”

  ” और कौन वही शिप्रा और उसका नया चोंचला। उसकी शादी की दूसरी सालगिरह है परसों, उसी में इनवाइट करने कॉल किया था कमबख्त ने।

   ” गालियाँ क्यों निकाल रही हो, पार्टी में ही तो बुला रही है बेचारी। न बुलाये तब भी मुसीबत।”

  ” उसके बुलाने से दिक्कत नही है, उसकी बकवास थीम से दिक्कत है, अब हर एक पार्टी में अलग थीम कौन रखता है ?

  ” रखते हैं शोना। आजकल फैशन है थीम पार्टी।”

  ” ओहहो पंडित जी फैशन का ज्ञान मुझे मत दो, तुमसे कहीं ज्यादा सेंस है मुझे। उसकी बकवास थीम से नाराजगी है। अरे रखना ही था तो 80s रिट्रो रखती, डिस्को थीम रख लेती, जेम्स बांड भी चल जाता लेकिन इसका अजूबा दिमाग, कसीनो एंड वेगस थीम रखी है चुड़ैल ने।”

”  वाओ शानदार थीम तो है ? क्या दिक्कत हो गयी इससे।”

” पक्के वाले जुआरी हैं दोनो, वेगस थीम में अलग अलग तरह के जुएं खिलाएंगे और हम सब के रुपये उड़ा ले जाएंगे। अच्छे से जानती हूँ इस शातिर नागिन को…

   भास्कर का हँस हँस के बुरा हाल था__

  ” गालियों पर पी एच डी कर रखी है मेरी तूफान ने यानी मेरी जान ने! दुनिया वालों सुन लो, बस अदिती के रुपयों की तरफ कोई ना देखो , बाकी जिसे जो करना है कर लो। क्यों ठीक कहा ना, अब इसी बात पर एक चाय हो जाये। बहुत देर से काम कर रहा हूं यार!

  “ठीक है पर….

  ” हाँ हाँ याद है पिछले चार दिन से मैंने रुपये नही दिए, आज पांच दिन पूरे होंगे पूरे पांच सौ ले लेना।”

  अदिती मुस्कुराने लगी__ ” ये पांच सौ माफ कर दिए तुम्हें , तुमने सिगरेट कम की है ना इसलिए।”

   ” ओहहो क्या बात है? तो चलो आज कहीं बाहर चलते हैं , डिनर के लिए?

” सिर्फ पांच सौ में डिनर हो जायेगा ? ये भी खूब रही तुम्हारे पांच सौ माफ किये और बदले में तुमने पांच हज़ार उड़ा दिए।”
    वो हँसती खिलखिलाती रसोई में चाय चढ़ाने चली गयी।

******

  अस्पताल में तीनों बेबस बैठे इंतज़ार कर रहे थे।
प्रेम ने राजा और बाँसुरी से वापस लौटने की गुज़ारिश भी की लेकिन ना राजा को मानना था और ना उसने माना।
       समर के बताने पर प्रेम के कर्मचारी भी वहाँ चले आये थे, समर खुद एक किनारे बैठा उन लोगों के साथ प्रतीक्षा कर रहा था।

    कुछ समय की प्रतीक्षा के बाद एक बच्चे की रोने की आवाज़ उस पूरे परिसर में गूंज उठी।
   आवाज़ सुनते ही सब खुशी से अपनी जगह खड़े हो गए, कुछ देर में नर्स बच्चे को साफ सुथरे कपड़े में लपेटे बाहर चली आयी__

  ” बच्चे के पिता कौन हैं?”

  समर राजा और प्रेम को सामने देख नर्स पूछ बैठी।
उसके सवाल पर प्रेम आगे बढ़ आया, लेकिन बच्चे को गोद में लेते हुए वो सहज नही हो पा रहा था, बाँसुरी ने आगे बढ़ बच्चे को गोद में ले लिया…

” क्या हुआ प्रेम भैया? डर लग रहा है क्या?”

  प्रेम ने मुस्कुरा कर हाँ में सिर हिला दिया__

” हाँ बहुत ही छोटा जो है, कहीं हाथ से फिसल गया तो ?”

  प्रेम की बात पर राज ने बच्चे को बाँसुरी से लेकर उसकी गोद में थमा दिया__

  ” अपने पिता की गोद में है , चिंता मत करो नही गिरेगा। पिता ही तो होता है जो बच्चे को हर आने वाले खतरे से आगाह कर अपनी मज़बूत बाहों में संभाल गिरने से बचा लेता है।”

  ” मुबारक हो सर ! बेबी गर्ल है !”

  नर्स की बधाई पर बच्चे को अपने हाथों में लिए प्रेम की आंखें भर आयी, निरमा की इतने महीने की तपस्या सफल हो कर उसके हाथ में चमक रही थी। कुछ ही देर में डॉक्टर बाहर चली आयी।

” आप लोग अब निरमा से मिल सकते हैं, वो बिल्कुल ठीक है।”

   निरमा को कमरे में शिफ्ट करते ही डॉक्टर के कहने पर वो सब कमरे में चले आये। प्रेम ने आगे बढ़ कर बच्चे को निरमा के पास सुला दिया।
      
  ” नवेली सी मम्मा को ढेर सारी बधाईयां।” बाँसुरी ख़ुशी से निरमा के गले से लग गयी।

  ” बहुत सारी बधाई आप दोनों को!  तो प्रेम साहब क्या नाम रखने वाले हैं आप अपनी गुड़िया रानी का?”
  समर के सवाल पर प्रेम राजा की ओर मुड़ गया

  ” हुकुम ! बताइये क्या नाम रखा जाए?”

  प्रेम के पूछते ही राजा मुस्कुरा कर निरमा को देखने लगा__

  ” सबसे पहला हक तो माँ का ही होता है, उस लिहाज़ से निरमा और तुम ही सोचो की नाम रखा जाए।”

  “राजा भैया मेरी बिटिया किस्मत वाली है जो आपके साथ जन्मदिन मनाया करेगी, आप ही बताइए कि इसे हम क्या कह कर बुलाएंगे?”

   ” हम्म बहुत मीठा बच्चा है इसलिए मैं तो इसे मीठी ही बुलाऊंगा।”
   राजा ने आगे बढ़ बच्चे के सर पर हाथ रखा और अपने हाथ में पहनी ब्रेसलेट निकाल कर उसके पास रख दी।

  ” निरमा मैं आज कोई तोहफा नही ला पाया था और खाली हाथ बच्चे का चेहरा नही देखा जाता, इसलिए मीठी का तोहफा ड्यू रहा।
  कुछ देर की बातों के बाद उन्हें भी लगा कि निरमा को आराम करना चाहिए, प्रेम को निरमा के साथ छोड़ राजा बाँसुरी और समर महल वापस निकल गए।

   नर्स आकर एक बार निरमा की हालत का जायज़ा ले बाहर चली गयी।
  नर्स के जाते ही प्रेम ने कमरे का दरवाजा लगाया और निरमा के पास चला आया, आते ही उसने मीठी को देखने के बाद निरमा की ओर देखा और झुक कर उसके माथे को चूम लिया__

  ” थैंक यू सो मच निरमा! तुम नही जानती तुमने मुझे कितनी बड़ी खुशी दी है।
    थैंक यू!…….
  दोनो खुश थे मुस्कुरा रहे थे और उन्हें देख चाँद भी मुस्कुरा रहा था….

  क्रमशः

aparna..


       
    
   



  
  
   
   
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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