जीवनसाथी-68

जीवन साथी –68





      निरमा की सामान्य डिलीवरी थी, बावजूद एक दिन अस्पताल में रखने के बाद ही उसे छुट्टी मिलनी थी।
    रात भर उसके कमरे में उसके साथ रुका प्रेम भी ठीक से सो नही पाया था।
  जब दोनों को नींद लगती, मीठी कुनमुना कर उन्हें जगा जाती। वो खुद तो थोड़ा सा हल्ला कर वापस सो जाती लेकिन प्रेम और निरमा उसके बाद देर तक जागते रह जाते।

  ” अब आप कुछ देर सो लीजिये, मैं देख लूंगा इसे।”

  निरमा की थकान वो भी समझ रहा था।

  ” आप संभाल लेंगे ना?”

  मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला कर प्रेम बच्ची को गोद में लिए टहलने लगा। पापा और बेटी की मनमोहक जोड़ी देखती निरमा मुस्कुराती सो गई।

  ********

   अगले दिन सुबह से ही महल की रौनक देखते ही बन रही थी….
     हर तरफ भारी भरकम सजावट हो रही थी। सभी व्यस्त थे, पूजा के लिये पंडित महाराज बुलाये जा चुके थे।
  पंडित जी खुद महल के मंदिर में अपना साजो सामान फैलाये बैठे चिकनी काली मिट्टी से शिवलिंग बनाने में लगे थे, उनके सहयोगी छोटे छोटे लिंग बनाकर एक सौ एक कि गिनती पूरी कर रहे थे।
     गौरी, गणेश और नंदी बनाने में भी पंडित जी ने अपनी सुघड़ता का अद्भुत परिचय दिया था।
     एक किनारे  दादी सा सब कुछ बड़ी बारीकी से देखती बैठी बीच बीच में कुछ ना कुछ अपनी तरफ से भी बताती जा रही थीं।
    धीरे-धीरे महल के लोग एक एक कर वहाँ जमा होने लगे थे…
         रूपा रसोई में प्रसाद कैसे बनवाना है इसके बारे में सारे निर्देश देकर पूजा स्थल में चली आयी… उसका बेटा और जया की बेटी इधर से उधर भागते अपनी शैतानियों में लगे थे।
     हर तरफ उल्लास का माहौल था, घर के लोग जो पूजा के लिए जमीन पर बैठ सकतें हैं के लिए जमीन पर पटले बिछे थे, और जिन्हें ज़मीन में बैठने में असुविधा थी उनके लिए कुर्सियां लगी थी।
    रूपा जया के साथ ही बुआ जी भी चली आयी थीं। उनका छोटा पुत्र जबसे आगे की शिक्षा के लिए विदेश चला गया था तबसे उनका मन जरा बुझा बुझा सा रहने लगा था।
    रूपा और जया तो अपने अपने बच्चों को संभालती पाटों पर बैठ गईं लेकिन बुआ जी ने एक किनारे कुर्सी पकड़ ली। रेखा का भी नीचे बैठना मुश्किल ही था, उसके लिए अलग व्यवस्था थी।
    रियासत के राजा जी जिन्हें रुद्राभिषेक करना था के लिए शाही आसान तैयार था ।
    राजा और बाँसुरी के आते ही रूपा ने उन्हें उनकी बैठने की जगह दिखा दी, लेकिन सबको आश्चर्य में डाल राजा ने वो कुर्सियां हटवा कर पटले में ही बैठ पूजा करने का निर्णय ले लिया।
     पंडित जी ने शुद्ध दूध में ज़रा सा गंगाजल मिलाकर अभिषेक पात्र में भरकर राजा के हाथ में थमा दिया।
    उसकी सतर धार शिवलिंग पर पड़ती रहे ऐसे उसे रख पंडित जी ने पात्र के मुहँ पर रखी अपनी उंगली हटा दी और रुद्राभिषेक प्रारम्भ हो गया।
  
    राजा का हाथ थामे बाँसुरी भी उस अक्षयधारा के प्रवाह का हिस्सा बनने के साथ ही खाली होते दुग्धपात्र को भरने का काम भी करती जा रही थी।

   पूजा समाप्त होते ही आरती कर पंडित जी ने सब को कलावा बांध कर प्रसाद दिया और अपने शिष्यों के साथ सामान बांधने लगे।
      पंडित जी और उनकी मंडली को जीमने बैठा कर घर की बहुएं ही परोसने लगी। उसी वक्त राजा के फ़ोन पर किसी का कॉल आया और वो मुस्कुरा कर फ़ोन लिए बाहर चला गया।
      बाँसुरी ने उसे ऐसे जाते देखा लेकिन परोसने में थी इसी से पीछे जा ना सकी, लेकिन मन में एक फांस सी तो चुभ के रह गयी आखिर किसके फ़ोन पर तुरंत कमरे से बाहर निकल गए।

     ” मेरे प्यारे से भाई को जन्मदिन की खूब सारी बधाइयाँ, सौ साल की उम्र हो आपकी, दुनिया की सारी खुशियाँ मिलें आपको।”

  ” अरे बस बस ! इतनी सारी शुभकामनाएं !
    कैसी है हमारी प्रिंसेस ?

   ” एकदम बढ़िया !”

   ” हम्म झूठ मत बोल! जानता हूँ रतन के जाने से अभी अकेली हो गयी होगी , कब तक है उनकी वापसी? “

   ” दो हफ्ते गुज़र गए हैं, अब दो महीने और हैं उसके बाद वो आ जाएंगे, वैसे भी आपने तो मेरी भी व्यवस्था मसूरी रुकने की ही कर दी है तो ऐसा कुछ लगता ही नही की हम दूर हैं.. हालांकि रतन अपने ट्रेनी हॉस्टल में ही रहतें हैं लेकिन हर शनिवार शाम आ ही जाते हैं यहाँ। कभी शाम का भी कोई सेशन होता है तब नही भी आ पाते। लेकीन हम एक ही शहर में हैं यही बहुत है मेरे लिए।

  ” हम्म और पढ़ाई कैसी चल रही है?”

“पढ़ाई भी अच्छी चल रही हैं , चलो अब आप जाओ , वहाँ लोग पूछ रहे होंगे ना ? इस बार भी काकी सा ने पूजा तो रखी ही होगी।”

  ” अपना ध्यान रखना छुटकी और कुछ भी लगे तो तुरंत अपने भाई को याद कर लेना बस।”

  फ़ोन रख कर राजा पलटा ही था कि सामने माँ साहेब खड़ी थीं।
    दोनो ने एक दूसरे को देखा, लेकिन दोनों ही के चेहरे से यही लगा जैसे दोनो ने ही एक दूसरे के मन की बात नही जानी।

    पूजा पाठ सम्पन्न होते ही राजा को जनदर्शन के लिए जाना था।  छत पर खड़े होकर अपनी जनता को अपनी एक झलक दिखाने वाले राजे महाराजों सा राजा नही था, इसी से उसका जन दर्शन कार्यक्रम भी बाकियो से अलग था।
   महल के बाहर के बड़े बगीचे में पंडाल के अंदर जनता के बैठने और खाने पीने की व्यवस्था थी जहाँ सभी सीधे महल के राजा से अपनी किसी भी तरह की समस्या कह सकते थे।
   राजा नियत समय पर समर के साथ वहाँ पहुंच गया।बाँसुरी रूपा और जया माँ साहेब के साथ राजा के नाम पर औरतों को फल मिठाई कपड़े बाँटने चली गयी।

   दोपहर का खाना निपटते ही रूपा ने बाँसुरी  और रेखा को आराम करने उनके  कमरों में भेजा और शाम के जलसे की तैयारियां देखने रसोई में चली गयी__


    ” अरे नही ! उन लोगों को कुछ गलतफहमी हुई लगती है रंभा! उन्हें तो मेरे बारे में पता ही नही चला, हुकुम ने डांट डपट के उस मेनका की बच्ची को निकाल बाहर किया…. वो सब शायद यही समझ रहे कि ये सारा किया धरा मेनका का है।
     महल के लोगों को क्या उन्होंने तो रानी हुकुम बाँसुरी सा को भी खबर ना होने दी, सभी को यही लग रहा गांव में उसकी माँ की बीमारी के कारण ही मेनका गांव चली गयी है। लेकिन सुन अभी कुछ दिनों के लिए मैं दवा छिपा रखूंगी , अभी उसका प्रयोग करना खतरनाक है, हम फंस सकते हैं।क्योंकि वो जो समर है ना बड़ी टेढ़ी बुद्धि वाला लड़का है, सारा वक्त हुकुम की परछाई बने घूमता है। हुकुम भले एक बार शांत हो जाएं लेकिन उसके तिकडमी दिमाग में कोई न कोई खुरापात घूम ही रही होगी, इसलिए अभी कुछ दिनों के लिए ये काम नही करूँगी। लेकिन बाकी काम तो कर ही रहीं हूँ। तू अपनी केसर सा से मेरे लिए कह रखना, हीरे के बूंदे चाहिए मुझे। उनका हुकुम का किसी को कुछ पता ना चलेगा।”
  
      रसोई तक पहुंचती रूपा के कानों में कुछ पक्की कच्ची सी बातें पड़ गईं, हालांकि उसे इसमें से कोई बात समझ नही आई लेकिन बोलने वाली ने समर और कुंवर सा का नाम तो लिया ही था और कुछ तो ऐसा था जो  छिपा रही थी।
     वो लपक के कदम बढ़ाती रसोई में पहुँच गयी, मुख्य रसोई के बाहर एक लंबी परछी थी, वहाँ उसके पहुंचते ही उसे लगा, कोई हड़बड़ा कर वहाँ से ओझल हो गया, रसोई में उसने देखा लगभग पंद्रह बीस लोग काम पर लगे हुए थे।
    महल की रसोई में कर्मचारियों का फ़ोन रखना वर्जित था, इसी से उसने वहाँ पहुंचते ही सभी को एक लाइन में खड़ा कर सबकी तलाशी करवा ली, लेकिन फ़ोन किसी के भी पास से नही मिला।
    उसने जो आधा अधूरा सुना था उसमें उभर कर चार नाम बाहर आये थे.. कुंवर सा, बाँसुरी , समर और केसर।
    रूपा को इन चारों के साथ जुड़ी मेनका की कड़ी समझ नही आ रही थी। उसे दूध और दवा के बारे में कुछ पता नही था, उसने अपनी बुद्धि पर ज़ोर लगा कर सोचना शुरू किया और अपनी सुविधानुसार एक कहानी तैयार कर ली।
  महल में हर कोई केसर के अतीत और उसकी राजा से होने वाली शादी के बारे में जानता था।
    इतने सब के बाद केसर की महल वापसी और राजा का आयोजन के दौरान केसर से घुल मिल कर बात करना उसने खुद ने देखा था।
  मेनका महल की पुरानी नॉकरानी थी और अब वो बाँसुरी की सेवा में थी।
   तो कहीं मेनका केसर और राजा से संबंधित सब कुछ बाँसुरी को ना बता दे , कहीं इसलिए तो नही राजा और समर ने उसे नौकरी से निकाल उसके गांव वापस फेंक दिया।
      ये राजा महाराजा और इनके शौक!
  बाँसुरी तो वाकई सीधी है, वो क्या जाने ये सब।
लेकिन कुंवर सा को भी तो वो जब से ब्याह कर आई है देख ही रही है, उनमें आज तक उसे कौन सा ऐब दिखा है?
   लेकिन फिर भी मर्द जात है, क्या भरोसा? वो औरत ज़रूर मेनका की सखी रही होगी जिसे मेनका के निर्वासन का कारण पता होगा।
    हाँ यही बात होगी, ज़रूर कुंवर सा और केसर का वापस मिलना जुलना शुरू हो गया होगा, और कुंवर सा की खबरें ये औरत केसर तक पहुंचाती होगी तभी तो हीरे के बूंदे चाहिए खबीस को।
     मेनका बाँसुरी से यह सब कह ना दे इसलिए उसे दूर पटक दिया।
   है प्रभु! तेरी माया।
  इतनी सुंदर पत्नी होने पर भी कुंवर सा ऐसा क्यों कर रहे?
   क्या उन्हीं से पूछ लूँ? नही लेकिन क्या रियासत के महाराज से सीधे ऐसा पूछना शोभा देगा? भले ही मैं उनकी भाभी हूँ , उनके बड़े भाई की पत्नी! लेकिन फिर भी ऐसा नही पूछ पाऊँगी।
इससे तो आसान बाँसुरी से बात करना रहेगा?  हाँ बाँसुरी से ही बात करनी पड़ेगी! उसे समय रहते सचेत करना बहुत ज़रूरी है ।
   अपने खयालों में खोई रूपा ने एक बार भी युवराज से चर्चा करना ज़रूरी नही समझा , और यही उसने भारी भूल कर दी, और सीधे बाँसुरी के कक्ष की ओर चली गयी।

     बाँसुरी अपने कमरे में अकेली थी, वो कुछ समय पहले ही बाहर से आई थी ।
     राजा जनदर्शन में जाने से पहले बाँसुरी से रुक कर कह चुका था कि इसके बाद शहर के व्यापारी संघ से उसकी मुलाकात होनी है, सभी जन्मदिन पर उससे विशेष रूप से मिलने आये हैं, इसिसे  उसे कमरे में वापस आने में समय लगेगा, उसका इंतेज़ार करने की जगह बाँसुरी शाम के लिए तैयार हो जाये और उसके भी शाम के कपड़े तैयार रखे जिससे उसके वापस आते ही दोनो जलसा के लिए समय पर निकल सकेंगे।
   राजा के इतना कह कर जाने के बाद बाँसुरी भी कमरे की ओर मुड़ चली। उसके इतने सारे तोहफों में एक तोहफा और बाकी था जिसका कुछ काम अब भी बचा था।
   वो कमरे में पहुंची और अपनी आलमारी के पीछे छिपा रखी राजा की पेंटिंग जो वो खुद उसके लिए बना रही थी को निकाल कर उस पर का बचा काम पूरा करने लगी।
          राजा की मुस्कुराती आंखें लग रहा था जैसे बोल पड़ेंगी, सारा काम करके उसने अपने नाम की जगह बाँसुरी बना कर पूरी की ही थी कमरे में रूपा चली आयी…

“आइए भाभी साहेब! कुछ ज़रूरी काम था तो मुझे बुलवा लिया होता।”

   हड़बड़ाई सी रूपा अचानक कुछ कह नही पायी, बात शुरू करने कोई बहाना तो चाहिए ही था….
  उसने  बाँसुरी की सहायिका  सुगंधा को चाय लाने भेजा और बाँसुरी के करीब चली आयी

  ” कुछ खास काम नही था, हम बस देखने चले आये कि आज के विशेष दिन पर हमारी प्यारी देवरानी कैसे तैयार हो रही हैं?

  रूपा की बात पर बाँसुरी मुस्कुरा कर रह गयी…

” आप ही बता दीजिए क्या पहनूं?”

  रूपा बाँसुरी की आलमारी से कपड़े देखती वहीं खड़े खड़े इधर उधर की बातों में लग गयी

” आप केसर के बारे में जानती हैं बाँसुरी?”

  बाँसुरी ने आश्चर्य से रूपा की तरफ देखा और ना में सिर हिला दिया

  ” हमे लगा ही था कि कुंवर सा ने आपको कुछ नही कहा होगा।”

  ” ऐसा क्या है भाभी सा?”

“अरे नही नही! ऐसी कोई बहुत बड़ी बात नही है। बस कुछ सालों पहले इन्हीं केसर के पिता ने कुंवर सा और केसर के रिश्ते की बात की थी, घर के बड़े बुज़ुर्ग शायद सोच भी रहे थे लेकिन कुंवर सा ने मना कर दिया था।”

   अंतिम पंक्तियाँ सुनते ही बाँसुरी के चेहरे पर मुस्कान चली आयी।

   ” वैसे तो कोई बड़ी बात नही है , ब्याह से पहले जाने कितने रिश्ते जुड़ते और टूटते हैं, लेकिन इन केसर के रिश्ते में राज पुरोहित ने भी कहा था कि दोनों के बत्तीस गुण मिलतें हैं, केसर की कुंडली में अपार धन संपदा का योग है इसलिए माँ साहेब कुछ अधिक ही चाहती थीं कि केसर आ जाये, खैर ….
     ये सब तो बीती बातें हैं , पते की बात बस इतनी है बाँसुरी की  राजघरानो की औरतों का जीवन बिल्कुल काँटों के ऊपर बंधी रस्सी पर चलने सा होता है, हम ज़रा भी अपनी देखभाल से चुके की कोई भी सौतिया नागिन हमे डस सकती है।
  हर समय दिमाग में यही जाल बुना जाता है कि कैसे और किस तकनीक ने अपने पति को अपने पल्लू से बांधे रखें क्योंकि इधर हमारी नज़र चुकी की उधर राह तकती कोई कब हमारे सुखी संसार से हमें ही ढकेल खुद हमारे सीने में कुंडली मार बैठ जाएगी , कहा नही जा सकता।
   तुम समझ रही हो न मैं क्या कह रही, वैसे तो कुंवर सा में कोई ऐब नही है लेकिन हैं तो मर्द ही …. आंच मिलेगी तो पिघल ही जाएंगे।

  ” आप कहना क्या चाहती हैं भाभी साहेब, साफ साफ कहिये ना?”

  “कुछ खास नही, बस इतना कि उस केसर से कुंवर सा को दूर ही रखना, हमें जाने क्यों उसकी चाल ढाल पसंद नही आ रही, अरे बातों ही बातों में देखो कितनी अबेर हो गई। चलिए हम भी ज़रा तैयार हो लें।”

   केसर से मिलने के बाद पहले ही कुढी बैठी बाँसुरी पर रूपा और वज्रपात कर गयी, बची खुची कसर पूरी करने को सुगन्धा थी ही।

रूपा के जाने के बाद  बाँसुरी को सजाती सुगंधा भी अपनी रौ में बोलती चली गयी……

   ” हुकुम आपका जुड़ा बना दूं, जुड़े में ज्यादा खिलेंगी आप?”

   रूपा की बात से आहत बाँसुरी का इस वक्त कुछ बोलने का मन नही कर रहा था

  ” नही , बस ऐसे ही पिन कर के खुले छोड़ दो।”

   ” हमारी अम्मा कहा करती हैं लड़कियों को बाल ऐसे सुंदर बांधने चाहिए कि पति बस देखता ही रह जाए।”

   सुगंधा की कोई बकवास सुनने का बाँसुरी का मन नही था लेकिन वो लगातार बोलती चली गयी।

  ” हुकुम इतने हल्के गहने क्यों पहन रही हैं, वैसे आप बुरा न माने तो एक बात कहुँ, आप रंग भी बड़े हल्के पहनती हैं, गुलाबी पीला आसमानी ये भी भला कोई रंग है, साड़ी तो कल केसर बाई सा ने पहनी थी, क्या गज़ब रंग था और उनके गोरे रंग पर फब भी खूब रही थी।
  जूड़ा देखा था उनका आपने, कैसे बालों को गोल मोल कर के बांधा था, और दो लट सामने माथे पर कैसी सुंदर सज रही थी। मैंने तो सुना उन्होंने जूड़े पर हीरे का ब्रोच लगाया था, और वैसे ही कानों के झुमके थे भई वाह ! रानी हो तो ऐसी !
     सुना है अपने पिता साहेब का सारा बिजनेस वही संभाल रहीं हैं, फिर तो खूब होशियार होंगी नही?”

   केसर का गुण गाती सुगंधा बीच बीच में तिरछी नज़रों से बाँसुरी को देखती भी जा रही थी।

  उसकी बातें खत्म होने को ना थी, थक कर बाँसुरी ने उसे बाहर भेज दिया ।
     अपने कमरे की बालकनी खोल वो बाहर ठंडी हवा लेने खड़ी हो गयी। राजा का कमरा महल में ऐसा बना था, जहाँ से नीचे का बगीचा मंदिर सब दिखाई देता था। 
    राजा सभी से मिलता जुलता बातें करता आगे बढ़ रहा था, कहीं थम कर बात करता कहीं बस नमस्कार किये आगे बढ़ जाता।
   उसे देख एक पल को वो सारी परेशानी सारा विषाद भूल बैठी कि तभी पीछे से ज़रा तेज़ कदमों से चलती केसर राजा तक चली आयी, राजा को रोक वो उससे कुछ बातों में लग गयी और फिर उसके सामने कुछ कागज़ फैला दिए…. राजा ने उन कागजों पर एक सरसरी नज़र डाली और केसर से वो पेपर्स लेकर समर के हवाले कर दिया , इसी सब में केसर की पैन की सियाही राजा की बाँह पर लग गयी, उसे अपने रेशमी रुमाल से जल्दी जल्दी साफ करते केसर के चेहरे पर के माफी के भावों को देख राजा मुस्कुरा उठा और बाँसुरी तिलमिला उठी….

   ” सच कह रहीं थीं भाभी साहेब, मर्द भले सारी दुनियादारी अपनी बुद्धि और दिमाग से निपटा लेंगे लेकिन एक औरत की कुटिलता कभी नही समझ पाएंगे। क्या साहेब को वाकई नज़र नही आ रहा कि वो जान बूझ कर उनके आगे पीछे डोल रही है या फिर वो समझ कर भी समझना नही चाहते।”

  जिस वक्त इंसान के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाता है, उस समय वो कीड़ा अलग अलग तरह की कहानियों का जाल दिमाग में बुनता चला जाता है और उसके बाद इंसान सही गलत समझने की शक्ति से परे चला जाता है। उस वक्त उसे वही सही लगने लगता है जो उसने खुद ने सोच लिया , उससे आगे क्या गलत होगा और क्या नही की परिधि छोटी पड़ने लगती है।
  बाँसुरी ऐसे तो विवेकशील थी, लेकिन उस वक्त शायद परिस्थितियां ही ऐसी बनती चली गईं कि उसका राजा से ही क्या खुद पर से भी विश्वास डोल गया।

    सर दर्द से फटा जा रहा था, वो बालकनी से अंदर चली आयी और दरवाज़ा लगा कर लेट गयी। उसका अब किसी जलसे में जाने का मन नही था।
  
*******

        सुरमई शाम का धुँधलका फैल रहा था, पहाड़ों पर ऐसी शाम बेहद खूबसूरत हो जाती है , यही सोचती पिंकी अपनी बालकनी पर खड़ी थी, आज उसके प्यारे भाई का जन्मदिन था और वो उसके पास नही थी।
  कभी कभी उसे अपने महल, अपने घोड़े अपनी पालकी महल की अपनी सहायिकाओं जो लगभग उसकी सहेलियों सी थी कि बहुत याद आया करती थी।
    महल के सदस्यो की तो बात ही अलग थी, उन्हें तो कभी भुला ही नही पायी। माँ पापा और राजा भैया तो सुबह शाम दिन रात दिमाग में घूमा करते, कैसा कठिन जीवन हो गया था उसका, और क्या आगे भी उसे ऐसे ही मायके के लिए तड़प तड़प कर ही ज़िन्दगी गुज़ारनी पड़ेगी ?
   मन भी अजीब होता है, जिस वक्त खुश होने की ज़्यादा ज़रूरत हो उसी वक्त दुनिया जहान के सारे दुख याद आने लगतें हैं ।
   खुद में खोई पिंकी को ध्यान भी नही था कि उसकी आँखों से आँसू बह रहें हैं, कि तभी कमरे की बेल बजी, इस वक्त कौन हो सकता था? उसने तो रूम सर्विस पर भी कुछ ऑर्डर नही किया, आज शनिवार भी नही है कि रतन आ जाये?
   आँसू पोछती भरे मन से वो दरवाज़ा खोलने चली गयी….. दरवाज़े पर रतन था।
   वो उसे चौन्क कर देख रही थी कि वो उसे गले से लगाये अंदर चला आया__

  ” आज के सेशन के बाद कल दोपहर तक कि छुट्टी लेकर आ गया हूँ। एक साथ मिल कर राजा भैया का जन्मदिन मनाएंगे , ठीक है प्रिंसेस?”

  पिंकी मुस्कुराती हुई रो पड़ी, और रतन उसे बाहों में लिए अपनी ट्रेनिंग के किस्से सुनाता रहा।

******

   थकान और सिर दर्द से बाँसुरी की नींद लग गयी थी, कि राजा अपना काम समाप्त कर वापस लौट आया।
    सजी संवरी बाँसुरी को सोते देख उसे हँसी आ गयी__

   ”  इन्हें तो बस मौका चाहिए  सोने का !”

  मुस्कुरा कर वो उसके पास झुका उसे उठाने जा रहा था कि कोई सपना देख वो चौन्क कर उठ बैठी

  “आप आ गए?”

  ” हाँ अभी ही वापस आया, देखा तुम आराम से सो रही थीं।”

  ” हम्म जाने कैसे बेवक्त नींद  लग गयी।”

  ” हमारी हुकुम तो बैठे बैठे भी सो सकती हैं, फिर जब सामने शाही बिस्तर हाज़िर हो तो क्या कहने।”

  ” नींद शाही बिस्तर नही देखती साहेब वो तो फुटपाथ पर भी लोगों को गले लगा लेती है बस सोने वाले का दिल साफ हो तो वो  कहीं भी चैन की नींद सो सकता है।”

  ” बात तो सही कही ! फिर आजकल मुझे नींद कम क्यों आने लगी है ? इस बात पर कोई रोशनी डालिए हुकुम ।”

  ” मैं क्या रोशनी डालूं? आप खुद के मन से क्यों नही पूछते कि आखिर क्या छिपा बैठा है भीतर जो आपको चैन से सोने नही दे रहा।”

    बाँसुरी अपने मन की सारी कड़वाहट उगल देना चाहती थी लेकिन राजा उसके मन में चल रही हलचल से अनभिज्ञ था।  उसे बाँसुरी की किसी बात का ओर छोर समझ नही आ रहा था, उसके लिए ये रोज़ होने वाली सामान्य बातचीत ही थी। अपनी चाय खत्म कर वो नहाने घुस गया। और उसके कपड़े निकालती बाँसुरी फिर एक बार गुमसुम हो गयी।


    आयोजन उतना ही शानदार था जितना एक राजमहल का उत्सव हो सकता है। चारों ओर चहल पहल थी, शोर शराबा था, पारंपरिक नृत्य गीत हो रहा था तो एक ओर विदेशी सेलर सजा था….. लोग राजा साहब से मिलने उत्सुक थे, कुछ मिल पाए तो कुछ एक को दूर के ही दर्शनों से ही काम चलाना पड़ा ।
     
     बाँसुरी अपनी प्लेट लिए राजा तक जा रही थी कि सामने ही केसर प्लेट थामे चली आयी___

  ” माफ कीजियेगा रानी साहिबा लेकिन आपकी प्लेट में सजी कोई भी चीज़ राजा साहब को कुछ खास पसंद नही। आपका मन रखने भले ही खा लें लेकिन कहाँ वो मुर्गे खाने वाला शेर और कहाँ आप उसे ये पनीर निगलवाने जा रहीं हैं।”

   मुस्कुरा कर बाँसुरी ने अपनी प्लेट देखी और कह पड़ी__

   ” जी शादी के बाद शेर वही खाने लगा है जो उसकी शेरनी को भाता है।”

  ” मन रखने के लिए बात बड़ी प्यारी है लेकिन उनकी पसंद मैं अच्छे से जानती हूँ। आखिर सात सालों से उनसे रिश्ता सा जो बन गया है।

  ” हमारा तो सात जन्मों का रिश्ता है, सात साल तो फिर भी बहुत कम है। मुझे तो लगता है जाने कितने जन्मों से हमारा नाम संग जुड़ गया है ‘राजा और बाँसुरी’…

  बाँसुरी अपनी बात पूरी कर आगे निकल गयी लेकिन केसर की कही बातों का ज़हर धीमे – धीमे उसकी रगों में बहता उसके दिमाग में खलबली मचाने लगा।

अब आयोजन अपने अंतिम पड़ाव पर था, खा पीकर धीरे धीरे मेहमानों की वापसी शुरू होने लगी। एक एक कर सभी  निकलते चले गए….. बड़े व्यापारी, नेता गण, जिलाधीश, उच्च अधिकारी, कार्पोरेट सभी उस उत्सव का हिस्सा बन गौरवान्वित थे।
   कुछ एक राजा के खास मित्रों के अलावा अब सभी जा चुके थे। महाराज और रानी माँ भी राजा से मिल कर अपने अपने कमरों की ओर निकल गए तब विराट ने सभी गिने चुने लोगों को इकट्ठा कर एक साथ बैठाया और महफ़िल सजा दी।
   
   अलाव के चारों ओर बैठे सभी से विराट ने राजा के लिए दो पंक्तियां सुनाने की गुजारिश की, शुरुआत उसी ने की…

   ” भाई साहब! आज आपके जन्मदिन पर सबसे गुज़ारिश करता हूं कि आपकी तारीफ में दो शब्द कहें ,बोल कर या गा कर ये आप की अपनी मर्ज़ी होगी। तो मैं सबसे पहले एक शेर कहना चाहूंगा__

     ” बस खुद्दारी ही मेरी दौलत है
          जो मेरी हस्ती में रहती है,
         बाकी ज़िन्दगी तो फकीरी है
         वो अपनी मस्ती में रहती है।”

  ये हमारे सबके लाडले हुकुम का मिजाज़ है जो मैंने कहा ,अब मेरे बाद युवराज भैया आप कुछ कहें।

    विराट की बात पर मुस्कुरा कर युवराज ने भी अपने मन की बात कही और उन लोगों को आराम से महफ़िल सजाने की बोल अपने कमरे की ओर निकल गए।
    रूपा भाभी जया भाभी जय समर सभी ने अपनी तरफ से कुछ न कुछ कहा और तभी रूपा ने बाँसुरी को पकड़ लिया

  ” अब हमारी देवरानी सा कुछ गाएंगी कुंवर सा के लिए। हमे पता है इन्हें गाने का बहुत शौक है और गाती भी अच्छा हैं।”

  थोड़ी ना नुकुर के बाद बाँसुरी ने राजा को देखा उसने भी आंखों ही आँखों में उसे गाने के लिए कहा और मुस्कुरा कर बाँसुरी ने माइक थाम लिया

   ” पल भर ठहर जाओ दिल ये संभल जाए
         कैसे तुम्हें रोका करूँ
     मेरी तरफ आता हर ग़म फिसल जाए
         आँखों में तुम को भरूं
   बिन बोले बातें तुमसे करूँ गर तुम साथ हो…”

   बाँसुरी के गीत पर मुस्कुराते राजा को देख रूपा ने उसे छेड़ना शुरू किया ही था कि विराट की नज़र केसर पर पड़ गयी, जो इतनी देर से एक कोना पकड़े बैठी राजा को ही देख रही थी।


  ” केसर जी अब पकड़ में आई हैं आप! आप तो बहुत अच्छा गाती हैं, कॉलेज के समय से सुन रहा हूं, अब आप भी कुछ सुना दीजिये।”

  बाँसुरी ने विराट को देखा, उसके मन की बात भाँप कर विराट आगे कहने लगा।

  ” केसर जी भी हमारे ही स्कूल से पढ़ी हैं भाभी साहेब! आपके हुकुम की क्लास मेट थी। फिर कॉलेज करने भाई बनारस चले गए लेकिन मेरा और इनका कॉलेज यूनिवर्सिटी एक ही थी। केसर जी ने मेरे फोटोग्राफी के कोर्स में मेरी बहुत मदद की है बल्कि अब भी….
   जाने विराट और क्या बोल जाता केसर ने उसे बीच में ही टोक दिया….
    काश कि केसर के टोकने से पहले वो सच्चाई बोल चुका होता तो एक अनर्थ होते होते रुक जाता….

  ” बस बस छोटे कुंवर सा इतनी तारीफ हम पचा नही पाएंगे, चलिए अब आप कह ही रहे तो हम भी कुछ सुना ही देते हैं__

   ”     मन ये साहेब जी, जाणे है सब जी
             फिर भी बनाये बहाने
        नैणा नवाबी जी, देखें है सब जी
              फिर भी न समझे इशारे
        मन ये साहेब जी, हाँ करता बहाने
          नैणा नवाबी जी, न समझे इशारे
      धीरे-धीरे नैणों को धीरे-धीरे जिया को धीरे-धीरे
                    भायो रे साएबो
      धीरे-धीरे बेगाना धीरे-धीरे अपना सा धीरे-धीरे
                   लागे रे साएबो……
       कैसी कसक जी हाँ लब दिखलाए
      चुपके से आ थोड़ा इश्क़ कर जाएं… धीरे धीरे नैनो

    केसर के नवाबी इशारे भले ही साहेब की समझ में ना आये हों लेकिन साथ बैठी बीवी सब समझ चुकी थी, बस उसे ये समझ नही आ रहा था कि वो सच इतना नादान है या सब जान कर भी अनजान बना जा रहा है…..

aparna..


        

..




  
    




  
  
  
    
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s