जीवनसाथी-69

जीवन साथी –69




           बहुत बार वक्त को भी वक्त देना पड़ता है , वरना बहुत सी ऐसी बातें घट जातीं हैं जो ना घटती तो कहीं ज्यादा अच्छा होता ! लेकिन बाद में पछताने के सिवा कोई चारा नही रह जाता।
      
      गाने बजाने की महफ़िल सजी थी, केसर का गीत अभी खत्म ही हुआ था, वहाँ मौजूद हर कोई ताली बजा रहा ,था स्वयं राजा भी पर बाँसुरी का मन वहाँ फिर नही लगा। उठ कर वहाँ से भाग जाने को उसका मन व्याकुल हो उठा ।
   पर ऐसे लोगों के बीच से उठ जाना सभ्यता भी तो नही है। भाड़ में जाये सभ्यता और भाड़ में जायें सभ्यता का गीत गाने वाले लोग । ऐसे ही कुछ विचारों के साथ वो अपनी जगह से उठी लेकिन फिर कुछ सोच वापस बैठ गयी।
    बहुत बार हम खुद से ज्यादा दूसरों के बारे में जो सोच बैठतें हैं__

   ” लगता है रानी साहेब को हमारा गाना पसंद नही आया ? “

   केसर को भी सब समझ आ रहा था और मन ही मन इस बात से वो खुश भी थी।

   ” नहीं ऐसी कोई बात नही केसर जी! बाँसुरी को भी बेशक पसंद आया होगा जब मुझे पसंद आया है तो।

” लेकिन उनके चेहरे से लग तो नही रहा हुकुम! “

   ” चेहरे के भाव तो पल पल बदलते हैं, लेकिन उन्हें वही पसंद आता है जो मुझे ।”

  ” ऐसा नही है साहेब! कई बातों में आपकी और मेरी पसंद अलग है” बाँसुरी की नाराजगी थी केसर पर लेकिन जाने क्यों वो निकाल पड़ी राजा पर

  राजा को बाँसुरी की ना तो बात समझ में आई और ना ही नाराज़गी,वो बिल्कुल आम पतियों की तरह उसे छेड़ने लगा__

  ” हाँ जैसे तुम्हें मैं पसंद हूँ लेकिन मुझे मैं नही पसंद ।”
राजा अपनी बात पर हँसने लगा…..

  ” हो सकता है आपकी और भी कोई पसंद ऐसी हो जो रानी साहेब को पसंद ना हो?”

  केसर एक बार फिर बीच में बोल पड़ी और बाँसुरी का पारा उबल पड़ा

  ” आप क्यों हम पति पत्नी की नोकझोंक में बार बार बोल रही हैं, क्या मेहमानों को इतना बोलना शोभा देता है?

  सीधे सच्चे लोगों के मन में जो होता है वही उनकी ज़बान पर होता है। बाँसुरी दिखावों से दूर रहने वाली लड़की थी, आज के आयोजन में शुरू से ही उसे केसर की कोई बात नही भा रही थी और ये उसके चेहरे पर नज़र आ गया था।
    अभी की कही उसकी बात  और कहने का अंदाज़ भी कुछ यही बयाँ कर गया, मौके का फायदा उठाती केसर की आंखों में बाँसुरी की बात सुनते ही आंसू छलक आये, जिन्हें उसने राजा से छिपाने की कोई कोशिश भी नही की।

  ” बाँसुरी! क्या मेहमानों से ऐसे बात करना एक रानी को शोभा देता है? “

   जीवन में पहली बार ही हुआ जब राजा ने बाँसुरी की किसी बात को काटा था। ऐसा नही था कि इस जोड़े के बीच झगड़े या मनमुटाव नही होते थे , लेकिन उन झगड़ो का मुख्य कारण समय पर खाना पीना सोना , अधिक काम करना आदि होता था, इसी से कभी मर्यादा से अधिक समय तक खिंचे नही लेकिन आज का मामला अलग था, सबके सामने का था इसी से शायद राजा की यह बात बाँसुरी बर्दाश्त नही कर पाई।

  ” हाँ सारी शोभाएँ मर्यादाएं लक्ष्मण रेखाएं हम घर की औरतों के लिए ही तो हैं, आप लोगों का क्या है? आप लोग सिर्फ नियम बनाने के लिए हैं, निभाने के लिए औरतें जो हैं।
    शादी दोनो की होगी लेकिन नाम सिर्फ औरत का बदला जाएगा। मायके वालों को सामने चार बातें सुना दो पर ससुराल की मर्यादा का ध्यान रख औरत को चुपचाप सुनन होगा। किसी मर्द की गलत नज़र आपको ना छू जाए इसलिए औरत पर्दे में रहेगी, हाथ भर का घूंघट रखेगी, और अगर कहीं इन रिवाजों को मानने से इनकार कर दिया तो उच्श्रृंखल करार दी जाएगी।”

   ” बाँसुरी तुम बात को कहाँ से कहाँ ले जा रही हो? एक तो पहले महल के मेहमान का अपमान किया अब बातों को भी तोड़ मरोड़ रही हो।”

   ” यही तो कह रहीं हूँ राजा साहेब! कि इतने बड़े राजा होकर भी आपको बातें कहीं से कहीं जाती क्यों नज़र नही आ रही या कहीं ऐसा तो नही कि आप सब कुछ देख कर भी अनदेखा करते जा रहें हैं?”

    बाँसुरी का इशारा केसर की ओर था लेकिन राजा को लगा उसका इशारा माँ साहेब की ओर है, आखिर उसने माँ साहेब की बात भी बाँसुरी से छिपाई ही थी, उसे लगा अगर बाँसुरी को कुछ मालूम भी चल गया था तो वो उससे इस बारे में अकेले में भी बात कर सकती थी , ऐसे सबके सामने कहने की क्या ज़रूरत थी!

   ” अनदेखा कर जाने वाला राजा मैं नही हूँ और दूसरी बात तुम्हें मुझे सिखाने की ज़रूरत नही कि मुझे क्या देखना है और क्या अनदेखा करना है?”

   गुस्सा बातों का रूख कैसे मोड़ देता है कि गलत ना होते हुए भी इंसान गलत हो जाता है और संभाली जा सकने वाली बात भी हाथ से निकल जाती है।
   काश दोनों में से कोई एक भी उस वक्त चुप रह जाता तो इतना बड़ा अनर्थ होने से रुक जाता।

  ” मैं होती ही कौन हूँ आपको सिखाने वाली? बल्कि अब भी महल का कोना कोना मुझे ही सिखाता रहता है कि राजपूत ऐसे रहतें हैं ये करते हैं ये खातें हैं ये बोलतें हैं ऐसा सोचते हैं… थक गईं हूँ मैं इस दोहरी ज़िन्दगी से, इन भारी कपड़ों और गहनों से, गहनों से भी भारी रवायतों से, सच राजा साहब मैं थक गईं हूँ आपके महल से।
    यहाँ काम करने वाली अदना सी दासी भी मुझे सौ बातें सीखा जाती है। मुझे नही सीखना अब , ये मेरी ज़िन्दगी है और इसे मैं अपने तरीके से जीना चाहती हूं।”

  ” तो जाओ जियो अपनी ज़िंदगी। रोका ही किसने है तुम्हें? लेकिन अगर महल में रहना है तो यहाँ के कायदे कानून पर चलना ही पड़ेगा। मेरी तरफ से तुम स्वतन्त्र हो जहाँ चाहे जाओ जैसे चाहो रहो , मैं तुम्हें नही रोकूंगा।”

   बाँसुरी ने सोचा भी नही था कि राजा एकदम से उसे ऐसा कह जाएगा, बोलने से पहले राजा ने भी कहाँ सोचा , सोच लिया होता तो बोलता ही क्यों?

    बाँसुरी ने राजा की तरफ देखा, राजा ने मुहँ फेर लिया क्योंकि शायद वो भी जानता था कि इस वक्त बाँसुरी का चेहरा देख लिया तो वो कमज़ोर पड़ जायेगा?

    आँखों से बरसते अपमान के आँसू लिए बाँसुरी वहाँ से बाहर चली गयी ।
अब दोनों के बीच कहने सुनने को शेष था भी क्या?

   अचानक देखते ही देखते ये क्या घट गया था, रूपा और जया बाँसुरी के पीछे भागी… विराट और समर राजा के पास चले आये, वो एक कुर्सी पर सर झुकाये नीचे देखते बैठा था, समर ने जैसे ही उसके कंधों पर हाथ रखा , राजा ने सर उठा कर समर को देखा , उसके इशारे को समझ कर समर भी वहाँ से बाहर चला गया।

    ” रुक जाओ बाँसुरी ! इतनी रात में तुम कहाँ चली जा रही हो? अरे पति पत्नी के बीच तो ये सब लगा ही रहता है? संसार का कौन सा ऐसा जोड़ा होगा जो बिना लड़े झगड़े अपना जीवन गुजार दे”

   रूपा ने आगे बढ़ कर बाँसुरी का हाथ पकड़ कर रोकने की कोशिश की

   ” भाभी साहेब ! आपका अपमान नही करना चाहती ना ही आपकी बात काटना चाहती हूं लेकिन अब यहाँ मेरा गुज़ारा नही है।”

  “क्यों ऐसी अपशकुनी बातें कह रहीं हो बाँसुरी ! सिर्फ इतनी सी कहासुनी में कोई अपना घर थोड़े ही छोड़ जाता है।”
   जया आगे बढ़ उसके गले से लग गयी। महल की तीनों बहुओं की आंखों में बहते आंसू थे , तीनों एक दूसरे की पीड़ा समझ रहीं थीं


  ” हमें माफ कीजियेगा बाँसुरी, हमारे कारण आपका और हुकुम का झगड़ा हो गया… हमने सोचा ही नही था बात यहाँ तक पहुंच …

   केसर भी रूपा के पीछे वहाँ तक चली आयी थी, उसकी बात बीच में ही काटती बाँसुरी अपने आँसू पोंछ खड़ी हो गयी….

     “खुद को दोष मत दीजिये केसर जी! आप न पहले कभी हम दोनों के बीच आयीं और ना आगे कभी आ पाएंगी।”

   ” ये हुई ना सही बात, अब चलिए अपने कमरे में बाँसुरी !”  बाँसुरी की बात पर उत्साहित रूपा ने बाँसुरी को पकड़ आगे बढ़ाने की कोशिश की

  ” माफ करिये भाभी साहेब ! लेकिन अब यहाँ एक पल भी नही रुक पाऊँगी, अगर आप दोनों ने कभी भी मुझे अपनी छोटी बहन मान कर प्रेम किया है तो आपको कसम है मेरी। आज आप मुझे नही रोकेंगी।”

    रूपा और जया के पैर छू कर वो महल से बाहर निकल गयी….
    इतने दिनों में रूपा भी उसके हठी स्वभाव से परिचित हो चुकी थी, अगर अब उसने यहाँ नही रहने की ठान ली है तो उसे कोई नही रोक पायेगा।

   इतनी देर में विराट ने सारे महल को खबर कर दी थी, युवराज भैया भागते हुए से रूपा तक पहुंचे तब तक बाँसुरी महल से बाहर जा चुकी थी।
     महल  में अपने कमरे की बालकनी में खड़ी माँ साहेब को भी खबर मिल चुकी थी __

  ” हमें पहले ही पता था, एक न एक दिन ये होना है………
    आपका इंतजार रहेगा ,जल्दी वापसी कीजियेगा।”

  फिर किसी के रोकने समझाने का कोई असर नही हुआ, जिसने कहा था जहाँ जाना है चली जाओ वो खुद तो रोकने आया नही फिर किसी और के रोकने से क्या होता।
      आधी रात में महल से बाहर निकलते ही बाँसुरी की रोते हुए हिचकियां बंध गयी, निकल तो गयी लेकिन अब इतनी रात जाए कहाँ? निरमा और प्रेम अभी तक अस्पताल में थे। खैर वो वहाँ शायद जाती भी नही। उसका ठिकाना अब एक ही था।
    वो तेज़ कदमों से बढ़ी जा रही थी कि एक गाड़ी उसके पास आ रुकी, समर गाड़ी से उतर उसके सामने चला आया__

  ” आइये गाड़ी में बैठ जाइए रानी साहिबा!”

  समर को अनदेखा कर वो आगे जाने को थी कि समर फिर उसके सामने चला आया

  ” आप जहाँ कहेंगी वहीं ले चलूंगा, आपको महल वापस ले जाने नही आया हूं, आइये बैठिए।

   समर को एक बार देख वो गाड़ी में जा बैठी। उसके बैठते ही समर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी।


***********


      अदिति ने ऑफिस से लौटते हुए कल ढेर सारा समान खरीदा था… कैनवास शीट्स, कलर ट्यूब्स और पेलेट नाइफ आदि….
      शाम के वक्त ऑफिस में भास्कर दो हाथों में कॉफी लिए अदिति की केबिन में चला आया, वो सर झुकाये कोई ड्राफ्ट लिखने में व्यस्त थी, उसकी टेबल पर कॉफी रख वो भी बैठ गया।

   ” कल इतना सारा कुछ कुछ खरीदा था, उसका क्या करने वाली हो ?”

  ” एब्सट्रैक्ट आर्ट !”

  ” ओह्ह ये शौक भी है तुम्हें? पेंटिंग भी कर लेती हो?”

    ” हम्म थोड़ी बहुत ! पता है भास्कर बचपन में न मुझे ऐसे ही भूत चढ़ते थे । हर साल गर्मियों की छुट्टियों में मैं इधर उधर से कोई नया कोर्स देख कर आती और पापा के पीछे पड़ जाती की मुझे ये सीखना है ….
  ऐसे ही एक बार मुझे निब पेंटिंग करने का चस्का चढ़ा , ग्लास शीट निब, रंग सब मंगवा लिया और मैंने अपनी कलाकारी शुरू की, कुछ देर में ही उंगलियां दर्द करने लगी, फिर भी खुद को टॉर्चर कर कुछ देर और किया और फिर थक कर सब मम्मा को पकड़ा दिया… बेचारी मम्मा ने जैसे तैसे वो पेंटिंग पूरी की।
     
  फिर दो चार महीने बाद एक दोस्त के घर मेटल पेंटिंग लगी देखी। मुझे लगा ये तो बहुत आसान है अदिति आराम से कर लेगी और  एम्बोसिंग का चस्का चढ़ गया, छैनी हथौड़ी टीन शीट रंग एक बार फिर सब मंगवा लिया….
    अब ड्रा करने के बाद जब ठोकने पीटने का काम शुरू किया तो शुरू में तो ठीक था बाद में फिर वही , काम करते करते थक गई और आधी अधूरी शीट को किनारे कर अपनी कहानी की किताब खोल पढ़ने बैठ गयी।”

   ” ओह्ह मतलब ससुर जी के बहुत पैसे बर्बाद किये गए हैं।”

  ” हम्म ” अदिति को हंसते देख भास्कर ने अगला सवाल किया

  ” मेरा सवाल ये था कि वो जो कल समान खरीद कर घर पर डंप किया गया है उसका क्या होने वाला है।”

    शातिर सी मुस्कान के साथ अदिति जवाब देने लगी

   ” कल दोपहर जिस मीटिंग में गए थे वहां पीछे की वाल नोटिस नही की तुमने?”

   ” नो बेबी! मैं मीटिंग पर फोकस कर रहा था ना!”

   ” पीछे की वॉल पर बेहतरीन एब्सट्रैक्ट पेंटिंग लगी थी, देख कर ही लगा  कि बहुत आसान है , मैं आराम से कर लूंगी… बस इसीलिए समान ले आयी, इस वीकेंड यही करना है।”

  ” वेट मैडम वो पेंटिंग कशिका सरकार की पेंटिंग है… उसे ड्रा करना इतना आसान …
    भास्कर ने अपनी बात अधूरी ही छोड़ दी, वो समझ गया कि आगे कुछ भी बोलना व्यर्थ है । अब अगर उसने सोच लिया तो ये कोशिश तो करेगी ही फिर चाहे आधी अधूरी पेंटिंग बना कर स्टोर रूम में पटक आये

  ” हम्म इसका मतलब अब मुझे पेंटिंग भी सीखनी पड़ेगी?”

  ” तुम्हें क्यों?” नाक चढ़ा कर अदिति ने सवाल किया

  ” क्योंकि आप तो अपनी आदत के मुताबिक आधी बना कर छोड़ देंगी, आगे तो उसे मुझे ही ले जाना होगा ना?”

   अदिति मुस्कुराते हुए अपने अधूरे ड्राफ्ट को पूरा करने में लग गयी….. भास्कर प्रिंटिंग रूम की ओर निकल गया।

   ********

   आधी रात के वक्त कोई फ्लाइट नही थी, बाँसुरी ने समर को रेलवे स्टेशन ले जाने कहा, और उसने उधर ही गाड़ी मोड़ ली।
     स्टेशन पहुंचने पर बाँसुरी को रायपुर के लिए गाड़ी प्लेटफॉर्म पर लगी मिल गयी।
    उसे प्लेटफार्म पर छोड़ कर समर ने टिकट ली और टीसी साहब से बात कर उसकी टिकट बनवा कर उसे ऐसी कूपे में बैठा दिया।
    सब कुछ ऐसी त्वरित गति से होता चला गया कि किसी को कुछ सोचने समझने का समय ही नही मिला।
  समर ने एक बार रायपुर तक साथ चलने की बात भी कही लेकिन बाँसुरी ने उसे उसके हुकुम की कसम खिला कर उसे वहीं उतरने को मजबूर कर दिया।
  भारी आंखों और भारी मन से समर ने उस रियासत की महारानी को ऐसे अकेले अपने मायके जाने के लिए विदा दी और गाड़ी के छूटते ही भारी कदमों से बाहर चला आया।
     
     ए सी फर्स्ट क्लास का कूपा था… दरवाज़ा खींच कर ही समर उतर गया था। बाँसुरी के पास पार्टी में उसने जो पर्स पकड़ा था उसके अलावा कोई सामान नही था। वो चुपचाप खिड़की से लगी बैठी बाहर देख रही थी।
      उसने कभी सोचा भी नही था कि इतने प्यार और जतन से बनाया उसका घोंसला ऐसे झट से बिखर जाएगा।
    राजा से एक बार भी नही हुआ कि उसके पीछे आकर उसे रोक ले, क्या एक बार भी वो उसकी बाहें पकड़ उसे थाम लेता तो वो फिर कहीं जा सकती थी भला?
    क्यों नही रोका उसे राजा ने? आखिर क्यों ऐसे अपनी ज़िंदगी से अपने घर से चले जाने दिया। सोचती बाँसुरी के आंसू थम नही रहे थे कि कूपे का दरवाजा खोल टीसी साहब अंदर चले आये,बिना उसकी ओर देखे ही उन्होंने उसकी तरफ टिकट की रसीद बढ़ा दी। रसीद लेती बाँसुरी ने पर्स खोल कर उन्हें पैसे देने चाहे

   ” आपके साथ आये साहब पैसे दे गए हैं मैडम! अब आप आराम कीजिये, अटेंडर आकर आपको ब्लेंकेट और शीट दे जाएगा।”
    हाँ में सर हिलाती बाँसुरी को ध्यान आया कि उसने अपनी साड़ी का मैचिंग पर्स सीधे आलमारी से निकाल कर रख लिया था… पार्टी के लिए निकलने से पहले बस एक लिपस्टिक और टिशू के अलावा उसके पर्स में मुश्किल से चार पांच सौ से ज्यादा पैसे भी तो नही थे, और अभी बड़ी शान से वो टीसी को देने पर्स खोल रही थी। अगर समर ने ना दिए होते तो आज यहाँ क्या करती?  उसे अचानक अपनी हालत का ध्यान आया, कानों में हीरे के सतरंगी झुमकों के साथ माथे पर बड़ा सा राजपूती बोर भी तो लगा था, उसने झट पट अपने भारी भरकम गहने उतारे और पर्स में डाल लिए। पर्स खोलते ही उसकी नज़र पर्स के अंदर रखे रुपयों पर पड़ी, इसका मतलब उसे ट्रेन में बैठाने के बाद समर चुपके से उसके पर्स में रुपये भी डाल गया था।
     ज़रूर उसके हुकुम ने ही कहा होगा? वैसे राजा से जुड़ा हर इंसान ही ऐसा निराला था।
   वो खुद में खोई बैठी थी कि ज़ोर की आवाज़ से फिर एक बार दरवाज़ा खुला और एक राजा का हमउम्र लड़का बड़ी सी ट्रॉली बैग संभाले अंदर चला आया।
  लंबी चौड़ी दाढ़ी मूंछ और घने बालों को देख उसे एकदम से राजा से हुई पहली मुलाकात याद आ गयी, और वो एक बार फिर खिड़की से बाहर देखने लगी___

  ” एक्सक्यूज मी ! मैडम शायद आप मेरी सीट पर हैं”

   उस कूपे में दो ही सीट थी, कोई कहीं भी बैठ जाता, क्या फर्क पड़ना था , लेकिन सामने खड़े उस सहयात्री को देख बाँसुरी बिना कुछ कहे अपनी जगह से उठ गई और सामने वाली सीट पर बैठ गयी।

  ” वैसे नो प्रॉब्लम! आप चाहें तो वहीं बैठी रहें, और कोई तो अब इस कंपार्टमेंट में आएगा नही, असल में मुझे मेरी गिटार रखने के लिए स्पेस चाहिए थी।”

   बाँसुरी को उसकी बातों में कोई रुचि नही थी,वो बाहर ही देख रही थी, लेकिन उसकी हर बात कहीं न कहीं बाँसुरी को राजा की याद दिलाई जा रही थी। गिटार सुन उसका दिल फिर कहीं अटक गया।
    अपने सामान को व्यवस्थित कर वो बैठा ही था कि किसी का फ़ोन चला आया।
    फ़ोन की रिंग सुन बाँसुरी को याद आया, वो अपना फ़ोन भी महल में भूल आयी थी….

   ” यस मॉम! अब मान तो गया हूँ आपकी बात.. कह दीजिएगा डैड से, इस बार उनका बेटा एग्जाम ज़रूर देगा । और अब जब तक सेलेक्ट नही हो जाऊंगा, घर वापस भी नही आऊंगा।”

    सामने से उसकी माँ ने शायद वो अभी कहाँ है और कहाँ जा रहा है जैसा कुछ पूछ लिया

   ” आपको बताया था ना मॉम , एक दोस्त की शादी में रायपुर जा रहा हूं,  दो दिन बाद वहीं से दिल्ली निकल जाऊंगा। आज ऑफिस से रिलीविंग ले ली मैंने । अब तो आप दोनों खुश हैं ना।”

   दूसरी तरफ से फ़ोन शायद उसके पिता ने ले लिया क्योंकि अब तक शांति से बात करता बैठा वो अचानक ही गर्मागर्म बहस में उलझ पड़ा था। बहस इतनी बढ़ गयी कि उसने गुस्से में फ़ोन सीट पर पटका और बाहर निकल गया…..

    रो रोकर बाँसुरी की भी आंखें सूज सी गयी थी, आंखों पर पानी मारने वो भी बाहर निकल आयी, वॉशबेसिन के पास पहुंची ही थी कि उसने देखा वही लड़का ट्रेन के दरवाज़े को खोले उस पर आधे से अधिक बाहर की तरफ लटका जा रहा है।
     उसकी फ़ोन पर की तेज़ तेज़ आवाजें बाँसुरी ने सुनी थी, उसे एकदम से लगा कि किसी बात पर खुद से खफा ये लड़का चलती ट्रेन से नीचे तो नही कूद जाएगा, बाँसुरी ने बिना देर किए उसका हाथ पकड़ उसे अंदर खींचने की कोशिश की लेकिन उस भारी भरकम को खींचने की जगह खुद उस तक खिंचा गयी।
     एकदम से खुद पर हुए इस हमले के लिए वो तैयार नही था, वो चौन्क कर पलटा कि कूपे वाली लड़की को अपने सामने खड़ी हुई पाया, कुछ सेकंड में ही उसे सारी बात समझ आ गयी , और वो वहीं ज़ोर से हंस पड़ा

   “आपको क्या लगा? मैं ट्रेन से नीचे कूदने वाला हूँ क्या?”

  बाँसुरी बुरी तरह से झेंप गयी, धीरे से हाँ में सर हिला कर वो वॉशरूम में घुस गई। अपने हाथ की सिगरेट फेंक कर वो वापस केबिन में चला आया।
     हाथ मुँह धोकर वापस आने पर अब वो भी थोड़ी शांति अनुभव कर रही थी।
     अपनी सीट पर बैठने के बाद बाँसुरी ने गौर किया उसकी अनुपस्थिति में ही अटेंडर सामने वाले के साथ साथ उसके लिए भी कॉफी रख गया था। वैसे ये आधी रात का समय जब पैंट्री बंद हो चुकी होगी जाने इस लड़के ने कॉफी कैसे बनवा ली। सर दर्द से फट रहा था उसे इस वक्त कॉफी की ज़रूरत भी थी।
   उसने एक कप बिना किसी नानुकुर के उठा लिया, कनखियों से बाँसुरी को कप उठाते देख वो सीधा सतर बैठ उसके कुछ कहने की प्रतीक्षा के बाद खुद ही शुरू हो गया….

   ” हेलो मैम ! मेरा नाम शेखर है, शेखर अभिराम मिश्रा। आपका नाम?”

   बाँसुरी चौन्क गयी, क्या बताए ? बाँसुरी अजातशत्रु  सिंह के अजातशत्रु तो पीछे छूट गए थे कहीं….

   ” बाँसुरी !”

   ” मैं यहाँ भोपाल के कादंबरी में फाइन आर्ट्स एन्ड म्यूज़िक फैकल्टी से एडवांस कोर्स करने के बाद यहीं  साल भर से म्यूज़िक क्लासेस लिया करता था, अब जॉब छोड़ कर वापस जा रहा हूं। पूछेंगी नही क्यों?”


  बाँसुरी ने बस उसकी ओर देखा और वो फिर शुरू हो गया…


  ” असल में मेरे डैड चाहतें हैं मैं प्रशासनिक में जाऊँ, मेरी रुचि शुरू से ही म्यूज़िक रही, हालांकि दिमाग तो अनाप शनाप है अपने पास , तो इसलिए सोचा कि एक बार डैड की फरमाइश भी पूरी कर ली जाए…..

   वो अपने में मगन बोलता चला गया…. पर सुनने वाली सुनते सुनते कब नींद में लुढ़क गयी उसे खुद पता ना चला।
   यही तो उसकी विशेषता थी, बस पीठ टिकाने को जगह मिली और नींद का समय हुआ कि फिर उसे रोकना मुश्किल था, लेकिन कोई था जो उसके जाने के बाद कमरे में इधर से उधर टहलता अपनी खोई हुई नींद को ढूंढ रहा था।

      आज अपना ही कमरा कैसा अनजाना सा लग रहा था राजा को! जैसे सिर्फ बाँसुरी के होने से ही उस कमरे का अस्तित्व था।
     वो हर एक दीवार हर पर्दे पर उसके निशान महसूस करता दुखी परेशान था पर कहता भी किससे।
   अपने कमरे में पहुंचने के बाद उसने बाँसुरी को फ़ोन लगाया जो पूरी रिंग बजने के बाद बंद हो गया। दुबारा तिबारा फ़ोन लगाने पर भी फ़ोन नही उठा बल्कि अब स्विच ऑफ कर दिया गया था।
    ऐसी भी क्या नाराज़गी थी बाँसुरी कि फ़ोन तक उठाना ज़रूरी नही समझा। ठीक है उस वक्त गुस्से में तुम्हें रोका नही लेकिन तुम्हारे पीछे समर को भेजने का उद्देश्य भी तो यही था कि तुम उसके साथ वापस चली आओ। न भी आओ तो कम से कम मेरी बात तो समझो
   और अब जब कमरे में आने के बाद फ़ोन लगा रहा हूं तो उठाने की जगह तुमने फ़ोन ही बंद कर दिया । क्या बस इतना ही प्यार था?

    वो परेशान हाल अपने बिस्तर पर बैठा अपने फ़ोन को घूर रहा था कि उसका हाथ पास रखी किसी चीज़ पर गया, उसने खोल कर देखा तो उसकी खुद की तस्वीर थी, जो उसके जन्मदिन के तोहफे के तौर पर बाँसुरी ने बनाई थी और शायद पार्टी से लौटने के बाद उसे देने का विचार था।
     तोहफा बहुत सुंदर था लेकिन देने वाली कुछ ऐसा तोहफा दे गई जो अब वो सारी जिंदगी नही भूल पायेगा।


   *********

 
     कहीं पड़ोस की सुहागिल पूजा से लौटी ताई प्रसाद लिये भीतर चली आयी, देखा देवर और देवरानी ओसारे में ही चिंतित बैठे हैं, सामने रखी चाय भी ठंडी पड़ी रखी है।
     
    ” क्या हुआ प्रमिला? जे मुहँ लटकाए काये बैठी हो? हैं लल्ला जी का हुआ? कुछ कहेंगे भी या मुहँ में बर्फी जमाये बैठे रहेंगे?”

   प्रमिला ने डबडबायी आंखों से अपनी जेठानी को देखा और ऊपर बाँसुरी के कमरे की ओर इशारा कर दिया__

    किसी अनिष्ट की आशंका से घबराती ताई अपने घुटनों को सहारा दिए सीढियां चढ़ गई। कमरे की खिड़की पर बाहर देखती खड़ी बाँसुरी का उतरा चेहरा उनसे सब कह गया।
   उन्होंने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया__

   ” ऐसे जी छोटा नही करते लाड़ो, पति पत्नी के बीच झगड़े होना भी ज़रूरी है वरना जहाँ अधिक मीठा होता है कीड़े भी वहीं लगते हैं। हर सुंदर चीज़ पर नज़र का टीका भी तो ज़रूरी है ना? “

  ताई के गले से लगी रोती बाँसुरी कांप उठी

  ” मैं अब वापस नही जाऊंगी ताई!”

  ” तुझे बोल ही कौन रहा जाने के लिए। तेरा घर है जब तक जी करे मन भर कर रह। बिटिया ये जो काले बादल तुम दोनों के बीच छाये हैं ना जिनसे तुझे घुटन सी लग रही है एक दिन ये भी बरस जाएंगे और तब तुम दोनों के प्यार का सूरज फिर से चमक उठेगा उस समय तुम मुझे लेने क्यों नही आये या तुम खुद चली क्यों नही आई जैसी बातें बेमानी हो जाएंगी और एक बार फिर तुम एक हो जाओगे। सभी के जीवन में ऐसे कठिन अवसर आतें ही हैं । जब माँ बेटी किसी एक बात पर एकमत नही हो पाती तो तुम तो पति पत्नि हो वो भी अलग परिवेश अलग खान पान अलग आचार विचार वाले। मतभेद तो होने ही थे … लेकिन मतभेद मनभेद बने इससे पहले उनका निपटारा ज़रूरी है बिटिया।”
  
    अब तक प्रमिला भी ऊपर चली आयी थी। बाँसुरी ने अपनी माँ को देखते ही अपने आँसू पोंछ लिए….

  ” बंसी ! ये निरमा का फोन है बेटा ! बात कर ले।”

   बाँसुरी ने फ़ोन ले तो लिया लेकिन निरमा क्या बोलती रही उसका ध्यान किसी बात पर नही था, बस हाँ हूँ में जवाब देती वो खुद में खोई थी या राजा की यादों में उसे खुद पता ना था।
   बातों बातों में उससे निरमा ने उसके फ़ोन के बारे में भी पूछा जिसका कोई जवाब बाँसुरी से ना पाकर निरमा को भी यही लगा कि बाँसुरी राजा से बात ना करने के लिए फ़ोन बंद किये बैठी है।
   अस्पताल से छुट्टी कर जब निरमा प्रेम घर पहुंचे तभी अम्मा ने चाय नाश्ते के साथ बाँसुरी के पलायन की खबर भी परोस दी, निरमा ने तुरंत उसके फ़ोन पर बात करनी चाही पर फ़ोन बंद आने पर उसके पिता के नंबर पर ही डरते डरते उसने कॉल लगाई थी, और जैसे ही उनसे ये सुना कि बाँसुरी उनके पास पहुंच चुकी है उसने बाँसुरी से बात करने की इच्छा जता दी।
   
   हालांकि निरमा भी जानती थी कि अगर उसकी सनकी सहेली ने ठान लिया है तो अब उसे वापस लौटाना मुश्किल ही होगा।

    कुछ दो चार बातों के बाद ही बाँसुरी ने फ़ोन रख दिया, प्रेम के पूछते ही निरमा भी रो पड़ी। उन दोनों की समझ से बाहर था कि आखिर दो ही दिन में ऐसी क्या बात हो गयी कि बांसुरी घर छोड़ कर चली गयी और राजा ने उसे रोकने की कोई कोशिश तक नही की।

   *********

   समय अपनी गति से चलता रहा…..
बाँसुरी को गए दो महीने बीत गए। राजा ने खुद को अपने कामकाज में पूरी तरह डुबो दिया, उसे सबसे अधिक दुख इसी बात का था कि बाँसुरी ने ना ही उसका फ़ोन उठाया और ना ही उसके भेजे किसी संदेश का कोई जवाब दिया, उल्टा उसके संदेशों से त्रस्त होकर उसने उसका नंबर ही ब्लॉक कर दिया।
      उधर बाँसुरी यह सोच कर दुखी थी कि महल में छूटा फ़ोन देख कर भी राजा ने उसके पिता के फ़ोन पर एक बार भी उससे बात करने की कोशिश क्यों नही की?

     दोनो ही इस बात से अनजान थे कि उस रात बाँसुरी के जलसे से निकलते ही केसर ने चुपके से उसका फ़ोन उठा कर अपने पास रख लिया था। बाँसुरी के महल से निकलने के बाद  भी उसकी सहायिका ने बाँसुरी के कमरे की साज संभाल का काम पकड़े ही रखा था, और इसी बहाने वो केसर के इशारे पर राजा पर नज़र भी रखे हुए थी।

     धीरे धीरे महल अपनी रानी को भुलाने लगा था… रानी खुद महल की आदतों को खुद से अलग करने में जी जान से जुटी थी लेकिन रह रह के कोई न कोई बात उसके गले का फंदा बनी उसे पूरा दिन उलझाए रखती थी, कभी उसे दादी सा की तबियत की चिंता होने लगती तो कभी रूपा भाभी के बेटे की। निरमा की मीठी को तो वो मन भर देख भी नही पायी थी।
     उस दिन के बाद से नाराजगी में निरमा ने उसे फ़ोन भी तो नही किया था।
    राजा साहब के साथ लग रहा था जैसे सभी उससे नाराज़ हो बैठे थे, उसकी सासु सा भी तो उसे मना कर वापस ले जा सकती थीं, आखिर एक बार फ़ोन पर ही उसे ज़ोर से डांट लगा कर बुला लेती तो क्या बिगड़ जाता उनका?
   लेकिन वो तो शायद चाहती ही यही थीं कि बाँसुरी राजा की ज़िंदगी से दूर चली जाए।
    कभी कभी रातों को वो चौन्क कर उठ बैठती और जब अपने बाजू वाला हिस्सा खाली पाती तो उसे याद कर रात भर ऑंसू बहाती चली जाती।
   आखिर क्यों वो ऐसे गुस्से में वहाँ से निकल आयी? आखिर क्यों?
     ऐसे कब तक उसका रास्ता देखती रहेगी ? क्या कहा था उस केसर ने ” हुकुम की बीवी होने के अलावा उसमें कोई खूबी नही?
  एक तरह से सहीं भी तो था, राजा से ब्याह के बाद वो खुद को पूरी तरह भूल भी तो गयी थी, जबकि वो हमेशा चाहता था कि बाँसुरी अपने खुद के कदमों पर चले ना कि सिर्फ राजा की परछाई बन कर।

   हे भगवान ! वो इन दो महीनों में समझ क्यों नही पायी कि आखिर वो चाहता क्या है? कितनी बार उसने इशारों में उसे समझाने की कोशिश भी तो की थी, लेकिन वो चीनी की गठरी बनी बैठी रह गयी।
उससे अपनी जान से ज्यादा प्यार करने वाला राजा कैसे उसे अकेले जाने दे गया? शायद वो यही चाहता था….
      महल से निकलने के बाद से आज उसके चेहरे पर मुस्कान आयी थी।
  
   उसने अपनी आलमारी खोली, शादी के पहले राजा का भेजा तोहफा वैसे का वैसा रखा था।
  उसने बाहर निकाला और सारा सिलेबस खोल कर देखने लगी।
   तो ये चाहतें हैं राजा साहब। पर साफ साफ भी तो कह सकते थे। खैर कोशिश तो की ही थी उसी के पल्ले कुछ नही पड़ा तो वो क्या करते।

   आज बहुत दिन बाद शाम के समय वो नीचे अपनी माँ और ताई के पास आकर बैठ गयी।
उसे मुस्कुराते देख वो दोनों भी खुश थी, प्रमिला सबकी चाय वहीं ले आयी__

   ” माँ मैं प्रशासनिक सेवा के लिए तैयारी करना चाहती हूँ।”

   प्रमिला को लगा था दामाद बाबू से सुलह समझौता हो गया है लड़की का लेकिन इसका ये नया राग सुन  उसके गले में चाय अटक गई, उसी वक्त बाहर से घूम कर लौटे बाँसुरी के पिता ने भी उसकी बात सुन ली थी। वो भी वहीं चले आये __

   ” बेटा तू जो करना चाहे जो पढना चाहे पढ़ सकती है। ये तेरा पिता अभी ज़िंदा है तेरी हर इच्छा पूरी करने के लिए।”

   ” अरे रियासत की रानी है वो, अब इसका पढना लिखना नही सुहायेगा।”

  ” काहे नही सुहायेगा प्रमिला! तुम तो खुद पढ़ाई लिखाई की पक्षधर थी, आज क्या हो गया। अरे लड़की का ब्याह ही तो हुआ है, चाह रही तो पढ़ने दे न।”

   ” अब जिज्जी आप भी इनकी बोली बोलने लगी! कैसे समझाऊं? पास पड़ोस क्या कहेंगे सब, वैसे भी अड़ोसी पड़ोसी पूछने लगे हैं? बिटिया ससुराल कब जा रही?”

” मेरे यहाँ रहने से समस्या है तो मैं मुम्बई चली जाती हूँ  माँ।”

  ” अरे ये मतलब नही है हमारा लेकिन बंसी..”

   “लेकिन वेकिन कुछ नही पंडिताइन! अब बिटिया ने कहा दिया तो कह दिया, अब उसे पढ़ने से कोई नही टोकेगा और जो पड़ोसी पूछने आये उसे मेरे पास भेज देना, समझी”

   ” दोनो बाप बेटी को समझाना मुश्किल है, जैसे ये सनकी वैसी इनकी लाड़ो रानी सनकी।”

   चाय के कप समेटे प्रमिला रसोई में चली गयी, ताई ने मुस्कुरा कर बाँसुरी के सर पर हाथ रखा और अपने घर निकल गयी।
  
    बाँसुरी अपने कमरे की खिड़की पर खड़ी चाँद को देखती रही…..
    इसी चाँद को अपनी खिड़की से शायद वो भी तो देख रहा होगा…

      पाती की जाली से, झाँक रही थी कलियाँ
       गंध भरी गुनगुन में, मगन हुई थी कलियाँ
       
        इतने में तिमिर धँसा, सपनीले नयनों में
       
         कलियों के आँसू का कोई नहीं साथी
         छोड़ चले नयनों को किरणों के पाखी
          साँझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी
          छोड़ चले नयनों को….

      साँझ ढले…

क्रमशः

aparna…..


 
 


  


      

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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