जीवनसाथी-70

जीवनसाथी –70



     
         तेरी झोरी डारूँ, सब सूखे पात जो आये
         तेरा छूआ लागे, मेरी सूखी डार हरियाए
             दिल हूम हूम करे…

     जिस तन को छुआ तुने, उस तन को छुपाऊँ
     जिस मन को लागे नैना, वो किसको दिखाऊँ
        ओ मोरे चन्द्रमा, तेरी चांदनी अंग जलाए
         तेरी ऊँची अटारी, मैंने पंख लिए कटवाए
         दिल हूम हूम करे…घबराए
         घन धम धम करे डर जाए…..

     टेबल पर रखे रेडियो पर पुराने समय का रुदाली का गीत चल रहा था, और उस गाने में खोई खिड़की पर बैठी बाँसुरी बाहर छत पर कबूतरों को इधर उधर अठखेलियाँ करती देख रही थी__

  ” बंसी ! बेटा बंसी क्या कर रही है, चल नीचे तेरे नंद नंदोई जी आये हैं।

   खुद में खोई बाँसुरी ने माँ की तरफ देखा और झट ऑंसू पोंछ अपना मुहँ धोने बाथरूम में घुस गई।

    उसके नीचे आते में प्रमिला चाय नाश्ता लगा चुकी थी….
     बाँसुरी को सीढ़ियों से उतरते देख पिंकी भागकर उस तक पहुंच गई, और उसके गले से लग गयी__

   ” ये क्या हाल बना रखा है अपना बंसी? और ऐसी कौन सी बात हो गयी जो तुम भाई को छोड़ कर चली आयी?”

   पिंकी प्यारी तो बहुत थी लेकिन कई मामलों में उसका हठ और ज़िद बाँसुरी भी जानती थी, उसे पता था अपने भाई के खिलाफ वो कुछ नही सुनने वाली, इसी से बिना कुछ कहे बाँसुरी चुप ही बैठी रही। उसे सर नीचे किये बैठे देख पिंकी का दिल भी भर आया__

  ” आंटी आप लोग समझाते क्यों नही इसे? इतनी सी बात पर कौन अपना घर छोड़ देता है भला? दुनिया में कौन सा कपल है जिनमें झगड़े नही होते?”

  ” बिटिया जितना समझा सकते थे समझा चुके।”

  ” अरे ये कोई सॉल्यूशन थोड़े ही है, अब क्या बंसी हमेशा आपके पास ही रहेगी। भाई के बारे में भी तो सोचिए। वो वहाँ अपना काम धाम देखे या इन्हें? ”

   इतनी देर से चुप बैठे रतन ने भी धीरे से मुहँ खोला..

   ” भाभी ! कुछ सोचा है आपने ? हमारा कहने का मतलब ये है कि आप दोनों में से किसी एक को समझौता तो करना ही पड़ेगा? देखिए ज़िन्दगी आप दोनों की है। आप के अलग होने से सभी दुखी हैं लेकिन एक लेवल के बाद लोग भूल जाएंगे , जिनकी ज़िन्दगी पर अमिट छाप पड़ेगी वो सिर्फ आप दोनों है और कोई नही।
    आप चाहें तो हम राजा भैया से बात कर लेंगे, वो ज़रूर आपको मनाने आ जाएंगे।”

   ” किसी के कहने पर मनाने आये तो फिर बात ही क्या बची रतन जी? ये तो उन्हें सोचना चाहिए?”

  ” हद करती हो बंसी? भाई की सारी मजबूरियां जानती हो? सारी मुश्किलें परेशानियां जानती हो और फिर भी ज़िद पर बैठी हो? तुम खुद चली जाओगी तो छोटी नही हो जाओगी।”

  ” पिंकी हम दोनों के बीच ये बात ही नही है कि कौन छोटा है और कौन बड़ा। मन ज़रा खराब है इसलिए जाने की हिम्मत नही जुटा पा रही, जिस दिन मन मान गया उसी दिन सामान उठा कर चली जाऊँगी।”

  ” अच्छा तो अब आपका मन डिसाइड करेगा कि मेरे भाई का जीवन कैसा होगा।”

   ” पिंकी यार तुम बात बनाने आयी हो या और बिगाड़ने?”

   रतन की बात सुन पिंकी की आंखों में लाचारगी के आंसू आ गए। उसका अक्खड़ स्वभाव उसे जल्दी से किसी के सामने झुकने की इजाजत नही देता था। वो दिल से दुखी थी राजा और बाँसुरी के लिए लेकिन बांसुरी से मिलते ही उसका दुख गुस्से में बदल गया और वो बाँसुरी पर ही बिफर पड़ी।
   अपने भाई के संघर्षों को उसने शुरू से देखा था इसलिए अभी सारी गलती उसे बाँसुरी की ही नज़र आ रही थी। उसके अनुसार उसके महल की औरतों को थोड़ा समझ बूझ कर शांति से काम लेना चाहिए भले ही वो खुद अपनी जिद से अपनी पढ़ाई और शादी के लिए घर भर के खिलाफ हो गयी थी।
   यही तो कुछ लोगों का स्वभाव होता है खुद के लिए कुछ और नियम बाकियों के लिए कुछ और। पर इस सब के बाद भी पिंकी के मन में किसी के लिए कोई भेद भाव न था, सोच गलत ज़रूर थी पर वो मन की साफ थी।
    उसे रोते देख बाँसुरी की भी आँखे भीग गयी लेकिन वो एक बहन से उसके लाडले भाई के लिए कहती भी क्या?

   “अच्छा वो सब छोड़ो तुम्हारा फ़ोन क्यों नही लग रहा? ”

   इतने दिनों में किसी को तो बाँसुरी के फ़ोन की सुध आयी…. लेकिन हाय रे समय! पिंकी ने पते की बात पूछ भी ली लेकिन बाँसुरी के जवाब देने के पहले ताई और बाँसुरी की अम्मा वहाँ खाना पीना लिए चली आयीं।
   आखिर बिटिया के ससुराल से इत्ते दिन बाद कोई आया था, और वो कोई भी ऐसा वैसा नही खुद बिटिया की नंद और नंदोई।
    उनके स्वागत सत्कार में कोई कमी ना रह जाए इसी सब तामझाम में पिंकी का सवाल कहीं खोकर रह गया।

     बाँसुरी का बहुत मन कर रहा था कि एक बार अकेले में पिंकी से उसके भाई का हालचाल पूछ लें लेकिन इतना सोच सोच कर भी पूछ नही पायी।

   रतन को पोस्टिंग मिल चुकी थी, और वो दोनों मुम्बई से एक नए शहर आ गए थे। पिंकी की तैयारियां चल रही थी। खाना निपटने के बाद पिंकी और बाँसुरी ऊपर उसके कमरे में चले गए….
     इतनी देर में अब जाकर दोनो सखियों को एकांत मिला था, बाँसुरी तब से जिस बात के लिए तरस रही थी जब जब वो पूछना चाहती पिंकी अपना ही कोई राग छेड़ जाती।
    बाँसुरी के घर छोड़ कर निकलने के बाद दादी साहब की तबियत बहुत खराब हो गयी थी, राजा भैया खुद उन्हें लेकर अमेरिका चले गए थे , लगभग पंद्रह बीस दिन वहाँ रहने के बाद लौटे थे।
     रानी माँ भी पिता साहेब के साथ ऑस्ट्रेलिया निकल गयी थी। और इसी बात का फायदा उठा कर उसकी माँ हरिद्वार जाने के बहाने एक बार उससे मिल भी गयीं।
    उसका घर और गृहस्थी देख खुशी से उनकी आंखों से ऑंसू बह निकले थे। लगभग हफ्ते भर उसके पास रह कर माँ लौटी थीं।

      बुआ साहेब के जोड़ों का दर्द एक बार फिर उठ गया था और इसलिए केरल से किन्हीं पंचकर्म वालों को बुला कर उनका स्नेहन स्वेदन सब वापस शुरू हो गया था।
   पिंकी की बातें लगातार चलती जा रही थी। वो सभी के बारे में बता रही थी…. रूपा भाभी युवराज भैया जया भाभी बुआ जी बच्चे यहाँ तक कि महल के नौकर चाकर घोड़े हाथी भी उसने नही छोड़े बस एक उसी के बारे में कुछ नही बता रही थी जिसके बारे में सुनने बाँसुरी के कान तरस रहे थे।

    दोनों बातों में लगी थी कि रतन खुद पिंकी को बुलाने ऊपर चला आया__

   ” मैडम वापस भी तो लौटना है। आज ही रात की गाड़ी है हमारी ।”

  रतन को वहाँ आया देख पिंकी चुप लगा गयी। रतन पिंकी को जल्दी करने की बोल नीचे लौट ही रहा था कि किनारे एक टेबल पर रखी किताबों पर उसकी नज़र चली गयी__

  ” ये किताबें किसकी है भाभी?”

   ” जी रतन जी ! ये मेरी ही हैं।” कुछ शरमा कर बाँसुरी नीचे देखने लगी

  ” ओह्ह तो सिविल सर्विसेज की तैयारी की जा रही है?”

  ” नही अभी कोई तैयारी शुरू नही की है। ये तो बस एक दिन ज़रा सिलेबस पलट कर देखा था।”

  “तो जैसे पलट कर देखा वैसे ही पढना शुरु कर दीजिए।”

  पिंकी चौन्क कर बाँसुरी को देखने लगी और फिर रतन को

  ” क्यों क्या हुआ? इतना चौन्क क्यों गयी भई जब तुम तैयारी कर सकती हो तो तुम्हारी भाभी क्यों नही?”

” अरे उसे वापस भी तो जाना है ?”

  ” हाँ तो तुम्हारे महल में पढ़ने लिखने पर कोई रोक है क्या? हमें नही लगता कि राजा भैया मना करेंगे। भाभी जी जब तक नाराज़गी है यही पढना शुरू कर दीजिए जिस दिन वापस जाएंगी किताबें साथ ले जाईयेगा। बाकी कोई समस्या पढ़ने में आई तो हम और पिंकी तो हैं ही, आप चाहें तो किसी कोचिंग को भी जॉइन कर सकती हैं।”

  ” इतना आसान है क्या रतन जी? कोई फ़िल्म थोड़े ही है कि मैंने सोचा और एग्जाम क्रैक कर लिया, लोगों का जीवन बीत जाता है इसके पीछे।”

” बिल्कुल सही ! लेकिन सलेक्ट होने वाले भी आप हम जैसे साधारण लोग ही होतें हैं बस उनमें जज़्बा होता है कुछ कर दिखाने का। और वैसे एक उदाहरण तो आपके सामने ही खड़ा है , दो बार में ही सहीं निकाल तो लिया ही।”

” आपकी तो बात ही अलग है रतन जी, आपकी मेहनत आपका त्याग देखा है मैंने, पिंकी से सुना भी है।”

  ” बस त्याग तो आप कर के आ ही गयीं हैं अब मेहनत बाकी है वो शुरू कर दीजिए। भाभी जी एक बार शांत मन से सोचिएगा, सिर्फ सिलेबस देखने से कुछ नही होगा अगर वाकई कुछ करना चाहती हैं तो आज बल्कि अभी से कमर कस लीजिये और पढ़ाई शुरू कर दीजिए।”

  “इनकी बातों पर ध्यान मत दो बंसी! इनका एक ही पसंदीदा टॉपिक है, पढ़ाई! अभी तुम हाँ बोल बैठी न तो तुम्हें यहीं पढ़ाना शुरू कर देंगे, मेरी तो जान ले रखी है। रोज़ सुबह ऑफिस निकलने के पहले ढेर टॉपिक दे जाते हैं, आने के बाद कितने भी थके हों पहले मेरा रिवीसन लेते हैं उसके बाद ही कुछ होता है।”

” ये तो अच्छी बात है ना पिंकी! “

  ” हम्म लेकिन इस बार मन नही लग रहा पढ़ने में, और बंसी हमारी मानो रतन की बात सुनने की ज़रूरत नही है। इतना आसान नही होता आई ए एस बनना। तुम राजा भैया की पत्नि हो यही तुम्हारी सबसे बड़ी उपलब्धि है , अब इससे आगे कुछ करने की ज़रूरत नही। हमारी बात मानो, जैसे आयी थीं वैसे ही वापस लौट जाओ। ”

    बाँसुरी बिना कुछ कहे चुप खड़ी रही , रतन ने पिंकी को साथ लिया और नीचे उतर गया।
     घर भर में सबसे विदा लेकर वो दोनों निकल गए। जाने से पहले महल लौट जाने की बात बोल पिंकी बाँसुरी के गले से लग एक बार फिर रो पड़ी। प्यार तो पिंकी का भी निश्छल ही था, उसके आंसू बाँसुरी की आंखों में भी चले आये।

   *************


      बच्चा छोटा हो तो माँ का सारा समय उसी में बीत जाता है। मीठी के आने के बाद से अब अम्मा भी सुबह कुछ और जल्दी आने लगी थी। मीठी की मालिश कर नहला धुला कर उसे निरमा की गोद में देने के बाद ही वो बाकी के कामो को हाथ लगाती थीं।

    शाम के सारे काम निपटा कर ही उनका लौटना होता था। इधर उनके गांव घर से उनका बड़ा बेटा उन्हें एक हफ्ते के लिए लेने चला आया, उनकी देवरानी की बेटी की शादी थी। निरमा से उन्होंने पूछा तो उसने चट हाँ कर दी लेकिन प्रेम निरमा अकेली रह जाएगी सोच कर थोड़ा चिंतित था__


  ” एक हफ्ते की ही तो बात है , मैं संभाल लुंगी मीठी को, आप परेशान ना हों।”

   अम्मा निरमा को मीठी की मालिश करना सीखा रही थीं , उन्होंने ठेठ देसी तरीके  से साड़ी को पैरों पर समेट कर सामने फैला रखे पैरों पर बच्चे को रखा और मालिश शुरू कर दी, जैसे खुद बैठी थी वैसे ही निरमा को बैठने कह उन्होंने हथेली पर तेल ले लिया। पास ही खड़े प्रेम के कारण निरमा को पैरों पर से कपड़े हटाने में संकोच हो रहा था, इस बात से बेखबर अम्मा नई नवेली माँ को कुछ ना कुछ नुस्खा दिए जा रही थीं।
     अपनी बातों में मगन अम्मा ने प्रेम को भी लपेटे में ले लिया__

  ” बाबू अभी बहुरिया से ज़रा दूर ही रहना! ”

   प्रेम को एकदम से अम्मा की बात समझ नही आई और वो बीच में ही बोल पड़ा__

  ” क्यों अम्मा ? ऐसा काहें बोल रहीं आप?”

  ” ये देखो इन्हें, अरे बाबू इतना उतावलापन ठीक नही है। पहले इसी उतावलेपन से इतनी जल्दी मचा दी बच्चे की । अब कम से कम दूसरे बच्चे में तो थोड़ा सबर से काम लो, दो तीन साल का अंतर तो रखोगे न,वैसे भी बड़े बूढ़े कहतें हैं… ऐसे में और जल्दी रुक जाता है। इसलिए कह रही जरा संयम बरतना।”

  अम्मा की बात सुन निरमा शरमा कर बच्चे को देखने लगी__

   ” कुछ भी बोल देती हो अम्मा!” कहता प्रेम मुस्कुराता बाहर चला गया। अब मीठी के आने के बाद से उसका संकोच ज़रा कम होने लगा था , अब वो पहले जैसा शर्मिला नही रह गया  था।
      मीठी के कारण निरमा से भी जब तब कुछ ना कुछ काम पड़ ही जाता था।
     अक्सर जब वो शाम में लौटता तब तक में निरमा मीठी को संभालती थक चुकी होती, और तब अगर मीठी ज़्यादा रोती या परेशान करती तब वो निरमा के चाय लेकर आते तक में  उसे गोद में लिए बगीचे में इधर से उधर घूमते चुप करवा लेता।
    
    जब तब वो रोती मीठी को अपने सीने पर लिटाये टीवी देख रहा होता या उसे थपकियां दे रहा होता और वो कुछ मिनटो में ही सो जाया करती।
    धीरे धीरे मीठी की ऐसे ही सोने की आदत सी बन गयी थी, अब कभी जब प्रेम को बाहर से लौटने में समय लगता तो मीठी रो रोकर घर सर पर उठा लेती, और फिर जैसे ही प्रेम वापस आता , भागते दौड़ते उसके पास पहुंच उससे माफी मांग तुरंत उसे गोद में लिए कुछ गुनगुनाने लगता ।
   उस दिन भी राजा का रियासत में दौरा होने से प्रेम सुबह से ही निकल गया था…. आज दोपहर के खाने पर भी उसका लौटना नही हो पाया था, शाम होते होते उसे निरमा और मीठी की याद सताने लगी, उसे बार बार घड़ी देखते देख राजा ने उसे जाने कह दिया, लेकिन अपने हुकुम को ऐसे छोड़ कर जा भी नही सकता था इसलिए उसने मना कर दिया।
   सुबह से घर से निकला था इसी से फ़ोन भी बैटरी खत्म होने से बंद हो गया था।
     अम्मा अपने गांव के लिए सुबह ही अपने बेटे के साथ निकल चुकी थीं। सुमित्रा वैसे भी शाम तक निकल जाती थी।
    शाम से ही अकेले मीठी को संभालती निरमा कई बार दरवाज़े पर झांक आयी थी लेकिन प्रेम का कोई अता पता नही था।
   फ़ोन भी लगाने की कोशिश की लेकिन वो भी बंद आ रहा था। उसे गुस्से से अधिक डर लगने लगा क्योंकि प्रेम  स्वभाव से लापरवाह था नही फिर क्या हुआ होगा?
  
       रात के ग्यारह बजने को थे लेकिन प्रेम अब तक घर नही पहुंचा था, परेशान हाल निरमा ने राजा और समर के फ़ोन पर भी कॉल किया लेकिन किसी का कवरेज से बाहर था तो किसी ने उठाया नही।
   मीठी को दूध पिला कर सुलाने के बाद बो घबराई सी महल जाने की सोच ही रही थी कि गेट खुलने की आवाज़ हुई।
    बाहर आते ही उसने प्रेम को गाड़ी अंदर करते देखा और उसकी जान में जान चली आयी।
    वो भागकर रसोई में पानी लेने चली गयी। इतनी देर में उसने गलत सही सोच सोच कर मन ही मन एक कहानी गुन ली थी कि लौटते समय ज़रूर प्रेम की गाड़ी का कहीं एक्सीडेंट तो नही हो गया।और यही सोचते सोचते उसे एक कच्ची सी झपकी लगी जिसमें उसने सपने में भी ऐसा ही कुछ देख लिया और चौन्क कर उठ गई …
   प्रेम के अंदर आते ही वो बहुत घबरा कर उस तक पहुंच गई__

” आप ठीक तो हैं ना?”

  ” हाँ क्यों?”

  निरमा को अपनी आंखों पर जैसे विश्वास से नही हो रहा था। असल में इतनी देर से सोचते सोचते उसे अपने मन की बात ही सही लगने लगी थी इसी से प्रेम के कहने पर भी उसका मन नही माना और वो उसके आगे पीछे घूम उसे देखने लगी। उसका हाथ पकड़ आगे पीछे अलट पलट कर देखती निरमा की हरकत पर प्रेम को हंसी भी आ रही थी।
      प्रेम के चेहरे गर्दन कंधों को छू छू कर जांचती निरमा को पता भी नही था कि उसकी छुअन सामने वाले पर कैसा असर पैदा करती जा रही है।
      निरमा को देखता प्रेम उसे गले से लगाने को व्याकुल हो उठा , लेकिन वो आगे बढ़ता तब तक में  उसके हाथ में पानी का ग्लास थमा कर वो रसोई में खाना गर्म करने चली गयी।

    पानी पीकर वो भी अपने कमरे में चला गया….

    ” आज इतनी देर कैसे हो गयी ? एक बार फ़ोन कर के बताया तक नही ?”

   प्रेम के फ्रेश होकर आते में निरमा खाना परोस चुकी थी, उसके खाने की टेबल पर बैठते ही निरमा ने अपना सवाल दाग दिया।

  ” हुकुम आज निकले थे, गांव घूमने । लोगों की समस्याएं सुनने सुलझाने में फिर वक्त का पता कहाँ चलता हैं? तुम अपना भी खाना ले आओ!”

  ” हम्म ! और फ़ोन?”

  “बैटरी डेड हो गयी थी।”

  ” जब मालूम था कि आज वक्त लगेगा तो पावर बैंक साथ रख लेना था।”

   निरमा की बात सुनता वो चुपचाप नीचे सर किये खाता रहा… उसे ऐसे देख निरमा को हंसी आने लगी

  ” मीठी बार बार पूछ रही थी, पापा कब आएंगे।”

   निरमा की बात पर चौन्क कर वो आंखें फाड़े निरमा को देखने लगा

  ” मीठी इतनी जल्दी बोलने लगी?”

  ” हे भगवान मैं कहाँ जाऊँ? क्या करूँ इस आदमी का? दो महीने का बच्चा कभी बोलता है भला? अरे इशारों में तो मिस करती ही है ना आपको।”

  अपनी हड़बड़ाहट पर शर्मिंदा प्रेम मुस्कुरा कर वापस अपनी थाली को देखने लगा, और निरमा उसे..

   निरमा बाहर सोती मीठी को लिए कमरे में सुलाने चली गयी, प्रेम बाहर बैठा टीवी पर कुछ देखने लगा।
  नींद दोनो की ही आंखों में नही थी….
   प्यार दोनों को ही एक दूसरे से हो चुका था लेकिन पहले आप पहले आप की तर्ज़ पर दोनो ट्रेन से बाहर खड़े स्टेशन से उसके सरकने का इंतज़ार कर रहे थे।

    मीठी को गहरी नींद में डूबा देख निरमा धीमे कदमों से बाहर चली आयी। रसोई से दूध का गिलास लिए वो प्रेम के सामने रख कर जाने को मुड़ी ही थी कि प्रेम ने उसे टोक दिया

  ” बहुत थकी नही हो तो कुछ देर बैठ जाओ। आजकल तो अपनी पसंद की चीज़ें भी नही देख पाती हो”

  मुस्कुरा कर वो उससे ज़रा हट कर उसी सोफे पर बैठ गयी।
    ” हुकुम कैसे हैं अब?
   
    ” काफी संभल गए हैं, वैसे भी जैसा उनका स्वभाव है अपनी दुख तकलीफें किसी को दिखातें कहाँ हैं? जो है उनके मन के अंदर ही चलता है।”

  ” हम्म ! क्यों दोनो ऐसी ज़िद पाले बैठे हैं?”

  ” तुम्हारी फिर दुबारा कोई बात हुई क्या?”

  ” किस से बाँसुरी से ?”

  ” हाँ ?”

  ” नही कोई बात नही हुई! मुझे बहुत गुस्सा आ रहा उस पर और उसके बचपने पर। मैंने तो बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सुनने को ही तैयार नही तो क्या कहूँ? फ़ोन भी कर के क्या वही वही बातें करूँ उससे। ”

  ” कोई नही। लेकिन समय मिले तो कर लेना एक बार।”

   इधर उधर की बातें करते दोनो फ़िल्म देखते बैठे रहे। कुछ देर में ही निरमा की हाँ हूँ सुनाई देनी बंद हो गयी, प्रेम ने देखा सोफे पर टिकी वो सो चुकी थी।
     उसे देखते हुए प्रेम को ध्यान ही नही रहा वो कब उसके बेहद करीब चला आया। कितना मोहक चेहरा था , मीठी बिल्कुल अपनी माँ सी ही तो लगती थी बहुत प्यारी।
      प्रेम के दिमाग में जाने क्या चल रहा था वो धीरे से उसकी तरफ झुकने को था कि निरमा की आंखें खुल गयी , शायद औरतों का सिक्स्थ सेंस होता है जो नींद में भी उन्हें सजग रखता है।
     और कोई दिन होता तो शायद प्रेम पीछे हट जाता लेकिन वो वैसे ही उसके बेहद करीब बना रहा।
निरमा उसे देख कर चोंक कर हटी नही और वो उस तक आता चला गया।
     पहली बार दोनो गले लगने वाले ही थे कि कमरे से मीठी की मीठी सी गुनगुनाहट बाहर चली आयी।
  निरमा मुस्कुरा कर प्रेम को अपने हाथों से पीछे धकेल कमरे में चली गयी ।
   उसके पीछे वो भी मुस्करा कर टीवी और लाइट्स बुझा कर कमरे में चला आया।
  
    वो बिस्तर के अपने किनारे पर लेटा मोबाइल पर कुछ पढ़ता मीठी के सोने की राह देखता रहा।
कुछ देर में जब उसकी नज़र पड़ी, मीठी को सुलाती निरमा भी गहरी नींद सो चुकी थी।

    बत्तियां बुझा कर वो भी सोने की कोशिश करने लगा।


   **********


       बाँसुरी चली गयी थी , केसर को लगने लगा था कि अब उसे राजा को पाने से कोई नही रोक सकता।
  केसर से पहले जो बेवकूफियां हुई थी अब वो उन्हें दोहराना नही चाहती थी। उसे पता था राजा जैसे लड़के का दिल जीतने के लिए उसके मन में खुद के लिए दया की भावना जगाना बहुत ज़रूरी है। वो जानती थी कि राजा ने बाँसुरी से अपनी पसंद का विवाह किया था लेकिन वो शायद राजा के दिल की गहराइयों को समझ नही पायी थी।

     बाँसुरी के जाने के कुछ समय बाद से ही उसने किसी न किसी कारण से राजा से मेल मुलाकात बढ़ानी शुरू कर दी थी। कभी ज़मीन से जुड़ा कोई प्रकरण लिए वो उसके पास चली आती कभी किसी और समस्या से जूझती उसके द्वारे खड़ी मिलती….
    आज फिर वो एक फाइल हाथ में दबाए दीवान खाने की ओर बढ़ी चली आ रही थी कि  सामने से आती सुगंधा उससे टकराती टकराती बची__

   ” देख कर चला नही जाता क्या,अभी तुम्हारे हाथ की ट्रे हम पर पलट चुकी होती।”

  ” माफ कीजियेगा साहेब ! गलती हो गयी।” इतनी देर में ट्रे को संभालती सुगंधा ने जैसे ही सामने खड़ी केसर को देखा पुलकित हो उठी

  ” अरे साहेब आपने हमें पहचाना नही, हम ही तो सुगंधा हैं। अरे हमारे पास ही तो आपकी भेजी दवाई आती थी जिसे हम रानी साहेब के दूध में…

   केसर ने उसकी बात बीच में ही काट दी,

   ” पगला गयी हो क्या? कहीं भी कुछ भी बकवास शुरू कर दी।” इधर उधर घबरा कर देखती केसर ने उसे घूर कर देखा और फिर धीमी आवाज़ में शुरू हो गयी…

   ” महल की दीवारों के कान और भी बड़े होतें हैं समझी मूर्ख लड़की। यहाँ न हम तुम्हें जानते हैं और ना तुम हमें समझीं!
     आज रात बिना यहाँ किसी से कुछ कहे हमारे घर आ जाना तुम्हें तुम्हारा इनाम मिल जाएगा। काम अच्छा किया है तुमने।”
    

  बिना उसकी ओर दुबारा देखे वो तेज़ कदमों से आगे बढ़ गयी। दीवानखाने में उसके अंदर जाने के कुछ देर बाद सुगंधा भी कॉफी की ट्रे संभाले भीतर चली आयी।
   सबको उनके कप पकड़ाती सुगंधा ने केसर के सामने भी एक  कप रख दिया, उस वक्त वहाँ समर और राजा ही बस थे जब कॉफी का ऑर्डर गया था इसी से केसर का कप देख समर सुगंधा की ओर देखने  लगा…

   ” तुम्हें कैसे पता था कि केसर जी भी यहाँ मौजूद हैं?”

  समर की बात पर सुगंधा हड़बड़ा गयी, वो घबरा कर कुछ का कुछ कह जाती उसके पहले ही केसर ने बात संभाल ली

   ” जी हम जब यहाँ आ रहे थे ये बाहर ही हमें मिली थी। हाथों में ट्रे देख हमने भी हमारे लिए कॉफी इन्हें बाहर ही बोल दी थी। असल में परेशानी की वजह से ज़रा सर में दर्द सा हो गया था।”

   राजा का इन सब बातों पर कुछ खास ध्यान नही गया था, वो अपने काम में मगन था, उसे सुनाने के लिए ही केसर ने अंत की सर दर्द वाली पंक्तियां कुछ अधिक ही तेज़ आवाज़ में कहीं उन्हें भी उसने सुन कर अनसुना कर दिया और वापस अपने किसी फाइल को पढ़ने में व्यस्त हो गया। उसका ध्यान खुद पर ना देख कर वो वापस कॉफी पीने लगी

” दिखाइए आप क्या लेकर आयीं हैं केसर जी?”

   केसर ने अपने हाथ में पकड़ रखी फाइल समर की ओर बढा दी और बढ़ा चढ़ा कर उसे अपनी समस्या बताने लगी….

     राजा का ध्यान अपनी तरफ बिल्कुल भी ना पाकर उसके अंदर का गुस्सा बाहर निकलने को था। स्वभाव से जिद्दी और अड़ियल केसर अपनी क्षमता से अधिक अभिनय कर रही थी खुद को बेचारी और परेशान हाल दिखाने का, लेकिन हर बार की तरह ही आज भी असफल थी।
    आज वो सुगंधा से हुई मुलाकात से भी एक बारगी परेशान हो उठी थी क्योंकि भले ही राजा का ध्यान ना गया हो लेकिन समर की तेज बाज नज़र से उसका बचना मुश्किल ही था।
    सुगन्धा अब उसके लिए काम की नही रह गयी  थी और जो चीज़ उसके काम की नही रह जाती उसे फिर वो और किसी काम का रहने भी नही देती थी।

   राजा की बेध्यानी से परेशान वो कुछ जल्दी ही वहाँ से वापस निकल गयी। उसे शाम का इंतज़ार था, उसने अपने कुछ लोगों को फ़ोन किया और कुछ ज़रूरी बातें बता कर फोन रख दिया।

    रात अपना सारा काम निपटाने के बाद सुगन्धा रोज़ की तरह महल के बाहर बने अपने कमरे की तरफ जाने की बजाय जब बाहर निकलने लगी तो एक बार फिर उसकी टक्कर समर से हो गयी

  ” इस वक्त महल से बाहर कहाँ जा रही हो?”

   उसे लगा था कि वो सबसे छुपते छुपाते निकल जायेगी लेकिन उसने शायद समर को बहुत कम आंक लिया था। सुबह उसके केसर के सामने कॉफी रखने के बाद से ही समर उस पर नज़र रखे था , वो खुद ऐसे ही किसी मौके की तलाश में था।
  
   ” जी साहेब वो मेरी बहन बाहर रहती है ना उसी से मिलने जा रही उसकी तबियत ठीक नही है।”

  ” बहन बाहर क्यों रहती है भला? यहाँ महल के सभी कर्मचारियों के साथ उनके परिवार वालों की भी तो व्यवस्था है ? अच्छा एक बात बताओ तुम्हें अभी महल में रहते कितना समय बीता है , ज्यादा समय हुआ नही लगता ?” “

  समर की आँखों से खुद को बचाती सुगंधा वहाँ से भागना चाह रही थी लेकिन उसे इतनी देर में समझ आ गया था कि जेलर की पकड़ मजबूत है रिहाई मुश्किल है।
   सुगंधा ने एक गड़बड़ और कर डाली थी उसने वो टेबलेट्स जो बाँसुरी के दूध में  मिलाया करती थी को भी उस वक्त अपने पास छिपा रखा था, वो केसर को प्रभावित करने के लिए ही उन दवाओं को साथ लिए जाना चाहती थी लेकिन आधे रास्ते ही समर से मुठभेड़ हो गयी।

     चोर जब चोरी के बाद पकड़ा जाता है तो बहुत बार वो अधिक ढिठाई दिखाते हुए ज़्यादा ज़ोर से शोर मचाने लगता है जिससे लोग उसकी तेज़ आवाज़ में उसकी गलती को भूल जायें। कुछ ऐसा ही सोचकर सुगंधा ने जोर जोर से रोना और चिल्लाना शुरू कर दिया कि उसकी आवाज़ सुन कर भीड़ जमा हो और वो समर पर खुद के साथ गलत काम करने का ठीकरा फोड़ वहाँ से किसी तरह भाग निकले लेकिन वो वाकई समर की काबिलियत से परिचित नही थी।
   समर अनुभवी युवक था उसकी आँखों में धूल झोंकना ऐसा आसान भी नही था, उसने सुगंधा को एक ज़ोर का तमाचा जड़ दिया और ज़रा कड़ाई से उससे पूछताछ करने लगा…

“सच बोल रानी साहेब के दूध में दवा मिलाने का काम तू ही करती थी ना?”

  ये बात समर ने बिल्कुल ऐसे ही बोल दी थी लेकिन सुगन्धा पर असर कुछ अधिक ही हो गया।
   रोते रोते उसने अब तक  छिपा कर रखी दवा को उसके सामने निकाल कर रखा और बिना कुछ सोचे समझे वहाँ से भाग निकली।

    समर के दवा उठा कर देखने तक में वो वहाँ से भाग खड़ी हुई। अब तक में कुछ एक नौकरों के साथ महल के गार्ड आदि भी उसकी तरफ भागते चले आये और अंधेरे का फायदा उठाती वो महल से बाहर निकल गयी।
    समर बाकी लोगों के साथ उसके पीछे भागा। महल के मुख्य द्वार से बाहर भागती सुगन्धा बिना आगे पीछे देखे भागती चली जा रही थी कि पीछे से आती एक लंबी चौड़ी ट्रक उसे रौंदती चली गयी।

    समर और बाकी लोगों के वहाँ पहुंचने तक में वो ट्रक उसे कुचल कर आगे निकल चुकी थी।
   वो लोग सुगंधा को उठा कर गाड़ी में डाल तुरंत अस्पताल की ओर निकल गए।

क्रमशः

aparna…


   

   
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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