जीवनसाथी-71

जीवनसाथी –71


  

             बात बिगड़ी है इस कदर
              दिल है टूटा, टूटे है हम
        तेरे बिन अब ना लेंगे एक भी दम
            तुझे कितना चाहें और हम
             तेरे साथ हो जाएगे खतम
             तुझे कितना चाहें और हम…..


    राजा की जान ही गानों में बसती थी, उसकी और बाँसुरी की पहली मुलाकात भी तो गानों से ही हुई थी। उसे आज भी वो मंज़र याद था जब वो आँखें बंद किये आफरीन आफरीन सुन रहा था और उसे इस कदर अपने गाने में खोए देख बाँसुरी धीरे धीरे अपना कान उस तक लाकर सुनने की कोशिश में थी कि वो क्या सुनते हुए इतना खोया हुआ है।
    बाँसुरी सुन सके इसलिए ही तो वो कुछ देर के लिए अपना फ़ोन और ईयरप्लग वहाँ छोड़ कर बाहर चला गया था।
    दरवाज़े के कांच से जब उसने झांक कर देखा तो वही हुआ जो उसने सोच रखा था, बाँसुरी तुरंत उसका ईयरप्लग लगाए गाना सुनने लगी थी और वो मुस्कुरा कर बिना किसी वजह के ही ट्रेन का चक्कर लगाता रहा था।
    कैसी बच्चों जैसी हरकतें किया करती थी, और बच्चों जैसी ही बातें ।
    अभी भी तो बच्चों सा बचपना किये बैठी थी।

      आज से पहले तो कभी उसने ऐसे उल्टे जवाब नही दिए, फिर आज क्या हो गया था उसे।
  पहले तो फ़ोन नही उठाया , बाद में परेशान होकर फ़ोन ही बंद कर दिया , कोई तरीका होता है ये।
   वैसे गलती तो मेरी भी है , ना मैंने उसे माँ साहेब से जुड़ी कोई बात बताई ना रेखा के पिता से जुड़ी। यहाँ तक कि उसके दूध में मिली दवाओं के बारे में भी तो हमने आज तक बात नही की।
    वो भी कब तक सहती, आखिर एक न एक दिन ये होना ही था, वैसे भी जब कोई इंसान कुछ ज्यादा ही खामोशी से सब सहता जाए तो ऐसा ही विस्फोट होता है , लेकिन बाँसुरी जब मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूं तो तुम क्यों खामोशी की चादर ओढ़े बैठी हो , जवाब भी देती हो तो चिढ़ कर।
   ऐसे तो तुमने कभी बात नही की।

  अब मेरे भेजे संदेशों को भी तोड़ मरोड़ कर देखने लगी हो। अरे बस इतना ही तो लिखा कि तुम्हें जल्दी ही लेने आ जाऊंगा मेरा इंतेज़ार करना इसमें मैंने क्या गलत लिख दिया इस पर इतनी नाराज़गी ” हम तुम्हारा चेहरा भी नही देखना चाहते कभी मत आना हमें लेने” ऐसा जवाब तो तुमसे सोचा भी ना था।

    मैंने समर या प्रेम को भेजने की बस बात लिखी ही थी कि तुम्हारी नाराज़गी फट पड़ी__ ” अगर कभी एक दिन के लिए भी हमसे प्यार किया है तो न तुम आओगे ना तुम्हारे नौकर! हमें किसी की ज़रूरत नही है, हम जहाँ हैं खुश हैं, और अब तुम्हारा हमारा कोई रिश्ता नही रह गया है।
   सच में अगर हमारा भला चाहते हो तो हमें तलाक के कागजात भिजवाओ और  रिहा कर दो अपनी गुलामी से।
    अब ना हमें तुमसे प्यार है ना तुम्हारे महल से और ना तुम्हारे नियम कायदों से।
   कसम है तुम्हें हमारी!!!

  ऐसी भयानक कसम भी खिला दी, तुम्हें क्या लगता है तुम्हारे गुस्से में कुछ भी लिख के भेज देने से मैं भी तुम पर नाराज़ हो कर सच में तुम्हें तलाक दे दूंगा? कभी नही! जानता हूँ अभी मेरी हुकुम बहुत नाराज है इसलिए वक्त दे रहा हूं कि घर पर रह कर संभल जाओ, तब तक यहाँ भी बहुत कुछ सही करना है बाँसुरी।

      अपने कमरे में बैठा राजा खुद से ही बातें कर लिया करता। अब उसका अपने कमरे में भी तो मन नही लगता था।
    उसे शादी के बाद के शुरुवाती दिन याद आने लगे थे। उसे कैसे अपने कमरे में भागने की हड़बड़ी होती थी और उसे चिढ़ाने ही समर जानबूझ कर उसी वक्त फाइल पर फाइल खोलता चला जाया करता था

   ” अब बस भी करो समर, देख नही रहे तुम्हारे हुकुम का अब मन नही लग रहा काम में।”

  युवराज भैया की बात पर कैसे समर हँस पड़ा था

  ” बस हुकुम की तरफ से यही सुनने के लिए तो ये कर रहा था बड़े हुकुम”
   और हँसते हुए उसने सारा काम समेट लिया था

   ” नही ऐसा कुछ नही हैं भैया, लाओ समर मैं काम निपटा कर ही जाऊंगा।”

   उसकी बात पर तो वहाँ खड़े जय, युवराज भैया समर प्रेम सभी हँसने लगे थे….

   ” अब तो आप जाइये और कमरे में ही अपने काम निपटाइये वरना आपकी रानी साहेब नाराज़ हो गईं तो अगले दो चार दिन उन्हें मनाने के चक्कर में आप वैसे भी काम काज नही देख पाएंगे।”  जय की बात पर वो कैसे झेंप कर रह गया था।
    उसका नाम आते ही अक्सर यही हाल तो होता था उसका।

    कैसे कैसे बचपने कर जाया करती थी अक्सर….
उसे शादी के बाद की वो बात याद आने लगी जब दोनों बालकनी में बैठे एक दूसरे से बातों में लगे थे__

  ” साहेब ! पता है शादी से पहले मेरी फैंटसी क्या थी?

    राजा चौन्क कर बाँसुरी को देखने लगा

  ” अच्छा ! लड़कियों की भी फैंटसीज होती हैं?

  ” हाँ क्यों नही? हमारी भावनायें नही होती क्या? हम लड़कियाँ भी भावुक होती हैं आखिर?”

” यार भावुकता और फैंटसी का क्या तालमेल? खैर बताओ तुम्हारी फैंटसी फिर मैं अपनी बताऊंगा!”

” मुझे ना फिल्मों के रोमांटिक सीन बहुत प्रभावित कर जाते थे।”

  ” ओह्ह तो वैसी वाली फिल्में भी देखी हैं तुमनें? “

  ” हाँ तो ? क्यों ना देखूँ? उल्टा हम तो दिवाली पर सब के सब एक साथ जाया करते थे, माँ ताई दीदी और मैं “

  ” बड़ी मॉडर्न फैमिली है तुम्हारी!” राजा किसी और तरफ को सोच रहा था और बाँसुरी कुछ और कहने में मगन थी, हालांकि जल्दी ही राजा को बाँसुरी की बात समझ आ गयी

  ” अब सुनेंगे भी मेरी बात?”

  ” फरमाइए हुकुम? ” राजा को उसे छेड़ने में मज़ा आ रहा था

  ” मुझे ना जब हीरो की शर्ट की बटन टूट जाया करती थी तो बड़ा मज़ा आता था।

  “अच्छा ! हीरो की शर्ट खुलने से तुम्हें मज़ा आता था? अब यही बात कहीं हम लड़के कह भर दें तो तुरंत हमारे चरित्र पर सवाल उठा दिया जाएगा, और लड़कियों की फैंटसी देखो ,हीरो की शर्ट की बटन पर टिकी है।”

  ” ओह्हहो पूरी बात तो सुन लीजिए राजा साहब! जब शर्ट की बटन टूटती थी और फिर हीरोइन सुई में धागा पिरो कर हीरो की पहनी हुई कमीज पर बटन टाँकती थी ना, वो सीन देख कर मज़ा आ जाता था। मेरी हमेशा से ये फैंटसी थी कि मैं भी अपने पतिदेव की शर्ट पर बटन टाँकू वो भी उनके पहने हुए पर।”

  राजा ने एक हाथ अपने माथे पर मारा और ज़ोर से हंसने लगा__

  ” हे भगवान! तो ये थी तुम्हारी फैंटसी, तो कर लिया करो पूरी , जब तुम्हारा दिल करे।”

” पर एक दिक्कत है , आपकी कमीजों के बटन ही नही टूटते ..”

“हम्म ये बात तो है, पर इसका एक आइडिया भी है,  पहले कुछ ऐसा किया करो कि बटन टूट जाये और अगली सुबह उस टूटे बटन को सिल दिया करो।”

” फिर शुरू हो गए ना ! थकते नही हो एक ही से जोक मार मार के”

  “बिल्कुल नही! राजा हूँ आखिर ! हम ना तो जोक्स थेओरी से थकते हैं और न प्रैक्टिकल से, समझीं। अब चलो आओ इधर।
कल सुबह की तुम्हारी फैंटेसी पूरी करने के लिए मेरी रात की फैंटसी तो पूरी कर दो।”
   और उसे एक धक्का देकर हँसती हुई वो अंदर भाग गई थी।

    राजा के चेहरे पर मुस्कान चली आयी थी। बातें ही ऐसी थी उसकी कि हर बात सोच कर चेहरा खिल उठता था।
     बाहर बालकनी में खड़े अपने विचारों में खोए राजा का ध्यान फ़ोन पर था ही नही लेकिन दूसरी बार बजते फ़ोन की रिंग बंद होने के पहले उसने लपक कर फ़ोन उठा लिया, फ़ोन समर का था जो राजा को तुरंत अस्पताल बुला रहा था।
     महल के तो सभी समाचार सहीं थे फिर किसलिए समर उसे अस्पताल बुला रहा है सोचता राजा तुरंत वहाँ से निकल गया…

  ” अरे हुकुम आप इस वक्त आधी रात में कहाँ जा रहें हैं?”

   कॉरिडोर में टहलते विराट ने राजा को टोक ही दिया

  ” कुछ नही विराट ! ज़रा समर ने बुलाया है, उसी से मिल कर आता हूँ।”

  ” हम भी चलें आपके साथ? अकेले इस वक्त क्यों जाएंगे आप?”

  ” चिंता मत करो, प्रेम की फोर्स हमेशा सजग खड़ी ही रहती है, और सुनो प्रेम से कुछ ना बोलना वरना वो आधी रात को बीवी बच्चे को छोड़ कर भागता अस्पताल चला आएगा।”

   उस वक्त विराट फ़ोन ओर किसी से बात ही कर रहा था जब राजा जाते हुए उससे टकरा गया, उस वक्त भी फ़ोन होल्ड पर ही था, दूसरी तरफ वाले ने अस्पताल शब्द सुन लिया था।

  ” ठीक है भाई , ध्यान रखिएगा अपना।” राजा के जाते ही विराट ने फोन कान पर लगाया लेकिन तब तक फोन डिस्कनेक्ट हो चुका था।
    बड़ी अजीब लड़की है, खुद इतनी रात को फोन करती है ,बिना ज़रूरत की बातें करती है और उस पर अजीबोगरीब शर्तें भी रखती है। बातें करतें हुए कॉरिडोर में टहलो और उसके बाद कितने कदम टहले इसकी काउंटिंग भी मैडम को बताओ ?
   मुस्कुरा कर विराट ने फ़ोन की तरफ देखा और अपने कमरे की ओर लौट गया। उसे क्या मालूम कि वो अजीब लड़की उस पर नही उसके भाई पर नज़र रखने उसका सिर्फ इस्तेमाल ही कर रही थी।

   ******


     राजा भागते दौड़ते अस्पताल पहुंचा, जब से वो गयी थी कुछ भी अच्छा नही हो रहा था उसके साथ।
  पहले उसके भेजे संदेशों के इतने बुरे जवाब भेजे फिर कुछ दिनों के लिए उसका नंबर ब्लॉक कर दिया, जब बेचारा उससे मिलने की सोच ही रह था कि दादी सा बीमार पड़ गयी, उन्हें लिए उसे यू एस भागना पड़ गया था।
     वापस लौटा ही था कि बुआ साहब की तबियत का फसाद शुरू हो गया था।
    उस रात के बाद से आखिर वो चैन से बैठ ही कब पाया था , अब फिर आज अचानक ऐसे समर का उसे बुलाना उसकी समझ से परे था।

   जाते जाते उसका सुख चैन नींदे सभी तो ले गयी थी बाँसुरी!!

   राजा समर तक पहुंचा ही था कि समर की नज़र वहीं खड़ी किसी और पर भी पड़ गयी थी….
    राजा को प्रणाम कर समर केसर की ओर मुड़ गया

” आप इस वक्त यहाँ क्या कर रहीं हैं केसर जी ?”

” क्यों ये अस्पताल आपकी मिल्कियत है क्या? ” राजा सामने खड़ा ना होता तो अपने मन की बात कुछ ऐसे ही कठोर शब्दों में वो कह जाती लेकिन समर अकेला नही था न इसीसे अपने मन के गुस्से को जज़्ब कर चेहरे पर परेशानी के भाव लाये वो बिलख उठी

  ” हमारे पापा की तबियत रात अचानक बिगड़ गयी, शायद स्ट्रोक है । अभी डॉक्टर जांच में लगे हैं, कुछ देर में ही कह पाएंगे कि हुआ क्या है? हुकुम आप इस वक्त यहाँ कैसे? सब खैरियत तो है ना?”

    राजा की वहाँ पहुंचने पर एक साथ ही नज़र केसर और समर पर पड़ी थी, इसीलिए उसे लगा शायद केसर के कारण समर ने उसे बुलाया होगा लेकिन जब समर को केसर से कारण पूछते देखा तो राजा वापस समर की ओर देखने लगा। समर ने आंखों से आश्वस्त कर उसे फिलहाल चुप रहने का इशारा किया और वापस केसर की ओर मुड़ गया__

   ” हमारे महल की एक कर्मचारी है, उसकी आज तबियत कुछ बिगड़ गयी बस उसे ही यहाँ लेकर आएं हैं।”

  ” महल के नौकरों के लिए भी राजा साहब को खुद आना पड़ता है क्या? अजीब बात है?”

  ” हाँ ! अजीब तो हैं हमारे हुकुम, क्योंकि वो नौकरों को भी नौकर नही इंसान समझ लेते हैं।”

   केसर को समर से हद दर्जे की नफरत थी क्योंकि वो जब जब किसी बहाने राजा तक पहुंचने की राह बनाती वो आकर उस पर कांटें बिछा जाता था, जाने कहाँ से इतना दिमाग लिए बैठा था ये लड़का। केसर को अब उसकी तीखी आंखों से डर लगने लगा था ,वो जैसे आजकल उसे देखता था लगता था जैसे उसका दिमाग भी पढ़ जाएगा।
     केसर इसी कोशिश में रहती की उससे कम आमना सामना हो उसका लेकिन उसके राजा तक पहुंचने से पहले ये उसकी परछाई सा उसके पीछे खड़ा टकरा ही जाता था।
   उसे तो लगा था एक बांसुरी को रास्ते से हटाते ही उसका रास्ता साफ हो जाएगा, लेकिन ये तिकडमी जाने कहाँ से टपक पड़ा था।

  ” आपके पिता साहब कहाँ हैं केसर जी?”

  राजा के सवाल पर उसका ध्यान टूटा और वो राजा की ओर मुड़ गयी

   ” जी आई सी यू में हैं। आप हमें सिर्फ केसर कहा कीजिये, जी लगाने की ज़रूरत नही है हुकुम!”

    समर ने घूर कर एक नज़र उस पर डाली और वहाँ से मुड़ कर भीतर की ओर चला गया, उसे जाते देख राजा भी वहाँ से निकल गया।
    केसर तो इस डर से भागती चली आयी थी कि कहीं सुगन्धा जीवित बच गयी तो उसका सारा भेद ना खोल दे।
    सुगन्धा की ज़बान बंद करने ही वो वहाँ आयी थी लेकिन ये भी जानती थी कि अगर वो किसी सुदृढ़ बहाने के साथ नही आई तो समर आंखों से ही उसका कोर्टमार्शल कर देगा इसलिए अपने पिता की दवाओं में ज़रा उलटफेर कर उसने उनकी तबियत में गड़बड़ पैदा की और उन्हें लिए अस्पताल चली आई, लेकिन उसकी इतनी मेहनत पर भी वो घड़ों पानी फिराने तैयार बैठा लग रहा।

     क्या क्या जतन नही किये थे उसने। बाँसुरी को दवाएं देने के पीछे का उद्देश्य भी यही था कि साल भर में बिना बच्चे की महारानी को वैसे भी महल दूध की मक्खी सा उठा बाहर फेंक देगा , तब तक में अपने टूटते स्वास्थ्य और टूटते रिश्तों की दरकती मीनारों को सहेजने की कोशिश में असफल बाँसुरी को किनारे कर वो राजा के दिल के साथ साथ महल में भी कब्ज़ा जमा बैठेगी, पर उसकी सोच से कुछ अधिक ही जल्दी बाँसुरी महल छोड़ गई थी।
    भले ही इतनी जल्दी चले जाने से उसके स्वास्थ्य पर उतना असर तो नही ही पड़ा होगा लेकिन जो भी हो आखिर वो बला किसी तरह टली तो सहीं, अब राजा को उसका बनने  से कोई नही रोक सकता था।

    आसपास किसी को ना देख कर बहुत धीमे शब्दों में समर ने राजा को सुगंधा से जुड़ी सारी बात उसके पास से बरामद दवा का पत्ता, और रोड पर पहुंचते ही हुआ उसका एक्सीडेंट आदि की जानकारी दे दी थी।
    दोनो बात कर ही रहे थे कि एक बार फिर केसर वहाँ चली आयी, इस बार उसके हाथों में दो कप कॉफी थी, उसने एक कप राजा की तरफ बढ़ाया और दूसरा बहुत धीमें से समर की ओर ।
    समर ने उसे देखा और कप लेने से मना कर दिया__

   ” जी मैं ज्यादा काफी और चाय नही पीता।”

   ” तो फिर क्या पीतें हैं आप?” जानबूझ कर ज्यादा घनिष्ठता दिखाने की केसर की कोशिश समर के मन को और खट्टा कर गयी

  ” बिल्कुल वही जो आप सोच रहीं हैं लेकिन न ये जगह माकूल है और ना वक्त।” उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया और फिर एक चुभता सा सवाल उस पर दाग ही दिया…

  ” आश्चर्य है आपके पिता आई सी यू में हैं और आप इतनी सहजता से कॉफी पिला रहीं हैं।”

   समर का व्यंग केसर को अंदर तक जला गया

  ” हम अपना दुख दुनिया को दिखाने में विश्वास नही करते। आपको शायद हम बहुत गुस्से वाली बददिमाग और बदतमीज़ लड़की लगते होंगे लेकिन हम भी क्या करें, दुनिया के ज़ालिम थपेड़े खा खाकर हमारा दिल पत्थर का हो गया है।”

    उसने भाव भरी आंखों से राजा को देखा , जो बेंच से टिक कर बैठा सामने की दीवार पर जाने क्या देखता खोया हुआ था, उसे यूँ खोया देख एक बार फिर उसके रोम रोम में आग लग गयी और समर मुस्कुरा कर किसी को फ़ोन करने चला गया।


     ******


     सुबह प्रेम की नींद निरमा की आहट से ही खुली, वो मीठी के उठने से पहले ही नहा लिया करती थी। क्योंकि एक बार प्रेम के घर से निकल जाने के बाद अभी अम्मा के ना रहने के कारण मीठी को अकेले छोड़ कर अपने काम करना मुश्किल होता था।
      वो गुनगुनाती हुई कुछ काम में लगी थी , बालों से टपकता पानी उसकी पीठ भिगोए चला जा रहा था। रोज़ सूट पहनने वाली निरमा ने आज जाने किस झोंक में साड़ी पहन रखी थी।
         इधर उधर सामान समेटने के बाद वो आईने के सामने बैठी गुनगुनाती हुई बालों को झाड़ रही थी।
     प्रेम बड़े ध्यान से उसके शब्दों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था कि आखिर वो गा क्या रही है…

   ……… आइना ज़रा निहार लूं
            खुद अपनी नज़र उतार लूँ
       के मैं तो सज गयी रे सजना के लिए……

   गाते गुनगुनाते अचानक उसे ध्यान आया कि कहीं प्रेम जाग तो नही गया , वो झट बिस्तर की तरफ घूम गयी, प्रेम ने आंखें बंद कर ली।
    राहत की सांस ले निरमा वापस आईने की तरफ मुड़ कर अपने बालों में लग गईं।
       उसकी पीठ पर टपकता बूंद बूंद पानी किसी की प्यास बढ़ाता रहा।

   घड़ी पर नज़र पड़ते ही वो हड़बड़ा कर चाय चढ़ाने रसोई में भाग गई।
  एक तरफ पानी गर्म कर और चाय चढ़ा कर वो  दिया बाती कर वापस आ गयी ।
    उसके चाय छानते में प्रेम भी कमरे से बाहर चला आया__

” अच्छा हुआ आप जाग गए, मैं आपको जगाने ही आ रही थी.”

   प्रेम ने एक नज़र उस पर डाली और बाहर लॉन में अखबार लिए चला गया।
     उसकी और अपनी चाय लिए वो भी बाहर चली आयी

   ” मीठी सो रही थी ना?” निरमा के सवाल पर हाँ में सर हिलाकर वो अखबार में डूब गया और उसे देखती वो चाय पीती रही।
       कितना मासूम और सलोना चेहरा बनाये बैठे हैं, जैसे रात की सारी बातें भूल गए हों। पता नही कल रात क्या हो गया था, अगर मेरी आँखें नही खुलती तो पक्का…
    सोच कर ही निरमा शरमा गयी, लेकिन उसके चेहरे पर बिखरा गुलाल देखने की फुर्सत जनाब में नही थी इस वक्त वो पूरी तरह से अखबार में डूबे हुए थे।

    मीठी की रोने की आवाज़ से निरमा का ध्यान टूटा और वो अंदर की तरफ भागी, उसके उठते में ही प्रेम भी उठ कर अंदर की ओर बढ़ चला था। उसे आगे बढ़ते देख निरमा ने मुस्कुरा कर अपने कदम रसोई की तरफ मोड़ लिए।

      रसोई में नाश्ता बनाती वो खिड़की से प्रेम और मीठी को देखती रही….
    मीठी को गोद में झुलाता प्रेम कभी उसे ज़ोर से हवा में उछलता कभी अपनी बाहों में छिपाता अपने आसपास की दुनिया से अनजान अपनी बिटिया में खोया हुआ था।
    बाहर की गुनगुनी धूप में मीठी वापस सोने लगी तो उसे कंधे पर टिकाये वो इधर से उधर घूमता कुछ धीमी आवाज़ में गाये भी जा रहा था, निरमा ने रसोई पर की खिड़की से सुनना चाहा पर जब साफ नही सुनाई दिया तो वो दरवाज़े तक छिप कर चली आयी।

      सजना है मुझे ,सजना के लिए
      ज़रा उलझी लटें संवार लूँ…

       हे भगवान! इसका मतलब ये सोए नही थे, और मेरा गाना सुन रहे थे।
      प्रेम को सुबह का गुनगुनाया खुद का गीत ही गाते सुन निरमा झेंप कर अंदर चली गयी।

      सोती हुई मीठी को अंदर लाकर सुलाने के बाद प्रेम भी तैयार होने चला गया।
    नाश्ते की टेबल पर प्रेम के सामने बैठी निरमा का बार बार मन कर रहा था कि वो प्रेम से शाम जल्दी लौटने को कहे लेकिन संकोच के कारण चुप चाप बैठी वो चाय पीती रही।
    
     बाहर गेट तक जाकर प्रेम वापस आने लगा, निरमा को लगा शायद कुछ कहने आ रहा है, लेकिन अंदर आकर की होल्डर से चाभी उठाये वो वापस निकल गया। गाड़ी गेट से निकालने के बाद वो एक बार फिर उतर कर अंदर की तरफ आने लगा।
    दरवाज़े पर खड़ी वो उसे आते देखती रही। हॉल में सोई मीठी को प्यार करने के बाद निरमा के पास से निकलते हुए उसके कानों के पास वो बहुत धीरे से कुछ कह गया__

    ” शाम को जल्दी आ जाऊंगा।”

   निरमा मुस्कुरा कर रह गयी , मन ही मन मीठी को सुला रखूंगी सोचती वो मुस्कुराती गुनगुनाती बाकी कामो में लग गयी।



*******


बाँसुरी के फोन की बीप से उसकी नींद खुली, इतनी सुबह उसे किसने मेसेज भेजा होगा।
    मेसेज रतन का था, उसे याद आया जाते जाते पिंकी के दिमाग से तो निकल गया लेकिन रतन ने उसका नम्बर ले लिया था।
     सुबह 5.30 पर भी कोई मेसेज भेजता है भला और वो भी इतना लंबा चौड़ा।
    मेसेज नही अच्छा खासा सिविल सेवा का अभिज्ञान था, क्या पढना है कैसे पढना है , क्या नही करना और क्या क्या करना है कि लंबी चौड़ी फेहरिस्त थी।
    इसके साथ ही दैनिक दिनचर्या में कैसे टाइम टेबल बना कर हर काम करना है, नोट्स कैसे तैयार करने हैं के अलावा दिल्ली और आसपास के कोचिंग इंस्टिट्यूट का नाम पता कॉन्टैक्ट नंबर भी उसने भेज दिया था।
    उसने तो बस मज़ाक मज़ाक में सिलेबस निकाल देख लिया था लेकिन ये रतन बाबू तो उसके पीछे ही पड़ गए थे।
   वो खुद यही सोच रही थी कि कुछ दो चार महीनों में राजा नही आया तो वो खुद वापस चली जाएगी, उसने इन किताबों को इतनी गंभीरता से लिया ही कहाँ था।
   लेकिन वक्त अब गंभीर होने का ही था।

  आखिर जिसे देखो मुहँ उठाये उसे बस राजा की पत्नी कि उपाधि से नवाज़ कर उतने में ही उसे सुखी और संतुष्ट रहने का ज्ञान पकड़ाता चला जा रहा था। पहले वहाँ केसर फिर ये पिंकी।
    जबकि दोनो अपने पैरों पर खड़ी हैं बावजूद उसे ज्ञान देने में पीछे नही हैं।
  क्या वो सच में बस राजा की परछाई मात्र बन कर रह गयी थी।
   

    ” लाड़ो ! बड़ी जल्दी जाग गयी बिटिया। चल नीचे आ जा मैं चाय का पानी चढ़ा आयी हूँ।”

    छत पर मिर्चे सुखाने आयी प्रमिला बाँसुरी को बिस्तर पर जागते बैठी पाकर उसे नीचे ही बुला गयी।

   मुहँ हाथ धोकर वो जब तक नीचे पहुंची माँ उसकी चाय लिए खड़ी ही थी, चाय थामे वो आंगन की देहरी पर ही बैठी चाय पीने लगी

  ” कहाँ हो?”  बाँसुरी के पिता नहा कर निकले ही थे और तुरंत ही उसकी माँ को आवाज़ लगा दी उन्होंने

   ” जी अभी आयी। हुआ क्या?”

  ” ये नीली कमीज की बटन कब से निकली पड़ी है, इसे टांकने का विचार है या शर्ट फेंकने वाली हो।”

   ” इधर उधर के काम में दिमाग से उतर गया, लाइये निकाल कर दीजिए मैं अभी टांकें देती हूं।”

   माँ पापा को ऐसे कमीज के बटन पर उलझते देख उसे अपना किस्सा याद आ गया था जब उसने राजा को बताया था कि उसे शर्ट की टूटी बटन टांकने का बहुत मन है।
     उस बात को कहने के अगले दिन ही राजा के नहा कर आते में उसने उसके कपड़े निकाल कर रखे ही थे और किसी और काम में लग गयी थी । उसके निकलने पर सही सलामत शर्ट का जाने कैसे राजा के पहनते में ही बटन गायब हो गया था

   ” बाँसुरी कहाँ बिज़ी हो भई! लो आओ अपनी फैंटेसी पूरी कर लो”

   शर्ट की बटन को गायब देख बाँसुरी को कितना आश्चर्य भी हुआ था

    ” मैं टांक सकूं इसलिए जानबूझ कर तोड़ दी ना!”

   ” पागल हो क्या! इतना वक्त किसके पास है कि पहले खुद तोड़ूँ फिर तुम जैसी अनाड़ी से सिलवाऊं।”

    और राजा ज़ोर से हँस पड़ा था। उसने कितने प्यार से सुई में धागा तो चढ़ा लिया लेकिन सिलना आता तब तो सिल पाती। फिर भी आड़ी टेढ़ी कैसी भी सिलाई मार उसने राजा के पहने में ही शर्ट पर बटन टांक दिया था, ये और बात थी कि पांच मिनट के काम में पूरे पैंतालीस मिनट का लंबा समय लग गया था, और अब तो हर रोज़ का यही सिलसिला चल निकला था। वो शर्ट निकाल कर रख जाती और राजा उसका बटन उखाड़ फेंकता।
     कितनी मीठी यादें थी, कैसे खुद से जुदा करे वो इन यादों को । कितना भी घिस ले धो के साफ कर ले, लेकिन अपने तन मन  पर टंकी उसकी उंगलियों को वो खुद से अलग कहाँ कर पा रही थी।

   लेकिन अब उसे सोचना था, उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न था? क्या वो सिर्फ एक पत्नी है? हालांकि उसे इस बात पर कोई आपत्ति नही थी लेकिन क्या राजा भी इस बात से खुश था कि वो सिर्फ एक पत्नि बन कर रह गयी थी, नही शायद!
     लेकिन महल और महल के नियमों से बंधी वो और करती भी क्या?
    अब लेकिन बहुत हो चुका था, अब उसे अपने लिए सोचना था, खुद की पहचान के लिए सोचना था।

      वो अपना फ़ोन उठाये वहाँ से किसी कोचिंग का नंबर मिलाती ऊपर चली गयी।


*****


     महल में राजा और समर को ना पाकर प्रेम ने उन्हें फ़ोन किया तो उसे एक रात पहले की सारी बात पता चल गई।
    सुगंधा का सारा किस्सा समर से सुनने के बाद वो भी अस्पताल निकलने को था कि समर ने उसे मना कर दिया ….
    राजा की सुरक्षा के लिए प्रेम की पूरी टीम राजा के साथ मौजूद थी ही , उस वक्त समर के बताए काम को पूरा करने के बाद समर ने उसे घर लौट जाने की बात कही थी।
    समर की बताई जगह पर पहुंच कर प्रेम ने उस सारी जगह को ध्यान से देखने के बाद जितनी तस्वीरें वहाँ की ली जा सकती थी ले ली और चुपचाप घर की ओर वापस लौट गया।
     इस पूरे काम को करने के दौरान उसे ये भी ध्यान रखना था कि वो तस्वीरें लेते किसी की नज़र में ना आये।
   इसलिए बड़ी होशियारी से अपना काम पूरा किये वो लौट गया, लौटते हुए उसने समर को सारी तस्वीरें भेजी और महल में युवराज भैया से मिल कर घर की ओर निकल गया।
    शाम का धुँधलका गहराने लगा था… आज दिन भर राजा से मिल ना पाने की कसक थी लेकिन जल्दी घर लौटने का उत्साह भी था।
    जाने आजकल शाम होते ही उसे क्या होने लगता था, उसका वही घर वही कमरा उसे कुछ अलग नज़र आने लगता था।
    दिन भर निरमा में दिखने वाली मीठी की माँ शाम होते ही कहीं खो जाती थी और उसमें उसे दिखने लगती थी सिर्फ अपनी पत्नि, जिसकी हर बात पर जिसके हर नाज़ पर जिसकी हर अदा पर उसका अधिकार था, एकाधिकार!
    जो उससे कोई नही छीन सकता था, खुद वो भी नही।
      गेट से अंदर गाड़ी करते हुए उसके चेहरे पर मुस्कान चली आयी…. बीती रात की एक एक बात आंखों के सामने से निकलती चली गयी, इतने करीब थे दोनो फिर भी वो निरमा को चूम नही पाया !
     कैसी महकी महकी सी आंच थी उसकी ! किसी नशे सी उस पर काबिज होती जा रही थी वो.. और वो पूरी खुशी से उस नशे में डूबने को तैयार था।
   और अब तो ऐसा लगने लगा था कि वो भी उसके साथ डूबने को तैयार थी।

    गाड़ी पार्किंग में डाल मुस्कुरा कर वो दरवाज़े पर खड़ा बेल बजाने ही वाला था कि निरमा ने झट दरवाज़ा खोल दिया।
    दोनो ही दुनिया को भूल कर एक दूसरे का इंतज़ार कर रहे थे जैसे….
     एक पल को लगा जैसे संसार उसी दरवाज़े पर सिमट आया हो ,निरमा को प्यार से देख वो अंदर चला आया।
     अंदर सोफे पर नज़र पड़ते ही वो चौन्क कर पीछे खड़ी निरमा की ओर मुड़ गया। उसे इस तरह चौन्कते देख निरमा हँसने लगी…. तभी रसोई से मामी हाथ में मटर पनीर का भगोना पकड़े बाहर चली आयीं

   ” दामाद बाबू ! अच्छा हुआ आप भी समय पर चले आये।”

  ” जी ! लेकिन आप लोग कब आये? मेरा मतलब कोई खबर नही की। मैं स्टेशन आ जाता लेने।”

” आपको कितना परेशान करेंगे, और दूसरी बात निरमा को सरप्राइज़ देना चाहते थे। दो महीने हो गए और हम लोग अपनी नवासी को देख ही नही पाए थे, टिकट ही कन्फर्म नही हो रही थी न इसलिए कुछ नही बताया आप दोनों को।”

  “हम्म !” सूखा सा जवाब देकर प्रेम ऊपर वाले कमरे में फ्रेश होने चला गया।

    एक साथ खाते पीते बातों में ही काफी समय निकल गया, मीठी को पहले ही दूध पिला कर निरमा सुला चुकी थी।
       मामा जी प्रेम के साथ बैठे टीवी देखते प्रेम को वर्तमान राजनीति के नफे नुकसान गिना रहे थे कि निरमा भी मामी के साथ वहीं चली आयी…

   मामा मामी किसी बात पर बहस में लगे थे कि मौके का फायदा उठाते हुए निरमा ने धीरे से प्रेम के पास जाकर एक फुलझड़ी छोड़ दी

   ” मीठी को सुला दिया है मैंने ”

   प्रेम ने लाचारगी से एक बार निरमा को देखा फिर मामी जी को देखने लगा, उसे पता था मामी निरमा को अकेले नही छोड़ने वाली।

   ” निरमा फिर मेरे सोने की कहाँ व्यवस्था है? कल ज़रा जल्दी उठना पड़ेगा, आज तो हुकुम से मिलना तक नही हो पाया था ,कल थोड़ा जल्दी चला जाऊंगा।मेरे जल्दी उठने से कहीं मामा मामी डिस्टर्ब ना हो जाएं।

    ” नही नही दामाद बाबू! हम बुड्ढा बुढ़िया को अब कहाँ नींद आती है, आपके जल्दी उठने से आपके मामा जी डिस्टर्ब नही होंगे। आप आराम से ऊपर सो जाइये इनके साथ। हम निरमा और मीठी नीचे वाले कमरे में सो रहेंगे।”

     निरमा को हंसी तो बहुत जोर से आ रही थी लेकिन प्रेम का उजड़ा सा चेहरा देख वो अपनी हँसी रोके भीतर चली गयी। भारी कदमों से प्रेम भी ऊपर चला गया।
     कुछ देर बाद ही उसे कुछ याद आया और वो वापस नीचे चला आया, निरमा मामी के साथ बिस्तर पर लेटी गप्पे लड़ा रही थी, दोनों के बीच अपने हाथ पैर हिला हिला कर किलकारी मारती मीठी भी चहक रही थी।
   कमरे में अचानक प्रेम को देख निरमा उठ कर बैठ गयी__

   ” वो मैं मीठी को गुड नाईट बोलने आया था”
प्रेम ने मीठी की तरफ इशारा किया और निरमा को देखने लगा

   ” हाँ तो अंदर आ जाये और कह लीजिए अपनी बिटिया को गुडनाइट।”

    प्रेम ने निरमा वाली तरफ से आकर मीठी को झुक कर प्यार किया कि मीठी ने उसकी उंगली पकड़ ली

   ” मीठी कह रही है पापा हमारे पास ही सो जाओ।”

  ऐसा बोलती मामी उठ कर वाशरूम चली गईं।

   मीठी के हाथ से अपनी उंगली छुड़ा कर प्रेम ने निरमा को देखा

  ” तो जाऊँ मैं ऊपर?”

  ” हम्म ” निरमा के हम्म पर प्रेम मुड़ कर जाने लगा

  ” सुनिए “
वो मुड़ा उसकी तरफ देखा वो उसे देख मुस्कुरा उठी

  ” गुड नाइट! ”

  निरमा के गुड नाइट पर एक मुस्कान दिए वो कमरे से बाहर निकल गया…

क्रमशः

aparna…


  कुछ दिल से……

   आप सभी चाहतें हैं कि राजा और बंसी जल्द से जल्द मिल जाएं लेकिन जिस उद्देश्य से दोनो अलग हुए हैं वो पूरा होने में थोड़ा वक्त तो लगेगा।
    अगले भाग से कहानी एक नए मोड़ की तरफ टर्न हो जाएगी , आशा करती हूं कहानी का आने वाला वो मोड़ आप लोगों को वैसे ही भायेगा जैसे अब तक के भाग पसंद आये।
    कहानी अब अपने अंतिम पड़ाव की तरफ है लेकिन कितने एपिसोड में खत्म होगी ये नही कह पाऊँगी।

   एक आदरणीय पाठक महोदय बेचारे इंतेज़ार कर कर के इतना थक गए कि उन्होंने लिखा –” बस मैडम अब कहानी को समेट लीजिये,अंत जानने को बहुत उत्सुक हूँ, अब बिल्कुल इंतज़ार नही हो रहा।”

   तो सर अगर जल्दी जल्दी समेटने की कोशिश करूँगी तो कहानी और पात्रों के साथ अन्याय होगा। उनके चरित्र पूरी तरह खुल खिल कर जब तक खुद कहानी को पूरा ना करें कहानी अपनी संपूर्णता को नही पा पाएगी।
   
   एक प्यारी पाठिका जी ने लिखा बहुत कुछ मैं बस उसका सार जो ज़रा चटपटा था बता रहीं हूँ

   ” मैम आप प्लीज़ इस कहानी को 200 भाग तक तो लिखना ही।”

    जी कहानी शुरू करते समय मैंने सोचा ही नही था कि कहानी कितनी लंबी जाएगी।
  हाँ कहानी के मुख्य पात्र राजा बाँसुरी, प्रेम निरमा, युवराज रूपा, समर, भास्कर , शेखर, पिंकी रतन माँ साहेब दादी, केसर , ताई ये सारे शुरू से दिमाग में थे …. अदिती का पात्र भास्कर के लिए नया रचना पड़ा वरना भास्कर का किरदार बाँसुरी की शादी के साथ ही समाप्त हो गया था।
     तो ये सारे किरदार जिस दिन अपना कार्य पूरा कर
  लेंगे उस दिन कहानी समाप्त हो जाएगी। 200 भाग तक ले जा पाऊँगी या नही ये तो नही कह सकती लेकिन अंत सुंदर ही होगा।

    अगला भाग तीन से चार दिन में देने की कोशिश करूँगी।

  आप सभी की चमकीली समीक्षाओं के लिए हृदय से आभार व्यक्त करती हूं आपका।
   
   धन्यवाद
  आभार
  शुक्रिया नवाज़िश !!

   aparna….

  
 




       

   
  

 
   

  
          

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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