जीवनसाथी -72

जीवनसाथी -72


जीवनसाथी –72



      समय का पहिया कब किसके लिए थमा है,ना वो राजा के लिए रुकता है ना रंक के लिए।
हम कितना भी सोच लें कि काश ऐसा हो जाये काश वैसा हो जाये लेकिन बहुत बार वो नही होता जो हमने सोच रखा होता है, और हो जाता है कुछ ऐसा जिसकी कभी कल्पना तक नही की होती।
  इसीलिए कहतें हैं जो अपनी इच्छा से हो वो अच्छा लेकिन जो ना हो वो बहुत अच्छा क्योंकि फिर वो ईश्वर की मर्ज़ी से होता है।

     लगभग छत्तीस घंटों की जद्दोजहद के बाद सुगंधा ने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया।
  समर ने डॉक्टरों से बार बार विनती करी किसी तरह एक बार उसे होश आ जाए तो सारी सच्चाई सामने आ जाती लेकिन वो एक बार भी पूरी तरह होश में नही आ पाई।
     समर जहाँ इस बात से बहुत परेशान हो उठा था वहीं राजा दुखी। उसके लिए उसके महल में काम करने वाला हर कर्मचारी उसके परिवार का हिस्सा था। वो सुगंधा के परिवार के बारे में पता करवाने जा रहा था कि समर ने उसे रोक दिया, समर ने कुछ समय के लिए ये बात की सुगंधा नही रही बाहर किसी को भी बताने से मना कर दिया, जाने उसके दिमाग में क्या चल रहा था।

     रात भर फिर अगले दिन और अगली रात भी समर अस्पताल से कहीं नही गया था, राजा को उसने ज़िद करके सुबह वापस भेज दिया था।
   समर की नज़र केसर और उसके पिता पर भी थी, इसलिए भी वो वहाँ से हटना नही चाहता था।

    डॉक्टर के केबिन से बाहर आते ही राजा भारी कदमों से महल के लिए निकल गया, समर अकेले ही बाहर की बेंच पर बैठा आगे क्या करना है सोच रहा था कि केसर चली आयी..

  ” राजा साहब नज़र नही आ रहे।”

   वो उसके बाजू में बैठती पूछ उठी

  ” जी सुगन्धा को होश आ गया इसलिये हुकुम भी निश्चिंत होकर महल निकल गए”

   कभी कभी दिमाग बिना किसी प्लान के भी कुछ बहुत अच्छा कर जाता है, ऐसा कुछ भी बोलना समर ने पहले से सोचा तो नही था लेकिन केसर के सवाल पर अचानक ही ये जवाब दे बैठा, और ये सुनते ही कैसर के चेहरे का रंग उड़ गया

  ” क्या? होश आ गया?लेकिन कब? हम तो सुबह से यहीं हैं कुछ पता नही चला?”

  ” जी आप अपने पिता साहेब के साथ व्यस्त रही होंगी, बस ज़रा नर्सिंग हो जाएं उसके बाद सुगन्धा ने मुझे बुलवाया है , कुछ बताना चाहती है शायद!”

  ” आपको ? लेकिन आपको क्यों? “

  ” ये तो वो ही जाने, कि ऐसी कौन सी बात है जो वो मुझसे कहना चाहती है ,डॉक्टर ने मुझे अभी बाहर इंतेज़ार करने को कहा है…

   समर की गहरी आंखें केसर में धंसती चली गईं, केसर के माथे का पसीना उसकी घबराहट देख समर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी

  ” वैसे आप सुगन्धा को कैसे जानती हैं?”

  “आपसे किसने कहा कि हम उसे जानते हैं?”

  “उस शाम आप ही ने कहा था, आप शायद भूल गयीं, आप कुछ बता रहीं थीं सुगन्धा के बारे में…

   केसर को याद ही नही रहा था कि उसने समर को क्या बताया है क्या नही वो हड़बड़ा गयी…

  ” ऐसी कुछ ज्यादा जान पहचान तो नही है , हाँ इसी सुगंधा की कोई बहन हमारे यहाँ काम करती है। हमारी मेड ने हमे बताया था, की उसकी फुफेरी बहन महल में है।”

     एक तिरछी  सी मुस्कान के साथ हाँ में सर हिलाता समर वहाँ से उठ गया

  ” मैं मेरे लिए कॉफी लेने जा रहा हूं, आप के लिए भी ले आऊं?”

  हाँ में सर हिला कर केसर चुप बैठी रही… समर उठ कर बाहर की ओर निकल गया।
   केसर बस उसके वहाँ से जाने का ही रास्ता देख रही थी, समर के जाने के बाद पांच मिनट रुकने के बाद वो तुरंत सुगन्धा के कमरे की ओर बढ़ गयी।

    दरवाज़ा हल्के से खोल कर अंदर झांकने पर केसर को कोई नज़र नही आया, वो धीमे से भीतर चली आयी, सामने बेड पर सुगन्धा सर तक चादर ओढ़े लेटी थी। केसर धीरे से उस तक पहुंच गई। चेहरा ढका होने से केसर उसे ठीक से देख नही पा रही थी

   ” सुगंधा उठो! हम हैं केसर !सुनो एक बात ध्यान से सुन लो, अगर किसी से ….
    केसर बोलते बोलते रुक गयी, उसने चादर हटाई सुगंधा का सफेद पड़ा चेहरा देखते ही उसे कुछ आभास सा हो गया, उतने में दरवाज़ा खोले समर चला आया..

  ” क्या कह रही थी आप? पूरी कर लीजिए अपनी बात केसर साहेब!”

  ” हम तो बस देखने आए थे कि ये कैसी है लेकिन ये तो बड़ी अजीब सी लग रही है।”

  ” हमारे यहाँ काम करने वाली कामगार को देखने आ जाये आप इतनी बड़ी दिलवाली तो लगती नही? अब और कितना छुपाएँगी केसर जी ? आप खुद बताएंगी या हुकुम और पुलिस बुला लूँ?”

  “क्या बतायें समर सा? बताने लायक कुछ हो तब तो बताएंगे ना?

“केसर जी पहेलियां न बुझायें। आप और मैं  दोनो जानतें हैं सच्चाई क्या है? अगर आप खुद बता देंगी तो ज्यादा अच्छा  होगा?”

” आप जैसा सोच रहे वैसा कुछ नही है समर सा।”

  “तो जैसा है वैसा ही बता दीजिए…”

  कुछ देर समर को देखते रहने के बाद केसर को समझ आ गया इस लड़के से अब और ज्यादा झूठ नही कहा जा सकता। उसे कुछ ऐसा बता कर टालना होगा जो उसके झूठ की नदी पर सच का झीना पुल बांध दे।

  ” हमने कभी कुछ हारा नही है, लेकिन पहली बार हुआ कि आपके हुकुम पर दिल हार बैठे हैं, अब अगर आपके हुकुम शादीशुदा है तो इसमें हमारा क्या कसूर, प्यार कोई सोच समझ कर करने की चीज़ तो है नही। हमारी माँ नही है, पापा साहेब ने ही पाला पोसा, अब अगर रुपयों पैसों में बड़े होने से थोड़ी अकड़ हममें आ भी गयी तो इसमें हमारा क्या कुसूर। “

  ” आपने प्यार किया इसमें आपका कसूर नही है लेकिन जिनसे किया वो तो किसी और से करतें हैं , तब ऐसे में उन्हें अपना बनाने की चाह तो गलत है ना?

  ” प्यार में कहाँ समझ आता है कि क्या गलत है क्या सही!”

  ” खुद को समझ नही आता इसलिए तो गलतियां हो जातीं हैं पर जब सामने से कोई समझाए तब तो समझना चाहिए।”

  ” लेकिन अब तो हुकुम अकेले हैं , उनकी भी तो कुछ ज़रूरतें होंगी।”

  ” उनकी ज़रूरतें पूरी करने बाई सा हैं केसर जी आपको चिंता करने की ज़रूरत नही।

  ” कहाँ हैं आपकी बाई सा? वो तो ज़रा सी बात पर रुठ बैठी? क्या किसी रानी को ऐसा बचकाना काम शोभा देता है। वो तो कहीं से महल की रानी बनने के योग्य थी ही नही, बल्कि अच्छा हुआ वो खुद चली गईं, वर्ना..

“वर्ना क्या? आप मरवा देती उन्हें?”

  ” अरे शुभ शुभ बोलिये समर सा, हम बाँसुरी को क्यों मरवाते भला। आज नही तो कल उन्हें हुकुम को छोड़ कर जाना ही था, इतने पिद्दी से कलेजे वाली लड़की कहीं से उस महल के लायक नही थी। और देख लीजियेगा जो उस महल के उस आसन के लायक होगी वो आपके हुकुम की सहगामिनी बन ही जाएगी।”

  ” आप हुकुम से ज्यादा प्यार करतीं हैं या महल की राजगद्दी से?”

  समर के इतना साफ साफ पूछने से केसर जैसी तेज़ मिजाज़ लड़की भी थोड़ी देर को घबरा गई थी लेकिन उसने खुद को संभाल रखा था

” अगर कहें अपने जीवन से ज्यादा हुकुम से प्यार करतें हैं तो क्या आप अपने हुकुम को हमें सौंप देंगे?”

  ” अगर आपका प्यार सच्चा होगा तो मैं कौन होता हूँ रुकावट बनने वाला लेकिन जाने क्यों आपकी बातों पर भरोसा नही होता।”

  ” ना हो , आपके भरोसे से हमें कुछ लेना देना भी नही जिससे प्यार है वही भरोसा कर ले यही बहुत है।”

  ” वो अभी खुद में नही हैं लेकिन जिस दिन बाई सा वापस आ गयी उस दिन हुकुम वापस अपने रंग में वापस आ जाएंगे।”

” और अगर आपकी बाई सा वापस ही नही आयीं तो?”

  ” वो दोनो एक दूसरे के बिना जी नही सकते।  इसलिए आपको समझा रहा हूं, हुकुम के बारे में सोचना छोड़ दीजिए । नाकामी और आंसूओं के सिवा कुछ हासिल नही होगा।”

  ” चलिए तो फिर यही शर्त रही, हम अपने प्यार से कोशिश करेंगे कि आपके हुकुम हमारे हो जाएं और आप उन दोनों को वापस मिलाने की कोशिश कर लीजिए।”

  ” चलिए ठीक है!  दिया आपको एक मौका! अगर बिना कुछ गलत किये आप सिर्फ अपने प्यार के बल पर खुद को जांचना चाहती हैं तो जांच लीजिये। वैसे मुझे कोई कोशिश करने की ज़रूरत नही है । वो दोनो एक थे और एक रहेंगे, उन्हें कोई अलग नही कर सकता और एक बात , आपने बाई सा के दूध में धीमा जहर मिला कर उन्हें देने की जो जुर्रत की है वो भी फिलहाल मैं हुकुम से नही कहूंगा।
    जिस दिन हुकुम से आप खुद हार मान लेंगी ना उस दिन आपके सारे राज़ भी खुल जाएंगे।”

  ” आपसे किस ने कहा कि बाँसुरी के दूध में मैं दवा मिलवा रही थी।”

  ” दवा!! ये तो मैंने कहा तक नही था केसर साहेब! आपने खुद ने कबूल लिया।
   लेकिन चलिए आप भी क्या याद रखेंगी किससे पाला पड़ा था।  अगर ईमानदारी से खेलना चाहती हैं तो अपने इश्क़ की एक पारी खेल कर देख लीजिए , दावे के साथ कहता हूँ आपको कुछ हासिल नही होगा।”

   समर की बात पर केसर तिलमिला कर रह गयी, उसे पता था अगर ये कह रहा कि ये किसी से कुछ नही कहेगा तो वाकई ये किसी से कुछ नही कहेगा। लेकिन अब समर का अधिक समय तक जिंदा रहना केसर के लिए घाटे का सौदा हो गया था।
   हालांकि उसे मारना इतना आसान भी नही था…

  ” केसर सा ! एक बात और कहना चाहता हूँ, आपकी और मेरी अभी की हुई सारी बातचीत मैंने फ़ोन पर रिकॉर्ड कर ली है, अगर आपने मुझे सुगन्धा की तरह मरवाने की कोशिश की तो ये सारी रिकॉर्डिंग हुकुम के साथ पुलिस तक भी पहुंच जाएगी, इसलिए गुज़ारिश है सच्चा गेम खेलना आप ! अगर कुछ भी इधर उधर किया तो फिर ज़िन्दगी भर पछताने और मेरे नाम का रोना रोने के अलावा आपके पास कुछ नही बचेगा। मैं अपनी पर आता हूँ तो लोगों को खून के आंसू रुलवा कर छोड़ता हूँ और समर सिंह के नाम पर लड़कियां आंसू बहाए ये मुझे पसंद नही।”

   समर वहां से बाहर निकलते निकलते एक बार फिर रुक गया

  ” एक बात और सुगंधा अब ज़िंदा नही है।  आपको रंगे हाथों पकड़ना चाहता था बस! मेरा काम हो गया, मेरे पास सबूत तो नही  हैं लेकिन जमा करने पर लगा हूँ खैर इस सब के बाद भी आपको एक मौका दे रहा हूं। सोच समझ कर आगे बढियेगा। ”

   मुस्कुरा कर समर बाहर निकल गया और केसर तिलमिला कर रह गयी।
   ” तुम्हें तो बुरी तरह से हरा दूंगी समर। समझते क्या हो खुद को? इतनी अकड़ और इतना घमंड? सारी अकड़ निकाल ना दी तो मेरा नाम केसर वखारिया नही।

   पैर पटकती वो भी बाहर निकल गयी।

   ****


     मामा मामी को आये दो चार दिन बीत चुके थे, लेकिन मीठी के साथ दोनो इतने व्यस्त थे की वापस लौटने की दोनो ही कि तरफ से कोई पहल नही हो रही थी।
     प्रेम संकोच में निरमा से कुछ पूछ नही पा रहा था। समय समय की बात है, जब वो निरमा को ब्याह कर लाया था, उस पहली रात एक दीवार के इधर उधर लेटे दोनो अपने अपने दुख से परेशान थे।
    उस पूरी रात वो सो नही पाया था सिर्फ यही सोचते कि उसने सही किया या गलत? उसका भविष्य उसकी जिंदगी क्या होनी है आगे उसे कुछ नज़र नही आ रहा था।
    जीवन कैसा रहेगा भला या बुरा ? सोचना कठिन होता गया था। खुशियां होंगी या दुख?
   लेकिन आज !

   इससे सुंदर तो उसने अपना जीवन कभी सोचा ही नही था। निरमा ने उसका जीवन संवार दिया था, इधर उधर आवारा भटकते लड़के से उसे एक ज़िम्मेदार पुरुष बना दिया था। एक पिता बना दिया था, पति बना दिया था।
     औरत में सच इतनी ताकत होती है?

  ” क्या सोच रहें हैं दामाद बाबू? ”

  प्रेम को खुद में खोए देख मामी ने टोक दिया

  ” जी कुछ खास नही…

  “फिर ठीक है अब ज्यादा सोचा मत कीजिये, और चलिये गाड़ी निकाल लीजिए, हम लोगों की शाम की ही ट्रेन है।”

  “अरे लेकिन इतनी जल्दी क्यों जा रहे आप लोग?”

प्रेम के दिल की खुशी उसके चेहरे पर भी चली आयी

  ” जाना तो पड़ेगा ही ना,वहाँ भी तो गृहस्थी फैली पड़ी है।”

  हाँ में सर हिला कर वो मुस्कुराता बाहर निकल गया।

   गाड़ी में सामान रखने के बाद उसने निरमा से भी साथ चलने पूछ लिया, मीठी को उसकी गोद मे देकर वो जल्दी से कपड़े बदल तैयार होकर चली आयी।

  ट्रेन समय पर थी, स्टेशन पर मामा मामी को छोड़ वो लोग उनकी गाड़ी निकलते ही वहाँ से निकल गए।
  बाहर ही खा पीकर प्रेम ने तेज़ी से गाड़ी घर की ओर बढ़ा दी , गाड़ी पर चलते रेडियो में गाना चल रहा था

      मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को…
       बेला महका रे महका आधी रात को…..

  प्रेम ने तुरंत चैनल बदल दिया , दूसरे पर कुछ और गीत चल रहा था

         मौसम ने भी की है कुछ कोशिशें
           होने लगी देखो ये बारिशें
           सर पे चढ़ा है ये कैसा असर
       दौड़े रफ़्तार में दिल की सब धड़कनें
    धुन कोई चल रही है, कानों में धीमे-से
           रोशन है ज़्यादा ये सुबह
      हलचल जो हो रही है, सीने में होने दे
       खुशियों की मिली है वजह, कुछ है जुनून ..


   वो फिर थोड़ा सा झेम्प गया, गाने में ऐसा कुछ खास था नही , लेकिन दिल में चलती बात ऐसे गानों में सामने आ जायेगी उसे पता नही था, उस अजीब इत्तेफाक पर उसके दिल की गुदगुदी बढ़ती जा रही थी , उसने फिर एक बार चैनल बदल दिया…

            बिन छुए छु लिए हैं तूने
    मुझको दिए हैं प्यार के ये तराने जानिया
              ये जो अब हो रहा है
             कुछ अजब हो रहा है
        क्या यही प्यार का है एहसास
       सौ आसमानों को और दो जहानों को….


   एक प्रेमी हृदय में उठती जलतरंग से दूसरा हृदय कैसे शुष्क रहता, निरमा को प्रेम के मन में चलती अकुलाहट समझ आ रही थी। इस बार गीत सुन उसने ट्रैक बदल दिया….
      अबकी बार गानों का बॉस ट्रैक पर था हम्मा ..

         मुझे डर इस बात का है बस
       के कहीं न ये रात निकल जाए
         मेरे इतने भी पास तू आ मत
     कहीं मेरे हाथों से ना बात निकल जाए
         बोलूँगा सच मैं जो दे तू इजाज़त
        सबर भी अब करने लगा बगावत
      जुल्फें हैं ज़ालिम और आँखें हैं आफत
          लगता है होने वाली है क़यामत….


  इस बार दोनो के ही हाथ एक साथ बढ़े और निरमा के हाथ पर प्रेम का हाथ रखा गया, दोनो ने एक दूजे को देखा

   ” चलने दीजिये ना ! हर गाना क्यों बदल दे रहे ?”

  ” तुम्हे पसंद है क्या?”

   ” हाँ है। औऱ इसके पहले के जितने ट्रैक आपने बदल दिए सारे मुझे पसंद थे…

  ” ओह्ह सॉरी ! मैं फिर से लगा देता हूँ।”

  ” रेडियो पर चल रहे थे वापस अब कैसे आएंगे, अब तो आपको ही गाकर सुनाना पड़ेगा तभी मीठी खुश होगी।”

   प्रेम ने आश्चर्य से निरमा की ओर देखा ,वो उसे देख ज़ोर से खिलखिला उठी। उसे हंसते देख अपनी बेवकूफी समझ कर वो भी हँसने लगा।
     हंसते गुनगुनाते घर पहुंचते में मीठी सो चुकी थी।

  *********

     बाँसुरी ने दिल्ली की एक कोचिंग में अपने एडमिशन की बात करने के बाद घर पर भी सबसे बात कर ली।
    घर पर जहाँ उसकी अम्मा और बुआ नाराज़ हो गईं वहीं उसके पिता सहमत थे ।
   आखिर सारी तैयारी कर वो निकल गयी। बाँसुरी के पिता और ताई भी साथ थे। दिल्ली में कोचिंग इंस्टीट्यूट के पास ही रहने के लिए कमरे उपलब्ध थे, जहाँ अधिकतर परीक्षा की तैयारी करने वाले लड़के लड़कियां रहा करते थे… वहीं उसके रहने आदि की व्यवस्था कर कोचिंग में उसका एडमिशन करवा कर उसके पिता आसपास की जगह देखने और कुछ ज़रूरत का सामान लेने चले गए, ताई कमरे में सब व्यवस्थित करने में जुट गयीं और बाँसुरी अपनी नई यात्रा पर …..
  उसे वैसे भी मंज़िल की तलाश नही थी उसे तो एक रास्ता चाहिए था , जहाँ वो चलती जाए… अनवरत। एक रास्ता चाहिए था जहाँ वो अपने अतीत से भाग सके। उसे वो रास्ता मिल गया था।

   उसे क्लास में पहुंचने में देर हो गयी थी….

” क्या मैं अंदर आ सकती हूं सर?”

  क्लास में लड़के लड़कियां किसी टॉपिक पर जिरह कर रहे थे, सामने गुरुजी टेबल पर बैठे हाथ में चॉक के टुकड़े पकड़े बड़ी तन्मयता से जो उनकी बात ना सुने उन सामने बैठे विद्यार्थियों पर निशाना लगा रहे थे, बाँसुरी के ऐसे चलती क्लास के बीच में पहुंच जाने से सभी एकबारगी उसे देखने लगे

   ” जी आ सकतीं हैं, लेकिन अब तो क्लास खत्म होने का समय हो रहा है!”

  ” जी सॉरी सर! मैँ थोड़ा लेट हो गयी!”

  ” आप थोड़ा नही बहुत लेट हो गईं हैं। आपको पता भी है एग्जाम है कब?

   सामने वाले कि तेज़ आवाज़ सुन उसकी रुलाई फूटने को थी, नीचे सर किये ज़मीन देखती उसने हाँ में सर हिला दिया…

  “इधर देखिए ऊपर! आपको क्या लगता है आप सिर्फ एक महीने की पढ़ाई में सेलेक्ट हो जाएंगी? मई का महीना है मैडम और जून में प्रीलिम्स हैं । आप लोग बस कोचिंग की फीस भर के समझ लेते हैं कि हम कोचिंग नही हैरी पॉटर बनाने की ट्रेनिंग दे रहें हैं… अरे देवी जी पढ़ाई होती हैं यहाँ मैजिक नही सिखाते कि आओ भैया रुपये बत्तीस हज़ार में आई ए एस बनने का जादू सीखो।”

   बात हल्के अंदाज़ में ही कही गयी थी लेकिन जब मन ही खट्टा हो तो फिर हर छोटी से छोटी बात दिल पर लग जाती है, वैसा ही कुछ बाँसुरी के साथ हुआ…
   उसकी आँखों से दो बूंद टपक पड़े, हालांकि उसने नज़रें नीची ही कर रखी थी। उसी वक्त एक रेला सा उठा, बहुत तेज़ कदमों से चलता हुआ कोई कक्षा में प्रवेश कर गया और सारी क्लास एक साथ खड़ी हो गयी, अब तक सामने गुरु जी की टेबल पर आसन जमाये बैठा लड़का कूद कर सामने लड़के लड़कियो की भीड़ में कहीं खो गया, और इस सब के बीच ऑंसू पोंछ बाँसुरी वहीं सामने खड़ी रह गयी…
    बाँसुरी ने देखा बाहर ऑफिस के बाहर जिन शिक्षक महोदय से उसका मिलना हुआ था और जिन्होंने उसे इस क्लास का अता पता बता कर यहाँ भेजा था वही खड़े थे, उसने उन्हें एक बार फिर नमस्ते किया और ठगी सी खड़ी ही रह गयी।
     सामने खड़े सर भी बहुत अधिक उम्र के नही थे, बत्तीस तैतीस की उम्र थी इसी से सभी विद्यार्थियों के साथ उनका दोस्ताना व्यवहार था।   उन्होंने सामने ही बैठी एक लड़की को जगह बनाने का इशारा किया और बाँसुरी को वहाँ बैठने कह कर क्लास की तरफ मुड़ गए….

   ” आप लोगों का जी के, एप्टीट्यूड पूरा हो ही चुका है,रिवीजन पर रिवीजन मारते रहिए बस और रोज़ इस क्लास में करंट अफेयर्स पर ही चर्चा कीजिये ना कि इधर उधर की गॉसिप पर। इस बार का हमारा टारगेट कम से कम सिक्सटी परसेंट सीट्स का है। समझ रहें हैं ना क्लास ! हरि सर का नाम खराब नही होना चाहिए? अच्छा शेखर और लीना सुनो ये नई स्टूडेंट हैं ज़रा इनकी हेल्प कर देना।
    मटेरियल तो ऑफिस से मैंने दिलवा दिया है लेकिन क्लास का देख लेना कुछ छूटे नही। समझे भाई शेखर ?
   पीछे कहीं से एक आवाज़ सुनाई दी ” जी सर”
    कुछ दो चार और बातें बता कर सर ने क्लास खत्म की और निकल गए, जाते जाते वो वापस शेखर नाम की गुहार लगाते गए।
   क्लास खत्म होते ही सभी एक एक कर अपनी किताबें समेटे बाहर निकलने लगे, बाँसुरी को समझ नही आ रहा था कि वहाँ रुके या बाहर चली जाए, वो अपनी जगह से खड़ी हुई कि पीछे की सीढियों से कूदता फांदता एक बार वही लड़का सामने चला आया जो सर के आने के पहले वहाँ सर बना बैठा था

  ” हेलो न्यू कमर! मैं शेखर मिश्रा ! आपका नाम ?”

   बाँसुरी को उसका चेहरा जाना पहचाना सा लगा लेकिन उस वक्त ज्यादा बोलने का मन नही होने से वो अपना नाम बता कर चुप रह गयी  ” बाँसुरी ”

” बाँसुरी हम्म ” यार कहीं सुना सुना सा लग रहा ये नाम ! अरे याद आया मैडम आप भोपाल स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ी बाँसुरी हैं क्या ?”

   अब तक बाँसुरी को भी याद आ चुका था उसने सामने वाले को देखा ,वो उसे ही देख रहा था। बाँसुरी ने हाँ में सर हिला दिया ।

   ” ओहहो अयोध्यावासी अब तुम्हारा भरत मिलाप हो गया हो तो तनिक हमें भी जगह दे दो। हेलो बाँसुरी मैं लीना! यहाँ बाहर कोचिंग कैम्पस में ही रहती हूँ, तुमने भी शायद वहीं कहीं रूम लिया होगा।

   हाँ में सर हिला कर बाँसुरी लीना के साथ साथ चलने लगी

  ” मरजीना अब तू इन मैडम को सब समझा ले मैं चलता हूँ।” मुस्कुरा कर शेखर वहाँ से भागने की फिराक में पीठ पर टंगे बैग को संभालता आगे बढ़ गया

  ” अबे रूक! कहाँ भाग रहा है तू?  सर ने क्या बोला सुना नही। चल हमारे साथ कैंटीन में, और सब सारा समझा दे जल्दी जल्दी। देखो बाँसुरी ये जो अफ़लातून बंदा है ना इसके अनुसार इसके पास अनाप शनाप दिमाग है और ये उसे खर्च करने की जगह सेंत कर तिजोरी में छिपा रखता है।

   ” जलन! बेटा दीना ये तुम्हारी जलन बोल रही है, मेरे जैसे दिमाग वाले बंदे की संगत में हो इसलिए जी खा पा रही हो। देख लेना टॉपर रहूंगा मैं।”

  “टॉप करने के लिए सब कुछ याद रखना पड़ता है, यहाँ मिसिर जी को हमारा नामे याद नही रहता कभी लीना को मरजीना कहेंगे कभी दीना कभी बीना ।बड़ा आया टॉप करने वाला?कुत्ता!”

” तू मेरे को कुत्ता बोली मीना।”

  “कुत्ते को कुत्ता बोली , तेरे पीछे देख खड़ा है। तेरे को कुत्ता बोलूंगी न तो ये मुझे गुस्से में काट खायेगा।”

  ” हम्म फिर ठीक है।”

   उन दोनों की चुहलबाजी में बड़े दिनों बाद बाँसुरी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी थी। तीनो साथ ही कैंटीन चले आये।
    एक टेबल पर उनके बैठते ही एक दुबला सा लड़का ऑर्डर लेने चला आया…

  ” क्या ले आऊं भैया जी?”

  ” अबे मिलता क्या है बे यहाँ! ले आओ अपनी जहरीली चाय , वही पी के मरें हम लोग..

” क्या भैया जी ! ” खींसे निपोरता वो अंदर चला गया। काउंटर पर बैठा मालिक वहीं से चिल्ला कर पूछ बैठा


    ” मिश्रा जी समोसे भेज दें? एकदम गरामगरम कड़ाही से उतरे हैं।”

  शेखर ने हँस कर उसे हाथ हिला कर मना कर दिया

  ” नही मालिक! अभी परीक्षा तक जिंदा रहना चाहता हूँ। उसके बाद जान ले लेना हुजूर ।”

  “कुछ भी बोलता है ये। ” लीना ने मुस्कुरा कर चाय बाँसुरी की तरफ बढ़ा दी ” इतनी बुरी भी नही होती है”

   बाँसुरी ने हँस कर चाय का प्याला उठा लिया, चाय का प्याला मुहँ से लगाते ही उसे महल की फीकी ज्यादा दूध वाली अंग्रेजों के तरीके की चाय याद आ गयी और उसके चेहरे पर एक रंग आ कर चला गया। लीना और शेखर आपस में भिड़े हुए थे कि शेखर का ध्यान बाँसुरी के उदास चेहरे पर चला गया…

  ” अरे अरे डरिये मत आप , मरेंगी नही इस चाय को पीकर ..”

” स्टॉप इट यार शेखर ! वो सिलेबस को लेकर परेशान है शायद ! डोंट वरी बाँसुरी सब हो जाएगा। ये बैठा है ना गधों का सरदार ये सब करवा देगा वैसे भी इसके पास….

  ” अनाप शनाप दिमाग है… ” कह वो एक बार फिर ज़ोर से हँस पड़ा….

   हंसते मुस्कुराते फिर वो अपने बैग से एक एक कर किताबें निकालता बाँसुरी को पढ़ाई और नोट्स की बारीकी समझाता चला गया।

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  गेट से अंदर गाड़ी कर दरवाज़े के सामने निरमा को उतार प्रेम पार्किंग की ओर चला गया।
   निरमा  मीठी को गोद में लिए वहीं खड़ी उसके आने का इंतज़ार करती रही। कुछ थोड़ा बहुत सामान भी खरीद लिया था वही सब संभाले प्रेम आया और दरवाज़े का लॉक खोल दिया। निरमा के पीछे ही वो भी अंदर चला आया।

   मीठी को सुला कर निरमा फ्रेश होने चली गयी, उतनी देर में वो भी अपने कमरे से हाथ मुहँ धो कपड़े बदल नीचे चला आया।
     बाथरूम से निकल निरमा रसोई की ओर जाती हुई ठिठक गयी, सोई हुई मीठी के पास लेटा प्रेम आंखें बंद किये कुछ गुनगुना रहा था ….
    निरमा को हँसी आने लगी ,वो धीमे कदमों से उस तक पहुंची सुनने की कोशिश कर रही थी। उससे अनजान प्रेम गुनगुनाने में मगन था…..

  “कुछ अच्छी सी खुशबू आ रही है ना? ” प्रेम ने चौन्क कर ऑंखे खोल दी, अब वो कैसे कहता कि अभी ऊपर कमरे में वो परफ्यूम के कुंड में डुबकी लगा कर ही नीचे आया है और ये उसके परफ्यूम की खुशबू है?

  “ये खिड़की खुली है ना, यहाँ से रातरानी की महक अंदर तक आ रही है, कुछ महीनों पहले ये बेल लगाई थी , आज जाकर महकना शुरू हुआ है।”

  वो मुस्कुरा कर खिड़की पर चढ़ी बेल को देखती खड़ी रही।
    प्रेम धीरे से उठ कर उसके पास चला आया…

  ” निरमा! बहुत दिनों से कुछ कहना चाहता था”

   ” हम्म!”

   ” हमारी शादी जैसे माहौल में हुई कुछ सोचने समझने की गुंजाइश ही नही थी, लेकिन एक बात कन्फेस करना चाहता हूँ कि तुमने मेरे लिए जो भी सोचा हो लेकिन शादी के अगले दिन से मैंने दिल से तुम्हें अपनी पत्नी मान लिया था। बावजूद तुम पर किसी तरह का कोई हक नही जताना चाहता था, तुम्हें वक्त देना चाहता था जिससे तुम अपने ज़ख्मों से बाहर आ सको।
    तुमने मेरे लिए, मेरे इस घर के लिए जितना किया है उसका शुक्रिया कह कर तुम्हारा एहसान उतारना नही चाहता।
   तुम नही जानती तुमने मुझे बिना मांगे ही मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफा दिया है मीठी!  इसके लिए मैं आजीवन तुम्हारा ऋणी रहूंगा।”

    निरमा भी बहुत कुछ कहना चाहती थी लेकिन भारी  पलकों और भरे गले से कुछ कह नही पायी। प्रेम ने उसे कंधो से पकड़ कर अपनी तरफ मोड़ लिया, उसकी आँखों में छलकते ऑंसू देख वो अचकचा गया

  ” क्या हुआ? कुछ गलत कह दिया क्या मैंने?

  ना में सर हिला कर वो प्रेम के गले से लग गयी, प्रेम ने कस कर उसे अपनी बाहों में भींच लिया….
    चांद कब ढला ,रात कब बीत गयी दोनो को पता भी नही चला।

  ******


    पढ़ाई लिखाई में समय का खयाल ही नही रहा था, शाम ढल चुकी थी । बाँसुरी के फ़ोन पर बजती रिंग से सबका ध्यान उचट गया

  ” बेटा कहाँ हो? अभी तक क्लास चल रही क्या?”

  ” नही पापा! क्लास खत्म हो गयी, मैं यहाँ कैंटीन में थी, साथ वालों से ज़रा नोट्स वगैरह ले रही थी।”

  “जल्दी आ जाओ, आज ही रात की वापसी की ट्रेन भी है मेरी। ताई कुछ समय तक रुकूँगी कह रही हैं।

   फ़ोन रख कर वो उन दोनों को कुछ बताती उतने में दोनो ही उसकी बात पहले ही समझ चुके थे।
   शेखर ने किताबें समेटी और सुबह 7 बजे क्लास पहुंचने को कह गुनगुनाता हुआ वहाँ से निकल गया

    कुछ है जुनून सा कुछ पागलपन है
    सौ बातें करता ये बुद्धू सा मन है।।

  उसे इतनी तेज आवाज में गाते हुए जाते देखती बाँसुरी अपना सामान रखने लगी

   ” बॉलीवुड के जितने भी लीजेंड गायक हुए थे ना उन सबके स्वर्गवास के बाद उनकी आत्माओं को ब्रम्हा जी ने मिक्सी में डाल कर मिक्स किया और ये शेखर पैदा हुआ, एक पल को तो चुप रहे दिन भर कुछ ना कुछ गाता रहता है। चलो चलतें हैं मैं तुम्हें अपना कमरा भी दिखा दूंगी।”

    बाँसुरी ने हाँ में सर हिलाया और लीना के साथ आगे बढ़ गयी…..

  क्रमशः

  aparna…..


  
    
    


 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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