जीवनसाथी-73

जीवनसाथी  –73




        जिसे जो मिलता है वो उसे भाता नही और कोई दूसरा उसी को पाने कि चाहत में बेकरार हुआ जाता है।
    बाँसुरी के मन में राजा से प्रेम और उससे बिछड़ने का दुख इतना हावी हो गया था कि उसे अभी परीक्षा की तैयारियां सिर्फ राजा की यादों से दूर भागने का जरिया मात्र लग रही थीं।
    जितनी बार वो खुद को तैयार कर खड़ी होती उतनी ही बार राजा की कोई न कोई बात उसे याद आ जाती और वो खिड़की पर बैठी उसी याद के सहारे पूरा दिन गुज़ार देती।
     बाँसुरी को दिल्ली आए चार पांच दिन हो चुके थे। शेखर और लीना ने क्लास में बताए लगभग सारे एक्स्ट्रा पॉइंट्स उसे उतरवा दिए थे , कुछ एक जो बाकी थे उसके लिए शेखर ने सुबह छै बजे उसे कैंटीन में बुलाया था। लीना भी वहीं आने वाली थी।
     रात बहुत देर तक राजा की याद में आंसू बहाने के कारण बांसुरी की सुबह नींद ही नही खुल पायी, ताई सात बजे जब उसे उठाने आयी तब उसकी आंख खुली….
     चाय का कप हाथ में पकड़े उसने मोबाइल पर नज़र डाली , सुबह के सात बजे चुके थे, शेखर का एक और लीना के चार मिस्ड कॉल थे। उसे एकदम से सुबह की पढ़ाई का तय समय याद आया और वो कूद कर बाथरूम में भाग गई।
    फटाफट तैयार हो कर निकलने में भी उसे आधा घंटा लग ही गया ।
     भागती दौड़ती वो किसी तरह कैंटीन  पहुंची , वहाँ कैंटीन के एक ओर लगे बड़े से बरगद के चबूतरे पर बैठे लीना और शेखर किसी टॉपिक पर उलझे हुए थे, सामने ही दो कप चाय रखी थी।
     वो भाग कर उन तक पहुंच गई…

  ” सॉरी गाइज़ मैं लेट हो गयी।”

   लीना ने उसे देख कर एक हल्की सी मुस्कान दी और उसके बैठने के लिए एक तरफ जगह बनाती खिसक गई। शेखर ने बिना बाँसुरी को देखे ही अपनी चाय उठा ली और पेन से किताब पर कुछ चीज़ें टिक करता रहा।
    बाँसुरी ने लीना से इशारे से पूछा ” इसे क्या हुआ?” लीना ने कांधे उठा कर ना में सर हिला दिया ।

   ” तो आज क्या किया लीना ? मुझे भी बताना! ”

   लीना से कहती बाँसुरी अपने बैग से किताबें निकालने हाथ डाल कर चौन्क उठी

   ” ओह्ह शिट! लीना मैं तो बुक और नोटबुक दोनो ही लाना भूल गयी। खैर तुम बताती जाओ मैं तुम्हारी बुक से फ़ोटो ले लेती हूँ, मैं उन्हीं से पढ़ लुंगी घर पर।”

   लीना ने चुपचाप उसकी तरफ किताब बढ़ा दी। उतनी देर में अपनी चाय खत्म कर शेखर अपनी किताबें समेट उठने लगा…

  ” अरे तू कहाँ जा रहा है? ये अभी तो आयी है , करवा दे ना जो बचा है।”

   ” मुझे थोड़ा काम है ! आज नही करवा पाऊंगा। और तू क्या मोटी बस कैंटीन की जहरीली चाय और सड़े समोसे ठूंसने को है, तू करवा ना , मैं तो चला ।”

  ” सॉरी शेखर जी ! आप थोड़ा नाराज़ से लग रहे हैं मैं समय पर नही आ पाई ना!”

   बाँसुरी की बात पर शेखर भी शुरू हो गया

  “मैं आपसे क्यों नाराज़ होने लगा भला, आप मेरी कौन सी रिश्तेदार लगती हैं। लेकिन हाँ दुखी ज़रूर हुआ क्योंकि मुझे दूसरों के वक्त की कद्र ना करने वाले बिल्कुल पसंद नही हैं। देखिए हो सकता है आप शौकिया ये परीक्षा दे रही हों, ये भी हो सकता है कि आप सेलेक्ट हो जाएं लेकिन आपके इस तरह बिना मन पढ़ने और चयनित होने से कोई एक वांछित पात्र अपनी सीट खो बैठेगा जिसे शायद आपसे ज्यादा जरूरत हो इस सीट की।
     मुझे किसी से कोई नाराज़गी नही होती, लेकिन मेरा एटीट्यूड ही ऐसा है तो क्या करूँ। मैं जब जिस वक्त जो काम करता हूँ पूरी शिद्दत से करता हुँ, और अगर मन बिल्कुल ही गवाही ना दे तो फिर वो काम उठाता ही नही हूँ।
    मुझे खुद इस क्षेत्र में कैरियर नही बनाना था, मैं तो संगीत में अपनी पहचान बनाना चाहता था लेकिन अपने डैड के सपने को पूरा करने ही यहाँ आया हूं। वो मेरे संगीतप्रेम से नाराज़ थे , और मैं उनसे लड़ झगड़ कर अपनी नौकरी पर चला गया, खैर मेरी कहानी किसी और दिन सुना लूंगा फिलहाल यही कहना चाहता हूँ कि अगर आप मन से नही जुड़ पा रहीं परीक्षा और उसकी तैयारियों से तो कम से कम हम बाकी लोगों का समय अपने कारण बर्बाद मत कीजिये।
    आपको करवाना था इसलिए हम दोनों सुबह से यहाँ पर बैठे  एक सौ छत्तीस बार किया हुआ भाग ही पढ़ते बैठे रहे, अगर आपका काम नही होता तो हम अपने अपने कमरे में अपना काम करते होते।”

   शेखर अपनी रो में बोलता चला जा रहा था उसने ध्यान ही नही दिया कि नीचे सर किये बैठी बाँसुरी की आंखों से झड़ी लगी हुई थी।

  बाँसुरी को रोते देख लीना ने शेखर को इशारे से बाँसुरी को देखने कहा लेकिन जब उसका इशारा समझे बिना भी वो बोलता रहा तो लीना को धीरे से उसकी बात काटनी पड़ी…


   ” बस कर यार शेखर! कितना सुनाएगा वो बेचारी रोने लगी।”

   शेखर ने एक नज़र बाँसुरी पर डाली और अपना बैग उठा कर वहाँ से जाने लगा

  ” यार तुम लड़कियो का यही सबसे बुरा हथियार लगता है मुझे, जब हारने लगोगी रोना शुरू। अब तुम दोनों अपना ये रोना गाना गेम खेलो मैं तो चला।”

  ” अरे रुक जा मोगैम्बो! इतना गुस्सा काहे कर रहे हैं शेखर बाबू , आपकी गंगापार वाली याद आ गयी क्या?”

   लीना ने माहौल हल्का करने की कोशिश की

  ” ना गंगा पार वाली याद आयी ना जमना पार , अभी फुल ऑन पढ़ाई। समझी करीना। चल अब मैं चला, बाय।”

   शेखर बाँसुरी की ओर देखे बिना ही फिर वहां से निकल गया, बाँसुरी ने उसे जाते देखा और वापस लीना को देखने लगी, लीना मुस्कुरा कर रह गयी

   “थोड़ा अजीब है ये।  चलो तुम उस पर ध्यान मत दो, मैं बताती जाती हूँ क्या क्या बाकी था।”

    दोनों पढ़ाई में लगी थी कि लीना के फ़ोन पर शेखर का मैसेज आ गया…

  ” अगर तेरी फ्रेंड को कुछ डाउट्स हों तो शाम में मैं फ्री रहूँगा चार से छै , तब चाहे तो वापस यहीं आ सकती है। ”

   लीना ने मेसेज बाँसुरी को दिखा दिया, बाँसुरी ने मुस्कुरा कर हाँ कह दिया

   लीना के जवाब पर उसका वापस छोटा सा मेसेज आ गया

   ” ओके तो तुम लोग दस मिनट पहले पहुंच कर मुझे मेसेज कर देना, मैं आ जाऊंगा।”

  शेखर का मैसेज पढ़ मुस्कुरा कर उसे खडूस बोल लीना वापस बाँसुरी को पढ़ाने में लग गयी।।

    *****


प्रेम ने आखिर इतने महीनों बाद अपने दिल में दबी बातें निरमा से कह ही दी। उसकी भावनायें सुनती समझती निरमा भी काफी कुछ कहना चाहती थी लेकिन उसकी भावनाएं उसके गले तक आकर अटक कर रह गयीं।

निरमा भी बहुत कुछ कहना चाहती थी लेकिन भारी  पलकों और भरे गले से कुछ कह नही पायी। प्रेम ने उसे कंधो से पकड़ कर अपनी तरफ मोड़ लिया, उसकी आँखों में छलकते ऑंसू देख वो अचकचा गया

  ” क्या हुआ? कुछ गलत कह दिया क्या मैंने?

  ना में सर हिला कर वो प्रेम के गले से लग गयी, प्रेम ने कस कर उसे अपनी बाहों में भींच लिया….
    चांद कब ढला ,रात कब बीत गयी दोनो को पता भी नही चला।

    निरमा को प्रेम की बाहों में अपने जीवन का हर पल याद आ रहा था, बचपन में ही माता पिता का न रहना, मामी के पास गुज़रे दिन, प्रताप से पहली मुलाकात, उसके साथ के प्यार और तकरार भरे दिन, और फिर प्रताप का एकाएक चले जाना।
    प्रताप के जाने के बाद से उसने कभी किसी कंधे का सहारा नही लिया था, अपने आंसू अपने गम उसके निहायत ही निजी हो गए थे… यहाँ तक कि अपनी सबसे खास सखी बाँसुरी से भी वो कहाँ प्रताप की बातें कर पाती थी, आज इतने महीनों बाद उसे वो कंधा मिल गया था जिस पर सर रख कर वो अपना मन हल्का कर सकती थी।
  इतने दिनों में प्रेम के साथ ने उसके दुख को बहुत कम कर दिया था , लेकिन इतने दिनों का भरा गुबार भी कहीं तो निकलना ही था।
     निरमा प्रेम के कांधे पर टिकी रोती रही और वो उसके साथ बैठा चाँद को डूबते देखता रहा…..
     वो उसके कंधे से लगी ही थक कर सो गई और वो  उसके सुंदर चेहरे पर चमकता उसका खुद का भविष्य देख मुस्कुराता बैठा रहा।

******


     पढ़ाई खत्म कर बाँसुरी और लीना जाने के लिए उठ गए …
  बाँसुरी ने लीना को भी अपने साथ ही ले लिया , लीना उसके साथ उसका कमरा देखने चली गयी। दोनो बैठी थी कि ताई उन दोनों के लिए कचौड़ियों के साथ चाय ले आयीं__

  ” ऑन्टी जी ये इतना हैवी तो अभी नही खा पाऊँगी पर हां चाय तो मैं कभी भी पी सकती हूं सो चाय ले लूँगी।”

  ” अरे तुम बच्चों का आजकल ये हैवी वो हैवी ही चलता रहता है। अब इस उम्र में नही खाओगी तो कब खाओगी बिटिया!हमारी उम्र में तो वैसे ही डॉक्टर मना कर देंगे। इसके भी ऐसे ही नखरे रहते हैं।”

  ताई की बात सुन लीना हँसने लगी..

  ” मुझे ये सब पसंद है ऑन्टी , मैं तो इसलिए नही खा रही कि फिर पढ़ाई नही कर पाऊँगी और सो जाऊंगी। चलो बाँसुरी मैं चलती हूँ, शाम चार बजे पहुंच जाना तुम!”

   अपनी बात खत्म कर वो फटाफट वहाँ से निकल गयी।

   शाम चार के कुछ पहले ही बाँसुरी कैंटीन पहुंच गई, लीना उसे दूर से आती नज़र आ गयी…

  “वाओ नाइस ! उस अक्खड़ की डांट का असर दिख रहा है बाँसुरी तुम पर।”

  ” नही यार! डांट वाली बात नही, असल में मुझे खुद भी लगा कि मैंने गलत किया था सुबह। फ़ोन कर लो शेखर जी को ।”

” उसका फ़ोन पहले ही आ गया था, नही आ पायेगा। वो बाथरूम में स्लिप हो गया पैर में उसे स्प्रेन हो गया है ।”

  “ओके!चलो फिर हम दोनों ही कर लेते हैं।”

  ” हम्म ! मैं सोच रही थी उसके रूम पर चलते हैं, वो बहुत फटाफट करवा देगा और उसके याद करने के ट्रिक्स भी लाजवाब होते हैं यार। कभी गाना बना के याद करता है कभी कहानी! उसके फार्मूला एक से बढ़ कर एक होतें हैं।
    बंदा पढ़ाई को इतना आसान कर देता है कि सब कुछ ज़बानी रट लो, ज़िन्दगी भर नही भूल सकते उसके ट्रिक्स और टैक्ट्स। चल उसके रूम पर। आज कुछ फॉर्म्युला बताने वाला था कमबख्त!  पास में ही है रूम। मैं गयी हूँ कई बार, डोंट वरी।”

   बाँसुरी ने धीरे से हाँ कहा और लीना के साथ आगे बढ़ गयी। कुछ दूर जाकर ही एक गली के अंदर शेखर ने कमरा ले रखा था।
   मकान मालिक के घर के एक किनारे से ऊपर को सीढियां थी, लीना के पीछे वो भी चढ़ती चली गयी।
दरवाज़ा खुला ही था, लीना ने दरवाज़े पर थाप दी

   ” कौन है?”

   ” मैं लीना , आ जाऊँ अंदर ।”

  ” मना करूँगा तो चली जायेगी वापस?

  ” ना ! बिल्कुल नही ।”

  बोलती लीना दरवाज़े को धकियाती अंदर चली गयी।

  अंदर शेखर ज़मीन पर बिछे गद्दे पर बैठा कुछ पढ़ रहा था, उन दोनो के आने से सीधा बैठ गया, पैर पर उसके क्रेप बैंडेज बंधा था…

  “आत्महत्या करने के लिए बाथरूम में फिसलना कौन सा तरीका है भई?”  लीना के सवाल पर तुरंत शेखर ने जवाब लपक लिया

  ” अभी मेरा बाथरूम मुझसे इतना त्रस्त नही हुआ की आत्महत्या करने की सोचे, समझी शीना ?”

  ” बाथरूम को कभी अपनी शक्ल दिखायेगा तब तो वो त्रस्त होगा ना? जिस बंदे को हफ्ते में एक बार नहाना हो उसका बाथरूम तो मुस्कुराएगा ही।”

  ” कर ली बकवास! अब कुछ पढ़ें? और तू कब से इतनी शरीफ हो गयी जो नॉक नॉक कर रही थी दरवाज़े पर?”

  ” छिछोरे ! हमेशा नॉक कर के ही आतीं हूँ , पहला तो ये डर लगता है कि तू अपने लड़कों वाली यूनिवर्सल ड्रेस में ना घूम रहा हो दूसरा पढ़ाई से ब्रेक लेने किसी बंदी के साथ टाइम पास न कर रहा हो।”

  ” वेरी स्क्रफी !! अगर कोई कोई बंदी साथ होगी तो दरवाज़ा लॉक रखूंगा ना फ़र्ज़ीना। चलो शुरू करें पढ़ाई।”

   उन दोनों की बातों के बीच बाँसुरी उस कमरे को देखने में व्यस्त थी, ज़रूरत भर का सामान और साधारण सा कमरा था , जिसमे एक आलमारी किताबों से भरी थी और सारी दीवारें छोटे छोटे नोट्स से भरी थी। कहीं मार्कर से तो कहीं डॉट पेन से कुछ न कुछ लिखा था। ऐसा लग रहा था सारे सिलेबस को उस कमरे की दीवारों पर उतार दिया गया था, एक किनारे एक टेबल और कुर्सी थी, दोनो में ही किताबें रखी थी।
    खूंटी पर दो शर्ट और एक जीन्स टँगी थी। कमरा बुरी तरह से एक बैचलर लड़के का कमरा लग रहा था, सबसे किनारे की एक टेबल पर एक हॉट प्लेट और गिन के चार बर्तन रखे थे, एक भगोना एक गिलास एक चम्मच और बड़ा कॉफी कप। इसके अलावा उस कमरे में कुछ भी काम की चीज़ नही थी पर देखा जाए तो उस कमरे की हर चीज़ बहुत काम की थी।

    बाँसुरी को सारा जायज़ा लेते देख शेखर ने पूछ ही लिया__

  ” क्या हुआ बाँसुरी जी ! कहाँ खो गयीं आप?”

   ना में सर हिला कर वो लीना के पास चली आयी, लीना उसके मन की बात समझ गयी….
    आखिर वो भी लड़की थी जानती थी कि अगर कोई लड़की दो दिन के लिए भी कहीं रहने जाए तो पांच जोड़ी कपड़ों के साथ नाइट सूट टॉवेल, पेपर नैपकिन टूथब्रश पेस्ट साबुन शैम्पू ये – वो जैसे साजो सामान के बिना नही जा सकती यहाँ शेखर का ऐसा वैरागी रूप देख बाँसुरी चकित हुई जा रही है।

  ” ये ऐसा ही है बाँसुरी ! ज़रूरत बस का सामान रखता है। तुम्हें पता है खाना भी ये एक ही टाइम खाता है जिससे बनाने का टाइम बच जाए।”

  ” पर खाना बनाते किस में हैं? ” बाँसुरी के सवाल पर शेखर ने उसे अपनी जमा पूंजी उन चार बर्तनों की ओर इशारा कर दिया।

  ” इनमें कैसे ? रोटियां तो बन नही पाती होंगी?”

  ” तो रोटियाँ खाता कौन है? मैं तो वही बनाता हूँ जो मुझे इजी पड़ता है, कभी दाल बना लेता हूँ कभी खिचड़ी । कभी चावलों में थोड़ी सब्जियां डाल के पका लेता हूँ।

  ” ओह्ह आपको रोटियाँ पसंद नही हैं क्या?”

  ” अभी सिर्फ और सिर्फ मुझे मेरी सीट पसंद है । यहाँ मैं कोई पिकनिक मनाने तो आया नही, और ना ही अपनी गृहस्थी सजाने आया हूँ कि बर्तन टीवी फ्रिज जमा करूं । लक्सरी में पढ़ाई कहाँ से होगी। पढ़ने आया हूँ तो बस पढना है खाने पीने के लिए तो उम्र पड़ी है मैडम, लाइये कहाँ थे हम सुबह।”

  ” रखने के लिए जगह कहाँ बनाऊंगा ये सोच कर कपड़े भी ज्यादा नही रखता? बर्तन धोने पडेंगे इस डर से बर्तन नही रखता, बेड रख लूँगा तो ज्यादा सो ना जाऊँ इसलिए बेड भी नही , ओवरऑल ये हद दर्जे का कंजूस भी है। ”
   मज़ाक में कही अपनी बात पर लीना हँसने लगी….

“हाँ ऐसी कंजूसी से जुड़े पैसों से तेरा दहेज़ दूंगा सकीना। यही बर्तन बेच कर तेरा दूल्हा ढूंढूंगा।”

  अपनी बात फटाफट पूरी कर उसने किताब खोल ली।
       शेखर ने तो किताब खोल ली लेकिन आज इस कमरे में आकर बाँसुरी की आंख खुल गयी थी। वो अभी तक इस परीक्षा की तैयारी को बस राजा की याद से बचने का एक जरिया मान रही थी। समय गुज़ारने का एक रास्ता समझ रही थी, और हर पल भगवान से बस यही मनाया करती थी कि राजा उसे लेने आये और वो तुरन्त  उसके साथ अपने महल वापस लौट जाए।
       सबने समझाया , चाहे रतन हो उसके पापा लेकिन हर बार थोड़ा सा उत्साहित होकर वो वापस बहुत सा हतोत्साहित हो बैठती थी।
   लेकिन आज सही मायनों में उसकी आंखें खुल गईं थीं।
   ये लड़का जिसका खुद का सपना तक नही है आई ए एस बनना वो भी अपने पिता के सपने को पूरा करने कैसे जी जान से जुटा है।बल्कि एक तरह से तपस्या कर रहा है। हाँ ये तपस्या ही तो है फिर वो क्यों इस परीक्षा और इसकी तैयारी का मज़ाक बनाये बैठी है।
    
    वो खुद से आगे बढ़ी शेखर की बताई बातों को लीना से ली नोटबुक में उतारती चली गयी।
     इतने दिनों में पहली बार हुआ कि उसने शेखर के पढ़ाने के बाद अपने कुछ डाउट्स पूछे और उन्हें भी लिख कर रख लिया, टी ब्रेक में जब लीना चाय बनाने लगी तब बाँसुरी घूम घूम कर दीवारों पर लिखे नोट्स भी पढ़ती रही।
    अब उसने खुद से ये प्रॉमिस कर लिया था कि उसे ये एग्जाम किसी भी हाल में पास करना ही है।


  ” चाय तो चढ़वा ली अब बता भी दे कि छाने किसमें?

   लीना के सवाल पर  शेखर उसे देखने लगा

   ” हैं तो वहाँ बर्तन !”

   ” किसी एक को गिलास में किसी एक को कप में और तीसरे को किस में दूँ?”

“मेरा भगोने में ही रहने दे । मैं बाद में पी लूंगा , गर्म कर के।”

” तेरे मुहँ में ही ना छान दूँ, कंजूस कहीं का! एक कप और रख लेता तो जाने इस तुगलक की कौन सी मिल्कियत गिरवी हो जाती।”

” कमबख्त दिल गिरवी हुआ पड़ा है, जान रहन रखी हुई है
  ऑंसू तक बिक गए बाजार में तुम मिल्कियत पे सवाल करते हो।”

  ” हद दर्जे की फ़िज़ूल शायरी करता है तू। प्लीज़ मत किया कर, ले चाय पी मेरा दिमाग मत खा। तू गर्म चाय पी लेता है मैं ठंडी। तो तेरे पीने के बाद कप धोकर मैं ले लुंगी।”

  पढ़ाई के समय जुट कर पढ़ाई करने वाले और उसके बाद ऐसी बच्चों सी लड़ाई में उलझ जाने वाले शेखर और लीना बाँसुरी को धीरे धीरे भाने लगे थे।

   
*******

      समर तो चला गया था लेकिन केसर के दिल दिमाग पर एक उलझन छोड़ गया था। उसकी चोरी पकड़ी जा चुकी थी, भले ही उसने कहा हो कि वो राजा को फिलहाल कुछ नही बताएगा लेकिन बता दिया तो ? आखिर था तो उसी का सगा? क्यों केसर का राज़ राज़ रखेगा ?
   राजा के हित में तो यही होता कि समर उसे सब बता दे लेकिन अब ऐसा क्या उपाय था कि वो समर से अधिक समय राजा के साथ गुज़ार पाती?
     उसने किसी को फ़ोन लगाया और वहाँ से उठ कर बाहर निकल गयी।

    राजा ने सुगन्धा के घर वालों को बुलवाकर उन्हें सुगंधा के समान के साथ साथ ही एक मोटी रकम भी दे दी। सुगन्धा का भी अपना कोई परिवार नही था, उसकी दो बहनें और थीं जिनमे से एक केसर के यहाँ काम करती थी और एक गांव में अपने पति बच्चे के साथ रहती थी। उसी बहन को बुलवाया गया था।

   अस्पताल का तामझाम निपटाते ही महल की शाही सवारी महल निकल गयी, अब केसर को भी अस्पताल काटने को था।
   उसने डॉक्टर से मिल कर अपने पिता की भी छुट्टी करवाई और वापस निकल गयी।
   दिमाग में उसके कुछ अलग ही योजना कुलबुला रही थी।

      इधर महल में दो चार दिन से काम काज ठप सा हो गया था, वापस लौटते ही समर और राजा सारे पुराने पड़े कामो को निपटाने में लगे थे की युवराज भैया भी वहीं चले आये…

“कुमार कुछ सुना तुमने? “

  राजा बेहद तल्लीनता से कुछ पढ़ने में व्यस्त था , चौन्क कर युवराज भैया को देखने लगा

” केसर वखारिया और उसके पिता पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया है , सुनने में आ रहा अस्पताल से घर जाते समय ही हुआ। हमला इतना ज़ोरदार किया गया कि केसर वखारिया की गाड़ी पलट कर दूर तक खिंचती चली गयी, बहुत ज्यादा चोटें आईं हैं उसे और उसके पिता को। अब उन लोगों का और कोई तो है नही, बड़े खानदानी लोग हैं जिनसे बना कर रखना हमारे लिए भी घाटे का सौदा नही है तो हमारा कहना है महल से किसी को तो वहाँ जाना चाहिए?

     राजा ने युवराज के एकदम से कहने पर मन ही मन बाँसुरी से जुडी कोई बात न हो सोच लिया था पर जैसे ही पता चला बात केसर से जुड़ी है उसे सुकून सा मिला कि बाँसुरी ठीक है।

   ” हाँ दीवान साहेब और काका सा चले जायेंगे।” राजा ने कहा और वापस अपनी फाइल में घुस गया

   ” ठीक है! हम सोच रहे हम और तुम्हारी भाभी सा चले जातें हैं।”

   ” इतनी सी बात पर आप क्यों कष्ट करेंगे हुकुम?”  समर की बात पर युवराज मुस्कुराने लगा

   ” बहुत पहले पिता साहेब को किसी कचहरी के मामले से इन्होंने ही राहत दिलवाई थी। बहुत पहले एक आदमी की हत्या का मामला भी पिता साहेब को परेशान कर रहा था उस वक्त भी यही उन्हें बचा ले गए थे, फिर उनकी बेटी भी व्यवहार कुशल है महल की औरतों से भी दोस्ती है, ऐसी जगहों पर हमारा जाना बनता है समर।”

   ” जैसा आप सही समझें हुकुम! मैं गाड़ी निकलवाता हूँ, आप और भाभी साहेब आ जाइये।”

   समर बाहर निकल गया, उसके निकलते ही युवराज राजा की ओर वापस मुड़ गया…

“कब जा रहे हो कुमार? बाँसुरी को वापस लाने?”

   “मैं नही जा रहा भैया!”

   ” क्यों ? “

   ” वो खुद गयी है खुद ही वापस आएगी।”

   ” अरे ये कैसी अकड़ है अब! तुम तो ऐसे ना थे..

   राजा ने फिर युवराज को सारी बातें बता दी …

  ” इन्हीं सब कारणों से मैं खुद भी चाहता था कि बाँसुरी कुछ दिनों के लिए महल से बाहर किसी सुरक्षित स्थान पर रहे, लेकिन उसे ऐसे कहता तो वो मानती नही।
   कहते हैं ना भैया जो होता है अच्छे के लिए होता है तो बस यही समझ लीजिए कि हमारा ये झगड़ा भी हमारे अच्छे के लिए हुआ है।
  अब उसकी अनुपस्थिति में मैं कम से कम पता तो कर पाऊंगा की ये सारा जाल किसका बुना हुआ है और एक बात और थी भैया!
    शादी के पहले से ही मैं चाहता था वो अपने पैरों में खड़ी हो सके, मैं जानता हूँ मेरे जीवन का कोई भरोसा नही, कब किसी दुश्मन की गोली मेरा सीना चीर जाए । ऐसे में मैं मेरे पीछे एक रोती झींकती विधवा नही छोड़ कर जाना चाहता हूँ।
   मैंने उसे हमारी शादी से पहले ही ये सब कहा था उसे पढ़ने के लिए प्रेरित भी किया था, लेकिन वो मेरे इस संसार में ऐसा घुल मिल गयी कि खुद को ही भूलने लगी।
    मेरे दिल को ठेस ना पहुंचे इसलिए उसने दूध वाली बात बिना मुझे बताए अकेले ही उस दुख को पी लिया । मैंने मुझसे शादी के बाद बाँसुरी के ऐसे जीवन की कल्पना तो कभी नही की थी भैया।
  मेरे प्यार और सम्मान के लिए वो तिल तिल मर के जीये ये मुझे मंज़ूर नही था। और उसका ये प्यार मुझे भी कमजोर कर रहा था। मैंने कई बार सोचा कि किसी तरह बाँसुरी को समझाऊँ की जीवन खुद के पैरों पर खड़े होकर जिया जाता है, लेकिन उसकी आँखों पर मैं इस कदर छाया था कि उसे उसका बुरा होता भी नही दिख रहा था।
   महल में उसके लिए जगह जगह पर जाल बिछे थे, वो कब किसमें गिरती उसे भी पता नही चलता। मैं जानता हूँ ये मेरे पाले दुश्मन हैं लेकिन मुझसे बदला लेने बुरा तो बाँसुरी का कर रहे थे।
   इन्हीं सब कारणों से अभी कुछ समय तक उसका बाहर रहना ज़रूरी है भैया।”

  ” पर ये काम शांति से भी तो किया जा सकता था कुमार!”

  ” आपको क्या लगता है मैंने प्रयास नही किया होगा। कई बार उससे कहा लेकिन वो सुनने समझने को तैयार ही ना थी। इसलिए उस दिन के फसाद को सुलझाने की कोशिश किये बिना मैंने बिगड़ जाने दिया क्योंकि शायद वही एक रास्ता बचा था उसे उसकी जिंदगी में बचाये रखने का।”

” मेरे ख्याल से एक बार उससे बात कर लो और उसे ये सारी बातें समझा दो तो तुम्हारी मुश्किल और आसान हो जाएगी।”

” नही भैया!अगर वो एक बार भी मेरी आवाज़ सुन लेगी तो कमज़ोर पड़ जाएगी, उसके बाद उसका कहीं और रहना और मुश्किल हो जायेगा। मेरे साथ भी वह होगा इसलिए अभी उसे फ़ोन करने या उससे बात करने मत कहिये। बड़ी मुश्किल से वो उस बात के लिए तैयार हुई है जो मैंने हमेशा से उसके लिए सोच रखा था।
    औरतें इस बात से परेशान रहती हैं कि पति बंधन में रखता है यहाँ मैं चाह रहा कि वो अपने पैरों पर खड़ी हो मेरे नाम से अलग अपनी एक पहचान बनाये पर उसे समझ ही नही आ रहा था।
    एक राजपूत आदमी की औरत को इतनी कोमलता शोभा नही देती भैया। अब बाँसुरी को थोड़ा मज़बूत तो बनना पड़ेगा कल को मुझे कुछ हो गया तो…

   ” ये तुम बार बार मुझे कुछ हो गया कि क्या रट लगाए बैठे हो कुमार! शुभ शुभ बोला करो, अभी इतने बुज़ुर्ग नही हुए जो ऐसे जाने आने की बातें करो।”

  ” भैया इस पर हमारा कोई ज़ोर नही ये तो ऊपर वाले के हाथ है ।”

  ” सौ साल की उम्र है तुम्हारी कुमार, अब आगे से हमारे सामने ऐसे कोई बात मत कहना।और रही बात बाँसुरी और तुम्हारी तो ठीक है तुम्हारे अपने कारण हैं लेकिन हम और तुम्हारी भाभी सा तो जा ही सकते हैं ना उससे मिलने।”

” मेरे खयाल से इस वक्त महल से किसी का भी जाना उसके इरादों को कमज़ोर कर देगा। आपको क्या लगता है वो राह नही देख रही मेरी? उसे तो हर वक्त इंतेज़ार होगा कि कब मैं या आप या भाभी सा आकर उसे ले जाएं लेकिन यही मैं नही चाहता। अगर मेरा जीवन भी एक आम इंसान का जीवन होता तो मैं उसे मना कर ला चुका होता, और इस तरह उसे उसके पैरों पर खड़े होने को मजबूर ना कर रहा होता।”

  ” आपकी सारी बातें अनोखी है कुंवर सा! लेकिन हम एक औरत हैं और हम बाँसुरी की पीड़ा समझ सकतें हैं उनके लिए आपसे अलग होकर जीना कितना मुश्किल हो रहा होगा।”
   अब तक में रूपा भी वहाँ आ चुकी थी।

  ” भाभी सा आपको यहाँ मेरा जीवन आसान लग रहा है?”

  ” नही आपका भी नही लग रहा । इसलिए तो कह रहे कि इतने आडम्बरों की क्या ज़रूरत है? “

  ” आज आपको नही समझ आ रही मेरी बात, लेकिन एक दिन आप सब मान जाएंगे कि जो हुआ अच्छा हुआ।”

    ” चलिए आप के साथ साथ हम सब भी कुछ दिनों का बाँसुरी का विछोह सह लेते हैं, अब आप लोग कुछ खा लीजिये। फिर हमें और साहब को केसर से मिलने भी तो जाना है।

   रूपा खाने में दोनो भाइयों की अनुपस्थिति देख ही दीवानखाने में दोनो को बुलाने आयी थी कि खुद भी बातों में लग गयी।
   जल्दी जल्दी खाना निबटा कर युवराज रूपा के साथ केसर से मिलने निकल गया।

  *****
  
          उस दिन की सुबह प्रेम और निरमा दोनो के लिए अनोखी थी, असल में तो अब उनका वैवाहिक जीवन शुरू हो रहा था।
      सुबह से दोनो बिना बात मुस्कुरा रहे थे, एक दूजे से शरमा रहे थे, एक दूसरे से छिपते हुए भी एक दूजे को ही देख रहे थे।
      निरमा ने प्रेम का नाश्ता लाकर रखा तो उसने उसे भी साथ ही खाने बैठा लिया….
  नाश्ता कर के प्रेम निकलते हुए निरमा के पास आया और निरमा की गोद में इठलाती मीठी को प्यार करने के बाद जाते जाते रुक निरमा के गाल पर भी अपना स्नेहचिन्ह देता गया।
   शरमा कर निरमा नीचे देखने लगी…

” मीठी बेटा ! पापा को कुछ नही मिलेगा क्या?”

प्रेम के सवाल पर मुस्कुराती निरमा भी मीठी को देखने लगी

  ” मीठी पापा को बोलो शाम को  काम से जल्दी घर आ जाएं तब उन्हें एक साथ सब मिल जाएगा।”

  ” सच! ” प्रेम ने निरमा की आंखों में आंखें डाल पूछ लिया, वो लजा कर दूसरी ओर देखने लगी, प्रेम मुस्कुराता बाहर निकल गया।
   
     प्रेम बहुत दिनों बाद अपने अस्तबल के घोड़ों के पास गया था। उसे पिछली शाम ही मालूम हुआ था कि उसका सबसे खास घोड़ा उनिष्क कुछ तकलीफ में हैं। अरबी नस्ल का ऊंचा पूरा ऊनिष्क ऐसा सुंदर दिखता था कि उसे देख प्रेम ने उसका नाम सूर्यदेव के सात घोड़ों में से एक के ऊपर से ही रखा था।
    उनिष्क कुछ अधिक ही पीड़ा में था इसलिए जब प्रेम उसके पास पहुंचा वो छिटक कर कुछ दूर चला गया। प्रेम दवा साथ में लिए फिर एक बार उस तक पहुंच गया लेकिन इस बार में उनि की हुंकार ऐसी तेज़ थी कि उसके झटके से प्रेम भी नही संभल पाया और वहीं मैदान में गिर पड़ा, आगे पीछे खुद को संभालने के चक्कर मे घोड़ा प्रेम के हाथ पर पैर रख आगे बढ़ गया।
  ज़मीन पर गिरा प्रेम कलप कर रह गया।

  सहयोगी ने हाथ थाम कर उठाया तो वो हाथ जो घोड़े के नीचे चला आया था सीधा ही नही हो पाया।
   आनन फानन में सहयोगी प्रेम को साथ लिए पास के ही अस्पताल की ओर भागा।
      डॉक्टर ने हाथ को पकड़ कर सीधा करने का प्रयास किया लेकिन दर्द की अधिकता और आयी हुई सूजन देख अनुभवी डॉक्टर समझ गया कि ये साधारण चोट नही बल्कि अंदरूनी फ्रैक्चर है। एक्सरे में चोट की तीव्रता और स्थान सुनिश्चित करने के बाद डॉक्टर ने प्रेम के हाथ में प्लास्टर बांध दिया।

   शाम से कुछ पहले ही जब निरमा ने गेट पर प्रेम की गाड़ी देखी तो मुस्कुरा कर दरवाज़े तक भागी चली आयी….
  गेट से अंदर गाड़ी के करने में जब उसने ड्राइविंग सीट पर किसी और को बैठे देखा और प्रेम को बाजू वाली सीट पर तो एक पल को उसका माथा भी ठनका क्योंकि इतने दिनों में वो इतना तो समझ गयी थी कि प्रेम किसी और के चलाने पर गाड़ी में बैठने वालीं में से नही था।
   वो अभी सोच ही रही थी कि प्रेम के सहयोगी ने जल्दी से उतर  कर प्रेम की तरफ का दरवाजा खोल दिया।
   एक हाथ में बंधे प्लास्टर और चेहरे और माथे पर लगी हल्की खरोंचों के निशान देखते ही निरमा भागी सी प्रेम तक चली आयी__

“ये क्या हो गया? और कब हुआ ये? सुबह तो अच्छे खासे निकले थे घर से?”
   बस इन तीन सवालों के साथ ही उसके आँसू बहने लगे

” अरे इतनी ज़रा सी चोट में रोने की कौन सी बात है निरमा?”

“ये ज़रा सी चोट है? हाथ में पट्टी नही प्लास्टर बंधा है और इन्हें लग रहा ज़रा सी चोट है।”

  खुद में बड़बड़ाती वो रोई भी जा रही थी, और प्रेम अपने सहायक के सामने अपदस्थ हुआ जा रहा था।
प्रेम का बैग और फोन अंदर रखने के बाद उसका मातहत मुस्कुराते हुए बाहर चला गया, और प्रेम शर्माते हुए अंदर आ गया।
     
   ” अब ऊपर कहाँ जा रहे आप ? मीठी पापा से बोलो यहीं नीचे वाले कमरे में कपड़े बदल लें , मम्मा नही देखेगी आंखे बंद कर लेगी।”

  निरमा की बचकानी सी बात पर प्रेम को हंसी आ गयी…

” मीठी मम्मा को बोलो पापा का नाइट सूट ऊपर के कपबर्ड से लेकर आ जाएं और पापा को कपड़े चेंज करने में हेल्प कर दें, बल्कि मीठी मम्मा से बोलो पापा के पास आकर उनकी शर्ट खोलने में हेल्प कर दें।”

   निरमा मुस्कुरा कर प्रेम के कपड़े लेने ऊपर चली गयी और प्रेम वहीं सो रही मीठी के पास बैठा उसके सलोने चेहरे को ताकता रहा।


   *******


    राजा को काम की अधिकता से थकान सी हो गयी थी, समर उसे काम खत्म कर आराम करने कह ही रह था कि किसी ने आकर उन दोनों ने कहा कि बड़े हुकुम यानी युवराज भैया उन दोनों को तुरंत बुला रहें हैं।
    अब क्या नया ऐसा हो गया जिसके कारण युवराज भैया को उन दोनों को बुलाना पड़ा सोचते हुए दोनो ही बाहर निकल पड़े….

     बाहर मुख्य द्वार पर युवराज भैया खड़े उन्हीं दोनो का इंतज़ार कर रहे थे..

” कुमार तुमसे बिना पूछे हमने ये निर्णय ले लिया। निर्णय अचानक लेना पड़ा इसी से हमने तुम्हें फ़ोन भी लगाया था पर तुम्हारा नंबर लगा नही और फिर तुमसे बिना पूछे ही हम वखारिया जी और उनकी बेटी केसर को हमारे साथ महल में रहने ले आये।”

   युवराज भैया के पास पहुंचते ही दोनो ने उनके एक तरफ अपनी व्हीलचेयर पर बैठे वखारिया को भी देख लिया था। उतनी देर में सीढियाँ चढ़ महल के मुख्य द्वार पर रूपा के पीछे पीछे चलती केसर भी आ खड़ी हुई।

  ” कुमार , समर आप दोनों जानते हैं आप दोनों से सलाह किये बिना हम कोई निर्णय नही ले पातें हैं, लेकिन आज केसर जी की हालत देख हमें जाने क्यों बहुत तरस आ गया। असल में इनके जमीन के बहुत से मामले हैं जिसके कारण इन्होंने भी बहुत दुश्मन कमा लिए हैं, अभी इस वक्त इन लोगों को सुरक्षित रखने का यही तरीका हमें सही लगा। कुछ समय बाद कुछ सिक्योरिटी हायर कर इन्हें  भेज देंगे लेकिन तब तक इनके यहाँ रहने पर आप को कोई आपत्ति तो नही होगी शायद।”

  ” भैया आपके किसी निर्णय के खिलाफ मैंने कभी आवाज़ उठाई है क्या जो आज कुछ कहूँ? आपने जो निर्णय लिया सोच विचार कर ही लिया होगा मैं आपके निर्णय को काटने वाला कौन होता हूँ, आइये वखारिया साहेब , आइये केसर जी । वेलकम !”

केसर चेहरे पर दुख और पीड़ा के भाव लिए राजा के सामने से निकल अंदर की ओर बढ़ चली..

  ” वेलकम केसर सा ! वेलकम टू द हेल!  वैसे महल तो हैवेन है लेकिन यहाँ आपकी ज़िंदगी हेल से बदतर कर दूंगा।”

  समर की बात पर मुस्कुरा कर केसर भी उतनी ही धीमी आवाज़ में फुसफुसा उठी

” ये तो वक्त ही बताएगा कि कौन किसका जीवन तबाह करता है। अब आप खुद मेरी काबिलियत सोच लीजिये, कल आप मुझे जिनकी ज़िन्दगी से उखाड़ फेंकना चाहते थे आज उनके महल तक पहुंच गई मैं , कल उनके कमरे तक और फिर दिल तक पहुंचने में भी ज्यादा वक्त नही लगेगा मुझे।
   अब तो आप अपनी पोज़िशन बचाने की फिक्र करें मिस्टर समर सिंह ! ”

   केसर को समर के पास खड़े बातें करते देख कुछ आगे बढ़ चुकी रूपा भी ठिठक कर खड़ी रह गयी, उसने पीछे मुड़ कर देखा , उसे ये तो समझ आया कि दोनों कुछ बात कर रहे लेकिन क्या कह रहे ये सुनाई नही दिया

   ” आप दोनों की भी पुरानी जान पहचान लगती है क्यों बाई सा?”

  “नही भाभी साहेब ऐसा कुछ नही । जानती ज़रूर पहले से थी लेकिन पहचान अब पायी हूँ कि ये आखिर हैं क्या?”

  ” बड़ी शायराना हैं आप तो” रूपा उसकी बात पर मुस्कुरा उठी

  ” ये क्या क्या हैं ? आप नही जानती भाभी सा जिस दिन आप इन्हें पूरी तरह जान गई उसी दिन इन्हें पहचान जाएंगी।” समर की ये बात सुन उस पर एक जलती नज़र डाल केसर आगे रूपा के पास चली गयी।

  राजा पहले ही वहाँ से अपने कमरे में जा चुका था, केसर को साथ लिए रूपा खाने वाले कमरे की ओर बढ़ गयी, युवराज वखारिया की व्यवस्था देखने में लग गए और समर वहाँ  केसर की अगली चाल के बारे में सोचता खड़ा रह गया।
 

क्रमशः

 
   


  

    


   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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