जीवनसाथी -74

जीवनसाथी –74




      शिक्षा एक ऐसा उपाय है जिसे अगर किसी ने मन बहलाव के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया तो फिर उसका मन किसी और काम में लग ही नही सकता।
   बाँसुरी के साथ भी यही हुआ। राजा से मन हटाने के लिए शुरू की गई पढ़ाई में वो डूबने लगी। दिन दिन ना रहा रात रात न रही। अपनी किताबों में मगन बाँसुरी को अब न अपने फ़ोन का ध्यान रहा ना नाते रिश्तों का।
  उसे इस तरह अपनी पढ़ाई में डूबा देख ताई भी कुछ समय बाद वापस लौट गयीं… परीक्षा के पंद्रह दिन पहले से कोचिंग क्लास भी बंद हो गयी।
   शेखर लीना खुद अपनी तैयारियों में व्यस्त थे।
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारियां ऐसी ही होतीं हैं…. पढ़ाई में मगन व्यक्ति के पास बैठा व्यक्ति सांस ले रहा या नही इसको देखने की भी फुरसत नही होती।
   तैयारियों के बीच कभी माँ फ़ोन खटका देतीं कभी ताई! कभी कभी पिता जी का भी फ़ोन चला आता, पांच दस मिनट फ़ोन पर बात कर लेने से कोई बहुत ज्यादा समय बर्बाद नही हो जाएगा छोरी कहती ताई अक्सर आधे आधे घंटे की कॉल लगा बैठती।

  ” पर थोड़ी सी भी बात कर लूं तो दिमाग का फ्रेम बदल जाता है ना ताई। इसलिए अब मैं मेरी सुविधा से ही फ़ोन उठाउंगी। ना उठाऊं तो डरना मत , समझ जाना पढ़ रहीं हूँ।”

   बाँसुरी की बात सुन ताई भी सर पकड़ कर बैठ गईं

  ” अब काहे सर पकड़े बैठी हैं जिज्जी ! लीजिये चाय पीजिये, जब पहले हम कह रहीं थीं कि लड़की को समझा बुझा के सासरे भेज दो तब किसी ने हमारी ना सुनी, अब भुगतो। अरे कलक्टरनी बन के कौन तीर मार लेगी। जिसका पति छोड़ दे उस लड़की का कोई ठिकाना नही होता, आप लोग समझते काहे नही हमारी बात। उस ज़िद्दी को मना मुनु के बुलवा लीजिये , हम खुद जाकर उसकी ससुराल उसे छोड़ आएंगे।”

   प्रमिला ने अपनी बात पूरी कर अपनी आंखें पोंछ ली पर वो भी समझ गयी थी कि अब उनकी नकचढ़ी राजकन्या कुछ बन कर ही वापस लौटेगी।

   *******

       हाथ में बंधे प्लास्टर से प्रेम जितना परेशान नही हो रहा था उससे कहीं अधिक निरमा की चिंता देख वो परेशान हो उठा था।
     रात तो वो जैसे तैसे सो गई लेकिन अगले दिन सुबह से ही उसके पीछे पीछे घूमती निरमा जैसे मीठी को भी भूल गयी थी।
   प्रेम के हाथों में चाय पकड़ा कर खुद बाजू में खड़ी रही कि कहीं प्रेम को और किसी चीज़ की ज़रूरत ना हो, प्रेम ने एक नज़र उसे देखा और वापस चाय पीने लगा… निरमा को सर पर सवार देख उसकी चाय पीने की गति ज़रा तेज़ हो गयी…

  ” इतना जल्दी जल्दी क्यों पी रहे, आराम से पी लीजिये ना!”

   ” तुम्हें और भी तो काम होंगे अब जब तक मैं चाय ना पी लूँ तुम यहाँ से हटोगी नही तो तुम्हारा समय क्यों बर्बाद करूं?”

   प्रेम फुरसत से आराम से चाय पीना चाहता था.. उसकी बात समझ वो भी अपनी चाय लिए वहीं चली आयी और उसके सामने बैठी चाय पीने लगी

” अब ठीक है ना! आपको ये भी नही लगेगा कि मैं आपके चाय पीते तक पहरा दे रही हूँ।”

   उसकी बात सुन प्रेम मुस्कुरा कर चाय पीने लगा।

   चाय खत्म कर वो अखबार पढ़ने लगा तो वो साथ बैठी पन्ने पलटती रही,प्रेम को समझ आ गया था कि प्लास्टर जल्द से जल्द उतारना पड़ेगा वर्ना निरमा उसके पीछे पूरी दुनिया भूल बैठेगी। उसने निरमा को छेड़ने के लिहाज से उसे देखा और कह उठा

” सोच रहा हूँ , अब नहा लिया जाए।”

  प्रेम को लगा कि अब स्वभाव से शर्मिली निरमा बाथरूम तक तो जाएगी नही लेकिन उसकी सोच के उलट अखबार को किनारे रख निरमा तुरंत अपनी कुर्सी से उठ अंदर चली गयी।
     वो मन ही मन खुश हो गया कि चलो पीछा तो छूटा लेकिन लगभग दस मिनट बाद वो बाहर चली आयी..

” चलिए गीज़र ऑन कर टॉवेल और कपड़े निकाल आयी हूँ , अब आपको ले चलती हूँ।”

  ” पैर में नही हाथ में प्लास्टर है,मैं खुद चला जाऊंगा बाथरूम तक।”

  “हाँ जाइये ना, पर पैरों की मदद से नहा भी लेंगे क्या उसमें तो मेरी मदद लगेगी ना या नही?”

  निरमा की बात का प्रेम के पास कोई जवाब नही था। वो चुपचाप उठ कर बाथरूम की तरफ चला गया।

  नहाने के बाद अपने हाथों से उसे नाश्ता खिलाने के बाद दवा खिला कर प्रेम के बार बार कहने पर आखिर निरमा अपने काम निपटाने चली गयी।
    उसके हाथ के बारे में राजा को पता चल चुका था इसलिए उसे कुछ दिनों के लिए महल आने के लिए राजा ने मना कर दिया था। घर पर बैठा प्रेम निरमा को भाग भाग कर कभी मीठी के काम करते कभी उसके काम करते देख बड़ा मजा आ रहा था। अम्मा वापस आ चुकी थी वो भी निरमा के साथ लगी हुई थी।
   मीठी को नहला कर दूध पिलाने के बाद लाकर उसे प्रेम को थमा कर निरमा वापस काम में लग गयी।
   सारा काम निपटाने के बाद वो नहा कर अपनी चाय लिए प्रेम और मीठी के पास आ बैठी…

” मीठी मम्मा को बोलो चाय कम पिया करे, कभी कभी कुछ खा भी लिया करें।”

   प्रेम की बात सुन निरमा मुस्कुरा उठी

  ” मीठी पापा से बोलो मम्मा की जान तीन चीजों में ही बसती है एक मीठी दूसरी चाय और तीसरा…?

” तीसरा कौन मीठी?”

” तीसरा मीठी के पापा। जो कभी घोड़े से गिर जातें हैं कभी गेट से टकरा जातें हैं।”

  निरमा की बात सुन प्रेम हँसने लगा

  ” मीठी पापा जानना चाहतें हैं कि आज रात मम्मा मीठी को जल्दी सुला देंगी या आज भी पापा को टीवी देखते देखते सोना पड़ेगा?

प्रेम की बात सुन निरमा झेंप गयी, पर जवाब तो देना ही था….

   ” मीठी खुद बहुत समझदार है , आज वो खुद जल्दी सो जाएगी जिससे उसके मम्मा पापा को एक दूजे के लिए थोड़ा वक्त मिल जाये।” निरमा अपनी बात पूरी कर तुरंत उठ कर रसोई में चली गयी शायद अपनी झेंप मिटाने लेकिन उसी वक्त उसे कुछ याद आया और वो तुरंत वापस लौट आयी….

” आपके हाथ में तो प्लास्टर बंधा है!”

“हाँ तो ?” निरमा क्या कहने आयी थी और प्रेम क्या जवाब दे गया सोच कर ही वो बेचारी फिर शरमा गयी फिर अपने संकोच को एक ओर रख बड़ी मुश्किल से उसने अपनी बात कह ही दी

  ” मीठी बेटा पापा से कह दो जब तक उनका प्लास्टर नही उतरता उन्हें दवा के साथ पूरा आराम करना होगा इसलिए मीठी के साथ उसके पापा भी जल्दी सो जाएंगे।”
   मुस्कुरा कर वो वापस चली गयी।

   *******
 
   महल में केसर का प्रवेश तो हो चुका था लेकिन दो चार दिन बीत जाने पर भी उसे राजा से मिलने का कोई मौका नही मिल पाया था।
    सुबह के नाश्ते के वक्त राज परिवार के साथ वो ज़रूर समय से पहुँच जाया करती थी पर जाने क्यों इधर कुछ दिनों से राजा नाश्ते के समय से पहले ही अपने काम से निकल जाया कर रहा था।
    दिन भर में वो जाने कितने चक्कर दीवानखाने के भी लगा आती लेकिन उसे राजा के दर्शन ना होने थे ना हुए।
   ऐसे ही एक शाम वो दीवानखाने का चक्कर लगा कर वापस मुड़ ही रही थी कि उसने अपने ठीक सामने समर को खड़ा पाया…

” क्या बात है केसर सा! चार दिन से मुझे देखा नही तो बेकरार हो गईं, यहाँ ढूंढने चली आयीं?”

  ” तुम्हें देखे मेरी जूती! तुम्हारे हुकुम नज़र नही आ रहे आजकल ! हैं कहाँ?”

  ” छिपा रखा है हुकुम को अपनी तिजोरी में। “

  ” इतना डर गए हो मुझसे ? खा नही जाऊंगी तुम्हारे हुकुम को! ऐसे छिपा रखा है जैसे हीरा मोती हों और मैं कोई चोरनी जो चुरा ले जाऊंगी तुम्हारे हीरे को!”

  ” बेशकीमती तो हैं ही हमारे हुकुम! और सही बात ये है कि आप डिज़र्व नही करतीं इतने कीमती कोहिनूर को! मुझे देख देख कर ही मन भर लिया कीजिये।”

  “तुम और तुम्हारी बकवास! मुझे कोई शौक नही नौकरों के मुहँ लगने का!”

” तुम्हें मुहँ से लगाना तो बहुत दूर की बात है, तुम्हें छूने की सोच के भी घिन आती है केसर सा। वो तो आज हमारा मूड ज़रा अच्छा था इसलिए शुरुवात में थोड़ी तमीज़ भरी बातें कर ली, लेकिन तुम तो सर पर सवार होने लगीं। एक बार फिर समझा रहा हूँ यहाँ दाल नही गलने वाली तुम्हारी। जितनी जल्दी निकल जाओ उतना अच्छा है।”

“बड़ी जल्दी आप से तुम पर उतर आए! अब तो यहाँ से मैं निकलने से रही हाँ तुम्हारे निकलने का इंतजाम ज़रूर कर दूंगी… फिर मत कहना की केसर सा पहले से बताया क्यों नही?”

समर केसर की बात पर ज़ोर से हँस पड़ा

  ” इसमें हँसने की क्या बात है?”

  “इंसान को खुद पर विश्वास होना चाहिए लेकिन ये आपका अति आत्मविश्वास कहीं आपको ले ना डूबे बस आपके इसी घटिया एटीट्यूड पर हंसी आ गयी।”

  समर की बात पर पैर पटकती वो अपने कमरे की ओर चली गयी

******

   समय बीतते  देर नही लगती … जब कोई किसी व्यस्तता में हो खासकर तब!
प्रीलिम्स की परीक्षा हो गयी थी, सभी का पेपर अच्छा हुआ था। प्रीलिम्स के होने के साथ ही सबकी मेंस की तैयारियां भी शुरू हो गयी थी और कोचिंग क्लास भी वापस शिक्षार्थियों की भीड़ से गुलज़ार होने लगा था।
   प्रीलिम्स के अगले दिन ही हरि सर सही उत्तरों के साथ अपने होनहार विद्यार्थियों का पेपर मिलान कर रहे थे।
   बच्चों से कहीं अधिक वो उत्सुक थे परीक्षा फल के लिए।

  ” मुझे लगता है कट ऑफ में हमारे यहां से लगभग 90% स्टूडेंट्स आ ही जायेंगे।”

   हरि सर की बात पर शेखर का ही एक सहपाठी चहक उठा

” शेखर के कितने आ रहे सर? आपका तो मेन फोकस उस पर ही है।”

” ऐसी कोई बात नही रिदान ! मेरे लिए सभी बराबर हैं। वैसे शेखर से तो पूछा ही नही मैंने की पेपर कैसा हुआ?  क्यों भई पेपर तो इज़ी आया था!”

  ” सर जिसकी तैयारी सौ प्रतिशत हो उसके लिए हर पेपर आसान है और जिसने किताब न खोली हो उसके लिए हर सवाल मुश्किल!”

” बस इससे अजूबी बातें करवा लो । हरि सर कल से क्या शुरू करवाएंगे आप ?”

शेखर की बात पर लीना ने सर से अगले दिन का शेड्यूल पूछ लिया, उतनी देर में शेखर अपने बैग के पीछे छिपा कर रखे बड़े से कार्टन बॉक्स से केक लिए सामने कूद आया…

  ” प्यारे गाँव वालों आज हमारे सरपंच यानी हमारे प्यारे हरि सर का जन्मदिन है तो आज आधे घंटे का सेलिब्रेशन कर लिया जाए अगर सर इजाज़त दें?”

  सर ने मुस्कुरा कर हामी भर दी….

  फिर तो एक एक कर सभी सामने सर के पास कूद पड़े, एक एग्जाम निपटाने की खुशी दूसरे सर के जन्मदिन की, खुशी डबल हो गयी थी। सब केक की आइसिंग एक दूसरे के चेहरे पर पोतते एक दूसरे के मुहँ में केक ठूंसते मज़े कर रहे थे । बाँसुरी एक किनारे सबसे पीछे चुपचाप खड़ी सब कुछ देख रही थी, की शेखर एक टुकड़ा हाथ में लिए उस तक चला आया।

  ” आप यहाँ क्या कर रहीं ? चलिए सामने।” कहता उसके सामने केक बढ़ा दिया

   बाँसुरी ने खाने से मना कर दिया

” क्यों डायबिटीज है क्या? ” शेखर के सवाल पर वो उसे देख ना में सर हिला रही थी कि लीना भी बाँसुरी के लिए केक लिए चली आयी

  ” कुछ भी बकता है ये इडियट? डायबिटीज क्यों होगा भला? ये भी तो हो सकता है कि तेरे हाथों से खाना ना चाहती हो?”

   शेखर ने अपने हाथों को उलट पलट कर देखा फिर बाँसुरी की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया….


”  देख लो ध्यान से, लेप्रसी नही है मुझे!”

  अबकी बार शेखर की बात पर बाँसुरी हँस पड़ी

  “नही शेखर जी ऐसी कोई बात नही, मुझे केक पसन्द ही नही इसलिए बस नही लिया।”

” अरे तो आपको कौन सा केक से शादी करनी है, एक ज़रा सा टुकड़ा खाना ही तो है। हम तो भई बाहर रह के इतने नखरे करते ही नही। जहाँ से जो फ्री का माल मिल गया खा लेते हैं , पी लेते हैं और राम नाम जप लेते हैं।”

“हाँ फ़ोकट चंद ! पर हर कोई तेरे जैसा फोकटिया नही होता ना ,कुछ लोग रॉयल होतें हैं जैसे बाँसुरी ।”

  लीना की बात पर बाँसुरी चौन्क कर उसे देखने लगी, क्योंकि अब तक उसने अपनी और राजा की बात वहाँ किसी को नही बताई थी, फिर लीना का कहा ये रॉयल पंच उसे समझ नही आया

  ” मैं भी एक सामान्य फैमिली से ही हूँ लीना । कोई रॉयल फ़ैमिली नही है मेरी।”

उसकी बात सुन लीना शेखर हँसने लगे

  ” अरे मेरी जान! मैंने तो बस ऐसे ही मज़ाक में कह दिया था, असल में तुम्हारा रहने का खाने का बोलने का तरीका ज़रा रॉयल सा है ना। और वैसे इस भिखारी के बारे में भी मज़ाक ही करती हूँ , वैसे इसके अब्बा का भी लंबा चौड़ा कारोबार है इसी से उन्हें अपने बेटे को शहर का जिलाधीश बनाने की सूझी है, क्यों मियाँ ?

  ” सही कहा सकीना। चलो अब सर की पार्टी गुलज़ार की जाए। आज बहुत दिन बाद कुछ अच्छा सा गाने का मन कर रहा है।”
   वो उन दोनों को वहीं छोड़  कूदता फांदता आगे निकल गया।लीना ने हाथ में पकड़े केक का छोटा सा टीका बाँसुरी के माथे पर भी लगा दिया।
    बाँसुरी ने भी बदला ले ही लिया, केक खाने के बाद चेहरा पोंछने के लिए अपने बैग में रुमाल ढूंढती बाँसुरी को लीना ने एक बड़ा सा सफेद रुमाल पकड़ा दिया, उससे मुहँ पोंछने के बाद दोनो सहेलियाँ हँसती खिलखिलाती बाहर लगे नल पर चेहरा धोने चली गईं।

   उन दोनों के वापस आते में शेखर अपने सुर छेड़ चुका था….

       फूलों के रंग से, दिल की कलम से
             तुझको लिखी रोज पाती
       कैसे बताऊँ किस किस तरह से
             पल पल मुझे तू सताती
        तेरे ही सपने लेकर के सोया
               तेरी ही यादों में जागा
         तेरे ख़यालों में उलझा रहा यूँ
              जैसे के माला में धागा
हाँ बादल बिजली चन्दन पानी जैसा अपना प्यार
        लेना होगा जनम हमें कई कई बार…..
     हाँ इतना मदीर इतना मधुर तेरा मेरा प्यार
       लेना होगा जनम हमें कई कई बार…..

    शेखर के बाद एक एक कर और भी दो चार लोगों ने गाया।
    शेखर रिदान लीना के साथ बैठी बाँसुरी भी गानों में खोई हुई थी , उसे ऐसे खोए देख शेखर उसकी ओर मुड़ गया…

” बस सुनने से काम नही चलता, यहाँ सुनाना भी पड़ता है। ये भी आपकी तैयारी का एक हिस्सा है ये समझ लीजिए, पर्सनल ग्रूमिंग यू नो।”

” अरे ओ लॉर्ड माउंटबेटन के नाती उसकी हो जाएगी सारी ग्रूमिंग तुझे फिकर करने की ज़रूरत नही है।”

  ” तू  क्यों ऐसी जलभुन जाती है शूर्पणखा की हमशक्ल ? चल अपनी फ्रेंड की जगह तू ही गा ले कुछ। ये जो सारे खुद को अरिजीत सिंह समझ के टूटे पड़े हैं ना कसम से किसी ने इन लोगों को रोका नही तो क्लास की छत उड़ने से हरि सर बचा नही पाएंगे।”

शेखर की बात पर रिदान हँसने लगा…

” हाँ बेटा तुम्हीं एक कुमार सानू हो । “

” वो तो हैं। अब खुद देख लो जब हम गातें हैं तो लोगों की सांस थम जाती हैं, है कि नही बाँसुरी जी?”

   उन सब की चुहलबाज़ी बाँसुरी को भी अच्छी लगती थी लेकिन वो एकदम से शेखर की बात का कोई जवाब नही दे पाती थी, और अक्सर उसकी तरफ से लीना को बोलना पड़ता था।

  ” हाँ जभी मैं सोचूँ मर्सी किलिंग के लिए आजकल सरकार शेखर बाबू की तलाश में क्यों हैं?

   लीना का मज़ाक समझते हुए भी रिदान शेखर को चिढ़ाने बीच में कूद पड़ा

  ” क्यों लीना?”

  ” अरे जिससे इनका गाना सुन कर जिसकी मर्सी किलिंग करनी हो उसकी सांस रुक जाए,वो परलोक सिधार जाए और उनका डायरेक्त स्वर्ग का टिकट काटने के लिए हमारे शेखर बाबू को ऑनर किया जाए … स्वर्ग का दूत, सॉरी यमदूत द शेखर मिश्रा।

  ” इतना बुरा भी नही गातें हैं यार लीना।”

  अब तक चुप बैठी बाँसुरी भी बोल पड़ी , और उसकी बात सुन एकबारगी शेखर की आंखें चमक उठी..

” सच ! अच्छा गाता हूं मैं? ला यार लीना मेरा रुमाल वापस कर ।”
   कहते शेखर ने लीना के हाथ से रूमाल ले अपनी जेब में ठूंस लिया, हाँ में सर हिला कर बाँसुरी चुप बैठ गयी, अब तक में लगभग सभी का गाना बजाना हो चुका था , हरि सर के कहने पर लीना ने भी एक गीत गा ही लिया, और इतने दिनों से मन में छिपा कर रखी राजा की याद उस गाने के साथ साथ बाँसुरी के आंखों के रास्ते बह चली

        सुनी सेज पे सैयाँ सारी रात मैं जागी
           तेरे पीछे पीछे मेरी नींद तो भागी
           मेरा चैन भी गया रे तेरे साथ मा
     छननछन चूड़ियां खनक गयी देख साहिबां …
       मोरनी बागा मा बोले आधी रात मा…


      उसने छिप कर आँसू पोंछ लिए लेकिन उन गीली आंखों के पीछे छिपा राज़ क्या था जानने के लिए वहाँ बैठा कोई तड़प उठा।

    *******


   अस्पताल से हाथ का प्लास्टर कटवाने के बाद बड़े दिनों बाद प्रेम का चक्कर महल की तरफ लगा था, इसी बीच अपने सारे ज़रूरी काम निपटाता राजा महल के ही ऑफिस में मौजूद था। कुछ कामों के लिए उसे बाहर जाने की ज़रूरत थी पर प्रेम के बिना उसका जाना लगभग असंभव सा ही था।
   राजकाज एक बार में निपटने वाला काम नही था, रोज़ ही कोई न कोई निराला काम चला आता था, कभी कोई नए पावर प्लांट का प्रोजेक्ट चला आता, कभी कोई नए अस्पताल का तो कभी नई बिल्डिंग्स कोलोनीज़ का।
    जनता और व्यापारियों के साथ सरकार का भी दबाव बना रहता था।
    सबके सारे लीगल इलीगल कागज़ , उन प्रोजेक्ट्स के जनता के लिए नफे नुकसान का लेखा जोखा देखने में ही राजा के दिन रात कट रहे थे।
    ज़िन्दगी बस कट रही थी, गुज़र रही थी जैसे बस एक एक दिन खत्म करना है।
       बाँसुरी के बिना ज़िंदगी कितनी बदरंग हो चली थी। वही सिंदूरी शामें जो उसकी बाहों में मदहोशी पैदा करती थी अब दिल और दिमाग में एक अजीब सी नीरवता पैदा करने लगी थीं।
    उसे सबसे अधिक अकेलापन इन्हीं शामों और रातों को महसूस होता था, और इसी अकेलेपन को काटने वो खुद को काम में डूबाता जा रहा था।
    अपने अकेलेपन से अकेले ही जूझते राजा का ध्यान केसर पर कभी था ही नही।

    ऐसे ही एक रात वो अपने कमरे में बैठा बाँसुरी की किसी नॉवेल को पढ़ रहा था कि बाहर से कुछ शोरगुल सा सुनाई दिया।
    रात के डेढ़ बजे महल के सन्नाटे में इतना हल्ला गुल्ला कौन कर रहा होगा , सोच कर वो भी दरवाज़ा खोले बाहर चला आया। महल के कुछ कर्मी समर के कमरे की ओर भाग रहे थे।
   समर के परिवार की व्यवस्था महल के पिछले बड़े से
    भाग में थी लेकिन समर का कमरा शुरू से ही राजा के कमरे से काफी पास था। बहुत बार रात बिरात काम के चक्कर में भी दोनो का साथ साथ जागना हो जाया करता था इसी से आसपास कमरे होने से सुविधा ही थी।

      समर के कमरे की ओर सभी को भागते देख किसी अनहोनी की आशंका से वो भी उसी तरफ को आगे बढ़ गया।
  दरवाज़े के बाहर दो चार महिला कर्मियों के साथ कुछ पुरुष कर्मचारी भी थे, दरवाज़ा बंद नही था बस हल्का सा भिड़ा हुआ था, उसने वहाँ मौजूद लोगों की तरफ देखा

  ” क्या हो रहा है यहाँ? आप सब इस वक्त यहाँ कैसे?”

   राजा की बात सुन एक महिला कर्मी गेंदा रोते रोते आगे चली आयी…

  “हुकुम इस कमरे से किसी औरत के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी, अभी भी आ रही है।”

   ये सब बस कुछ सेकण्ड्स में ही घटित हुआ था कि अंदर से फिर एक ज़ोर की आवाज़ बाहर तक चली आयी।
   सारे कर्मचारी आवाज़ सुन कर भी चुप चाप हाथ बांधे खड़े थे , आखिर महल के कमरों के भीतर चल रहे किसी भी खेल को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काटने का हक उन्हें नही था।
   राजा ने तुरंत दरवाज़ा खोला और अंदर चला गया।
  अंदर समर और केसर के हाथ एक दूसरे में गड्डमड्ड थे, एक बारगी देखने वाले को समझ नही आ सकता था कि किसने किसे पकड़ रखा है। राजा पर नज़र पड़ते ही केसर एक बार फिर ज़ोर से चिल्लाने लगी…

  ” हमें बचा लीजिये हुकुम ! हम तो कहीं मुहँ दिखाने लायक नही रहे।”

   अपनी स्लीवलेस नाइटी की गिरी हुई स्ट्रिप्स को ठीक करती केसर अपने ऑंसू पोंछने लगी।
   अब तक में इस शोरगुल की खबर को किसी ने रूपा के कमरे तक भी पहुंचा दिया था, वो और युवराज भी वहाँ पहुंच चुके थे।
   युवराज ने आते ही सभी कर्मचारियों को रफ़ा दफा कर कमरे का दरवाजा बंद किया और समर की ओर देखने लगा

  ” क्या बात है समर? ये क्या हल्ला मचा रखा है तुम दोनों ने ?”

   शुरुवात में घबराया सा समर अब शांति से हाथ बांधे एक ओर खड़ा हो गया था…

  ” इन्हीं से पूछिए क्या हुआ? क्योंकि जितना आपको पता है उतना ही मैं भी जानता हूँ।”

  केसर की ओर घूरते हुए उसने अपनी बात रख दी। राजा को समर पर पूरा विश्वास था, केसर की कही बात इसीलिए उसके पल्ले नही पड़ रही थी। केसर के बेतरतीब कपड़े देख रूपा भाभी उसके पास पहुंच गई, अपने शॉल से उसे लपेट उन्होंने उसे एक किनारे बैठाया , पानी का गिलास थमाया और उससे उसकी आपबीती पूछ ली।
  केसर बस मौके की ताक में थी।

  ” क्या कहें भाभी साहेब! आपके लाने पर ही इस महल में दाखिल हुए थे हम, हमे क्या पता था कि महलों के बारे में लोगबाग जो कहतें हैं वो सच होगा।”

” ऐसा क्या कहतें हैं लोग?”

  ” यही की महल बस बाहर से देखने भर को सुंदर है, अंदर तो भेड़िये रहतें हैं, जैसे ये आपके समर सा। इनकी लंबी चौड़ी खूबसूरत पर्सनैलिटी देख कर कौन कहेगा कि इनके अंदर इतना बड़ा शैतान छिपा है?”

  रूपा ने मुड़ कर गुस्से से समर की ओर देखा लेकिन वो वैसा ही निर्लिप्त खड़ा था

  ” बाई सा वैसे कुछ कुछ समझ में तो आ गया है लेकिन आप पूरी बात खुल कर बताएंगी तो …

   रूपा की बात आधे ही में काटती केसर बोलती चली गयी

   ” पहले तो हमें किसी प्रोजेक्ट को डिस्कस करने के बहाने कमरे में बुला लिया उसके बाद हमें वाइन ऑफर की। हमने मना भी किया लेकिन इनके ऊपर तो शैतान सवार था ना, कैसे रुकते? मन भर पीने के बाद हम पर टूट पड़े। हमने खुद को बचाने की पूरी कोशिश की और ये कोशिश भी करी की महल के नौकरों के सामने ये बात ना आये वरना महल की बदनामी होगी लेकिन जब ये राक्षस सुनने को तैयार ही ना हुआ तब हमें ज़ोर की आवाज़ मदद के लिए लगानी ही पड़ी। भाभी साहेब अब देखिए आप सब के सामने भी ये सच्चाई आ गयी, हम तो किसी को मुहँ दिखाने के लायक नही रहे। बड़े हुकुम हमारी जान बचाने हमें महल में लेकर आये थे लेकिन यहाँ हमारी इज्जत पर बन आयी।
   हम जानतें हैं अकेली लड़की का इस संसार में कोई सहारा नही होता। अगर हमारे पिता इतने बीमार ना होते तो क्या समर जैसों की हिम्मत थी हमें आँख उठा कर देखने की भी।
   हम समझ गए हैं हमें अपनी जिंदगी की मुश्किलों से अकेले ही लड़ना है। अब हमें मत रोकियेगा भाभी साहेब। हम जी लेंगे कैसी भी ज़िन्दगी लेकिन अब इस आदमी के रहते हुए हम महल में नही रह सकते।”

    समर के चेहरे पर ये बात सुनते ही मुस्कान खेलने लगी, क्योंकि अब जाकर उसे सारी बातें समझ आयीं थी कि क्यों शाम से ही केसर उसके आगे पीछे घूम रही थी, क्यों उसने रात के खाने के वक्त भी उसकी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था।
   ज़ाहिर था कि दोस्ती का हाथ बढ़ा कर वो उसके कमरे तक पहुंचना चाहती थी जिससे ये सब खेल रच सके, पर जब शाम में उसका हाथ झटक वो वहाँ से चला गया तब उसने ये दूसरी तरकीब निकाली थी।
   ये सब हंगामा मचाने से लगभग आधे घंटे पहले वो खुद चल कर उसके कमरे तक आयी थी किसी प्रोजेक्ट को डिस्कस करने के बहाने से। जब उसने सुबह पर टालने की कोशिश की तब फ़िज़ूल की जिरह करती वो कमरे के अंदर चली आयी।
   मूड फ्रेश करने के नाम पर वाइन निकाल वो वापस उस पर डोरे  डालते हुए बस इसी इंतज़ार में थी कि समर उसका डाला दाना चुगे और वो चीख चिल्ला कर भीड़ जमा कर ले, लेकिन समर भी समर था।
   जब उसने उसे वहाँ से जाने को कहा तब अपनी दाल ना गलती देख केसर ने आखिरी पैंतरा अपना ही लिया और शोर मचाने लगी।

   राजा ने समर को मुस्कुराते देखा तो आंखों ही आंखों में उससे क्या हुआ पूछ लिया, उसने भी कुछ नही कहा और वापस केसर और रूपा की बातें सुनने लगा….

” आप चाहती क्या हैं बाई सा?” रूपा के सवाल पर रोती बिलखती केसर रूपा से लिपट गयी

  ” ऐसे में एक सताई हुई औरत और क्या चाहेगी भाभी साहेब! अगर आप हमारी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं तो और चाहती हैं कि हम इस महल में रहें तो अभी इसी वक्त इस आदमी को महल से बाहर कीजिये। बस इतनी सी गुज़ारिश है हमारी।”

  केसर को समर के पूर्वजों का इतिहास भले ही मालूम नही था लेकिन राजा और युवराज अच्छे से जानते थे कि समर उन्हीं के वंश का खून था , उनका अपना भाई था। ऐसे समर को महल से वो दोनो ही नही निकाल सकते थे और असल बात ये थी कि वो निकालना चाहते भी नही थे।
   रूपा ने समर की तरफ देखा और फिर युवराज और राजा को देखने लगी

  ” आप लोग कुछ कहेंगे भी या चुपचाप यूँ ही खड़े रहेंगे। ये कोई छोटी बात तो हुई नही है महल के अंदर।”

  ” मैं चाहता हूँ समर भी अपना पक्ष रखे!”

  राजा की बात पर केसर भड़क गई

  ” हुकुम आपसे ये उम्मीद ना थी आखिर मर्द जो ठहरे अपनी जमात का ही तो पक्ष लेंगे ना आप। एक औरत का दर्द हर कोई नही समझ सकता , हम….

   केसर अभी और भी जाने क्या क्या कहने वाली थी उसकी बात काट कर समर बीच में ही बोल पड़ा

  ” मेरे कारण आप किसी को मुहँ दिखाने लायक नही रहीं है ना केसर सा?”
    केसर ने गुस्से से मुहँ दूसरी तरफ फेर लिया

  ” आपकी लाज ढाकने के लिए मैं आपसे शादी करने को तैयार हूँ , अब तो आपको इस महल को छोड़ने की ज़रूरत नही है?

   समर ऐसा कुछ कह सकता है इसकी केसर को ज़रा भी उम्मीद नही थी, वो चौन्क कर उसे देखने लगी। युवराज ने आगे बढ़ कर समर को सीने से लगा लिया। राजा को अब भी इस सब मामले में कोई बात खटक रही थी, लेकिन वो सब के सामने चुप ही था। समर के साथ ही वो पला बढ़ा था इतना तो वो समर को जानता था और समझता था कि केसर झूठा इल्ज़ाम लगा रही थी।
 
   ” अपनी गलती को जो वक्त रहते संभाल ले उससे बढ़ कर कोई नही।समर तुम्हारे निर्णय से हम बहुत खुश हैं।” युवराज की बात खत्म होने से पहले ही केसर चीख उठी

   ” लेकिन हम खुश नही हैं। हम उस नीच आदमी से शादी के बारे में सोच भी नही सकते जो हमारे लिए इतने गंदे विचार रखता हो।”

   रूपा अब केसर को समझाने लगी

  ” बाई सा एक बार सोच कर देखिए, रुपये पैसे रुतबे में आप कितनी भी बड़ी हों पर अगर आपका दामन दागदार होगा तो कौन सा अच्छे घर का लड़का आपसे शादी करेगा। ज़िन्दगी भर कुंवारी तो बैठी नही रहेंगी ना , आखिर अपना घरद्वार तो हर औरत को चाहिए फिर देखा जाए तो आज की बात भुला दें तो समर सा में ऐसा कोई ऐब कोई बुराई नही है।।
   हमारी कोई छोटी बहन होती तो हम इन्हें अपनी बहन के लिए मांग लेते । आप मान जाइये बाई सा इसी में आपकी और महल की भलाई है।”

   केसर का फेंका पांसा उल्टा पड़ गया था, उसने अपने और राजा के बीच से समर को हमेशा के लिए हटाने के लिए ही ये चाल चली थी। उसे लगा था इतना बड़ा इल्ज़ाम लगते ही समर अपने बचाव के लिए आगे बढ़ कर कुछ न कुछ कहेगा और तब उसकी हर बात को काट कर उसकी खलनायक सी छवि प्रस्तुत करती वो सबके सामने ऐसा माहौल बना देगी की महल छोड़ने के अलावा समर के पास कोई और उपाय नही बचेगा।
   समर के पास उसकी रिकॉर्डिंग थी जिसका उसे डर था, इसलिए उस सब हंगामे के समय समर के साथ होने वाली छीनाझपटी में उसने उसका मोबाइल भी जोर से नीचे फेंक दिया था।
    उसे पूरी पूरी उम्मीद थी कि औरतों की इज़्ज़त का तरफदार न्यायप्रिय राजा उसके पक्ष में ही बोलेगा और समर इस महल से बाहर फेंक दिया जाएगा लेकिन इस बार उसने समर को वाकई कम आंक लिया था।
   समर ने उसी के वार से उसे घायल कर दिया था। शादी का प्रस्ताव रख समर ने उसकी बोलती ही बंद कर दी थी। अपने ही बनाये जाल में वो खुद बुरी तरह उलझ गए थी। समर से शादी के बाद राजा और महारानी की गद्दी उसके लिए मात्र सपना ही रह जाने वाली वस्तु थी।
    कितना शातिर निकला था ये लड़का , उसने सपने में भी नही सोचा था कि उसकी चाल ऐसे नाकामयाब हो जाएगी। अब अगर वो शादी से पीछे हटती है तो ये रूपा और महल की बाकी औरतें उसका जीना मुहाल कर देंगी और कहीं शादी के लिए हाँ कह देती है तो ये लड़का ड्रैकुला बना ज़िन्दगी भर उसकी गर्दन पर दांत गड़ाए उसका खून पीता रहेगा।
   है भगवान कैसी मुश्किल में डाल दिया था ।
केसर अपनी सोच में मगन थी। अब यहाँ से पीछे हटने का कोई उपाय समर ने उसके लिए नही छोड़ा था।
    समर धीरे से केसर के पास चला आया। उसे केसर के पास आते देख रूपा उठ कर दूसरी ओर चली गयी

  ” हाँ एक बार आप लोग बैठ कर विचार विमर्श कर लीजिए , फिर हम सब को बता दीजिएगा।” रूपा बैडरूम के बाहर की स्टडी में चली आयी उसके पीछे युवराज और राजा भी निकल गए

  ” क्या खा कर तुम्हारी अम्मा ने तुम्हें पैदा किया है समर सिंह ! तुम क्या समझते हो तुम्हारी इस शादी वाली चाल में फंस जाऊंगी मैं?”

  ” सोचना क्या है कब? आप बुरी तरह से फंस चुकी हैं। और रहा सवाल मेरी माँ का तो उन्होंने नीम खा कर मुझे पैदा किया है…

   उसकी बात आधे में ही काट केसर बोल उठी

  ” तभी इतने कड़वे हो?”

  ” अभी चखा कहाँ हैं आपने? महल के साथ साथ मेरे कमरे में भी चली आयीं अब चख भी लेना मुझे ।”
    समर ज़ोर से हँसने लगा और उसकी हंसी देख केसर के तन बदन में आग लग गयी।

  ” नफरत होती है तुमसे मिस्टर समर सिंह।”

  ” मुझे कौन सा आपसे इश्क़ है? मैंने भी आपकी चाल का ही जवाब दिया है आज। और आगे भी देता रहूँगा। आज आखिरी बार कह रहा हूँ आज रात सामान बांन्ध कर चुपचाप महल से निकल जाइये वरना अगर सच में मुझसे शादी हो गयी न तो जीते जी नरक की अग्नि में जलना पड़ेगा।
     बुरा नही बहुत बहुत बुरा हूँ मैं। पहले भी कहा था किसी लड़की की आंख में समर के कारण ऑंसू आये ये मुझे पसंद नही लेकिन सच कहूं तो आप मुझे लड़की लगती भी नहीं।
     एक बार और सोच लीजिए , शादी से बचने के दो ही उपाय हैं या तो बाहर जाकर आज रात की सारी सच्चाई वहाँ सबसे कह कर माफी मांग लीजिये और या फिर अगर सच कहने की हिम्मत नही है तो चुपके से महल छोड़ कर निकल जाइये इसी में आपकी भलाई है। ”

   अपनी बात पूरी कर वो तेज़ कदमों से बाहर निकल गया। केसर क्या करूं क्या ना करूं के फेर में पड़ी रह गयी थी।
   वाकई उस अड़ियल ने अजीब सी परिस्थिती में उसे फंसा कर छोड़ दिया था , अब ना उससे उगलते बन रहा था न निगलते।
    अभी बिना किसी कोशिश के उसकी आँखों में ऑंसू चले आये। अपनी असहायता अवशता पर तरस खाती वो धीमे कदमों से बाहर चली आयी…

  ” भाभी साहेब! हम शादी के लिए तैयार हैं!”

   केसर के ऐसा कहते ही रूपा ने आगे बढ़ कर उसे गले से लगा लिया। युवराज भी मुस्कुरा कर समर की ओर देखने लगा , और समर चौन्क कर केसर को ।
केसर भी उसे ही घूर रही थी लेकिन समर की जलती आंखों की ताब ना सह सकी और उसने आंखें नीची कर लीं।

  *******

    महल से निपट कर प्रेम शाम में घर पहुंचा , आज उसे उसका ही घर कुछ बदला बदला सा लग रहा था।
रेशमी गुलाबी पर्दों के साथ डायनिंग पर सजी खुशबू वाली मोमबत्तियां अलग ही माहौल बना रहीं थीं।
     निरमा भी आज कुछ अलग सी लग रही थी, थोड़ी सजी संवरी सी।
   वो अपनी आदत के मुताबिक सबसे पहले मीठी को देखने बैडरूम में चला गया, उसे मीठी सी नींद में सोए देख प्रेम को सारा माजरा समझ में आ गया कि इतनी सारी तैयारियां आखिर निरमा ने किस लिए कर रखी हैं।
   मुस्कुराते हुए वो अपने कमरे से कपडे बदल कर नीचे चला आया।
 
   ” आज घर कुछ बदला बदला सा लग रहा है ना?”

  ” हम्म ! आपको पसंद आया।”

  ” बहुत ! अम्मा कहाँ हैं? घर चली गयी?”

  ” हाँ , आज थोड़ा जल्दी चली गईं।”
   निरमा खाना परोसने में लगी थी कि प्रेम ने पीछे से आकर उसे बाहों में ले लिया..

  ” खाना तो खा लीजिये ।”

  ” बाद में खा लेंगे ”
   निरमा प्रेम की तरफ घूम गयी, एक दूसरे को देखते दोनो एक दूसरे में खोए हुए ही थे कि निरमा का फ़ोन बजने लगा, प्रेम की आंखों में खोई निरमा का ध्यान फ़ोन पर एकदम से गया नही फिर जैसे ही उसने रिंग सुनी मुस्कुरा कर प्रेम की बाहों से निकलने लगी

  ” छोड़िए ना देख तो लूँ किसका फ़ोन है? “

  ” बाद में देख लेना। ऐसी कौन सी अर्जेंसी आ गईं?”
 
  ” वही तो । कोई अर्जेंट कॉल हुई तो। बस एक मिनट में आई।”

  वो उसकी बाहों से निकल तुरंत फ़ोन उठाने चली गयी..

” निरमा बेटा तेरे मामा को अटैक आया है , अस्पताल में भर्ती कर लिया है डॉक्टर ने , यहीं पास में उनके दोस्त के अस्पताल में ही हैं हम लोग। तू बिना देरी किये आ जा बेटा।”

  ” हाँ मामी आप चिंता मत करना, मैं सुबह तक पहुंचती हूँ ।”

    मामी की आवाज़ घबराहट में इतनी तेज आ रही थी कि प्रेम ने भी सारी बातें सुन ली, वो भी तुरंत निरमा के पास पहुंच गया। फ़ोन रख कर निरमा ने पानी भरी आंखों से प्रेम की ओर देखा

  ” आई एम सॉरी ! “

  ” अरे पागल इसमें सॉरी की क्या बात है? रोमांस करने के लिए तो पूरी ज़िंदगी पड़ी है। अब तुम फटाफट समान रखो मैं तुम्हारी टिकट का इंतज़ाम करता हूँ। मेरा इस वक्त जाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है , फिर भी एक बार हुकुम से बात कर के देखता हूँ । वो छुट्टी के लिए मना नही करेंगे मैं जानता हूँ।”

  ” नही ! आपकी अभी वैसे भी बहुत छुट्टियाँ हो गईं हैं। मैं चली जाऊंगी, वहाँ कुछ भी आपकी ज़रूरत हुई तो आपको बुला लुंगी, डोंट वरी मैं मैनेज कर लूँगी। मुम्बई ही रही हूँ बचपन से।”

  हाँ में सर हिला कर प्रेम निरमा की टिकट देखने लगा, इत्तेफाक से भोर की हवाई टिकट उसे मिल भी गई।
अपना और मीठी का सामना बांधे निरमा तैयार होकर बाहर चली आयी, उसका सामान गाड़ी में रख प्रेम ड्राइविंग सीट की तरफ जा रहा था कि निरमा उससे लिपट गयी

  ” अपना ख्याल रखियेगा, रोज़ समय से खाना सोना किया कीजियेगा और अस्तबल में जाते समय पूरी सावधानी रखियेगा और…

   ” हाँ मेरी माँ सब समझ गया। तुम तो बीवी से माँ बन गईं.. इतनी केयर कौन करता है भला? “

  ” हर बीवी करती है बस आप आदमियों का ध्यान नही जाता।”

   निरमा का माथा चूम कर उसके लिए सामने की सीट का दरवाजा खोल उसे अंदर बैठाने के बाद प्रेम खुद ड्राइविंग सीट पर आ गया।
    हवा से बातें करती उसकी गाड़ी कुछ देर में ही एयरपोर्ट पर खड़ी थी। अब तक में मीठी भी जाग गयी थी जो निरमा की गोद से प्रेम की गोद में जाने को मचलने लगी।
    उसे मन भर दुलार करने के बाद उसे निरमा की गोद में देकर वो बाहर निकल एक ओर खड़ा हो गया।

   निरमा के चेक इन तक बाहर हाथ बांधे खड़ा उसे देखता प्रेम जैसे ही निरमा आंखों से ओझल हुई भारी कदमों से एयरपोर्ट से बाहर निकल आया……



क्रमशः


  
  
       
      
    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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