जीवनसाथी-75



जीवनसाथी  75


           

    गाना बजाना खत्म होते ही क्लास शुरू हो गयी।
हरि सर की क्लास वैसे तो घंटे भर की होती थी लेकिन कुछ उनका पढ़ाने का निराला स्टाइल कुछ पढ़ाकू विद्यार्थियों का जुनून क्लास खत्म होते होते कभी तीन तो कभी साढ़े तीन घंटे बीत जाते थे।
    क्लास खत्म कर सर ढेर सारा काम अगले दिन के लिए देकर निकल जाया करते थे।
    ये सारा काम लेखन से सम्बंधित होने से ही अधिकतर विद्यार्थी साथ ही नोट्स तैयार किया करते थे।
    आज भी क्लास के बाद शेखर और रिदान कुछ दो चार लड़कों के साथ निकलने लगे…


  ” ओए तू कहाँ चल दिया? तू वहाँ पढ़ेगा तो हमें कौन कराएगा?” लीना ने शेखर को टोक दिया

” तेरे अब्बा ने खरीद लिया है क्या मुझे? जब देखो सवार रहती है मुझ पर। अरे दूसरों का भी कुछ हक है शेखर पर । सीरियसली मैन!!!  दिमाग ज्यादा होना भी बुरा ही है। हर कोई अपने साथ खींचना चाहता है।”

  ” अबे ओये कबाड़ी की दुकान! ज्यादा बोलबच्चन दिखाने की जगह नोट्स बनाने में मदद करेगा न तो बेटर होगा।”

  ” तुझे पढ़ाना मतलब खतरों से खेलना। खतरों का खिलाड़ी बन गया हूँ मैं!”

  ” जी नही तू कचरों का कबाड़ी बन गया है।”

  ” हसीना तू वाकई दाऊद इब्राहिम की बहन है क्या? जिसे देखो उसे ही चमकाती रहती है। अरे इज्जत है यार अपनी तमीज़ से बात कर लिया कर।”

  ” तेरे जैसे छुट्टन के लिए तमीज़ नही है मेरे पास , समझा। अब तू चल रहा हमारे साथ या हम निकले।”

  ” निकलो फिर!”

   शेखर का इशारा समझते ही लीना ने पीछे से उसकी शर्ट  की कॉलर पकड़ी और उसको अपने साथ ही खींच लिया

  ” अबे चला जा ना यार, क्यों इस हिटलर की अम्मा से पंगा लेता है। स्कूल टाइम पर एथलीट रह चुकी है। स्पोर्ट्स वाली है दबा के एक देगी ना तो बत्तीसी बाहर आ जायेगी भाई।”

   रिदान की बात सुन शेखर ज़ोर से हँसने लगा

  ” कमीने मुझे अकेले फंसा के तू नही भाग सकता। चल तू भी। पर सुन यार कैटरीना मैं तेरे रूम पर नही जाऊंगा।”

  ” क्यों ? क्या प्रॉब्लम है मेरे रूम में?”

  ” यार एक से बढ़ कर एक भूतनी है तेरे होस्टल में। कोई फेसपैक लगा कर डराती है तो कोई बालों में कर्ल्स फंसा के। और सारी की सारी मुझे बहुत लाइन मारती हैं यार, मज़ा नही आता।”

   शेखर ने जैसे भोलेपन से कहा बाँसुरी को हंसी आ गयी, उसे हँसता देख वो भी मुस्कुराने लगा

  ” कुत्ता!” लीना की बात सुन शेखर इधर उधर देखने लगा

  ” कहाँ है ? ” शेखर ने देखा उसे उसके पीछे ही एक कुत्ता दिख गया उसे देख वो वापस हँसने लगा

  ” जानता हूँ कुत्ते को ही कुत्ता बोल रही , मुझे नही। है ना?”

  ” इस बार तेरे को ही कुत्ता बोली!”

  ” तू मेरे को कुत्ता बोली फ़र्ज़ीना?”

  ” हाँ ! क्योंकि ये खुजली वाला कुत्ता है, तो इसके सामने तुझे कुत्ता बोलने से ये नाराज़ नही होगा बल्कि तुझे देख उसे तसल्ली होगी कि उससे गया बीता भी कोई है।”

   बाँसुरी का हसंते हसंते बुरा हाल था

  ” बस करो यार! तुम दोनों को तो कॉमेडी शो कर लेना चाहिए। अब चले पढ़ने।”

  ” मैं तो बोलता हूँ यही कैंटीन में बैठते हैं। यहाँ की ज़हर चाय अंदर जाकर ऐसी आग पैदा करती है कि इस चाय वाले को  यहाँ से नेस्तोनाबूत करने के लिए यहाँ का कलेक्टर बनने का मन करने लगता है और फिर जो जी जान से पढ़ाई होती है ना कि पूछ मत।”

  ” कल ये फिर से छप्पनवी बार ममी देख रहा था। कितने पसंद है यार तुझे वो सड़े बिलबिलाते हुए कीड़े।’

   “कोई नही कीड़े शीड़े नही इसे मम्मी की हिरोइन पसंद है रेशल !! उसी के चक्कर में आंखें फोड़ता रहता है। और सुन उस हीरोइन का ना तेरी उम्र का बेटा होगा इसलिए ना ज्यादा मत देखा कर उसे।”

   ” ठीक है उसी शक्ल वाली अपनी उम्र की खोज लेता हूँ, तब तो चलेगा ना।”

   शेखर की बात पर हँसते हुए वो चारों वहीं बैठ गए, कैंटीन का छोटू कंधे पर फटका डाले वहाँ चला आया

  ” क्या ले आऊँ भैया जी?”

  ” लज़निया ले आ बेटा!”

  ” क्या भैया जी? क्या मतलब?”

” अबे चाय समोसे के अलावा मिलता क्या है बे ? तो वही ले आ ! और क्या लाएगा भाई, और सुन समोसा मेरे लिए मत लाइयो।”

  ” मेरे लिए भी नही।” शेखर के बाद बाँसुरी ने भी मना कर दिया

   ” मैं ही बस क्या भुक्कड़ दिख रही हूँ, मैंने भी नही खाना। जा छोटू बस चार चाय ले आ।”

   लीना की बात पर रिदान कंधे झुझका कर रह गया, शेखर चाय आने तक में वहीं किनारे लगे बेसिन पर मुहँ धोने लगा।
   मुहँ धोने के बाद उसने जेब से रुमाल निकाला और चेहरा पोंछने लगा, लेकिन उसके साफ सुथरे चेहरे पर केक की आइसिंग लग गयी। वो एकदम से झल्लाता लीना की तरफ आया

  ” क्या यार ये तूने मेरे रुमाल का क्या सत्यानाश किया है ? अपनी सारी आइसिंग इसमें पोंछ दी?”

  ” मेरी कोई गलती नही है। बाँसुरी के गालों पर लगी आइसिंग है ये, इसी ने पोंछी भी है।

   बाँसुरी एकदम से घबरा कर शेखर को देखने लगी उसी वक्त शेखर ने भी उसे देखा। नज़रे मिलतें ही बाँसुरी ने उसे सॉरी कहा , नो इट्स ओके कह शेखर ने रुमाल से अपना चेहरा पोंछा और वापस जेब में डाल मुहँ धोने चला गया।

      चाय पीते हुए चारों साथ ही पढ़ने में भी जुट गए।
शाम गहराते हुए रात में बदल गयी, बाँसुरी का फ़ोन बजने लगा

   ” कहाँ हो बाँसुरी ? ”

   पिंकी का फ़ोन था, वो उसके लिए चिंतित हो रही थी…

  ” मैं ? क्या हुआ ? अचानक ऐसा सवाल क्यों? सब ठीक है ना?”

” अरे हाँ सब ठीक है! हम तो बस ये जानना चाहते थे कि अकेली हो या घर का कोई साथ है, असल में तुम्हें कुछ बताना था।”

   धड़कते दिल से बाँसुरी ने पूछा क्या हुआ?

   ” सुनो ! तुम जल्दी ही मामी सा बनने वाली हो।”

  ” क्या? ” बाँसुरी इतनी जोर से चहकी की शेखर के साथ साथ सभी उसे देखने लगे, उसने उन लोगों से आंखों ही आंखों में माफी मांगी और फ़ोन संभाले वहाँ से उठ कर थोड़ा आगे बढ़ गयी….

” बहुत बहुत बधाइयाँ वुड बी मॉमी! कब हुआ ये? और कैसे? आई मीन अभी तो तुम्हें एग्जाम की तैयारी करनी थी ना!”

  ” अब क्या बताएं कि कब हुआ?” पिंकी की खिलखिलाहट फ़ोन पर गूंज उठी, बाँसुरी भी अपने सवाल पर झेंप गयी…

” रही बात एग्जाम की तो अब इस बार हमारा कोई प्लान नही है । अब पूरा ध्यान बेबी पर देना है उसके बाद सोचेंगे।”

” ऐसा क्यों कर रही हो पिंकी! इतने आगे तक बढ़ने के बाद अब पढ़ाई छोड़ कर अपना कितना बड़ा नुकसान कर रही हो सोचा भी है?”

  ” और तुम बंसी? राजा भैया से अलग होकर तुम खुद का कितना नुकसान कर रही हो तुमने कभी सोचा?”

   पिंकी ज़बान की ज़रा तेज़ ज़रूर थी लेकिन सच्चाई यह भी थी कि अपने प्यारे भाई की हालत उससे देखी नही जा रही थी। अगर रतन ना रोकता तो वो अब तक ज़ोर ज़बरदस्ती कर कैसे भी बाँसुरी को राजा भैया के पास पहुंचा आती। इसी से जब भी फ़ोन करती वो बाँसुरी को बस एक ही उलाहना दिया करती।
थोड़ी देर इधर उधर की बात करके उसने फ़ोन रख दिया, उसके वापस आते में उसके सारे दोस्त अपनी किताबें समेट चुके थे।
  उसके आते ही सारे वहाँ से उठ गए।

   अगली सुबह का समय तय कर सब अपने अपने कमरों की ओर चले गए।

  कोचिंग के पास ही कैम्पस के बाहर आस पास की गलियों में सभी के घर थे। रिदान और शेखर के अपनी गली में मुड़ते ही बाँसुरी और लीना आगे बढ़ गए। सामने शिव मंदिर था, बाँसुरी लीना को संग लिए मंदिर दर्शन के लिए चली गयी।
    लीना फटाफट प्रणाम कर प्रसाद लिए बाहर निकल कर सीढ़ियों पर बैठ गयी।
   बाँसुरी हाथ जोड़े खड़ी रह गयी। मन में उस वक्त उसके कुछ भी नही था। वो खुद सोच में पड़ी थी कि क्या मांगे।
   राजा से मिलने के बाद से आज तक उसने उसके अलावा और कुछ नही मांगा था,उसके लिए राजा के लिए कुछ भी मांगना खुद के लिए मांगना ही था। और सही भी तो था, राजा सुखी और स्वस्थ रहेगा तो वो कैसे दुखी रह सकती थी।
     आंखें मुंदी हुई थी और अचानक उसे अपने आस पास ऐसा लगा जैसे वो खड़ा है, उसने चौन्क कर आंखें खोल दी, पंडित जी ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया हुआ था… प्रसाद लेने उसने अपना हाथ आगे किया उसके पहले ही उसके बाजू से होकर एक चौड़ी सी हथेली पंडित जी के सामने खुल गयी।
     हाँ उसी का हाथ तो था।  वही सुनहरे तारों में बंधा रुद्राक्ष हाथ में लिपटा था, एक चौरस बड़ा सा हीरा उंगली में झिलमिला रहा था और नीचे वाली हथेली में  राडो की घड़ी।
     हाँ राजा ही तो था उसके पीछे….

*******


     महल में अगली सुबह दीवानखाने में रूपा भाभी ने केसर और समर की होने वाली शादी के बारे में सबको बताने में कोई देर नही की।
      घर के सदस्यों को खुशी से ज्यादा आश्चर्य था क्योंकि समर के साथ साथ केसर के हठी और खराब स्वभाव से सभी परिचित थे…
    रूपा के ही कहने पर वो दोनो दादी साहेब से मिलने उनके कमरे में चले गए, रूपा भी साथ ही थी…

  ”  अभी तो कोई मुहूर्त ही नही है?”

  ” हाँ दादी साहेब ! अभी तो बस तय हुई है , शादी तो मुहूर्त पर ही होगी, अब तो सीधे दीवाली के बाद ही होगी , तब तक हमारे बन्ना बन्नी को इंतेज़ार करना होगा।”

    रूपा ने हंसते हुए अपनी कोहनी से केसर को हल्का सा धक्का दिया, वो समर पर गिरते गिरते बची।
    वो पहले ही उससे ज़रा हट कर खड़ा था। दादी साहब के पैर छूने के बाद वो उनके पैरों के पास ही ज़मीन पर बैठ गया, रूपा केसर के साथ सामने लगी कुर्सियों पर बैठ गयी।
     दादी सा ने जितनी आवाज़ धीमी कर सकती थी कर के उससे पूछ ही लिया

   ” और कोई नही मिली तुझे, इस परकटी के अलावा।”
   
   ” पर तो अभी काटने बाकी है दादी हुकुम! उसके बाद देखना! और शादी में तो अभी बहुत वक्त है, मुहूर्त तक पहुँचते पहुँचते देखा जाएगा ! हो सकता है दुल्हन भाग जाए!” अपनी बात कह वो हँसने लगा, उसके साथ दादी भी खिलखिला उठी, फिर जैसे अचानक ही उन्हें कुछ याद आया

   ” रूपा ! बाँसुरी से कोई बात हुई क्या? अरे उसे भी तो जाकर ले आओ कोई, कुमार नही जा रहे तो तुम्हीं लोग चले जाओ! समर बेटा तुम भी तो जा सकते हो।”

   “दादी सा ! हमने तो बहुत कोशिश की लेकिन उनका फ़ोन ही नही लग रहा। पहले पहल रिंग जाया करती थी तो उन्होंने उठाया नही फिर एक बुरा से मेसेज आया और उसके बाद उन्होंने हमारा नंबर ब्लॉक कर दिया।
    अब इतनी बदतमीज़ी के बाद हम क्यों और कैसे जाएं लेने। बताइये आप?”

    रूपा की बात सुन समर उसे देखने लगा

  ” भाभी साहेब ने आपसे बदतमीज़ी से बात की?”

   ” हाँ ! हमें भी बड़ा अचरज हुआ क्योंकि वो तो बहुत मीठा बोलती थी हमेशा , फिर अचानक इतना बुरा मेसेज क्यों?”

  ” मिसरी की डली थी, जाने क्यों इतना नाराज़ हो बैठी? सब बचपना है। तुम लोग उसे जल्दी से वापस ले आओ बस। बेचारा मेरा कुमार!”

  दादी साहेब की बात के बीच ही समर ने रूपा से बाँसुरी का मैसेज दिखाने की गुज़ारिश कर दी….

    समर को मैसेज में इतनी रुचि लेते देख केसर का दिमाग ठनक गया

   “हमारी तबियत कुछ ठीक नही लग रही, भाभी सा हम कमरे में जाएं क्या? आप चलेंगे हमारे साथ?”

  केसर ने बड़ी अदा से समर की ओर देखा

  ” क्यों आपके पैरों में कोई तकलीफ है क्या या मेहंदी लगी है ?

  समर का टेढ़ा जवाब सुन वो खड़े होते होते वापस बैठ गयी। उसे समझ आ गया कि ये ज़िद्दी लड़का अब बिना मेसेज देखे यहाँ से टलेगा नही

  ” भाभी साहेब अपना फ़ोन दिखाये।”

  समर की बात तुरंत केसर ने काट दी

  ” अरे ऐसे कैसे आप किसी का फ़ोन चेक कर सकतें हैं। बैड मैनर्स ना?”

समर ने केसर को घूर कर देखा और रूपा के बढ़े हुए हाथ से फ़ोन ले लिया

   ” ये मेसेज देखिए समर सा ! हमें तो बाँसुरी की ये बात बहुत खराब लगी। क्या कोई अपनी जेठानी से ऐसे बात करता है?”

  समर ने हाँ में सर हिला कर फ़ोन ले लिया

   ” भाभी साहेब ! आप हमारे और हमारे पति के बीच ना ही बोलें तो बेहतर होगा, वैसे भी अगर वो राजा हैं तो हम भी महारानी हैं, हमारा भी मान सम्मान है। आप अपने सम्मान को ताक पर रख अपने पति के पैर की जूती बनी रह सकती हैं लेकिन हमें राजा साहब की जूती बनना मंज़ूर नही है।
   अब हम उस महल में कभी नही लौट सकते, आप हमारी मदद करना चाहती हैं तो तलाक के पेपर्स तैयार करवा कर भिजवा दीजिये, हम अब आज़ाद रहना चाहते हैं।”

    समर की आंखें सिकुड़ कर छोटी हो गईं। उसने उस मेसेज को दो तीन बार पढ़ लिया

   “क्या हुआ ? अब आप इसी मेसेज में खोए रहेंगे क्या? वापस भी तो जाना है। चलिए ना!”

   केसर की बात अनसुनी करता समर रूपा की तरफ देखने लगा

    ” जाने क्यों ऐसा लग रहा जैसे ये मेसेज रानी हुकुम ने नही किया। उनकी बोली ऐसी तो नही है, और दूसरी बात गुस्से में इंसान सोच समझ कर बातें बना कर नही लिख सकता। खैर ! देखा जाएगा…

   केसर बार बार समर को वहाँ से जाने को कह रही थी, एक बार फिर केसर को घूरने के बाद समर ने फ़ोन रूपा को वापस कर दिया , और दादी साहेब के पैर छूकर वहाँ से उठ गया।
     युवराज भी रोज़ की आदत से दादी सा से मिलने आया था, इसलिए रूपा को वहीं छोड़ समर बाहर निकल गया, केसर भी उसके पीछे बाहर निकल गयी।

   ” सच कहना! कहीं रानी साहेब का फ़ोन तुम्हारे पास तो नही है?”

   बाहर अकेले में समर ने जैसे ही केसर से ये पूछा , केसर की जान हलक में अटक गई

  “नही नही! पागल हैं क्या आप? हमारे पास कैसे होगा उनका फ़ोन? और क्या दुनिया भर का ठेका हमने ले रखा है जो कहीं भी कुछ गड़बड़ हो आपको हम ही नज़र आने लगते हैं । ”

  “दुनिया तो नही लेकिन इस महल की बहुत सारी गड़बड़ का कारण आप ही हैं, ये जानता हूँ मैं।”

   ” लगता है इस रॉयल टाइगर को इश्क़ होने लगा है, हर जगह आपको अब हम ही नज़र आ रहे हैं , वो गाना सुना है ना __ तू ही तू हर जगह आजकल क्यों है? ”

  मेसेज वाली बात से समर का ध्यान हटाने केसर उसे इधर उधर की बातों में उलझाने की कोशिश करने लगी
समर ने एक बार फिर उसे देखा और उलझ पड़ा

  ” दुनिया की आखिरी लड़की भी आप हुई ना तब भी आपसे समर को कभी इश्क़ नही होगा।”

  ” हाय ! इतनी तमीज़,  कहाँ जाकर मरे हम। आप खडूस ही अच्छे लगते हैं।”

  “केसर साहेब आप इतना फिल्मी ड्रामा ना ही करें तो अच्छा है वरना मेरा ध्यान और ज्यादा इस बात पर जाएगा कि मेरा ध्यान फ़ोन और मैसेज से हटाने के लिए ही आप ये सारी तिकड़म भिड़ा रहीं हैं।”  
 
   समर की ऐसी स्पष्टवादिता उसे वापस सुलगा गयी

  ” भाड़ में जाओ!” उसे धिक्कारती वो अपनी सैंडल चटकाती वहाँ से चली गयी, और उसे जाते देख वो कुछ सोचता राजा के कमरे की ओर बढ़ गया।

    *******

    शिव मंदिर में किसी ने भजन कीर्तन रतजगा रखवाया था शायद। एक से एक फिल्मी धुनों पर शिव जी के भजन गाये जा रहे थे।
    बाँसुरी की आंखों से नींद उड़ी हुई थी। आज मंदिर में उसे बिल्कुल ऐसा आभास हुआ था जैसे उसके ठीक पीछे राजा ही खड़ा था, उसके बाजू से आगे बढा हाथ भी राजा ही का था, पर उस हाथ के पीछे वो मुड़ कर पलटती तब तक में पंडित जी ने उसकी ओर प्रसाद बढ़ा दिया और प्रसाद लेकर प्रणाम कर पीछे पलटते में वो मुड़ कर आगे बढ़ गया था।
     वो जब तक उसके पीछे जाती वो लंबे लंबे कदम भरता सीढियां उतर गया था, सफेद फॉर्मल शर्ट और ब्ल्यू डेनिम यही तो उसका पसंदीदा पहनावा था, कोहनी पर कमीज की बाहें समेटे हुए वो अक्सर यही कॉम्बिनेशन पहना करता था। सत्तर प्रकार की तो सिर्फ सफेद कमीज़ें थी उसके पास।
      वो जब तक आवाज़ देती वो लंबे लंबे डग भरता आगे निकल गया था।
    वो उसके पीछे मुग्धा सी चलती चली जाती अगर लीना ने हाथ पकड़ कर उसे रोक ना लिया होता। और फिर लीना के प्रपंची सवालों में वो कब आंखों से ओझल हो गया वो समझ ही नही पायी।
     मंदिर परिसर की अगरबत्तियों के धुएं के बीच भी उसका बेंटले क्रिस्टल का विदेशी परफ्यूम वो आसानी से पहचान गयी थी।
     वो तो आंखें बंद होने पर भी उसकी महक से ही उसे पहचान सकती थी।
   पर दुनिया भर में क्या कोई और लड़का बेंटले नही लगा सकता? लेकिन सोने में गूंथा रुद्राक्ष? वो तो हर लड़का नही पहन सकता, और चलो मान लो पहन भी लिया तो उसकी अंगुली का चौकोर सोलेटियर? और दूसरे हाथ की राडो?

    हो न हो वो राजा ही था। पर अगर वो आया भी था तो उसके सामने क्यों नही आया? कहीं उसे शेखर और रिदान के साथ देख कुछ गलत तो नही समझ बैठा होगा ना?
    जब मन कमज़ोर हो तो हर बात खट्टी लगने लगती है।
    दूर मंदिर में कोई फिल्मी गीत बजने लगा था…

      दूसरों के वास्ते  तू सदैव ही जिया
    माँगा कुछ कभी नहीं  तूने सिर्फ है दिया
    समुद्र मंथन का था समय जो आ पड़ा…. 
             नमो नमो जी शंकरा….


     दूर चलते इस गाने की पंक्तियां सुनती बाँसुरी राजा की याद में और भी ज्यादा खो गयी। वो भी तो ऐसा ही था, कभी किसी से उसने कुछ नही चाहा उल्टा सब के लिए सदा करता ही आया था और उसके हिस्से क्या बचा, विष का प्याला ही तो उसे भी मिला हर बार! वो भी तो यही कर आई थी । इतनी बेकार सी बात पर रूठ के चली आयी।
    और अब परिस्थितिया ऐसी बन गई थी कि वो चाह कर भी उसके पास लौट नही पा रही थी।
    लेकिन उसने भी तो पलट कर एक फ़ोन तक नही किया…
    फ़ोन !!!
        फ़ोन के बारे में आज तक उसका ध्यान ही नही गया था। वो इतने गुस्से में वहाँ से निकल गयी थी कि फ़ोन क्या उसे तो पैसों तक का होश नही था। अगर समर ने चुपके से उसके पर्स में रुपये नही डाले होते तो उसका अपने शहर पहुंचना कितना मुश्किल हो जाता।
   आने के बाद भी चार पांच दिन रोते धोते कट गए, और उसके बाद उसका ध्यान गया कि उसके पास उसका फ़ोन था ही नही।
   तभी तो पापा नया फ़ोन और नया नंबर ले आये थे उसके लिए, लेकिन उसने राजा क्या महल के किसी भी रहवासी को अपना नंबर दिया ही नही।
   तो वो बेचारा फ़ोन करेगा भी तो किस नम्बर पर।

   हे भगवान कैसे बेवकूफी पर बेवकूफी करती चली जा रही थी वो। क्या एक बार राजा को फ़ोन कर ले या नही? सोच रही थी कि उसके फ़ोन पर अलार्म बजने लगा।
    सुबह उठ कर पढ़ने के लिए लगाया अलार्म ठीक साढ़े चार पर बज उठा लेकिन वो क्या जागती , शाम के उसके करीब होने के एहसास ने ही उसकी नींद उड़ा दी थी। कितनी बेचैन हो उठी थी वो उसकी बाहों में समा जाने के लिए। उसकी खुशबू ने जैसे पागल कर दिया था उसे।
    उसका ध्यान ही नही गया कि वो जब से कमरे में आई थी इसी खिड़की पर खड़ी उसे याद करती खोई हुई थी।
    लेकिन वो नही जानती थी कि उसकी खिड़की से कुछ दूर सड़क पर ऑडी में बैठा वो भी जाग रहा था, उसे बस एक नज़र देखने ही वो इतनी दूर चला आया था।
     मंदिर में एक पल को बाँसुरी को देख वो भी कुछ सेकण्ड्स को अपना आपा खो बैठा था, एक पल को लगा उसे बाहों में कस ले और वापस अपने साथ ले जाये लेकिन वो जानता था अगर इस पल वो कमज़ोर हो गया तो उन दोनों का जीवन पटरी पर आते आते रह जायेगा।
    आज जो बुरा कर रहे उन्हें तो वो पकड़ लेगा लेकिन ऐसे जाने कितने छिपे दुश्मन बैठे हैं, उन्हें चुन चुन कर हटाने में उसे भी वक्त लगेगा आखिर…….

  ……. दोनो की ही रात आंखों ही में कट गई।
अलार्म बंद कर वो हाथ मुहँ धोने चली गयी। उसने रूम अकेले ही लिया था। वो चाहती थी कि किसी लड़की के साथ रूम शेयर कर ले जिससे कुछ पैसे भी कम खर्चने पड़ेंगे लेकिन उसके पिता ने उसके लिए सिंगल रूम ही चुना था। उसे अब शादी के बाद अपने खर्चे के लिए अपने पिता पर निर्भर रहना बहुत अखर रहा था लेकिन वो कुछ सुनने को तैयार नही थे। उसके एकाउंट में एक मोटी धनराशि डाल कर उसे उसका कार्ड थमा कर वो चले गए थे। और वो सोचती रह गयी थी कि उसके माध्यम वर्गीय पिता उसके पीछे ज़रूरत से ज्यादा खर्च क्यों कर रहे?

     उसके खिड़की से हटते ही ऑडी भी वहाँ से आगे बढ़ गयी।
   
     एयरपोर्ट पहुंचे राजा का फ़ोन एकदम से बजने लगा , उसने चौन्क कर फ़ोन उठा लिया, महल से रूपा भाभी का फ़ोन था…  इतनी सुबह उनका फोन देख वो ज़रा परेशान हो उठा…

  “कहाँ है कुंवर सा?”

  ” जी मैं ज़रा… बात क्या है भाभी साहेब?”

   ” रेखा की तबियत ज़रा बिगड़ गयी है। हमने डॉक्टर साहब को बुला लिया है , आप तो जानते हैं माँ साहेब लोग भी यहां है नही इसलिए हमने अपनी सहायिका को आपको बुलाने भेज दिया लेकिन आप कमरे में थे नही इसलिए फ़ोन लगा लिया।”

  ” भाभी साहेब आप परेशान ना हों मैं जल्दी ही पहुंच जाऊंगा , वैसे हुआ क्या रेखा को?”

  ” उनका छठा महीना चल रहा ये तो आप जानते ही हैं, विराज सा लेकिन अभी भी नही सुधरे, कल फिर कुछ ज्यादा पी ली होगी। दोनो की किसी बात को लेकर बहस हो गयी और विराज का हाथ उठ गया । रेखा नाराज़गी में कमरे से बाहर जा रही थी कि उसे रोकने की कोशीश में हुई झूमाझटकी में रेखा गिर गयी, उसके माथे और हाथों पर चोट भी आ गयी। फ़ोन पर और कितना बताएं अब आप आ जाये फिर आगे बताएंगे।”

राजा ने परेशान हो कर सीट के पिछले हिस्से पर सर टिका कर कुछ समय को आंखें मूंद ली।
    लगभग रात भर वो जागता खड़ा बाँसुरी को देख रहा था, मन कितना हल्का सा हो गया था कि तभी ये फ़ोन आ गया।
    क्या उसके जीवन में शांति से भरे सुकून के पल ही लिखना भूल गए भगवान!

   फ़ोन निकाल किसी को फ़ोन करने के बाद वो अंदर की तरफ चला गया। फ्लाइट में बैठते ही रात भर की जागती आंखें सो गई…

   ********

    सुबह छै बजे कैंटीन में बैठे शेखर और रिदान कुछ पढ़ रहे थे कि लीना अकेली ही अपने नोट्स संभाले चली आयी…
     शेखर ने एक नज़र उसे देखा फिर उसके पीछे एक बार झांक कर वापस पढ़ने लगा। कुछ देर बाद फिर एक बार रास्ते की तरफ देख किताबें देखने लगा। रिदान ने उसे टोक ही दिया

   ” शुरू कर ले ? या किसी का इंतज़ार है?”

  “नही मुझे किसका इंतज़ार होगा। चलो शुरू करें…

  कुछ देर इधर उधर बातें घुमाने के बाद शेखर आखिर लीना से पूछ ही बैठा..

” तेरी फ्रेंड नही आई आज?”

  लीना ने किताब से सर उठाया उसे देखा और वापस किताब में खो गयी

” फ़ोन किया था मैंने , शायद सो रही होगी उसने पिक नही किया!”

  “अरे तो जाकर देख लेती, कहीं तबियत ना बिगड़…

  शेखर की बात पूरी होने से पहले ही लीना बोल पड़ी

  ” यार उसकी अपनी ज़िंदगी है, चाहे जैसे पढना चाहे । तू अपना सब पर थोप नही सकता ना। अब तेरे साथ पढ़ रहे इसका मतलब तेरे हिसाब से सोए जागे ये क्या बात हुई। भई हमारा तो बॉस है तू हम तेरे हिसाब से चलते हैं लेकिन ज़रूरी नही की वो भी ऐसा कुछ सोचती हो..

   लीना अभी बोल ही रही थी कि भागती दौड़ती बाँसुरी चली आयी…

” सॉरी शेखर जी थोड़ा लेट हो गयी!”

   बाँसुरी को देखते ही शेखर ने मुस्कुरा कर लीना को देखा और लीना ने मुस्कुरा कर कंधे उचका दिए….

पढ़ते लिखते उन लोगों को समय का ध्यान ही ना रहा , वो तो छोटू ने साफ सफाई करने के बाद चारों के लिए ला कर चाय रखी तब सबने किताबों से नज़र ऊपर उठाई…

    ” मज़ा आ गया बेटा , आज तो बढ़िया पिला दी चाय! क्या मिलाया है यार?”

” पहली चाय है ना भैया इसलिए। ”

  ” तो बेटा दुबारा तिबारा में इतनी सहीं क्यों नही लगती?”

  ” अब भैया जी बनाते तो इसी चाय पत्ती से हैं, इसी बर्तन में और चाय चीनी उबाल उबाल कर बनातें हैं, जाने आपको भाती क्यों नही?”

  “हाँ बेटा तो ये जो पहली पत्ती उबाली है इसी को शाम तक उबाल उबाल कर ज़हर तैयार करते हो साले तुम!
   तुम अपना फॉर्म्युला बेचो यार रॉ वालों को।”

” क्या भैया जी कुछ भी! हमारी चाय का फारमूला कौन खरीदेगा।अब इत्ती भी तारीफ ना करिये।” 

   इतनी देर से शेखर और छोटू की बात सुनता रिदान हँसने लगा..

” अबे ये तेरा भैया जी तेरा मजाक उड़ा रहा है, चल अब निकल एक चाय और ले आ मेरे लिए।”

  ” छोटू जब भी अमेरिका जाऊंगा न तुझे साथ ले जाऊंगा मैं कमाऊंगा तू चाय पिलाना।” दांत दिखाता छोटू अंदर चला गया और लीना वापस शुरू हो गयी

  “अबे फ़कीर चंद पासपोर्ट है भी तेरे पास?”

  “सपने देखने के लिए पासपोर्ट की क्या ज़रूरत दीना? हम तो जहाँ चाहे पहुंच जातें हैं बस चुटकी बजा कर। ”

   ” शेखर यार जल्दी चाय खत्म कर, घर जाते हुए ट्यूबलाइट ख़रीदनी है। “

  “क्यों दिन में भी ट्यूबलाइट जला कर पढ़तें हो?”

  ” जलाते तो रात में ही हैं सकीना लेकिन रात में जलाना है इसलिए दिन में खरीद नही सकते क्या? अजीब लॉजिक हैं यार तेरे। इत्ता सारा दिमाग लेके पैदा कैसी हुई तू?”
   शेखर और रिदान को हँसते देख लीना का मुहँ बन गया

  ” स्वर्ग से डायरेक्ट पार्सल हो कर आई हूं। फेयरी यू नो? ”

“अबे शूर्पणखा को अंग्रेज़ी में फेयरी बोलते हैं क्या बे?”

   ” नही लेकिन शेखर को रावण ज़रूर बोलते हैं”

  लीना के चिढ़े जवाब से शेखर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा

  ” मतलब मानती तो है ना कि अपने पास दिमाग रावण वाला है।”

    शेखर ने अपने मस्तमौला अंदाज़ में किताबें समेटी और कुछ गुनगुनाता हुआ उठ कर जाने लगा

” अरे जाते जाते सुना भी दे क्या गा रहा है?”

  “गवैया नही हूँ सुनने के पैसे देने पड़ेंगे।”

  “बड़ा आया पैसे लेने वाला?
     चल आजा पांच रुपये दिए तुझे अब सुना दे…

    हंसी मजाक मस्ती में सभी अपने नोट्स समेटने लगे, शेखर वहीं खड़ा गुनगुनाता रहा…
   
      जिस रोज़ से देखा है उसको
        हम शमा जलाना भूल गए
       दिल थाम के ऐसे बैठे हैं
      कहीं आना जाना भूल गए
     अब आठ पहर इन आँखों में
     वो चंचल मुखड़ा रहता है … मेरे सामने वाली खिड़की में

    ” अबे ओये तानसेन तेरे सामने वाली खिड़की में तो बाँसुरी का कमरा पड़ता है, अफसोस ये है कि वो तेरे तरफ की खिड़की खोलती नही।”
   
    अपनी बात पर हँसती लीना बाँसुरी का हाथ थामे आगे बढ़ गयी और शेखर मुस्कुरा कर रिदान के साथ गुनगुनाता गाता उनके पीछे पीछे अपने कमरे के लिए निकल गया…
      मेरे सामने वाली खिड़की में एक चाँद का टुकड़ा..


*******

   निरमा अपने जाने के लगभग आठ दस दिन बाद लौटने वाली थी।
     प्रेम के बिना कहे भी अम्मा और सुमित्रा घर की साफ सफाई में जुटी थी, घर की मालकिन का डर दोनो की हरकतों से नज़र आ रहा था और उन्हें देख प्रेम बेसाख्ता मुस्कुरा रहा था।
      वो भी खुश था, मीठी के लिए जाने कितने खिलौने कहाँ कहाँ से उठा लाया था। उसकी उम्र से काफी बड़े बच्चों के खिलौने भी।
    नियत समय से कुछ पहले ही उन्हें लेने पहुंच भी गया, उसे लगा बच्चे और सामान के साथ अकेली निरमा को परेशानी नही होनी चाहिए।
       निरमा को मीठी के साथ मुस्कुराते हुए अपनी तरफ आते देख उसे एक पल को लगा उसकी जिंदगी लौट आयी, निरमा उससे कुछ कहना चाहती ही थी कि उसकी नज़र निरमा के साथ आ रहे मामा मामी पर भी चली गयी।
    उसने आगे बढ़ उन्हें प्रणाम किया और सबको साथ ले घर के लिए निकल गया।
   घर पहुंचते ही सब को छोड़ प्रेम काम के लिए निकलने लगा तो निरमा भाग कर उसे छोड़ने गेट तक चली आयी…

  ” सुनिए…. सॉरी!”

  ” अब किस लिए?” प्रेम आश्चर्य से निरमा को देखने लगा, उसने धीरे से अपना एक कान पकड़ा और वापस बोलने लगी

  ” मैं आप से बिना पूछे ही मामा मामी जी को साथ ले आयी। असल में मुझे लगा अभी उन्हें देखभाल की ज्यादा जरूरत है ना? और मेरी जगह उनकी खुद की बेटी होती तो क्या वो इस हालत में मामा जी को अकेले छोड़ पाती। बस मैं भी अकेले नही छोड़ पायी। मेरे लिए दोनों ने बहुत किया है बचपन से ही। अब आज मेरा भी तो फ़र्ज़ बनता….

   प्रेम ने उसके होंठों पर अपना हाथ रख उसे चुप करवा दिया….

  “सिर्फ़ तुम्हारा नही हमारा फ़र्ज़ बनता है निरमा। इस घर पर इस घर की हर एक चीज़ पर तुम्हारा हक है। तुम अपने हिसाब से निर्णय ले सकती हो उसके लिए मुझसे इज़ाज़त लेने की तुम्हे कोई ज़रूरत नही है। मालकिन हो तुम आखिर “

   ” किस किस चीज़ पर हक है मेरा?” निरमा मुस्कुराने लगी

  ” यहाँ की हर एक चीज़ पर ! इस घर पर , इस गार्डन पर यहाँ तक कि अम्मा और सुमित्रा पर भी।”

  ” और घर के मालिक पर?”
 
   निरमा की बात पर धीरे से मुस्कुरा कर प्रेम बाहर चला गया…..
  ” वो तो वैसे भी तुम्हारा गुलाम है।” खुद में बोलता वो गाड़ी निकाले आगे बढ़ गया।

    रात सब खाने पर इंतज़ार करते रहे लेकिन प्रेम कुछ व्यस्तता के कारण समर के साथ कहीं रुका रहा। उसे आने में होती देर देख कर निरमा ने सबको खिला पिला कर सबके सोने की व्यवस्था कर दी।

   समर के साथ प्रेम को शहर जाना पड़ गया था। समर के कुछ ज़रूरी काम थे जिसमें उसे प्रेम की ज़रूरत थी। लौटने के बाद भी कुछ बातें थी जो उन्हें आपस में करनी थी इसलिए समर भी प्रेम के साथ उसके घर चला आया।
     दरवाज़ा धीरे से खोल कर धीमे कदमों से प्रेम समर को साथ लिए ऊपर चला गया।
     उसे सुबह ही निरमा ने बता दिया था कि मामा जी भी नीचे ही सो जाएंगे जिससे उन्हें सीढियां चढ़ने की तकलीफ न हो।
    
     अपने कमरे में पहुंच कर लाइट्स जला कर प्रेम वापस नीचे कॉफी लेने जाने ही वाला था कि उसकी नज़र उसके बेड पर पड़ी।
    रोशनी होते ही ब्लेंकेट के नीचे से चेहरा निकाले निरमा उठ बैठी…

” आप दोनों यहाँ?”

  प्रेम निरमा को ऊपर अपने कमरे में देख चौंक गया, हड़बड़ा कर उसने समर को देखा।
    समर ने दोनों हाथ ऊपर खड़े कर दिए और मुस्कुरा कर निरमा को देखने लगा

  ” आई एम सॉरी भाभी जी! प्रेम साहब जाने किस मुगालतें में मुझे इस कमरे में ले आये। चलो भई प्रेम मैं अब चलता हूँ, तुम भी आराम करो, बाकी का काम कल देख लेंगे।”

   प्रेम कुछ कहता उसके पहले ही हंसते हुए समर प्रेम के कंधे पर हाथ से थपकी देता तेज़ कदमों से नीचे उतर गया।
     प्रेम वापस निरमा की ओर घूम गया…

” आप यहाँ? मीठी कहाँ है? “

   ” मीठी को बहुत ज़िद कर के मामी ने अपने पास सुला लिया। मैं तो बहुत देर से आपका रास्ता देख रही थी।”

    मुस्कुरा कर प्रेम दरवाज़ा बंद कर निरमा की ओर बढ़ गया….
     और दो धडकते दिल एक हो गए।

क्रमशः

aparna….



 




 
     

 
     

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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